Wednesday, March 18, 2026
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ये हैं भारत की पहली महिला जासूस, सुलझाए 75 हजार मामले

मुंबई. कई प्रोफेशन्स पर केवल मर्दों का ही अधिकार माना जाता है। ऐसा ही एक पेशा है जासूसी। पर पिछले 25 सालों में 75,000 से ज्यादा मामलों को सुलझा चुकीं रजनी पंडित दूसरी कहानी कहती हैं। वह भारत की पहली महिला जासूस कही जाती हैं। उन्हें देश का वुमन जेम्स बॉन्ड भी कहा जाता है।

रजनी का जन्म महाराष्ट्र के थाणे जिले में हुआ था। रजनी ने मुंबई में मराठी लिटरेचर की पढ़ाई की थी। रजनी के पिता सीआईडी में थे और महात्मा गांधी की हत्या के केस में उन्होंने काम भी किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रजनी कहती हैं कि ‘जब कॉलेज में थी, तो अपने साथ की एक लड़की को गलत संगत में जाते देखा। उसने सिगरेट, शराब पीने के साथ ही गलत लड़कों के साथ वक्त बिताना शुरू कर दिया था।
मैंने डिसाइड किया कि उसके घरवालों को ये बात बतानी है। इसके लिए ऑफिस से उसे गिफ्ट भेजने के बहाने उसका पता मांगा और फिर वहां पहुंच गई। उसके घरवालों को मैंने जब ये बातें बताईं तो उन्होंने यही कहा, क्या आप जासूस हो? उसी दिन मैंने सोच लिया था कि मुझे क्या करना है।’ आज उसी का नतीजा है ‘रजनी पंडित डिटेक्टिव सर्विसेज’ के नाम से उनकी जासूसी फर्म। उनकी डिटेक्टिव एजेंसी में 20 लोगों की टीम है।

केस सुलझाने के लिए अपनाए कई गेटअप

एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि ‘मैंने एक भिखारी, प्रेग्नेंट महिला, अपंग महिला, सारे किरदार अपने काम के लिए निभाए हैं। रजनी के मुताबिक, एक डिटेक्टिव के लिए सबसे मुश्किल काम होता है कि वह खुद की पहचान छुपा कर रखे। एक केस सुलझाते वक्त वे भिखारी बनी और कुछ दिन भिखारियों के दल में भी रही थीं। एक घर में तो वे 6 महीने तक नौकरानी बनकर रही थीं। इस केस में एक औरत ने अपने साथी के साथ मिलकर अपने पति और बेटे की हत्या कर सारी जायदाद अपने नाम कराने की कोशिश की थी। उस औरत के ससुराल के लोगों ने उन्हें यह केस सौंपा था। उस औरत ने कोई भी सुबूत पीछे नहीं छोड़ा था। इसके लिए नौकरानी के तौर पर छह महीने रहकर उन्होंने उस औरत का विश्वास जीत लिया था। उन्हें पता चला कि झगड़ा जायदाद व पैसों के लिए चल रहा था और उस महिला ने ही अपने साथी से मिलकर पति और बेटे का खून किया था।

अब तक नहीं की शादी

47 साल की हो चुकीं रजनी ने शादी नहीं की है, लेकिन उन्हें इसका बिलकुल अफसोस नहीं है। रजनी कहती हैं कि मैंने बचपन में ही सोच लिया था कि मैं शादी नहीं करुंगी। मेरी डिक्शनरी में डर नाम का कोई शब्द ही नहीं है। मैं दिन में 14 घंटे काम करती हूं और साल के 8 से 10 लाख रुपए कमाती हूं। हालांकि केस को सॉल्व करना ही मैं सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हूं। रजनी के मुताबिक उन्होंने यह पेशा नाम या पैसे के लिए बल्कि लोगों की मदद करने के लिए चुना है।

मिल चुके हैं कई अवॉर्ड्स

रजनी को दूरदर्शन की तरफ से ‘हिरकानी अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है। वह दो किताबें भी लिख चुकी हैं, जिनमें से एक मायाजाल और दूसरी फेस बिहाइंड फेस (चेहरे के पीछे चेहरा) है।  जहां मायाजाल को छह अवॉर्ड मिले हैं। वहीं, फेस बिहाइंड फेस को दो अवॉर्ड मिल चुके हैं। इसके अलावा वह एक डॉक्यूमेंट्री में भी काम कर रही हैं।

