Wednesday, March 25, 2026
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ऑक्सफोर्ड से राजनीति सीखेंगी मलाला

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पाकिस्तान की नोबल विजेता और शिक्षा कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से राजनीति, दर्शन और अर्थव्यवस्था की शिक्षा लेंगी। इसके लिए उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिविर्सिटी में प्रवेश के लिए साक्षात्कार दिया है। मलाला को आकांक्षा है कि वह एक दिन प्रधानमंत्री बनेंगी।

मीडिया रिपोर्ट के हवाले से 19 वर्षीय पाकिस्तानी किशोरी ने कहा कि उनका साक्षात्कार इतना आसान नहीं था और दूसरे किसी छात्र की तरह मैं भी रिजल्ट का इंतजार उत्सुकता से कर रही हूं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मलाला दर्शन, राजनीतिक और अर्थव्यवस्था की पढ़ाई करने को इच्छुक है। ये तीनों विषयों का चयन डिग्री के लिए मुख्यत: ब्रिटिश राजनेताओं, सामाजिक सेवा कार्यकर्ताओं और मीडिया प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है।
मलाला इस समय अपने पिता जिआउद्दीन यूसुफजई और अपनी मां टूर पेकई के साथ बर्मिंघम में हैं, जहां मलाला लड़कियों के लिए एजबेस्टन हाईस्कूल में शिक्षा कार्यकर्ता के लिए रूप में हिस्सा लेती हैं। मलाला ने कई साक्षात्कारों में पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाहिर की है।

 

बेटी को खोने के बाद भी, पकिस्तान से इस पिता ने भेजा भारत को प्यार भरा ख़त!

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लकीरे हैं तो रहने दो..

किसी ने रूठ कर गुस्से में शायद खेंच दी थी…
इन्ही को अब बनाओ पाला..
और आओ कबड्डी खेलते हैं..

लकीरे हैं तो रहने दो….

-गुलज़ार 

प्यार से अबीहा कहलाई जानेवाली 13 साल की नलैन रुबाब इमरान ने गुलज़ार साहब की लिखी इन पंक्तियों को ज़रूर पढ़ा और समझा होगा, तभी तो भारत और पकिस्तान के बीच खींची नफरत की इन लकीरों को मिटाकर वो पकिस्तान से भारत आई और हमे प्यार और अपनेपन का एक नया पाठ पढ़ा गई।

अबीहा की मौत के बाद उनके पिता हमीद इमरान ने पकिस्तान के एक अखबार, ‘द डॉन’ में भारत के नाम एक धन्यवाद पत्र लिखा।

“न तो मैं अपनी बेटी की मौत के दर्द को भुला सकता हूँ और न ही उसके इलाज के दौरान भारत से पाए हुए प्यार को।”

अबीहा पाकिस्तान के चकवाल शहर की रहने वाली थी। उनका जिगर (liver) खराब हो चुका था। 2011 में डॉक्टरो ने उन्हें लीवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी। चूँकि उनके पिता, इमरान उस वक़्त साऊदी अरबिया में नौकरी कर रहे थे इसलिए अबीहा का ऑपरेशन वही करवाया गया था।  पर 2015 में एक बार फिर से अबीहा को ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ी। पकिस्तान में इस ऑपरेशन का खर्च करीब 50 लाख रूपये तक आना था इसलिए इमरान ने भारत का रुख किया।

यहाँ दिल्ली के अपोलो अस्पताल में अबीहा का ऑपरेशन होना था। पर दिक्कत ये थी कि इमरान भारत में किसीको नहीं जानते थे। ऊपर से यहाँ आने से पहले तक उन्होंने भारत को केवल एक दुश्मन देश के तौर पर ही जाना था। अबीहा की माँ भी गर्भवती थी इसलिए उन्हें भी देखभाल की ज़रूरत थी।

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इमरान को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसे में इमरान के एक दोस्त ने उन्हें भारत में रहने वाले रतनदीप सिंह कोहली के बारे में बताया और उनका पता भी दिया। रतनदीप सिंह कोहली, सरदार चेत सिंह कोहली के पोते है, जिन्होंने 1910 में चकवाल का सरकारी स्कूल बनवाया था। इसी स्कूल में इमरान और उनके दोस्त भी पढ़े थे।

विभाजन से पहले सरदार चेत सिंह कोहली का परिवार चकवाल में ही रहा करता था और उन्होंने यहाँ स्कूल और अस्पताल बनवाने के अलावा भी ऐसे कई नेक काम किये थे जिनकी वजह से वे आज भी चकवाल के लोगों के दिलो में बसते है। इसी वजह से जब कभी चकवाल के इस स्कूल में कोई बड़ा कार्यक्रम होता है तो चेत सिंह जी के पोते रतनदीप सिंह को ज़रूर बुलाया जाता है।

