ऊषा उत्थुप के संघर्ष की बात करें, इससे पहले कुछ गाने याद कीजिए. ‘दोस्तों से प्यार किया, दुश्मनों से बदला लिया… जो भी किया हमने किया…शान से’, ‘हरि ओम हरि-हरि ओम हरि, ‘रंबा हो हो… संबा हो, कोई यहां आहा नाचे नाचे, कोई वहां आहा नाचे नाचे, एक दो च च च, डार्लिंग आंखों से आंखे चार करने दो।
ये वो चुनिंदा गाने हैं जो कहीं भी बज रहे हों, आप गुनगुनाने लगते हैं. ये सारे गाने प्लेबैक सिंगर ऊषा उत्थुप की बड़ी पहचान हैं। उनकी आवाज अलग है। उनकी अदायगी अलग है. उनका अंदाज अलग है. लेकिन ये पहचान बनाना उनके लिए बहुत मुश्किल था। हुआ यूं कि ऊषा को गायकी का शौक बचपन से था. एक रोज वो स्कूल टीचर के पास गईं। छोटी सी ऊषा ने संगीत सीखने की इच्छा जताई. टीचर ने जब ऊषा उत्थुप का गाना सुना, तो उन्होंने मना कर दिया। शिक्षक का कहना था कि ऊषा की आवाज गायकी के लिए है ही नहीं. गायकी के लिए आवाज में मुलायमियत होनी चाहिए जबकि ऊषा उत्थुप की आवाज मर्दानी आवाज के काफी करीब थी। शिक्षक के इस बेरूखे अंदाज का सामना कम ही बच्चे कर सकते हैं। आप ही सोच कर देखिए अगर किसी छोटी सी बच्ची को टीचर ऐसे मना कर दे तो ज्यादातर बच्चे मायूस हो जाएंगे। उनकी आंखों में आंसू होंगे लेकिन ऊषा उत्थुप ने इसका ठीक उलट किया. उन्होंने टीचर की बात को ही अनसुना कर दिया, जैसे गाती थीं वैसे ही गाती रहीं।
ऊषा उत्थुप को कहां से लगा संगीत का चस्का – आजादी के कुछ ही महीने बाद की बात है. मुंबई में ऊषा उत्थुप का जन्म हुआ। पिता क्राइम ब्रांच में नौकरी करते थे. ऐसे परिवार में संगीत हो, ऐसा कम ही सोचा जाएगा लेकिन ऊषा की मां को संगीत का बहुत शौक था. वो शौकिया गाती भी थीं। दिलचस्प बात ये है कि पचास के दशक में भी ऐसा नहीं था कि इस परिवार में कुछ चुनिंदा कलाकारों को सुना जाता हो. बल्कि गजब की वेराइटी थी. वेस्टर्न क्लासिकस में बीथोवेन, मोजार्ट सुने जाते थे। भारतीय शास्त्रीय संगीत में पंडित भीमसेन जोशी, बड़े गुलाम अली खान, बेगम अख्तर से लेकर किशोरी अमोनकर की आवाज घर में गूंजती रहती थी यानि संगीत के शौक की ‘रेंज’ भी कमाल की थी। ऊषा उत्थुप में संगीत के संस्कार यहीं से आए।स्कूल में जैसे ही खाली समय मिलता ऊषा उत्थुप की गायकी शुरू हो जाती। पढ़ाई की टेबल तबले में तब्दील हो जाती. क्लास के बाकि बच्चे ‘कोरस’ में शामिल हो जाते।
ये सिलसिला काफी समय तक चला. घर पर ऊषा की बहनों को भी गाने का शौक था। कुल मिलाकर संगीत सुनने का चस्का धीरे-धीरे गायकी सीखने की तरफ बढ़ा लेकिन जब संगीत सीखने की इच्छा जताई तो उन्हें नकार दिया गया लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि ऊषा ने अपने इरादे मजबूत कर लिए. ऊषा 22 साल की थीं, मद्रास में एक कार्यक्रम में उन्होंने गाया। खूब तालियां बजीं. हालांकि वो एक इंग्लिश गाना था। उस दिन मिली तारीफ से ऊषा उत्थुप को एक बड़ा सबक मिला. उन्होंने समझ लिया कि अगर गायकी में पहचान बनानी है तो सबसे पहले ‘ओरिजिनल होना बहुत जरूरी है। इसके बाद वो गायकी के रास्ते पर निकल गयी।
नाइट क्लब में गायकी से शुरू हुआ था सफर – ऊषा उत्थुप ने तो सिंगर बनने का फैसला कर लिया था, लेकिन वो उस दौर में ये प्रयास करने जा रही थीं जब इंडस्ट्री में लता मंगेशकर, आशा भोंसले जैसी गायिका थीं. ऐसे में ऊषा का सफर नाइट क्लब में गायकी के साथ शुरू हुआ। दिल्ली में ऐसे ही एक कार्यक्रम के दौरान ऊषा उत्थुप की किस्मत बदली. दिल्ली से पहले मद्रास, कोलकाता जैसे शहरों में भी ऊषा उत्थुप ने नाइट क्लबों में गायकी की थी। ऊषा की वेशभूषा भी अलग ही होती थी- आज भी वो वैसी ही हैं। चटक रंग की साड़ी… बड़ी सी बिंदी. ऊषा जब नाइट क्लब में फिल्मी गाने गाती थीं तो उस दौरान एक और गाना उनका पसंदीदा था-काली तेरी गुथ ते परांदा तेरा लालनी। दिल्ली के उस नाइट क्लब में नवकेतन फिल्म्स की यूनिट के कुछ बड़े लोग मौजूद थे। उस समय ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ फिल्म के लिए काम चल रहा था। ये उस दौर के बहुत बड़े स्टार देव आनंद की फिल्म थी। इस फिल्म का संगीत पंचम दा बना रहे थे। फिल्म की यूनिट के लोगों ने क्लब में गा रही लड़की के बारे में पता किया। सारी जानकारी इकट्ठा करने के बाद उन्होंने ऊषा उत्थुप से संपर्क किया. ऑफर बिल्कुल सीधा था- क्या आप हमारी अगली फिल्म में गाएंगी? ऊषा के सामने कोई ऐसी वजह नहीं थी कि वो मना करतीं. उन्होंने हामी भर दी। उस फिल्म के लिए गाना बना- हरे कृष्णा हरे राम…बाकि इसके बाद की कहानी इतिहास में दर्ज है। ऊषा उत्थुप के गाने पर आज भी लोग झूमते हैं- नाचते हैं। ऊषा उत्थुप गायकी के साथ साथ एक्टिंग भी कर चुकी हैं लेकिन वो कहती है उन्होंने जो गाया दिल से गाया। अपनी जिंदगी को वो अपने ही गाने से परिभाषित करती हैं- दोस्तों से प्यार किया, दुश्मनों से बदला लिया… जो भी किया हमने किया…शान से।
