Thursday, March 19, 2026
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सेहत के लिए रखें कैलोरी का हिसाब

वजन को संतुलित रखने के लिए आपने बकायदा एक वर्कआउट रूटीन अपना लिया। आप उसी हिसाब से रोज कसरत कर रहे हैं और पसीना बहा रहे हैं। लेकिन फिर भी नतीजा वैसा नहीं मिल पा रहा जैसा आपने सोचा था। अगर ऐसा है तो एक बार अपने कैलोरी के हिसाब-किताब पर जरूर नजर डालें।

अपने खान-पान को लेकर अक्सर हम यह बात नजरअंदाज कर डालते हैं कि हम शरीर को जितनी जरूरत है उतनी कैलोरीज दे पा रहे हैं या नहीं और यदि कैलोरीज जरूरत से ज्यादा हो रही हैं तो क्या हम उन्हें उसी मात्रा में खर्च भी कर पा रहे हैं? यही गणित असल में तमाम रिजल्ट पर असर डालता है। उदाहरण के लिए, एक स्वस्थ आदमी को संतुलित वजन रखने के लिहाज से प्रतिदिन लगभग ढाई हजार किलो कैलोरीज की आवश्यकता होती है।

ऐसे में यदि वह इससे डेढ़ या दो गुना अतिरिक्त कैलोरीज लेता है लेकिन वर्कआउट इतना करता है कि केवल ढाई-तीन हजार किलो कैलोरी को ही बर्न कर सके तो ऐसे में बाकी बची कैलोरीज एक्स्ट्रा कैलोरीज में आएंगी। अगर उसका रूटीन रोज ऐसा ही होता है तो जाहिर है कि उसके शरीर पर वर्कआउट का कोई खास असर नहीं पड़ेगा। इसमें एक और ध्यान रखने लायक बात यह भी है कि कैलोरीज के खर्च होने की क्षमता पर उम्र, मेटाबॉलिज्म और स्थितियों का भी बहुत असर रहता है। इसलिए इन बिंदुओं पर भी काम जरूर करें।

अब कैलोरीज के जमा-खर्च को संतुलित बनाए रखने के लिए आपको जरूरत है थोड़े से गणित को लागू करने की। ऐसा भी नहीं कि इसके लिए आप बिलकुल एक-एक ग्राम का आंकड़ा ध्यान में रखें लेकिन एक बार किसी विशेषज्ञ से सलाह लेकर अपने लिए एक मोटा-मोटा चार्ट बना लें कि किस खाने से आपको कितनी कैलोरीज मिलेंगी। एक बार जब आपको इसकी आदत पड़ जाएगी तो अपने आप अंदाज आता चला जाएगा और आप सही तरीके से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ पाएंगे। पहले-पहल इसमें थोड़ा कन्फ्यूजन हो सकता है लेकिन धीरे-धीरे यह रूटीन बन जाएगा।

अब खान-पान के साथ ही अपने व्यायाम के तरीकों पर फोकस करें। सबसे पहले तो यह रूल खुद पर लागू करें कि व्यायाम के तुरंत बाद आप कुछ भी नहीं खाएंगे और इसके आधे घंटे बाद भी वह डाइट लेंगे जिसमें फाइबर और पानी ज्यादा हो जैसे फल, अंकुरित अनाज, सलाद, उपमा, कॉर्नफ्लेक्स, ओट्स, नट्स आदि।

अगर आपके फिटनेस सेंटर के आस-पास की नाश्ते की दुकानें आपको आकर्षित करती हैं तो खुद पर कंट्रोल करना सीखिए क्योंकि जिम जाने वाले कई लोगों में वजन के न घटने या कई मामलों में तो बढ़ जाने के पीछे भी यह एक बड़ा कारण होता है। अब जो भी व्यायाम आप कर रहे हैं उसे बदलते रहें। जैसे कार्डियो, एरोबिक्स, योगा आदि का मिश्रण अपनाएं। यानी व्यायाम को एक जैसा न रहने दें। इससे आपके शरीर को किसी भी एक व्यायाम की आदत नहीं पड़ेगी और ऐसा होने से वजन को घटाने में ज्यादा मदद मिल सकेगी।