रतनदीप सिंह कोहली कहते है, “मैं 2010 में चकवाल गया था, जब मेरे दादाजी के बनाये स्कूल की सौवी वर्षगाठ थी। और फिर दुबारा 2012 में अपने परिवार को लेकर वहां गया था। वहां के लोगो ने और उस स्कूल के बच्चो ने हमें इतना प्यार और सम्मान दिया जिसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मेरी पत्नी को तो वो ‘चकवाल की बहु’ कहकर बुलाते थे। हमारे बुजुर्गों के किये हुए अच्छे कामो के लिए वो लोग हमे शुक्रियां कहते नहीं थक रहे थे। ये बहुत ही भावुक क्षण था हमारे लिए।”

रतनदीप सिंह का पता मिलने पर इमरान अपनी पत्नी, अपनी बेटी- अबीहा और उस व्यक्ति को साथ लेकर गए जो अबीहा को लीवर देने वाला था। इन चारो का रतनदीप सिंह और उनकी पत्नी परमजीत कौर ने खुले दिल से स्वागत किया।

“जब इमरान हमारे घर आये तो हम लोग एक दुसरे से बिलकुल अनजान थे। पकिस्तान में रहने वाले हमारे एक पुराने दोस्त ने उन्हें हमारा पता दिया था। पर अबीहा पहले ही दिन से मेरी पत्नी के साथ बहुत घुल मिल गयी थी। जब मेरी पत्नी ने पूछा कि क्या वो अबीहा के लिए उसकी पसंद का खाना बना कर रोज़ अस्पताल भेज सकती है तो इमरान और उनकी पत्नी बेहद खुश हुए। अबीहा को अस्पताल का खाना बिलकुल पसंद नहीं था। ऐसे में उनके लिए ये बड़ी राहत थी,” रतनदीप सिंह बताते है।

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परमजीत कौर बहुत प्यार से अबीहा के लिए खाना बनाने लगी। बाकि सभी सदस्यों के लिए भी वे अलग से खाना बनाती। मांसाहारी व्यंजनों के लिए मांस ख़ास तौर पर मुसलमान दुकानदारों से ही लाया जाता।

“मुझे पता था कि मुसलमान धर्म के लोग सिर्फ हलाल किया हुआ मांस ही खाते है। इसलिए मैं इस बात का ख़ास ध्यान रखता। जब मैंने इमरान को एक बार खाने की मेज़ पर बताया कि ये मांस हलाल किया हुआ है इसलिए वे बेझिझक खाए तो उन्होंने कहा, “भाईजान हमारे लिए तो आपके घर की हर चीज़ हक़ हलाल है”। उनके ये शब्द सुनकर मैं और मेरी पत्नी बेहद भावुक हो उठे थे,” कोहली बताते है।

16 मार्च 2015 को अबीहा का ऑपरेशन किया गया। पर तबियत बिगड़ने की वजह से अबीहा की माँ को उसे छोड़कर पकिस्तान लौटना पडा। पर वो इस तसल्ली के साथ भारत से जा रही थी कि यहाँ परमजीत कौर के रूप में अबीहा की दूसरी माँ मौजूद है।

अगले कुछ दिन बेहद नाज़ुक थे। अबीहा की तबियत दिन पर दिन बिगडती चली जा रही थी। पर परमजीत हर पल उनके साथ होती। अब वे सिर्फ अबीहा के लिए ही नहीं बल्कि अपोलो अस्पताल में इलाज करा रहे बाकी पाकिस्तानी मरीजों के लिए भी खाना बनाकर लाने लगी। कुछ लोगो को तो उन्होंने घर पर ख़ास दावत भी दी।

“हम तीन महीने वहां रहे पर कोहली साहब और उनके परिवार ने हमे ये कभी महसूस नहीं होने दिया कि हम किसी अनजान मुल्क में है। हमे ऐसा ही लगता था जैसे हम चकवाल के ही किसी अस्पताल में अबीहा का इलाज करा रहे है,” इमरान बताते है।

पर तीन महीने तक मौत से जंग लड़ने के बाद आखिर 7 मई 2015 को अबीहा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

“वो कई बार कहती थी कि उसे भारत बहुत अच्छा लगता है। उसे ये अस्पताल और यहाँ के डॉक्टर्स भी बहुत अच्छे लगते है और जब वो बड़ी होगी तो इसी अस्पताल में डॉक्टर बन कर आएगी। मुझे उसकी बहुत याद आती है,” परमजीत कौर ने अपने आंसू रोकते हुए कहा।

अस्पताल की नर्स से लेकर अबीहा की डॉक्टर तक हर कोई अबीहा की बातें बताता नहीं थकता। इमरान भी अस्पताल के सभी कर्मचारियों के बेहद शुक्रगुजार है जिन्होंने अबीहा की देखभाल में कोई कमी नहीं रखी।

भारत से जाते हुए भी भारतीय सेना के जवानो ने इमरान का दिल उस वक़्त जीत लिया जब वे अबीहा के शव को लेकर पकिस्तान वापस जा रहे थे।

