Tuesday, September 29, 2026
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बनारस की ये महिलाएं ला रही हैं हजारों किसानों के चेहरे पर खुशी

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हर साल गरीबी, कर्ज, सूखे की मार से सैकड़ों किसान आत्महत्या कर लेते हैं। उनकी मौत पर संसद में शोर-शराबा होता है, हम-आप सोशल मीडिया पर शोक मना लेते हैं और किसानों के हालात जस के तस बने रहते हैं। लेकिन बनारस की कुछ महिलाओं ने सिर्फ दुख न जताकर किसानों के लिए कुछ करके दिखाया है। हाईब्रीड बीजों, रासायनिक दवाओं व उर्वरकों के दामों में बेतहाशा वृद्धि और महंगाई की मार को कम करने के लिए महिलाओं ने ‘अपना बीज बैंक’ बना डाला। किसानों की मदद के लिए महिलाओं ने ये बैंक शुरू किया है। इस बीज बैंक में देसी प्रजाति के सभी प्रकार के फल, सब्जी, अनाज, दलहनी और तिलहनी आदि उन्नतशील बीजों का संग्रह है। बीज बैंक से किसान बीज विनिमय के माध्यम से बिना पैसे के बीज प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसे काम करता है ये बैंक – ‘अपना बीज बैंक’ की खासियत ये है कि कोई भी किसान बैंक सदस्य बनकर मुफ्त में बीज प्राप्त कर सकता है। इसके लिए किसान को बदले में दूसरी प्रजाति का बीज बैंक में जमा करना होता है या फसल तैयार होने के बाद किसान को बीज के एवज में बीज देना पड़ता है।

बैंक के माध्यम से किसानों को हाईब्रीड, नपुंसक बीजों, रासायनिक दवाओं और रासायनिक उर्वरकों से ज़मीन, पानी और स्वास्थ्य आदि पर पड़ रहे बुरे प्रभाव बताकर जागरूक भी किया जाता है। किसानों को जैविक खेती, प्राकृतिक खेती जैसी कम लागत वाली खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस बीज बैंक के खुलने से किसान बहुत खुश हैं। बीज बैंक के खुलने से गांव के किसानों के चेहरे खिल गए हैं। किसानों का मानना है, कि ‘जो बीज हम बाजार से महंगे दामों पर खरीदते थे, वो जल्द ही खराब हो जाते थे। अब इस बैंक के माध्यम से हमें मुफ्त में बेहतर बीज मिलेंगे, जिससे हमारी खेती को नया आयाम मिलेगा और हमारी जिंदगी बदल जाएगी।’

महिलाएं चलाती हैं ‘अपना बीज बैंक’ – अपना बीज बैंक का संचालन महिला किसान समूह करता है। उन सबने खुद के जुटाए हुए पैसों से ये बैंक तैयार किया है। लोगों ने गांव की भलाई के लिए दुकान के लिए जगह दे दी थी। बैंक की नींव रखने वाली अनीता के मुताबिक, ‘किसानों की समस्या को ध्यान में रखकर इस बैंक को खोला गया है। इस बीज बैंक में भारतीय देसी प्रजाति के सभी फल, सब्जी, अनाज, दलहनी और तिलहनी वगैरह की उन्नतशील बीजों का संग्रह रहता है।’ अपने आप में अनोखा ये बीज बैंक फिलहाल किसानों के सामने खड़ी बीज समस्या का समाधान करेगा। खेती लगातार महंगे होते बीज के चलते बढ़ रही है, जिससे लागत को कम करने में इससे काफी मदद मिलेगी। दूसरी ओर उन्नतशील देसी बीज से पैदा अनाज, दालें और सब्जियां स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी लाभदायक होंगी।

गरीब बच्चों को आईएएस की तैयारी कराने के लिए एक किसान ने दान कर दी अपनी 32 करोड़ की सम्पत्ति

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आईएएस बनने का सपना जितना बड़ा और आकर्षक है उतना ही मुश्किल भी। सही से तैयारी करने के लिए कोचिंग से लेकर किताबें और किसी बड़े शहर में रहकर पढ़ाई करने में काफी पैसे खर्च हो जाते हैं। ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को आईएएस की तैयारी करने में तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