 

 

ट्यूशन पढ़ाकर की थी आईआईटी की पढ़ाई, अमेरिका में जाकर बनाई कंपनी

पानीपत (हरियाणा).  गांव चुलकाना निवासी रणवीर गुप्ता, समालखा के जिस गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़े थे, वहां भी 2015 में 1.25 करोड़ रुपए से  ‘ऑडिटोरियम और इनोवेशन’ सेंटर बनवाया। इसके उद्घाटन की तैयारी चल रही है। इस ऑडिटोरियम में अब एक साथ 1000 बच्चे बैठ सकेंगे। अमेरिका के वॉशिंगटन में रह रहे 67 साल के रणवीर कहते हैं, ‘मैं 8वीं क्लास तक गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ा।’  समालखा के गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल  से 12वीं पास की। 1965 में खड़गपुर आईआईटी में सिलेक्शन हो गया।वे बताते हैं कि 10 भाई-बहनों में सबसे बड़ा था। इसलिए परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहता था। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। इसी से आईआईटी की पढ़ाई का खर्च निकाला। आईआईटी करने के बाद मुझे देश में इंफ्रास्ट्रक्चर कॉलेज की कमी महसूस हुई। मैंने तभी तय किया था कि अगर मैं कामयाब रहा, तो इस फील्ड में जरूर काम करुंगा। इसके बाद कुछ दिन नौकरी भी की।

जॉब छोड़ अमेरिका में बनाई कंपनी 

रणवीर बताते हैं कि  कुछ करने की चाह में नौकरी छोड़कर 1971 में अमेरिका चला गया। वहां आर्किटेक्चर और कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाई।

कंपनी चल निकली तो जहां पढ़ा था, उन्हीं शिक्षा मंदिरों को सबसे पहले संवारने को सोचा।  आईआईटी खड़गपुर में रणवीर-चित्रा ‘इंफ्रास्ट्रक्चर डिजाइन एंड मैनेजमेंट’ इंस्टीट्यूट खोला। अब तक यहां से 100 स्टूडेंट डिग्री ले चुके हैं।  इस कोर्स में एयरपोर्ट बनाने, मेट्रो, पुल, पावर प्लांट आदि के बारे में सिखाया जाता है।’

 

 

अनचाहे संगीत ने शास्वती को दिलायी सफलता

 

इंदौर.ग्वालियर घराने की ख्यात शास्त्रीय गायिका शाश्वती मंडल का टप्पा जर्नी शीर्षक से म्यूज़िक एलबम इंग्लैंड और अमेरिका में लोकप्रिय हुआ था। जिस संगीत के लिए उन्हें वाह-वाही मिली, कभी उससे बचने के लिए उन्होंने अपनी अंगुली तक काट ली थी।

सुबह 4 बजे से रियाज़ कराती थीं मां
मां सुबह 4 बजे से रियाज़ कराती थी और शाम को भी। मैं तब दस साल की थी। एक दिन रियाज़ से बचने के सहेली के घर चली गई। मां ने आवाज़ लगाई तो घर में आकर मैं पलंग के नीचे छिप गई। वहां एक ब्लेड पड़ी मिली और मैंने रियाज़ से बचने के लिए अपनी अंगुली काट ली।

खून देख घबरा गई। मां ने तब बहुत लाड़ और प्यार से मरहम पट्टी की, चुप कराया और फिर कहा-चलो अब, दूसरी अंगुली से तानपुरे पर रियाज़ करो। वे रियाज़ को लेकर बहुत कठोर थी। परीक्षा के दिनों में वे मुझे रात दो बजे उठा देती। रात दो बजे से सुबह 4 बजे तक वे मुझे पढ़ाती और सुबह 4 बजे से संगीत की रियाज़ करातीं।
इंग्लैंड-अमेरिका में लोकप्रिय हुआ टप्पा एलबम
इंग्लैंड की एक कंपनी ने टप्पा को लेकर मेरा म्यूज़िक एलबम रिलीज़ करने की योजना बनाई। मैंने इसमें कुछ पारंपरिक टप्पे गाए। इंग्लैंड के हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के जानकार डेविर रॉबर्ट ने इसमें स्पेनिश म्यूज़िक, दक्षिण भारत के घटम्, मृदंगम और कर्नाटकी वायलिन कलाकारों के साथ मिलकर फ्यूज़न किया। यह इंग्लैंड और अमेरिका में पॉपुलर हुआ क्योंकि उन्होंने खयाल गायन से सुना था लेकिन फ्यूज़न के साथ टप्पा सुनना उनके लिए नया अनुभव था।

