Thursday, September 24, 2026
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युद्ध के उन्माद की शिकार औरत की कहानी है बल्कान की औरतें

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आज दुनिया में जितनी भी हिंसा हो रही है, वह चाहे दंगों की शक्ल में हो, आतंकवाद हो, या फिर सेनाओं द्वारा की जाने वाली हिंसा, इन सब के पीछे धार्मिक एवं सांस्कृतिक असहिष्णुता अक्सर मुख्य कारक होती है | यह असहिष्णुता घृणा और उन्माद तक पहुँच जाती है और इस उन्माद का सबसे आसान शिकार बनती है – औरत | मानवीय मूल्यों की निर्मम हत्या होने लगती है | जब गोलियां चलती हैं तो इंसान से पहले इंसानियत की छाती छलनी होती है |

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 इसी विषय पर केंद्रित जूल्स टास्का का नाटक ‘बाल्कन वुमेन’ नब्बे के दशक मे यूगोस्लाविया के विघटन के समय क्रिश्चियन सर्बों व मुस्लिम बोसनियंस के बीच हुए युद्ध में धार्मिक विद्वेष और बदले की भावना से उत्पन्न इंसानी व गैर इंसानी जज़्बों के अंतर्द्वंद्व को अत्यंत मार्मिकता से प्रदर्शित करता है | ‘युद्ध निषेध’ की यह त्रासदी कहीं न कहीं यूरिपिडीज़ के ग्रीक नाटक ‘ट्रॉय की औरते’ से भी प्रभावित है और भारतीय उप-महाद्वीप की स्थितियों के बेहद करीब है |  कभी वास्तविक चरित्रों के रूप में, कभी चरित्रों के अंतर्मन के रूप में मनोभावों को उभारने के लिये अज़हर आलम का प्रकाश और मुरारी रायचौधुरी के संगीत का संयोग अदभुत बन पड़ा है |

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इस नाटक के असाधारण व तीव्र भावनात्मक स्थितियों व घटनाक्रमों के द्वंद्व को निर्देशक मुश्ताक़ काक ने  सभी स्तरों पर एक नई सृजनात्मकता एवं प्रयोगात्मकता दी है |  कोरस के अभिनेताओ व अभिनेत्रियों ने नाटक में मौजूद भय, वीभत्स और खौफ़नाक रसों को संप्रेषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है l  अजहर आलम और उमा झुनझुनवाला जैसे अनुभवी एवं कुशल अभिनेताओ और हीना परवेज़, सागर सेनगुप्ता, चंद्रेयी मित्र तथा कोरस में अनीता दास, कुमकुम राय, रुपाश्री, शबरीन खातुन, अर्चना भट्टाचार्य, सैबल दत्ता, सतीश चौधुरी, राघव रे, शुभंकर, बिप्लव, अभिषेक मिश्र, जीत गुप्ता आदि के परिश्रम ने इस नाटक को शानदार बनाया है l

नाटक – बल्कान की औरतें

मूल नाटक – द बाल्कन विमेन्स, लेखक – जूल्स टस्का

अनुवाद – उमा झुनझुनवाला

संगीत – मुरारी रायचौधरी

मंच तथा प्रकाश सज्जा – एस.एम. अजहर आलम

डिजाइन तथा निर्देशन – मुश्ताक काक

 

देश की लड़कियां बेहद क्षमतावान, बस उन्हें निखारने की जरूरत : साक्षी

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मिर्जापुर : रियो ओलम्पिक की महिला कुश्ती में कांस्य पदक जीतने वाली साक्षी मलिक ने आज कहा कि देश की लड़कियों में खेलों के लिहाज से बहुत क्षमता है, बस उसे निखारने की जरूरत है।

साक्षी ने मिर्जापुर के कछवां में आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती टूर्नामेंट का उद्घाटन करने के बाद कहा कि खेल के क्षेत्र में देश की लड़कियों में काफी क्षमता और प्रतिभा है, लेकिन जरूरी प्रशिक्षण के अभाव में वे सामने नहीं आ पातीं।

उन्होंने कहा कि प्रतिभावान लड़कियों को अगर समुचित प्रशिक्षण और सहयोग मिले तो वे भी अन्तरराष्ट्रीय फलक पर देश का नाम रोशन कर सकती हैं।

रियो ओलम्पिक में कांस्य पदक विजेता ने कहा कि उन्होंने यह साबित किया है कि लड़कियों को सही प्रशिक्षण मिले तो वह आसमान छू सकती हैं।

सत्यनारायण खेल संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती टूर्नामेंट के पुरष विजेता को डेढ़ लाख रपये और महिला वर्ग की विजेता को एक लाख रपये नकद पुरस्कार दिया जाएगा।