पद्म पुरस्कार 2024 : पद्मश्री से सम्मानित होंगी मशहूर गायिका ऊषा उत्थुप
गणतंत्र दिवस विशेष : संविधान ही नहीं, अधिकार भी जानें
भारत आज अपना 75वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। गणतंत्र दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है। इस दिन भारत का संविधान लागू हुआ था। भारत ने आज के दिन समानता, धर्मनिरपेक्षता और स्वशासन के लिए प्रतिबद्ध एक गणतंत्र के रूप में अपनी पहचान अपनाई। हमारे संविधान ने महिलाओं को आजादी से जीने के लिए कई अधिकार दिए हैं, जिनका इस्तेमाल हम एक सम्मान भरी जिंदगी जीने के लिए कर सकते हैं। लेकिन अपने संविधान की ही तरह क्या वाकई महिलाएं अपने अधिकारों को अच्छी तरह जानती हैं। समाज इस बात को स्वीकार करे या ना करे, पर यह सच्चाई है कि महिलाओं पर जिम्मेदारियों का दोहरा बोझ होता है। घर,ऑफिस,बच्चे,परिवार और रसोई की जिम्मेदारियां अकसर एक-दूसरे से घालमेल होती नजर आती हैं। पर, जिम्मेदारियों का इतना बोझ उठाने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें अपने सारे वाजिब अधिकार भी मिल जाते हैं। कभी वह घर में तिरस्कार का शिकार हो जाती है, तो कभी ऑफिस में शोषण का। उसे कई बार सिर्फ औरत होने का खामियाजा भुगतना पड़ता है, तो कई बार अपने अधिकारों की जानकारी का अभाव उसे शोषण का शिकार रहने के लिए मजबूर कर देता है। यह समझना जरूरी है कि हम महिलाओं के ऊपर सिर्फ जिम्मेदारियों का बोझ ही नहीं है बल्कि हमारे पास अपनी हिफाजत के लिए कई अधिकार भी हैं। जैसे मातृत्व अवकाश का अधिकार, घर में रहने का अधिकार, ऑफिस में समान वेतन का अधिकार, अपनी बात रखने का अधिकार आदि। समय की जरूरत है कि हम महिलाएं ना सिर्फ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें बल्कि उन्हें उठाने के लिए उचित कदम भी उठाएं।
मातृत्व से जुड़े अधिकार- क्या आप जानती हैं कि गर्भवती महिलाओं को संविधान द्वारा कुछ खास अधिकार प्राप्त हैं? संविधान के अनुच्छेद -42 के तहत कामकाजी महिलाओं को तमाम अधिकार हासिल हैं। इसमें महिला यदि किसी सरकारी और गैर सरकारी संस्था, फैक्ट्री में जिसकी स्थापना इम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट, 1948 के तहत हुई हो में काम करती है, तो उसे मातृत्व से जुड़े तमाम लाभ मिलेंगे, जिसमें 12 सप्ताह से लेकर छह माह तक का मातृत्व अवकाश शामिल है। इस अवकाश को वह अपनी आवश्कता के अनुसार ले सकती है। गर्भपात की स्थिति में भी इस एक्ट का लाभ मिलता है। महिला गर्भावस्था या फिर गर्भपात के चलते बीमार हो जाती है, तो मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उसे अतिरिक्त एक महीने की छुट्टी मिल सकती है। महिला को मैटरनिटी लीव के दौरान किसी तरह के आरोप पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। अगर उसे यह सुविधा नियोक्ता द्वारा नहीं दी जाती है, तो वह इसकी शिकायत कर सकती है। यहां तक कि वह कोर्ट भी जा सकती है।
मुफ्त कानूनी सलाह का अधिकार – अगर कोई महिला किसी केस में आरोपी है, तो वह मुफ्त कानूनी मदद ले सकती है। वह अदालत से मुफ्त में सरकारी खर्चे पर वकील की गुहार लगा सकती है, जिसे महिला की आर्थिक स्थिति देखते हुए मुहैया कराया जाता है। पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता कमिटी से संपर्क करती है और महिला की गिरफ्तारी के बारे में उन्हें सूचित किया जाता है। लीगल ऐड कमेटी महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देती है।
