Thursday, September 24, 2026
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सैकड़ों गरीब बच्चों को पढ़ा रही है मीना निझवान!

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हममें से शायद ही कोई होगा जो समाज को कुछ देने की ख्वाहिश न रखता हो। हम सब सामाजिक मदद करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर अकेले होने की वजह से या कहाँ से शुरू करें इन सवालों से जूझते रहते हैं। और अपने रोजमर्रा की ज़िन्दगी में खो जाते हैं।

नोएडा की मीना निझवान ‘संकल्प साक्षरता समिति’ के माध्यम से सैकड़ों जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा रही हैं। 1993 में मीना निझवान ने अपनी घरेलू सहायक पदमा को पढ़ाना शुरू किया। तब उन्हें कुछ तो अंदाजा था कि ये पहल एक दिन हज़ारो बच्चों की ज़िन्दगी संवारने वाली है।

“मैं आर्मी बैकग्राउंड से आती हूँ, इसलिए हमेशा समाज के लिए कुछ करने की बड़ी इच्छा रखती थी। जब मेरे पति आर्मी से रिटायर हुए और हम एक स्थाई जगह रहने लगे। मैंने पदमा को पढ़ाना शुरू किया,” 71 वर्षीय मीना बताती हैं।

1995 में जब मीना और पदमा को अपने घर पास यूँही भटक रहे चार गरीब बच्चे दिखे, तो वे उन्हें अपने घर लेकर आ गयी। उन्होंने बच्चों को नहलाया, खाना खिलाया और उनसे ये वादा लिया कि अब वो पढ़ाई शुरू करेंगे।

मीना के लिए ये बहुत ख़ुशी की बात थी कि उन बच्चों ने वादा निभाया और हर दिन उनके घर पढ़ने को आने लगे। धीरे धीरे आसपास ये बात फैली तो कूड़ा उठाने वाले, रिक्शा चलाने और घरेलु कामकाजी परिवारों के बच्चे भी उनके घर पढ़ने को आने लगे। अब मीना का घर एक छोटे स्कूल में बदलने लगा। बच्चों के उत्साह ने मीना को प्रेरित किया और उन्होंने अपने इस जिम्मे को ‘संकल्प साक्षरता समिति’ का नाम दे दिया। इन बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ उनकी कॉपी-किताबों, स्टेशनरी सहित खाने का इंतज़ाम भी मीना करने लगीं।

“बच्चों की बढ़ती संख्या से मैं खुश भी थी और थोड़ी चिंतित भी, क्योंकि मेरे पास पर्याप्त धन नहीं था कि उनकी परवरिश कर सकूँ। मेरे पिता की बंद पड़ी फेक्ट्री में नमक के पैकेट्स थे उन्होंने मुझे कहा, देखो अगर इनसे तुम्हारी कुछ मदद हो पाए तो.. फिर मैं नमक के पैकेट्स लेकर निकल पड़ी, अनजान लोगों के दरवाजे खटखटाती और उनसे इन बच्चों की पढाई के लिए नमक के पैकेट खरीदने को कहती,” मीना अपने मुश्किल वक़्त को याद करते हुए कहती हैं।

बच्चों के साथ व्यवहारिक चुनौतियाँ भी कम नहीं है। ये वो बच्चे हैं जिनके साथ उनके समाज और परिवार में बुरी तरह व्यवहार किया जाता है, उन्हें मारना-पीटना और गाली-गलौज रोजमर्रा की सामान्य बात है। इस माहौल में पल रहे बच्चों के लिए मीना पर भी विश्वास करना कठिन है।

“धीरे धीरे मैंने ये महसूस किया कि बच्चों को पढ़ाना बेशक जरुरी है लेकिन साथ ही उनके परिवार को संवेदनशील बनाना भी उतना ही जरुरी है। मैंने इनके घरों में जाना शरू किया और उनके माता-पिता को ये बातें समझाने की कोशिश की। आखिर मेरे जीवन का मकसद सिर्फ बच्चों को शिक्षा देना भर नहीं है बल्कि उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करना है,” मीना बताती हैं।

मीना के शिक्षा से ज़िंदगियाँ संवारने के प्रयास को स्माइल फाउंडेशन ने सहयोग देने का फैसला लिया। तब से उनके बच्चों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।

