Wednesday, March 18, 2026
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रसप्रिया 

 

रचनाकार: फणीश्वरनाथ रेणु

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धूल में पड़े कीमती पत्थर को देख कर जौहरी की आँखों में एक नई झलक झिलमिला गई – अपरूप-रूप!
चरवाहा मोहना छौंड़ा को देखते ही पँचकौड़ी मिरदंगिया की मुँह से निकल पड़ा – अपरुप-रुप!
…खेतों, मैदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुंदरता!
मिरदंगिया की क्षीण-ज्योति आँखें सजल हो गईं।
मोहना ने मुस्करा कर पूछा, ‘तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हो गई है, है न?’
‘ऐ!’ – बूढ़े मिरदंगिया ने चौंकते हुए कहा, ‘रसपिरिया?

 

…हाँ …नहीं। तुमने कैसे …तुमने कहाँ सुना बे…?’
‘बेटा’ कहते-कहते रुक गया। …परमानपुर में उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को उसने प्यार से ‘बेटा’ कह दिया था। सारे गाँव के लड़कों ने उसे घेर कर मारपीट की तैयारी की थी – ‘बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेर कर! …मृदंग फोड़ दो।’
मिरदंगिया ने हँस कर कहा था, ‘अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार! अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा!’
बच्चे खुश हो गये थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्‌डी पकड़ कर वह बोला था, ‘क्यों, ठीक है न बाप जी?’
बच्चे ठठा कर हँस पड़े थे।
लेकिन, इस घटना के बाद फिर कभी उसने किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं की थी। मोहना को देख कर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है।
‘रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? …बोलो बेटा!’
दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। …कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा।
मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नंदूबाबू के घराने में भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने को मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ ही है, कभी-कभी रसचरचा भी यहीं आ कर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। …आज सुबह शोभा मिसर के छोटे लड़के ने तो साफ-साफ कह दिया – ‘तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया?’
हाँ, यह जीना भी कोई जीना है! निर्लज्जता है, और थेथरई की भी सीमा होती है। …पंद्रह साल से वह गले में मृदंग लटका कर गाँव-गाँव घूमता है, भीख माँगता है। …दाहिने हाथ की टेढ़ी उँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं है, मृदंग क्या बजाएगा! अब तो, ‘धा तिंग धा तिंग’ भी बड़ी मुश्किल से बजाता है। …अतिरिक्त गाँजा-भाँग सेवन से गले की आवाज विकृत हो गई है। किंतु मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की वह चेष्टा अवश्य करेगा। …फूटी भाथी से जैसी आवाज निकलती है, वैसी ही आवाज-सों-य,सों-य!
पंद्रह-बीस साल पहले तक विद्यापति नाम की थोड़ी पूछ हो जाती थी। शादी-ब्याह, यज्ञ-उपनैन, मुंडन-छेदन आदि शुभ कार्यों में विदपतिया मंडली की बुलाहट होती थी। पँचकौड़ी मिरदंगिया की मंडली ने सहरसा और पूर्णिया जिले में काफी यश कमाया है। पँचकौड़ी मिरदंगिया को कौन नहीं जानता! सभी जानते हैं, वह अधपगला है! …गाँव के बड़े-बूढ़े कहते हैं – ‘अरे, पँचकौड़ी मिरदंगिया का भी एक जमाना था!’
इस जमाने में मोहना-जैसा लड़का भी है – सुंदर, सलोना और सुरीला! …रसप्रिया गाने का आग्रह करता है, ‘एक रसपिरिया गाओ न मिरदंगिया!’
‘रसपिरिया सुनोगे? …अच्छा सुनाऊँगा। पहले बताओ, किसने…’
‘हे-ए-ए-हे-ए… मोहना, बैल भागे…!’ एक चरवाहा चिल्लाया, ‘रे मोहना, पीठ की चमड़ी उधेड़ेगा करमू!’
‘अरे बाप!’ मोहना भागा।
कल ही करमू ने उसे बुरी तरह पीटा है। दोनों बैलों को हरे-हरे पाट के पौधों की महक खींच ले जाती है बार-बार। …खटमिट्ठाल पाट!
पँचकौड़ी ने पुकार कर कहा, ‘मैं यहीं पेड़ की छाया में बैठता हूँ। तुम बैल हाँक कर लौटो। रसपिरिया नहीं सुनोगे?’
मोहना जा रहा था। उसने उलट कर देखा भी नहीं।
रसप्रिया!
विदापत नाचवाले रसप्रिया गाते थे। सहरसा के जोगेंदर झा ने एक बार विद्यापति के बारह पदों की एक पुस्तिका छपाई थी। मेले में खूब बिक्री हुई थी रसप्रिया पोथी की। विदापत नाचवालों ने गा-गा कर जनप्रिया बना दिया था रसप्रिया को।
खेत के ‘आल’ पर झरजामुन की छाया में पँचकौड़ी मिरदंगिया बैठा हुआ है, मोहना की राह देख रहा है। …जेठ की चढ़ती दोपहरी में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते हैं। …कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है! पाँच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास बाकी था। …पहली वर्षा में भीगी हुई धरती के हरे-हरे पौधों से एक खास किस्म की गंध निकलती है। तपती दोपहरी में मोम की तरह गल उठती थी – रस की डाली। वे गाने लगते थे बिरहा, चाँचर, लगनी। खेतों में काम करते हुए गानेवाले गीत भी समय-असमय का खयाल करके गाए जाते हैं। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर और लगनी-
‘हाँ… रे, हल जोते हलवाहा भैया रे…’
खुरपी रे चलावे… म-ज-दू-र!
एहि पंथे, धनी मोरा हे रुसलि…।
खेतों में काम करते हलवाहों और मजदूरों से कोई बिरही पूछ रहा है, कातर स्वर में – उसकी रुठी हुई धनी को इस राह से जाते देखा है किसी ने?…
अब तो दोपहरी नीरस कटती है, मानो किसी के पास एक शब्द भी नहीं रह गया है।
आसमान में चक्कर काटते हुए चील ने टिंहकारी भरी – टिं…ई…टिं-हि-क!
मिरदंगिया ने गाली दी – ‘शैतान!’
उसको छोड़ कर मोहना दूर भाग गया है। वह आतुर होकर प्रतीक्षा कर रहा है। जी करता है, दौड़ कर उसके पास चला जाए। दूर चरते हुए मवेशियों के झुंडों की ओर बार-बार वह बेकार देखने की चेष्टा करता है। सब धुँधला!
उसने अपनी झोली टटोल कर देखा – आम हैं, मूढ़ी है। …उसे भूख लगी। मोहन के सूखे मुँह की याद आई और भूख मिट गई।
मोहना-जैसे सुंदर, सुशील लड़कों की खोज में ही उसकी जिंदगी के अधिकांश दिन बीते हैं। …विदापत नाच में नाचनेवाले ‘नटुआ’ का अनुसंधान खेल नहीं। …सवर्णों के घर में नहीं, छोटी जाति के लोगों के यहाँ मोहना-जैसे लड़की-मुँहा लड़के हमेशा पैदा नहीं होते। ये अवतार लेते हैं समय-समय पर जदा जदा हि…
मैथिल ब्राह्मणों, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापतवालों की बड़ी इज्जत होती थी। …अपनी बोली – मिथिलाम – में नटुआ के मुँह से ‘जनम अवधि हम रुप निहारल’ सुन कर वे निहाल हो जाते थे। इसलिए हर मंडली का ‘मूलगैन’ नटुआ की खोज में गाँव-गाँव भटकता फिरता था – ऐसा लड़का, जिसे सजा-धजा कर नाच में उतारते ही दर्शकों में एक फुसफुसाहट फैल जाए।
‘ठीक ब्राह्मणी की तरह लगता है। है न?’
‘मधुकांत ठाकुर की बेटी की तरह…।’
‘नः! छोटी चंपा-जैसी सुरत है!’
पँचकौड़ी गुनी आदमी है। दूसरी-दूसरी मंडली में मूलगैन और मिरदंगिया की अपनी-अपनी जगह होती है। पँचकौड़ी मूलगैन भी था और मिरदंगिया भी। गले में मृदंग लटका कर बजाते हुए वह गाता था, नाचता था। एक सप्ताह में ही नया लड़का भाँवरी दे कर परवेश में उतरने योग्य नाच सीख लेता था।
नाच और गाना सिखाने में कभी कठिनाई नहीं हुई, मृदंग के स्पष्ट ‘बोल’ पर लड़कों के पाँव स्वयं ही थिरकने लगते थे। लड़कों के जिद्दी माँ-बाप से निबटना मुश्किल व्यापार होता था। विशुद्ध मैथिली में और भी शहद लपेट कर वह फुसलाता…
‘किसन कन्हैया भी नाचते थे। नाच तो एक गुण है। …अरे, जाचक कहो या दसदुआरी। चोरी डकैती और आवारागर्दी से अच्छा है। अपना-अपना ‘गुन’ दिखा कर लोगों को रिझा कर गुजारा करना।’
एक बार उसे लड़के की चोरी भी करनी पड़ी थी। …बहुत पुरानी बात है। इतनी मार लगी थी कि …बहुत पुरानी बात है।
पुरानी ही सही, बात तो ठीक है।
‘रसपिरिया बजाते समय तुम्हारी उँगली टेढ़ी हुई थी। ठीक है न?’
मोहना न जाने कब लौट आया।
मिरदंगिया के चेहरे पर चमक लौट आई। वह मोहना की ओर एक टकटकी लगा कर देखने लगा …यह गुणवान मर रहा है। धीरे-धीरे, तिल-तिल कर वह खो रहा है। लाल-लाल होठों पर बीड़ी की कालिख लग गई है। पेट में तिल्ली है जरुर!…
मिरदंगिया वैद्य भी है। एक झुंड बच्चों का बाप धीरे-धीरे एक पारिवारिक डॉक्टर की योग्यता हासिल कर लेता है। …उत्सवों के बासीटटका भोज्यान्नों की प्रतिक्रिया कभी-कभी बहुत बुरी होती। मिरदंगिया अपने साथ नमक-सुलेमानी, चानमार-पाचन और कुनैन की गोली हमेशा रखता था। …लड़कों को सदा गरम पानी के साथ हल्दी की बुकनी खिलाता। पीपल, काली मिर्च, अदरक वगैरह को घी में भून कर शहद के साथ सुबह-शाम चटाता। …गरम पानी!
पोटली से मूढ़ी और आम निकालते हुए मिरदंगिया बोला, ‘हाँ, गरम पानी! तेरी तिल्ली बढ़ गई है, गरम पानी पियो।’
‘यह तुमने कैसे जान लिया? फारबिसगंज के डागडरबाबू भी कह रहे थे, तिल्ली बढ़ गई है। दवा…।’
आगे कहने की जरूरत नहीं। मिरदंगिया जानता है, मोहना-जैसे लड़कों के पेट की तिल्ली चिता पर ही गलती है! क्या होगा पूछ कर, कि दवा क्यों नहीं करवाते!
‘माँ, भी कहती है, हल्दी की बुकनी के साथ रोज गरम पानी। तिल्ली गल जाएगी।’
मिरदंगिया ने मुस्करा कर कहा, ‘बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ!’
केले के सूखे पतले पर मूढ़ी और आम रख कर उसने बड़े प्यार से कहा, ‘आओ, एक मुट्ठी खा लो।’
‘नहीं, मुझे भूख नहीं।’
किंतु मोहना की आँखों से रह-रह कर कोई झाँकता था, मूढ़ी और आम को एक साथ निगल जाना चाहता था। …भूखा, बीमार, भगवान!
‘आओ, खा लो बेटा! …रसपिरिया नहीं सुनोगे?’
माँ के सिवा, आज तक किसी अन्य व्यक्ति ने मोहना को इस तरह प्यार से कभी परोसे भोजन पर नहीं बुलाया।