“जब हमारा एम्बुलेंस बॉर्डर के पास आकर रुका तो एक सैनिक दौड़कर आया और अबीहा के शव पर उसने एक हरा कपड़ा ओढ़ा दिया ताकि उसे धुप न लगे।”

भले ही इमरान भारत से आँखों में आंसू लेकर लौटे पर उन्होंने भारत के रतनदीप सिंह कोहली और उनके परिवार के प्यार को कभी नहीं भुलाया।

“भले ही बंटवारे की वजह से हम एक दुसरे से बहुत दूर हो गए हो। पर 67 साल बाद भी इन दोनों मुल्को के आम इंसान के बीच का प्यार अब भी ख़त्म नहीं हुआ है। और एक दिन ये प्यार दोनों मुल्को के सियासती खेलो से ऊपर उठकर अपना रंग ज़रूर दिखायेगा,” – हमीद इमरान।

पकिस्तान में अपने घर से फ़ोन पर ‘द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए इमरान ने कहा, “मैं अपनी किस्मत को मंज़ूर करता हूँ। वालिद होने के तौर पर अपनी बच्ची को बचाने के लिए मुझसे जो कुछ हो सकता था, जितना हो सकता था, मैंने किया। पर एक मुसलमान होने के नाते मैं ‘अल्लाह’ के हर फैसले को मंज़ूर करता हूँ।”

भारत के लोगो का शुक्रिया अदा करते हुए इमरान के पास शब्द कम पड़ रहे थे, “मैं चाहता हूँ कि लोग ये जाने कि आम हिन्दुतानी कितना नेक है। सिर्फ कोहली परिवार ही नहीं बल्कि अपोलो अस्पताल के हर डॉक्टर और नर्स का मैं शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मेरी बच्ची का इतना ख्याल रखा, फिर चाहे वो डॉ. सुभाष गुप्ता हो या डॉ. सिब्बल।”

“मैं लोगो से ये भी कहना चाहता हूँ कि दोनों ही मुल्को की आम आवाम को सियासत से कोई लेना देना नहीं है। उनके अन्दर जो एक इंसानी जज्बा है वो किसी भी सियासती कडवाहट से कई ऊपर है,” उन्होंने कहा।

अबीहा की डायरी कोहली परिवार और अपोलो अस्पताल के डॉक्टरो के नाम लिखे कई शुक्रियानामे से भरी हुई थी। जन्नत की ओर रुखसती से पहले इस नन्ही सी परी ने अपनी डायरी में लिखा था, “I Love India” (“मुझे भारत से प्यार है “)।

(साभार – द बेटर इंडिया)

फैशनेबल और स्टाइलिश हैं डस्टर जैकेट्स

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सर्दियों में अपने परम्परागत परिधानों के साथ स्वेटर्स, पुलोवर्स और ब्लेज़र से अलग कुछ पहनना चाहती हैं तो इन दिनों एक तरह की जैकेट्स काफी ट्रेंड कर रही है जो आपके ट्रेडिशनल लुक को बरकरार रखने में हेल्पफुल रहेगी. इन जैकेट्स को विंटर्स के बाद भी लगभग सभी तरह के ड्रेसेज़ के साथ पेयर किया जा सकता है. इस तरह की जैकेट्स मार्केट में डस्टर जैकेट के नाम से लोकप्रिय हैं।

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डस्टर जैकेट?
जींस, स्कर्ट, मैक्सी, गाउन और कुर्ते के साथ पहने जाने वाले लॉन्ग जैकेट्स को डस्टर जैकेट कहते हैं। फुल स्लीव और स्लीवलेस जैसे कई तरह के वैराइटी में ये जैकेट्स उपलब्ध हैं।. हैवी, बोल्ड और लाइट प्रिंट्स वाले इन जैकेट्स से आप खुद को हर एक सीज़न में स्टाइल कर सकती हैं।

इन्हें कॉलेज़, ऑफिस वेयर के साथ ही कैजुअल और पार्टी वेयर के साथ भी पहना जा सकता है। प्रिंट्स और पैटर्न का चुनाव आप अपने शरीर के हिसाब से करें।

स्लीव्स के अलावा इनके नेकलाइन और लम्बाई भी वैराइटी देखने को मिलती हैं जो पूरी तरह से आपके पसंद और बॉडी साइज़ पर डिपेंड करता है।

जहां पहले इसे कुर्ती और सलवार-कमीज के साथ पहना जाता था वहीं अब इसे जींस, स्कर्ट, गाउन,शॉर्ट ड्रेस, सबके साथ पहने हुए देखा जा सकता है.अपने पुराने लहंगे के साथ थोड़ा हैवी वर्क वाला डस्टर जैकेट पहन सकती हैं।

अपने आउटफिट्स को देखते हुए फ्रिल, लेयर्स और स्ट्रेट कट वाले जैकेट्स को चुनें।

लहंगे के साथ एम्ब्रॉयडेड, ब्रोकेड वर्क और सिल्क जैसे फैब्रिक से बने डस्टर जैकेट अच्छे लगेंगे।

