Wednesday, July 15, 2026
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ऐ पुरुष, जरा सोचिए और बदलिए जरा सा खुद को

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रेखा श्रीवास्तव

हमारे समाज व परिवार में पुरुष का स्थान काफी महत्वपूर्ण है। एक बच्ची से लेकर वयस्क औरत तक कहीं न कहीं एक पुरुष पर ही निर्भर रहती है। समाज का सबड़े बड़ा मजबूत खंभा माना जाता है पुरुष वर्ग। महिलाओं की तरह पुरुष वर्ग में भी कुछ अच्छाइयाँ और कुछ खामियाँ हैं। अब तक महिलाओं की खामियों पर बहुत बार कलम चलायी गयी है, गोष्ठियाँ की गई हैं पर पुरुष ने न तो कभी अपने गिरेवान में झांका है और न खुद को सुधारने की कोशिश की है।

महिलाओं की तो जुर्रत ही नहीं हो सकती थी कि वह पुरुष को उंगली दिखाये और बताये कि तुम्हारे अंदर भी कमियाँ है इसलिए पुरुष वर्ग काफी आत्मविश्वास से हर कार्य करते हैं, चाहे वह समाज व परिवार के लिए सही हो या नहीं। उन्हें फैसला लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती है, पर एक महिला को अगर सामान्य सी बात  भी सोचनी हो तो कई बार फैसला करती हैं और फिर उसे जाँचने की कोशिश करती रहती है कि वह फैसला सही है या नहीं।

देखा गया है कि पुरुष वर्ग चाहे वह भाई हो या पिता, दोस्त हो या पति सभी एक बार फैसला लेते हैं और उसे ही सब को मानना पड़ता है। जिस तरह स्त्री की कुछ आदतें हैं, वैसे ही पुरुषों की ही कुछ आदतें हैं। पर उनकी आदतों से घर, परिवार या समाज को कोई फर्क पड़ता है या नहीं, इसकी चिंता नहीं होती। वह बचपन से ही अपने बाहरी जीवन को बहुत खास मानता रहा है। अपने बाहरी संपर्क यानी दुनिया को ही अपनी जिंदगी, अपनी कामयाबी का हिस्सा मानता आ रहा है।

ऐसा नहीं है कि सारे पुरुष ही ऐसे होते हैं, पर अधिकांशत:। उनका सोचना है कि जिंदगी में जो रिश्ता हमें भगवान या समाज ने दिया है, यानी घरेलू रिश्ते वो तो जिंदगी भर यूँ ही चलते रहेंगे। उन्हें बनाये रखने की कोई जरूरत नहीं है। उन रिश्तों को जीवित रखने के लिए कोशिश करना बेकार है। उल्टे एक भाई घर आकर अपनी बहन पर रौब झाड़ता है। पति तो पत्नी का सर्वेसवा होता है। उसका रक्षक माना जाता है।

माँ भी अपने बेटे से डरती ही है। वही पुरुष घर में हर समय गुस्सा, एंग्री यंग मैन के रूप में हाजिर रहता है। अनुशासन के लिए कुछ हद तक जरूरी भी है, लेकिन हर समय एक ही रवैया में रहने से परिवार में दूरी आ जाती है। उनकी सोच होती है कि  बाहरी लोगों से संपर्क बनाये रखेंगे तो हमें आमदनी के अलावा एक अच्छा और परिपक्व रिश्ता मिलेगा जो हमेशा काम आयेगा। यह बात कुछ हद तक सही भी है, लेकिन पूरी तरह नहीं।

हमें चाहे घरेलू हो या बाहरी दोनों ही रिश्तों की कद्र करनी चाहिए। ठीक है कि बाहरी रिश्ते से हमें आर्थिक मदद और सामाजिक पहचान मिल सकती है, पर पारिवारिक लोगों के साथ रिश्ते बनाये रखने से हमें सकून मिलता है। अगर पारिवारिक रिश्ते को बनाये रखने में आप कोशिश करते हैं, तो माँ-पिता, भाई-बहन या पत्नी-बच्चों को एक अपनापन लगता है पर कुछ पुरुष इसे पूरी तरह से नकार देते हैं। उनका मानना है कि घर के लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियाद सुविधाओं के अलावा कुछ नहीं चाहिए। वे बच्चों को पढ़ाने के लिए आर्थिक जरूरत पूरी करना ही अपना कर्तव्य समझते  हैं। उन्हें यह नहीं समझ आता कि बच्चों के साथ कुछ पल बैठ कर खेलने, उनको पढ़ाने से, उनके भविष्य के बारे में सोच-विचार करने से परिवार मजबूत होता है। परिजन के साथ समय बिताने और उनके साथ दोस्ताना रवैया अपनाने से रिश्ते परिपक्व होते हैं।

बढ़ते बच्चों के बारे में सोचना, उनकी शादी, उनका भविष्य जैसे विषयों पर परिवार के लोगों के साथ बैठकर बात-चीत करने में बहुत से सारे पुरुष हिचकिचाहते हैं। यहाँ तक कि रिटार्यडमेंट के बाद भी अपनी आदतनानुसार वे अपनी बाहरी जिंदगी को ही भरपूर जीना चाहते हैं। हाँ, पर जैसे ही घर के बारे में कोई फैसला की बात आती है, तो  उनका सोचना है कि मैं अकेले ही परिवार का नाविक हूँ, और  मैं अकेले ही फैसला ले सकता हूँ।

