Wednesday, March 18, 2026
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गर्मी, चुनाव, परीक्षा के बाद एक ताजा उम्मीद के इंतजार में

यह मौसम गर्मियों का है और बंगाल ही नहीं जहाँ चुनाव हो रहे हैं, यह एक बार फिर उम्मीदें बाँधने का मौसम है। बदलाव की उम्मीद, कुछ अच्छा होने की उम्मीद और सबसे बढ़कर विकास की उम्मीद, शायद यही उम्मीद है जो बार – बार ठगी गयी जनता को जीने की उम्मीद देती है। जहाँ तक बंगाल की बात है तो घोटालों के दलदल में फँसे आम आदमी के पास विकल्प ही नहीं है। उसके पास बुरा या कम बुरा चुनने का भी विकल्प नहीं है। 34 साल के वामपंथी शासन के बाद उसने बदलाव का दामन था मगर उसकी मुट्ठियों में सपना रेत बनकर बह गया। क्या ये  समझा जाए कि वर्तमान शासन के दौर में सब गलत हुआ, तो यह सच नहीं होगा मगर ये भी उतना ही सच है कि बंगाल में सुरक्षा और घोटालों के जितने दाग पिछले 5 सालों में लगे, उतने शायद पहले कभी नहीं लगे। छात्र राजनीति और हिंसा, बंद की राजनीति पहले भी थी और यह और प्रबल हो जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए। सत्ता के गलियारे में जिसकी लाठी, उसकी भैंस का गणित चलता है, अब लगता है कि लाठी भी 5 – 5 साल का विभाजन देखने जा रही है। यह हमारे राज्य के लोकतांत्रिक ढाँचे की पराजय ही कही जाएगी जहाँ आम आदमी को वोट डालने के लिए बाहर लाने के लिए भी केन्द्रीय वाहिनी और 144 धारा का उपयोग करना पड़ रहा है। चुनाव के इस पूरे दौर में केन्द्रीय वाहिनी की भूमिका बेहद सराहनीय है, उसके जवान आश्वस्त करते दिखे। अरसे बाद कोलकाता पुलिस को भी जनता के लिए मुस्तैदी के साथ खड़े होते गया मगर सवाल यह है कि क्या सत्ता बदलने या नयी सरकार आने के बाद हम पुलिस को ऐसी ही भूमिका में देख सकेंगे जो मंत्रियों की जी हजूरी न करती हो। यह बड़ा सवाल है और क्या गारंटी है कि वाममोर्चा – काँग्रेस गठबंधन में यह दबंगई नहीं होगी। आखिर जनता को अपना अधिकार पाने के लिए 5 साल इंतजार क्यों करना पड़े। मुझे लगता है कि इसका एकमात्र हल यह है कि अविश्वास प्रस्ताव  की कमान नेताओं के हाथ में न होकर आम आदमी के हाथ में हो, उसे यह अधिकार मिले कि अगर वह अपने जनप्रतिननिधि से संतुष्ट न हो तो उसे वापस बुला सकती है और किसी भी योग्य व्यक्ति को क्षेत्र की कमान सौंपे। नेताओं पर दबाव बनाए रखना सबसे अधिक आवश्यक है। क्या ऐसा सम्भव है कि बंगाल का लोकतंत्र इतना निडर हो कि अगले चुनाव में बगैर केन्द्रीय वाहिनी और 144 धारा के शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ममतदान हो? सच तो यह है कि अभी यह बिलकुल सम्भव नहीं है और राजनीति का गणित और रिश्तों का मायाजाल हर पल बदलता है। सब भविष्य के गर्भ में है। यह महीना नतीजों का महीना है, एक के बाद एक हर बोर्ड के नतीजे घोषित होंगे। हमारी परीक्षा का आधार भी अजीब है वरना मेधा और योग्यता का आकलन 3 -4 घंटों की परीक्षा में कैसे हो सकता है? हर साल माध्यमिक और उच्च माध्यमिक के नतीजे निकलते हैं, मेधा तालिका में जगह बनाने वालों की जय – जयकार होती है और इसके बाद वे हर शुक्रवार को परदे पर से उतरने वाली गुमनाम फिल्म बन जाते हैं। कई बच्चे भयभीत तो कभी इस कदर नर्वस होते हैं कि उनको अपना डर जिंदगी से बड़ा लगता है और वे जिंदगी हार जाते हैं। हर किसी में प्रतिभा है, जरूरत बस उसे सामने लाने की है। कोई भी गलत कदम उठाने से पहले एक बार फिर कोशिश पर जरूर विचार करें। अपने घर – परिवार और मम्मी – पापा के बारे में सोचें क्योंकि मई में आप मदर्स डे और फिर फादर्स डे मनाएंगे। अपराजिता की ओर से बंगाल, और देश के नौनिहालों को ढेर सारी शुभकामनाएं, राम राज्य न सही, आम जनता का राज कम से कम लौटे।