अपने भोजन को टुकड़ों में बांटना हर लिहाज से सर्वोत्तम तरीका है। इससे न केवल सामान्यतौर पर स्वस्थ रहने में मदद मिलेगी बल्कि डायबिटीज, उच्च रक्तचाप जैसी लाइफस्टाइल डिसीज को भी इससे कंट्रोल में रखा जा सकेगा। सबसे खास बात यह कि इस तरीके से कैलोरीज के जमा होने और खर्च होने में सही संतुलन बनाया रखा जा सकेगा।

 

महानगर को मिला गोल्डन ट्यूलिप होटल

महानगर को हाल ही में मिला एक नया होटल। विधाननगर में खुला गोल्डन ट्यूलिप होटल जिसमें 55 कमरे हैं और कोलकाता आने वाले यात्रियों के लिए यह बिलकुल फिट है। इसका उद्घाटन करने के लिए अभिननेत्री महिमा चौधरी तथा टॉलीवुड अभिनेत्री स्वस्तिका, रिद्धिमा और अभिनेता साहब भट्टाचार्य पहुँचे थे। गोल्डन ट्यूलिप होटल के एम डी आशीष मित्तल के अनुसार यहाँ आने वालों को जायकों का खजाना मिलेगा। होटल में एक हुक्का बार भी है। सामाजिक कार्यक्रमों तथा बैठकों के लिए गोल्ड फिंच हैं। मेहमानों को यहाँ ब्लूटूथ और वाई – फाई से कनेक्टिविटी के साथ डिजिटल रूम की सुविधा भी मिलेगी।

रिपल फ्रेगनेंस एयर केयर मार्केट में उतारे नए उत्पाद

साइकिल प्योर अगरबत्ती के निर्माता एन आर ग्रुप के रिपल फ्रेगनेंसेस के तहत मैजिक ऑफ फ्रेंगनेंस बाजार में उतारा है। उसने अपने एयर केयर ब्रांड लिया को नये रूप में पेश किया। रिपल फ्रेंगनेंस की मैनेजिंग डायरेक्टर किरण रंगा ने उम्मीद जतायी कि नया ब्रांड ग्राहकों को पसंद आएगा। लिया के तहत रूम फ्रेशनर की लैवेंडर, चंदन, रोज और सी शोर की वैरायटी भी पेश की गयी।

जब दफ्तर में करनी हो दोस्ती

दफ्तर में आप नए हों या पुराने, एक दोस्त की जरूरत तो पड़ती है मगर जब आप किसी को जानते नहीं हैं तो यह काफी मुुश्किल हो जाता है। दफ्तर में दोस्त जरूरी है और दोस्त बनाना जरूरी है। हर ऑफिस में एक गैदरिंग पॉइंट होता ही है जहां सभी इकट्ठा बैठ सकते हैं, या समूह बनाकर बैठते हैं, बातें करते हैं, खाते-पीते हैं। कॉफी वेंडिंग मशीन और वॉटरकूलर्ज ऐसे ही कुछ स्पॉट्स हैं। ये जानने कि को शिश करें कि जिन कलीग्स को आप जानना चाहते हैं वे कहां बैठते हैं। एक बार जगह पता चल जाए तो आप भी वहां उसी वक्त पहुंचे जिससे कि आपको उनसे बात करने का मौका मिल सके। कॉफी पसंद न हो तो भी ऐसे ब्रेक्स जरूर लें क्योंकि इस तरह के कॉफी ब्रेक्स की वजह से ही आपको अच्छे दोस्त मिल सकते हैं।

अपने कलीग के दिल में जगह बनाने के लिए भी रास्ता पेट से होकर ही जाता है। बहुत से आईटी फर्म्स में काम करने वालों की मानें तो अपने जैन, या डायबेटिक कलीग्स के पसंद का खाना लाकर उन्हें खिलाएंगे तो आपस में बेहतर रेपो बन सकेगा। इसलिए ऑफिस वालों के डायटरी पसंद-नापसंद पर ध्यान देना शुरू कर दें।

किसी को ही ऐसे किसी व्यक्ति के आसपास रहना पसंद नहीं आता है जो हमेशा सीरियस होकर घूमता रहता हो या ज्यादा चिढ़-चिढ़ा हो। खुद को हमेशा चीयरफुल बनाकर रखें और बातचीत करते हुए खुश नजर आएं। अगर कोई अच्छा दिख रहा है तो उसकी तारीफ करना न भूलें, किसी ने अच्छा काम किया तब भी तारीफ जरूर करें और दिल से करें।