अत: जब मेरा मन करेगा, जब मुझे महसूस होगा कि उनके बारे में सोचूँ तभी सोचुँगा। पर परिवार ऐसे नहीं चलता। वैसे भी परिवारनुमा आँगन तो अब छोटा ही होता जा रहा है। संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक पहुँच चुका है। अब तो एकल परिवार भी दम तोड़ता नजर आ रहा है। सिंगल मदर का जमाना आ गया है। पर फिर भी पुरुष वर्ग की नींद नहीं टूट रही है। अगर समय रहते पुरुष वर्ग नहीं चेता  तो हो सकता है कि जिस तरह महिलाएँ घर से निकलकर आर्थिक मजबूत हो गई है, वैसे घर के छोटे-बड़े फैसले करने का भी दायित्व ले लेगी तो इन पुरुषों का क्या होगा? समय रहते सम्भल जाएं पुरुष वर्ग नहीं तो ‘अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत!’ वाली कहावत फिट हो जायेगी।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

वहीं करिए जो आप करना चाहती हैं

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मशहूर ज्वेलरी डिजाइनर राधिका जैन अपने शौक को बड़ी खूबसूरती के साथ अपना क्षेत्र बनाया है। जेवरों की दुनिया में हर बार वे नया प्रयोग करती हैं और हैरत में डालती रहती हैं। हाल ही में हाल ही में राधिका के सिग्नेचर मायरा के अंर्तगत पेश किए गए फाइबर ज्वेलरी कलेक्शन को लैक्मे फैशन वीक में भी खूब तारीफें मिली। मशहूर ज्वेलरी डिजाइनर राधिका जैन से अपराजिता ने मुलाकात की, पेश हैं प्रमुख अंश –

बहन के साथ काम करके सीखा

मैंने प्रोफेशनल तौर पर ज्वेलरी डिजाइनिंग का कोर्स नहीं किया। यह मेरा शौक था जो प्रोफेशन में बदला और इसके पीछे मेरी बहन से मिलने वाली प्रेरणा थी। उसे आभूषणों की दुनिया में काम करते देख मेरे अन्दर शौक जगा। मैं तब उसकी मदद किया करती थी और बाद में उसे देखकर खुद भी आभूषण बनाना सीख गयी। अपने जेवर कई दुकानों और ज्वेलरी बुटिक में उपलब्ध करवाना आरम्भ किया, काम चल निकला और सफर शुरू हो गया। मायरा नाम हम दो बहनों को लेकर बना है, मीरा और राधिका मगर मैंने इसे मीरा की जगह मायरा नाम दिया। हम सेमी प्रेशियस स्टोन पर सोने और चांदी की प्लेटिंग से जेवर बनाते हैं और अब तो फाइबर पर भी काम किया है।

सेमीप्रेशियस ज्वेलरी की माँग बढ़ ही रही है

आज ज्वेलरी उद्योग में भी काफी बदलाव आया है। प्रतियोगिता बढ़ गयी है। किफायती फैंसी जेवर तो पहले भी पसन्द किए जाते थे और अब स्टोन पर भी भारी काम पसन्द किया जा रहा है। लोग अब आभूषण खरीद रहे हैं। मेरे पास बजट के अनुसार जेवर उपलब्ध हैं। असली जेवर भी लोग अपना स्टेटस ध्यान में रखकर खरीद रहे हैं मगर आज तो जेवर जरूरत भी है और हर वक्त महँगे जेवर नहीं पहन सकते इसलिए सेमीप्रेशियस ज्वेलरी की माँग बढ़ ही रही है।

कारीगरों को पेशेवर प्रशिक्षण देने की जरूरत है

बंगाल में हस्तशिल्प बेहद अच्छा है और यहाँ के कारीगरों का काम हर जगह सराहा जाता है। उनको बस पेशेवर तरीके से प्रशिक्षण देने और उनके हुनर को तराशने की जरूरत है। व्यवसायिक तौर पर मार्केटिंग बहुत जरूरी होती है तो उस पर भी ध्यान देना होगा।

जल्दबाजी में डिजाइन नहीं करती

मैं अपने स्टोन खुद खरीदती हूँ और मेरे डिजाइन काफी अलग हैं। मैं जल्दबाजी में कभी डिजाइन नहीं करती। कच्चे माल और डिजाइन पर ध्यान देना बहुत जरूरी होता है और आपको हमेशा कुछ नया करना पड़ता है जैसे कि मैंने अपने कलेक्शन में हाथी दाँत की जगह फाइबर इस्तेमाल किया है। लोगों की पसन्द के अनुसार भी हम जेवर तैयार कर उनको देते हैं। फ्लोरल डिजाइन और रंगों पर खास तौर पर ध्यान देते हैं।

वहीं करिए जो आप करना चाहती हैं

मेरा मानना है कि आपको जिस काम से खुशी मिलती हो, वही करना चाहिए। लड़कियों के लिए अपने पैर पर खड़ा होना व आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। वहीं करिए जो आप करना चाहती हैं। हर काम अपने आप में महत्वपूर्ण है।

 

 

 

 

 

