Tuesday, March 24, 2026
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76 साल बाद सड़क पर दौड़ी नेताजी की कार

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बुधवार को उस जर्मन कार को रवाना किया, जिससे अंग्रेजों को चकमा देकर नेताजी नेताजी सुभाष चंद्र बोस नजरबंदी से 1941 में निकलने में सफल रहे थे. नेताजी ने इस कार का इस्तेमाल गोमो स्टेशन तक दिल्ली की ट्रेन पकड़ने के लिए किया था।हाल ही में मरम्मत के बाद कार को रवाना करने से पहले राष्ट्रपति ने कुछ दूरी तक कार की सवारी भी की। रवाना करने से पहले राष्ट्रपति ने कार पर तिरंगा झंडा भी लगाया। कार का नंबर ‘ऑडी वांडरर डब्ल्यू 24’ है।

नेताजी के महानिष्क्रमण की 76वीं वर्षगांठ और नेताजी रिसर्च ब्यूरो का 60वां स्थापना वर्ष मनाया गया। इस दौरान पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी और नेताजी के पोते एवं तृणमूल कांग्रेस सांसद सुगत बोस भी मौजूद थे।

कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा, ‘कार को नया रूप देने के लिए मैं कृष्णा बोस और अन्य सदस्यों को बधाई देता हूं.’ बता दें कि नेताजी के नजरबंदी से भागने की घटना को ‘महानिष्क्रमण’ का नाम दिया गया है।

 

14 साल के लड़के के ड्रोन प्रोजेक्ट में पांच करोड़ का निवेश

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लड़ाई के मैदान में बारूदी सुरंग का पता लगाने वाले ड्रोन को तैयार करने के लिए गुजरात सरकार की ओर से पांच करोड़ रुपए की मदद दी जाएगी। इस ड्रोन को विकसित करने वाले 14 साल के हर्षवर्धन जाला के साथ गुजरात काउंसिल ऑन साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने यह डील साइन की है।

अहमदाबाद में हुए वाइब्रेंट गुजरात समिट में इस प्रस्ताव को लेकर मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर साइन किया गया है गुजरात के रहने वाले हर्षवर्धन जाला दसवीं क्लास के छात्र हैं। उन्हें इस ड्रोन को बनाने का आइडिया टीवी में आने वाली ख़बर को देखकर आया।

उन्होंने बीबीसी को बताया, “मैंने जब टीवी पर फ़ौज के लोगों को बारूदी सुरंग के कारण मरते हुए देखा तो पहली बार मेरे दिमाग़ में इस तरह के ड्रोन का आइडिया आया।”

उन्होंने कहा, ”मैंने इसके बाद इस पर रिसर्च किया। अभी जो माइन डिटेक्टर बारूदी सुरंग को जांचने के लिए इस्तेमाल किया जाता था वो सुरक्षित नहीं है और न ही वह सही तरीके से काम करता है।.”

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हर्षवर्धन का दावा है कि उन्होंने ड्रोन बनाने में जिस तकनीक का इस्तेमाल किया है वो उनकी ख़ुद की बनाई हुई है।

हर्षवर्धन बताते हैं, “मेरी छह कोशिशें नाकाम रही हैं और सातवीं बार में कामयाबी मिली। पिछले साल फ़रवरी-मार्च में इसे बनाने में मुझे कामयाबी मिली है, लेकिन इस साल अप्रैल-मई तक पूरी तरह से विकसित किया जाएगा. इसमें अभी हम और भी ख़ूबियां डालने वाले हैं।”

हर्षवर्धन के पिता एक अकाउटेंट हैं और उन्होंने अपनी कंपनी एयरोबैटिक्स-7 शुरू की है। ऐसे ही और गैजेट्स बनाने की उनकी कंपनी की योजना है।

गुजरात काउंसिल ऑन साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रमुख नरोत्तम साहू ने बताया, “डेमो देखने के बाद हमें हर्षवर्धन के प्रस्ताव में संभावनाएं नज़र आई हैं इसलिए हमने उनकी योजना पर काम करने का फ़ैसला लिया है। उनका यह ड्रोन 100 मीटर के दायरे में 50 फ़ुट की ऊंचाई से बारूदी सुरंग का पता लगाने में सक्षम होगा। ”

हर्षवर्धन ने बताया कि सरकार ने फ़ाइनल प्रारूप को बनाने में भी उन्हें तीन लाख की मदद दी थी।

 

#IamBrandBihar – बिहार और बिहारियों के बारे में हमारी सोच को बदलने की एक मुहिम !