उस खास वर्ग के उन बच्चों की मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए ही महाराष्ट्र के एक किसान ने अपनी 32 करोड़ की कीमत वाली सम्पत्ति दान कर दी। श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट IAS की तैयारी कराने के लिए एक अकेडमी बनाना चाहता है, ऐसे में वसई के रहने वाले काशीनाथ पाटिल ने इसके लिए अपनी दो इमारतें (जिनकी कीमत 32 करोड़ रुपये हैं) दान में दे दी हैं। शिरडी के पास एक कस्बे में स्थित ये अकादमी बच्चों को आईएएस बनाने के लिए तैयार करेगी।

काशीनाथ गोविंद पाटिल साईं बाबा के बहुत बड़े भक्त हैं। वे शिरडी साईं बाबा के दर्शन के लिए आने वाले लोगों के लिए मुंबई-शिरडी रूट पर रहने की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। हालांकि पाटिल ने अपनी बिल्डिंग ट्रस्ट को फ्री में दी है, लेकिन ट्रस्ट को इसके लिए लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की स्टांप ड्यूटी भरनी पड़ी।

इस प्रोजेक्ट की देख रेख करने वाले और ट्रस्ट के अध्यक्ष सुरेश हावड़े अपनी योजनाओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं, कि ‘ये अकेडमी गरीब बच्चों को फ्री में ट्रेनिंग और गाइडेंस उपलब्ध करायेगी। बच्चों को पढ़ाने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए रिटायर आईएएस अधिकारी आएंगे।’ साथ ही उन्होंने ये भी कहा, कि ‘मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में उत्तर महाराष्ट्र से भी कई बच्चे आईएएस की लिस्ट में अपनी जगह बनाएंगे।’

भारत में आईएएस के एग्जाम को सबसे कठिन एग्ज़ाम माना जाता है। सिविल सर्विस की परीक्षा तीन चरणों में होती है, प्री, मेंस और इंटरव्यू। इसकी कठिनाई का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि सिर्फ प्री एग्ज़ाम में 95 प्रतिशत से अधिक छात्र असफल करार दिये जाते हैं और जो बचते हैं, वे ही आगे के एग्ज़ाम्स में बैठ पाते हैं।

ऑफिस में काम करने वाले सीखें हाई बीपी को काबू करने के तरीके

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ऑफिस में जॉब करने वालों को वैसे तो अनेको बीमारियां हो जाती हैं लेकिन उनमें से हाई बीपी की समस्‍या और भी ज्‍यादा लोंगो को होती है। अगर आपको भी हाई बीपी की समस्‍या है, तो दवाइयों पर निर्भर ना रह कर अपनी लाइफस्‍टाइल में चेंज कीजिये। इससे आपकी दवाइयों का खर्च घटेगा और धीरे धीरे आप दवायों का सेवन करना भी बंद कर देंगे।

अगर ऑफिस वाले हैं तो अब ऑफिस का बहाना मत दीजिये क्‍योंकि हाई बीपी बहुत खतरनाक बीमारी है। आज हम उन लोंगो के लिये टिप्‍स लाए हैं, जिन्‍हें हाई बीपी है और वे ऑफिस में काम करते हैं। लिफ्ट की जगह करें सीढ़ियों का प्रयोग सीढ़ियां चढ़ने से आपके शरीर का ब्‍लड सर्कुलेशन ठीक होगा और लगे हाथों आपकी एक्‍सरसाइज भी हो जाएगी। इससे दिल भी स्‍वस्‍थ रहेगा लेकिन हां, अगर सीने में दर्द शुरु हो जाए या सांस फूलने लगे, तो अपने डॉक्‍टर को जरुर दिखाएं।

कॉफी ज्‍यादा ना पिएं ऑफिस में थकान और आलस को दूर करने के लिये ज्‍यादा कॉफी पा पिएं। इससे आपका ब्‍लड प्रेशर बढ़ेगा। जिनको हाई बीपी की समस्‍या है उन्‍हें लंबे समय तक बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। इसकी जगह पर ग्रीन टी पिएं।  बाहर का खाना ऑर्डर ना करें ऑफिस में बाहर की जगह घर पर खाना लाएं।