विविधता और सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी और आपकी है

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इन दिनों हवा गर्म है, आग उगल रही है। जो सुकून चाहिए, खोता जा रहा है। नेता और धर्म की अगुआई कर रहे लोगों में गजब का उत्साह है। उत्तर प्रदेश में अचानक सख्त फैसले लिए जा रहे हैं और इन फैसलों को लेकर भी विवाद हो रहा है। हिन्दूत्व और राममंदिर के नारे तेज हो रहे हैं और सोशल मीडिया तो राष्ट्रवाद की परिभाषा समझाने में व्यस्त है। हर तरफ नफरत, डर और संशय…ये कौन से देश की तस्वीर है..पता नहीं? आखिर क्यों हम एक दूसरे की संस्कृति का सम्मान करके जीना नहीं सीख पा रहे? आखिर क्यों इस तरह के मसले हमारी गंगा – जमुनी संस्कृति पर भारी पड़ रहे हैं। ये तो सच है कि आप अगर चाहें भी तो वेदों के युग में नहीं जा सकते।

कट्टरता धर्म नहीं देखती, वह सिर्फ इन्सान पर निर्भर करती है, सोचने वाली बात यह है कि कट्टर होकर क्या आप भारत को 21वीं सदी में ले जा सकते हैं? किसी भी लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह होनी चाहिए, वैचारिक विविधता भी जरूरी है, उसकी रक्षा करना देश की संसद, न्यायपालिका और मीडिया के साथ आम आदमी की भी जिम्मेदारी है। अगर हिन्दुत्व में सहिष्णुता है तो उसे वैसा ही रहने दीजिए क्योंकि अगर आप किसी से न कहने का अधिकार छीनते हैं तो फिर आप दूसरों की तरह हो जाएंगे। वहीं व्यक्ति से विरोध होने के कारण उसका हर फैसला संदेह के दायरे में आए, यह भी सही नहीं है। कोई भी राष्ट्रवाद सामूहिक बलात्कार की धमकी देना नहीं सिखाता, अगर आप ऐसा करते हैं तो उसी देश को गाली दे रहे हैं, जिसके नाम पर आप लड़ने चले हैं। सच तो यह है कि इस देश का विकास सिर्फ हिन्दू, सिर्फ मुसलमान, सिर्फ सिख या सिर्फ ईसाई नहीं कर सकता, विकास के लिए सबको साथ चलना होगा।

नेताओं का काम राजनीति करना है मगर उनकी चाल समझना और  सौहार्द बनाए रखना ये हमारे और आपके हाथ में है। बात अगर महिलाओं की हो तो हर धर्म महिलाओं के प्रति कट्टर ही है। अब सवाल यह है कि कहीं नैतिकता के नाम पर महिलाओं को एक बार फिर पीछे तो नहीं धकेला जा रहा है? एंटी रोमियो दस्ता कहीं युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन तो नहीं करेगा? अगर दो वयस्क लोग अपनी मर्जी से घूम रहे हैं या बैठ रहे हैं तो उनको परेशान करने का अधिकार आपको नहीं है।  छेड़छाड़ करने वालों और प्रेम करने वालों में अन्तर करना जरूरी है क्योंकि कई बार परिवार इस तरह के मामलों में अपने बच्चों के पीछे पड़ जाते हैं क्योंकि उनका रिश्ता उनको स्वीकार नहीं होता और ऐसे में पुलिस का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे ही जैसे रिजवानुर मामले में प्रियंका के पिता ने किया था। परिवार के लिए अहंकार और जिद का मामला के साथ रुतबे का मामला भी हो सकता है।

सख्ती और अनुशासन एक सीमा तक ही सही हैं मगर आप इसे थोपना चाहेंगे तो यह कहीं न कहीं आपकी खीझ है। सोशल मीडिया पर जिस तरह आमने – सामने की हिंसक लड़ाई हो रही है, वह पूरे विचार की गरिमा को क्षति पहुँचा रही है। नरेन्द्र मोदी और फिर योगी की जीत बहुतों के गले नहीं उतर रही इसलिए हर फैसले को गलत रंग देने की प्रवृत्ति दिखने लगी है। ऐसा नहीं होना चाहिए मगर सीएम योगी को भी समझना होगा कि बहुमत कभी मनमानी का अधिकार नहीं देता और वे किसी विशेष सम्प्रदाय के नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के हर व्यक्ति के मुख्यमंत्री हैं। कमजोर से कमजोर तबके की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी ही है फिर वह किसी धर्म या समुदाय को ही मानता क्यों न हो। समय आ गया है कि योगी अपनी कट्टर छवि से ऊपर उठकर काम करें।

प्रशासनिक और सियासी तौर पर अगर उनको लम्बी पारी खेलनी है तो उनको सबको साथ लेकर चलना सीखना होगा और वह कट्टरता से कभी नहीं हो सकता। सबसे अच्छी बात यह है कि राम मंदिर मसले पर सुप्रीम कोर्ट का संयम दिख रहा है इसलिए सुनवाई में कोई जल्दबाजी नहीं है। राम मंदिर और तीन तलाक के मामला, दोनों ही संवेदनशील हैं। न तलाक तो खत्म होना चाहिए मगर राममंदिर का समाधान ऐसा हो जो हमारी गंगा – जमुनी संस्कृति को और व्यापक करे। हमारी उम्मीद तो यही है, फैसला तो अदालत को करना है मगर इस देश में विविधता और सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी और आपकी है जो भारतीय होने के नाते हमें निभानी पड़ेगी। नवरात्रि और रामनवमी के साथ चैती छठ, पोएला बैशाख और बैसाखी की हार्दिक शुभकामनाएं।

