दीपंकर एडबार
रानाघाट (नदिया) । समय बदला, पीढ़ियां बदलीं और पूजा के आयोजन का स्वरूप भी बदल गया, लेकिन पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रानाघाट स्थित पुरोहित पाड़ा की ‘सदु-बाउनी’ दुर्गापूजा की परंपरा आज भी कायम है। 331वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी यह ऐतिहासिक पूजा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकजुटता की भी मिसाल है। इस पूजा की शुरुआत एक बाल विधवा सदु देवी की धार्मिक निष्ठा और संकल्प से जुड़ी मानी जाती है।
स्थानीय इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, सदु देवी अपने ससुराल कालना से दुर्गापूजा की परंपरा को अपने मायके ब्रह्मडांगा लेकर आई थीं। यही क्षेत्र वर्तमान में रानाघाट के पुरोहित पाड़ा के नाम से जाना जाता है। उस समय ब्राह्मण परिवारों की महिलाओं को ‘बाउनी’ कहकर संबोधित करने की परंपरा थी। इसी आधार पर पूजा का नाम ‘सदु-बाउनी’ पड़ा। एक महिला की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था से शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे इलाके की सांस्कृतिक पहचान बन गई।
इस पूजा के इतिहास में 1971 का वर्ष महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे पहले तक पूजा पारिवारिक स्तर पर आयोजित होती थी। बाद में इसे सार्वजनिक रूप दिया गया। इस बदलाव के साथ पूजा की जिम्मेदारी किसी एक परिवार तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे मोहल्ले ने इसकी परंपरा को आगे बढ़ाने का दायित्व संभाल लिया। आज परिवार के मूल सदस्य भले ही मौजूद नहीं हैं, लेकिन स्थानीय निवासी उनकी विरासत को संजोकर रखे हुए हैं।
पूजा के आयोजन में मोहल्ले के बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक की सक्रिय भागीदारी रहती है। महिला और पुरुष सभी मिलकर विभिन्न तैयारियों और धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं। इस तरह यह आयोजन केवल देवी की आराधना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संबंध बनाए रखने और सामाजिक एकता मजबूत करने का माध्यम भी बनता है।
सदु-बाउनी पूजा की खासियत इसकी सदियों पुरानी परंपराओं में भी दिखाई देती है। षष्ठी के दिन देवी को कलाइ की दाल का भोग लगाया जाता है। वहीं, दशमी के दिन पांता भात, कचू की साग और चॉलता से तैयार खट्टी सामग्री अर्पित की जाती है। इसके अलावा गन्ना, कद्दू और केले की प्रतीकात्मक बलि देने की परंपरा भी आज तक जारी है। इन रीति-रिवाजों को नई पीढ़ी भी श्रद्धा के साथ निभाती है।
हालांकि, समय के साथ पूजा के बाहरी स्वरूप में बदलाव आया है। पहले प्रतिमा पर पारंपरिक मिट्टी की सजावट होती थी, जबकि अब आकर्षक डाकेर साज का इस्तेमाल किया जाता है। विसर्जन की व्यवस्था में भी बदलाव आया है। इसके बावजूद पूजा की मूल परंपराओं और धार्मिक आस्था को बनाए रखने का प्रयास जारी है।
331 वर्षों की इस यात्रा में सदु-बाउनी पूजा ने साबित किया है कि किसी परंपरा की असली ताकत केवल उसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि उसे जीवित रखने वाले लोगों की भागीदारी में होती है। एक बाल विधवा की भक्ति से शुरू हुई यह पूजा आज रानाघाट के पुरोहित पाड़ा की सामूहिक विरासत बन चुकी है। बदलते समय के बीच यह आयोजन इतिहास, संस्कृति और सामाजिक एकजुटता की एक जीवंत मिसाल बना हुआ है।