ऐसे लोगों से आपकी दोस्ती करने की इच्छा नहीं भी हो सकती है जो सारा दिन गॉसिप और ऑफिस पॉलिटिक्स में उलझे रहते हैं। अपने ताल्लुक और बातचीत साफ रखें और इस तरह आपके पास सही लोग ही ठहरेंगे। वर्कपेस के बारे में कुछ अच्छा बोलने पर फोकस करें, इस तरह गुडविल बनेगी। अगर आप गलत लोगों के साथ उठेंगे-बैठेंगे तो न चाहते हुए भी आपका इम्प्रेशन गलत ही पड़ेगा। इसलिए सही लोगों के साथ ताल-मेल बनाएं।

किसी नए रेस्टोरेंट में सभी को लेकर जाएं। ये ट्रिक हमेशा काम करती है। ऐसा रेस्टोरेंट चुनें जो वाकई अच्छा हो और अपने साथियों की राय भी लें। अपनी आउटिंग को यादगार बनाने की पूरी कोशिश करें। इस तरह अपने कलीग्स को बेहतर जानने का आपको पूरा मौका मिलेगा।इसी तरह उन लोगों को बभी आपको जानने का अवसर मिलेगा।

अगर आप ज्यादा बात नहीं करते हैं और ज्यादा मेल-जोल रखने में झिझकते हैं या करना नहीं चाहते तो वॉट्स ऐप ग्रुप के जरिए बात शुरू करें। इस तरह लोगों से बात करना आपके लिए आसान हो जाएगा।

अगर आप बहुत बोलते हैं तो ज्यादा ध्यान रखें। अपनी बातचीत से किसी को डराएं नहीं न ही किसी को कॉम्प्लेक्स में डालें और न ही खुद का दबदबा कायम करने की कोशिश करें।

 

जब बच्चा जा रहा हो पहले दिन स्कूल

बच्चों का स्कूल खुलना एक मुश्किल भरा समय होता है। पहले दिन बच्चे को स्कूल भेजना तो मम्मियों के लिए काफी कठिन होता है। स्कूल के वातावरण में उसको ढालना और मानसिक रूप से तैयार करना किसी भी माँ के लिए आसान नहीं होता। बच्चा स्कूल जाने और नए साथियों से मिलने में हिचकिचाता है। हम आपको बता रहे हैं बच्चे को स्कूल के लिए पहले दिन तैयार करने के लाइक कुछ टिप्स…

बच्चे को बता दें कि उसका शेड्यूल कैसा होगा। उसके स्कूल के शुरू होने का खत्म होने का समय बता दें।

बच्चे को स्कूल के बारे में अच्छी और बुरी बातें पूछें, उससे जानें कि वह स्कूल में कैसा महसूस करता है।

बच्चे के साथ स्कूल जाएँ और स्कूल का टाइम शुरू होने से पहले उसके नए टीचर से मिलें।

उसको स्कूल खुलने की सकारात्मक बातें बताएं। यह मजेदार होगा, उसे नए दोस्त मिलेंगे।

वह चेहरा बिगड़ने के बाद बनीं ब्यूटी क्वीन

ग्लैमर की दुनिया में एक खूबसूरत चेहरा बेहद जरूरी है। एक सफल जिंदगी गुजारते हुए हादसे आपसे यही पूँजी छीन लें तो जीना बेहद मुश्किल हो जाता है। जिस चेहरे पर आप गुमान करते हों वो इस कदर विकृत हो जाए कि आप अपने ही चेहरे से नफरत करने लगें। यह कहानी है हैदराबाद की उद्यमी रुचिका शर्मा की. साल 2004 में वह 9 टीवी चैनलों पर कुकरी शो होस्ट करती थीं –

सड़क हादसे से पूरी तस्वीर बदल गई…
बेहद खूबसूरत जिंदगी गुजार रही रुचिका एक भयानक सड़क दुर्घटना की चपेट में आ गईं। इस दुर्घटना में उनके हाथ-पांव की हड्डियां टूटने के साथ-साथ उनका चेहरा भी विकृत हो गया। हमेशा हंसने-खिलखिलाने वाली रुचिका के लिए चार कदम चलना भी दूभर हो गया। लोगों के लिए स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों की नई-नई वैराइटी बनाने वाली रुचिका की जिंदगी बेड और व्हील चेयर तक सिमट गई। अपनी यह हालत उनसे बर्दाश्त नहीं हुई और वह डिप्रेशन की शि‍कार हो गईं.