गीतों में छिपी राजस्थान के गणगौर की परम्परा

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अनुराधा अग्रवाल

 होली के दूसरे दिन चैत्र की तीज तक गणगौर की पूजा की जाती है। इसे कुँआरी लड़कियाँ और स्त्रियाँ पूजती हैं। इस पूजा में ईसर और गोरा की पूजा की जाती है। कई गवरजा मंडलियाँ इसका आयोजन करती हैं और सामूहिक रूप से करती हैं। गणगौर की पूजा बड़ी धूम – धाम से की जाती है और इसके गीत भी गाए जाते हैं, इन गीतों में लोक परम्परा बोलती है। ऐसे ही दो गीत –

पहला गीत

उदियापुर से आई गनगौर,, आए उतरी ब्रम्हादास जी री पोल,

ईसरदासजी ओ मांडल्यो गननौर, कानीरामजी ओ मांड्या गनगौर।

रोवां की भाभी पूजल्यो गनगौर, सुहागन रानी पूजल्यो गनगौर,

थारो ईसर म्हारी गनगौर, गोर मचा व रमझोल,

सुहागन रानी पूजल्यो गनगौर।।

 

दूसरा गीत

चमकण घाघरो, चमकण चीर, बोल बाई रोवा तेरा कुण –कुण बीर,

बड़ से बड़ो मेरो ईसरदास वीर, ब स छोटो मेरो कानीराम बीर।

माय से मिलाव मेरो ईसरदास बीर, चुनड़ी उढ़ा  व मेरो कानीराम बीर।

 

 

पत्रकारिता का लक्ष्य राष्ट्रहित होना चाहिए – राज्यपाल

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कोलकाता :  राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि पत्रकार समाचार संकलन और संपादन ही नहीं करता बल्कि इससे आगे बढ़कर वह शिक्षक की भूमिका भी निभाता है। भारतीय भाषा परिषद तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा दो दिवसीय पत्रकारिता पर राष्ट्रीय विमर्श भारतीय भाषाओँ में अंतर्संवाद का उद्घाटन करते हुए उन्होंने उक्त बातें कहीं। राज्यपाल ने कहा कि पत्रकारिता का लक्ष्य राष्ट्रहित होना चाहिए और मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। कार्यक्रम के प्रथम सत्र में भारत में भाषाई विविधता पर बोलते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाल ने कहा कि पत्रकार में उसके शब्दों के प्रति दायित्वबोध नहीं होना चाहिए। भारतीय भाषाओं की शब्दावलियों से सर्वश्रेष्ठ शब्दों का चयन कर उनको उपयोग में लाने की जरूरत है। राज्यसभा सांसद तथा सन्मार्ग हिन्दी दैनिक के प्रधान संपादक विवेक गुप्त ने कहा कि भारतीय भाषाओँ का अपना स्वाद और विविधता है और उसे व्यवहार में लाना होगा। सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक रामकुमार मुखोपाध्याय ने मीडिया को उन भाषाओँ को सामने लाने की जरूरत हैं जो छूट गयी हैं। उद्घाटन सत्र का संचालन कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने किया। स्वागत भाषण भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष कुसुम खेमानी ने किया जबकि धन्यवाद भारतीय भाषा परिषद के मंत्री नन्दलाल शाह ने दिया। परिसंवाद के दूसरे सत्र में भारतीय पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियाँ विषय पर बोलते हुए छपते – छपते के प्रधान संपादक विश्वम्भर नेवर ने कहा कि आज पत्रकारिता पूंजी और बाज़ार के पंजे में हैं और मीडिया पर दबाव रहता है। सत्र की अध्यक्षता वाराणसी के पूर्व प्रोफेसर राममोहन पाठक ने पत्रकारिता समाज का एजेंडा तय करती रही है और पत्रकार को अपने पेशे और समाज के प्रति जवाबदेह होनी चाहिये। प्रथम सत्र का संचालन प्रो. संजय जायसवाल ने किया। तीसरे सत्र में भाषाई पत्रकारिता में अंग्रेजी शब्दों का प्रदुषण विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि हिन्दी देश की सर्वोत्तम भाषा हिन्दी है, ये मैं नहीं मानता। अन्य भाषाओँ से शब्द लेना और आत्मसात करना भाषा को समृद्ध करता हो पर यह ध्यान रखें कि मूल भाषा का अस्तित्व खतरे में न पड़े। हिन्दी को मृत अवस्था तक ले जाने में मीडिया की भूमिका है। बांग्ला के वरिष्ठ पत्रकार स्नेहाशीष सूर ने कहा कि हिंगलिश भाषा को बिगाड़ रही है। भाषा की शुद्धता पर जोर दिया जाना चाहिए। हिन्दी की एकमात्र भाषा है जो जोड़ने का काम कर रही है। कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने कहा कि मालिक और विज्ञापन की बढ़ती माँग ने पत्रकारिता की भाषा को बिगाड़ दिया है। सत्र का संचालन ममता पाण्डेय ने की। कार्यक्रम के दूसरे दिन सामजिक समरसता में पत्रकारिता की भूमिका विषय में वक्तव्य रखते हुए साधना पत्रिका के संपादक मुकेश शाह ने कहा कि लेखन समाज को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सभी भाषाओँ को सीखने की जरुरत है। पोंडिचेरी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर सी.  जयशंकर बाबू ने कहा कि समरसता का मतलब एकता की भावना है। मिली – जुली संस्कृति को विकसित करने की जरूरत है। भाषा जोड़ने का माध्यम है। अध्यक्षीय भाषण में आलोचक डॉ. शम्भुनाथ ने कहा कि हिन्दी सिर्फ संपर्क की ही नहीं संवाद और ह्रदय की भाषा है। सामजिक समरसता के लिए अतीत का बोझ छोड़ने की जरुरत है।  सत्र का संचालन सुषमा त्रिपाठी ने किया।दूसरे दिन परिसंवाद में पत्रकारिता के माध्यम से भारतीय साहित्य में अंतर्संवाद विषय पर बोलते हुए दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक जयकृष्ण वाजपेई ने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी का कारण तात्कालिकता का दबाव है। अब दैनिक अखबारों में साहित्य का प्रकाशन सिमटकर रविवारीय परिशिष्ट में एक या दो पन्नों का हो गया है। वरिष्ठ पत्रकार गौरांग अग्रवाल ने कहा कि पत्रकारिता में नई चीजें आ गई हैं। भारी- भरकम बातों के बदले लोग हल्की- फुल्की चीजें चाहते हैं। बेहतर साज – सज्जा और प्रस्तुति पर जोर अधिक है। अखबार नई जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। सत्र का संचालन वरिष्ट पत्रकार अभिज्ञात ने किया। कार्यक्रम के अंतिम सत्र में परिसंवाद के संयोजक डॉ. अविनाश वाजपेई ने दो दिनों के कार्यक्रम की रपट पेश की। महात्मा गांधी चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने कहा कि  हमें अंग्रेजी के शब्दों की जगह हिन्दी के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। शब्द भारतीय शब्दों से लिए जाएँ जिससे भारतीय भाषाओँ की मिठास बनी रहे।