घर के खाने में कम नमक, तेल और प्रिजर्वेटिव्‍स होते हैं। साथ ही अपने लंच बॉक्‍स में ढेर सारे फल और सब्‍जियां पैक करें, जिसे आप शामा को स्‍नैक के तौर पर खा सकते हैं। डेस्‍क से थोडी-थोड़ी देर पर उठें लंबे समय तक सीट पर ना बैठें और एक आधे घंटे पर उठ कर टहलें। लंबे समय तक बैठे रहने से मेटाबॉलिज्‍म घटता है और मोटापा, हाई बीपी और मधुमेह की बीमारियां होती हैं।

प्रेशर और स्‍ट्रेस से दूर रहें काम का बोझ ज्‍यादा ना लें, प्रेशर आने पर सीट से उठ कर कुछ देर टहलें या अपने दोस्‍तों से इस बारे में बात करें। काम में प्रेशर तो आएगा ही लेकिन इसे हैंडल करने का तरीका भी आपको ही सीखना होगा।

इजरायली नर्स ने फिलिस्तीनी बच्चे को कराया स्तनपान

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पूरी दुनिया जानती है कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच किस हद तक दुश्मनी हैं. दोनों देश एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने का एक भी मौका नहीं गंवाते हैं, लेकिन इस बार एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे जानकर लोग हैरत जताने के साथ भावुक हो रहे हैं. दरअसल, इन दिनों सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रही हैं, जिसमें इजरायली की एक नर्स फिलिस्तीनी महिला की कोख से पैदा हुए नवजात को स्तनपान करा रही है. मानवता की मिसाल पेश करती इस तस्वीर की दुनिया भर में चर्चा हो रही है. जिस किसी की भी इसपर नजर पड़ रही है वह हैरानी के जताने के साथ यह भी लिख रहे हैं, ‘दुनिया में इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं है, सदैव इसकी जीत होती है.’

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सड़क दुर्घटना में फिलिस्तीनी महिला बुरी तरीके से घायल हो गई थी और उसके पति की मौत हो गई थी. महिला को इजरायल के करीम अस्पताल में भर्ती कराया है. उसके बच्चे को भूख के मारे बिलखता देख इजरायली नर्स का कलेजा पसीज गया. उसने बच्चे को गोद में उठाया और स्तनपान कराने लगी. इंसानियत की मिसाल पेश करने वाली यहूदी नर्स का नाम उला ओस्‍ट्रोवस्‍की-जक है।

इजरायली नर्स ने पहले करीब सात घंटे तक बच्चे को बोतल से दूध पिलाने की कोशिश की, लेकिन उसने रोना बंद नहीं किया. इसके बाद उसने स्तनपान कराने का फैसला लिया।

नर्स ने कहा, ‘उसकी (बच्‍चे की) मौसी बेहद हैरान थी कि एक यहूदी कैसे दूध पिलाने को तैयार हो गई, मगर मैंने उनसे कहा कि हर मां यही करेगी।’ अपनी शिफ्ट के दौरान नर्स ने नवजात को पांच बार स्‍तनपान कराया और जब परिवार इस बात को लेकर चिंतित था कि नर्स के जाने के बाद क्‍या होगा, तो उला ने उसका भी बंदोबस्‍त किया। नर्स ने एक फेसबुक ग्रुप पर पोस्ट लिखी, जिसपर हजारों जवाब आए और कई महिलाओं ने आकर बच्‍चे को खिलाने के लिए कॉल किया। यह तस्‍वीर सोशल मीडिया पर हजारों बार शेयर की गई है।
मालूम हो कि इजरायल की स्थापना 1948 में हुई थी। इससे पहले इजरायल देश का कोई अस्तित्व नहीं था। यहां मूल रूप से फिलिस्तीनी निवास करते थे। 1947 में संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली ने अंतरराष्ट्रीय देख-रेख में फिलिस्तीन को एक स्वायत्त येरुशलम के साथ यहूदी स्टेट और अरब स्टेट में बांटने के लिए वोट दिया था, जिसके बाद इसकी स्थापना हुई। पिछले 60 साल से दोनों देशों के बीच इसी वजह से लगातार झगड़े होते आ रहे हैं.