समाज की नब्ज टटोलता कबिरा खड़ा बाजार में

लिटिल थेस्पियन की ओर से हाल ही में  भीष्म साहनी लिखित “कबीरा खड़ा बाज़ार में” का मंचन भारतीय भाषा परिषद सभागार में किया गया। नाटक के निर्देशक एस एम अज़हर आलम हैं। लगभग 1 घंटे 40 मिनिट के इस नाटक में कबीर के माध्यम से सामाजिक परिस्थितियों का चित्रण किया गया है।kabira (2)

नाटक का सारांश – 

भीष्म साहनी द्वारा लिखित नाटक ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ संत कबीरदास के माध्यम से  समाज में व्याप्त कुरीतियों-विसंगतियों, जात-पात, छुआ-छूत, ऊंच-नीच, ढोंग-आडंबर और भेदभाव के खिलाफ पुरजोर ढंग से आवाज उठाई गई है l इस नाटक का सशक्त पक्ष कबीर की निर्गुणी रचनाएं हैं जो मानस पर अपना गहरा प्रभाव छोडती है।

निर्देशकीय –

नाटक में कबीर के फकीराना अंदाज के साथ धार्मिक मठाधीशों की चालबाजी और राजनीतिक शातिरों की जालसाजी का बखूबी चित्रण किया गया। इंसानियत को सबसे बड़ा मजहब मानने वाले कबीर को खरी बातों के लिए हिंदू-मुसलमान दोनों ही तबकों की आलोचना सहनी पड़ी, कोड़े खाने पड़े, जेल जाना पड़ा मगर कबीर ने सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ा। ‘चींटी के पग घुंघरू बाजे तो भी साहब सुनता है जैसे वाक्यों में आडम्बर का खुलासा और मानवीय दर्शन का चरम हैl ये नाटक अपने निर्गुणी विचारधारा का वाहक होने के कारण ही मुझे ज़्यादा प्रिय है l  हालाँकि मानवता का प्रचार हर युग की माँग है चाहे वो कबीर युग हो या आज का समय….कबीर हमेशा प्रासंगिक रहेंगे l

निर्देशक ने खुद सिकन्दर लोदी की भूमिका निभायी है जबकि कबीर की भूमिका में सायन सरकार दिखे। नाटक कबीर की तरह ही प्रासंगिक है।

 

साहित्यिकी ने किया भीष्म साहनी शतवार्षिकी का आयोजन

कोलकाता की सुपरिचित संस्था साहित्यिकी की ओर से हाल ही में भारतीय भाषा परिषद के सभागार में भीष्म साहनी शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में भीष्म साहनी के साहित्यिक अवदानों पर गंभीर चर्चा हुई। डॉ. विजयलक्ष्मी मिश्रा के स्वागत भाषण से संगोष्ठी की सफल शुरुआत हुई। सविता पोद्दार ने साहनी की कहानियों का विश्लेषण करते हुए कहा कि भीष्म साहनी ने कथा साहित्य की जड़ता को तोड़कर उसे ठोस सामाजिक आधार दिया है। उन्होंने मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की समस्याओं को उभारा।प्रसिद्ध नाट्यकर्मी महेश जायसवाल ने भीष्म साहनी के नाटकों पर बोलते हुए कहा कि रचनाकार का अपने समाज से जो रिश्ता होता है वह उसकी वैचारिक चेतना को विकसित करता है। भीष्म साहनी ने बंटवारे के दर्द को झेला और उसे अपनी रचनाओं में उतारा। भीष्म प्रगतिशील चेतना से संपन्न नाटककार थे।

