
विदर्भ के प्रमुख उद्योगपति सेठ बच्छराज बजाज ने सन 1905 में वर्धा में निवास के लिए बनी हवेली के परिसर में श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण प्रारंभ कराया था। यह बजाज परिवार का मंदिर था। जयपुर में निर्मित श्रीलक्ष्मी-नारायण की दिव्य मूर्तियों की मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा 7 फरवरी, 1908 को शास्त्रोक्त विधि से संपन्न हुई। बजाज परिवार ने मंदिर की व्यवस्था का दायित्व 29 जुलाई, 1909 को श्रीलक्ष्मीनारायण देवस्थान ट्रस्ट को सौंप दिया।
निर्माण के 20 वर्ष 5 माह 10वें दिन इस मंदिर ने भारत में सामाजिक समरसता का नया अध्याय लिखा। महात्मा गांधी की प्रेरणा और गांधी जी के पाँचवें बेटे के रूप में समादृत श्री जमनालाल बजाज के आग्रह से आचार्य विनोबा भावे के नेतृत्व में मंदिर में हरिजनों का प्रवेश हुआ। भारत में हरिजनों के लिए खोला जाने वाला यह पहला मंदिर है।

श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर की मूर्तियाँ विशुद्ध खादी के वस्त्र धारण करती हैं। उनका श्रृंगार सोना, चाँदी, रत्न आदि आभूषणों से रहित होता है। प्रसाद में भी केवल गाय के दूध, घी का प्रयोग होता है। पूजन के लिए मंदिर प्रांगण में बने कुएँ के जल का प्रयोग किया जाता है।
सन 1942 के 8-9 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन के लिए वर्धा से महात्मा गांधी ने इसी मंदिर में दर्शन करके मुंबई प्रस्थान किया था।
श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर के निर्माण के 118 वर्ष पूरे हो गए हैं। हरिजनों के मंदिर प्रवेश की सामाजिक-धार्मिक युगांतरकारी पहल के भी 98 वर्ष हो चुके हैं। मंदिर परिसर में मनुष्यता की वह दैवी सुवास की अनुभूति अभी भी की जा सकती है। इस आध्यात्मिक धाम से दो पीढि़यों से जुड़े राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के प्रधानमंत्री प्रोफेसर डा. हेमचन्द्र वैद्य जब यह विवरण सुना रहे थे, तब उनकी आँखें चमक रही थीं और भावभीनी भी थीं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में जनसंचार के प्राध्यापक डा. कृपाशंकर चौबे ने छायाचित्रों में इस स्मृति को बसाया।