सेमी फॉर्मल लुक के लिए जींस, पैंट्स और कुर्ते के साथ पहनें। इंडो-वेस्टर्न लुक के लिए क्रॉप-टॉप और स्कर्ट के साथ डस्टर जैकेट पहनें।

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सलवार-कमीज और गाउन के साथ डस्टर जैकेट का कॉम्बिनेशन आपके लेडीज़ संगीत और मेंहदी फंक्शन में देगा क्लासी लुक। जु्अल लुक के लिए शॉर्ट्स के साथ डस्टर जैकेट्स पहनें। इसे आप बीच वेयर के तौर पर भी पहन सकती हैं।

स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में दिया ये भाषण जिसने दुनिया बदल दी

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स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण दिया था। विवेकानंद का जब भी जि़क्र आता है उनके इस भाषण की चर्चा जरूर होती है। पढ़ें विवेकानंद का यह भाषण… 

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अमेरिका के बहनो और भाइयों,

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था। और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयो, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है: जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।वर्तमान सम्मेलन जोकि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है: जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं।

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सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।

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अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

 
(साभार – भारत दर्शन)

माहावारी…शर्म का नहीं सेहत और स्त्रीत्व का मामला है

-सुषमा त्रिपाठी

मेनस्ट्रुअल हाइजीन एक ऐसा विषय है जो महिलाओं की जिंदगी में बहुत मायने रखता है मगर इस पर हम बात नहीं करते और न ही इसे लेकर किसी प्रकार की जागरूकता है। माहावारी या मासिक धर्म महिलाओं को लेकर आज भी कई विश्वास या यूँ कहें कि अंधविश्वास हैं और कई बार यह महिलाओं के प्रति भेदभाव को भी जन्म होता है। कई बार उसे अलग कर दिया जाता है तो कहीं पर मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लग जाती है, इसे लेकर हमारे घरों और समाज में हिचक है और इस पर बात करना शर्म की बात मानी जाती है।

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जाहिर है कि अगर हम समस्या को ही स्वीकार नहीं करते जो कि सीधे महिलाओं के स्वास्थ्य और उसके शरीर में होने वाले जैविक परिर्वतनों से जुड़ी प्रक्रिया है तो हम उसका निदान खोज सकेंगे, यह भी सोचना बेमानी है। एक अध्ययन के अनुसार इस देश में महज 12 प्रतिशत महिलाएं ही सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करती हैं और इनमें से 96 प्रतिशत महिलाएं अधिकतर शहरों या उपनगरीय इलाकों में रहने वाली महिलाएं हैं।

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97 प्रतिशत गायनोकोलॉजिस्ट मानते हैं कि सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फेक्शन यानि सँक्रमण को काफी हद तक कम कर सकता है। मासिक धर्म से जुड़े हास्यास्पद मिथक गहरी वर्जनाओं को जन्म देते हैं। माना जाता है कि महिलाएं इस दौरान अपवित्र, बीमार और अभिशप्त होती हैं। एक सैनेटरी पैड बनाने वाली कम्पनी ने अपने हालिया अध्ययन में पाया कि 75 फ़ीसदी महिलाएं अब भी पैड किसी भूरे लिफ़ाफ़े या काली पॉलीथीन में लपेटकर ख़रीदती हैं। इससे जुड़ी शर्म के कारण परिवार के किसी पुरुष के हाथों इसे मंगवाना तो बहुत कम होता है।

मुझे याद है कि अपनी तीन बड़ी बहनों के साथ एक बड़े परिवार में पलते-बढ़ते हम क्या-क्या जतन करते थे कि किसी को हमारी माहवारी के बारे में ख़बर न लगे। मुझे याद है कि अपनी तीन बड़ी बहनों के साथ एक बड़े परिवार में पलते-बढ़ते हम क्या-क्या जतन करते थे कि किसी को हमारी माहवारी के बारे में ख़बर न लगे। पिता और भाइयों को तो बिल्कुल भी नहीं। माहवारी के दौरान हमारी माँ पहले से ही पुरानी चादरों को काट कर एक बक्से में छुपा कर रख देती थीं।

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भारत में कई औरतों के लिए माहवारी की तस्वीर नहीं बदली है। बहुत से हालिया अध्ययनों से पता चला है कि औरतों के स्वास्थ्य के लिए ये सब कितना बड़ा ख़तरा है।शोध से पता चलता है कि ये एक ऐसा विषय है जिसने औरतों की बेहतरी, उनके स्वास्थ्य और स्वच्छता के मसले को प्रभावित किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार गर्भाशय के मुंह के कैंसर के कुल मामलों में से 27 फ़ीसदी भारत में होते हैं और डॉक्टरों के अनुसार माहवारी के दौरान साफ़-सफाई की कमी इसकी बड़ी वजह है। रिपोर्टों के मुताबिक़ भारत में हर पांच में से एक लड़की माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जाती है।