महेश जी ने भीष्म के प्रसिद्ध नाटक “कबिरा खड़ा बाजार में ” के एक अंश की भावपूर्ण श्रुति नाट्य प्रस्तुति की जिसमें उनका साथ श्रीमती विजयलक्ष्मी मिश्रा और गीता दूबे ने दिया।IMG-20160414-WA0015

डा आशुतोष ने कहा कि भीष्म साहनी का आंकलन हमें मुकम्मल लेखक के तौर पर करना चाहिए और लेखकों को देवता के रूप में स्थापित करने से बचना चाहिए। रंगकर्मी जीतेन्द्र सिंह ने उनके नाटकों की चर्चा करते हुए हानूश को बहुत अधिक सशक्त नाटक के रूप में चिह्नित किया। गीता दूबे ने भीष्म साहनी के औपन्यासिक अवदान पर विचार करते हुए उन्हें मूल्यबोध की चेतना से संपन्न रचनाकार के रूप में रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डा. किरण सिपानी ने भीष्म साहनी की प्रासंगिकता को उभारा। संगोष्ठी का सफल संचालन डा. वसुंधरा मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन  वाणीश्री बाजोरिया ने किया। कार्यक्रम में साहित्यिकी की सदस्याओं के अलावा शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की, जैसे, जीतेन्द्र जीतांशु, कल्याणी ठाकुर, सेराज खआन बातिश, कपिल आर्य, पुष्पा तिवारी आदि।

गीता दूबे

 

 

नौकरी छूटी तो बेटों ने घर से निकाल दिया लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी 

 

उम्र के जिस पड़ाव पर जब लोगों को चलने के लिए भी सहारे की जरूरत होती है, उस उम्र में किसी महिला को रोजी-रोटी के जुगाड़ के लिए रिक्शा चलाना पड़े तो आप उसकी स्थि‍ति का अंदाजा लगा सकते हैं।

उन्हें देखकर मन में एक ही सवाल आता है, क्या इनका कोई अपना नहीं है जो इन्हें इस उम्र में आराम दे सके लेकिन आपको जानकर दुख होगा कि वीणापाणी का एक भरा-पूरा परिवार है. बावजूद इसके वो ई-रिक्शा चलाने को मजबूर हैं। इलाहाबाद में रहने वाली वीणापाणी की कहानी जानकर किसी की भी आंखें छलक उठेंगी। 63 साल की उम्र में जब अपने ही घर के दरवाजे उनके लिए बंद हो गए तो वो सड़क पर आ गईं लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आज वो शान से इलाहाबाद की सड़कों पर ई-रिक्शा चलाती हैं। उनकी एक बहन भी उन्हीं पर आश्रि‍त हैं। ऐसा नहीं है कि वीणापाणी का इस दुनिया में कोई सगा नहीं है. पति के अलावा उनके 3 बेटे भी हैं. बेटे सौतेले हैं लेकिन क्या कोई इतना निर्दयी हो सकता है जो मां समान महिला को दो वक्त की रोटी न खिला सके।

कर्ज लेकर खरीदा ई-रिक्शा नौकरी छूटी तो सौतेले बेटो ने तोड़ा नाता 
वीणापाणी शुरुआत से ही आत्मनिर्भर रहीं हैं। उन्होंने 60 साल की उम्र तक एक निजी कंपनी के अलावा जनसंख्या विभाग से जुड़कर काम किया लेकिन 60 की उम्र पार होने के बाद जब वो रिटायर हुईं तो बेटों ने रिश्ता तोड़ लिया. पति तो बहुत पहले ही उन्हें छोड़ चुके थे।

वीणापाणी पर उनकी बहन की भी जिम्मेदारी थी।ऐसे में उन्होंने रिटायरमेंट के बाद मिले पैसों के अलावा कुछ कर्ज लेकर 1 लाख 45 हजार रूपए जुटाए और ई-रिक्शा खरीदा। शुरू में उन्होंने रिक्शा चलवाने के लिए ड्राइवर भी रखे लेकिन जब ड्राइवर काम छोड़ कर भागने लगे तो वीणापाणी ने खुद रिक्शा चलने का फैसला किया।