…लेकिन, दूसरे चरवाहे देख लें तो माँ से कह देगें। …भीख का अन्न!
‘नहीं, मुझे भूख नहीं।’
मिरदंगिया अप्रतिभ हो जाता है। उसकी आँखें फिर सजल हो जाती हैं। मिरदंगिया ने मोहना – जैसे दर्जनों सुकुमार बालकों की सेवा की है। अपने बच्चों को भी शायद वह इतना प्यार नहीं दे सकता। …और अपना बच्चा! हूँ! …अपना-पराया? अब तो सब अपने, सब पराए।…
‘मोहना!’
‘कोई देख लेगा तो?’
‘तो क्या होगा?’
‘माँ से कह देगा। तुम भीख माँगते हो न?’
‘कौन भीख माँगता है?’ मिरदंगिया के आत्म-सम्मान को इस भोले लड़के ने बेवजह ठेस लगा दी। उसके मन की झाँपी में कुडंलीकार सोया हुआ साँप फन फैला कर फुफकार उठा, ‘ए-स्साला! मारेंगे वह तमाचा कि…
‘ऐ! गाली क्यों देते हो!’ मोहना ने डरते-डरते प्रतिवाद किया।
वह उठ खड़ा हुआ, पागलों का क्या विश्वास।
आसमान में उड़ती हुई चील ने फिर टिंहकारी भरी …टिंही …ई …टिं-टिं-ग!
‘मोहना!’ मिरदंगिया की अवाज गंभीर हो गई।
मोहना जरा दूर जा कर खड़ा हो गया।
‘किसने कहा तुमसे कि मैं भीख माँगता हूँ? मिरदंग बजा कर, पदावली गा कर, लोगों को रिझा कर पेट पालता हूँ। …तुम ठीक कहते हो, भीख का ही अन्न है यह। भीख का ही फल है यह। …मै नहीं दूँगा। …तुम बैठो, मैं रसपिरिया सुना दूँ।’
मिरदंगिया का चेहरा धीरे-धीरे विकृत हो रहा है। …आसमान में उड़नेवाली चील अब पेड़ की डाली पर आ बैठी है। …टिं-टिं-हिं टिंटिक!
मोहना डर गया। एक डग, दो डग …दे दौड़। वह भागा।
एक बीघा दूर जा कर उसने चिल्लाकर कहा, ‘डायन ने बान मार कर तुम्हारी उँगली टेढ़ी कर दी है। झूठ क्यों कहते हो कि रसपिरिया बजाते समय…’
‘ऐं! कौन है यह लड़का? कौन है यह मोहना? …रमपतिया भी कहती थी, डायन ने बान मार दिया है।’
‘मोहना!’
मोहना ने जाते-जाते चिल्ला कर कहा, ‘करैला!’ अच्छा, तो मोहना यह भी जानता है कि मिरदंगिया ‘करैला’ कहने से चिढ़ता है! …कौन है यह मोहना?
मिरदंगिया आतंकित हो गया। उसके मन में एक अज्ञात भय समा गया। वह थर-थर काँपने लगा। उसमें कमलपुर के बाबुओं के यहाँ जाने का उत्साह भी नहीं रहा। …सुबह शोभा मिसर के लड़के ने ठीक ही कहा था।
उसकी आँखों में आँसू झरने लगे।