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फिल्म “ उड़ता पंजाब” में बिहार की जो छवि दिखाई गयी है, वो छवि पूरे बिहार का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है। भारत के हर हिस्से में विविधता है और आप किसी एक व्यक्ति को उस हिस्से की छवि नहीं मान सकते। इसी बात को कहने के लिए और बिहार की छवि को एक नयी परिभाषा देने के लिए बंगलुरु के रहने वाले २५ वर्षीय छात्र, बशर हबीबुल्लाह ने एक ऑनलाइन मुहिम छेडी है।

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इस मुहिम की शुरुआत २२ तस्वीरों से हुई थी जिनमे अलग अलग पेशे के लोगों ने अपने हाथ में #IamBrandBihar की तख्ती ले रखी थी। धीरे धीरे ये कारवां बड़ा होता गया और अधिक लोग इसमें जुड़ते गये जिसमे ‘सुपर 30’ के संचालक आनंद, कार्टूनिस्ट पवन टून, आई पी एस अफसर विकास वैभव भी शामिल हैं।

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ये मुहिम अपने शुरू होने के १० दिनों के अन्दर ही वायरल हो गयी है। इसे सोशल मीडिया पर दिल खोल के स्वीकारा गया है और हज़ारों शेयर्स और लाखों लाइक्स मिले हैं। इन सब की शुरुआत तब हुई थी जब उड़ता पंजाब का ट्रेलर देखने के बाद एक लेखिका स्वाति कुमारी जो की पटना बीट्स के लिए लिखती हैं ने आलिया भट्ट के नाम खुला ख़त लिखा था। पटना बीट्स एक वेबसाइट है जो बिहार की सही छवि को सामने लाने में प्रयासरत है। इसके बाद उन्होंने अपने मित्र हबीबुल्लाह के साथ मिल कर इस मुहिम को अंजाम दिया।

बिहार के युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा देश के विभिन्न हिस्सों में बेहतर शिक्षा और नौकरी में अवसरों की तलाश में निकल पड़ता है और अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा दुसरे राज्यों में बिता देता है।

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दुसरे राज्यों में रहने के दौरान उन्हें बिहार के बारे में जो कुछ सुनने को मिलता है उसके बाद वो अपनी पहचान छुपाने में ही भलाई समझते हैं। वो जहाँ रहते है वहां की वेशभूषा और बोलचाल में ढल जातें है। इसी तरह भोजपुरी को बिहारी भाषा समझा जाता है जबकि बिहार में और भी कई भाषाएँ बोली जाती हैं जैसे मैथिली, अवधी और मगही ।

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इस मुहिम की सफलता इस बात को साफ़ जाहिर करती है कि प्रवासी बिहारी अब बिहार की देश भर में व्याप्त छवि को बदल देना चाहते हैं और अब खुल कर सामने आना चाहते हैं। इन तस्वीरों में ये बिहारी ऐसा ही कुछ कह रहे हैं –

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हम उम्मीद करते हैं इसके बाद बिहार को लेकर पूरे देश की सोच जरुर बदलेगी।

(साभार – द बेटर इंडिया)

‘साहित्यिकी’ ने गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ का जन्म-शतवार्षिकी-पर्व मनाया