मुस्कुराता चेहरा है इनकी पहचान 
40 डिग्री तापमान में सवारियों की तलाश में भटकना, एक जगह से दूसरी जगह लगातार रिक्शा दौड़ाते रहना, इतना आसान भी नहीं है लेकिन उन्हें अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं.वो हर सुबह पूरी ताकत से उठती हैं और अपना काम करती है। वीणापाणी के चेहरे पर कभी भी शिकन नहीं दिखायी देती। खास बात ये है की ऐसे दौर में जब बेरोजगारी से तंग आकर तमाम नौजवान खुदकुशी कर रहे हैं 63 साल की ये महिला कहती है ‘जीवन एक संघर्ष है संघर्ष करना सीखो.’

ये चायवाला बदल रहा है गांववालों की ज़िंदगी

केएम यादव ने सैकड़ों ग्रामीणों को सरकार के बारे में जानकारियां हासिल करने में मदद की है. इन जानकारियों के बल पर लोगों ने सरकार से मिलने वाली सुविधाएं और अपना हक़ हासिल किया। यादव उत्तर प्रदेश के चौबेपुर गांव में अपनी चाय की दुकान पर बैठे हैं. चाय की यह दुकान उनका दफ़्तर भी है। वे लोगों को गरमागरम चाय पिला रहे हैं और उनसे बातें भी कर रहे हैं। चाय की यह दुकान दूसरी दुकानों से अलग नहीं है। तीन कच्ची दीवारो और फूस की छत के नीचे 10 कुर्सियां और मेज़ हैं। वहां कई लोग बैठे हुए हैं, जिनके हाथ में काग़ज़ात हैं. वे लोग काफ़ी उत्तेजित भी हैं। यादव उन काग़ज़ात को देखते हैं, उनके नोट बनाते हैं और लोगो को कई तरह के सुझाव देते हैं। यह साफ़ है कि ये लोग अपनी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए यादव के पास आए हुए हैं। सूचना के अधिकार क़ानून को भारत में ‘ग़रीबों का हथियार’ भी कहा जाता है। साल 2005 से ही इस क़ानून ने लोगों को इस लायक बनाया कि वे सरकारी अधिकारियों से सवाल पूछ सकें। सरकारी विभागों के ग़लत कामकाज और भ्रष्टाचार का खुलासा करने में इससे काफ़ी सहूलियत हुई है और इस वजह से इस क़ानून की काफ़ी तारीफ़ भी हुई है पर इस क़ानून की ख़ामियां भी हैं। यादव ने बीबीसी से कहा, “गांवों में जो लोग पढ़ लिख नहीं सकते, उनके लिए अर्ज़ी देना मुश्किल है. जो अनपढ़ हैं, उन्हें आवेदन करने की प्रकिया भी मालूम नहीं है। वे आगे कहते हैं, “ऐसे में लोगों को मेरी ज़रूरत होती है. मैं उन्हें आरटीआई के ज़रिए सिर्फ़ अपनी आवाज़ उठान में मदद करता हूं। मैं एक बार एक आवेदन करता हूं।”यादव की चाय की दुकान तमाम गतिविधियों का केंद्र है. चौबेपुर और आसपास के गावों के बाशिंदे यादव को ‘सूचना का सिपाही’ और ‘आधुनिक समय का महात्मा गांधी’ कहते हैंपर वे इससे सहमत नहीं हैं. वे कहते हैं, “मैं महज एक कार्यकर्ता हूं और इन ग्रामीणों को उनकी समस्याओं से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाएं हासिल करने में मदद करता हूं।”यादव ने पास के कानपुर शहर में नौकरी छोड़ने के बाद साल 2010 में आरटीआई के प्रति जागरुकता बढ़ाने का अभियान शुरू किया था। उन्होंने जल्द ही यह महसूस किया कि गांव के लोगों को सूचना के अधिकार के क़ानून की अधिक ज़रूरत है। उन्होंने साल 2013 में किराए पर एक कमरा लिया और चाय की दुकान का इस्तेमाल दफ़्तर की तरह करना शुरू किया। उन्होंने उस समय से अब तक 800 आरटीआई आवेदन डाले हैं। चौबेपुर के बाशिंदे, जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, वह भारत के गांवों के लोगों की समस्याओं का एक उदाहरण भर है। भूमि विवाद, कर्ज़ की योजनाएं, पेंशन, सड़क निर्माण और स्थानीय स्कूलों के लिए पैसे, ये समस्याएं ज़्यादा प्रमुख हैं। राज बहादुर सचान आरोप लगाते हैं कि कुछ लोगों ने उनकी ज़मीन छीन ली थी और वे उनसे अपनी ज़मीन वापस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने बीबीसी से कहा कि अदालत ने साल 1994 में ही कह दिया था कि वह ज़मीन उनकी है। दो दशक बाद भी वे वह ज़मीन पाने की कोशिश कर रहे हैं। वे यादव से पिछले साल मिले. उन्होंने अदालती आदेश की एक प्रति और सरकारी विभागों से सूचना लेने के लिए आरटीआई की अर्ज़ी डाली है। यादव कहते हैं, “उनके मामले में समय अधिक लग रहा है क्योंकि कई विभाग इससे जुड़े हुए हैं. पर उनके पास वे सब काग़जात हैं, जो नए आवेदन के लिए ज़रूरी हैं। “उधर 70 साल के रमेश चंद्र गुप्ता यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके गांव के लोगों को सरकारी दुकान से सस्ते में अनाज मिले। वे कहते हैं, “उस दुकान का ठेकेदार सरकारी दर से ऊंची दर पर अनाज बेच रहा था। मैंने अनाज की वास्तविक क़ीमत जानने के लिए यादव की मदद से आरटीआई आवेदन डाला. ठेकेदार जिस क़ीमत पर अनाज बेचता है, वास्तविक क़ीमत उससे 20 फ़ीसदी कम है।.”उन्होंने कहा, “अधिकारियों को कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि मेरे पास सही सूचना है.”यादव ख़ुद भी अर्ज़ी डालते हैं। वे कहते हैं, “स्कूलों के लिए सरकारी फंड, सड़क बनाने और पीने के पानी के लिए आबंटित पैसे के लिए मैंने ख़ुद 200 अर्जियां दी हैं।”वे इसके आगे जोड़ते हैं, “लगभग सभी मामलों में मैं सरकारी अधिकारियों पर काम करने के लिए दवाब डालने में कामयाब रहा क्योंकि मेरे पास सही जानकारी थी।”