“स्माइल फाउंडेशन के सहयोग से हम बच्चों को संकल्प स्कूल में एलिमेंट्री शिक्षा दे पा रहे हैं, उसके साथ ही हम उन्हें मुख्यधारा के स्कूलों में आगे की पढाई के लिए दाखिल कर रहे हैं। अब हम फॉर्मल स्कूलों की फीस का खर्च उठाने की ओर ध्यान लगा रहे हैं।”

मीना ने अपने घर के पास एक स्कूल में प्रौढ़ शिक्षा की शुरुआत की है, जहाँ वे पास के झुग्गियों की 50 महिलाओं को मुफ़्त शिक्षा दे रही हैं।

मीना निझवान अकेले दम पर बदलाव की प्रेरक हैं। वे मिसाल हैं ऐसे लोगों के लिए जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं। हमें अकेले ही अपने घर से बदलाव की शुरुआत कर देनी चाहिए, आगे का कारवां अपने आप जुड़ता जाता है।

स्माइल फाउंडेशन राष्ट्रीय स्तर की विकास संस्था है जो 4 लाख बच्चों और उनके परिवारों को हर वर्ष 200 से ज्यादा वेलफेयर प्रोजेक्टो से सीधे लाभ पहुंचाती है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

महिलाओं की कला को पहचान दिला रही है अरबन छोकरी

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अरबन छोकरी..यह नाम अब एक ब्रांड बनता जा रहा है. इसमें सिर्फ साड़ियां ही नहीं ड्रेस मैटेरियल के साथ ही मॉडन ड्रेस के लिए जाना माना बुटिक बन गया है।

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5 साल पहले प्रतिभा टालाटुले ने इसे कला संगम के नाम से आरम्भ किया था। इसका उद्देश्य उन महिलाओं की कला को सामने लाना था जिनमें कला थी और जो आगे काम करना चाहती थीं मगर आर्थिक अभाव के कारण उनका यह सपना अधूरा रह गया था।

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बाद में इसे अरबन छोकरी नाम दिया गया। इसे महिलाओं की पहचान बनाने के लिए शुरू किया है। प्रतिभा का कहना है कि समाज का सबसे मजबूत स्तम्भ महिलाएं हैं और उन्हें खुद अपनी पहचान बनानी पड़ेगी इसलिए उन्होंने अपने इस बुटिक में हाथों की कारीगरी को प्रमुखता दी है।

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कढ़ाई, एप्लिक, फेबरिक पेंटिग के साथ ही रचनात्मकता को प्रमुखता दी है। उन्होंने अपने इस काम में जरूरतमंद महिलाओं का साथ लिया है ताकि वे भी खुद की क्षमता को पहचानकर आर्थिक रूप से स्वाबलम्बी हो सके।

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अरबन छोकरी की शुरुआत में प्रतिभा ने अपने रिश्तेदारों के वैवाहिक कार्यक्रमों के लिए डिजाइनर परिधान तथा सजावट का अन्य सामान बनाकर की। धीरे – धीरे महिलाएं जुड़ीं  और आज 15 महिलाएं जुड़ी हैं। नागपुर के अरबन छोकरी से अब कोलकाता और मध्यप्रदेश की महिलाएं भी जुड़ रही हैं।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

स्त्री को सशक्त बनाने की राह बताती दुर्गापूजा

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 मालविका घोष

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नवरात्रि के साथ माँ का आगमन हो चुका है। पंडालों में श्रद्धा और मस्ती के मिले – जुले संगम में डूबने – उतराने के लिए हम तैयार है। जहाँ देखिए, वहीं पर माँ के नेत्र दिख पड़ते हैं।

बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव दुर्गापूजा जहाँ देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है। रोशनी में नहाया कोलकाता अद्भुत लगता है मगर इसकी शुरुआत बाड़ी पूजो के रूप में ही हुई थी, ये हम सब जानते हैं।

1790 का समय था, कोलकाता बस रहा था और राय बाबू के घर से हुगली के गुप्तीपाड़ा में रहने वाले 12 मित्रों ने बारवारी पूजा आरम्भ की। इस पूजा के लिए घरों से अर्थ की व्यवस्था की जाती है और अब तो बाजार से लेकर सितारे तक सब हाजिर हैं। यही पूजा सार्वजनीन भी है।

