Friday, November 6, 2026
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1576 में हुई थी बंगाल की पहली दुर्गापूजा

बंगाल के इतिहास के पन्नों को पलटें तो हमें पता चलता है कि लगभग 16वीं शताब्दी के अंत में 1576 ई में पहली बार दुर्गापूजा हुई थी। उस समय बंगाल अविभाजित था जो वर्तमान समय में बांग्लादेश है। इसी बांग्लादेश के ताहिरपुर में एक राजा कंसनारायण हुआ करते थे। कहा जाता है कि 1576 ई में राजा कंस नारायण ने अपने गांव में देवी दुर्गा की पूजा की शुरुआत की थी। कुछ और विद्वानों के अनुसार मनुसंहिता के टीकाकार कुलुकभट्ट के पिता उदयनारायण ने सबसे पहले दुर्गा पूजा की शुरुआत की। उसके बाद उनके पोते कंसनारायण ने की थी। इधर कोलकाता में दुर्गापूजा पहली बार 1610 ईस्वी में कलकत्ता में बड़िशा (बेहला साखेर का बाजार क्षेत्र) के राय चौधरी परिवार के आठचाला मंडप में आयोजित की गई थी। तब कोलकाता शहर नहीं था। तब कलकत्ता एक गांव था जिसका नाम था ‘कोलिकाता’।

अश्वमेघ यज्ञ का विकल्प बनी दुर्गापूजा
विवेकानंद विश्वविद्यालय में संस्कृत और दर्शन के प्रोफेसर राकेश दास ने बताया कि राजा कंसनारायण ने अपनी प्रजा की समृद्धि के लिए और अपने राज्य विस्तार के लिए अश्वमेघ यज्ञ की कामना की थी। उन्होंने यह इस बात की चर्चा अपने कुल पुरोहितों से की। ऐसा कहा जाता है कि अश्वमेघ यज्ञ की बात सुनकर राजा कंस नारायण के पुरोहितों ने कहा कि अश्वमेघ यज्ञ कलियुग में नहीं किया जा सकता। इसे भगवान राम ने सतयुग में किया था पर अब कलियुग करने का कोई फल नहीं है। इस काल में अश्वमेघ यज्ञ की जगह दुर्गापूजा की जा सकती है। तब पुरोहितों ने उन्हें दुर्गापूजा महात्मय बारे में बताया। पुरोहितों ने बताया कि कलियुग में शक्ति की देवी महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा की पूजा करें। मां दुर्गा सभी को सुख समृद्धि, ज्ञान और शाक्ति सब प्रदान करती हैं। इसी के बाद राजा कंसनारायण ने धूमधाम से मां दुर्गा की पूजा की। तब से आज तक बंगाल में दुर्गापूजा का सिलसिला चल पड़ा।

देवी भागवतपुराण में है दुर्गापूजा का उल्लेख
प्रोफेसर राकेश दास ने बताया कि इतिहास के अनुसार राजा कंसनारायण की पूजा के पहले दुर्गापूजा की व्याख्या देवी भागवतपुराण और दुर्गा सप्तशती में मिलती है।दुर्गा सप्तशती और देवी भागवतपुराण में शरद ऋतु में होने वाली दुर्गापूजा का वर्णन है। देवी भागवतपुराण में इसका भी उल्लेख है कि भगवान राम ने लंका जाने से पहले शक्ति के लिए देवी मां दुर्गा की पूजा की थी। देवी भागवत पुराण की रचना की तिथि पर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह एक प्राचीन पुराण है और छठवीं शताब्दी ईस्वीं से पहले रचा गया था। कुछ के अनुसार इस पुस्तक की रचना 9वीं और 14वीं शताब्दी के मध्य ई. बीच हुई थी। 4 अलग-अलग विधियों से होती है दुर्गापूजा
बंगाल में साढ़े 550 साल से अधिक पुरानी पूजा में विधियों को लेकर थोड़ा परिवर्तन हुआ है। फिर भी राज परिवारों में होने वाली पारंपरिक दुर्गापूजा चार अलग अलग विधियों में होती है। विद्वानों की माने तो पहली विधि कालिकापुराण की विधि के अनुसार है। दूसरी विधि वृहतनंदीकेश्वर विधि के अनुसार है। तीसरी विधि देवीपुराण के अनुसार और चौथी व आखिरी विधि मत्स्य पुराण के अनुसार है। राज्य के हर जिलों में होने वाली इन्हीं चार विधियों में होती है। फिलहाल पूजा की मूल विधियां समान है पर अब थोड़ा बहुत अंतर है।