सादगीभरे गुरु मिले
मेरी मां के साथ ही मुझे बालासाहेब पूंछवाले जैसे गुरुओं से संगीत सीखने का सौभाग्य मिला। ये ऐसे गुरु थे जिन्होंने मुझे बहुत अपनेपन और गहराई के साथ संगीत की तालीम दी। ये सादगीभरे, गरिमामय और किसी भी तरह की गिमिक्स से दूर थे।

 

लॉंन्ग कुरता पहनें थोड़े स्टाइलिश अंदाज में

Off-White-with-Black-Piping-Stoleहम भारतीय महिलाएं पूरब और पश्चिम को साथ लेकर चलने में यकीन रखती हैं। मतलब जींस के साथ भी ट्रेडिशनल जेवर या फिर साड़ी के साथ कुछ फंकी। ऐसे में लॉंग कुरता ये चाहत पूरी करता है मगर इसे पहनने का तरीका होना चाहिए कुछ अलग। ऑफि‍स, पार्टी, शॉपिंग, कोई सेलिब्रेशन या फिर फ्रेंड्स के साथ कैजुअल लंच पर मीटिंग, हर मौके पर लॉन्ग कुरते को पहन सकती हैं। डेट पर जाने के लिए भी इसे पहन सकती हैं. हां, इसे सिर्फ सलवार के साथ पहनेंगी तो यह बोरिंग ही लगेगा तो आइए लगाते हैं लॉंग कुरते में स्टाइल का तड़का-

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लॉन्ग कुर्ते के साथ चूड़ीदार और लेगिंग्स पहनना पुराना स्टाइल हो चुका है। इन्‍हें स्ट्रेट पायजामे, एंकल लेंथ पैंट्स, प्लाजो पैंट्स और लॉन्ग स्कर्ट के साथ पहनें। फ्यूजन का ये कॉम्बिनेशन आपके दिन को स्पेशल बना देगा।
स्लीक हैंकी स्कार्फ भी आपके इस लुक को डिफरेंट और कुछ हटकर दिखा सकते हैं। एकदम प्लेन कुर्ते के साथ प्रिंटेड स्कार्फ को गले पर बांधे या फिर प्रिंटेड कुर्ते के साथ कंट्रास्ट कलर का प्लेन स्कार्फ भी मैच कर सकती हैं।kurta high hills
अक्सर ही हम कुर्ते के साथ फ्लैट्स पहन लेते हैं और ज्यादा हुआ तो मोजड़ी। ब्लॉक हील्स या फिर हाई हील्स को कुर्ते के साथ कैरी करें। आप चाहें तो रॉयल ब्लू, ब्लैक, रेड और नियोन कलर की हील्स पहन सकती हैं।

कहां है आपकी फेवरेट ब्लू जींस! उसे कुर्ते के साथ मैच करना बुरा आइडिया नहीं है। यलो कलर हो या फिर प्योर व्‍हाइट या फिर हर किसी का पसंदीदा ब्लैक, आपकी फेवरेट जींस के साथ ये बेहद खूबसूरत लगेंगे।

रसोईघर सेट कर रही हैं तो रखें ध्यान

रसोईघर हमारे घर का वो कोना है जिसे हम किसी भी हालत में अनदेखा नहीं कर सकते। सुबह के एक कप प्याले से लेकर रात के डिनर तक की सारी व्यवस्था यहीं होती है। ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि रसोईघर में हर सामान सही तरीके से रखा हो ताकि कम समय में ज्यादा काम निपटाया जा सके। रसोईघर साफ हो और वहां रोशनी का पूरा प्रबंध हो.