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‘साहित्यिकी’ संस्था के तत्वावधान में मासिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसका शुभारम्भ नगर के प्रतिष्ठित कवि श्री नवल ने सुषमा हंस तथा रेशमी पांडा मुखर्जी द्वारा संपादित ‘साहित्यिकी’ पत्रिका के २६वें अंक के लोकार्पण से किया। गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ के जन्म-शतवार्षिकी-पर्व पर केन्द्रित इस संगोष्ठी में किरण सिपानी ने सबका स्वागत किया। उषा श्रॉफ ने ‘मुक्तिबोध’ की कविता ‘मुझे कदम-कदम पर’, वसुंधरा मिश्र ने ‘अंधेरे में’, सुषमा हंस ने ‘मैं तुम लोगों से दूर हूँ’ कविताओं की आवृत्ति की तथा विद्या भंडारी ने ‘तू और मैं’, गीत की सुरबद्ध प्रस्तुति की। प्रमुख वक्ता प्रो. रेखा सिंह ने ‘मुक्तिबोध’ की मानसिक बुनावट की पड़ताल करते हुए रेखांकित किया कि उनकी कविताओ में ‘अस्मिता की पहचान’ की नहीं वरन् मानवीय चेतना के पहचान और बचाव की तड़प दिखाई देती है। ‘मुक्तिबोध’ को विलक्षण रचनाकार बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि उनमें विरोधाभास बहुत ही कम है  इसीलिए वे इतने खास और प्रासंगिक हैं। पूनम पाठक ने कहा कि ‘मुक्तिबोध’ सदैव उसी ईमानदारी की अपेक्षा करते दिखाई देते हैं, जो उन्होंने स्वयं रचनात्मक स्तर पर बरती है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कुसुम जैन ने कहा कि अपना उपनाम ‘मुक्तिबोध’ रखने वाले रचनाकार ने ‘सर्व’ की मुक्ति में ही ‘स्व’ की मुक्ति स्वीकार की। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए गीता दूबे ने कात्यायनी की कविता  ‘मुक्तिबोध के लिए’ की आवृत्ति भी की। धन्यवाद ज्ञापन वाणीश्री बाजोरिया ने किया। संस्था की सदस्याओं के अतिरिक्त इतु सिंह, आदित्य गिरि ,बालेश्वर राय, प्रीति साव आदि भी कार्यक्रम में उपस्थित थे।

सर्दियों में करें होंठों की हिफाजत

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सर्दियां आते ही ज्यादातर लोगों की त्वचा रूखी होने लग जाती है। त्वचा की नमी कहीं खो सी जाती है और त्वचा रूखी-बेजान नजर आने लगती है। त्वचा के साथ ही हमारे होंठ भी फटने शुरू हो जाते हैं.।कई बार ये समस्या इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि होंठों से खून भी आना शुरू हो जाता है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम अपनी त्वचा को लेकर फिक्रमंद रहें ताकि वो हमेशा खूबसूरत और जवां बनी रहे।

सर्दियों में त्वचा को ज्यादा से ज्यादा नमी की जरूरत होती है. ऐसे में आप चाहें तो ग्लिसरीन का इस्तेमाल कर सकती हैं। यह एक कुदरती लिप बाम भी है।

आप चाहें तो ग्ल‍िसरीन को बाम की तरह लगा सकती हैं। इसके अलावा इसे दूध, शहद या गुलाब जल के साथ मिलाकर भी लगाया जाता है।

सर्दियों में शुष्‍क हवाओं के कारण होठ सूख जाते हैं और फटने लग जाते हैं। होठों पर ग्ल‍िसरीन के इस्तेमाल से होंठ मुलायम बनते हैं जिससे फटने की समस्या भी नहीं होने पाती है।

 अगर आपके होंठों पर दाग-धब्बे हैं और ये काले पड़ चुके हैं तो भी ग्ल‍िसरीन का इस्तेमाल करना फायदेमंद रहता है. कई बार धूम्रपान करने के कारण लोगों के होंठ काले पड़ जाते हैं. ऐसी स्थिति में भी ग्ल‍िसरीन का इस्तेमाल करना फायदेमंद रहता है.

 सर्दियों में हवाओं के प्रभाव से होंठो की ऊपरी परत सूख जाती है और पपड़ी बन जाती है. ऐसे में ग्लसिरीन का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है।

अगर आपके होंठ कहीं से कट गए हों या फिर अगर उनमें किसी तरह का घाव बन गया हो तो भी ग्ल‍िसरीन का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है।

होंठों के लिए ग्ल‍िसरीन एक पोषक तत्व की तरह काम करता है, जिससे होंठों को नमी मिलती है।

 

समय के साथ संगीत बदल जाएगा: गुलजार

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प्रख्यात गीतकार-फिल्मकारर गुलजार का मानना है कि समय के साथ बदलते फिल्मी संगीत में कुछ भी गलत नहीं है और व्यक्ति को इसे अपनाना चाहिए और इसे आत्मसात करना सीखना चाहिए।

उनका कहना है कि किसी फिल्म में किरदार के मिजाज के मुताबिक गाने लिखे जाते हैं और इन गानों की तुलना 50 और 60 के दशक के गानों से करना अनुचित है।
उन्होंने कहा, ‘‘ गाने उस फिल्म के मुताबिक होंगे। यदि कोई किरदार शराब के नशे वाला कोई गाना गाना चाहता है तो वह ‘दिल ए नादान.’ नहीं गाएगा, बल्कि ‘गोली मार भेजे में’ गाना गाएगा। किरदारों के मुताबिक भाषा बदलती है।’’ गुलजार ने कहा, ‘‘ समय बदलेगा और संगीत भी। हमारी रफ्तार बदली है, कपड़े बदले हैं, खाने की आदतें बदली हैं तो संगीत जस का तस क्यों रहना चाहिए? वह भी बदलेगा।