जाते-जाते मोहना डंक मार गया। उसके अधिकांश शिष्यों ने ऐसा ही व्यवहार किया है उसके साथ। नाच सीख कर फुर्र से उड़ जाने का बहाना खोजनेवाले एक-एक लड़के की बातें उसे याद हैं।
सोनमा ने तो गाली ही दी थी – ‘गुरुगिरी कहता है, चोट्टा!’
रमपतिया आकाश की ओर हाथ उठा कर बोली थी – ‘हे दिनकर! साच्छी रहना। मिरदंगिया ने फुसला कर मेरा सर्वनाश किया है। मेरे मन में कभी चोर नहीं था। हे सुरुज भगवान! इस दसदुआरी कुत्ते का अंग-अंग फूट कर…।’
मिरदंगिया ने अपनी टेढ़ी उँगली को हिलाते हुए एक लंबी साँस ली। …रमपतिया? जोधन गुरुजी की बेटी रमपतिया! जिस दिन वह पहले-पहल जोधन की मंडली में शामिल हुआ था – रमपतिया बारहवें में पाँव रख रही थी। …बाल-विधवा रमपतिया पदों का अर्थ समझने लगी थी। काम करते-करते वह गुनगुनाती – ‘नव अनुरागिनी राधा, किछु नाँहि मानय बाधा।’…मिरदंगिया मूलगैनी सीखने गया था और गुरु जी ने उसे मृदंग थमा दिया था… आठ वर्ष तक तालीम पाने के बाद जब गुरु जी ने स्वजात पँचकौड़ी से रमपतिया के चुमौना की बात चलाई तो मिरदंगिया सभी ताल-मात्रा भूल गया। जोधन गुरु जी से उसने अपनी जात छिपा रखी थी।

रमपतिया से उसने झूठा परेम किया था। गुरु जी की मंडली छोड़ कर वह रातों-रात भाग गया। उसने गाँव आ कर अपनी मंडली बनाई, लड़कों को सिखाया-पढ़ाया और कमाने-खाने लगा। …लेकिन, वह मूलगैन नहीं हो सका कभी। मिरदंगिया ही रहा सब दिन। …जोधन गुरु जी की मृत्यु के बाद, एक बार गुलाब-बाग मेले में रमपतिया से उसकी भेंट हुई थी। रमपतिया उसी से मिलने आई थी। पँचकौड़ी ने साफ जवाब दे दिया था – ‘क्या झूठ-फरेब जोड़ने आई है? कमलपुर के नंदूबाबू के पास क्यों नहीं जाती, मुझे उल्लू बनाने आई है। नंदूबाबू का घोड़ा बारह बजे रात को…।’ चीख उठी थी रमपतिया – पाँचू! …चुप रहो!’
उसी रात रसपिरिया बजाते समय उसकी उँगली टेढ़ी हो गई थी। मृदंग पर जमनिका दे कर वह परबेस का ताल बजाने लगा। नटुआ ने डेढ़ मात्रा बेताल हो कर प्रवेश किया तो उसका माथा ठनका। परबेस के बाद उसने नटुआ को झिड़की दी – ‘एस्साला! थप्पड़ों से गाल लाल कर दूँगा।’…और रसपिरिया की पहली कड़ी ही टूट गई। मिरदंगिया ने ताल को सम्हालने की बहुत चेष्टा की। मृदंग की सूखी चमड़ी जी उठी, दाहिने पूरे पर लावा-फरही फूटने लगे और तल कटते-कटते उसकी उँगली टेढ़ी हो गई। झूठी टेढ़ी उँगली! …हमेशा के लिए पँचकौड़ी की मंडली टूट गई। धीरे-धीरे इलाके से विद्यापति-नाच ही उठ गया। अब तो कोई भी विद्यापति की चर्चा भी नहीं करते हैं। …धूप-पानी से परे, पँचकौड़ी का शरीर ठंडी महफिलों में ही पनपा था… बेकार जिंदगी में मृदंग ने बड़ा काम दिया। बेकारी का एकमात्र सहारा – मृदंग!
एक युग से वह गले में मृदंग लटका कर भीख माँग रहा है – धा-तिंग, धा-तिंग!
वह एक आम उठा कर चूसने लगा – लेकिन, लेकिन, …लेकिन …मोहना को डायन की बात कैसे मालूम हुई?
उँगली टेढ़ी होने की खबर सुन कर रमपतिया दौड़ी आई थी, घंटों उँगली को पकड़ कर रोती रही थी – ‘हे दिनकर, किसने इतनी बड़ी दुश्मनी की? उसका बुरा हो। …मेरी बात लौटा दो भगवान! गुस्से में कही हुई बातें। नहीं, नहीं। पाँचू, मैंने कुछ भी नहीं किया है। जरुर किसी डायन ने बान मार दिया है।’
मिरदंगिया ने आँखें पोंछते हुए सूरज की ओर देखा। …इस मृदंग को कलेजे से सटा कर रमतपिया ने कितनी रातें काटी हैं! …मिरदंग को उसने अपने छाती से लगा लिया।
पेड़ की डाली पर बैठी हुई चील ने उड़ते हुए जोड़े से कहा – टिं-टिं-हिंक्‌!
‘एस्साला!’उसने चील को गाली दी। तंबाकू चुनिया कर मुँह में डाल ली और मृदंग के पूरे पर उँगलियाँ नचाने लगा – धिरिनागि, धिरिनागि, धिरिनागि-धिनता!
पूरी जमनिका वह नहीं बजा सका। बीच में ही ताल टूट गया।
-अ‌‌‌-कि-हे-ए-ए-हा-आआ-ह-हा!
सामने झरबेरी के जंगल के उस पार किसी ने सुरीली आवाज में, बड़े समारोह के साथ रसप्रिया की पदावली उठाई –
‘न-व-वृंदा-वन, न-व-न-व-तरु-ग-न, न-व-नव विकसित फूल…’
मिरदंगिया के सारे शरीर में एक लहर दौड़ गई उसकी उँगलियाँ स्वयं ही मृदंग के पूरे पर थिरकने लगीं। गाय-बैलों के झुंड दोपहर की उतरती छाया में आ कर जमा होने लगे।
खेतों में काम करनेवालों ने कहा, ‘पागल है। जहाँ जी चाहा, बैठ कर बजाने लगता है।’
‘बहुत दिन के बाद लौटा है।’
‘हम तो समझते थे कि कहीं मर-खप गया।’
रसप्रिया की सुरीली रागिनी ताल पर आ कर कट गई। मिरदंगिया का पागलपन अचानक बढ़ गया। वह उठ कर दौड़ा। झरबेरी की झाड़ी के उस पार कौन है? कौन है यह शुद्ध रसप्रिया गानेवाला? इस जमाने में रसप्रिया का रसिक…? झाड़ी में छिप कर मिरदंगिया ने देखा, मोहना तन्मय होकर दूसरे पद की तैयारी कर रहा है। गुनगुनाहट बंद करके उसने गले को साफ किया। मोहना के गले में राधा आ कर बैठ गई है! …क्या बंदिश है!
‘न-वी-वह नयनक नी…र!