मां की हिम्मत और फेशियल योगा ने किया कमाल…
रुचिका तो इस दुर्घटना के बाद पूरी तरह आत्मसमर्पण कर चुकी थीं लेकिन उनकी मां ने हिम्मत नहीं हारी। उनकी मां उन्हें प्रेरक कहानियां सुनाया करतीं. मेडिटेशन और अध्यात्म से जोड़ने की कोशिश करतीं। सड़क हादसे से उबरने के लिए उन्हें कई ऑपरेशन करवाने पड़े। यहां तक की पांव में स्क्रू भी इम्पलांट करवाना पड़ा।  रुचिका ने इसी दौरान फेशियल योगा का सहारा लिया। योगा से उन्हें खूब मदद मिली और चेहरे की खोई रौनक फिर से लौटने लगी.

हॉस्पिटल के बेड से गिनीज बुक तक का सफर किया तय…बचपन के सपने को फिर से पूरा करने की कोशिश की…
रुचिका बचपन से ही मॉडल बनना चाहती थीं लेकिन जैसा कि भारत की अधिकांश आम जनता के साथ होता रहा है, उन्होंने भी अपने सपनों से समझौते कर लिए. उनके ऐसे सपने पूरे नहीं हो सके थे लेकिन इस उभार के बाद उन्होंने ठान लिया था कि हादसे से उभरने के बाद वो सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगी.।
एक दिन वो यूं ही इंटरनेट ब्राउज कर रही थीं कि उन्हें ‘मिसेस इंडिया’ के बारे में पता चला. उन्होंने फौरन इसके लिए आवेदन कर दिया। वह सेलेक्ट भी हो गईं. यहां वह इस प्रतियोगिता में सबसे बड़ा खिताब तो नहीं जीत सकीं लेकिन उनके हुनर-जज्बे और खूबसूरती की वजह से मिसेस इंडिया -पॉपुलर के खिताब से नवाजा गया।
इसके अलावा वह ‘मिसेस इंडिया हैदराबाद इंटरनेशनल’ और ‘मिसेस साउथ एशिया’ का खिताब भी अपने नाम कर चुकी हैं।

हादसे के बाद वह लंबे समय तक हॉस्पिटल के बेड पर पड़ी रहीं. असहाय और हताश लेकिन वहां से एक बार उठने के बाद उन्होंने पलट कर नहीं देखा. वह अब एक आत्म-निर्भर महिला हैं और गृहणि‍यों के लिए कुकिंग स्कूल चला कर कमाई भी करती हैं. इतना ही नहीं रुचिका ने फेशियल योगा में भी कमाल कर दिखाया. हादसे के बाद वह फेशियल योगा से उबरीं और दूसरे लोगों को फेशियल योगा सिखाने का जिम्मा उठाया।
उनकी एक क्लास में तो 1961 लोग शामिल रहे और इसी वजह से उनका नाम आज गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है.
साथ ही रुचिका बताती हैं कि योग-ध्यान तो भारत की पैदाइश हैं लेकिन इसका अधिकांश पेटेंट व रिकॉर्ड दूसरे देशों के नाम पर है. रुचिका ने इस रिकॉर्ड को अपने नाम कर भारत को गर्व का एक और मौका दिया है. ऐसे तमाम लोगों के लिए उनका सक्सेम मंत्रा है ‘नेवर गिव अप’.

 

चट्टान की तरह मजबूत और अजेय थे गामा पहलवान

दतिया/भोपाल.बॉडी बिल्डिंग के लिए आधुनिक युग में भले ही कई मशीनें आ रही हो, लेकिन अगर पत्थर से बने कसरत करने के सामानों को देखना है तो वह इस दतिया में रखे हुए हैं। यहां के म्यूजियम में वर्ल्ड चैम्पियन गामा पहलवान द्वारा यूज किए ये सामान आज भी सुरक्षित हैं। इनमें पत्थर के डंबल, हंसली, गोला आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं ।