स्त्री धन है सिर्फ आपका – स्त्री धन? हैरान होने की जरूरत नहीं है। यह वह धन है, जो महिला को शादी के वक्त उपहार के तौर पर मिलता है। इस पर महिला का पूरा हक होता है। इसके अतिरिक्त वर-वधू दोनों के इस्तेमाल के लिए साझा सामान दिए जाते हैं, वह भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस बाबत वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव गुप्ता कहते हैं कि अगर ससुरालवालों ने महिला का स्त्री धन अपने पास रख लिया है तो महिला इसके खिलाफ आईपीसी की धारा 406 (अमानत में खयानत) की भी शिकायत दर्ज करा सकती है।
आपकी हां, है जरूरी – महिला की सहमति के बिना उसका गर्भपात नहीं कराया जा सकता। जबरन गर्भपात कराए जाने के लिए सख्त कानून मौजूद हैं। अब आप सोच रही होंगी कि गर्भपात करना ही कानूनी नहीं है। पर, कुछ खास परिस्थितियों में गर्भपात कराया जा सकता है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रग्नेंसी एक्ट के तहत अगर गर्भ के कारण महिला की जान को खतरा हो या फिर स्थिति मानसिक और शारीरिक रूप से गंभीर परेशानी पैदा करने वाली हों या फिर गर्भ में पल रहा बच्चा विकलांगता का शिकार हो तो गर्भपात कराया जा सकता है।
लिव इन के भी हैं अधिकार – अब लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। पर यहां सबसे पहले यह समझना होगा कि आखिर लिव इन है क्या? सिर्फ उसी रिश्ते को लिन-इन रिलेशनशिप माना जा सकता है, जिसमें स्त्री और पुरुष विवाह किए बिना पति-पत्नी की तरह रहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि दोनों बालिग और शादी योग्य हों। यदि दोनों में से कोई एक भी पहले से शादीशुदा है, तो उसे लिव-इन रिलेशनशिप नहीं कहा जाएगा। इस रिश्ते में रहने वाली महिलाओं को भी घरेर्लू ंहसा कानून के तहत सुरक्षा हासिल है। अगर उसे किसी भी तरह से प्रताड़ित किया जाता है, तो वह अपने साथी के खिलाफ इस एक्ट के तहत शिकायत कर सकती है। ऐसे में संबंध में रहते हुए उसे राइट-टू-शेल्टर भी मिलता है। यानी जब तक यह रिश्ता कायम है, तब तक उसे घर से निकाला नहीं जा सकता। लिव-इन में रहने वाली महिला गुजारा भत्ता पाने की भी अधिकारी है।
एफआईआर दर्ज होगी कहीं भी – डीवी एक्ट की धारा-12 इसके तहत महिला मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की कोर्ट में शिकायत कर सकती है। शिकायत की सुनवाई के दौरान अदालत सुरक्षा अधिकारी से रिपोर्ट मांगता है। महिला जहां रहती है या जहां उसके साथ घरेर्लू ंहसा हुई है या फिर जहां प्रतिवादी रहते हैं, वहां शिकायत की जा सकती है। सुरक्षा अधिकारी घटना की रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करता है और उस रिपोर्ट को देखने के बाद अदालत अपना आदेश पारित करती है। इस दौरान अदालत महिला को उसी घर में रहने देने , खर्चा देने या फिर उसकी सुरक्षा का आदेश दे सकती है। अगर अदालत महिला के पक्ष में आदेश पारित करती है और प्रतिवादी उस आदेश का पालन नहीं करता है तो डीवी एक्ट-31 के तहत प्रतिवादी पर केस बनता है।
पिता की नौकरी पर भी है अधिकार – नौकरी पर रहते हुए पिता की मौत होने पर बेटियों को भी मुआवजे के तौर पर नौकरी पाने का अधिकार है। फिर चाहे बेटी शादीशुदा हो या कुंवारी। 2015 से लागू हुए नियम के तहत नौकरी में रहते हुई पिता की मौत पर शादीशुदा बेटी भी मुआवजे में पिता की नौकरी पाने का अधिकारी रखती है।
समान वेतन का अधिकार – समानता का अधिकार महिलाओं के कार्यक्षेत्र में सामान वेतन पर भी लागू होती है, जिसमें एक जैसा काम करने वाले महिला-पुरुष को एक सा वेतन मिलेगा । कंपनी में जितनी भी सुविधा पुरुष कर्मचारी को मिलती है, उतनी ही सुविधा महिला कर्मचारी को भी मिलेगी। कुछ खास जगहों को छोड़कर शाम सात बजे के बाद और सुबह छह बजे के पहले महिला कर्मचारी को काम पर नहीं लगाया जा सकता है। छुट्टी के दिन महिला कर्मचारी को काम पर नहीं बुलाया जा सकता है। अगर उन्हें बुलाना है तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है। अगर कोई कंपनी इस कानून को मानने से इंकार करती है तो उसके मालिक को सजा का प्रावधान है। समस्या होने पर श्रम आयुक्त से शिकायत की जा सकती है।
घरेलू हिंसा का शिकार महिला को घर में रहने का पूरा अधिकार है। धारा 17-18 के तहत कानून प्रक्रिया के अतिरिक्त उसका निष्कासन नहीं किया जा सकता।
घरेलू हिंसा की शिकायत व्यक्ति के घरेलू संबंध में रहने वाली महिला के द्वारा अथवा उसके प्रतिनिधि द्वारा दर्ज कराई जा सकती है। पत्नी, बहनें ,माताएं, बेटियां भी शिकायत दर्ज करवा सकती हैं।