 साहित्यिकी’ की मासिक गोष्ठी अमृतलाल नागर पर चर्चा

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महानगर की ‘साहित्यिकी’ संस्था के तत्वावधान में बुधवार दिनांक २२ मार्च १९१७ को संगोष्ठी का आयोजन किया गया । संस्था की वरिष्ठ सदस्या रेनू गौरिसरिया ने डा. धर्मवीर और ‘साहित्यिकी’ की सदस्या मधुबाला रोहतगी को मरणोपरांत श्रद्धांजलि देते हुए पद्माकर की पंक्तियों से कार्यक्रम का प्रारंभ किया । किस्सागोई में माहिर अमृतलाल नागर की जन्मशत वार्षिकी उत्सव पर केन्द्रित इस संगोष्ठी में नुपुर जायसवाल ने नागर जी कहानियों पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि विभिन्न विषयों पर लिखी उनकी कहानियों को एक सूत्र जोड़ता है और वह है –उनकी शैली में किस्स्गोई । जनप्रियता और रोचकता से ओतप्रोत नाटकीय मोड़ पर ख़त्म होने वाली उनकी कहानियाँ पाठकों के ह्रदय तक पहुँचती हैं । यही उनकी सबसे बड़ी सार्थकता है ।

पूनम पाठक ने नागर जी के हास्यव्यंग्य रचना संग्रह ‘कृपया दाएँ चलिए’ से उद्धृत रचना ‘जब बात बनाये न बनी’ का भावपूर्ण जीवंत पाठ किया । प्रमुख वक्ता  प्रेम शंकर त्रिपाठी जी ने नागर जी के उपन्यासों पर शोध कार्य करते हुए उनके साथ हुई अपनी अनेक मुलाकातों और रोचक वार्तालापों का उल्लेख करते हुए श्रोताओं को आह्लादित कर दिया । उन्होंने रेखांकित किया कि आस्था के आलोक और जिजीविषा की ज्योति से नागर जी का सम्पूर्ण लेखन आलोकित है। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभावित होते हुए भी नागर जी भारतीय संस्कृति पर अटूट आस्था रखते हुए मानव मूल्यों से जुडे रहने को ही धर्म समझते थे । उनका यह स्पष्ट मानना था कि संस्कृति को संप्रदाय से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। अध्यक्षीय भाषण में किरण सेपानी ने नागर जी के सम्पूर्ण रचना संसार का उल्लेख करते हुए ‘ताई’ और ‘सुहाग के नुपुर’ का विशिष्ट उल्लेख करते हुए ताई को हिंदी साहित्य का अविस्मर्णीय चरित्र घोषित किया । गीता दुबे ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि किसी भी साहित्यकार को उनके साहित्य के आधार पर आलोचित किया जाना चाहिए I संगोष्ठी में संस्था की अनेक सदस्याओं के अतिरिक्त गिरधर राय जी भी उपस्थित थे I कार्यक्रम का सफल संचालन सुषमा हंस ने किया।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में मनाया गया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में छात्रों के द्वारा  स्त्री सशक्तिकरण को लेकर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें विभाग के सभी छात्र छात्राओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर राजश्री शुक्ला ने  किया।अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए उन्होंने कहा कि “आंदोलन करने से कहीं अधिक आवश्यक है कि स्त्री अपनी चेतना जागृत करें ।