आहो…पललि बहए ताहि ती…र!’
मोहना बेसुध होकर गा रहा था। मृदंग के बोल पर वह झूम-झूम कर गा रहा था। मिरदंगिया की आँखें उसे एकटक निहार रही थीं और उसकी उँगलियाँ फिरकी की तरह नाचने को व्याकुल हो रही थीं। …चालीस वर्ष का अधपागल युगों के बाद भावावेश में नाचने लगा। …रह-रह कर वह अपनी विकृत आवाज में पदों की कड़ी धड़ता – फोंय-फोंय, सोंय-सोंय!
धिरिनागि-धिनता!
‘दुहु रस…म…य तनु-गुने नहीं ओर।
लागल दुहुक न भाँगय जो-र।’
मोहना के आधे काले और आधे लाल होंठों पर नई मुस्कराहट दौड़ गई। पद समाप्त। करते हुए वह बोला, ‘इस्स! टेढ़ी उँगली पर भी इतनी तेजी?’
मोहना हाँफने लगा। उसकी छाती की हड्डियाँ!
…उफ! मिरदंगिया धम्म से जमीन पर बैठ गया – ‘कमाल! कमाल!…किससे सीखे? कहाँ सीखी तुमने पदावली? कौन है तुम्हारा गुरु?’
मोहना ने हँस कर जवाब दिया, ‘सीखूँगा कहाँ? माँ तो रोज गाती है। …प्रातकी मुझे बहुत याद है, लेकिन अभी तो उसका समय नहीं।’
‘हाँ बेटा! बेताले के साथ कभी मत गाना-बजाना। जो कुछ भी है, सब चला जाएगा। …समय-कुसमय का भी खयाल रखना। लो,अब आम खालो।’
मोहना बेझिझक आम ले कर चूसने लगा।
‘एक और लो।’
मोहना ने तीन आम खाए और मिरदंगिया के विशेष आग्रह पर दो मुट्ठी मूढ़ी भी फाँक गया।
‘अच्छा, अब एक बात बताओगे मोहना! तुम्हारे माँ-बाप क्या करते हैं?’
‘बाप नहीं है, अकेली माँ है। बाबू लोगों के घर कुटाई-पिसाई करती है।’
‘और तुम नौकरी करते हो! किसके यहाँ?’
‘कमलपुर के नंदूबाबू के यहाँ।’
‘नंदूबाबू के यहाँ?’
मोहना ने बताया उसका घर सहरसा में है। तीसरे साल सारा गाँव कोसी मैया के पेट में चला गया। उसकी माँ उसे ले कर अपने ममहर आई है… कमलपुर।
‘कमलपुर में तुम्हारी माँ के मामू रहते हैं?’
मिरदंगिया कुछ देर तक चुपचाप सूर्य की ओर देखता रहा।

…नंदूबाबू – मोहना – मोहना की माँ!
‘डायनवाली बात तुम्हारी माँ कह रही थी?’
‘हाँ।’
‘और एक बार सामदेव झा के यहाँ जनेऊ में तुमने गिरधर-पटटी मडंलीवालों का मिरदंग छीन लिया था।

…बेताला बजा रहा था। ठीक है न?’
मिरदंगिया की खिचड़ी दाढ़ी मानो अचानक सफेद हो गई। उसने अपने को सम्हाल कर पूछा, ‘तुम्हारे बाप का नाम क्या है?’
‘अजोधादास!’
‘अजोधादास?’
बूढ़ा अजोधादास, जिसके मुँह में न बोल, न आँख में लोर। …मंडली में गठरी ढोता था। बिना पैसा का नौकर बेचारा अजोधादास!
‘बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ।’ एक लंबी साँस ले कर मिरदंगिया ने अपनी झोली से एक छोटा बटुआ निकला। लाल-पीले कपड़ों के टुकड़ों को खोल कर कागज की एक पुड़िया निकाली उसने।
मोहना ने पहचान लिया – ‘लोट? क्या है, लोट?’
‘हाँ, नोट है।’
‘कितने रुपएवाला है? पचटकिया। ऐं… दसटकिया? जरा छूने दोगे? कहाँ से लाए?’ मोहना एक ही साँस में सब कुछ पूछ गया, ‘सब दसटकिया हैं?’
‘हाँ, सब मिला कर चालीस रुपए हैं।’ मिरदंगिया ने एक बार इधर-उधर निगाहें दौड़ाई, फिर फुसफुसा कर बोला, ‘मोहना बेटा! फारबिसगंज के डागडरबाबू को दे कर बढ़िया दवा लिखा लेना। …खट्ट-मिट्ठा परहेज़ करना। …गरम पानी जरुर पीना।’
‘रुपए मुझे क्यों देते हो?’
‘जल्दी रख ले, कोई देख लेगा।’
मोहना ने भी एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। उसके होंठों की कालिख और गहरी हो गई।
मिरदंगिया बोला, ‘बीड़ी-तंबाकू भी पीते हो? खबरदार!’
वह उठ खड़ा हुआ।
मोहना ने रुपए ले लिए।
‘अच्छी तरह गाँठ बाँध ले। माँ से कुछ मत कहना।’
‘और हाँ, यह भीख का पैसा नहीं। बेटा, यह मेरी कमाई के पैसे हैं। अपनी कमाई के…।’
मिरदंगिया ने जाने के लिए पाँव बढ़ाया।
‘मेरी माँ खेत में घास काट रही है। चलो न!’ मोहना ने आग्रह किया।
मिरदंगिया रुक गया। कुछ सोच कर बोला, ‘नहीं मोहना! तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा पा कर तुम्हारी माँ ‘महारानी’ हैं, मैं महाभिखारी दसदुआरी हूँ। जाचक, फकीर…! दवा से जो पैसे बचें, उसका दूध पीना।’
मोहना की बड़ी-बड़ी आँखें कमलपुर के नंदूबाबू की आँखों-जैसी हैं…।
‘रे-मो-ह-ना-रे-हे! बैल कहाँ हैं रे?’
‘तुम्हारी माँ पुकार रही है शायद।’
‘हाँ। तुमने कैसे जान लिया?’
‘रे-मोहना-रे-हे!’
एक गाय ने सुर-में-सुर मिला कर अपने बछड़े को बुलाया।
गाय-बैलों के घर लौटने का समय हो गया। मोहना जानता है, माँ बैल हाँक कर ला रही होगी। झूठ-मूठ उसे बुला रही है। वह चुप रहा।
‘जाओ।’ मिरदंगिया ने कहा, ‘माँ बुला रही है। जाओ।…अब से मैं पदावली नहीं, रसपिरिया नहीं, निरगुन गाऊँगा। देखो, मेरी उँगली शायद सीधी हो रही है। शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल?…
‘अरे, चलू मन, चलू मन- ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहिरा में अगिया लगायब रे-की…।’
खेतों की पगडंडी, झरबेरी के जंगल के बीच होकर जाती है। निरगुन गाता हुआ मिरदंगिया झरबेरी की झाड़ियों में छिप गया।
‘ले। यहाँ अकेला खड़ा होकर क्या करता है?’ कौन बजा रहा था मृदंग रे?’ घास का बोझा सिर पर ले कर मोहना की माँ खड़ी है।
‘पँचकौड़ी मिरदंगिया।’
‘ऐं, वह आया है? आया है वह?’ उसकी माँ ने बोझ जमीन पर पटकते हुए पूछा।
‘मैंने उसके ताल पर रसपिरिया गाया है। कहता था, इतना शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल! …उसकी उँगली अब ठीक हो जाएगी।
माँ ने बीमार मोहना को आह्लाद से अपनी छाती से सटा लिया।
‘लेकिन तू तो हमेशा उसकी टोकरी-भर शिकायत करती थी – बेईमान है, गुरु-दरोही है, झूठा है!’
‘है तो! वैसे लोगों की संगत ठीक नहीं। खबरदार, जो उसके साथ फिर कभी गया! दसदुआरी जाचकों से हेलमेल करके अपना ही नुकसान होता है। …चल, उठा बोझ!’
मोहना ने बोझ उठाते समय कहा, ‘जो भी हो, गुनी आदमी के साथ रसपिरिया…।’
‘चौप! रसपिरिया का नाम मत ले।’
अजीब है माँ! जब गुस्साएगी तो वाघिन की तरह और जब खुश होती है तो गाय की तरह हुँकारती आएगी और छाती से लगा लेगी। तुरत खुश, तुरत नाराज…
दूर से मृदंग की आवाज आई – धा-तिंग, धा-तिंग!
मोहना की माँ खेत की ऊबड़-खाबड़ मेड़ पर चल रही थी। ठोकर खा कर गिरते-गिरते बची। घास का बोझ गिर कर खुल गया। मोहना पीछे-पीछे मुँह लटका कर जा रहा था। बोला, ‘क्या हुआ, माँ?’
‘कुछ नहीं।’
-धा-तिंग, धा-तिंग!
मोहना की माँ खेत की मेड़ पर बैठ गई। जेठ की शाम से पहले जो पुरवैया चलती है, धीरे-धीरे तेज हो गई …मिटटी की सुंगध हवा में धीरे-धीरे घुलने लगी।
-धा-तिंग, धा-तिंग!
‘मिरदंगिया और कुछ बोलता था, बेटा?’ मोहना की माँ आगे कुछ बोल न सकी।
‘कहता था, तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा…’
‘झूठा, बेईमान!’ मोहना की माँ आँसू पोंछ कर बोली, ‘ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।’
मोहना चुपचाप खड़ा रहा।