आईपीसी की धारा 354डी के अंतर्गत किसी महिला का पीछा करने, बार-बार मना करने के बाद भी संपर्क करने, इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेश जैसे ई-मेल, इंटरनेट आदि के जरिए मॉनिटर करने वाले शख्स पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के तहत स्टॉकिंग करने पर जेल हो सकती है।
किसी महिला को सूरज डूबने के बाद और उगने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। किसी खास मामले में एक प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही यह संभव है।
प्रत्येक पुलिस स्टेशन में एक महिला पुलिस अधिकारी (हेड कांस्टेबल से नीचे नहीं होना चाहिए) पूरे समय होना अनिवार्य है।
महिला कॉन्स्टेबल की अनुपस्थिति में, पुरुष पुलिस अधिकारी द्वारा महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
महिला की तलाशी सिर्फ महिला पुलिस कर्मी ही ले सकती है।
बिना वॉरेंट गिरफ्तार महिला को तुरंत गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी है और उसे जमानत संबंधी अधिकार के बारे में भी बताना जरूरी है।
पुलिस केवल महिला के निवास पर ही उसकी जांच कर सकती है।
एक बलात्कार पीड़िता अपनी पसंद के स्थान पर ही अपना बयान रिकॉर्ड कर सकती है और पीड़िता की चिकित्सा प्रक्रिया केवल सरकारी अस्पताल में ही हो सकती है।
राम अबकी आएं तो शांता और सीता के साथ आएं…स्वप्न वहीं खड़ा है
जालान पुस्तकालय में निबंध लेखन एवं वाचन प्रतियोगिता सम्पन्न
कोलकाता। सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के तत्वावधान में अंतर्विद्यालयी निबंध लेखन एवं वाचन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में महानगर के प्रतिष्ठित 14 विद्यालयों के 27 छात्र-छात्राओं ने उत्साह पूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्थान, लखनऊ की प्रधान संपादिका डॉक्टर अमिता दुबे ने कहा कि इस तरह के साहित्यिक कार्यक्रम बच्चों में अपनी भाषा के प्रति लगाव पैदा करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा में लेखन करते हुए भाषा की शुद्धता का ध्यान देना चाहिए।
मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध चिंतक एवं यूको बैंक के राजभाषा अधिकारी अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी ने कहा कि ऐसे साहित्यिक कार्यक्रमों से बच्चों के मानसिक विकास के साथ–साथ व्यक्तित्व के विकास में भी सहायता मिलती है। निबंध विचारों को क्रमबद्ध रूप से अभिव्यक्त करने का सुंदर माध्यम है। इस अवसर पर डॉ प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि आज डिजिटल युग में डिजिटल बंधन से बाहर निकलकर निबंध लेखन एवं वाचन प्रतियोगिता में भाग लेना अतिसराहनीय है। निबंध लिखना स्वयं के विचारों को मर्यादित ढंग से अभिव्यक्त करना है। इस प्रतियोगिता में क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार महेश्वरी बालिका विद्यालय की श्रेया उपाध्याय, टांटिया हाई स्कूल के नवीन चावला और मारवाड़ी बालिका विद्यालय की वसुंधरा शाह को मिला। तीन सांत्वना पुरस्कार भी दिए गए। प्रतियोगिता के निर्णायक डॉ. बृजेश कुमार सिंह, प्रो. मंटू दास, अमरनाथ सिंह, डॉ. काजू कुमारी साव एवं डॉ कमल कुमार थे। कार्यक्रम का शुभारंभ विवेक तिवारी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना एवं रामाष्टक से हुआ।
स्वागत भाषण देते हुए संस्था की मंत्री दुर्गा व्यास ने कहा कि हिंदी भाषा के विकास और सही समझ के लिए ऐसे कार्यक्रम का आयोजन सराहनीय है। उन्होंने सभागार में उपस्थित सभी सुधिजनों का हार्दिक स्वागत और अभिनंदन किया।
द्वय सत्रीय कार्यक्रम का कुशल संचालन प्राध्यापिका दीक्षा गुप्ता एवं दिव्या प्रसाद ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी ने किया।
इस अवसर पर महावीर बजाज, अरुण प्रकाश मल्लावत, ओमप्रकाश मिश्र, डॉ. ऋषिकेश राय, विधुशेखर शास्त्री, डॉ आर. एस. मिश्रा, चंद्रिका प्रसाद पाण्डेय ‘अनुरागी’, अविनाश गुप्ता, रमाकांत सिन्हा के साथ–साथ विद्यालय के अध्यापक, अध्यापिकाएं और छात्र–छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में परमजीत पंडित, राहुल उपाध्याय, पलक सिंह, राहुल दास एवं राकेश पाण्डेय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यूनिवर्ल्ड सिटी में बनाई गई राम मंदिर की भव्य रंगोली