डिप्रेशन में घुटन महसूस करती थीं दीपिका, मां बनीं मददगाार

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नई दिल्ली.दीपिका पादुकोण भी कभी डिप्रेशन से गुजर चुकी हैं। वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे पर अपने एनजीओ लिव लव लाफ के ‘दोबारा पूछो’ प्रोग्राम के लॉन्चिंग के दौरान उन्होंने यह आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा कि डिप्रेशन में हमें परेशान न होकर उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरे लिए इससे बाहर निकलना आसान नहीं था। लेकिन मां ने मेरी मदद की। मैं उनसे कहना चाहूंगी कि अगर वे नहीं होतींं, तो आज मैं यहां नहीं होती। यह वाकया सुनाते हुए वे रो पड़ींं।

– दीपिका ने सोमवार को इस प्रोग्राम में बताया- “दो साल पहले मेरे पेरेंट्स मुझसे मिलने मुंबई आए थे। मेरी बहन भी साथ थी। सभी लोग जाने के लिए पैकिंग कर रहे थे। मैं अपने बेडरूम में अकेली थी। मां मेरे पास आईं और पूछा सब कुछ ठीक है? मैंने कहा- हां। उन्होंने मुझसे फिर पूछा कि यह काम से रिलेटेड है? मैंने कहा- नहीं। उन्होंने फिर पूछा परेशानी की वजह कुछ और है? मैंने कहा -नहीं।”

– “उन्होंने मुझसे दो या तीन बार पूछा। मैं घुटन महसूस कर रही थी। फिर मैं रो पड़ी।”

– “मैं कहना चाहूंगी कि अगर आज मेरी मां नहीं होतींं, तो मैं आज यहां नहीं होती। इस मुश्किल वक्त में मेरा सपोर्ट करने के लिए थैंक्स। मैं सपोर्ट करने के लिए अपनी बहन, पिता और दोस्तों के लिए भी थैंक्स कहना चाहूंगी।”

– “मैं लंबे समय तक डिप्रेशन की स्थिति में नहीं रह सकती थी। मैं इससे जल्दी निकलना चाहती थी। दरअसल, हर प्रॉब्लम का हल अपने अंदर ही होता है। मैंने भी अपनी स्ट्रेंथ को खोजा था। यही मैं दूसरों से कहना चाहती हूं।”

हम सेंसिटिविटी खोते जा रहे हैं

– दीपिका ने कहा- “आज के दौर में हम अपनी सेंसिटिविटी खोते जा रहे हैं। हमें अपनी सेंसिटिविटी को बचाए रखना होगा।”

– “यह समझना जरूरी है कि आज हम बहुत कॉम्पिटीटर बन गए हैं, जो एक अच्छी बात है, लेकिन हम अपने आसपास के लोगों को लेकर कम सेंसिटिव भी हुए हैं।”

– “आपके पास फैमिली और दोस्त होने चाहिए, जो आपके लिए हर समय खड़े हों। इससे डिप्रेशन से गुजर रहे शख्स को बाहर निकलने में मदद मिलती है।”

एक साल पहले शुरू किया था यह कैम्पेन

– दीपिका ने पिछले साल अक्टूबर में ‘लिव लव लाफ’ एनजीओ की शुरुआत की थी। इसका मकसद डिप्रेशन से पीड़ित लोगों की मदद करना और लोगों के बीच अवेयरनेस लाना है।

कब हुईं डिप्रेशन की शिकार

– दीपिका ने इससे पहले भी डिप्रेशन में जाने की बात मानी थी। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था- “यह सब 2014 में शुरू हुआ था। तब सब कुछ अच्छा चल रहा था। मैंने 2013 में किए गए काम के बदले कई अवॉर्ड जीते थे। एक दिन में सुबह उठी तब मुझे पेट काफी खाली-सा लगा। उस समय मैं खुद को दिशाहीन महसूस कर रही थी। मैं यह जान नहीं पा रही थी, ऐसा क्यों हो रहा है? मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं। मैंने रोना शुरू कर दिया था।”

 

गौहर खान ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ से जुड़ीं

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मुंबई: अदाकारा गौहर खान, वरूण धवन-आलिया भट्ट अभिनीत ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ में नजर आएंगी ।वरूण ने अपने, आलिया और गौहर वाला एक वीडियो इंस्टाग्राम के जरिए प्रशंसकों से साझा किया है ।लघु वीडियो की शुरूआत में वरूण ने कहा, ‘‘हैलो साथियों, बद्रीनाथ की दुल्हनिया की टीम में हमारे साथ खानों में से एक हैं।’’ इसपर आलिया ने जोड़ा ‘‘और लेडी खान’’ गौहर कदम रखेंगी । अदाकारा इस को लेकर काफी रोमांचित हैं । उन्होंने वरूण और आलिया के साथ वीडियो के अंत में कहा, ‘‘ये दोनों मेरे पसंदीदा अदाकार हैं और इनके साथ काम करके बहुत खुश हूं।’’ ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ वर्ष 2014 में आयी ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ की दूसरी किस्त है ।