यूं तो आजकल मॉड्यूलर किचन का चलन है लेकिन सिर्फ मॉड्यूलर किचन ही बनवा लेना पर्याप्त नहीं है। रसोईघर की साफ-सफाई भी बहुत जरूरी है।

इस्तेमाल और स्टोरेज की जरूरत के अनुसार किचन को अलग-अलग भागों में बांट लें। खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीजों को और बिना पकाए खाने योग्य चीजों को अलग-अलग रखें। खाना बनाने से पहले की जाने वाली तैयारी की जगह और दूसरे उपकरणों के लिए भी एक निश्च‍ित जगह बनाएं।

 स्लैब को केवल खाना बनाने की तैयारी और खाना बनाने के लिए ही इस्तेमाल करें। इससे यह साफ-सुथरा रहेगा। इस जगह का इस्तेमाल चीजें रखने के लिए बिल्कुल मत करें।

 खास तरह की स्टोरेज जरूरतों के लिए खास तरह के दराज का इस्तेमाल करें। दराज में लाइट्स लगवाएं. इसके इस्तेमाल से सामान रखना और रात के अंधेरे में सामान निकालना ज्यादा सुविधाजनक हो जाएगा।

 

तैलीय त्वचा को दें प्राकृतिक टोनर की हिफाजत

क्लींजिंग, टोनिंग और मॉइश्चराइजिंग से त्वचा में चमक आती है। टोनर से चेहरे को साफ करना एक बेहद जरूरी प्रक्रिया है। ऐसा करने से चेहरे पर गंदगी जम नहीं पाती है और चमक बनी नहीं रहती है। आमतौर पर लोगों को लगता है कि चेहरे पर सिर्फ मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल करना ही जरूरी है पर ये सोच गलत है। टोनर का इस्तेमाल करने से त्वचा का पीएच लेवल बना रहता है.

क्लींजिंग और टोनिंग दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। टोनिंग से चेहरे में कसावट भी आती है और ये कुदरती तरीके से चेहरे पर चमक लाने का काम करता है। यूं तो बाजार में कई तरह के टोनर उपलब्ध हैं जो त्वचा से तेल तो सोख लेते हैं पर इनमें एल्कोहल की मात्रा होती है. ऐसे में बेहतर होगा कि आप प्राकृतिक टोनर का इस्तेमाल करें। एक ओर जहां नेचुरल टोनर से त्वचा में निखार आता है वहीं उसे पोषण भी मिलता है। इन नेचुरल टोनर के नियमित इस्तेमाल से त्वचा पर मौजूद बारीक रेखाएं भी दूर हो जाती हैं.

पुदीने की पत्त‍ियां

पुदीन की पत्त‍ियों को टोनर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। ये त्वचा की मृत कोशिकाओं को साफ करने का काम करती है। पुदीने की पत्तियों को गर्म पानी में डालकर कुछ देर के लिए छोड़ दें। जब ये ठंडा हो जाए तो इसी मिश्रण से अपने चेहरे को साफ करें। कॉटन की मदद पूरे चेहरे को साफ कर लें। कुछ देर बाद चेहरे को गुनगुने पानी से साफ कर लें।

एलोवेरा का इस्तेमाल

एलोवेरा न केवल एक अच्छा मॉइश्चराइजर है बल्क‍ि त्वचा को कोमल भी बनाने का काम करता है। ये एक बेहतरीन टोनर भी है। एलोवेरा की कुछ पत्तियों को निचोड़कर उनका जूस निकाल लें। आप चाहें तो इसके जेल को भी इस्तेमाल में ला सकती हैं। इसे कुछ देर के लिए चेहरे पर लगाकर छोड़ दें। उसके बाद चेहरे को साफ पानी से धो लें।

बर्फ वाला ठंडा पानी
बर्फ वाला ठंडा पानी भी एक बेहतरीन टोनर है। ये न केवल चेहरे को हाइड्रेट करता है बल्कि कील-मुंहासों और दाग-धब्बों को भी दूर करने में फायदेमंद है। अगर आपको कुदरती चमक चाहिए तो बर्फ के टुकड़ों से चेहरे पर मसाज करना फायदेमंद रहेगा।