कोलकाता : सोमवार को अयोध्या में ऐतिहासिक राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा को लेकर पूरा देश राममय हो गया है। महानगर कोलकाता भी इससे परे नहीं है। राम मंदिर और भगवान श्रीराम में आस्था रखने वाला हर एक व्यक्ति अपनी-अपनी भावना के अनुसार अपनी भक्ति को प्रकट कर रहा है। कोलकाता शहर में भी राम मंदिर को लेकर लोगों में जबर्दस्त उत्साह का माहौल देखने को मिल रहा है। इसी उत्साह की झलक राजारहाट स्थित यूनीवर्ल्ड सिटी में देखने को मिली। यहाँ नीता मिश्रा, शाएला मिश्रा, नम्रता महराना और शगुन सिंह ने मिलकर राम मंदिर की एक भव्य रंगोली बनाई है। रंगोली की खूबसूरती ऐसी है कि एक बार जिसकी नज़र इस पर पड़ रही है, उसकी नज़र हटने को तैयार नहीं है।
तीसरा मनीषा त्रिपाठी स्मृति अनहद सम्मान डॉ.अभिज्ञात को
कोलकाता । मनीषा त्रिपाठी फाउंडेशन फिल्म तथा वेब पत्रिका अनहद कोलकाता की ओर से दिया जाने वाला तीसरा मनीषा त्रिपाठी स्मृति अनहद कोलकाता सम्मान-2023 हिन्दी भाषा के महत्वपूर्ण कवि-कथाकार डॉ.अभिज्ञात को प्रदान किया जाएगा। अनहद कोलकाता के प्रबंध निदेशक उमेश त्रिपाठी ने बताया कि यह सम्मान हर वर्ष कला की किसी भी विधा में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले एक कला साधक को दिया जाता है। इसके पूर्व यह सम्मान हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि एवं एक्टिविस्ट केशव तिवारी और महिलाओं के सवालों को अपनी कविता में पुरजोर तरीके से उठाने वाली रूपम मिश्र को दिया जा चुका है। सम्मान स्वरूप ग्यारह हजार रुपये की मानदेय राशि सहित प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। अभिज्ञात हिन्दी में उस परम्परा के लेखक हैं, जिनकी जड़ें आज भी गाँव में हैं। अभिज्ञात ने अपने लेखन के माध्यम से समाज के वंचितों और शोषितों के प्रश्नों को उठाया है और पिछले तीस सालों से लगातार साहित्य की दुनिया में सार्थक-सक्रिय रहे हैं। इस बार के निर्णायक हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि केशव तिवारी एवं अनहद कोलकाता के संस्थापक विमलेश त्रिपाठी थे। केशव तिवारी ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि यह सम्मान एक ऐसे साहित्यकार को दिया जा रहा है, जो अपने रचना और जीवन के बीच की खाई को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य की ओर प्रवृत हैं एवं उन्होंने अपने साहित्य में समय के ज्वलंत मुद्दे उठाए हैं। यह सम्मान डॉ. अभिज्ञात कोलकाता में ही आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा, जिसमें कोलकाता एवं भारत के अन्य हिस्से से आए साहित्यकार शामिल होंगे।
22 युवा लेखकों को मिला साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार 2023
200 विद्यार्थियों को दी जाएगी ज्योति मेधा छात्रवृत्ति
संत शिरोमणि जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य

प्राचीन काल से ही भारत भूमि महान ऋषि-मुनियों की जननी रही है। गुरु-शिष्य परंपरा से सुशोभित इस धरा पर अनगिनत संत और महापुरुष जन्में, जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन किया। अपने तेज, त्याग और तपस्या से संपूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित किया। सदियों से ही धर्म भारत की आत्मा रही है। अपने आध्यात्म के बल पर ही यह राष्ट्र विश्वगुरू के पद पर आसीन था। कालांतर में युग बदले तब अनेक रूपों में धर्म की हानि हुई। ऐसे में धर्म की संस्थापना हेतु भारत के दिव्य संतों ने समाज-सुधार का बीड़ा उठाया और असंख्य कष्टों का सामना करते हुए समय-समय पर जनमानस में निर्भीकता, जागरूकता, आस्था, भक्ति, सत्यपरायणता, राष्ट्रीयता जैसे श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का साहसिक कार्य किया।
जब सन् 1528 में विधर्मी मुग़ल आक्रांता बाबर ने अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद बनाने का आदेश दिया तब उस कुकृत्य से भारतीय अस्मिता को गहरी ठेस पहुँची। राम हमारी आस्था हैं, आदर्श हैं, इष्ट हैं, गौरवशाली सनातन संस्कृति के परिचायक हैं। ऐसे में, जनमानस में विद्रोह की ज्वाला का भड़क उठना स्वाभाविक था। इन विधर्मियों ने हिंदू आस्था के केंद्र कहलाने वाले सैकड़ों मंदिर तोड़ डाले जिनका आज तक जीर्णोंद्धार न हो सका।