विश्व की ज्यादातर आबादी ‘मोटापे’ का शिकार है

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एक नये शोध के मुताबिक एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया है कि विश्व की 76 प्रतिशत आबादी यानी करीब 5 . 5 अरब लोग मोटापे के शिकार हैं। शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि यह धीरे-धीरे विकराल रूप लेता जा रहा है। इसके साथ ही इससे जटिल व पाचन संबंधी गंभीर बीमारियों के खिलाफ वैश्विक स्वास्थ्य प्रयासों में अब बदलाव करने की अपील की है।

शोधकर्ताओं ने मोटापे के पीछे की एक विशिष्ट धारणा को रेखांकित किया है कि जरूरत से ज्यादा वसा होने से स्वास्थ्य पर काफी बुरा असर पड़ता है। इस शोध में न्यूजीलैंड के ऑकलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ता भी शामिल हैं।
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार यह बात सामने आयी है कि अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या में हुई वृद्धि ने इसको मोटापे की उस श्रेणी में डाल दिया जिसमें सामान्य वजन के लोग भी शामिल हैं।

इसके मुख्य अध्ययनकर्ता और ऑस्ट्रेलिया के मैफ फिटनेस प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ फिलिप मैफेटोन ने कहा, ‘‘मोटापे के इस विकराल रूप ने उन लोगों को भी अपने आगोश में ले लिया है जो लोग व्यायाम करते हैं और यहां तक कि वे लोग भी जो खेलों में काफी अच्छे हंै।’’ मैफेटोन ने बताया, ‘‘मोटापे की इस श्रेणी में सामान्य वजन के लोग भी शामिल हैं जिससे जटिल बीमारियों के लिए खतरा और बढ़ गया है। यह खतरा ज्यादा मोटे लोगों के साथ-साथ उनके लिए भी है जिनको सामान्य वजन का समझा जाता है।’’ पिछले तीन से चार दशकों में मोटापे का यह भयावह चेहरा काफी हद तक बढ़ गया है जिससे ज्यादातर लोग अस्वस्थ होने की कगार पर हैं।

मैफेटोन ने बताया कि हमलोग इन खतरनाक कारकों में हो रहे इजाफे को लेकर जागरूकता फैलाना चाहते हैं, जहां ‘ओवरफैट’ और ‘अंडरफैट’ शब्दावलियों को नये सिरे से व्याख्या की जाएगी। हम उम्मीद करते हैं कि यह शब्दावली आम प्रयोगों में शामिल होगी जिससे विश्व स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार करने में मदद मिलेगी।

चार साल की बच्ची बनी लाइब्रेरियन, दो साल में पढ़ चुकी है हजार किताबें

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चार साल की लड़की डालिया अराना की उपलब्धियों के बारे में सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। दरअसल जॉर्जिया की डालिया 1,000 से ज्यादा किताबें पढ़ चुकी है और उसकी इस उपलब्धि के कारण उसे दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी ‘यूएस लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ में एक दिन के लिए लाइब्रेरियन बनाया गया। कार्ला ने डालिया के साथ की अपनी तस्वीरें भी ट्वीट की हैं और लिखा है, ‘एक दिन की लाइब्रेरियन डालिया मैरी अराना के साथ काम करना काफी मजेदार रहा. उसने अभी ही 1,000 से ज्यादा किताबें पढ़ ली है।’डालिया ने एक दिन का कार्यभार वहां की लाइब्रेरियन कार्ला हेडन के साथ संभाला. कार्ला और डालिया ने साथ में मीटिंग्स की। दोनों लाइब्रेरी के स्टाफ से भी मिले और वहां के हॉल का भी जायजा लिया. डालिया ने लाइब्रेरी में व्हाइटबोर्ड भी लगाने का सुझाव दिया, जिससे बच्चे वहां लिखने का अभ्यास कर सकें। डालिया ने पहली किताब दो साल की उम्र में पढ़ी थी। यह देखकर उसकी मां ने उसे एक ऐसे प्रोग्राम में दाखिला दिला दिया। था, जो बच्चों को किताबें पढ़ने कि लिए प्रोत्साहित करता है और यह भी ट्रैक रखता है कि बच्चे ने कितनी किताबें पढ़ ली हैं। डालिया की मां ने ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ को डालिया की उपलब्धियों के बारे में लिखा। लाइब्रेरी ने डालिया के पूरे परिवार को लाइब्रेरी बुलाया और डालिया को एक दिन का लाइब्रेरियन बनाने का प्रस्ताव रखा।