बेटी को पढ़ाना था, पिता ने स्पेशल बच्चों के लिए खड़ा कर दिया स्कूल

भीलवाड़ा.यह कहानी है प्रेमकुमार जैन की। बेटी सोना दो साल की थी। चलते-चलते लड़खड़ा जाती थी। अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने कह दिया सोना विमंदित है। इलाज संभव नहीं। उसी दिन जैन ने जिद कर ली। वे सोना को चलाएंगे और पढ़ाएंगे। साथ ही उन बच्चों के सम्मान के लिए भी कुछ करेंगे जो सोना की तरह हैं। उन्होंने सोना मनोविकास केंद्र खोल दिया।

1996 में शुरू हुए अपनी तरह के इस स्कूल में अब 76 बच्चे हैं। दस प्रशिक्षित शिक्षक हैं। स्कूल सही चलता रहे इसलिए उन्होंने अपना व्यवसाय कम कर लिया। मूलत: जहाजपुर के रहने वाले जैन बताते हैं, बात वर्ष 1985-86 की है। सोना चलने लगी तो बार-बार गिर जाती थी। कुछ दिन सोचा कि बड़ी होने पर सही चलने लगेगी।

डॉक्टर बोले ठीक नहीं हो सकती बेटी

दो साल की हो गई तब भी वही स्थिति रही। भीलवाड़ा के डॉक्टर बीमारी समझ नहीं पाए तो जयपुर ले गए। वहां डॉक्टर ने बताया कि सोना 70 फीसदी विमंदित है इसलिए कभी ठीक नहीं हो सकती। पूरा परिवार सदमे में आ गया। वे स्थायी रूप से भीलवाड़ा आ गए। विमंदित बच्चों को पढ़ाने का तरीका समझा। छह साल तक ट्रेंड टीचर की तलाश में जयपुर सहित कई विमंदित स्कूलों में गए। 1996 में जयपुर के एक स्कूल से एक टीचर को भीलवाड़ा लाकर सोना मनोविकास केंद्र शुरू किया। विमंदित बच्चों के परिजनों से खुद मिलते और यहां ऐसे बच्चों को भर्ती कराने को प्रेरित करते।

सोना भी इसी केंद्र की छात्रा

सोना जब दो साल की थी तब जैन ने विशेष स्कूल खोलने का प्रण किया था। आठ साल की तब से सोना इसी स्कूल में अन्य बच्चों के साथ है। उसे भी स्पिच थैरेपी, फिजियो थैरेपी दी जाती है। वह अलग-अलग कमरों में विशेष खिलौनों से खेलती है। संगीत की क्लास में भी जाती है। आईक्यू लेवल के अनुसार उसे अलग-अलग बच्चों के साथ रखा जाता है।

सरकारी सहायता नहीं

यह केंद्र 1996 से 2002 तक सरकारी सहायता के बगैर चला। वर्ष 2002 में केंद्र सरकार से कुछ सहायता मिलना शुरू हुई जो 2007 में बंद हो गई। अक्टूबर, 2012 में राज्य सरकार से अनुदान मिला। यह वार्षिक चार लाख रुपए है लेकिन सालाना खर्च करीब 12 लाख रुपए आता है। बाद में स्कूल संचालन समिति भी कुछ सहयोग करने लगी। सोना मनो विकास केंद्र के संस्थापक प्रेम कुमार जैन कहते हैं कि किसी का विमंदित होना गुनाह तो नहीं। क्यों न उसे भी सम्मान का जीवन मिले। कई मूक-बधिर भी संघर्ष करके उच्च पदों पर पहुंचे हैं। तो विमंदित को भी कम नहीं आंका जा सकता।

 

प्यार के इजहार करना बखूबी जानते हैं पावरफुल बराक ओबामा

 