महालया देवी आगमन की सूचना है और पूर्वजों को तर्पण देने के लिए उमड़ी लोगों की भीड़ से गंगा के घाट सज उठते हैं।

महाषष्ठी, महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी के दौरान पूजा का उत्साह अपने चरम पर होता है और फिर आता है विजयादशमी का दिन, जब माँ कैलाश जाती हैं। यह पक्ष देवी पक्ष कहलाता है।

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नवरात्रि और इस उत्सव से जुड़ी है माँ शक्ति की आराधना और स्त्री शक्ति का सम्मान। कन्याओं को पूजे जाने का दिन मगर कन्याओं और में देवी का वास है, यह बात ही आजकल उपहास लगती है जब हम छोटी बच्चियों से लेकर स्त्री का उत्पीड़न देखते हैं।

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आज लड़कियों की तस्करी और बलात्कार की घटनाओं से अखबार भरे पड़े हैं और उसे सनसनीखेज बनाने की होड़ चल पड़ी है। परिवारों में भी लड़कियों से पक्षपात होता है और लड़के मान लेते हैं कि लड़कियो का कोई महत्व नहीं होता और वे उसे अपनी संपत्ति भर समझने लगते हैं तो यह दोहरी मानसिकता खीझ उत्पन्न करती है। परिवार की परवरिश और वातावरण में ही लड़कों को नहीं सिखाया जाता कि वे लड़कियों का सम्मान करें तो स्त्री को सम्मान कहाँ से मिलेगा?

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स्त्री सक्षम है और जब कुम्हारटोली की महिला शिल्पकार चाइना पाल से मुलाकात हुई तो बहुत कुछ जानने और समझने का मौका मिला। चाइना महज 19 साल की उम्र से ही माँ की प्रतिमा गढ़ रही हैं। पिता को देखकर रुचि जगी और उनके गुजरने के बाद चाइना ने परिवार का दायित्व कंधे पर उठाया। चाइना कहती हैं कि अगर कोई काम लगन और निष्ठा से किया जाए तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। राज्यपाल से सम्मानित हो चुकीं चाइना का काम बेहद सराहा गया है।

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उनकी प्रतिमा रामकृष्ण मिशन से लेकर हावड़ा व कई अन्य जगहों पर जाती हैं। कुम्हारटोली में और भी महिला मूर्तिकार हैं जिनमें माला पाल का नाम भी शामिल है। चाइना को लोग कुम्हारटोली में दशभुजा के नाम से पुकारते हैं। ये एक शुरुआत है मगर स्त्री जब खुद कदम बढ़ाएगी और अपने साथ दूसरी स्त्रियों के सम्मान की रक्षा के लिए खड़ी होगी तो सशक्तीकरण खुद ही हो जाएगा।

(आलेख और तस्वीरें एक युवा पत्रकार मालविका घोष की हैं और उत्सव को अपनी दृष्टि से देखने का प्रयास किया है। अगर आप भी अपराजिता के लिए लिखना चाहती हैं या चाहते हैं तो आपका स्वागत है। विशेषकर युवाओं को अभिव्यक्ति का माध्यम देना अपराजिता का प्रयास है)

गरबा और डांडिया नाइट पर दिखें सिर्फ आप ही आप

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नवरात्र के दिनों में हर दिन एक नया सेलिब्रेशन है। कभी डांडिया तो कभी दुर्गा पूजा, दोस्त हों या रिश्तेदार, त्योहारों पर एक साथ सेलिब्रेट करने की तैयारियों के बीच खास दिखने की चाहत भला किसमें नहीं होगी। गरबा या डांडिया नाइट पर कैसी ड्रेस पहनें, कैसा मेकअप हो जैसी कई प्रकार की उधेड़बुन हमारे मन में चलती है। तो चलिए, आपकी इस उधेड़बुन को हम सुलझा देते हैं, मेकअप एक्सपर्ट भारती तनेजा के खास टिप्स आपके जरूर काम आएंगे।
कैसा हो मेकअप
मौसम भी ही कितना बेहतरीन हो लेकिन भीड़-भाड़ और डांस के दौरान पसीना आना वाजिब है। ऐसे में मेकअप के दौरान ध्यान रखें कि इसका बेस वाटरप्रूफ हो जिससे पसीने के साथ-साथ मेकअप न बहे।