(साभार – बीबीसी)

16 वर्षीय भारतीय-अमेरिकी ने तैयार की एक बेहद सस्ती सुनने की मशीन

यह खबर उन तमाम लोगों के लिए सुखद हो सकती है जो किन्हीं कारणों से ऊंचा सुनते हैं। अमेरिका के हॉस्टन शहर में रहने वाले एक 16 वर्षीय भारतीय मूल के लड़के ने एक बेहद सस्ती सुनने की मशीन ईजाद की है। इस मशीन की कीमत महज 60 अमेरिकी डॉलर है और इसकी वजह से कइयों की जिंदगी बेहतर हो सकेगी।

मुकुंद वेंकटकृष्नन नामक इस लड़के की उम्र महज 16 साल है और वह इस डिवाइस के मॉडल पर पिछले दो वर्षों से काम कर रहे थे। उन्होंने इस हियरिंग मशीन को जेफरसन काउंटी पब्लिक स्कूल्स आइडिया फेस्ट में प्रेजेंट किया था और इस डिवाइस के लिए उन्हें प्रथम पुरस्कार भी मिला था।

इस डिवाइस को किसी भी सस्ते हेडफोन के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें आप अपनी जरूरत के हिसाब से फ्रीक्वेंसी घटा-बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा यह लोगों की डॉक्टर पर निर्भरता को भी एकदम से कम कर देता है।  उन्हें इस डिवाइस पर काम करने की प्रेरणा उनके दादा-दादी से मिलने के बाद मिली जो भारत में रहते हैं। मुकुंद दो साल पहले उनसे मिलने आए थे और यहां दादा-दादी को सुनने में आ रही दिक्कतों और इसके उपचार के लिए लगने वाले मशीन की भारी कीमत से चिंतित थे। इसके बाद उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया और पूरी दुनिया को यह कर दिखाया।