स्त्री पुरुष कदम से कदम मिलाकर साथ चलेंगे तभी समाज और राष्ट्र परिपूर्ण बनेगा।आंदोलन हों लेकिन उनकी सार्थकता तभी है जब बदलाव भीतरी हो, चेतना के स्तर पर हो।”इस आयोजन में विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय उपस्थित तो नहीं हो सकी किंतु अपना संदेश देते हुए कहा कि “स्त्री अपनी लड़ाई स्वयं लड़े इसलिए उसे और जागरुक होना पड़ेगा और स्त्री जागरुक हो इसलिए उसे शिक्षित होना पड़ेगा ।” इस संदेश के माध्यम से उन्होंने स्त्री शिक्षा पर विशेष बल दिया। इस कार्यक्रम में बंगो बासी कॉलेज के प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार भी उपस्थित थे जिन्होंने इस आयोजन के लिए हिंदी विभाग के छात्रों की प्रशंसा की।उन्होंने कहा कि “आज के छात्र पहले की अपेक्षा ज्यादा आत्मविश्वास से भरे हैं।लड़कियों में यह आत्मविश्वास जितना अधिक होगा उतना वह सार्थक स्वाधीन चेतना की निर्मिति कर पाएँगी।अभी भी हमारे समाज में स्त्री पूर्ण स्वाधीन नहीं है।पुरुष समाज को उसको पर्याप्त जगह देनी की जरूरत है।” इस कार्यक्रम में काव्य पाठ, गीत,नृत्य तथा स्त्री सशक्तिकरण के मुद्दों पर चर्चा भी हुई जिसका सफलतापूर्वक संचालन छात्र राहुल गोंड ने किया।

चैत्र नवरात्र 2017: जानिए घट-स्थापना की पूजा और मुहूर्त का समय

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चैत्र शुक्ल पक्ष के नवरात्रों के साथ ही हिन्दू नवसंवत्सर शुरू होता है इसलिए इस नवरात्रि का काफी मान है।

28 मार्च से चैत्र नवरात्र का शुभारंभ होने जा रहा है, इस बार माता का वास पूरे नौ दिन रहेगा। नौ दिनों तक चलने वाली इस पूजा में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों आराधना की जाती है। जिन घरों में नवरात्रि पर घट-स्थापना होती है उनके लिए शुभ मुहूर्त 28 मार्च दिन मंगलवार को सुबह 08 बजकर 26 मिनट से लेकर 10 बजकर 24 मिनट तक का है।

वैसे तो नवरात्रि का शुभ वक्त तो पूरे दिन रहेगा लेकिन अगर शुभ मुहूर्त पर घट-स्थापना होगी तो जातक को फल अच्छा मिलेगा। नवरात्रों के साथ ही हिन्दू नवसंवत्सर शुरू गौरतलब है कि चैत्र शुक्ल पक्ष के नवरात्रों के साथ ही हिन्दू नवसंवत्सर शुरू होता है इसलिए इस नवरात्रि का काफी मान है।

इस साल 28 मार्च से शुरू होने वाला यह नवरात्र पांच अप्रैल तक चलेगा। 28 मार्च 2017 : मां शैलपुत्री की पूजा  29 मार्च 2017 : मां ब्रह्मचारिणी की पूजा  30 मार्च 2017 : मां चन्द्रघंटा की पूजा  31 मार्च 2017 : मां कूष्मांडा की पूजा  01 अप्रैल 2017 : मां स्कंदमाता की पूजा  02 अप्रैल 2017 : मां कात्यायनी की पूजा  03 अप्रैल 2017 : मां कालरात्रि की पूजा  04 अप्रैल 2017 : मां महागौरी की पूजा  05 अप्रैल 2017 : मां सिद्धदात्री की पूजा

पीछा करना और तेजाब फेंकना प्यार नहीं होता, इनकार का सम्मान करें

  •  सुषमा त्रिपाठी

कहते हैं कि प्यार में कोई शर्त नहीं होती और आप जिससे प्यार करते हैं, उसकी कद्र करना जरूरी होता है। शायद आपने भी किया है और आप जैसे बहुत से लड़के या पुरुष या दोस्त करते हैं मगर क्या आप प्यार का मतलब समझते हैं। युवाओं में से अधिकतर और आप नहीं तो मुमकिन है कि आपके दोस्त या जान – पहचान में कोई किसी न किसी लड़की को चाहता होगा, शादी का इरादा भी रखता होगा मगर एक बार खुद से पूछिए क्या आप इनकार सुनने की हिम्मत रखते हैं? आजकल प्यार व्हाट्सएप से शुरू होता है और वीडियो कॉलिंग तक पहुँचता है और स्कूलों या कॉलेजों में पढ़ने वाले बच्चे भी वेलेंटाइन्स खोजते फिरते हैं। अगर बात बनी तो कुछ दिनों तक डेट किया और रास्ता अलग हो गया तो शिकायत नहीं करते।

 

कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी भावनाओं को संजीदगी से लेते हैं और इतनी संजीदगी से लेते हैं कि जिससे प्यार किया है, उसे अपनी सम्पत्ति मान लेते हैं। आप इसे प्यार समझते हैं मगर ये प्यार नहीं है, ऐसा बंधन है जिसमें एक दिन आपके प्यार का दम घुट जाएगा। इस तरह के रिश्ते दिल से नहीं मजबूरी से चलते हैं और जनाब मजबूरी को प्यार नहीं करते। जिस तरह आप अपने परिवार में अपनी निजी जिन्दगी के लिए स्पेस चाहते हैं, वही स्पेस आपको देना होगा। मोहब्बत जी –हूजूरी नहीं होती इसलिए आप दोनों को एक दूसरे की निजता और इच्छाओं का सम्मान करना होगा।