दतिया के होलीपुरा में गामा का जन्म सन् 1889 में हुआ था। हालांकि, उनके जन्म को लेकर विवाद है कुछ यह भी मानते हैं कि उनका जन्म 1880 में पंजाब के अमृतसर में हुआ था। गामा के बारे में कहा जाता है कि वह 80 किलो वजनी हंसली (कसरत के लिए गले में पहनी जाने वाली पत्थर की भारी वस्तु) पहन कर उठक बैठक लगाते थे। डंबल के रूप में भी वह भारी भरकम पत्थर का उपयोग करते थे। आम आदमी के लिए इन्हें उठाना मुश्किल ही है।  कहा जाता है कि गामा एक बार में एक हजार से अधिक दंड बैठक लगाया करते थे। कई बार बैठक की संख्या पांच हजार तक पहुंच जाती थी।

यह थी गामा की खुराक

बताया जाता है कि गामा पहलवान की खुराक एक समय में पांच किलो दूध व उसके साथ सवा किलो बादाम थी। दूध 10 किलो उबाल कर पांच किलो किया जाता था। उनकी खुराक का खर्चा तत्कालीन राजा भवानी सिंह द्वारा उठाया जाता था।

विदेशी पहलवानों को भी चटाई थी धूल

सन् 1910 में दुनिया में कुश्ती के मामले में अमेरिका में जैविस्को का नाम काफी था। गामा ने इसे भी परास्त कर दिया था।पूरी दुनिया में गामा को कोई हरा नहीं सका। इसीलिए उन्हें वर्ल्ड चैम्पियन का खिताब मिला था। गामा ने अपने जीवन में देश के साथ विदेशों के 50 नामी पहलवानों से कुश्ती लड़ी और सभी जीतीं।

 

 रखें अपने लेदर शूज का खास ध्यान

लेदर शूज़ से एक क्लास झलकता है और जाहिर है क्लासी चीज़ें महंगी होंगी ही. किसी के लिए भी ये मुमकिन नहीं कि आए दिन वो महंगे लेदर शूज़ खरीदे। ये भी सच है कि चाहे ये लेदर शूज़ कितने भी महंगे क्यों ना आते हैं, हर लड़के के पास इसका एक पेयर ज़रूर होता है।

जैसे हर महंगी चीज़ को काफी देखभाल की ज़रूरत पड़ती है ऐसा ही इन शूज़ के साथ भी है। इनका अच्छी तरह ध्यान न रखने पर ये जल्दी खराब हो जाते हैं। यहां जानिए कैसे आप अपने पसंदीदा और महंगे लेदर शूज़ की देखभाल करें और इसे लंबे समय तक इन्हें खराब होने से बचाकर रखें –

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जब कभी आप बाहर से आएं तो अपने जूते खोलने के साथ ही इसे बंद करके वॉर्डरोब में ना रखें इसे थोड़ा सांस लेने दें। इसके लिए पहले अपने जूतों के लेस को खोल लें और इसके टंग (जूतों के लेस के ठीक नीचे की पट्टी) को एक घंटे के लिए बाहर निकाल कर रख दें. लेदर शूज़ आमतौर पर लेदर लाइनिंग और इनसोल के साथ आते हैं, जो पैरों में आने वाले पसीने को सोख लेते हैं।ये लेदर शूज़ को काफी नुकसान पहुंचाते हैं क्योंकि पानी के संपर्क में आने से लेदर का टेक्सचर डैमेज हो जाता है। पसीने से शूज़ के टेक्सर को खराब होने से बचाने के लिए जब कभी बाहर से आएं तो इसे अपने वॉर्डरोब में रखने से पहले एक घंटे खुले में ज़रूर रखें।
लेदर शूज़ की देखभाल से मतलब सिर्फ इनके लेदर से नहीं होता है, बल्कि उनकी बनावट से भी होता है. इसलिए इनका शेप में रहना भी बहुत ज़रूरी है। यकीन मानें, अच्छी देखभाल की बदौलत आप किसी भी जूते को लंबे समय तक खराब होने से बचा सकते हैं। पहनने के बाद आप अपने जूतों को किसी बॉक्स में रखें और शू ट्री का इस्तेमाल करें। शू ट्री पैर के पंजे की तरह होता है और इसलिए जूतों का शेप बना रहता है और जूते लूज़ नहीं होते हैं। शू ट्री आपको मार्केट के कई शू स्टोर में मिल जाएंगे। अगर आपके पास शू ट्री नहीं है, एक सॉफ्ट पेपर को कोनिकल शेप में रोल करके इसे जूतों के अंदर भर दें। अगर आपके पास लंबे लेदर बूट्स हैं, तो सॉफ्ट पेपर की जगह मैगज़ीन का इस्तेमाल करें।