भाद्र कृष्णपक्ष की नवमी को ही शुरू होती है पूजा
रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के प्रोफेसर सुब्रत मंडल ने बताया कि बंगाल की सदियों पुरानी पारंपरिक दुर्गापूजा भाद्र मास के कृष्णपक्ष की नवमी को ही शुरूहो जाती है। हिसाब से यह पितृ पक्ष में ही पड़ती है। कोलकाता के शोभाबाजार राजबाड़ी, बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर के प्रसिद्ध राजपरिवार की दुर्गा पूजा भी इसी दिन से शुरू हो जाती है। इसके बाद षष्ठी के दिन मां दुर्गा का बोधन होता है। इसमें मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है और बेल के पेड़ की पूजा की जाती है। सप्तमी के दिन नवपत्रिका पूजा होती है। इस नवपत्रिका पूजा में धान, मान अरवी, अरवी, हल्दी का पेड़, जयंती, अशोक, अनार की डाली और बेल की डाली को केले के पेड़ के साथ बांधकर पूजा की जा जाती है। उसके बाद गंगा में स्नान करवाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि नवपत्रिका पूजा मां दुर्गा के नौ रूपों की प्रकृति की शक्ति स्वरूपा पूजा है। उसके बाद अष्टमी नवमी की संध्या को संधि पूजा होती है। दशमी के दिन पारंपरिक रूप में माता दुर्गा का विसर्जन होता है।

मोगरे का गजरा लगाने के फायदे

बालों में मोगरे का गजरा सजाना सिर्फ खूबसूरती बढ़ाने का जरिया नहीं है। आइए जानते हैं इसके पीछे छिपा वैज्ञानिक तर्क, मूड व स्ट्रेस से जुड़ा कनेक्शन और इसके बेहतरीन फायदे। पूजा-पाठ या त्योहारों पर साड़ियों और लहंगों के साथ बालों में गूंथा हुआ मोगरा लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। खासकर दक्षिण भारत में महिलाओं को गजरा लगाना बहुत पसंद होता है। अक्सर महिलाओं को लगता है कि गजरा केवल श्रृंगार और बालों की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए ही लगाया जाता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा रहस्य भी छिपा हुआ है। जी हां, आयुर्वेद और आधुनिक एरोमाथेरेपी (सुगंध से इलाज) के अनुसार, मोगरे के फूलों की खुशबू हमारे दिमाग, नर्वस सिस्टम और मूड पर सकारात्मक असर डालती है।

सेहत के लिए मोगरे का गजरा – बालों में मोगरे का गजरा लगाने से मानसिक तनाव और दिनभर की थकान दूर की जा सकती है। आइए जानते हैं मोगरे के गजरे का साइंटिफिक लॉजिक और इससे होने वाले सेहत से जुड़े फायदों के बारे में –

तनाव और चिंता को कम करने में मददगार – वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के तहत मोगरे के फूलों से आने वाली खुशबू दिमाग को सुकून पहुंचाती है। जब गजरा बालों में बंधा होता है, तब उसकी खुशबू नाक के जरिए शरीर के अंदर जाती है। यह खुशबू दिमाग में सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे खुशी महसूस कराने वाले हार्मोन्स को बढ़ाती है, जो मानसिक बेचैनी, चिंता और स्ट्रेस हार्मोन के लेवल को तेजी से कम करते हैं। इसकी मदद से मन तुरंत शांत हो जाता है और मूड अच्छा रहता है।

मूड स्विंग्स और मानसिक थकान से राहत –दिनभर की भागदौड़ के बाद बालों में लगा ताजा गजरा मन को ताजगी से भर देता है। मोगरे की महक सुस्ती और दिमागी थकान को दूर करती है। एरोमाथेरेपी एक्सपर्ट्स के अनुसार, मोगरे के फूलों से निकलने वाले प्राकृतिक खुशबूदार तत्व दिमाग को रिफ्रेश करने के साथ-साथ मूड स्विंग्स और चिड़चिड़ेपन को कम करने में मदद करते हैं।

सिरदर्द और अनिद्रा की समस्या में कारगर – आयुर्वेद और पुरानी पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, मोगरे के फूलों में ठंडक देने वाले गुण मौजूद होते हैं। स्कैल्प के पास गजरा लगाने से ये फूल सिर को ठंडक पहुंचाते हैं। इससे निकलने वाली खुशबू नसों के खिंचाव को कम करके सिरदर्द से राहत दिलाती है। साथ ही, इसकी भीनी-भीनी खुशबू से रात में गहरी और अच्छी नींद आने में भी मदद मिलती है।

पसीने की बदबू से राहत – मोगरे के फूल की खुशबू एक नेचुरल इत्र या परफ्यूम की तरह काम करती है। इसी वजह से बालों में गजरा लगाने से पसीने की बदबू दूर रहती है और बाल दिनभर महकते रहते हैं। मोगरे के फूलों से बना यह गजरा बाजार में मिलने वाले केमिकल हेयर स्प्रे से कई गुना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि यह बालों को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाता है।