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15 साल की मार्गदर्शी उत्तरकाशी के गांव में रहती हैं और स्कूल जाना पसंद करती हैं। पहाड़ी रास्तों पर लंबा चलकर वो स्कूल जाती हैं, लेकिन पिछले साल जब उन्हें पहली बार माहवारी हुई थी तो उन्होंने स्कूल लगभग छोड़ ही दिया था। वे कहती हैं, “सबसे बड़ी मुश्किल इसको संभालने में होती है। मुझे शर्म आती है, डर लगता है कि कहीं दाग़ न लग जाए और लोग मेरा मज़ाक न उड़ाए।” मार्गदर्शी बताती हैं, “मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है। समझ नहीं आता है कि इसको लेकर इतनी शर्म क्यों जुड़ी हुई है।” मार्गदर्शी डॉक्टर बनना चाहती हैं और इस बात से हैरान हैं कि जीव विज्ञान की कक्षा में जब माहवारी पर चर्चा होती है तो लड़के इतना हँसते क्यों हैं। मार्गदर्शी कहती हैं, “ये तो हर लड़की के साथ होता है. इतनी प्राकृतिक और सहज बात से हमें असहज होने पर मजबूर क्यों कर दिया जाता है।” ज़ाहिर है इस थोपी गई शर्म और चुप्पी की संस्कृति से बाहर आने का सिलसिला शुरू हो गया है। जैसे-जैसे औरतें अपने फ़ैसले ख़ुद करने लगी हैं, वैसे-वैसे तस्वीर भी बदलती जा रही है मगर यह इतना आसान आज भी नहीं है। अधिकतर माएं आज भी अपनी किशोरावस्था में जा रही बेटियों को देखती हैं तो उनके लिए मासिक धर्म को समझाना एक मुश्किल काम होता है। बच्चों को कई बार समझाना बेहद मुश्किल होता है, खासकर अगर उसकी उम्र कम है क्योंकि बच्चियाँ डर जाती हैं इसलिए इस  मसले को लेकर संवेदनशील होना भी बेहद जरूरी है।

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सबसे बड़ी दिक्कत दाग लगने को लेकर है जिसकी वजह से शर्म का सामना करना पड़ता है। आज भी 90 प्रतिशत संस्थानों, शिक्षण संस्थानों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन नहीं है मगर देखा जाए तो यह रोजगार और जागरुकता का साधन बन सकता है। हाल ही में राज्य के महिला व बाल विकास विभाग, महिलाओं के लिए काम कर रही संस्था ऑल बंगाल विमेन तथा इको डेव कंसल्टेंसी ने ऑल बंगाल विमेन में सम्पूर्णा प्रोडक्शन सेंटर खोला जहाँ सेनेटरी नैपकिन की पैकिंग और बिक्री होगी। ये सैनेटरी नैपकिन सरकारी होम्स में बेचे जाएंगे और इसके लिए राज्य सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनें लगायी जा रही हैं। 10 रुपए में 3 नैपकिन मिलेंगी। इसके लिए सरकार शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, संस्थानों, दफ्तरों से लेकर सार्वजनिक स्थानों पर सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाने की तैयारी कर रही है। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने इस  दिशा में शुरुआत कर दी है। समस्या इन नैपकिन्स के नष्ट करने को लेकर है तो इसके लिए वेंडिंग मशीनों के साथ इनसिनिलेटर भी दिए जा रहे हैं जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए इन नैपकिन्स को खत्म करेंगे।

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अच्छी बात यह है कि अब सिने तारिकाएं भी इसे लेकर जागरूकता लाने की कोशिश में साथ दे रही हैं। हाल ही में करीना कपूर ने कहा कि पुरुषों को भी इन दिनों में महिलाओं का साथ देना और उनको समझना चाहिए। प्रियंका चोपड़ा भी इस पर बात कर रही हैं तो इसका एक अच्छा प्रभाव पड़ रहा है और महिलाएं खुलकर बात कर रही हैं और पुरुष उनको समझ रहे हैं। दरअसल, अब जरूरत माहावारी को लेकर शर्म से आगे बढ़कर बात करने और आवश्यक कदम उठाने की है क्योंकि आखिरकार यह महिलाओं की सेहत और अस्मिता का मामला है, महिलाओं परिवार कीही नहीं बल्कि समाज और देश की भी धुरी हैं इसलिए यह उनके लिए ही नहीं हमारे देश के विकास के लिए जरूरी है, और कोई न करे तो खुद महिलाओं को इस दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।

(इनपुट – साभार बीबीसी हिन्दी, सम्पूर्णा की तस्वीरें साभार – अदिति साहा)