जूतों को बॉक्स में सिर्फ इसलिए नहीं पैक किया जाता ताकि कस्टमर्स इसे आसानी से घर ले जा सकें, बल्कि इन बॉक्स को इस तरह तैयार किया जाता है कि जूतों को इनमें अच्छी तरह स्टोर किया जा सके। जूते के बॉक्स को फेंकने की बजाय इन्हें संभाल कर रखें। इन बॉक्स में हवा के आने-जाने के लिए भी पर्याप्त जगह होती है और साथ ही जूते भी पूरे स्पेस के साथ रखे जा सकते हैं। अगर जगह की कमी की वजह से आपने बॉक्स को फेंक भी दिया। ध्यान रखें कि आप अपने जूते ऐसी जगह रखें जहां इन्हें पर्याप्त जगह मिले और इनपर किसी तरह का दबाव ना पड़े।

लेदर शूज़ पर कभी भी लिक्विड-बेस्ड पॉलिश का इस्तेमाल ना करें। लिक्विड आपके लेदर शूज़ को नुकसान पहुंचाएगा। इसके ज़्यादा इस्तेमाल पर आपके जूते सामान्य जूतों की तरह दिखने लगेंगे इसलिए लेदर शूज़ के लिए हमेशा वैक्स-बेस्ड पॉलिश का इस्तेमाल करें।

अपने लेदर जूतों को ऐसी जगहों पर ही पहनकर जाएं जो इनके लिए बने हो। महंगे लेदर शूज़ को बारिश के दिनों में पहनकर निकलने या धूल-मिट्टी या गंदगी भरी जगहों पर जाने में बिल्कुल समझदारी नहीं है।

 

और अपनी जिद से बदल दी दुनिया की सोच

 

समाज की बनी बनाई सोच से अलग चलकर नई मिसाल कायम करना कोई आसान काम नहीं है। जानिए ऐसी महिलओं के बारे में जिन्‍होंने रुढ़िवादी सोच को अपने हुनर और फैसलों के दम पर चुनौती ही नहीं दी बल्कि दुनिया की सोच भी बदल डाली –

इरोम शर्मिला: सैन्य बल विशेषाधिकार कानून के विरोध में करीब 15 साल से भूख हड़ताल कर रही मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला की कहानी किसी को भी झकझोर कर सकती हैं। अफस्पा 22 मई 1958 को लगाया गया था। इरोम शर्मीला अफस्पा के खिलाफ भूख हड़ताल कर रही हैं और अधिकारी उन्हें रबर पाइप की मदद से नाक के जरिये विटामिन, खनिज, प्रोटीन सहित अन्य सामग्री देने पर मजबूर हैं।

 सुहासिनी मुले: सुहासिनी मुले एक सशक्त अभिनेत्री होने के साथ ही वो एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता भी है, जिसके लिए उन्‍हें 4 बार राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। इन सबसे इतर सुहासिनी 60 साल की उम्र में शादी करके उन तमाम रुढ़‍ियों को दरकिनार कर दिया जो औरत को महज एक हाउसवाइफ बने रहने देना चाहती हैं।

 नंदिता दास: औरत होने का मतलब सिर्फ सुंदरता और गोरा रंग होता है।  इस परिभाषा को नंदिता ने अपने हुनर के दम पर पूरी तरह खारिज कर दिया। डार्क एंड ब्‍यूटीफुल के स्‍लोगन को सार्थक करने वाली नंदिता ने फेयरनेस क्रीम के एडवरटीजमेंट करने से भी साफ मना कर दिया। उनका मानना है कि सुंदरता दिखावे की नहीं होती है।

सुष्मिता सेन: बोल्‍ड एंड ब्‍यूटीफुल अभिनेत्रियों में शुमार सुष्मिता ने बच्‍ची को गोद लेने का सहासिक कदम उठाते हुए सभी को हैरान कर दिया था। इसके लिए सुष्मिता को लंबी कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी. उन्‍होंने रिनी को कंपनी देने के लिए दूसरी बच्‍ची अलीशा को भी गोद लिया। आज सुष्मिता मिस यूनिवर्स, अभिनेत्री होने के साथ प्राउड सिंगल मदर भी हैं.