उफनती नदी के बीच 9 बच्चों के लिए रोज 3 किमी का सफर तय करती हैं शिक्षिकाएं

बलरामपुर । बारिश के मौसम में जब नदी और नाले उफान पर होते हैं, तब कई इलाकों में सड़कें बंद हो जाती हैं और गांवों का संपर्क आसपास के क्षेत्रों से टूट जाता है। लेकिन वाड्रफनगर विकासखंड के धौरपुर गांव में बच्चों की पढ़ाई के लिए हर दिन एक ऐसा सफर तय किया जाता है, जिसे देखकर रास्ते की मुश्किल का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यहां पदस्थ दो महिला शिक्षिकाएं संध्या हलदर और कर्मिला टोप्पो बारिश के दिनों में भी स्कूल पहुंचती हैं। पहले स्कूटर को मरना इलाके में छोड़ना पड़ता है। इसके बाद करीब तीन किलोमीटर का पथरीला और पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना होता है। रास्ते के आगे मोरन और इरिया नदियों का संगम है। बारिश के कारण जब पानी बढ़ जाता है तो यही नदी स्कूल तक पहुंचने की सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।
धौरपुर मढ़ना ग्राम पंचायत का आश्रित गांव है। जंगल और पहाड़ी क्षेत्र के बीच बसे इस गांव में करीब 15 से 20 परिवार रहते हैं। बच्चों को गांव से बाहर जाकर पढ़ाई करने में परेशानी न हो, इसलिए यहां वर्ष 2005 से प्राथमिक शाला संचालित है। इस समय स्कूल में नौ बच्चे पढ़ रहे हैं।
इन बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की जिम्मेदारी दो शिक्षिकाओं पर है। बारिश में गांव तक पहुंचने वाला रास्ता और कठिन हो जाता है। इसके बावजूद दोनों शिक्षिकाएं कोशिश करती हैं कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू शिक्षिका कर्मिला टोप्पो का सफर है। कर्मिला की नौ माह की बेटी है। बच्ची को घर पर छोड़ने की व्यवस्था नहीं होने के कारण कई बार वह उसे अपने साथ लेकर स्कूल जाती हैं।
एक तरफ बेटी को संभालने की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ नदी का तेज बहाव। इसके बावजूद कर्मिला बच्ची को गोद में लेकर नदी पार करती हैं। बारिश में पानी का स्तर बढ़ने पर नदी पार करना और भी मुश्किल हो जाता है। वह वर्ष 2014 से इसी स्कूल में पदस्थ हैं और हर साल बरसात में उन्हें इसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ता है।
यह रास्ता हर दिन पार हो जाए, ऐसा भी नहीं है। शिक्षिका संध्या हलदर के मुताबिक वे अपना स्कूटर मरना में खड़ा करती हैं और वहां से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलकर नदी तक पहुंचती हैं। जब पानी कम होता है तो किसी तरह नदी पार कर स्कूल पहुंच जाती हैं, लेकिन जलस्तर बहुत ज्यादा होने पर उन्हें नदी से ही वापस लौटना पड़ता है।
यानी स्कूल पहुंचने की उनकी यात्रा केवल दूरी तय करने की बात नहीं है। इसमें मौसम, पहाड़ी रास्ता, नदी का बहाव और बच्चों की पढ़ाई सभी एक साथ जुड़े हैं।
शिक्षिकाओं के लिए सबसे बड़ी वजह वे नौ बच्चे हैं, जो हर दिन स्कूल में उनका इंतजार करते हैं। संध्या हलदर के मुताबिक बच्चे छोटे हैं और उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो, इसकी चिंता रहती है। बच्चे जब उन्हें स्कूल पहुंचते देखते हैं तो खुश हो जाते हैं। यही लगाव उन्हें कठिन रास्ता तय करने के लिए हिम्मत देता है।
कर्मिला टोप्पो बताती हैं कि बारिश के मौसम में हर साल ऐसी स्थिति बनती है। कई लोग उन्हें तेज बहाव के दौरान नदी पार नहीं करने की सलाह भी देते हैं। इसके बावजूद जब परिस्थितियां अनुकूल होती हैं तो वह स्कूल पहुंचने की कोशिश करती हैं।
दोनों शिक्षिकाओं के इस कठिन सफर की जानकारी सामने आने के बाद बलरामपुर कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने उनकी सराहना की। जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी चंदन संजय त्रिपाठी को बलरामपुर की कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट के रूप में दर्ज किया गया है।
कलेक्टर ने कहा कि छोटे बच्चे को साथ लेकर बारिश के मौसम में नदी पार करना और करीब तीन किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचना शिक्षिकाओं की मेहनत और कर्तव्य के प्रति समर्पण को दिखाता है। उन्होंने दोनों शिक्षिकाओं को जिले के अन्य शिक्षकों के लिए उदाहरण बताया। धौरपुर की यह कहानी सिर्फ दो शिक्षिकाओं के कठिन सफर तक सीमित नहीं है। यह उस चुनौती को भी सामने लाती है, जिसका सामना बारिश में दूरस्थ और पहाड़ी इलाकों के बच्चों को करना पड़ता है।
एक तरफ शिक्षिकाएं किसी तरह स्कूल तक पहुंचकर बच्चों को पढ़ाने की कोशिश कर रही हैं, तो दूसरी तरफ हर साल बरसात में वही नदी और वही रास्ता उनके सामने खड़ा हो जाता है। ऐसे में स्थायी पहुंच मार्ग या बारिश के दिनों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था हो तो बच्चों की पढ़ाई भी सुरक्षित रह सकती है और शिक्षिकाओं को भी जोखिम भरे रास्ते से गुजरने की जरूरत कम होगी।
फिलहाल धौरपुर के नौ बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंचने वाली इन दोनों शिक्षिकाओं की कहानी यही बताती है कि कई दूरस्थ इलाकों में शिक्षा की एक कक्षा तक पहुंचने के पीछे कितनी लंबी और कठिन यात्रा छिपी होती है।