 

फैन को फैन नहीं रहने दिया फैन ने

  • रेखा श्रीवास्तव

शाहरूख खान की डबल रोल की फिल्म फैन देखने के लिए दर्शक पिछले वीकेंड मल्टीप्लेक्स में काफी संख्या में नजर आये, पर  निकलते समय फिल्म की स्क्रिप्ट से पूरी तरह निराश दिखे। शाहरूख की एक्टिंग में जरूर थोड़ी जान थी, लेकिन इसके अलावा कोई नहीं था जो फिल्म की एकाग्रता को बरकरार रखे। फैन के दर्शक उम्मीद कर गये थे कि वह शाहरूख खान के जबरदस्त फैन हो जायेंगे, पर उनके फैन भी हताश हो गये। मनीष शर्मा द्वारा निर्देशित फिल्म फैन में दिखाया गया कि एक सुपर स्टार (आर्यन) अपने फैन से हाथ मिला कर अभिवादन तो कर सकता है, पर उससे मिलने के लिए केवल पाँच मिनट का भी समय नहीं दे सकता। जबकि सुपरस्टार को उसका एक फैन (गौरव) इस कदर चाहता है कि वह बचपन से उसके सपने देखकर ही बड़ा हुआ। उसकी एक्टिंग कर के ही पुरस्कार प्राप्त करता है। संजोग से उसे अपने ही सुपरस्टार का रूप भी मिला हुआ है। चाहत इतनी थी कि सुपर स्टार के बारे में कोई गलत बात करें, तो वह बर्दाश्त नहीं करता। उसको अपने दम पर सीधा कर देता है। इसके बावजूद एक सुपरस्टार अपने फैन से खुश न होकर, उसे पाँच मिनट समय नहीं देता बल्कि उसे पकड़वा कर उसके मारपीट की जाती है और अपने घर लौटने की धमकी दे दी जाती है। फैन इसके बावजूद इसके बाद से वह फैन नहीं रह जाता है और वह अपने ही फैन का दुश्मन बन जाता है और आखिरकार उसको हर तरह से परेशान कर देता है। इतना ही नहीं, फिल्म के आखिर में दिखाया गया है कि अभिनेता शाहरूख जो आर्यन सुपरस्टार का किरदार निभा रहे हैं, वह भी बदला लेने पर उतारू हो जाता है और उसके शहर दिल्ली पहुँच जाता है और बदला लेता है। यहाँ फैन से ज्यादा दुश्मनी दिखी है। दुश्मनी को भी बहुत ज्यादा ही बढ़ा कर दिखाया गया है। सुपरस्टार और उसके फैन का रिश्ता प्रेम से जुड़ा होता है और अगर उस रिश्ते में प्रेम से ज्यादा दुश्मनी हो जाती है तो वह फैन कैसे हो सकता है? यानी कुल मिलाकर फिल्म का नाम, स्क्रिप्ट सभी कमजोर पड़ गया। गाना भी एक भी ऐसा नहीं जो दर्शक गुनगुनाते हुए निकले। फिल्म के आखिरी समय में फैन का मर जाना सबसे ज्यादा निराशा करने वाला रहा। कोई भी फैन यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि वह इस गति को प्राप्त हो। दर्शकों में एक प्रश्न निर्देशक मनीष शर्मा ने जरूर पैदा कर दिया है कि आर्यन (शाहरूख खान) की तरह सभी सुपरस्टार होते हैं, जो एक कलाकार के रूप में तो जरूर कामयाब होते हैं। स्टेज पर फैन की तारीफ भी करते हैं, और हाथ दिखाकर अभिवादन भी करते हैं पर अंदर से वह अपने फैन की कद्र नहीं करते हैं। और उससे पाँच मिनट का समय देने के बजाय, अपनी गलती मानने के बजाय अपने फैन के पीछे लग जाता है और उसे बरबाद कर देता है। इस तरह यह फिल्म सुपरस्टार और फैन के रिश्ते में दरार पैदा करती है।