 सुनीता कृष्णन: भले ही कद काठी में सुनीता कृष्णन आपको छोटी लगे लेकिन उनके इरादे और हौसले पहाड़ जैसे हैं. उनके साथ महज 15 साल की उम्र में हुई गैंग रेप की घटना ने कभी उन्‍हें तोड़कर रख दिया था लेकिन आज वे यौन-दासत्व में फंसे औरतों और बच्चों को बचाने का काम करती हैं। 1996 में उन्होंने ब्रदर जोस वेटि्टकेटिल के साथ मिलकर हैदराबाद में ‘प्रज्वला’ नाम की संस्‍था बनाई, जो महिलाओं और बच्‍चों के लिए काम करती है।

शांति टिग्‍गा: भारतीय सेना में कभी किसी औरत के होने की कल्‍पना करना भी संभव नहीं था। इस असंभव से दिखने वाले काम को शांति ने पूरा कर दिखाया। बतौर जवान भारतीय सेना में शामिल होने के दौरान वह दो बच्चों की मां थी। शारीरिक परीक्षण के दौरान इन्होंने अपने सभी पुरुष साथियों को हरा दिया था। इस उपलब्धि को उन्‍होंने 35 वर्ष की उम्र में यह हासिल किया था। आपको बता दें कि उन्‍हें अपनी ट्रेनिंग के दौरान बेस्ट ट्रेनी का अवार्ड भी मिला था.

 नीना गुप्‍ता: सिर्फ बिंदास बातें करना ही काफी नहीं होता उसे जिंदगी में किस तरह उकेरा जाता है ये फिल्म अभिनेत्री नीना गुप्ता ने बखूबी कर दिखाया। क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स के साथ अपने प्रेम-प्रसंग और फिर बिना शादी किए उनकी बेटी मासबा को जन्म देना कोई आसान राह नहीं थी। नीना ने उस राह को चुना और आज मासबा ने बतौर फैशन डिजाइनर अपनी पहचान बना ली है।

लक्ष्मी तब 15 साल की थीं, जब एक 32 साल की उम्र के आदमी ने अपने दो साथियों के साथ उनके ऊपर तेजाब फेंक दिया था। लक्ष्मी पर तेजाबी हमला केंद्रीय दिल्ली में स्थित तुगलक रोड पर हुआ था। इस हादसे के बाद लक्ष्‍मी के जीवन में अंधेरा छा गया था लेकिन हिम्‍म्‍त हारे बिना लक्ष्‍मी ने अपना मुकाम बनाया। आज उनका परिवार भी है और एक प्यारी सी बेटी भी है।

 

आत्मसम्मान के लिए आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है

महिलाओं को आगे बढ़ाने के दावों के बीच सबसे अधिक असमानता का शिकार महिलाओं को होना पड़ता है। खासकर शादी के बाद तो घरेलू जिम्मेदारियों को निभाने के लिए कई महिलाएं के सपने अधूरे रह जाते हैं। दूसरी तरफ कार्यस्थल पर शादी के बाद अगर बच्चे हो जाएं तो आपको कमतर आँका ही नहीं जाता बल्कि उम्मीद की जाती है कि आप परिस्थिति से समझौता कर लें और अधिकतर मामलों में महिलाएं समझौता कर भी लेती हैं। यही स्थिति जब पत्रकार ऋतुस्मिता विश्वास के सामने आयी तो उनके लिए हैरत में डालने वाली घटना जरूर थी मगर इस अपराजिता ने हार नहीं मानी और आज वह एक नहीं दो कम्पनियाँ चला रही हैं। यह हम सभी के लिए सीखने वाली बात है कि मंजिलें अगर मुश्किल हो तो रास्तों को अपने हिसाब से मोड़ लेना चाहिए, मंजिल खुद आपके पास चलकर आएगी। वर्डस्मिथ राइटिंग सर्विसेज और डिजिटल ब्रांड्ज प्राइवेट लिमिटेड की प्रमुख ऋतुस्मिता विश्वास से अपराजिता ने खास तौर पर बातचीत की, पेश हैं प्रमुख अंश –

rtusmitA BISWAS

प्र. अपने बारे में बताइए?