 

भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज में इंटर कॉलेज प्रतियोगिता कम्युनिके

कोलकाता ।  भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज द्वारा ‌कम्युनिके 26का आयोजन किया गया जो पूरी तरह से प्रतिभागियों की आवाज़, अभिव्यक्ति और सृजनात्मकता पर केंद्रित था। यह कार्यक्रम वाक्स पोपुली कलेक्टिव का प्रमुख कार्यक्रम है जिसका नाम कम्युनिके -26 है।यह एक जीवंत उत्सव रहा जिसमें कोलकाता के प्रमुख 21कॉलेजों के छात्र -छात्राओं ने एक साथ अपनी ऊर्जा, रचनात्मकता और अभिव्यक्तियों को पहचान दी। 15 सितंबर को सुबह 9:00 बजे शुरू हुआ जिसके मुख्य निर्णायकों में प्रसिद्ध विद्वान परनब मुखर्जी ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में भाषण कला की क्षमता को दर्शाने और अभिव्यक्ति की सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि किस प्रकार युग प्रवर्तक गांधी, डॉ अंबेडकर, चर्चिल और मंडेला के व्यक्तित्व से सभी प्रभावित हुए हैं जबकि उस समय गूगल वाट्सएप,एआई भी नहीं थे, ऐसे कालजीवी लोगों के जीवन उद्देश्यों को समझना चाहिए।नाट्य शास्त्र के प्रणेता भरत और संगीत में भीमसेन जोशी, बिस्मिल्लाह खान आदि युगों तक याद किए जाएंगे।
“नवरस” थीम पर आधारित यह कम्यूनिके -26 विभिन्न प्रतियोगिताओं से भरा हुआ है। जिसमें नौ भावनाओं की खोज और लोगों के संवाद करने के तरीके को कैसे आकार दिया गया उस पर आधारित विभिन्न प्रस्तुतियां दी गई।कार्यक्रम की शुरुआत जिनिया रॉय के भावपूर्ण संगीत प्रदर्शन के साथ हुई।।मुख्य अतिथि परनब मुखर्जी ने संचार के बारे में बोलते हुए सभा को संबोधित करते हुए समझ, अभिव्यक्तियों और साधनों पर चर्चा की। रेक्टर और डीन प्रो. दिलीप शाह ने संचार में स्पष्टता के महत्व पर प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि कैसे किसी शब्द या अक्षर में छोटा- सा परिवर्तन भी उसके अर्थ को बदल सकता है। उद्घाटन समारोह में अभिनंदन भी शामिल था । उद्घाटन प्रमुख प्रो दिलीप शाह के साथ सभी प्रतिभागियों ने एक स्वर में कार्यक्रम की शुरुआत की।इस अवसर पर कॉलेज के ईस्टर्न फ्लेम्स के नृत्य समूह ने शास्त्रीय नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी।
पोस्टर-मेकिंग प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया।
महोत्सव में विभिन्न स्थानों पर 13 कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें से प्रत्येक को एक अलग पहलू का परीक्षण करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।वाद विवाद, पैरोडी पार्लियामेंट, पैरोडी कोर्ट , मुशायरा,जैसे आयोजनों के माध्यम से कार्यक्रम जीवंत हो उठा। वहीं अंग्रेजी में भी कई विषयों पर त्वरित प्रस्तुतियां दी गई।व्हाट इफ, नेक्स्ट बेस्ट एंकर, व्लॉगिंग, किसी किताब को उसके कवर और इंग्लिश क्रिएटिव के आधार पर जज करें,लेखन की कल्पना, कहानी कहने के माध्यम से अदभुत या आश्चर्य के तत्व की खोज आदि विभिन्न विषयों पर प्रस्तुति जो सभी के लिए विशेष और रुचिकर रहा।डॉ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि सभी विजेताओं को पुरस्कृत किया गया।