श्रीराम के अनन्य भक्त का जन्म : धर्म की स्थापना हेतु माघ कृष्ण एकादशी विक्रम संवत 2006 (तदनुसार 14 जनवरी, सन् 1950), मकर संक्रांति की तिथि को रात 10:34 बजे, उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शांडीखुर्द नामक ग्राम में एक रामभक्त का जन्म हुआ। माता शची देवी और पिता पण्डित राजदेव मिश्र ने उनका नाम गिरिधर मिश्र रखा। जन्म के मात्र दो माह पश्चात ही बालक की नेत्रदृष्टि क्षीण हो गई और त्वरित उपचार के बाद भी कोई लाभ न हुआ। वे तभी से प्रज्ञाचक्षु हो गए अर्थात लिख-पढ़ नहीं सकते। केवल श्रवण कर सीख पाने और बोलकर रचनाएँ लिपिबद्ध करवाना ही उनकी शिक्षा का एकमात्र साधन है।
मात्र 3 वर्ष की अल्पायु में गिरिधर ने अवधी में अपनी सर्वप्रथम कविता रची और अपने पितामह को सुनायी। एकश्रुत प्रतिभा से युक्त बालक गिरिधर ने अपने पड़ोसी पण्डित मुरलीधर मिश्र की सहायता से 5 वर्ष की आयु में मात्र 15 दिनों में श्लोक संख्या सहित 700 श्लोकों वाली सम्पूर्ण भगवद्गीता कण्ठस्थ कर ली। 7 वर्ष की आयु में गिरिधर ने अपने पितामह की सहायता से छन्द संख्या सहित सम्पूर्ण श्रीरामचरितमानस 60 दिनों में कण्ठस्थ कर ली। किसे ज्ञात था कि नियति ने यह चमत्कार किसी विराट उद्देश्य के लिए किया है।
शैक्षणिक योग्यता एवं उपलब्धियाँ : 7 जुलाई 1967 को जौनपुर स्थित आदर्श गौरीशंकर संस्कृत महाविद्यालय से गिरिधर मिश्र ने अपनी औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ की, जहाँ उन्होंने संस्कृत व्याकरण के साथ-साथ हिन्दी, आङ्ग्लभाषा, गणित, भूगोल और इतिहास का अध्ययन किया। तीन महीनों में उन्होंने वरदराजाचार्य विरचित ग्रन्थ लघुसिद्धान्तकौमुदी का सम्यक् ज्ञान प्राप्त कर लिया। प्रथमा से मध्यमा की परीक्षाओं में चार वर्ष तक कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। तत्पश्चात उच्च शिक्षा हेतु वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में संस्कृत व्याकरण में उन्होंने शास्त्री (स्नातक उपाधि) से लेकर वाचस्पति (डी.लिट्) तक की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान उन्हें परीक्षा में स्वर्णपदक भी प्राप्त हुए। उनके चतुर्मुखी ज्ञान के कारण विश्वविद्यालय ने उन्हें केवल व्याकरण ही नहीं अपितु वहां अध्यापित सभी विषयों का आचार्य घोषित कर दिया।
19 नवम्बर 1983, कार्तिक पूर्णिमा के दिन रामानन्द सम्प्रदाय में श्री श्री 1008 श्री रामचरणदास महाराज फलाहारी से विरक्त दीक्षा लेकर गिरिधर मिश्र रामभद्रदास नाम से आख्यात हुए। 1987 में उन्होंने चित्रकूट में तुलसीपीठ की स्थापना की और श्रीचित्रकूटतुलसीपीठाधीश्वर की उपाधि से अलंकृत हुए। 24 जून 1988 को काशी विद्वत् परिषद् वाराणसी ने रामभद्रदास का तुलसीपीठस्थ जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के रूप में चयन किया। 3 फरवरी 1989 को प्रयाग में महाकुंभ में रामानन्द सम्प्रदाय के तीन अखाड़ों के महन्तों, सभी सम्प्रदायों, खालसों और संतों द्वारा सर्वसम्मति से काशी विद्वत् परिषद् के निर्णय का समर्थन किया गया। इसके बाद 1 अगस्त 1995 को अयोध्या में दिगंबर अखाड़े ने रामभद्रदास का जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के रूप में विधिवत अभिषेक किया। रामभद्रदास अब जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य हो गए। स्वामी वल्लभाचार्य के 500 वर्षों पश्चात पहली बार संस्कृत में प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखकर लुप्त हुई जगद्गुरु परम्परा को स्वामी रामभद्राचार्य ने पुनर्जीवित किया।
श्रीराम मंदिर आंदोलन में योगदान : अयोध्या नगरी को उजाड़ने जैसे असहनीय आपराधिक कृत्य से संपूर्ण हिन्दू समाज आक्रोशित था। श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए देश में अनेकों प्रयास किए गए थे। लगभग 500 वर्षों से अधिक समय से यह मामला न्यायालय से निर्णित होने के मोड़ पर पहुँचकर अटका हुआ था। एक विराट आंदोलन हुआ जिसमें जगद्गुरु रामभद्राचार्य भी शामिल थे। पुलिस ने उनपर लाठीचार्ज की जिससे उनकी दाहिनी कलाई चोटिल हो गई और आज भी टेढ़ी है। उन्हें 8 दिनों तक निरपराध होने के बावजूद जेल में बंद किया गया।