आप चाहें तो ग्लॉसी या न्यूड मेकअप को भी तरजीह दे सकती हैं। इसके साथ-साथ गुलाबी, पीच या ब्राउन ब्लशर खूब फबेगा। रात के समय ब्लशर थोड़ा डार्क रखें और इसे गालों से कनपट्टी तक ब्रश से लगाएं। ध्यान रहे कि ब्लशर आपके स्किन टोन के हिसाब से ही हो। वहीं लिपस्टिक के बजाय आप लिप पेंसिंल ले लाइन के बाद लिपग्लॉस का इस्तेमाल करेंगी तो आपका लुक अधिक ब्राइट लगेगा। ट्रैडिशनल टच के लिए स्वरोस्की वाली पतली या छोटी बिंदी लगाएं।

आंखों का मेकअप हो खास
कोई भी मेकअप तब तक पूरा नहीं है जब तक आंखों के मेकअप को तरजीह न दी जाए। डांडिया नाइट पर खास लुक के लिए आप आंखों पर पर्पल, पिंक, ग्रीन, ब्लू या कॉपर शेड के आइशैडो ट्रइ कर सकती हैं जो पार्टी लुक के लिए परफेक्ट हैं। यह ध्यान रखें कि आइशैडो के शेड्स आपकी ड्रेस से मैच करें।

आइब्रो के ठीक नीचे आप स्पार्कल्स भी लगा सकती हैं जिससे रात में आपका मेकअप ब्राइट लगेगा। चाहें तो आंखों के नीचे कलरफुल लाइनर लगाकर स्मज करें, सिर्फ इतने से ही आपकी आंखें आकर्षक लगेंगी। लाइनर या काजल को बाहर की ओर निकालकर लगाने से भी आपका लुक चेंज हो जाएगा।

ट्राइ करें फैंटेसी मेकअप 
आजकल बैकलेस, क्रॉसलेस या हाल्टर लुक वाली चोली का काफी चलन है। इसमें पीठ, गर्दन आदि का काफी एक्सपोज होता है। कुछ अलग दिखने की चाह है तो आप अपने बैक या गर्दन के खुले भाग पर फैंटेसी मेकअप भी करवा सकती हैं। इसमें मेंहदी, स्पार्कल्स और कई रंगों के प्रयोग से तरह-तरह की कलाकृतियां बनवा सकती हैं। सिके अलावा, चूडियों की जगह भी इनका प्रयोग आकर्षक लगेगा।

हेयरस्टाइल हो खास
आमतौर पर लड़कियां आजकल खुले बाल ज्यादा पसंद करती हैं पर आप अलग लुक के लिए अपनी हेयरस्टाइल के साथ थोड़े बदलाव जरूर करें। बालों के आगे भाग की कई चोटियां गुथ लें और पूछे से प्लेन चोटी या जूड़ा बनाएं या फिर आगे के बालों को कर्ल कराकर निकाल लें और पीछे चोटी रखें। चाहें तो चेटियों में मोती या स्वरोस्की वाले पिन क्लच करें। डांडिया नाइट पर यकीनन सिर्फ आप ही आप दिखेंगी।

 

स्टेशन पर पढ़ती है 8 साल की बच्‍ची, अफसर बनना चाहती है

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उरई. घर में छाया अंधेरा, फिर भी नहीं बुझी पढ़ाने आस। कुछ ऐसी ही तस्‍वीर यूपी के जालौन जिले में सामने आई है। यहां एक बच्‍ची रोजाना रेलवे स्‍टेशन पर आकर अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ जाती है। पढ़ाई पूरी होने के बाद व‍ह वापस चली जाती है। कई बार वह स्‍टेशन पर ही सो जाती है। सीएम के नि‍र्देश पर डीएम ने उसकी मां को आवास और पेंशन दिए जाने की घोषणा की।