भवानीपुर कॉलेज में में 545 विद्यार्थियों ने किया रक्तदान

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने ब्लड डोनेशन कार्निवाल 2026का उद्घाटन समारोह उत्सव के रूप में मनाया। 545 विद्यार्थियों ने रक्तदान देकर समाज और राष्ट्र के प्रति देश भक्ति का परिचय दिया।कॉलेज के अध्यक्ष रजनीकांत भाई दानी ने ब्लड डोनेशन उत्सव का उद्घाटन प्रमुख कार्यकर्ताओं और शिक्षक शिक्षिकाओं का घेरा बना कर समाज के जिम्मेदार नागरिक होने का गौरव माना। रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने सभी नये विद्यार्थियों का स्वागत किया ।वाडिया हॉल में रक्तदान के लिए आए सभी छात्र छात्राओं का रक्त देने के पूर्व डॉक्टर द्वारा चेकप किया गया जिसकी पूर्ण व्यवस्था की गई । हर बेड के पास वोलिंटियर्स और हेल्थकेयर के कम्पाऊंडर मौजूद रहे।कॉलेज के अध्यक्ष रजनीकांत भाई दानी ने दीप प्रज्वलित किया।साथ में मैनेजमेंट पदाधिकारियों में नलिनी पारख, सोहिला भाटिया, बुलबुल भाई,संयोजक रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह, वाइस प्रिंसिपल प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो गार्गी,प्रो विवेक पटवारी, प्रोजेक्ट लाइफ फोर्स के लक्ष्मी जी, धानीश जी और बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। इस बार ब्लड डोनेशन की थीम अब आपकी बारी है( it’s your turn)थी।
भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज में युवा विद्यार्थियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।इस बार ब्लड डोनेशन में 545 यूनिट रक्त दान हुआ। भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज में ब्लड डोनेशन में विद्यार्थियों ने बहुत अधिक संख्या में भाग लिया और छात्र छात्राओं ने रजिस्ट्रेशन कराया जिसमें कई विद्यार्थी अनफिट भी रहे। रक्त दान में प्रोजेक्ट लाइफ फोर्स का योगदान रहा।सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि बहुत बड़ी संख्या में एनसीसी कैडेट्स और विद्यार्थियों ने प्रथम बार रक्तदान किये। उपाध्यक्ष श्री मिराज डी शाह ने ब्लड डोनेशन के लिए विद्यार्थियों को विभिन्न सुविधाएं दी गई और रक्तदान के लिए उत्साहित किया। विद्यार्थियों के लिए नाश्ता, जूस, ग्लूकोज़ और रक्तदान के बाद भोजन की व्यवस्था की गई। गीत संगीत और नृत्य द्वारा विद्यार्थियों ने रक्तदान उत्सव मनाया ।एनसीसी के कैडेट्स ने रक्तदान किया और कैप्टन आदित्य राज ने व्यवस्था में अपना योगदान दिया। डॉ वसुंधरा मिश्र ने कार्यक्रम की जानकारी दी।

डॉ. आनंद श्रीवास्तव की कविताएं

 

डॉ. आनंद श्रीवास्तव

ऋषि दुर्वासा का शाप

आक्रोश और आवेश से भरे हुए ऋषि दुर्वासा
अब शापित करना भूल गए क्या ?
या सूख गया कमण्डल का वह जल
जिसे हाथों में लेकर भस्म हो जाने की आज्ञा दी जाती थी ।
क्या सारे लोग अस्तित्व संकट से जूझते – जूझते संन्यास ले चुके?
या धरती का पाप न्यूटन के थर्ड लॉ ऑफ़ मोशन की तरह
प्रत्येक क्रिया के बराबर विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया
करते – करते इतना कुटज बन गया है
जिसे ना उखाड़ा जा सकता है ना काटा जा सकता है ।।

सड़क 

सड़क चाहे जितनी भी लंबी हो ,
इंतज़ार में टिकी नज़रों को खुद पर भरोसा करना आना चाहिए ।
देख सकते हो तो देखो – हर मोड़,हर गली ,हर किनारों को ;
सड़क कभी ख़त्म नहीं होती ,
एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक जाने की कड़ी जोड़ती है।
दुःख, चिंता, आंसू, ग्लानि , शिकायत की न कोई भाषा होती है ,न जाति,न धर्म ।
दूध, ख़ून और आँसुओं का जैसे कोई बंटवारा नहीं होता
वैसे ही सड़क की भी ना कोई जाति, कोई धर्म और कोई भाषा नहीं होती ।