माननीय उच्च न्यायालय ने जब प्रश्न किया क्या रामलला के अयोध्या में जन्म का शास्त्रों में कोई प्रमाण है? ऐसे में, बड़े-बड़े दिग्गज जवाबदेही से पीछे हट गए परन्तु पूज्य स्वामी जी साक्ष्य देने हेतु स्वयं कठघरे में प्रस्तुत हो गए। न्यायालय ने स्वाभाविक प्रश्न किया कि आप बिना देखे साक्ष्य कैसे देंगे? इस पर प्रज्ञाचक्षु श्री रामभद्राचार्य जी ने कहा कि शास्त्रीय साक्ष्य के लिए भौतिक आँखों की आवश्यकता नहीं होती। शास्त्र ही सबकी आँखें हैं। जिनके पास शास्त्र नहीं वे दृष्टिहीन हैं। उनके इस वक्तव्य को न्यायालय ने स्वीकार कर पूछा कि शास्त्रीय प्रमाण दीजिए तब उन्होंने अथर्ववेद के दशम काण्ड के 31वें अनुवाक्य के दूसरे मंत्र को प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करते हुए कहा कि-
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्या हिरण्यय: कोश: स्वर्गो ज्योतिषवृत:।।
अर्थात वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि 8 चक्र और 9 द्वार वाली अयोध्या, श्रीरामजन्मभूमि से 300 धनुष उत्तर में सरयू नदी विद्यमान है और आगे इस तरह के 441 साक्ष्य प्रस्तुत किए और जब वहां खुदाई हुई तब 437 साक्ष्य स्पष्ट निकले। उनमें से केवल 4 अस्पष्ट थे, लेकिन वह भी रामलला के ही प्रमाण थे। इस प्रकार 8 अक्टूबर 2019 को तीन सदस्यीय जजों की बेंच ने महाराज श्री द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की रोशनी में कोटि-कोटि भारतवासियों के आराध्य भगवान श्रीराम की जन्मभूमि से विवादों का समापन करते हुए निर्णय दिया।
वर्ष 2015 में स्वामी रामभद्राचार्य को भारत के द्वितीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से विभूषित किया गया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, साहित्य और दर्शन विषय पर 225 से अधिक पुस्तकों की रचना की है। 22 भाषाएँ बोलते हैं। संस्कृत, हिन्दी, अवधी, मैथिली सहित कई भाषाओं में कवि और रचनाकार हैं। वे चित्रकूट स्थित ‘जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय’ के संस्थापक और आजीवन कुलपति हैं। समस्त भारतवर्ष आज उनका आभारी है, जिनके महत्वपूर्ण योगदान से हम सभी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के साक्षी बन पा रहे हैं। यह दैविक संयोग है कि अयोध्या में नव निर्मित श्री राममंदिर के भव्य शुभारम्भ और पूज्यपाद जी के 75वें जन्मोत्सत्व का सुअवसर एक साथ आया । ऐसे महान संत के श्रीचरणों में विनम्र प्रणति।
( लेखिका शुभांगी उपाध्याय, कलकत्ता विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. शोधार्थी हैं।)
युवा दिवस पर विशेष – श्री राम भक्त विवेकानंद

इतिहास साक्षी है कि पुण्यभूमि भारत की गाथा सहस्त्रों वर्षों के कठोर संघर्ष की गौरव गाथा है। इस शांतिप्रिय देश पर निरंतर कुठाराघात होने के कारण यहाँ के जनमानस में घोर निराशा छा गई थी। भारतवासियों का स्वाभिमान सो गया था, यह देश अपना गौरवशाली इतिहास, अपनी महान संस्कृति, अस्तित्व सब भूल बैठा था। परतंत्रता रूपी अंधकार में डूबे भारत में 12 जनवरी 1863 में बंगाल की भूमि पर एक ऐसे प्रकाशपुंज का आविर्भाव हुआ जिन्हें संसार योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानंद के नाम से जानता है।
उनका समस्त जीवन भारत माता को समर्पित था। परिव्राजक सन्यासी से रूप में अनेकों कष्टों का सामना करते हुए उन्होंने पूरा भारत भ्रमण किया, कोने कोने में गए, लोगों से मिले और अपने देश को बहुत करीब से देखा। उन्हें अपने जीवन का उद्देश्य स्पष्ट हुआ अतः भारत के सोए स्वाभिमान को जगाने हेतु वे विदेश की धरती पर पहुँचेे। उन्होंने पूरी दुनिया में अपने महान सनातन धर्म, संस्कृति और दर्शन का लोहा मनवाया।
भारतीय आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए सार्वभौमिक विचारों से संवाद स्वामीजी की प्रमुख विशेषता थी। उन्होंने कहा था भारत एक बार फिर समृद्धि तथा शक्ति की महान ऊँचाइयों पर उठेगा और अपने समस्त प्राचीन गौरव को पीछे छोड़ जाएगा, भारत पुनः विश्व गुरु बनेगा, जो पूरे संसार का पथ प्रदर्शन करने में समर्थ होगा। आज उनका यह कथन काफी हद तक सत्य होता दिखलाई दे रहा है। केवल भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व ही राममय हो गया है। प्रभु श्रीराम लला की प्राण-प्रतिष्ठा हेतु चराचर जगत उत्साहित है। रामराज्य की स्थापना से पूर्व ही भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका पर अग्रसर हो चुका है।