 

किसी लग्जरी कार की तरह इस ऑटो के यात्रियों को मिलती हैं ऐसी सुविधाएं

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नई दिल्ली. यदि आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं तो ऑटो रिक्शा में बैठें ही होंगे। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे ऑटो ड्राइवर के बारे में सुना है, जो अपने पैसेंजर के लिए वाई-फाई, मैगजीन, टीवी, टेबलेट जैसी सर्विसेस देता है। चेन्नई के इस ऑटो ड्राइवर का नाम अन्ना दुरई है। अन्ना के ऑटो में घूमना किसी लग्जरी कार के एक्सपीरियंस से कम नहीं है। स्कूल ड्रॉपआउट हैं अन्ना, हर महीने कमाते हैं 50 हजार रुपए…

– बता दें कि अन्ना के फेसबुक में 10 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं।

– 30 साल के अन्ना एक स्कूल ड्रॉप आउट हैं। वे चेन्नई के थिरुवनमयुर-शौलिंगनलूर रोड पर एक शेयर-ऑटो चलाते हैं। उनके शेयर-ऑटो में एक बार में 6 पैसेंजर्स सवार हो सकते हैं।

– उनके ऑटो को चेन्नई में अमेजिंग ऑटो भी कहा जाता है। अन्ना मूलतः थंजावुर जिले से हैं। चार साल की उम्र में वे अपने दो भाइयों और एक बहन के साथ चेन्नई आ गए थे।
– 2012 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई अधूरी छोड़कर ऑटो चलाने लगे। उनके ऑटो को अमेंजिंग ऑटो के नाम से जाना जाता है।

हर महीने कमाते हैं 50 हजार रुपए, कस्टमर्स पर खर्चते हैं 10 हजार रुपए

– शुरुआत में अन्ना आम ऑटो ड्राइवर की तरह ही काम किया करते थे। बाद में उन्हें लगा कि अपने पैसेंजर्स को अच्छी सर्विस देने के लिए कुछ अलग करना चाहिए।
– इसके लिए उन्होंने ऑटो में 20 अलग-अलग तरह के अखबारों और मैगजीन रखना शुरू किया। – उन्होंने कुछ पैसे जमा करके अपने ऑटो में वाई-फाई भी लगवाया। उनकी ज्यादातर सवारियां आईटी सेक्टर से होती थीं। इसके चलते उन्होंने 7 हजार रुपए में एक टैबलेट खरीदा।

– हर महीने 50 हजार रुपए की कमाई करने वाले अन्ना 10 हजार रुपए तो कस्टमर्स की सुविधाओं में ही खर्चते हैं।

ऑटो में है रिचार्ज की सुविधा

– अन्ना ने अपने ऑटो में एक कार्ड स्वीपिंग मशीन का भी इंतजाम कर रखा है। इसके अलावा ऑटो में प्रीपेड मोबाइल को रिचार्ज करने के भी इंतजाम हैं।
– वह नियमित तौर पर एक कस्टमर-रिलेशनशिप कॉन्टेस्ट भी चलाते हैं, जिसमें वह अपने पैसेंजर्स से पांच सवाल पूछते हैं। जिसमें वह एक हजार रुपए तक जीत सकता है।
– इसके अलावा वह टीचर्स को फ्री राइड देते हैं। यही नहीं, वह उन नर्सों को भी फ्री राइड देते हैं, जो एचआईवी इन्फेक्टेड लोगों की सेवा करती हैं।

 

इस क्रिकेटर को बुलाते हैं टाइगर, ट्रॉफीज रखने के लिए पिता से मांगा था बड़ा घर

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पुणे: महाराष्ट्र टीम के कैप्टन स्वप्निल गुगाले (351रन नॉटआउट) ने अंकित बावने के साथ मिलकर रणजी में किसी भी विकेट के लिए सबसे लंबी पार्टनरशिप का 70 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ डाला। ‘टाइगर’ नाम से फेमस पुणे के रहने वाले स्वप्निल ने 11 साल की उम्र में पिता से कहा था, पापा बड़ा घर ले लीजिए इस घर में मेरी ट्रॉफीज के लिए जगह नहीं बचेगी। 5 साल की उम्र से खेल रहे हैं क्रिकेट…