 

 

पांच वक्त के नमाजी कृष्ण भक्त अब्दुल बोलते हैं श्रीराम

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घर में वो गीता, कुरान रखता है, जुबां पर राधे-राधे नाम रखता है
गफ्फार तो सांवरे का दीवाना है, वो इंसानियत से काम रखता है॥

सियासत है, जिसने हिंदू-मुस्लिम बीच दीवार खड़ी की। धर्म के ठेकेदारों ने कभी इस खाई को पटने नहीं दिया। ऐसे लोगों को आगरा की टेढ़ी बगिया के अब्दुल गफ्फार आइना दिखाते हैं।

43 साल के गफ्फार का ताल्लुकात भले ही उनका इस्लाम से है, लेकिन सांवरे से प्रीत की डोर ऐसी बंधी कि मुख से श्रीराधे-श्रीराधे ही निकलता। अब्दुल गफ्फार वक्त मिलते ही श्रीमद् भागवत कथा, गीता, रामचरित मानस का पाठ करते हैं। उन्होंने इस्लाम से नाता नहीं तोड़ा है, वो पांचों वक्त के नमाजी हैं।

गफ्फार कहते हैं कि सात साल पहले मथुरा में एक हिंदू मित्र की शादी में गए थे। वहां दोस्तों ने बांकेबिहारी के दर्शन की बात कही। बोले, वह भी चलेंगे। खुशकिस्मत देखिए, दोस्त सभी बारात के साथ लौट लिए, लेकिन वो नहीं आए। सोच लिया, दर्शन करके ही जाऊंगा। दोपहर मंदिर पहुंचे तो पट बंद थे, पुजारी से पता चला कि शाम के साढे़ चार बजे दर्शन होंगे।

इस पर वे मंदिर के बाहर ही बैठ गए। पट खुले और कान्हा की सांवरी मूरत के दर्शन किए। बोले, जैसे ही कान्हा के दर्शन हुए उनकी मूरत मन में बस गई। हृदय में एक ज्योति से जलने लगी। घर लौटा तो रात-दिन कान्हा की मूरत मनमस्तिष्क में आने लगी। फिर क्या, हिंदू धर्म, ग्रंथ और कान्हा को समझने की जिज्ञासा बढ़ी और अब पूरी तरह से सांवरे से डोर बंध गई है।

गफ्फार का हर साल गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने जाते हैं। अभी तक छह बार ऐसा कर चुके हैं। 84 कोस की परिक्रमा भी वे तीन बार कर चुके हैं। कहते हैं कि भी हिंदू मित्रमंडली के साथ तो कभी अकेले ही मथुरा के लिए रवाना हो जाते हैं। आसपास भागवत होने पर वो सुनने का मौका नहीं छोड़ते।

कान्हा की भक्ति में रमे गफ्फार पिछले आठ साल से अपने यहां भागवत कथा, सत्संग कराते हैं। खास बात इसके लिए वह किसी से चंदे के तौर पर रुपये नहीं लेते। सारे व्यसन से दूर गफ्फार पूरी तरह से सात्विक जीवन बिताते हैं। उनके पास हिंदू धर्म से जुड़ी हुई 900 से अधिक ग्रंथ, पुस्तकें, साहित्य और पत्रिकाएं हैं।

ऐसा नहीं कि गफ्फार को विरोध नहीं झेलना पड़ा। नाते-रिश्तेदारों तक ने उलाहने दिए। धार्मिक गुरुओं ने भी उनका विरोध कर इसे इस्लाम के खिलाफ बताया। तीन बच्चे और पत्नी ने भी विरोध किया, पर गफ्फार की भक्ति में कोई कमी नहीं आई। उनकी भक्ति के आगे अब तो परिवार-नाते रिश्तेदारों का विरोध भी हल्का पड़ने लगा है।