आपमें से अधिकतर युवा हमारी फिल्मों के नायकों को अपनी प्रेरणा मान बैठते हैं और आपको लगता है कि शाहरुख खान या किसी और किरदार की तरह कुछ दिन आप पीछा करेंगे और अंत में वह मान जाएगी। सज्जनों, पहली बात तो यह है कि जिन्दगी फिल्म नहीं है और जिस नायक को प्रेरणा मानकर आप किसी लड़की से ऐसा ही व्यवहार करते हैं तो याद रखिए कि वह जिन्दगी भर आपसे नफरत करेगी और डर में शाहरुख खान के किरदार का अन्त भी दर्दनाक ही होता है। आप उसके लिए दहशत बनेंगे और दहशत में डर होगा, नफरत होगी मगर प्यार कभी नहीं होगा, आप उसे हासिल करना चाहते हैं मगर याद रखिए जो प्यार करते हैं, वह हासिल नहीं करते। हासिल करने वाले जीतते नहीं हारते हैं, हमेशा। जरा सोचिए, ये आपका कैसा प्यार है जो उसके चेहरे पर दहशत लिखता है, जिसे वह प्यार करने का दावा करता है। वह आपसे दूर जाना चाहती है और आप सोच रहे हैं कि मेरी नहीं तो किसी और की नहीं, तेजाब फेंकने वाले भी बहुत हैं। आप एक बात बताइए कि क्या आपका प्यार, आपकी संवेदनाएं इतनी कमजोर है कि एक इनकार आपको आशिक से दरिन्दा बना देगा। क्या आपको नहीं लगता कि यह आपकी हार है क्योंकि जो प्यार करते हैं, वे खुद को हारकर दिल जीतते हैं। आप उस चेहरे को बदसूरत और उसकी जिन्दगी को जहर बनाने की सोच रहे हैं, जिस चेहरे पर आप मर मिटे थे और हर वक्त उसे अपने सामने देखना चाहते हैं, क्या आपकी नफरत आपकी हार नहीं है? मान लीजिए, आपने ये कर भी डाला मगर इसके बाद क्या, क्या सिर्फ एक व्यक्ति के लिए अपनी जिन्दगी, परिवार और अपना भविष्य दाँव पर लगाना नहीं है? क्यों आप उसके लिए अपनी जिन्दगी को दाँव पर लगाना चाहते हैं जिसकी जिन्दगी में आप कहीं हैं ही नहीं? पीछा करना और तेजाब फेंकना कमजोरी ही नहीं अपराध है और हमारी सलाह यह है कि आपको किसी के लिए भी अपनी जिन्दगी दाँव पर नहीं लगानी चाहिए।  रोज का पीछा, रोज के फोन कॉल और रोज ढिठाई..ये सब करके लड़का समझ लेता है कि ‘हसीना मान जाएगी’, लेकिन ऐसा नहीं है जनाब। लड़की पटाने के लिए आपने फिल्मों से तो आइडिया ले लिया लेकिन ये फिल्म नहीं है, असल जिंदगी है, जहां जरूरी नहीं कि हर बार स्टॉकिंग का सबब हैप्पी एंडिंग हो। कहीं ऐसा न हो कि आपका जुनून आपको जेल के पीछे धकेले।

अक्सर हम छेड़छाड़ की खबरों रोजाना रूबरू होते हैं। कभी मनचले लड़कियों को छेड़ते हैं तो कभी कोई सिरफिरा आशिक अपने प्यार का हक जताने के लिए लड़कियों को प्रताड़ित करना शुरू कर देते है..और इसके बाद भी अगर सफलता ना मिले तो समझो लड़की का रास्ते से सफाया या फिर उस पर तेजाब फेंक दिया जाता है। ‘वो मेरी नहीं तो किसी की नहीं’..कुछ इसी तरह की भावना ये लड़के अपने मन में पाल लेते हैं। लेकिन ताज्जुब तो इन लड़कों की उन तकनीकों को देखकर होता है जो ये अपनाते हैं। सच मानिए, ये लड़कियों के लिए सिर्फ दहशत है, प्यार करते हैं तो मुस्कान दीजिए दहशत नहीं। हो सकता है कि आपकी हरकतों के कारण उसकी पढ़ाई छुड़वाकर घर बैठा दिया जाए, आप भी जानते हैं कि ये आज भी होता है। आप उसे प्यार करते हैं तो ये कैसा प्यार है जो अपने प्यार के सपनों को रौंदने की वजह बन जाए। प्यार जबरदस्ती नहीं होता, अगर सच में प्यार करते हैं तो कोशिश कीजिए और समझाइए और वह नहीं होता तो एक अच्छे दोस्त बनिए और उसे जिन्दगी में आगे बढ़ने में मदद कीजिए।

फिल्मों को समाज का आईना कहा जाता है यानि जो समाज में हो रहा है या होता है उसे ही फिल्मों में दिखाया जाता है। लेकिन अब तो स्थिति उलट ही नजर आती है। अब तो मनचले फिल्मों से सीखते हैं और उसे असल जिंदगी में अप्लाई करते हैं। सोचते हैं कि इस स्टाइल की वजह से फिल्म में हीरोइन मान गई तो असल जिंदगी में भी उनकी हसीना मान जाएगी लेकिन इसका अंजाम बहुत बुरा है।

 