पढ़ने के स्‍कूल से तो मिला ड्रेस-किताब लेकिन झोपड़ी में नहीं मिली लाइट

– जालौन जिले के तिवारी अपने परिवार के साथ उरई रेलवे स्‍टेशन के पास एक झोपड़ी में रहते हैं।
– इनकी 6 साल की बेटी दिव्या प्राइमरी स्कूल में क्‍लास 2 की छात्रा है।
– दिव्‍या की मां मोनिका ट्रेनों में भीख मांगकर पेट पालती हैं, जबकि तिवारी मजदूरी करते हैं।
– बड़ी मुश्किल से 2 वक्‍त की रोटी का जुगाड़ हो पाता है। झोपड़ी में बिजली कनेक्शन भी नहीं है।
– फिर भी दिव्‍या के पढ़ने-लिखने के शौक को देखते हुए उसका सरकारी स्कूल में एडमिशन कराया है।
– स्कूल से उसे किताबें-ड्रेस तो मिल गईं, लेकिन झोपड़ी में लाइट नहीं आने के कारण वह पढ़ नहीं पाती थी।
– इसलिए वह पास स्थित स्‍टेशन पर चली जाती है और वहीं रोशनी में बैठकर पढ़ाई करती है।
– अक्‍सर वह स्‍कूल ड्रेस में ही होती है। लोग आते-जाते रहते हैं। रेलवे का अनाउंसमेंट और ट्रेन का शोर होता रहता है।
– लेकिन दिव्‍या बिना कहीं ध्यान दिए जमीन पर कॉपी-किताब फैलाए पढ़ती रहती है।

अफसर बनना चाहती है दिव्या

– दिव्या को अभी नहीं पता कि वह क्या बनना चाहती है।
– मां मोनिका बताती हैं, कभी-कभी बिटिया कहती है कि वह अफसर बनेगी, लेकिन कौन सी अफसर बनेगी, नहीं पता।
– रेलवे स्टेशन पर स्‍वीट की दुकान लगाने वाले मशहूर शर्मा बताते हैं, ऐसा जज्बा कम ही देखने को मिलता है।

सीएम ने आवास और पेंशन देने का दि‍या नि‍र्देश

सीएम अखिलेश ने रवि‍वार को दिव्या के परिवार को आवास और पेंशन देने के निर्देश दिए। इसके बाद डीएम संदीप कौर

ने दिव्या और उसकी मां को आवास और पेंशन दिए जाने की घोषणा की। उन्होंने इसके कागजात दिव्या की मां को सौंप

दिए।
 

पहले नक्सली थीं, सरेंडर कर कमांडो बनीं; अब दो नक्सलियों को मार गिराया

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रायपुर.छत्तीसगढ़ में बस्तर के कुदूर इलाके में इस बार महिला कमांडो ने दो नक्सलियों को मार गिराया है। बस्तर में ऐसा पहली बार हुआ है। हमला करने के बाद दोनों नक्सली इंद्रावती नदी पार कर भागने की कोशिश कर रहे थे। बस्तर में फोर्स ने नक्सलियों के खिलाफ पिछले 9 महीने में 94 लोगों को मार गिराया है। जिन कमांडो ने नक्सलियों को ढेर किया, वे कभी खुद नक्सली थीं…

– ऑपरेशन में तीन महिला कमांडो प्रमिला कश्यप, फूलो मरकाम और कोसी भी शामिल थीं। ये तीनों भी पहले नक्सली थीं, जिन्होंने सरेंडर किया था।

– पुलिस ने इन्हें ट्रेनिंग दी और कमांडो बनाया। हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। इनके हाथ में एसएलआर थी। प्रमिला का कहना है कि उन्हें पता था कि नक्सलियों का मूवमेंट क्या होगा।

– इससे उन्हें स्ट्रेटजी समझने में देर नहीं लगी और एनकाउंटर में आसानी हुई।

एक घंटे तक हुई फायरिंग

– दो दिन पहले बस्तर के कुदूर इलाके में नक्सलियों ने पुलिस पार्टी पर अटैक किया था। इसके बाद डिस्ट्रिक्ट पुलिस फोर्स, डीआरजी और एसएएफ की ज्वाइंट पार्टी को एनकाउंटर के लिए जंगल में भेजा गया।