उम्र को धूल चटातीं 97 साल की योग गुरु ननम्मल  

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ननम्मल ने कोयम्बटूर में 20,000 से अधिक छात्र और उत्साही लोगों को योग का प्रशिक्षण देकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाने का प्रयास किया ।

ननम्मल के पिता एक मार्शल आर्ट कलाकार थे। ननम्मल ने योग की मूल बातें अपने पिता से ही सीखी हैं। ये पिता की सीख ही है, कि वे 97 वर्ष की उम्र में भी अपने शरीर को अपनी इच्छानुसार तोड़-मरोड़ सकती हैं।

भारत में संभवतः सबसे वृद्ध योग प्रशिक्षक वी ननम्मल दैनिक आधार पर 100 से अधिक छात्रों को योगा सिखाती हैं और उनके छात्रों में सभी आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। नन्नाममल ने योग की मूल बातें अपने पिता से सीखी हैं। उनके पिता आठ साल की उम्र से ही एक मार्शल आर्ट कलाकार थे। स्वाभाविक रूप से सुबह जल्दी जागने वाली नन्नाममल सुबह उठते ही 500 मिलीलीटर पानी पीती हैं और अपने दांतो को साफ़ करने के लिए नीम कि दातुन का इस्तेमाल करती हैं और इसीलिए जब कभी वो शहर से बाहर यात्रा पर होती हैं, तो भी अपने साथ नीम की दातुन ले जाना नहीं भूलतीं। ननम्मल दिन के समय फल, शहद के साथ दूध और हल्दी पाउडर जैसा स्वस्थ भोजन खाती हैं।

डेक्कन क्रॉनिकल के साथ बात करते हुए ननम्मल कहती हैं, ‘मेरे पति ‘सिद्ध’ का अभ्यास करने के साथ ही खेती करते थे। इस प्रकार से शादी के बाद प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति मेरे लगाव कि शुरुआत हुई। मैंने अपने जीवन में कभी भी योग के अभ्यास को नहीं छोड़ा और यही मेरे स्वास्थ्य का रहस्य है। मेरे द्वारा प्रति दिन किया जाने वाला भोजन भी फाइबर और कैल्शियम से अत्यंत समृद्ध होता है। मैं हर रोज एक अलग शाकाहारी व्यंजन के साथ कांजी लेती हूँ। हमारे द्वारा उपयोग की गई सभी सब्जियां हमारे अपने खेत में उगाई जाती हैं।’

ननम्मल ने कोयम्बटूर में 20,000 से अधिक छात्र और उत्साही लोगों को योग का प्रशिक्षण देकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी अपना नाम दर्ज करवाने का प्रयास किया है। वर्तमान में उनका उद्देश्य महिलाओं और मुख्य रूप से कन्या छात्राओं को विशेष रूप से शादी के बाद, उनकी बहुत से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को हल करने के लिए विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में जाकर योग तकनीकों के बारे में जागरूकता पैदा करना है।

ननम्मल बेटे वी एलुसामी कहते हैं, ‘उन्होंने दुनिया भर से कई योग महासंघों से आये प्रस्तावों को सिर्फ इसलिए रिजेक्ट करना पड़ गया, क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती है।’

नन्नाममल से योग का प्रशिक्षण लिए हुए लगभग 600 लोग आज योग प्रशिक्षक की भूमिका में हैं और दुनिया भर को योग का प्रशिक्षण दे रहे हैं। अभी उनके परिवार के 36 सदस्य गंभीरता से योग अभ्यास से जुड़े हुए हैं। ननम्मल का दृढ़ विश्वास है, कि यदि ‘इंसान इरादा सही है तो फिर कोई बहाना या सीमा उसे रोक नहीं सकती है।’

 