वो दुनिया का सबसे ताकतवर शख्स है. दुनिया के सबसे ताकतवर देश का सर्वोच्च नागरिक लेकिन बावजूद इसके वो सार्वजनिक जगह पर अपनी पत्नी का पर्स पकड़ने में झिझकता नहीं है। बीवी को सबसे सामने आई लव यू कहने में उसे कोई शर्म नहीं आती। अपनी बेहद व्यस्त जिंदगी में भी वो अपनी पत्नी को रेस्त्रां ले जाकर खाना खि‍लाना नहीं भूलता। उसका यकीन पत्नी को पीछे रखने में नहीं बल्क‍ि उसका हाथ पकड़कर साथ चलने में है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की। अगर हम आपसे पूछें कि आपने अमेरिकी राष्ट्रपति को पत्नी मिशेल ओबामा के बिना कितनी बार देखा है तो शायद आपको याद न पड़े। ओबामा दुनिया के किसी भी कोने में हों, मिशेल हमेशा उनके साथ नजर आती है। दोनों की पहचान एक आदर्श दंपती के तौर पर होती है। इन्हें अमेरिका की सबसे रोमांटिक जोड़ी के तौर पर भी देखा जाता है.

इनके बीच का प्यार वाकई एक मिसाल है. खासतौर पर उन पुरुषों के लिए जो अपने व्यस्त कामकाज का हवाला देकर बीवी-बच्चों को दरकिनार कर देते हैं. आप खुद ही सोचिए, क्या बराक के पास काम की कमी होगी…फिर भी वो अपनी पत्नी को भरपूर समय देते हैं.

10 ऐसी बातें जो साबित करती हैं कि एक बेहतरीन पति हैं बराक

 ओबामा भले ही दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स क्यों न हों लेकिन उन्हें अपनी पत्नी से रोमांस करना भी बखूबी आता है. एक टेलीविजन इंटरव्यू के दौरान मिशेल ने खुद ये बात स्वीकार की थी कि उनके पति कई बार सिर्फ उनके लिए ही गाना गाते हैं और उनकी आवाज अच्छी है।

. मिशेल ने डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में कहा था कि बराक निस्वार्थ प्रेम करना जानते हैं। वो प्यार के लिए त्याग करने में भी पीछे नहीं हटते.उनके लिए भौतिक चीजें मायने नहीं रखतीं।

 मिशेल ने इसी दौरान ये भी कहा था कि बराक भले ही राष्ट्रपति बनकर व्हाइट हाउस पहुंच गए हों लेकिन वो आज भी वैसे ही हैं जैसे 23 साल पहले थे। मिशेल ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वो वही हैं जिससे उन्होंने सालों पहले मोहब्बत की थी।

 हर पत्नी चाहती है कि उसका पति सिर्फ और सिर्फ उसकी खूबसूरती की तारीफ करे और उसे ही आकर्षक कहे। बराक ओबामा बिल्कुल ऐसे ही हैं. बराक मानते हैं कि मिशेल बेहद आकर्षक हैं।

 पति, पत्नी की बात सुनें इससे अच्छा क्या हो सकता है। बराक ओबामा ने एक इंटरव्यू में खुद स्वीकार किया था कि उन्होंने अपनी पत्नी मिशेल के कहने की वजह से ही स्मोकिंग छोड़ दी।

ओबामा सार्वजनिक मंच पर भी अपने प्यार का इजहार करने में पीछे नहीं रहते. Ellen DeGeneres के शो पर उन्होंने पूरी दुनिया के सामने मिशेल को एक बेहतरीन महिला कहा था और अपने प्यार का इजहार किया था।

सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टल पर बराक ओबामा और मिशेल की जितनी भी तस्वीरें आती हैं, सभी में दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे दिखते हैं. ये प्यार नहीं तो और क्या है? एक इंटरव्यू में ओबामा ने कहा भी था, मुझे आंखें मिली ही इसलिए हैं कि मैं तुम्हें देख सकूं। बराक कई बार कह चुके हैं वे हमेशा मिशेल की सलाह पर अमल करते हैं और कोई भी बड़ा फैसला मिशेल से बिना पूछे नहीं करते. अमेरिका के राष्ट्रपति पद की तमाम व्यस्तताओं के बीच वे मिशेल के लिए हर दिन वक्त निकालते थे और अमूमन सुबह की एक्सरसाइज और ब्रेकफास्ट एक साथ ही करते थे।

 अगस्त 2012 में जहां एक ओर राजनीतिक इतिहास बना वहीं बराक और मिशेल की एक तस्वीर ने भी रिकॉर्ड तोड़ दिए. इस तस्वीर में बराक और मिशेल एक-दूसरे को गले लगाए हुए हैं. बराक अपनी हर कामयाबी का श्रेय मिशेल को देते हैं और ये मानते हैं कि वो उनसे कहीं ज्यादा काबिल हैं. पत्नी को इतना सम्मान देना, एक अच्छे पति की ही तो निशानी है.