 

महिला दिवस पर बेटी के लिए

 

geeta dubey

 

 

 

 

 

 

 

 

  • डॉ. गीता दूबे

ओ मेरी प्यारी बिटिया

ओ मेरी सोन चिरैया

आज महिला दिवस पर

चारों ओर गूंज रहे हैं नारे

रोशनी और आनंद के फौव्वारे

पट गया हैबाजार कीमती उपहारों से

आह्लादित हैं महिलाएं इन कारबारों से

पर तुम न समझना इसे अपनी सफलता

मेरी रानी यह नहीं है वह रास्ता

जिस पर चलकर पाओगी अपनी मंजिल

इन चोंचलों से कुछ भी न होगा हासिल।

ओ मेरी नन्हीं परी

ओ मेरी प्यारी कली

यह सब तमाशा है

बस घड़ी दो घड़ी।

ध्यान सेदेखो मेरी बिटिया

कल जिन लड़कियों/ औरतों ने

रखा था व्रत शिवरात्रि का

अच्छा वर पाने की कामना से

परिवार कल्याण की भावना से

और सोलह श्रृंगार कर

खिंचवाकर तस्वीरें

आकर्षक भंगिमा में

अपने – अपने देवताओं के साथ

हुलसते हुए बांटा था

सोशल मीडिया में गर्व के साथ।

आज वे ही सारी स्त्रियां

निकल पड़ी हैं

हाथों में मशाल लेकर

सड़कों और चौराहों पर,

गरज रही हैं मंचों पर।

लादी जा रही हैं फूल मालाओं से

बहलाई जा रही हैं अभिनंदन पत्रों से।

गर्वित हैं आज जो अपने साफल्य पर

कल फिर से ढकेल दी जाएंगी

अपने अपने घरों में,

दहलीज की सीमा के अंदर

जहाँ अपनी अपनी खिड़कियों से

अपने हिस्से का आकाश निहारती

अपनी सिसकियों को हृदय में दबाती

सारे तीज त्योहार खुशी खुशी मनाती

पति ,बेटे और परिवार की मंगल कामना के गीत गाती

बेटियों को कोख में ही दफनाती

इंतजार करेंगी वास्तविक  मुक्ति के दिन का।

ओ मेरी बिटिया

कभी इस छद्म मुक्ति के भुलावे में मत पड़ना,

अपनी आजादी उधार या सौगात में न मांगना।

उसे हासिल करना अपने दम खम से

अपनी ही शर्तों पर।

और अपनेसाथ साथ मुक्त करना

अपनी तमाम सखियों और सखाओं को

क्योंकि मुक्ति का सही आनंद और आस्वाद

अपनी नहीं  सबकी मुक्ति में है।

जहाँ मुक्त विचार और उदार आचार हो,

हर एक के लिए विकास का आधार हो।

जहाँ अर्गलाएं तन की ही नहीं

मन की भी कटकर गिरें

जहाँ हर मनु और मानवी को

अपने सपनों का घर मिले।

निर्भया, नयना और सोनी को न्याय मिले,

सत्ता का सुख और पद का आनंद ही नहीं

असहमति के लिए जगह और निर्णय का अधिकार मिले।

(कवियत्री स्कॉटिश चर्च कॉलेज की हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं)

महाननगर में उत्साह के साथ मनाया गया गणगौर

कोलकाता – गणगौर राजस्थान का ऐसा पर्व है जिसे महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ मनाती हैं और कोलकाता में भी यही उल्लास दिखायी पड़ता है। हाल ही में पूर्व कोलकाता माहेश्वरी सभा की ओर से यह पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर संस्था द्वारा आयोजित समारोह में टॉलीवुड की अभिनेत्री सुचंद्रा वानिया और जस्टिस अमिताभ लाला ने शिरकत की। गणगौर गौरी की प्रसन्नता का प्रतीक है और विवाहित महिलाएं अपने पति की लम्बी आयु की कामना के साथ यह पर्व मनाती हैं। यह पर्व इस साल 8 से 10 अप्रैल तक गणगौर सीआईटी पार्क में अपने पूरे उमंग पर दिखा। पूर्व कोलकाता माहेश्वरी सभा के उपाध्यक्ष हेमंत मारदा ने इस अवसर पर बताया कि संस्था का उद्देश्य युवाओं को परम्परा से जोड़ना है।

जब डीएम ने किया खुद रक्तदान

शाहजहांपुर। वैसे तो आमतौर पर अधिकारी किसी भी जगह अव्यवस्था दिखाई देने पर जिम्मेदारों को निर्देश देकर आगे निकल जाते हैं। लेकिन शाहजहांपुर के डीएम ने इससे आगे जाते हुए एक ऐसा कदम उठाया जिसकी पूरे जिले में प्रशंसा हो रही है।

दरअसल डीएम विजय किरण जिला अस्पताल का निरिक्षण करने पहुंचे थे। जब वो अधिकारियों से बात कर रहे थे तभी वहां एक मरीज की बहन आई जिसे एबी नेगेटिव ब्लड ग्रुप की जरूरत थी। युवती ने डीएम से से जब अपनी परेशानी बताई तो डीएम ने ब्लड बैंक में जाकर बात की जहां उन्‍हें बताया गया कि बैंक में इस ग्रुप का ब्लड उपलब्ध नहीं है।

इसके बाद डीएम ने ऑन ड्यूटी रहते हुए महिला की मदद के लिए कदम बढ़ाया और तुरंत अपना रक्त दिया। डीएम का ब्लड ग्रुप एबी नेगेटिव होने की वजह से उस मरीज के काम आ गया। डीएम के इस कदम की अब चारों तरफ प्रशंसा हो रही है।

 

मन के जीते जीत है, जरूरी है विश्वास

आपका अवचेतन आपकी इच्छानुसार तभी फल देता है, जब आप उस पर पूरी आस्था रखते हैं। इच्छाएं तो आपकी अनंत होती हैं। आपके मन में जो भी विचार चलते हैं, वे आपकी अनगढ़ इच्छाएं ही होती हैं। इनका कोई सिर-पैर नहीं होता। हमेशा मन में बेलगाम घोड़े दौड़ते रहते हैं। इस प्रकार की इच्छाएं कभी फलवती नहीं होतीं।

विचार हमेशा चेतन मन में चलते हैं। प्रत्येक विचार का मन में एक मेंटल फ्रेम अथवा चित्र बनता है। बिना चित्र कोई विचार नहीं चलता। आपका अवचेतन प्रत्येक विचार को सत्य समझता तो है लेकिन उसी हद तक, जिस हद तक आपका विश्वास होता है। व्यर्थ के सभी विचार विश्वास से परे होते हैं।

जिस किसी भी विचार पर आपकी आस्था होती है, पूरा विश्वास होता है, आपका अवचेतन मन उस विचार अथवा छवि को वास्तविकता में बदल सकता है। संसार में प्रचलित सब धार्मिक सिद्धांत इसी विश्वास पर काम करते हैं।