– शुक्रवार की सुबह सांगवेल के पास नदी किनारे नक्सली दिखे। नक्सलियों को फोर्स की मूवमेंट का पता लग गया और उन्होंने हमला कर दिया। इसके बाद करीब एक घंटे तक दोनों तरफ से फायरिंग चलती रही।

– मुठभेड़ के बाद सर्चिंग में पुलिस ने दो नक्सलियों के शव बरामद किए हैं। जिनकी पहचान नहीं हो पाई है, लेकिन इन्हें नक्सली लीडर विलास की गैंग से जुड़ा माना जा रहा है।

– नक्सलियों को मारने के बाद डीआरजी की टीम के साथ नक्सलियों की लाश को लेकर ये लेडी कमांडो पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचीं। इससे पहले भी पुलिस की इस टीम के साथ 5 बार मुठभेड़ हो चुकी है।

– कमांडो प्रमिला के मुताबिक, उन्हें पता था कि नक्सलियों का अगला मूवमेंट क्या होगा। इससे उन्हें स्ट्रेटेजी समझने में देर नहीं लगी और एनकाउंटर में आसानी हुई।

नक्सली से कमांडो बनी महिला की शादी भी पुलिस ने करवाई

– ऑपरेशन में शामिल तीनों लेडी कमांडो प्रमिला कश्यप, फूलो मरकाम और कोसी पहले खुद नक्सली थीं। इनके सरेंडर करने के बाद इन्हें फोर्स में नौकरी दी गई और पुलिस ने इन्हें ट्रेनिंग देकर कमांडो बनाया।

– इनमें से कोसी की शादी भी पुलिस ने करवाई थी। कभी जंगल में भटकने वाली इन महिलाओं के हाथों में आज एसएलआर जैसे खतरनाक हथियार हैं।

– कमांडो प्रमिला का कहना है कि अब हम एनकांडटर के दौरान गोली चलाते हैं और जब नक्सली थे, तब भी गोली चलाते थे, लेकिन इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। तब गुनाह लगता था, छिप-छिपकर फिरते थे और अब गर्व हो रहा है।

बस्तर में 9 महीने में 94 नक्सली ढेर

– आईजी एसआरपी कल्लूरी के मुताबिक साल 2014 तक पुलिस हर साल औसतन 34 से 36 नक्सली मारती थी। इसके बाद 2015 में 48 नक्सलियों को मारा गया।

– वहीं 2016 में पुलिस ने अब तक 94 नक्सलियों को मार गिराया है। हालांकि, कुछ सोशल ऑर्गनाइजेशन की तरफ से बस्तर में इन एनकाउंटर को फर्जी होने का आरोप भी लगाया जाता रहा है।

 

उड़ी के शहीदों के बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएंगे सूरत के बिजनेसमैन

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सूरत। उड़ी में हुए हमले में शहीद हुए जवानों की घटना से पूरा देश आक्रोशित है। हर ओर से इसका बदला लेने की मांग उठ रही है। वहीं, शहीद जवानों के बच्चों ने जिस तरह से साहस भरे बयान दिए, उससे सूरत के मशहूर बिजनेसमैन महेश सवाणी का दिल पसीज गया। उन्होंने घोषणा की है कि वे शहीद जवानों के बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएंगे।

महेश सवाणी ने कहा कि शहीदों के बच्चों ने जिस साहस का परिचय दिया है, उससे मैं गर्व का अनुभव करता हूं। मेरे कोई बेटी नहीं है, इसलिए बेटियों की कमी और उनके दर्द को समझता हूं। इसलिए जैसे ही मैंने उन बच्चों के बयानों को सुना कि वे भी पिता की राह पर चलकर देश सेवा करना चाहते हैं, तो मैंने यह निर्णय ले लिया।

पढ़ाई का सारा खर्च उठाऊंगा-सवाणी

पीपी सवाणी ग्रुप के महेश सवाणी ने बताया कि उड़ी हमले में शहीद हुए जवानों के बच्चों को जहां भी और जो भी पढ़ाई करनी हो वे करें, उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च मैं उठाऊंगा। यदि वे मेरी स्कूल में पढ़ना चाहें तो उनके हॉस्टल मे रहने का खर्च मैं पर्सनली उठाऊंगा।

 