अमाल मलिक ने कहा, ‘अवॉर्ड जाए भाड़ में’

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बॉलीवुड में दिए जाने वाले अवॉर्ड्स की साख को लेकर सवाल उठना कोई नहीं बात नहीं है। इस बार के फिल्मफेयर अवॉर्ड में झंडा गाड़ने वाली फिल्म ‘दंगल’ के लीड हीरो आमिर खान अतीत में नेशनल अवॉर्ड्स के अलावा दूसरे अवॉर्ड समारोह में शिरकत नहीं करने की बात कह चुके हैं। इस बार विरोध का बिगुल गायक और संगीतकार अमाल मलिक ने बजाया है। एक फिल्म अवॉर्ड समारोह में नॉमिनेशन के तौर तरीकों को लेकर अमाल मलिक ने अपनी नाराजगी का इज़हार फेसबुक पर किया हलांकि उन्होंने अवॉर्ड समारोह का नाम नहीं लिया।

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अमाल ने अपने फेसबुक पोस्ट में ज्यूरी की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं। अमाल ने ऐसी कई फिल्मों और कलाकारों का हवाला दिया है जिन्हें उनके मुताबिक नॉमिनेशन मिलना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

बड़े सितारों के बच्चों को दिए गए ‘न्यू कमर अवॉर्ड्स’ को लेकर अमाल नाराज दिखे। उनका कहना है कि ‘न्यू कमर अवॉर्ड्स’ वैसे लोगों को भी दिए गए हैं जिनके काम को किसी ने देखा तक नहीं है। अपने फेसबुक पोस्ट के आखिर में अमाल ने कहा है, “अवॉर्ड गया भाड़ में यार… लोगों को उनकी प्रतिभा और काम के आधार पर नॉमिनेट किया जाना चाहिए।.”

अमाल इस बात का भी अंदेशा जताते हैं कि इस फेसबुक पोस्ट के बाद उन्हें जीवन में शायद दोबारा कोई नॉमिनेशन नहीं मिले।

 

‘दंगल’ को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं छोटे परदे की पार्वती

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छोटे परदे की बेहतरीन एक्ट्रेस में शुमार साक्षी तंवर इन दिनों फिल्म ‘दंगल’ को लेकर सुर्खियों में हैं। कारण कि साक्षी ने भी फिल्म में छोटा मगर महत्वपूर्ण रोल किया है। पहलवान महावीर सिंह फोगाट पर केंद्रित इस फिल्म में आमिर खान ने लीड रोल निभाया है। फिल्म में साक्षी ने आमिर की पत्नी दया कौर का किरदार निभाया है।

कम ही लोग जानते हैं कि साक्षी ने अपना करियर दूरदर्शन से शुरू किया था। इतना ही नहीं साक्षी भी एक ब्यूटी कांटेस्ट का हिस्सा रह चुकी हैं। उन्हें एक टाइटल भी दिया गया था। साक्षी के करियर में ‘कहानी घर-घर की’ और ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ बड़े टीवी शो माने जाते हैं। यह शो न सिर्फ बहुत ज्यादा समय तक लोकप्रिय रहे बल्कि इनके लिए साक्षी को सम्मान भी मिला।

साक्षी ने टीवी जगत में लगातार चार सालों तक शो ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड जीता है। शो में साक्षी के किरदार का नाम ‘प्रिया’ था। जबकि ‘कहानी घर-घर की’ में साक्षी के किरदार का नाम ‘पार्वती अग्रवाल’ था। दोनों ही किरदारों से साक्षी ने घर-घर में अपनी पहचान बना ली है। साक्षी शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ पर भी नजर आ चुकी हैं।

साक्षी तंवर का नाम उन एक्ट्रेस में शुमार हैं जिन्होंने टीवी पर पहली बार न सिर्फ बोल्ड सीन दिया बल्कि अपने को-स्टार को ‘किस’ भी किया। एक्टर राम कपूर और साक्षी तंवर के बीच फिल्माया गया यह सीन टीवी जगत के गलियारों में खासा चर्चित रहा था। शो ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ का निर्माण एकता कपूर की कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स ने किया था।