Sunday, October 11, 2026
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पांच शताब्दियों की विरासत सहेजे हुए है रानाघाट की घोषबाड़ी दुर्गापूजा

दीपंकर एडबार

रानाघाट (नदिया) । पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रानाघाट में घोषबाड़ी का दुर्गापूजा उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। परिवार की मान्यताओं के अनुसार, इस पूजा की शुरुआत 1520 ईस्वी में हुई थी। पांच शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पूजा से जुड़ी कई प्राचीन रस्में आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं।

परिवार के प्रचलित इतिहास के मुताबिक, हुगली जिले के आकना से चैतन्यचरण घोष 1520 में ब्रह्मडांगा आकर बसे थे। ब्रह्मडांगा को बाद में रानाघाट के नाम से जाना जाने लगा। बताया जाता है कि चैतन्यचरण घोष ने वहां मंदिर स्थापित कर दुर्गापूजा शुरू की थी। उनके निःसंतान रहने के कारण निधन के बाद पूजा की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई मकरंद घोष के वंशजों ने संभाली। परिवार का दावा है कि वर्तमान में 29वीं पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

हालांकि, पूजा की शुरुआत से संबंधित 1520 की तारीख की स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेजों से पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस विवरण को परिवार की मौखिक और पारंपरिक ऐतिहासिक मान्यता के रूप में देखा जाना चाहिए।

घोषबाड़ी की पूजा की एक खास पहचान प्रतिमा निर्माण से जुड़ी मिट्टी की परंपरा है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, पूजा के शुरुआती दौर में इस्तेमाल की गई मिट्टी का कुछ हिस्सा आज भी सुरक्षित रखा गया है। हर वर्ष उस पुरानी मिट्टी का थोड़ा हिस्सा नई मिट्टी में मिलाकर पूजा के लिए पाटा तैयार किया जाता है। इस परंपरा को पूर्वजों की स्मृति और वर्तमान पीढ़ी के बीच संबंध बनाए रखने का माध्यम माना जाता है।

पूजा की रस्मों में भी कई विशिष्टताएं हैं। जहां सामान्य तौर पर दुर्गापूजा की प्रमुख रस्में षष्ठी से शुरू होती हैं, वहीं घोषबाड़ी में पंचमी के दिन ही देवी का बोधन किया जाता है। अधिवास के समय परिवार का एक पुरुष सदस्य ‘रक्षा प्रदीप’ जलाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार, यह दीपक विसर्जन तक जलता रहता है।

विसर्जन के बाद पाटा तोड़कर उसी दीपक की लौ से घर के अलग-अलग कमरों में दीप जलाए जाते हैं। इसके बाद केले के पत्ते पर 108 बार दुर्गा का नाम लिखा जाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार, उस पत्ते को चूर्णी नदी में विसर्जित किया जाता है या तुलसी के पौधे के पास रखा जाता है।

भोग और अन्य रस्मों में भी अलग-अलग नियमों का पालन किया जाता है। अष्टमी के दिन पका हुआ भोग चढ़ाया जाता है, जबकि अन्य दिनों में कच्चा भोग देने की परंपरा है। नवमी को थोर और केले के फूल से बने व्यंजन चढ़ाए जाते हैं। इसी दिन पारंपरिक कीचड़ खेलने की रस्म भी निभाई जाती है। दशमी पर शुक्तो, मछली और चावल अर्पित कर देवी को विदाई दी जाती है। उस दिन ताजे फूलों के बजाय पहले से चढ़ाए गए फूलों के इस्तेमाल की परंपरा भी परिवार में प्रचलित है।

परिवार के सदस्यों के अनुसार, पहले यहां 51 बकरे और भैंसों की बलि देने की परंपरा थी। उनका कहना है कि 1934 में स्वप्नादेश के बाद बकरे की बलि बंद कर दी गई। बाद के वर्षों में बलि की परंपरा पूरी तरह समाप्त हो गई। यह बदलाव दर्शाता है कि पुरानी परंपराओं को सहेजने के साथ-साथ समय के अनुसार कुछ धार्मिक प्रथाओं में भी परिवर्तन आया है।

रानाघाट का इतिहास केवल प्रशासनिक बदलावों और शहरी विकास तक सीमित नहीं है। घोषबाड़ी जैसी पारिवारिक पूजा स्थानीय समाज की स्मृतियों, धार्मिक विश्वासों और सांस्कृतिक पहचान को समझने का अवसर देती है। पांच शताब्दियों से अधिक पुरानी मानी जाने वाली यह पूजा इस बात का उदाहरण है कि पारिवारिक परंपराएं किस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हुए किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रख सकती हैं।

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