22 वर्षीय प्रतीक सीए की पढ़ाई छोड़ किसानों को आय दुगनी करना सिखा रहे हैं

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प्रतीक बजाज सहयोगी बायोटेक नाम की कंपनी चलाते हैं। उनकी कंपनी वर्मी खाद से सैकड़ों किसानों की जिंदगी बदल चुकी है। प्रतीक ‘ये लो खाद’ ब्रैंड से वर्मीकंपोस्ट बेचते हैं। उनका सालाना कारोबार लगभग 12 लाख रुपये का है। 2015 का वक्त था उस समय प्रतीक सिर्फ 19 साल के थे। बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सीए बनने के लिए पहली सीढ़ी यानी सीपीटी की परीक्षा पास की। उसके बाद वे सीए की पढ़ाई में लग गए। उनके बड़े भाई ने उसी वक्त एक डेयरी फार्म शुरू किया था और डेयरी का काम आगे बढ़ाने के लिए वे कृषि विज्ञान केंद्र से ट्रेनिंग ले रहे थे। संयोग से एक बार प्रतीक ने भी वहीं से वर्मीकंपोस्ट बनाने का गुर सीख लिया। इसके बाद प्रतीक को लगा कि सीए बनने से बेहतर है, कि कुछ ऐसा काम किया जाये कि अच्छी खासी इनकम होने के साथ ही किसानों का भी फायदा हो।

प्रतीक के भाई के डेयरी फार्म से जो गाय और भैंस का गोबर निकलता था वो बेकार चला जाता था, उसका सामान्य तरीके से ही खेतों में इस्तेमाल होता था। उन्हें लगा कि इसको वर्मीकंपोस्ट में तब्दील करके खाद का अच्छा इस्तेमाल करने के साथ ही पैसे भी बनाये जा सकते हैं।

प्रतीक बजाज ने IVRI इज्जतनगर के वैज्ञानिकों की मदद से वर्मीकंपोस्ट के बारे में रिसर्च की और वर्मीकंपोस्ट को और बेहतर बनाने का प्रयास किया। लगभग छह महीने बाद प्रतीक ने अपने घरवालों को बता दिया कि अब सीए की पढ़ाई में उनका मन नहीं लग रहा है और वे सीए बनने के बजाय ये बिजनेस शुरू करना चाहते हैं। उनके घर में पहले तो किसी ने यकीन ही नहीं किया, लेकिन जब उन्होंने अपनी पहली वर्मीकंपोस्ट बेची तो घर वालों को लगा कि प्रतीक ये बिजनेस अच्छे से कर सकता है।

प्रतीक बताते हैं,कि अगर वे दिन में 10 घंटे की पढ़ाई करके सीए बनते तो शायद उन्हें इतनी खुशी नहीं मिलती, लेकिन अब वे अपने खेतों और प्लांट में 24 घंटे लगे रहते हैं और ऐसा करने से उन्हें बेइंतहा खुशी मिलती है। साथ ही वे ये भी कहते हैं, कि जिस काम में आपका मन लगे, जो आपको खुशी दे, वही काम करना चाहिए।

प्रतीक ने अपने पूरे सात बीघे खेत में वर्मी कंपोस्ट तैयार करना शुरू कर दिया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह कचरा प्रबंधन के साथ-साथ उसे खाद में कैसे बदला जाए, इस पर भी काम कर रहे हैं।

वर्मीकंपोस्ट के साथ ही प्रतीक मंदिर में पूजा के बाद बेकार हो जाने वाली पूजन सामग्री और फूल, घर में खराब हो जाने वाली सब्जी और चीनी बनाने के बाद निकले कचरे से खाद बनाने का काम कर रहे हैं। धीरे-धीरे प्रतीक ने वर्मीकंपोस्ट के जरिए अॉर्गेनिक खेती भी शुरू कर दी। अब वे जानवरों के मूत्र में नीम की पत्ती मिलाकर खेतों में छिड़काव करते हैं और रासायनिक खाद का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं करते हैं। वह किसानों को बिलकुल फ्री में वर्मीकंपोस्ट और और्गैनिक खेती करने के बारे में ट्रेनिंग देते हैं। एक छोटे से मटके में वर्मीकंपोस्ट कैसे बनाई जाये इसकी भी वे ट्रेनिंग देते हैं।