महानगरों में भी चल रहा है ‘दंगल’ को लेकर दंगल

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रेखा श्रीवास्तव

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पिंक के बाद अब दंगल। यह भी लड़कियों को केंद्र करके बनाई गई फिल्म पर वास्तविक। गाँव में जन्मी दो बहनों की सच्ची कहानी। एक पिता ने पत्नी, गांव और दुनिया से संघर्ष कर कुश्ती की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपनी बेटियों को केवल शामिल होने का जज्बा नहीं दिया, बल्कि स्वर्ण पदक लाकर देश का झंडा सबसे ऊँचा फहराने में कामयाब बनाया। फिल्म इंडस्ट्री में कई कामयाब फिल्म देने वाले आमिर खान ने इसके पहले क्रिकेट को गांव के गुल्ली डंडा खेलने वालों तक पहुँचाया था और जीत हासिल करने की सीख दी थी। वैसे ही इस बार दंगल के माध्यम से एक गांव की लड़की की दास्तान को महानगरों में मल्टीप्लेक्स में देखने वाले लोगों तक पहुँचा दिया। पूरी फिल्म में एक तारतम्य रहा जो दर्शक को इधर से उधर हिलने भी नहीं दिया गया। कयामत से कयामत तक में रोमांटिक हीरो की छाप बनाने वाले आमिर खान यहाँ एक पिता महावीर सिंह फोगाट के रूप में भी जंच रहे हैं। उनकी पत्नी का किरदार निभा रही सांक्षी तंवर ने भी अपनी सादगी भरे अभिनय से ही माँ के किरदार में जान भर दी। बड़ी बेटी गीता (जूनियर-ज़ायरा वसीम और सीनियर-फातिमा सना शेख) और छोटी बेटी बबीता (जूनियर-सुहानी भटनागर और सीनियर-सान्या मल्होत्रा ) का किरदार भी लोगों को काफी पसंद आया। प्रतियोगिता के  दौरान बबीता का कहना गीता जीत, गीता जीत तो जैसे दर्शकों के अंदर भी ऊर्जा भर देता था। उनका चेहरा परिचित नहीं था, फिर भी उनके अभिनय ने फिल्म में जान भर दी। इस फिल्म का महत्वपूर्ण पात्र है जो इन दो बहनों का कजन होता है और यह फिल्म उसी की जुबानी चलती है। कजन के डायलाग डिलीवरी और अभिनय की ही बदौलत गंभीर फिल्म के बीच बैठे दर्शक भी हंसने लगते हैं।

फिल्म के शुरुआती दौर में एक पिता परेशान होता है कि वह अपने दौर में खेल प्रतियोगिता में नेशनल से आगे नहीं बढ़ पाया और पेट भरने के लिए नौकरी भरी जिंदगी की शुरुआत करनी पड़ी। शादी होने के बाद वह अपने बेटों के लिए सपना देखने लगता है, पर लगातार तीन-तीन बेटियों के जन्म के बाद वह अपने सपने को बक्स में दबा कर रख देता है। पर एक दिन जब उन्हीं बेटियों के द्वारा दो लड़कों को पीट-पीट कर घायल कर देने की घटना उसके अंदर दबी इच्छा फिर से पंख फैलाने के लिए तैयार हो जाता है।  पिता जुट जाता है अपने सपने में। और इसमें पहले बेटियाँ विरोध करती है, पर जब उनकी समझ में आता है कि यह कदम कितना अच्छा है उसके लिए। तो वो भी जुट पड़ती है और कड़ी मेहनत कर नेशनल प्रतियोगिता में परचम लहरा लेती है। पर उसके बाद थोड़ी सी भटकन के बाद वह फिर अपने पिता और बहन की मदद के साथ इंटरनेशनल प्रतियोगिता में जीत का परचम लहरा लेती है। सबसे बड़ी बात है कि जीत हासिल करने के बाद भी लड़कियाँ अपने हरियाणा की भाषा में ही खुशियाँ व्यक्त करती है। यह फिल्म हरियाणा के रेसलर महावीर सिंह की है जिन्होंने लड़कर अपनी बेटियों को इंटरनेशनल में जीत हासिल करवाई थी। निर्देशक नितेश तिवारी ने बहुत ही अच्छी तरह से पूरी फिल्म को संजोया है और दर्शक को बांधे रखने में पूरी तरह कामयाब हुए हैं। एक समय लगान केवल आस्कर में शामिल ही हुई थी, अब तो ऐसा लगता है कि यह आस्कर लेकर ही आयेगी।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

महिलाओं के साथ छेड़छाड़ होते चुपचाप देखना कायरता है : कोहली

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भारतीय कप्तान विराट कोहली ने आज कहा कि नववर्ष की पूर्व संध्या पर बेंगलुरू की सड़कों पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ होते हुए खामोशी से देखने वालों को खुद को मर्द कहने का हक नहीं है और ऐसे समाज का हिस्सा होने से वह शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं ।