स्वामी विवेकानंद और रामायण :
स्वामी विवेकानंद ने विभिन्न अवसरों पर अपने व्याख्यानों में श्रीराम कथा के पात्रों विशेषकर श्रीराम, माता सीता और श्रीहानुमान आदि के चरित्र का बखान करते हुए मुक्त कंठ से उनकी प्रशंसा की। 2 सितंबर,1897, विक्टोरिया हॉल, मद्रास (चेन्नई) में उन्होंने कहा था,
“मैं बस राम के पुल के निर्माण में उस गिलहरी की तरह बनना चाहता हूं, जो पुल पर अपनी थोड़ी सी रेत-धूल डालकर काफी संतुष्ट थी।”
इतना ही नहीं अपितु उन्होंने अपने द्वितीय विदेश प्रवास में 31 जनवरी, 1900 में अमेरिका स्थित शेक्सपियर क्लब, पेसिडिना, कैलिफ़ोर्निया में “रामायण”शीर्षक पर व्याख्यान देते हुए सबको संक्षिप्त रामायण सुनाई। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि श्रीराम और माता सीता भारतीय राष्ट्र के आदर्श हैं।
30 मार्च, 1901, ढ़ाका, बांग्लादेश में “मैंने क्या सीखा” शीर्षक के अंतर्गत स्वामीजी कहते हैं,“जहाँ राम हैं, वहाँ काम नहीं है; जहाँ काम है, वहाँ राम नहीं हैं। रात और दिन कभी एक साथ नहीं रह सकते।”
माता सीता के संदर्भ में : अपने मद्रास व्याख्यान में स्वामीजी कहते हैं, “सीता का चरित्र अद्वितीय है। यह चरित्र सदा के लिए एक ही बार चित्रित हुआ है। राम तो कदाचित अनेक हो गये हैं, किंतु सीता और नहीं हुईं।” एक अन्य अवसर पर भी उन्होंने एक बार कहा था,“सीता विशिष्ट हैं, उनका चरित्र सभी के लिए आदर्श है। सीता सच्ची भारतीय स्त्री का उदाहरण है, सभी भारतीयों के लिए, एक परिपूर्ण स्त्री का आदर्श अकेली सीता के जीवन से निकलकर आता है। सम्भव है कि हमारा समस्त पौराणिक साहित्य लुप्त हो जाए, किन्तु फिर भी, जब तक एक भी हिन्दू व्यक्ति जीवित है, चाहे वह कितनी ही ग्राम्य बोली क्यों न बोलता हो, तब तक सीता की कथा रहेगी, मेरे इन शब्दों को आप याद रखें। सीता हमारी जाति के जीवनावश्यक तत्वों में सम्मिलित हैं। वह प्रत्येक हिन्दू पुरुष और स्त्री के रक्त में है। हम सब सीता की ही सन्तान है।”
हनुमान भक्त स्वामी विवेकानंद : बाल्यकाल से ही स्वामी विवेकानंद को ध्यान लगाना अतिप्रिय था। लगभग 4-5 वर्ष की आयु में ही वे माता सीता, श्रीराम और महादेव की मिट्टी की मूरत पर फूल अर्पित कर ध्यानमग्न हो जाया करते थे। उन्होंने स्वयं एक बार अपने शिष्य शरतचंद्र चक्रवर्ती को बताया था कि बचपन में जब भी यह ज्ञात होता कि आस पड़ोस में कहीं निपुण गायकों को मण्डली रामायण का पाठ करने वाली है, तो वह अपना खेल आदि छोड़कर उसमें उपस्थित हो जाते थे। श्री हनुमान जी महाराज पर उनकी आस्था इतनी प्रगाढ़ थी कि लोक मान्यता के अनुसार यह सुनकर कि हनुमान जी को कदली (केला) वनों में ढूंढा जा सकता है, वे उत्साहित होकर अपने घर के समीपस्थ एक केले के उद्यान में रात भर उनके दर्शन की लालसा से बैठे रहे। स्वामीजी की यह हार्दिक इच्छा थी कि, “प्रत्येक भारतीय के घर में महावीर हनुमान की पूजा का अनुष्ठान किया जाना चाहिए। उनका चिन्तन था कि ऐसा करने से मानव मन की आत्मशक्ति जागृत की जा सकेगी।”
स्वामीजी ने भारत में विघटित होते जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए युवा पीढ़ी पर ही सबसे अधिक भरोसा किया था। वे कहते हैं, “अपने महिमावान अतीत को मत भूलो। स्मरण करो.. हम कौन हैं? किन महान पूर्वजों का रक्त हमारी नसों में प्रवाहित हो रहा है? एक ऐसे महान भारत की नींव रखो जो विश्व का पथप्रदर्शन कर सके।”
तत्कालीन समाज को दिया गया स्वामीजी का यह संदेश आज भी अति प्रासंगिक है। अब समय आ गया है कि देश का युवा उसी सेवा, समर्पण और भक्ति से अपनी भारत माता के लिए कार्य करे जिस निष्ठा से श्रीहनुमान ने अपने आराध्य श्रीराम का कार्य किया। उसी उत्साह से देश के पुनरुत्थान में योगदान दे जैसे गिलहरी ने दिया था। युगों से इस राष्ट्र के आदर्श और महापुरुषों के प्रेरणास्रोत मर्यादापुरुषोत्तम् प्रभु श्रीराम और माता सीता ही रहे हैं। श्रीराम मंदिर का बनना हर सनातनी के लिए गर्व का विषय है परन्तु इस दिव्य क्षण के लिए किए गए वर्षों के संघर्ष को हमें भूलना नहीं है और इसके संरक्षण हेतु हमें अपनी जड़ों को सींचना होगा अर्थात अपने पवित्र ग्रंथों का पठन-पाठन तथा चिंतन-मनन करना होगा।
लेखिका शुभांगी उपाध्याय, कलकत्ता विश्वविद्यालय में पी.एच.डी शोधार्थी हैं।