25 वर्षीय स्वप्निल की इस सफलता पर उनके पुणे स्थित घर में जश्न का माहौल है। बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। उनके पिता मनसुख गुगाले ने स्वप्निल के बचपन की यादों को साझा करते हुए बता कि, वे 5 साल की उम्र से क्रिकेट खेल रहे हैं। एक दिन बेटे को बैट से खेलता देख मनसुख ने तय किया कि, वे उन्हें क्रिकेटर ही बनाएंगे।  अपने दोनों बेटों (रोहित और स्वप्निल) का दाखिला एक ऐसे स्कूल (सेठ दगडूराम कटारिया स्कूल) में करवाया जहां तीन प्ले ग्राउंड थे। उनके रिश्तेदारों और दोस्तों ने इसका विरोध भी किया लेकिन मनसुख नहीं माने। उन्होंने स्वप्निल की पढ़ाई से ज्यादा उनके क्रिकेट पर फोकस किया।  स्वप्निल के करियर में एक बड़ा योगदान उनके स्कूल के कोच विलास गोगरे का भी है, विलास उन्हें छठवीं क्लास से ट्रेनिंग दे रहे हैं।

कोच की मेहनत और अपनी लगन से स्वप्निल 11 साल की उम्र में स्कूल टीम में शामिल हो गए और एक मैच ने उन्हें लाइमलाइट में ला दिया। स्वप्निल के भाई रोहित गुगाले ने बताया कि, “जी.एन पेटिट और कटारिया स्कूल के बीच मैच था। कटारिया स्कूल को 130 रन चाहिए थे और उनके 17 रन पर 6 विकेट गिर चुके थे।”
“इसके बाद क्रीज पर स्वप्निल उतरे और उन्होंने टीम के टेलेंडर्स(पीछे के खिलाड़ियों) के साथ मिलकर यह मैच जीत लिया। रोहित ने बताया कि, “पुणे के नेहरु स्टेडियम में ट्रायल चल रहे थे। पूरे राज्य से तकरीबन 500 खिलाड़ी यहां पहुंचे थे।”  “स्वप्निल ने पहले 250 खिलाड़ियों में, फिर 25 में और अंत में महाराष्ट्र के प्लेइंग 11 में जगह बना ली। स्वप्निल की परफॉर्मेंस देख सिलेक्टर भी हैरान हो गए थे।”

बोलने-सुनने में सक्षम नहीं हैं मां

स्वप्निल के परिवार में रोहित और मनसुख के अलावा उनकी मां राजश्री गुगाले, भाभी वर्षा गुगाले और 3 साल की भतीजी हिरल है। उनकी इस सफलता के पीछे उनकी मां और भाभी का बड़ा हाथ है। स्वप्निल की डाइट की पूरी जिम्मेदारी उनकी भाभी के ऊपर है। उनकी मां राजश्री बोलने और सुनने में सक्षम नहीं हैं। इसके बावजूद उन्होंने स्वप्निल को हमेशा क्रिकेट खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोहित ने बताया कि,”मां बोल नहीं सकती, लेकिन उन्होंने हम दोनों भाइयों की परवरिश में कभी कोई कमी नहीं रखी।”

स्वप्निल अपनी फिटनेस के लिए डेली दो घंटे जिम में पसीना बहाते हैं।  इसके बाद वे ग्राउंड में तकरीबन 5-6 घंटे क्रिकेट प्रैक्टिस करते हैं।क्रिकेट के अलावा स्वप्निल को म्यूजिक बहुत पसंद है, वे हर बड़े रॉक स्टार को फॉलो करते हैं।

स्वप्निल पुणे में ‘टाइगर’ नाम से फेमस हैं। यह नाम उनके पिता ने उन्हें दिया है।

मनसुख ने बताया कि, “स्वप्निल बचपन से बहुत शरारती और जिद्दी स्वभाव के हैं। वे एक टाइगर की तरह फुरतीले और कभी न थकने वाले खिलाड़ी रहे हैं।””हमें इस बात का विश्वास है कि, स्वप्निल एक दिन टीम इंडिया का पार्ट जरुर बनेंगे।”

मनसुख के मुताबिक, स्वप्निल ने लगभग हर बड़े मैच में ट्रॉफी जीती है।  उन्होंने एक किस्से को याद करते हुए बताया कि,”जब स्वप्निल छोटे थे तो उन्होंने एक दिन मुझे से कहा,पापा मैं हर मैच में ट्रॉफी लेकर आता हूं। हमारा ये घर बहुत छोटा है इन्हें रखने के लिए।”बेटे के इस सपने को पूरा करने के लिए मनसुख ने एक बड़ा घर लिया। आज उनका ये घर भी स्वप्निल की ट्रॉफीज से भरा पड़ा है। बेटे की सफलता के बाद घर में बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है।  मनसुख ने बताया कि, वे जैन कम्युनिटी से आते हैं। बेटे की सफलता पर पूरे जैन समुदाय ने उन्हें बधाइयां दी हैं।