कोहली ने ट्विटर पर 94 सेकंड की दो वीडियो क्लिप में कहा ,‘‘ बेंगलुरू में जो हुआ, वह शर्मनाक था । लड़कियों के साथ ऐसी घटना होते देखना और लोगों का मूक दर्शक बनकर उसे देखना कायरता है । इन लोगों को खुद को मर्द कहने का हक नहीं है ।’’ उन्होंने कहा ,‘‘ मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं । भगवान ना करे यदि ऐसा कुछ आपके परिवार में किसी के साथ होता है तो आप खड़े रहकर देखेंगे या मदद करेंगे । ऐसी चीजें होती है क्योंकि लोग चुपचाप खड़े देखते रहते हैं और उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता । ’’ उन्होंने कहा ,‘‘ सिर्फ इसलिये कि उसने छोटे कपड़े पहने थे । यह उसकी जिंदगी और उसका फैसला है । पुरूषों का यह मानना कि उनके लिये यह छेड़छाड़ का मौका है और सत्तारूढ लोगों द्वारा इसका बचाव किया जाना भयावह है ।’’ कोहली ने कहा ,‘‘ असलियत यह है कि कुछ लोगों के दिमाग में यह है और कुछ हद तक यह स्वीकार्य है, यह काफी शर्मनाक और स्तब्ध करने वाला है । मैं ऐसे समाज का हिस्सा होकर शर्मसार हूं । हमें अपनी सोच बदलनी होगी । महिला और पुरूषों को एक नजर से देखना होगा । महिलाओं का सम्मान जरूरी है । अपने आपको उन हालात में रखकर सोचो कि यदि हम उन लड़कियों के परिजन होते तो कैसा महसूस करते ।’’

 

भारत के पहले सिख मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस खेहर

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जस्टिस जगदीश सिंह खेहर ने बुधवार को भारत के भारत के 44वें मुख्य न्यायाधीश के रुप में शपथ ली। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने बुधवार सुबह राष्ट्रपति भवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ दिलाई। इसके साथ ही जस्टिस खेहर भारत के पहले सिख मुख्य न्यायाधीश होंगे।

गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर सेवानिवृत हो गए। जस्‍टिस तीरथ सिंह ठाकुर ने अपने उत्‍तराधिकारी के रूप में जस्टिस खेहर को नामित किया था। जस्टिस खेहर का कार्यकाल 27 अगस्‍त, 2017 तक रहेंगा।

28 अगस्त 1952 में जन्मे न्यायमूर्ति खेहर ने वर्ष 1974 में चंडीगढ़ से स्नातक की डिग्री हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने एलएलएम भी किया। उन्होंने एलएलएम में प्रथम स्थान हासिल किया था।

वर्ष 1979 से उन्होंने वकालत की शुरुआत की। वह मुख्य तौर पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते थे। आठ फरवरी, 1999 में उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जज नियुक्त किया गया।

नवंबर, 2009 को वह उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए गए। इसके बाद वह कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। सितंबर, 2011 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने। मालूम हो कि न्यायमूर्ति खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने ही राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को निरस्त कर दिया था।

 

फ्लाइट्स में छेड़छाड़ से निपटने के लिए एयर इंडिया ने अपनाया ये अनोखा तरीका

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हवाई यात्रा के दौरान लगातार छेड़छाड़ की घटनाओं से परेशान एयर इंडिया ने नियम तोड़ने वाले यात्रियों के लिए प्लास्टिक की हथकड़ी फ्लाइट में ही रखने का फैसला लिया है। इस नए नियम के मुताबिक, अगर कोई यात्री फ्लाइट में सवार अन्य यात्री के साथ आपत्तिजनक व्यवहार करता है तो उसके हाथों में प्लास्टिक की हथकड़ी डालकर उसे रोका जा सकता है।

एयर इंडिया के चेयरपर्सन अश्विनी लोहानी के मुताबिक द टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है, ‘पहले सिर्फ इंटरनेशनल फ्लाइट्स में ही इस तरह के इंतजाम रखते थे। अब डोमेस्टिक फ्लाइट्स में भी प्लास्टिक की हथकड़ियां होंगी। सभी प्लेन में प्लास्टिक की दो हथकड़ियां होंगी। हम इससे समझौता नहीं कर सकते।’

बताते चलें कि एयर इंडिया का यह फैसला ऐसे मौके पर लिया है जब दो जनवरी को मस्कट से दिल्ली और मुंबई से न्यूयॉर्क में एयर होस्टेस से छेड़छाड़ का मामला सामने आए है।

रिपोर्ट में सीनियर अधिकारी के मुताबिक कहा गया है कि इन दिनों हवाई यात्रा के दौरान छेड़छाड़ की लगातार घटनाएं हो रही है। पायलट्स एयर होस्टेस और यात्रियों के यौन उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं कर सकते। ऐसे लोगों को लैंडिंग के बाद कानून के हवाले कर देते हैं।’

एयर इंडिया के केबिन क्रू मैनुअल के मुताबिक रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी यात्री को हथकड़ी लगाना आखिरी कदम है। ऐसा तब किया जाएगा जब चीजें बिल्कुल बेकाबू हो जाएं।

 

दिन था, मैंने फैशनेबल कपड़े नहीं पहने थे फिर भी…

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मंगलवार सुबह देश की राजधानी दिल्ली के एक पेट्रोल पंप पर एक आदमी ने मुझ पर हमला किया। वो आराम से आया और चला गया. पंप पर काम करने वाले फिर से पेट्रोल भरने लगे। मैं अकेले ही ख़ुद को, अपना फोन और टूटा हुआ चश्मा समेटने लगी. फिर पुलिस को फोन किया.