. एक अच्छा पति वही होता है जो खुद तो आगे बढ़े ही लेकिन अपनी पार्टनर को भी आगे बढ़ने में मदद करे। उसका साथ दे. मिशेल भले ही अमेरिका की प्रथम महिला क्यों न हों लेकिन उनकी अपनी भी एक पहचान है और लोग उन्हें उनके विचारों के लिए जानते हैं।

इस एक बात से ये साबित हो जाता है कि बराक को अपनी पत्नी से कितना प्यार है। भारत दौरे के दौरान हवाई जहाज से उतरते समय बराक ने मिशेल का पर्स पकड़ रखा था। हो सकता है कुछ लोग इसे जोरू का गुलाम होना कहें लेकिन बराक के लिए तो ये प्यार जताने का एक मौका था, जिसे उन्होंने यूं ही जाने नहीं दिया।

 

भारतीय छात्र के आविष्कार का कमाल, नासा ने दिया न्योता

मुरादाबाद –   फि‍ल्‍म थ्री इडि‍यट के आमिर खान से इंस्‍पायर 11वीं के स्‍टूडेंट ने कबाड़ से 55 फीट ऊंचाई तक उड़ने वाले ड्रोन का एक मॉडल तैयार किया। इस मॉडल को उसने नासा की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया था। 25 फरवरी को नासा ने उसे इंटरनेशनल स्पेस डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस के तहत 18 से 22 मई तक अमेरिका में होने वाले ओरल प्रजेंटेशन के लिए इंवाइट किया है।  विशाल अमरोहा जिले के गजरौला कस्बे में रहता है। विशाल के मुताबिक, अमरोहा में ड्रोन कैमरा बनाने के लिए सामान नहीं मिला। वह दिल्ली के जामा मस्जिद के पास स्थित कबाड़ी की दुकान पर गया। यहां से कैमरे से रिलेटेड इंस्ट्रूमेंट्स लेकर आया और अन्य जगहों से पुराने इंस्ट्रूमेंट्स लाकर ड्रोन कैमरा तैयार किया है।  इसका मॉडल नासा के इंटरनेशनल स्पेस सोसाइटी की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया।  इसे स्पेस सेटलमेंट स्टूडेंट डिजाइन कॉम्पिटीशन के लिए सेलेक्‍ट कर लिया गया है। इस कॉम्पि‍टीशन में दुनियाभर के स्‍टूडेंट्स हिस्‍सा लेंगे।

कैमरे में लगी लिपो बैटरी

विशाल ने बताया कि इस कैमरे में एक लिपो बैटरी लगी है।  भारत में पेपर बैटरी मिलती नहीं है, नहीं तो इसमें पेपर बैटरी लगती।

पेपर बैटरी लगाने से यह 24 घंटे तक चार्ज रहता। इससे बॉर्डर पर हम इसके माध्यम से 24 घंटे तक निगरानी रख सकते हैं।
विशाल का कहना है कि मुझको सब से ज्यादा खुशी इस बात की है कि देश-विदेश में बनने वाले ड्रोन कैमरा एक ट्रेंड इंजीनियर बनाते है, जबकि यह ड्रोन मैंने बिना ट्रेनिंग बनाया है।

 

 छोटी ही सही मगर शुरुआत जरूर होनी चाहिए

अच्छा इलाज और जरूरत पड़ने पर अच्छे डॉक्टर का मिल पाना आज के दौर में बेहद जरूरी चीज है मगर ये दोनों ही आसानी से नहीं मिलते। अच्छा इलाज मिल जाए तो यह महंगा होता है और डॉक्टर घर नहीं जाते और जाते भी हैं तो उनकी फी अचानक बढ़ जाती है। नंदिनी बसु फूकन की समस्या भी कुछ ऐसी ही थी। एक अनुभवी एच आर प्रोफेशनल के रूप में 16 साल गुजारने के बाद उन्होंने अपनी 2 सहयोगियों की सहायता से इस समस्या का समाधान निकाला और शुरूआत हुई वैद्य.कॉम की। गौर करने वाली बात यह है कि इन तीनों में से किसी नने डॉक्टरी नहीं पढ़ी मगर आज उनके साथ 150 से अधिक डॉक्टर जुड़े हैं। डॉक्टर ऑन कॉल परिसेवा बंगाल मे एकदम नयी है। अपराजिता ने वैद्य.कॉम की संस्थापक और संचालक नंदिनी बसु फुकन से मुलाकात की –