सड़क सबको अपने साथ लेकर चलती है
क्योकि सबकी मंजिल तक पहुंचाना ही
उसके होने की सार्थकता है।
सड़क हमारे लिए भरोसा है , साहस है और शायद उम्मीद भी ।
जब भी थक जाता है मन,
सड़क के इस छोर से उस छोर तक चलना अच्छा लगता है,
सड़क पर मिलते हैं लोग- हर भेदभाव से परे ,
और उन लोगों में मिलती है जिजीविषा,
आस्था और जीवन के प्रति व्याकुलता ।

नज़र ढूंढती है सुकून के दो पल
और सड़क चलती ही रहती है,
जैसे किसी मंजिल की तलाश में चलते हैं हम बेपरवाह ….
जैसे मछली की तलाश में मछुआरे .
जैसे बिना किसी आशियाने के
खुली गगन के नीचे धरती के टुकड़ों पर
छाँव तलाशते हुए बंजारे ।

मत बाँटो हमें,
जीने दो अपनी जिंदगी अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी से ।
हमें ना तुमसे शिकायत है और ना ही कोई उम्मीद ;
हमारी सार्थकता सड़क बने रहने में है।

और इंतज़ार में टिकी नज़रों को
ख़ुद पर भरोसा करना भी आ गया है।

…………………..

You are within me

You are far from me,
Yet somehow you are always close ..
I am alive because within me ,
You are the very feeling of being alive ..

The World is painted in a thousand colors
from the earth beneath my feet
to the endless blue of the sky,
from the tender green of the trees
to the magic of the rainbow.
And in every color I see,
there is a little part of you,
Beyond every color,every star ,and every dreams,
You are the closest to me
My own reflection, my soul’s most beautiful echo.

You are distant ,
Yet you live so close to my heart..
You are the sailor’s oar
as it searches for a shore,
in the thunder that tears through the silence,
in the wind ,passoinate rhythm of the rain ,
in the moon that watches over the night ,
and in every star that lights up the sky.

Form this world to whatever lies beyond,
Wherever life may take us,
You are with me .
You are beside me
You are within me .
You are far away,
Yet closer than anyone could ever be ,

And perhaps that is what makes you so special…
You are not merely a part of my life ,
You are the feeling that make my life beautiful…

 

बंगाल में बनेंगे चार नए रीजनल एयरपोर्ट

कोलकाता, नि.सं.। पश्चिम बंगाल में एयर कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए राज्य में चार और रीजनल एयरपोर्ट विकसित किए जाएंगे। इसके लिए अगले हफ्ते केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होगा। यह एमओयू साइनिंग प्रोग्राम 23 सितंबर को राज्य सचिवालय नवान्न के मुख्य सभागार नबन्ना सभागार में आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी मौजूद रहेंगे। एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि कार्यक्रम की तैयारियां शुरू हो गई हैं। प्रस्तावित चार रीजनल एयरपोर्ट पुरुलिया जिले के छर्रा, दक्षिण दिनाजपुर के बालुरघाट, अलीपुरद्वार के हासीमारा और पश्चिम मिदनापुर के कलाईकुंडा में बनेंगे। इनमें हासीमारा और कलाईकुंडा भारतीय वायुसेना के महत्वपूर्ण बेस भी हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “राज्य सरकार इन प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन, बिजली, पानी और अन्य सेवाएं उपलब्ध कराएगी। केंद्र सरकार एयरपोर्ट के बुनियादी ढांचे का विकास करेगी और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया एयर ट्रैफिक की जिम्मेदारी संभालेगी।”
इस मौके पर केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू, पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह, मुख्य सचिव मनोज कुमार अग्रवाल, केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सचिव, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के चेयरमैन और संबंधित जिलों के सांसद व विधायक भी मौजूद रहेंगे।
यह एमओयू केंद्र सरकार की संशोधित ‘उड़ान 6.0’ योजना के तहत साइन किया जाएगा। बता दें कि मॉडिफाइड उड़ान योजना भारत की रीजनल एयर कनेक्टिविटी स्कीम का अगला चरण है।
अधिकारी के अनुसार, इस एमओयू के साइन होने से पुरुलिया, दक्षिण दिनाजपुर, अलीपुरद्वार और पश्चिम मिदनापुर में हवाई संपर्क के बुनियादी ढांचे और रीजनल हवाई सेवाओं को मजबूती मिलेगी।
केंद्र की रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम के तहत समझौते के अनुसार राज्य सरकार जरूरी जमीन, संपर्क सड़कें, बिजली आपूर्ति, पानी की आपूर्ति और बुनियादी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेगी, जबकि केंद्र सरकार एयरपोर्ट का बुनियादी ढांचा तैयार करेगी।

 