आध्यात्मिकता और परंपरा का संगम है गरबा

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शक्ति की आराधना के दिन हैं नवरात्र। श्रद्धा से मां की भक्ति में रमना ही इस त्योहार का पवित्र उद्देश्य है। जिसका माध्यम बनता है ‘गरबा’। या यूं कहें कि मां की भक्ति और उन्हें प्रसन्न करने का सबसे सशक्त माध्यम है ‘गरबा’। गुजरात के इस लोकनृत्य के बिना मानो मां की उपासना अधूरी-सी लगती है।

गुजरात के साथ-साथ गरबे की धूम अब अधिकांश क्षेत्रों में दिखाई देती है। यही वजह है कि गरबा आजकल आधुनिक नृत्यकला की श्रेणी में भी शामिल हो गया है।

आदिशक्ति मां अंबे और दुर्गा की आराधना के साथ पारंपरिक और रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे-धजे बच्चे, युवा, बड़े और बुजुर्ग एक अलग ही अंदाज को प्रस्तुत करते हैं। घट स्थापना के बाद इस नृत्य का आरंभ होता है। जिसके लिए बड़े-बड़े पंडालों को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है।

गरबा नृत्य में ताली, चुटकी, खंजरी, डंडा, मंजीरा आदि का ताल देने के लिए प्रयोग किया जाता है। कहते हैं लयबद्ध ताल से देवी दुर्गा को प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है। जहां भक्तिपूर्ण गीतों से मां को उनके ध्यान से जगाने का प्रयास किया जाता है ताकि उनकी कृपा हर किसी पर बनी रहे। पहले देवी के समीप छिद्र वाले घट में दीप ले जाने के क्रम में यह नृत्य होता था।

हालांकि यह परिपाटी आज भी है लेकिन मिट्टी के घट (गरबी) की शक्ल अब स्टील और पीतल ने ले ली है। यह घट ‘दीपगर्भ’ कहलाता है और बाद में यही गरबो और फिर गरबा के रूप में प्रचलित हो गया। तालियों के जरिए किया जाने वाला ताल गरबा और डंडों के प्रयोग से किया जाने वाला डांडिया कहलाने लगा। देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, ‘आरती’ से पहले किया जाता है और डांडिया उसके बाद।

‘घूमतो-घूमतो, घूमतो जाए, अंबो थारो गरबो रमतो जाए’, ‘पंखिड़ा ओ पंखिड़ा…’ जैसे गीतों के बजते ही हर किसी के कदम थिरक जाते हैं। चारों ओर ढोलक की थाप और संगीत में गरबों का जो समां बंधता है, उसे कुछ घंटों क्या, पूरी रात करने से भी मन नहीं भरता है। न सिर्फ गरबा करने वाले बल्कि देखने वालों की स्थिति भी यही होती है।

गरबा और डांडिया को मां और महिषासुर के बीच हुई लड़ाई का नाटकीय रूपांतर भी माना गया है। इसलिए इस नृत्य में इस्तेमाल की जाने वाली डांडिया स्टीक को मां दुर्गा की तलवार के रूप में माना जाता है।

यही वजह है कि डांडिया के लिए रंग-बिरंगी लकड़ी की स्टीक्स, चमकते लहंगे और कदमों को थिरकाने वाले संगीत की जरूरत पड़ती है। जिसके लिए गुजराती लोकगीतों का क्रेज सबसे ज्यादा होता है। गरबा को सौभाग्य का भी प्रतीक माना जाता है। इसलिए महिलाएं नवरात्र में गरबा को नृत्योत्सव के रूप में मनाती हैं।

 

अच्छा पति बनने की तैयारी में जापान के मर्द, कर रहे बच्चे पालने का कोर्स

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टोक्यो.प्लास्टिक से बने बेबी को नहलाने के बाद टॉवल पर रखते ये शख्स हैं 31 साल के मसाया कुरिता और उनके साथी। उन जैसे कई युवा बच्चों को पालने की ट्रेनिंग ले रहे हैं ताकि शादी के बाद अच्छे पिता भी बन सकें। फिलहाल उन्हें टब में बेबी को नहलाने के बाद एहतियात बरतना सिखाया जा रहा है। नैपी बदलने से लेकर फीड कराने तक सबकी ट्रेनिंग…