पिता को टीम इंडिया में सिलेक्शन की उम्मीद

इस मैच में स्वप्निल ने 351 नॉटआउट स्कोर किया है। वे ट्रिपल सेंचुरी स्कोर करने वाले महाराष्ट्र के चौथे बैट्समैन हैं। स्वप्निल ने पहला रणजी ट्रॉफी मैच 2010 में राजस्थान के खिलाफ खेला था। इसके बाद उन्हें 2014 तक कोई बड़ा मौका नहीं मिला। 2015 में उन्होंने कुछ खास स्कोर नहीं किया, लेकिन अपनी मेहनत और लगन से फिर एक बार 2016 में वे कमाल करने में कामयाब हुए हैं। ये फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उनका पर्सनल बेस्ट भी है। स्वप्निल शुरू से ही कैप्टन मटेरियल रहे हैं। वे अब तक क्रिकेट के लगभग सभी फॉरमेट में कप्तान रह चुके हैं।
उनके लीडरशिप में महाराष्ट्र ने 2009 में अंडर-19 वीनू मांकड़ ट्रॉफी और 2014 में कूंच बिहार ट्रॉफी जीती थी। वर्ल्ड रिकॉर्ड से चूकने पर मनसुख का कहना है कि, “स्वप्निल की इस परफारमेंस से पूरा परिवार खुश है।” “उन्होंने टीम के लिए खेला अगर मैच 4 की जगह पांच दिन का होता तो यह वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बन सकता था।” सचिन, सहवाग समेत टीम इंडिया के कई बड़े नाम स्वप्निल के खेल की तारीफ कर चुके हैं।

 

यूट्यूब पर दिख रहा है हिन्दी कविता का सौंदर्य

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मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और बहुभाषी अभिव्यक्ति की सबसे कीमती विधा ‘कविता’ बहुत कम शब्दों में काफी कुछ कह जाती है। दिन के अंत में कविता हमें सुकून देती है, लेकिन ऐसे समय में जब किताबें पढ़ने के सिलसिले कम हो गये हैं, कविता के लिए लोग मुश्किल से समय निकाल पाते हैं।

इसके बावजूद एक व्यक्ति की हिन्दी कविताओं के प्रति ऐसी दीवानगी है कि उन्होने हिन्दी कविता को ही अपना काम बना लिया और लोगों तक यह संदेश पहुचाँने के लिए प्रयासरत है कि हिन्दी कविता कितनी शानदार होती है।

अमरिका के मियामी में बस चुके एक सफल फिल्म निर्माता और व्यवसायी, मनीष गुप्ता ने जब मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम और कवियों की कविताओं के सम्बन्ध में लोगों की अरुचि देखी तो उन्होनें हिन्दी कविताओं को दोबारा प्रसिद्ध बनाने का,विशेष तौर पर युवाओंकेबीच में,प्रयास आरम्भ कर दिया।

उन्होनें हिन्दी कविताके नाम से यूट्यूब पर एक चैनल की शुरुआत की है, जिसमें हिन्दी कविता प्रेमियों की संख्या हजारों में पहुँच चुकी हैं।

1980 में जब मनीष मात्र ग्यारह वर्ष के थे,तब उन्होनें अपने कोर्स की किताब में पहली बार भवानी प्रसाद मिश्रा की कविता “सतपुड़ा के घने जंगल” पढ़ी थी। यह उनके कविताओं के साथ प्रेम की शुरुआत थी।

मनीष ने युवावस्था में अनगिनत दोपहरें छिंदवाड़ा में अपने दोस्त के साथ पेड़ के नीचे बैठकर मुन्शी प्रेमचन्द की कहानियाँ, रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ और मार्क ट्वेन के हिन्दी रुपान्तर पढ़कर बितायीं। शब्दों के साथ इसी सम्बन्ध को 47 वर्षीय मनीष ने अपने यूट्यूब चैनल ‘हिन्दी कविता’ में पेश किया। अपने युवावस्था और मुम्बई में अपने हिन्दी चैनल शुरु करने के बीच के समय में मनीष अमरिका चले गए। वहाँ एक पेन्टर के रुप में काम किया, मियामी में बीच क्लब चलाया, टीवी शोज़ का निर्माण किया और दो फीचर फिल्मों-इण्डियन फिश (2003) और होली (2006) का निर्देशन किया। वह इण्डियन डेली में एक कॅाल्मिस्ट के रुप में कार्य कर रहे थे और अभी हाल में ही अमरीका से तब लौटे जब हिन्दी कविता चैनल का ख्याल उनके दिमाग में आया।