बंगाल में दुर्गा पूजा से पहले 25 हजार करोड़ की परियोजनाओं का होगा शिलान्यास

कोलकाता, नि.सं. । पश्चिम बंगाल में बड़े औद्योगिक निवेश को लेकर चर्चा के बीच भाजपा की प्रदेश महासचिव लॉकेट चटर्जी ने बुधवार को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर उद्योगपति और आरपी-संजिव गोयनका समूह के चेयरमैन संजीव गोयनका का एक वीडियो साझा किया है। गोयनका ने पश्चिम बंगाल में करीब 25 हजार करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव का उल्लेख किया है। लॉकेट चटर्जी ने इसे बंगाल में निवेश और औद्योगिक विकास के संदर्भ में साझा करते हुए ‘पहले और अब’ की तुलना का राजनीतिक संदेश दिया है।
गोयनका ने बताया कि राज्य में वितरण कारोबार को मजबूत करने के लिए अब तक मुख्य रूप से वितरण नेटवर्क के आधुनिकीकरण, मीटरिंग व्यवस्था और अन्य कार्यों पर हर साल करीब 100 करोड़ रुपये का निवेश किया जाता रहा है। उनके मुताबिक, अब करीब 25 हजार करोड़ रुपये के बड़े निवेश का प्रस्ताव राज्य सरकार के समक्ष रखा गया है और इसे सरकार की मंजूरी भी मिल चुकी है।

गोयनका ने यह भी संकेत दिया है कि इस निवेश से जुड़ी परियोजना का शिलान्यास दुर्गापूजा से पहले किया जा सकता है। बंगाल में दुर्गा पूजा के पहले पांच हजार मेगावाट-घंटे क्षमता वाली बैटरी ऊर्जा भंडारण परियोजना का शिलान्यास होने जा रहा है। गोयनका समूह की ओर से इससे पहले ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ी बैटरी ऊर्जा भंडारण परियोजना की घोषणा की जा चुकी है। दिसंबर 2025 में संजीव गोयनका ने 5,000 मेगावाट-घंटे क्षमता वाली बैटरी ऊर्जा भंडारण परियोजना के लिए करीब 12 हजार करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की थी। गोयनका के अनुसार, परियोजना के पूरा होने के बाद कोलकाता की बिजली जरूरतों का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करने में मदद मिल सकती है। गोयनका समूह ने दिसंबर 2025 में ऊर्जा, शिक्षा और स्वास्थ्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में कुल 15,800 करोड़ रुपये के प्रस्तावित पूंजीगत निवेश की जानकारी दी थी। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा 5,000 मेगावाट-घंटे की ऊर्जा भंडारण परियोजना का था, जिस पर करीब 12 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान बताया गया था। समूह की ओर से इस परियोजना के लिए जमीन को लेकर आवेदन किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।
समूह ने शिक्षा क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए करीब 500 करोड़ रुपये तथा स्वास्थ्य क्षेत्र में विस्तार के लिए निवेश की योजना का उल्लेख किया था। प्रस्तावित निवेश में एक बड़े अस्पताल की योजना भी शामिल है।

देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किए थे ऐसे अद्भुत निर्माण

अक्सर हम भगवान विश्वकर्मा के बारे में सुनते तो रहते हैं लेकिन बहुत ही कम लोग इनके विषय में जानते हैं। चलिए जानते हैं कि भगवान विश्वकर्मा ने किन-किन स्थानों का निर्माण किया, जिनके आधार पर उन्हें देव शिल्पी की उपाधि प्राप्त हुई –
विश्वकर्मा भगवान का परिचय
स्कंद पुराण के अंतर्गत विश्वकर्मा भगवान का परिचय “बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी। प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च। विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति” श्लोक के जरिए मिलता है।
श्लोक का अर्थ
इस श्लोक का अर्थ है महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मविद्या की जानकार थीं। उनका विवाह आठवें वसु महर्षि प्रभास के साथ संपन्न हुआ था। विश्वकर्मा इन दोनों की ही संतान थे।
ब्रह्मा जी का पुत्र कहा गया है
कहीं-कहीं भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मा जी का पुत्र भी कहा गया है, जिन्हें देवताओं का शिल्पी के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा विश्वकर्मा भगवान को सभी शिल्पकारों और रचनाकारों का भी इष्ट देव माना जाता है।
विश्वकर्मा भगवान को ब्रह्मांड का रचयिता भी माना जाता है, ऋग्वेद के अंतर्गत इन्हें सर्वश्रेष्ठ सत्य के तौर पर भी उल्लिखित किया गया है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की सोने की खूबसूरत लंका का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था। पुराणों के अनुसार माल्यवान, माली और सुमाली नामक तीन राक्षस भगवान विश्वकर्मा के पास गए और उनसे अपने लिए भव्य महल और राज्य का निर्माण करने के लिए कहा।
धन कुबेर के लिए लंका बनाई जो रावण की हो गयी
जबकि कुछ स्थानों पर यह पढ़ने को मिलता है कि रावण के सौतेले भाई, धन कुबेर के कहने पर ही विश्वकर्मा ने सोने की लंका निर्माण किया था। इस लंका को बाद में धन कुबेर ने ही रावण को दे दिया था।
रामसेतु का निर्माण
जब रावण सीता का हरण कर अपने पुष्पक विमान पर बैठाकर उन्हें लंका से जाता है तब वहां तक पहुंचने के लिए भगवान राम की आज्ञा पाकर वानर सेना ने सागर पर पुल बांधा था।
नल
वाल्मीकि रामायण के अनुसार शिल्पकला में निपुण नल नामक वानर जो विश्वकर्मा का ही पुत्र था, ने रामसेतु का निर्माण किया था।
भगवान शिव के रथ का निर्माण
जिस रथ पर बैठकर महादेव ने विद्युन्माली, तारकाक्ष और कमलाक्ष का वध किया था, उस रथ का निर्माण करने वाले भगवान विश्वकर्मा ही थे। महादेव का यह रथ सोने का था जिसके दाहिने चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विराजमान थे। इसके अलावा दाहिने पहिए में 12 और बाएं पहिए में 16 आरे थे।
द्वारका नगरी का निर्माण
श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी का निर्माण करने वाले भी भगवान विश्वकर्मा ही थे। इस नगरी के आधार पर भगवान विश्वकर्मा ने अपनी वैज्ञानिक समझ की एक अद्भुत मिसाल पेश की थी। द्वारका नगरी की लंबाई और चौड़ाई, दोनों ही 48 कोस की थी। वास्तुशास्त्र के अनुसार इस नगरी में भवन, सड़के, गलियों और चौराहों का निर्माण किया गया था।
देवताओं के शिल्पकार
देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा को समर्पित विश्वकर्मा दिवस भी मनाए जाने की परंपरा है। विश्वकर्मा पूजा पर सभी कारीगर अपने-अपने औजारों की पूजा करते हैं।

महानायक उत्तम कुमार के नाम पर न्यू टाउन में बनेगा फिल्म सेंटर

कोलकाता,  नि.सं.। बांग्ला सिनेमा के महानायक उत्तम कुमार की जन्म शताब्दी के अवसर पर राज्य सरकार ने फिल्म जगत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य के सूचना एवं संस्कृति विभाग की ओर से न्यू टाउन में ‘उत्तम कुमार फिल्म सेंटर’ का निर्माण किया जाएगा। करीब 25 करोड़ की लागत से बनने वाले इस फिल्म सेंटर की आधारशिला रखी जाएगी। शुक्रवार सुबह मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने महानायक उत्तम कुमार की जयंती शतवर्षिकी के उपलक्ष्य में आयोजित वाक का नेतृत्व किया। इससे पहले गुरुवार शाम नंदन परिसर में राज्य सरकार के सूचना एवं संस्कृति विभाग की पहल पर महानायक उत्तम कुमार की जन्म शताब्दी वर्ष समारोह की शुरुआत हुई। सरकार के अनुसार, प्रस्तावित उत्तम कुमार फिल्म सेंटर को तीन प्रमुख हिस्सों में विकसित किया जाएगा। पहले हिस्से में 700 से 750 सीटों की क्षमता वाले दो सिनेमा हॉल, एक पूर्वावलोकन थिएटर, भोजनालय और वाहन पार्किंग की सुविधा होगी। दूसरे हिस्से में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए करीब 1,000 दर्शकों की क्षमता वाला सभागार और खुले में रंगमंच बनाया जाएगा। फिल्म सेंटर का तीसरा हिस्सा आधुनिक फिल्म तकनीक पर केंद्रित होगा। यहां एनीमेशन, दृश्य प्रभाव, गेमिंग, कॉमिक्स, आभासी वास्तविकता और फिल्मों के निर्माण के बाद के तकनीकी कार्यों के लिए प्रयोगशालाएं और स्टूडियो विकसित किए जाएंगे। सरकार का कहना है कि यह सुविधा राज्य के मीडिया और मनोरंजन उद्योग के लिए महत्वपूर्ण सहायक केंद्र के रूप में काम करेगी। पश्चिम बंगाल सरकार के अनुसार, बंगाली फिल्मों में एनीमेशन और दृश्य प्रभावों की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण होने वाली है। पारिवारिक कहानियों के साथ अब साहसिक और काल्पनिक फिल्मों की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। ऐसे में आधुनिक तकनीक के माध्यम से फिल्मों में जंगल, काल्पनिक जीव और प्राचीन शहरों जैसे दृश्यों को अधिक वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।