– ओसाका की इकुमेन यूनिवर्सिटी ने ये कोर्स शुरू किया है। ये उन बैचलर्स के लिए है जो जल्द ही शादी करने जा रहे हैं।
– इसमें स्टूडेंट्स को सात किलो के प्रेग्नेंसी जैकेट पहनने से लेकर बच्चे की नैपी बदलने, फीड कराने तक हर चीज सिखाई जा रही।
– टोक्यो में रहने वाले कुरिता पिछले छह महीने से लाइफ पार्टनर तलाश रहे हैं और तभी से उन्होंने ये कोर्स शुरू किया।

– कुरिता के मुताबिक कोर्स जॉइन करने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनमें भावनाओं को छिपाने की कमजोरी है।
– मैचमेकिंग एजेन्सीज भी अपने एडवरटाइज में ऐसे कोर्स को एक्स्ट्रा वेल्यू की तरह जोड़ रही हैं।
– एक्सपर्ट्स के मुताबिक ऐसे कोर्स जरूरी है क्योंकि 2015 में सिर्फ 3% पुरुषों ने जापान में पैटरनिटी लीव ली थी।

 

किन्नर बनीं ‘छोटी बहू’ बोलीं- पहले मैं इस रोल को लेकर डरी थी लेकिन अब नहीं

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मुंबई।टीवी की ‘छोटी बहू’ उर्फ रुबीना दिलाइक सीरियल शक्ति : अस्तित्व के अहसास में किन्नर (ट्रांसजेंडर) का रोल प्ले कर रही हैं। जी हां, छोटी बहू के नाम से मशहूर रुबीना दिलाइक सीरियल में सौम्या का किरदार निभा रही हैं, जो एक किन्नर है। रुबीना ने एक इंटरव्यू में अपने किन्नर वाले रोल को लेकर खुलकर बात की। इस रोल को लेकर डर था कि लोग इसे एक्सेप्ट करेंगे या नहीं…

रुबीना के मुताबिक, शुरुआत में मुझे इस रोल को लेकर एक डर था कि लोग इसे एक्सेप्ट करेंगे या नहीं। मुझे रिजेक्शन का डर था। हालांकि मेरा कॉन्फिडेंस डर से कहीं ज्यादा था और यही वजह रही कि मैंने एक बार कदम बढ़ा लिया तो फिर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं। मैं जानती हूं कि लोग आपको सिर्फ आपके कैरेक्टर के तौर पर देखते हैं और उसे ही सराहा जाता है। वैसे भी किसी कैरेक्टर को परफॉर्म करने का मजा उसके डर से कहीं ज्यादा होता है। मुझे लगता है कि डर और काम करने की खुशी की वजह से हम हमेशा बेहतर करते हैं। रुबीना ने बताया कि मैं मैथड एक्टिंग में बिलीव नहीं करती। मैं सिर्फ इस पर यकीन करती हूं कि एक एक्टर सिचुएशन पर रिएक्ट करता है।

रूबीना के रोल से मां थी नाराज…
रुबीना भले ही सीरियल में अपने किन्नर वाले रोल से खुश हों लेकिन उनकी मां और परिवार इससे बेहद नाराज हैं। रुबीना के मुताबिक मेरी मां सीरियल में मेरे रोल के बारे में नहीं जानती थी। मैंने भी इस ट्विस्ट के बारे में किसी को नहीं बताया था। लेकिन जब एपिसोड ऑन एयर हुआ और मां ने देखा तो वह शॉक्ड रह गईं।

किन्नर का रोल निभाना काफी चुनौती भरा था
रुबीना के मुताबिक वो पहले से ही ऐसे रोल की तलाश में थीं, जो अब तक टीवी पर देखा न गया हो या फिर जिसे बहुत कम लोगों ने ही किया हो। उनके मुताबिक एक ट्रांसजेंडर का किरदार निभाना वाकई एक बड़ा चैलेंज है। शो की प्रॉड्यूसर रश्मि शर्मा के मुताबिक ये सीरियल महज डेली सोप नहीं है, बल्कि इसमें एक सोशल मैसेज भी है। उन्होंने बताया कि किन्नर को भी अपनी ज़िंदगी एक आम इंसान की तरह जीने का पूरा हक है।