कोई भी व्यक्ति जब पूरी आस्था से कोई कामना करता है, ईश्वर, अल्लाह या गॉड से प्रार्थना करता है तो वह प्रार्थना पूरी होती है। आपकी प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है। लेकिन सुनता कौन है? कौन आपकी याचना को पूरा करता है? दरअसल कोई भी व्यक्ति जब पूरी आस्था से कोई कामना करता है, तो उसे सुनने वाला उसका अवचेतन मन ही होता है और वही फल देता है।

सवाल शुद्धता का

आपका अवचेतन मन आपकी इच्छा को तभी पूरी करता है, जब वह शुद्ध होती है, किसी का अहित नहीं चाहती। अवचेतन मन की शुद्धता, चेतन मन की शुद्धता पर निर्भर करती है। विचार और उनका चित्रण चेतन मन की प्रक्रिया है।

हर विचार का अपना चित्रण होता है। जिस प्रकार के चित्र आपके चेतन मन में चलते हैं और बार-बार दोहराए जाते हैं, उनकी प्रोग्रामिंग होकर आपके अवचेतन की हार्ड-डिस्क में परमानेंटली रिकॉर्ड हो जाती हैं।

इनकी रिकॉर्डिंग चित्रों के रूप में ही होती है। आपने देखा होगा कि सीडी अथवा डीवीडी पर भी तरंगों के रूप में ही चित्रों तथा ध्वनि की रिकॉर्डिंग होती है। अवचेतन मन की हार्ड डिस्क में चित्रों व ध्वनि के साथ-साथ कर्म व संस्कारों की भी रिकॉर्डिंग होती है, जिससे सुख अथवा दु:ख की अनुभूति होती है।

ये संस्कार ही आपकी कार्मिक शक्ति होते हैं। तदनुसार मन को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। यदि आपका दृष्टिकोण सकारात्मक है, तो आप अच्छे फल की आशा कर सकते हैं।

आज आप जो कुछ भी हैं, अपने कर्म-संस्कारों के कारण ही हैं। आपके संस्कार स्वयं ही आपके लिए ऐसी परिस्थिति उत्पन्ना कर देते हैं, जो आपकी इच्छाओं को पूर्ण करने का कारण बनते हैं। आपकी आशा आपके विश्वास को बल देती है। आशा और विश्वास ही आपके वास्तविक मित्र हैं। अपने विश्वास की शक्ति से आप मनचाहा प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र हैं। अत: आशावादी बनें। अपने विश्वास से अपनी इच्छाएं पूरी करें।

सब लोग अच्छा स्वास्थ्य, धन-दौलत, सुख और शांति की आकांक्षा रखते हैं। क्या यह सब कुछ हर व्यक्ति को उपलब्ध है? नहीं! ऐसा संभव भी नहीं। इच्छा करना, कामना करना और बात है, जबकि विश्वासपूर्वक याचना दूसरा ही पहलू है।

आपका अवचेतन मन तो अनादि काल से ही सर्वशक्तिमान, सर्वसामर्थ्यवान व सर्वदृष्टा रहा है। जब इस संसार में आज के धर्म व सम्प्रदाय नहीं थे, उस काल में भी मन इस आस्था से ही कार्य करता था।

आपका मन एक वाई-फाई की तरह कार्य करता है। वाई-फाई से काम लेने के लिए उससे कनेक्ट होना पड़ता है। कनेक्ट होने के लिए एक पासवर्ड की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार मन से कनेक्ट होने के लिए भी एक पासवर्ड चाहिए। मन के लिए तो एक ही पासवर्ड होता है और वह है ‘विश्वास।

 

कुँअर बेचैन की दो कविताएं

मध्यमवर्गीय पत्नी से

Dr_Kunwar_Bechain

कल समय की व्यस्तताओं से निकालूँगा समय कुछ

फिर भरुँगा खुद तुम्हारी माँग में सिन्दूर
मुझको माफ़ करना
आज तो इस वक्त काफी देर ऑफिस को हुई है
हाँ जरा सुनना वो मेरी पेंट है न
वो फटी है जो अकेले पाँयचों पर
तुम जरा उसमें लगाकर चन्द टाँके
शर्ट के टूटे बटन भी टाँक देना
इस तरह से, जो नई हर कोई आँके
कल थमे वातावरण से, मैं निकालूँगा प्रलय कुछ
ले चलूँगा फिर तुम्हें इस भीड़ से भी दूर
मुझको माफ करना

आज तो इस वक्त काफी देर, ग्यारह पर सुई है
क्या कहा, है आज पप्पू का जन्मदिन
तुम सुनो, ये बात पप्पू से न कहना
और दिन भर तुम उसी के पास रहना
यदि करे तुमको परेशां, मारना मत
और हाँ, तुम भी कहीं मन हारना मत
कल पराजय के जलधि से, मैं निकालूँगा विजय कुछ
फिर मनायेंगे जन्मदिन की खुशी भरपूर
मुझको माफ करना
आज तो ये जेब भी मेरी फटेपन ने छुई है

indian mother painting

 

बेटियाँ-

शीतल हवाएँ हैं
जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं

बेटियाँ –
पवन-ऋचाएँ हैं
बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं
हैं चपलता तरल पारे की
और दृढता ध्रुव-सितारे की
कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन
नाव हैं ये उस किनारे की

बेटियाँ-
ऐसी घटाएँ हैं
जो छलकती हैं, नदी बनकर नहीं बहतीं

बिटिया के नाम चंदा कोचर की पाती

वो दुनिया की 100 सबसे ताकतवर महिलाओं में से एक हैं. आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक और सीईओ चंदा कोचर को पिछले तीन साल की तरह इस साल भी दुनिया की 100 सबसे ताकतवर महिलाओं में चुना गया है।

एक सफल कामकाजी महिला के तौर पर तो उन्हें हर कोई जानता है लेकिन उनकी निजी जिंदगी के बारे में कम ही लोगों को पता है. जहां वो एक मां, एक बेटी, एक पत्नी, एक बहू की भूमिका में होती हैं. आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि कामकाजी औरतें अपने बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं दे पाती हैं लेकिन चंदा कोचर की ये चिट्ठी पढ़कर आपकी भी राय बदल जाएगी. ये चिट्ठी उन्होंने अपनी बेटी आरती के नाम लिखी है।

सुधा मेनन द्वारा लिखी किताब “लिगेसीः लेटर्स फ्रॉम एमिनैंट पैरेंट्स टू देयर डॉटर्स” में उनका ये खत प्रकाशित हुआ है जिसे पढ़कर आप भी भावुक हुए बिना नहीं रह पाएंगे।chanda kochar

प्यारी आरती,
आज तुम्हें जीवन के इस नए सफर के लिए तैयार और आत्मविश्वास से भरी हुई युवती के रूप में देखकर मुझे गर्व हो रहा है। आने वाले सालों में मैं तुम्हें तरक्की करते हुए देखना चाहती हूं। आज तुम्हें देखकर मेरी अपनी यादें जिंदा हो उठी हैं. यादों के साथ ही वो सारी बातें, वो सबक जो मैंने बचपन में सीखे थे।

उस वक्त के बारे में सोचती हूं तो पाती हूं कि ज्यादातर बातें और सबक तो मैंने अपने माता-पिता से ही सीखे थे। बचपन में जो मूल्य उन्होंने मुझे सिखाए और दिए, उन्हीं की नींव पर मैं आज खड़ी हूं।

हम तीनों भाई-बहनों में कभी भेदभाव नहीं किया गया। चाहे पढ़ाई की बात हो या भविष्य की योजनाओं की, कभी कोई फर्क नहीं किया गया। उन्होंने हमेशा यही कहा कि जिस चीज से हमें संतुष्टि मिलती है, हमें उसी दिशा में पूरी लगन से काम करना चाहिए। बचपन में सिखायी गई इन्हीं बातों ने हमें अपना फैसला खुद लेने के काबिल बनाया। इस एक सबक ने मुझे खुद की पहचान बनाने और खुद को तलाशने में मदद की।

मैं सिर्फ 13 साल की थी, जब हमारे पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा और वो हमें अकेला छोड़कर चले गए। उनके रहने तक हमने कभी भी चुनौतियों का सामना नहीं किया था पर उस रात के बाद, बिना किसी पूर्व सूचना के सबकुछ बदल गया। मेरी मां, जो अब तक एक गृहिणी थी, उसके ऊपर तीन बच्चों को अकेले बड़ा करने की जिम्मेदारी आ गई। तब हमें पता चला कि वो कितनी मजबूत थीं.