2013 में अपने दोस्तों के साथ बीते दिनों में प्रेमचन्द, निराला और दिनकर को पढ़ने के बारे में हुई बातचीत में अन्तत: मनीष ने हिन्दी कविता चैनल को शुरु करने का फैसला किया। इस प्रोजेक्ट के रिसर्च के दौरान वे देश के विभिन्न कॅालेज के छात्रों से मिले, पब्लिशर्स और पुस्तक-विक्रेताओं से मिले और उनसे यह जानकारी हासिल की, कि हिन्दी कविता इसलिए प्रसिद्ध नहीं रही क्योकिं इसका “स्टाइल कोटैन्ट” कम हो गया है।

इस विषय में सोचते हुए कि हिन्दी कविता किस तरह से नयी पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है, मनीष को एक शक्तिशाली विचार दिमाग में आया। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन कलाकारों के द्वारा जाने-माने समकालीन और पुराने कवियों की कविताएँ प्रस्तुत कराने का निश्चय किया। इस का नतीजा बेहतरीन रहा मनोज वाजपेयी द्वारा पढ़ी गयी दिनकर की ‘रश्मिरथीको 1,90,000 दर्शक मिले और लेखकअभिनेता पीयूष मिश्राकी स्वरचित कविता ‘प्रेमिकाओं के नाम‘ को 86,000 सेज्यादा दर्शक मिले।

तीन साल पहले शुरू किये गये इस यूट्यूब चैनल को बेइंतहा मुहब्बत मिली। इसके चैनल के प्रशंसकों ने इसका नाम ‘कविताओं का कोक स्टूडियो’ रख दिया। मनीष गुप्ता कहते है, जब हमने इसे शुरु किया तो लोगों को हिन्दी कविताएँ पंसद आयीं। आज के समय में कई अंग्रेजी-क्लब भी हिन्दी कविता से जुड़ना चाहते है क्योकिं कविताओं को पेश करने का अंदाज काफी निराला है।

हिन्दी कविता वीडियो के अभिनेता और लेखक अपने पंसदीदा कवियों की कविताएँ पढ़ते हैं-गीतकार -लेखक वरुण ग्रोवर द्वारा उदय प्रकाश की “मैं लौट जाऊंगा” और अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता द्वारा हुबनाथ की “मुसलमान”, अभिनेत्री स्वरा भास्कर और रसिका दुग्गल द्वारा उनके पंसदीदा कवि/कवियित्री पाश और अमृता प्रीतम  की रचनाएँ पढ़ी गयी है, जो काफी विस्तृत रूप से देश में प्रसिद्ध हुई।

इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने एक साक्षात्कार में स्वरा भास्कर कहती हैं:-

हाल ही मेंमेरी दोस्त के घर में एक सब्जीवाले ने मुझसे कहा कि वो पढ़ नही सकता लेकिन उसने मेरे कविता-पाठ का वीडियो देखा है। इस वाकये ने मुझे ये भी एहसास कराया कि देशी लोग सिर्फ मसाला हिन्दी फिल्में ही पंसद नहीं करतेबल्कि वे हिंदी साहित्य का भी आनंद लेते हैं।

जाने-माने अभिनेता सौरभ शुक्ला कहते हैं,”इन खूबसूरत वीडियो ने मुझमें कविताओं के लिए प्यार लौटा दिया,यह एक एहसास है जो हिन्दी कविता के प्रशंसकों को लगातार बढ़ा रहा है।

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गीतकार-लेखक वरुण ग्रोवर कहते हैं:-

हिन्दी कविता का कोई भी व्यवसायिक चैनल कभी नहीं था। लोगों को कविताएँ पसन्द हैं, लेकिन यह हमेशा स्कूली किताबों से ही जुड़ी रही। इस चैनल के माध्यम से हिन्दी कविता में आधुनिकता आ गयी।

इन छोटे, साधारण और आनंददायक वीडियो का निर्माण सामान्यतः मनीष के घर पर ही होता है, जिसमें बैकग्राउण्ड में  वायलिन बजता रहता है और वक्ता  अपनी चुनी हुई कविता के बारे में वर्णन करते हैं।मनीष के पास फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन तकनीशियनों का सहयोग है, जो उन्हें सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग और ग्राफिक्स में मदद करते हैं।

मनीष बताते हैं कि उन्होंने कुछ काफी पुरानी, भूली हुयी कविताओं को भी ढूँढ निकाला है, जैसे कि नजीर अकबराबादी की और कुछ कम जानी हुयी आवाजें जैसे डोगरी भाषा के कवि पद्मा सचदेव।