गुलमोहर

  •   रेखा श्रीवास्तव

  • गुलमोहरrekha

     

    खिड़की से झांकता

    गुलमोहर का पेड़

    फूलों से लदा है

    तपती गर्मी में भी

    झूम झूम कर

    मुस्कुराता है

     

    उसकी मुस्कुराहट देख

    गर्मी की उमस, तड़प

    कम होती जा रही है

     

    कल तक यहाँ केवल

    खाली डाली थी

    कौओं का कावँ-कावँ था

    कौआ भी परेशान था

    पेड़ की डाल पर बैठ

    वह चीखता था

    कुछ कहना चाहता था

    पर अब जब यह पेड़

    फूलों से लद गया है

    नारंगी रंगों से  भर गया है

    कौआ भी मुस्कुरा रहा है

    इस डाल से उस डाल पर

    उछल रहा है

    उसके मन में भी उमंग है

    खुशी है,

    फूल के खिलने का

    रंग भर जाने का

     

    यह फूल हमें

    सिखाती है

    गर्मी में भी मुस्कुराना

    गर्मी में भी खिलना

    जहाँ भयंकर गर्मी में सूख जाते हैं

    पेड़ और मुरझा जाते हैं फूल

    वहीं गुलमोहर का फूल

    इस अप्रैल-महीने की गरमी

    में खिल कर हमारे मन, आँखों को

    राहत दे रही है

    नाजुक सी फूल होने के

    बावजूद गर्मी में मुस्कुरा रही है

    झूम रही है और हमें भी

    मुस्कुराना और झूमने की

    सीख दे रही है

    और कह रही है कि

    घबराओ मत

    दुख के बाद खुशी

    गर्मी के बाद बारिश

    रात के बाद दिन

    आयेगा ही आयेगा।

     

  • (कवियत्री वरिष्ठ पत्रकार हैं)

गर्मियों में राहत देंगे ये पेय

आम पन्ना

सामग्री – 4 कच्चे आम (हरे आम), 2 छोटे चम्मच भुना जीरा पाउडर, 3 छोटे चम्मच काला नमक, एक छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर (चाहें तो), एक बड़ी चम्मच पुदीना पत्तियां कटी हुईं, 6 बड़े चम्मच कसा हुआ गुड़ या चीनी, स्वादानुसार नमक।mango juice

विधि –  सबसे पहले आम अच्छी तरह धो लें।  इसके बाद आम को कुकर में उबाल लें. कूकर में लगभग 4 सीटी आने तक आम उबालें। अब आम को पानी से निकाल लें। इन्हे ठंडा करके छिलका उतारें और गुठली अलग करके बर्तन में मैंगो पल्प निकालें। इसके बाद मैंगो पल्प में पुदीना पत्तियां, गुड़ या चीनी, काली मिर्च, जीरा पाउडर, काला नमक और नमक डालकर मिक्स करें अब इस मिश्रण को मिक्सर में डालकर चलाएं। तैयार है आम का पन्ना. इसे एयर टाइट डिब्बे में डालकर फ्रिज में रखें।  जब भी पन्ना पीना या पिलाना हो तो एक बड़ा चम्मच पन्ना मिक्सचर एक ग्लास ठंडे पानी के साथ डालकर मिलाएं और बर्फ का टुकड़ा डालकर सर्व करें।

 लाइम मिंट सोडा

सामग्री – 1/2 कप ताजी पुदीने की पत्तियां, 1 चम्मच नींबू का रस , 2 चम्मच शहद , 2 कप पानी , 4 आइस क्‍यूब्‍स, स्‍वादानुसार चीनी , स्‍वादानुसार नमक ।Lemonade-with-mint

विधि – मिक्सर में पुदीने की पत्तियां, नींबू का जूस, शहद और पानी डालकर अच्‍छी तरह ब्‍लेंड कर लें। तैयार पेस्‍ट को एक बॉउल में छानकर निकाल लें।  अब आप चाहें तो स्‍वादानुसार नमक और चीनी मिलाकर इसे ग्‍लास में छान लें। तैयार लाइम मिंट सोडा में ऊपर से आइस क्‍यूब डालें और सर्व करें।