धीरे-धीरे उन्होंने टेक्सटाइल डिजाइनिंग के लिए खुद को तैयार किया और छोटी सी फर्म में नौकरी कर ली। कुछ ही दिनों में उन्होंने खुद को एक प्रासंगिक शख्स बना लिया. अकेले पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाना उनके लिए बहुत मुश्किल रहा होगा लेकिन उन्होंने हमें कभी भी इस बात का एहसास नहीं होने दिया.। उन्होंने तब तक कड़ी मेहनत की,जब तक हम सब कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर अपने पैरों पर खड़े नहीं हो गए। मुझे कभी नहीं पता था कि मेरी मां को खुद पर इतना भरोसा है।

अगर आप फुलटाइम जॉब करने वाली मां या पिता हैं तो आपके काम का असर आपके परिवार और रिश्ते पर नहीं पड़ना चाहिए. वो वक्त याद है, जब तुम अमेरिका में पढ़ रही थी और मेरे आईसीआईसीआई बैंक के एमडी और सीईओ बनने की खबरें सारे अखबारों में थीं? तुमने दो दिन बाद मुझे एक मेल किया जिसमें तुमने मुझे लिखा था, ‘आपने हमें कभी महसूस नहीं होने दिया कि आपका करियर इतना तनावभरा और इतना शानदार हो सकता है। घर पर आप सिर्फ हमारी मां थीं,’ तुम अपनी जिंदगी को वैसे ही जीना।

मां से मैंने एक बात और सीखी थी कि मुश्किलों से निपटकर आगे बढ़ते रहने की ताकत होना सबसे जरूरी है, फिर चाहे कुछ भी हो। मुझे आज भी याद है कि कितने धैर्य के साथ उन्होंने पापा के जाने के बाद सब संभाल लिया था। आपको सारी मुश्किलों का सामना कर, उनसे जीतना होता है, न कि उन्हें खुद पर हावी होने देना। मुझे याद है कि 2008 के आखिर में ग्लोबल इकनॉमिक मेल्टडाउन के दौरान आईसीआईसीआई बैंक को बचाए रखना कितना मुश्किल हो गया था। सारे बड़े मीडिया हाउस दूर से हमारी स्थिति को देखकर अंदाजे लगा रहे थे। हर जगह हमारे बारे में बहसें की जा रही थीं।

मैं काम पर लग गई, छोटे से छोटे पैसा जमा करने वाले से लेकर बड़े इनवेस्टर्स तक, सबसे बात की. रेगुलेटर्स से लेकर सरकार तक से बात की. बैंक परेशानी में नहीं था, पर मैं स्टेकहोल्डर्स की परेशानी भी समझती थी, क्योंकि कइयों को डर था कि उनका पैसा खतरे में है।

मैंने हर ब्रांच के स्टाफ को सलाह दी कि बैंक से पैसा निकालने आए हर इनवेस्टर की बात तसल्ली से सुनें। अगर कोई अपनी बारी का इंतजार कर रहा है, तो उन्हें बैठने को कुर्सी और पीने को पानी दें और हां, भले ही लोगों को बैंक से अपना पैसा निकालने की पूरी आजादी थी, पर हमारे स्टाफ ने उन्हें समझाया कि ऐसा करने से उन्हें कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि दरअसल क्राइसिस की कोई बात नहीं थी।

उन्हीं मुश्किल दिनों की बात है, जब एक दिन मैंने तुम्हारे भाई के स्क्वॉश टूर्नामेंट के लिए दो घंटे की छुट्टी ली थी. उस वक्त मुझे अंदाजा नहीं था, पर उस दिन मेरे वहां होने से बैंक के कस्टमर्स का हम पर भरोसा मजबूत हुआ था. कुछ मांओं ने मेरे पास आकर पूछा कि क्या मैं आईसीआईसीआई की चंदा कोचर हूं, और जब मैंने हां में जवाब दिया, तो उनका अगला सवाल था कि इतने क्राइसिस के दौरान खेल के लिए वक्त कैसे निकाला? उन्हें भरोसा हो गया था कि अगर मैं खेल के लिए वक्त निकाल रही हूं, तो बैंक सही हाथों में है और अपने पैसे को लेकर उन्हें डरने की जरूरत नहीं है।

मैंने अपनी मां से परिस्थितियों के हिसाब से ढलना भी सीखा. अपने करियर के लिए कड़ी मेहनत करते वक्त मैंने अपने परिवार की देखभाल भी की. जब भी मेरी मां और मेरे ससुराल वालों को मेरी जरूरत हुई, मैं उनके साथ थी। उन्होंने भी मेरा साथ दिया और मेरे करियर को आगे ले जाने में मेरी मदद की।

याद रखना, रिश्ते बेहद जरूरी हैं और हमें उनका खयाल रखना चाहिए. ये भी याद रखो कि रिश्ते एकतरफा नहीं होते, इसलिए जो आप अपने सामने वाले से उम्मीद रखते हो, वो उसे देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

आज मेरा करियर जहां है, वहां कभी नहीं पहुंच पाता, अगर तुम्हारे पापा मेरे साथ न होते। उन्होंने घर से बाहर रहने पर मुझसे कभी भी शि‍कायत नहीं की. हम दोनों ही अपने करियर में व्यस्त थे लेकिन फिर भी हम दोनों ने अपने रिश्ते को कमजोर नहीं पड़ने दिया। मुझे भरोसा है कि वक्त आने पर तुम भी अपने पार्टनर के साथ वैसा ही करोगी।

अगर तुमने भी मेरे मेरे घर से काफी समय तक बाहर रहने को लेकर शिकायत की होती तो मैं कभी अपने लिए करियर बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। मेरा सौभाग्य है कि मुझे इतना समझदार और साथ देने वाला परिवार मिला है। मुझे यकीन है कि जब तुम अपना परिवार बनाओगी, तुम भी इतनी ही भाग्यशाली रहोगी।

मुझे याद है, जब तुम्हारे बोर्ड एग्जाम शुरू होने वाले थे. मैंने छुट्टी ली थी ताकि मैं तुम्हें खुद एग्जाम दिलाने ले जा सकूं. तब तुमने मुझे बताया कि कितने साल तक तुम्हें अकेले एग्जाम देने जाना पड़ा था। ये सुनकर मुझे मुझे बहुत दुख हुआ था. पर मुझे ये भी लगा कि एक कामकाजी मां की बेटी होने की वजह से तुम बहुत जल्दी ही आत्मनिर्भर हो गई हो। तुम सिर्फ समझदार ही नहीं हुई, बल्कि तुमने अपने छोटे भाई का भी ध्यान रखा. तुमने उसे कभी मेरी कमी महसूस नहीं होने दी. मैंने भी तुम पर भरोसा करना, तुममें विश्वास रखना सीखा और अब तुम एक मजबूत, आत्मनिर्भर महिला बन गई हो. मैं अब वही सिद्धांत अपनी कंपनी में भी अपनाती हूं।