ये देखते हुए कि छात्रों का हिन्दी साहित्य से रूझान लगातार घट रहा है,गुप्ता चाहते है कि हिन्दी कविता को सभी कॅालेजों तक ले जाये, जिसमें सभी आईआईएम, सभी आईआईटी, दिल्ली विश्वविद्यालय और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय भी शामिल हैं। उन्होनें सभी  कॅालेजों में वीडियो दिखाने की योजना बनाई है और कोशिश है कि कलाकार स्वयं जाकर वहाँ कविताएँ पढ़े।

मनीष गुप्ता मानते हैं कि अंग्रेजी एक बहुत प्रसिद्ध और बोलचाल की सामान्य भाषा बन चुकी है, लेकिन भारत देश में अपनी भाषा में बात करने में लोगों को ज्यादा आसानी होती है।

वे कहते हैं,”मुझे अंग्रेजी से कोई समस्या नहीं हैयह भी एक बहुत अच्छी भाषा हैकिन्तु यह हमारी नही हैइसलिए हमें इसे बहुत ज्यादा नही अपनाना चाहिए। हम अपनी भाषा को विकसित करें।

मनोविज्ञानियों का भी मानना है कि जब हम अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते है तो शब्दों के साथ ज्यादा गहरा जुड़ाव महसूस करते है और बेहतर तरीके सेअपनी बात कह पाते है।

मनीष के लिए हिन्दी कविता के माध्यम से कवियों और कविताओं की पुनः स्थापना उनकी जिंदगी का सबसे शानदार प्रोजेक्ट है। वह और उनकी टीम हिन्दी, उर्दू और हाल ही में पंजाबी में भी कविताओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे जल्द ही मराठी, गुजराती और बंगाली को भी अपने प्रोजेक्ट में शामिल करने वाले हैं।

 

अमेरिकी गीतकार बॉब डिलेन को नोबेल साहित्य पुरस्कार

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स्टॉकहोम – अमेरिकी गीतकार बॉब डिलेन को इस साल का नोबेल साहित्य पुरस्कार दिया जाएगा। वह प्रतिष्ठित सम्मान हासिल करने वाले पहले गीतकार हैं और इस घोषणा ने पुरस्कार पर नजर जमाए हुए लोगों को हैरान कर दिया है।

स्वीडिश एकेडमी ने कहा कि 75 साल के डिलेन को ‘‘अमेरिकी गीतों की लंबी परंपरा में नयी काव्य शैली विकसित करने के लिए’’ नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

पुरस्कार की घोषणा के कार्यक्रम में मौजूद पत्रकारों ने हैरान होने के बाद तालियां बजाकर इसका स्वागत किया।

पूर्व में भी नोबेल के लिए गायक के नाम की अटकलें लगी थी लेकिन उनकी दावेदारी को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया।

एकेडमी की स्थायी सचिव सारा दानियस ने कहा कि डिलेन के गाने ‘‘कानों में कविता जैसे लगते हैं।’’ नोबेल पुरस्कार गायक के लिए सबसे नया सम्मान है। 1941 में मिनेसोटा के डुलुथ में एक साधारण परिवार में जन्मे रॉबर्ट एलेन जिमेरमन उर्फ बॉब डिलेन ने बड़े होने के साथ हार्मोनिका, गिटार और पियानो बजाना सीखा।

डिलेन को पुरस्कार के साथ 80 लाख क्रोनोर :9,06,000 डॉलर: की धनराशि मिलेगी।

साहित्य के नोबेल पुरस्कार की घोषणा के साथ इस साल के नोबेल पुरस्कारों के सभी विजेताओं की सूची पूरी हो गयी। इससे पहले चिकित्सा, भौतिकी, रसायनशास्त्र, अर्थशास्त्र और शांति के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की जा चुकी है।

शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता को छोड़कर बाकी दूसरे विजेताओं को 1़0 दिसंबर को स्टॉकहोम में एक औपचारिक समारोह में पुरस्कार – एक स्वर्ण पदक और एक डिप्लोमा – दिया जाएगा।

शांति का नोबेल पुरस्कार उसी दिन नार्वे की राजधानी ओस्लो में होने वाले एक दूसरे समारोह में दिया जाएगा। यह पुरस्कार नार्वे की नोबेल समिति देती है।

8 सालों से पर्यटन के लिए घूम रही हैं ये बहनें, वेबसाइट ने दिलवाया पुरस्कार

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भोपाल.मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में एमपी ट्रैवल मार्ट के उद्घाटन समारोह में 22 श्रेणियों में 39 विजेताओं को पहले एमपी टूरिज्म अवार्ड्स बांटे। पुरस्कार पाने वालों मे पर्यटन को बढ़ावा देने वाली दिल्ली की दो बहनें भी शामिल हैं। पर्यटन को प्रोत्साहित करने वाली ghoomophiro.com वेबसाइट को दिल्ली की दो बहनें प्राची और हिमाद्री गर्ग चलाती हैं।