 

 

 

 

मौसम भी डालते हैं सिरदर्द पर असर

मौसम के बदलने पर कई लोगों को सिरदर्द की शिकायत होने लगती है। जैसे ठंड से गर्मी आने पर, गर्मी से बारिश या फिर ऐसे ही एक से दूसरे मौसम का बदलना सिरदर्द का कारण बनता है, यह मौसमी सिरदर्द के लक्षण होते हैं। मौसम के साथ-साथ सिरदर्द का प्रकार भी अलग-अलग होता है। मौसम के अनुसार होने वाला सबसे सामान्य सिरदर्द क्लस्टर हेडएक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सिररदर्द की समस्या कई बार मौसम पर भी निर्भर करती है और क्लस्टर सिरदर्द मौसम के बदलने पर होने वाला सबसे सामान्य प्रकार का सिरदर्द है। वैसे माइग्रेन की समस्या भी मौसमी मानी जाती है। इससे पीड़ित कई रोगी यह कहते हैं कि मौसम बदलने पर उनके नींद का पैटर्न प्रभावित होता है, जिससे सिरदर्द की समस्या और भी बढ़ जाती है।

क्या वजह है मौसमी सिरदर्द का

विशेषज्ञों का मानना है कि मस्तिष्क में स्थित इंटरल क्लॉक सार्कडियन रिदम को नियंत्रित करते हैं। हमारा इंटरनल क्लॉक दिन में होने वाली रोशनी के प्रति संवेदनशील होता और यह हमारी नींद के साइकल को नियंत्रित करने में मदद करता है। नींद के इस साइकल के बिगड़ने या बदलने से मौसमी सिरदर्द होने की आशंका बढ़ जाती है।

क्लस्टर हेडएक सिरदर्द की काफी गंभीर समस्या होती है जोकि इंटरनल क्लॉक के बदलने पर ट्रिगर होती है। कई लोग दिन की इस रोशनी के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं जोकि किसी रोगी को इस तरह से प्रभावित करते हैं कि उनके सिरदर्द का दिन भी समान होने लगता है।

गर्मी के मौसम में सिरदर्द की शिकायत माइग्रेन के रूप में बढ़ जाती है। क्योंकि माइग्रेन के मरीज गर्मी के प्रति संवेदनशील होते हैं। एलर्जी से होने वाला मौसम पतझड़ का हो सकता है, जिसमें पेड़, घास आदि झड़ जाते हैं और हवाओं में धूल उड़ती रहती है।

मौसमी क्लस्टर सिरदर्द के ये होते हैं लक्षण

  • आंखों के पीछे या आस-पास दर्द होना : यह दर्द माइग्रेन से भी कहीं अधिक पीड़ादायक होता है।
  • दर्द की अवधि: आपका सिरदर्द दिन में कई बार कुछ हफ्तों या महीनों के लिए हो सकता है, जिसे क्लस्टर पीरियड कहते हैं।
  • हर साल एक ही समय पर दर्द का होना : हर साल सिरदर्द समान महीने में उसी खास समय पर होते हैं
  • समय भी होता है एक ही : दोपहर 1-2, 1-3 और रात को 9 बजे सिरदर्द होने की आशंका अधिक रहती है, वैसे सिरदर्द किसी भी वक्त हो सकता है।

इस तरह कर सकते हैं मौसमी सिरदर्द को मैनेज

  • अपने सिरदर्द को एक डायरी में नोट करते जाएं। इससे आपको इस बात का पता चल पाएगा कि आपका सिरदर्द मौसमी है या नहीं और इससे बचने में मदद मिलेगी।
  • आपके सिरदर्द का जो भी मौसम है उस दौरान इसके ट्रिगर से बचने की कोशिश करे। इसमें भोजन, तनाव, धूम्रपान, शराब, नींद पूरी न होना जैसे ट्रिगर शामिल हैं।
  • एलर्जी के प्रकार के अनुसार घर के बाहर की गतिविधियों पर रोक लगा दें। धूल और फफूंद आदि के संपर्क में आने से बचने की कोशिश करें।