मेरी मदद के लिए कोई क्यों नहीं आया? मैंने तो कुछ नहीं किया था। मैं कोई जवान लड़की नहीं हूं। मैंने कोई फ़ैशनेबल कपड़े भी नहीं पहने थे. व़क्त भी सुबह का था। मैं पेट्रोल पंप पर अपनी कार में पेट्रोल भरे जाने के बाद उसका दरवाज़ा खोलकर उसमें बैठ रही थी कि अचानक दूसरी तरफ़ से वो आदमी अपनी स्कूटी पर आया और मेरे बैग समेत मुझसे खींचने लगा।

मैंने बैग वापस खींचा, हम दोनों गिर गए। उसने मुझे गाली दी और ‘रंडी’ बुलाया। जब मैंने विरोध किया उसने थप्पड़ और घूंसे मारे। मेरा चश्मा फेंका और तोड़ दिया।

आसपास के लोग देखते रहे. मानो ये सही था. मानो ‘रंडी’ कहकर उसने मुझे मारने-पीटने का परमिट हासिल कर लिया हो।रात को सड़कों पर निकलकर क्या कहना चाहती हैं ये औरतें?

मैंने उसके जैकेट का टोपा खींचकर हटाने की कोशिश की ताकि उसका चेहरा ठीक से देख सकूं तो उसने टोपा हटाया और मुझे धमकी दी. कहा कि ‘बाद में तने देख लूंगा’। फिर वो जितनी आसानी से आया था वैसे ही चला गया.

आख़िरकार ये सब देख रहा एक आदमी आया और पेट्रोल पंप के लोगों को डांटते हुए पूछने लगा कि उन्होंने उस आदमी को रोका क्यों नहीं? तो उसी से वे उल्टा पूछने लगे, “आप इनके क्या लगते हो?” यानी अगर किसी औरत से रिश्ता न हो तो एक अनजान आदमी उसकी मदद की पेशकश नहीं कर सकता!

पर रिश्ता होना भी ख़तरे से ख़ाली नहीं. जब मैंने ‘दर्शकों’ से पूछा कि मैं जब चिल्ला रही थी कि उस आदमी की स्कूटी का नंबर नोट कर लो, तो आपने क्यों नहीं किया? एक आदमी बोले, “हमने सोचा वो आपका पति है।”

यानी पति, ब्वायफ्रेंड, पिता और भाई अगर किसी औरत से मारपीट करें तो उन्हें करने दिया जाए! चाहे वो सार्वजनिक जगह हो। शायद इसी सोच के चलते पिछले साल कई औरतों का पीछा कर सड़कों पर उनकी हत्या कर दी गई. हत्या उन लोगों ने की जो महिला से रिश्ते का दावा करते थे, और लोग तमाशबीन बने रहे।

मानो रिश्ते ने भी मारने का परमिट दे दिया। सुरक्षा क्या है? उस पेट्रोल पंप पर लगे चार में से तीन कैमरे काम नहीं कर रहे थे. वो आदमी पंप पर इतनी देर था पर जो कैमरा चल रहा था उसमें सिर्फ़ हमला दिखता है, उसका चेहरा नहीं।

ऐसी तकनीक किस काम की? जिसमें कैद तस्वीरें एक औरत को असहाय दिखा रही है, मानो उसे पीटकर समाज ने उसे उसका दर्जा दिखाया हो। वैसे भी तकनीक चाहे जितनी अच्छी हो, समाज का बदलना ज़्यादा ज़रूरी है.

तब तक यह बहुत ज़रूरी है कि, नेता औरतों के ख़िलाफ़ बयान देना बंद करें, पुलिस सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करे और सरकार सुरक्षा के लिए ठोस नीतियां बनायें। मेरे दोस्तों की मदद से आखिरकार मेरे मामले में एफ़आईआर तो हो गई, मेरी चोटें भी ठीक हो जाएंगी, लड़ने से मन का डर भी ख़त्म हुआ।

पर यही बात ख़टक रही है कि अगर बच्चे महिलाओं की ओर हिंसा को सही ठहराने वाली यही सब बातें देखते-सुनते बड़े हुए तो ये कितना बीमार समाज बन जाएगा इसीलिए इस नज़रिए और व्यवहार के खिलाफ आन्दोलन ज़रूरी है।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)