प्रतीक दावा करते हैं, कि पहले जहां किसान हर एकड़ में रासायनिक खाद और कीटनाशक पर 4500 रुपये खर्च करते थे वहीं अब उन्हें सिर्फ 1,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं और इससे खेत की जमीन के साथ ही फसल को भी कोई नुकसान नहीं होता है। ऑर्गेनिक तरीके से उगाए गए गेहूं और चावल का दाम सामान्य तरीके से रासायनिक खाद और कीटनाशक का प्रयोग कर उगाए गए गेहूं से अधिक दाम मिलते हैं। अब प्रतीक अपना प्रोडक्ट नोएडा, गाजियाबाद, शाहजहांपुर, बरेली और यूपी के तमाम जिलों में बेचने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी लगन देश के उन तमाम युवाओं को प्रेरित कर रही है, जो बिजनेस करने का सपना देखते हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

गर्मियों को खास बनाएगा आम का स्वाद

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आम रबड़ी

सामग्री- ढाई कप दूध, 1 कप पका और टुकड़ों में कटा हुआ आम (पीस में), 1/4 कप चीनी, 5-6 पिस्‍ता, 4 बादाम, 1/4 चम्‍मच दालचीनी पाउडर, 4 रेशे केसर के।

विधि- बादाम को गरम पानी में भिगोइये और 20 मिनट के बाद उसका छिलका छील कर उसे बारीक काट लें। पिस्‍ता को भी बारीक काट कर किनारे रख दें। केसर को भी एक कटोरी में थोड़ा सा दूध डाल कर भिगो दें। कटे हुए आम को मिक्‍सर में थोड़ा सा दूध डाल कर गाढा फेंट लें। एक पैन में दूध को आधा होने तक उबालें। फिर उसमें चीनी डाल कर घोल लें। आंच को धीमा रखें। दूध जब गाढा पक जाए तब इसे ठंडा होने के लिये आंच से उतार कर रख दें। जब दूध ठंडा हो जाए तब उसमें आम की प्‍यूरी , इलायची पावडर, कटे हुए पिस्‍ता और बादाम तथा केसर वाला दूध मिक्‍स करें। अब आप इसे ठंडा ही सर्व कर सकते हैं।

 

 

आम का सूप

सामग्री – 2 आम, 1 नींबू, 1 कप चीनी, 1/2 कप दही

विधि- सबसे पहले आम को छील कर उसकी गुठली निकाल लें। गूदे में चीनी मिला कर मिक्‍सी में खूब फेंटे। नींबू का रस और दही मिलाएं। क्रीमी होने तक फिर से फेंटें। फ्रिज में ठंडा होने के लिये रख दें। जब यह ठंडा हो जाए तब इसे सर्व करें।

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे

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बशीर बद्र

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे
हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे

हुई शाम यादों के इक गाँव में
परिंदे उदासी के आने लगे

घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते-आते ज़माने लगे

कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं
दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे

वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे

पढाई-लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे

गंगा का प्रदूषण

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नज़ीर बनारसी

डरता हूँ रूक न जाये कविता की बहती धारा

मैली है जब से गंगा, मैला है मन हमारा

छाती पे आज उसकी कतवार तैरते हैं
राजा सगर के बेटो तुम सबको जिसने तारा

कब्ज़ा है आज इस पर भैंसों की गन्दगी का
स्नान करने वालो जिस पर है है हक़ तुम्हारा

श्रद्धाएँ चीख़ती है विश्वास रो रहा है
ख़तरे में पड़ गया है परलोक का सहारा

किस आईने में देखें मुँह अपना चाँद-तारे
गंगा का सारा जल हो जब गन्दगी का मारा

इस पर भी इक नज़र कर, भारत की राजधानी
क़िस्मत समझ के जिसको राजाओं ने सँवारा

बूढ़े हैं हम तो जल्दी लग जायेंगे किनारे
सोचो तुम्हीं जवानो क्या फ़र्ज़ है तुम्हारा

कविता ’नजीर’ की है तेरी ही देन गंगे
तेरी लहर लहर है उसकी विचारधारा