उ. मेरे पिता झारखंड में कार्यरत थे और 18 साल तक वहीं रही और मेरी बुनियाद भी वहीं तैयार हुई। बचपन में कभी एहसास ही नहीं हुआ कि लैंगिक विषयमता या जेंडर डिस्क्रिमिनेशन होता क्या है। इकलौती बेटी थी। जादवपुर विश्वविद्यालय से साहित्य खासकर तुलनात्मक साहित्य पढ़ा तो थोड़ा – बहुत पता चला मगर इस दौरान भी मेरे सामने इस प्रकार की स्थिति नहीं आयी थी। उस दौरान पता चला कि मेरे साथ नहीं मगर दूसरी लड़कियों को पक्षपात से गुजरना पड़ता है। ससुराल में भी बहुत प्रोत्साहन मिला और पति ने भी हमेशा साथ दिया।

प्र. पत्रकारिता में कैसे आना हुआ?

उ. मैंने एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म से पढ़ाई की है औऱ एशियन एज से बतौर सब एडिटर शुरुआत की। बाद में रिर्पोटिंग में आयी और फीचर खास तौर पर करती थी। एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका रेडी टू गो में काम किया। मैकमिलन पब्लिशर्स और आईसीएफएआई में भी रह चुकी हूँ। अब अक्सर कई ऱाष्ट्रीय और विश्वस्तरीय पत्रिकाओं में लिखती हूँ जिसमें बोहेमिया (सिंगापुर), डेकन हेराल्ड, द स्टेट्समेन, सहारा टाइम्स जैसे अखबार भी शामिल हैं।

प्र. पहली बार असमानता का शिकार आपको खुद कब और कैसे होना पड़ा?

उ. मैं संस्था का नाम नहीं लेना चाहूँगी मगर मेरी बेटी के जन्म के बाद जब मैं वापस काम पर लौटी तो मुझसे कहा गया कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे सकूँगी क्योंकि मैं शादीशुदा हूँ और मेरी बेटी काफी छोटी है। वे मुझे काम देना चाहते थे मगर यह पहले की तरह महत्वपूर्ण नहीं था। यह मेरे साथ असमानता की पहली घटना थी क्योंकि मुझमें विश्वास था कि मैं पहले की तरह अच्छा काम कर सकती हूँ मगर माँ होने के कारण मुझे कमतर समझा जा रहा था। यहाँ मेरी क्षमता पर संदेह किया जा रहा था।

प्र. आपकी एजेंसी की शुरुआत कैसे हुई?

उ. मैं लिखती थी और ब्लॉग भी लिखती थी, मेरे पूँजी मेरा लेखन ही था। इस घटना ने मुझे चुनौती दी और मैंने तय किया कि घर पर तो मुझे बैठना नहीं है। मैंने देखा कि मेरे आस – पास बहुत सी महिलाओं के साथ ऐसा हुआ है और मैंने 2005 में शुरू की वर्डस्मिथ राइटिंग सर्विसेज, जिसमें आज ज्यादातर शादीशुदा महिलाएं ही अपनी सेवाएं दे रही हैं। हमारे कई ओवरसीज क्लाइंट हैं। 2010 – 2011 में क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर लाडली मीडिया पुरस्कार जीता और वह मैंने अपनी बेटी के साथ लिया। 2014 में द यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में मुझे आमंत्रित कर सम्मानित किया गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर मार्केटिंग के लिए डिजिटल ब्रांड की शुरुआत की और इसे भी काफी सफलता मिली। आज मैं अपनी बेटी को भी बताती हूँ कि वह भाग्यशाली है क्योंकि उसे जो मिल रहा है, वह बहुत सी लड़कियों को नहीं मिल पाता।

प्र. महिला होने के नाते किस प्रकार का अनुभव हुआ?

उ. भारतीय महिलाएं तनाव में जी रही हैं। यहाँ लड़कियों के लिए हर काम और हर चीज के लिए उम्र तय कर दी गयी है। महिलाओं को सामाजिक तौर पर जागरूक होने की जरूरत है।। अगर वह कुछ अच्छा भी करे तो यह कहा जाता है कि उसे महिला होने का फायदा मिला मगर सच यह है कि उसे पुरुषों की तरह ही और कई बार उनसे अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

प्र. आपकी भावी योजना क्या है?

उ. वेब पोर्टल पर कामकाजी महिलाओं के लिए नेटवर्क तैयार करना चाहती हूँ। अन्य गृहिणी महिलाओं को भी साथ लाने का इरादा है।

प्र. महिलाओं को क्या कहना चाहेंगी?

उ. मेरे पापा ने सिखाया है कि शादी हो या न हो, महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है और यही संदेश मेरा भी है। अपने आत्मसम्मान के लिए खुद कमाना सीखें और हमेशा आत्मनिर्भर रहें।