मैं भाग्य में भरोसा रखती हूं लेकिन इसके साथ ही इस बात को भी मानती हूं कि कड़ी मेहनत की हमारी जिंदगी में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बड़े मायनों में देखें तो हम सब अपनी किस्मत खुद ही लिखते हैं। अपनी किस्मत को अपने हाथों में लो, जो पाना चाहते हो उसका ख्वाब देखो और इसे अपने मुताबिक लिखो।chanda-1-1460612281

आगे बढ़ते वक्त कई बार तुम्हें मुश्किल फैसले लेने होंगे. ऐसे फैसले जो शायद दूसरों को पसंद न आएं लेकिन तुममें इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि तुम उसके लिए खड़ी हो सको जिसमें तुम्हारा विश्वास है। ध्यान रहे कि तुममें वो करने की हिम्मत होनी चाहिए, जो तुम्हें सही लगता है।

आरती, दृढ इच्छा शक्ति से कुछ भी पाया जा सकता है, इसकी सीमा नहीं, पर अपने लक्ष्य के पीछे जाते वक्त अपनी ईमानदारी और मूल्यों से समझौता मत करना. अपने आस-पास के लोगों की भावनाओं का सम्मान करना।

याद रखना कि अच्छा और बुरा, दोनों तरह का वक्त जिंदगी में बराबर आता है. तुम्हें इसे एक ही तरह से लेना सीखना होगा. जिंदगी जो अवसर दे, उसका पूरा फायदा उठाओ और हर अवसर, हर चुनौती से सीखती रहो.।

तुम्हारी प्यारी,
मम्मा

 

मानसून बेहतर रहा तो साल के अंत तक सेंसेक्स पहुंचेगा 35000 के पार!

मुंबई।मौसम विभाग ने इस साल बेहतर मानसून के संकेत दिए हैं। इसके बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि शेयर बाजार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर मानसून की उम्मीद से बाजार में निवेश बढ़ेगा। अगर जुलाई से सितंबर तक मानसून बेहतर रहा तो सेंसेक्स में करीब 13 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा सरकार की मौद्रिक नीति भी निवेशकों को बाजार में निवेश करने के लिए प्रेरित करेगी।

अंग्रेजी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स ने डच बैंक के मैनेजिंग डॉयरेक्टर अभय लाइजावाला के हवाले से कहा है कि मानसून बेहतर होता है तो इससे ग्रामीण भारत में विकास की गति और तेज करने में बढ़त मिलेगी।

पिछले दो सालों से कमजोर मानसून देखने के बाद मौसम विभाग ने पिछले हफ्ते बयान जारी कर कहा था कि इस साल पूरे देश में उम्मीद से बेहतर मानसून देखने को मिलेगा।

मौसम विभाग के इस अनुमान के बाद से ही शेयर बाजार में रौनक नजर आई और सेंसेक्स करीब 351 अंक तक उछलकर 27 हजार के पार हो गया। इसके अलावा विकास दर और निवेश की बेहतर संभावनाएं भी बाजार को मजबूत करने में अहम भूमिकाएं निभाएंगी।

बाल विवाह की सूचना देने वाले को 100 रुपए का टॉक टाइम

मंदसौर। महिला सशक्तिकरण एवं बाल संरक्षण विभाग ने हाल ही में जिले में बाल विवाह की सूचना देने वालों को 100 रुपए का टॉकटाइम देने की योजना लागू की है।

शुरुआत में ही योजना के अच्छे परिणाम मिलने ले हैं। अभी तक जिले में 7 लोगों को 100-100 रुपए का टॉकटाइम दिया जा चुका है। जिले के बंजारों का खेड़ा गांव में बाल विवाह होने की सूचना के लिए तीन लोगों को टॉक टाइम दिया गया है।

विभाग के राघवेंद्र शर्मा ने बताया कि यह योजना केवल आम लोगों के लिए ही है सरकारी, संविदा कर्मचारियों व जनप्रतिनिधियों पर लागू नहीं है।

हालात ये हैं कि एक बाल विवाह की शिकायत दो या तीन जगहोें से मिल रही है। बाल संरक्षण अधिकारी ने बताया कि वर्ष 2014-15 में कुल 42 बाल विवाह स्र्कवाए गए थे। इस वर्ष 16 अप्रैल तक ही 59 बाल विवाह स्र्कवाए जा चुके हैं

पद्मश्री लेकर लौटे ‘राजा’ का यूं हुआ स्वागत

रांची (झारखंड)। राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से सम्मानित पहड़ा राजा सिमोन उरांव शनिवार को रांची लौटे। रेलवे स्टेशन पर अखिल भारतीय आदिवासी महासभा ने उनका शानदार स्वागत किया। उनके सम्मान में ढोल-नगाड़े और गाने-बाजे के साथ सैंकड़ों लोग मौजूद थे। सिमोन उरांव राजधानी एक्सप्रेस से नई दिल्ली से रांची आए। स्टेशन पर सबसे पहले उर्सलाइन स्कूल की स्टूडेंट्स ने सिमोन उरांव को बुके देकर स्वागत किया।

स्टेशन पर सिमोन उरांव को देखने भीड़ लगी हुई थी। यात्री और रेलवे कर्मचारी पद्मश्री से सम्मानित उरांव की फोटो मोबाइल में कैद करते दिखे।

सिमोन ने जब बांध बनाना शुरू किया था तो लोग उनका मजाक तक उड़ाते थे। बीते मंगलवार को इन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से नवाजा।

स्टेशन से बाहर खुले जिप्सी में उरांव को सम्मान के साथ ले जाया गया। वे सबसे पहले रेलवे गेस्ट हाउस गए। वहां पर उनका जोरदार स्वागत हुआ।

सिमोन के स्वागत में युवा कई बाइकों पर सवार होकर आए थे। वे सिमोन के स्वागत में सड़क के दोनों ओर मौजूद रहे।

छोटी-छोटी नहरों को मिलाकर तीन बांध बना डाले

सिमोन ने छोटी-छोटी नहरों को मिलाकर तीन बांध बना दिया। आज इन्हीं बांधों से करीब 5000 फीट लंबी नहर निकालकर खेतों तक पानी पहुंचाया जा रहा।

सिमोन झारखंड के रहने वाले हैं। इनकी उम्र 83 है। ये पहड़ा राजा हैं।

हौसले पर उम्र को नहीं होने दिया हावी

सिमोन का कॉपी-किताब से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं रहा। न कोई तकनीक और न ही पैसे थे। इनके पास था तो सिर्फ जिद और कुछ कर गुजरने का जज्बा।

पहड़ा राजा सिमोन उरांव ने अपने हौसले पर उम्र को कभी हावी होने नहीं दिया।

बाबा के नाम से प्रसिद्ध सिमोन ने वह कारनामा कर दिखाया, जो सरकारी मशीनरियां करोड़ों खर्च करने के बाद भी नहीं कर पाईं।

साल में तीन फसलें उगाई जाती हैं

आज उनके बनाए बांधों से पांच गांवों की सूरत बदल गई है। एक ब्लॉक की यह कहानी पूरे झारखंड के लिए मिसाल बन गई।

सिंचाई सुविधा के अभाव में जहां एक फसल के लाले थे, वहां साल में तीन फसलें उगाई जाने लगीं।

पलायन यहां की सबसे बड़ी समस्या थी। सिमोन को यह कचोटता था। 1961 में वे कुदाल लेकर निकल पड़े।

बांध बनाना शुरू किया। लोग उनका मजाक उड़ाते थे। मगर हार नहीं मानी। धीरे-धीरे ग्रामीणों का साथ मिला और कारवां बनता गया।

ग्रामीणों की आर्थिक समस्याएं दूर करने के लिए फंड बनाया। बैंक में खाता खुलवाया।

अब ग्रामीणों को जरूरत के समय इसी फंड से 10-10 हजार रुपए की सहायता दी जाती है।