दोनों बहने 8 साल से भारत और देश के बाहर घूम रही हैं। 8 सालों में वह करीब-करीब पूरा भारत देख चुकी हैं। -इस यात्रा में वह ज्यादातर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करती हैं। बाइक से हिमालय और लद्दाख जाना उन्हें विशेष पसंद है।अवार्ड मिलने के बारे में बात करते हुए प्राची ने बताया कि उन्होंने एमपी को अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया के माध्यम से बाहर काफी प्रमोट किया है। सारा देश घूमने के बाद मैं कह सकती हूं कि एमपी बहुत खास है। वहीं, एमपी में सभी मौसम में जाया जा सकता है। नेचर को देखना है तो पंचमढ़ी, रेस्ट करना है तो जंगल कैंप, संगमरमर की चट्टानों के बीच फाल्स देखना है तो भेड़ाघाट, आर्किटेक्चर के बारे में जानना है तो खजुराहो और धार्मिक आस्था है तो उज्जैन। हम दोनों बहने 6-7 बार एमपी आ चुकी हैं। पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए हम हर बुधवार को सोशल मीडिया पर चैट करते हैं और यहां के बारे में विदेशी और देशी पर्यटकों को जानकारी देते हैं। पूरा देश घूमते हैं, अभी तक कोई प्रॉब्लम नहीं
विदेशों में आम धारणा है कि भारत घूमने के लिए सेफ जगह नहीं है, खासतौर से लड़कियों के लिए लेकिन हम पूरा देश घूमते हैं, अभी तक कोई प्रॉब्लम नहीं आई है।
पहली बार हम दोनों बहनें 8 साल पहले 10 मिनट के विचार के बाद ही दिल्ली से हिमाचल निकले थे। तब से ये सफर जारी है।

प्राची और हिमानी, दोनों बहनों ने इंजीनियरिंग और एमबीए पास हैं। प्राची एक किताब ‘सुपर वूमेन’ भी लिख चुकी हैं जो प्रतिष्ठित पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित है।

 

रीना तालुकदार ने अपने हुनर से सजाया मोती का संसार

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यह एक अनोखी दुनिया हैं जहां बैग से लेकर तरह तरह के खिलौने टेबल पर सजाने तथा डायनिंग टेबल पर बिछाने वाला मैट की तरह कई अनोखी चीजें देखने को मिलती है।

घर गृहस्थी के बीच मिले एकान्त में खुद की तलाश करने का मौका मिला…लगा कि खुद की क्षमता को पहचान कर उसे दुनिया के सामने लाना है। मुक्तो निकेतन के जरिए वे अपनी पहचान बना चुकी है और कल्याणी में रहते हुए कार्य कर रही है।

उनकी कारीगरी और सफाई से किया गए कार्य मांग बढ़ी है. कई प्रदर्शनी में भाग ले चुकी है.अब तो उनके बैग की मांग महानगर से अन्य राज्यों में बढ़ी है। रीना का कहना है काम कम करो पर जो काम करो वह शतप्रतिशत खरा हो। उनके इसी नारे ने हजारों की भीड़ में रीना की पहचान बनाई है।

रिटार्यड आईपीएस अधिकारी की पत्नी रीना अपने आप में प्रेरणा हैं। आइए डालते हैं उनके मोती से सजे संसार से निकले खजाने पर एक नजर –

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यह त्योहारों का मौसम है और अगर आप कुछ देसी फंडा आजमाना चाहती हैं तो सफेद मोती का यह पर्स आपकी सिल्क को और खूबसूरत बना सकता है।

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शादी पर जाना है या दिवाली पर मिठाई बाँटने, यह पर्स काफी अच्छा लगेगा। सफेद और हरे रंग का संयोजन इसे शानदार लुक दे रहा है।

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काले रंग का जवाब नहीं होता और उस पर सफेद लंबे मोती का काम इस पर्स को बेहद खूबसूरत बना रहा है। पार्टी में ब्लैक पहनने जा रही हैं। इसे साथ रखिए और देसी स्टाइल दिखाएं शान से।

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उत्सव के इस मौके पर लाल रंग बहुत पसंद किया जाता है और इस पर्स में लाल के साथ काले और सुनहरे रंग का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से किया गया है।img-20161010-wa0041

सहेलियों के साथ फिल्म देखने जा रही हैं, इसे साथ रखिए और फैशनेबल बनिए। आपकी जींस हो या पलाजो, सबके साथ ये बेहद प्यारा लगेगा।

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रीना तालुकदार के खजाने से एक और रत्न। सजावट के लिए एकदम सही।