वैद्य मेरी अपनी जरूरत की देन है

मैंने 16 साल बतौर एच आर प्रोफेशनल काम किया है और कामकाजी होने के नाते घर में अभिभावकों की देख-रेख कितना मुश्किल और अहम् है, मैं जानती हूँ। मेरी पृष्ठभूमि डॉक्टरों वाली नहीं है मगर दवाओं और डॉक्टरों की जरूरत घर में हमेशा पड़ती थी। कई बार डॉक्टर के पास ले जाना मुश्किल होता था और कई बार डॉक्टर घर नहीं जाना चाहते। तब मुझे लगा कि यह समस्या तो सिर्फ मेरे साथ नहीं बल्कि दूसरों के साथ भी हो सकती है। आपको नर्स मिल सकती है और अब ऑनलाइन दवाएं मिल सकती हैं मगर डॉक्टर कॉल करने पर मिले, यह नहीं हो पाता और यहीं से वैद्य. डॉट कॉम की शुरूआत करने का ख्याल आया। यह मेरी अपनी जरूरत की देन है।

बहुत जगहों पर निराशा भी मिली

डॉक्टरों को चुनना और उनको अपने काम के बारे में समझाना, यह इतना आसान भी नहीं था। बहुत से डॉक्टरों से सहयोग मिला तो कई डॉक्टर ऐसे थे जिन्होंने अपने व्यवहार से हमें हताश किया या फिर उनकी फी इतनी अधिक थी कि हमारे लिए वहन करना आसान नहीं था। जरूरी था कि हम जिसके साथ जुड़ने जा रहे हैं, वह एक अच्छा इंसान भी हो। हमने 400 डॉक्टरों से मुलाकात की और उनको परखा और आज हमारे साथ 150 डॉक्टर जुड़ें हैं।

कोलकाता के किसी भी इलाके में हम उपलब्ध करवा सकते हैं डॉक्टर

हम लोगों और डॉक्टरों के बीच सम्पर्क करवाते हैं और कई बड़ी दवा कम्पनियों से भी हमें सहायता मिली है। मेरी सहयोगी शिवानी देव डॉक्टरों से मिलने और मुलाकात करने की जिम्मेदारी निभातीं है और उनके अनुभव का हमें बहुत लाभ मिला है। ऑपरेशन की जिम्मेदारी तृष्णा मुखर्जी देखती हैं और मैं रणनीति बनाती हूँ। वैद्य 2015 मई में शुरू हुआ और आज हम कोलकाता के किसी भी इलाके में डॉक्टर उपलब्ध करवा सकते हैं। हम अपने क्लाइंट्स और डॉक्टरों से एक दूसरे के बारे में राय जानते रहते हैं और डॉक्टरों में भी यह उत्सुकता हमने देखी है।

लोग काफी पड़ताल करते हैं

कोलकाता के लोग काफी शिक्षित हैं और वे कोई भी परिसेवा लेने से पहले काफी पड़ताल करते हैं। डॉक्टरों की उम्र और उनकी योग्यता के बारे में कई सवाल करते हैं। हमारे यहाँ मधुमेह, मेडिसिन और डेंटिस्ट की काफी माँग है। आज हमें रोजाना 3 से 5 कॉल मिलते हैं और हमारा सारा काम फोन और सोशल मीडिया पर ही होता है। हम गुवाहाटी के बाद भुवनेश्वर में भी अपनी परिसेवा आरम्भ करना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य अधिक से अधिक मरीजों और डॉक्टरों तक पहुँचकर पूर्व भारत में अपनी पकड़ मजबूत बनाना है।

छोटी ही सही मगर शुरुआत करें

कल्पना को सीमा में न बाँधें। छोटी ही सही मगर शुरुआत जरूर होनी चाहिए।