खुद से प्यार कीजिए क्योंकि आप किसी को कितना भी चाहें, वह आपसे ज्यादा कीमती नहीं हो सकता। हम नहीं कहते कि अपना प्यार भुला दीजिए मगर उसे जहर नहीं अपनी ताकत बनाइए, अमृत बनाइए,  सृजनात्मक चीजों में अपनी भावनाएं लाइए, अपने काम में लाइए। जो प्यार आपको नहीं मिला, वह उनको बाँटिए जिसे इनकी वाकई जरूरत है क्योंकि आपकी संवेेदनाए कीमती हैं, उनको जाया नहीं होना चाहिए। प्यार जिन्दगी का हिस्सा हो सकता है, पूरी जिन्दगी नहीं होता। प्यार निभाने के और भी तरीके हैं और हर बार प्यार की मंजिल शादी हो, ये जरूरी नहीं, वह दोस्ती भी हो सकती है, बशर्ते आपका प्यार इस पर सहमत हो, अगर नहीं है तो उसे जाने दीजिए। जो आपका होगा, वह कहीं भी रहे, किसी न किसी रूप में लौटकर आएगा और नहीं आया तो वह आपके लिए था ही नहीं और जो आपका था ही नहीं, उसके लिए अपराध या प्रतिशोध की आत्मघाती राह चुनने का कोई मतलब नहीं है। मुमकिन है कि जिन्दगी आपको एक और मौका दे और एक पल ऐसा आए कि उसे भी अफसोस हो कि उसने आपका साथ क्यों नहीं दिया, तब वह आखिरी जीत आपकी होगी इसलिए मोहब्बत कीजिए मगर जबरदस्ती नहीं क्योंकि मोहब्बत है ये जी – हूजूरी नहीं।

 

 

इस महिला ने अपने देश में खाना फेंकने के खिलाफ छेड़ी मुहिम

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आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, गरीबी, जातिवाद इन तमाम चीजों के बाद ये दुनिया एक और बड़ी समस्या से जूझ रही है और वो है ‘फूड वेस्टिंग की समस्या’। दुनिया में करोड़ो लोग आज भी खाली पेट सोते हैं। हममें से न जानें कितने लोग हैं जो प्लेट में रखी पूरी रोटी भी खत्म नहीं कर पाते, उसे छोड़ देते हैं और वो वेस्ट ही हो जाता है।  खाना वेस्ट करने से हो सकता है हममें से किसी को फर्क  न पड़ता हो, लेकिन रूस की ये महिला इस बात से बेहद दुखी होती थी।

खुद में बदलाव लाओ, जमाना बदल जाएगा

इसी कथन की तर्ज पर सेलिना जुल ने अकेले दम पर ही एक देश की खाने की आदतों में सुधार ला दिया। 

सेलीना खाने को खराब या वेस्ट होते देखती, तो उनका दिल बैठ जाता है। एक ऐसी दुनिया में जहां हर रात करोड़ों लोग भूखे सोते हों। वे फूड वेस्ट को अपराध से कम नहीं समझती हैं। शायद यही कारण था कि उन्होंने खाने की बर्बादी के खिलाफ़ कदम उठाने का फ़ैसला किया। उनके अथक प्रयासों का ही नतीजा है कि आज डेनमार्क में खाने की बर्बादी में 25 प्रतिशत की कमी हुई है। सेलीना एक ऐसे देश से आती हैं (रूस), जहां दो वक्त का खाना मिलना भी दुर्लभ होता है। सेलीना के मुताबिक, हमारे देश का इंफ्रास्ट्रक्चर चरमरा गया है। कम्युनिज्म की वजह से देश के हालात बिगड़ गए। हमारी प्लेटों में खाना अब चुनौती की तरह नज़र आ रहा था।

डेनमार्क में ऐसे कई सुपरमार्केट्स थे जहां खाद्य पदार्थों की प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी। इन फूड आइटम्स की तादाद इतनी ज़्यादा थी कि कई चीज़ें ख़राब हो जाती। ट्रक भर-भर कर इन्हें फिंकवाया जाता या कम्पाउंड में भेजा जाता। डेनमार्क के लोग भी शायद इसलिए ही खाने के प्रति संवेदनहीन थे।

उन्होंने डेनमार्क के हालातों को देखते हुए ही फूड वेस्टेज के खिलाफ़ खड़े होने का निर्णय लिया। उन्होंने इससे जुड़ा एक फ़ेसबुक पेज बनाया। इसके अलावा उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को फूड वेस्ट के प्रति जागरुक करने की कोशिश की। उन्होने लोगों को बताया कि कैसे छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखने से खाने को खराब होने से बचाया जा सकता है।

उन्होंने डेनमार्क की एक सुपरमार्केट चेन रेमा 1000 को अपने साथ लिया। सेलीना की बात मानते हुए इस सुपरचेन ने खाने की चीज़ों पर बड़ी तादाद वाले उत्पादों पर डिस्काउंट्स को ख़त्म ही कर दिया और अब सिंगल आइटम्स पर ही डिस्काउंट उपलब्ध थे।

उन्होंने कहा कि हम आज उन हालातों में नहीं हैं कि खाने के सामान को सड़ने दिया जाए और फिर उसे कूड़े में फिंकवा दिया जाए। खाने की बर्बादी का कारण भी लोगों की खाने के प्रति लापरवाही ही है। फ्रिज की वजह से भी कई खाद्य पदार्थ खराब हो रहे हैं। लोग फ्रेश करने के चक्कर में कई बार चीज़ों को लंबे समय तक फ्रिज में रखे रहते हैं। आखिरकार ये फू़ड आइटम्स पेट में जाने की जगह कूड़े में चले जाते हैं।

अपने इस मिशन को दुनिया के कई हिस्सों में फैलाना चाहती हैं। सेलीना ने चेतावनी दी कि अगर पूरी दुनिया में खाने के वेस्ट को लेकर जागरुकता नहीं बरती गई, तो जल्दी ही विश्व का फूड साइकिल हिल जाएगा। वे अब अपने इस मिशन को दुनिया के कई हिस्सों में फैलाना चाहती हैं। उनका मकसद है कि खाने के प्रति लोगों में संवदेनशीलता को ग्लोबल स्तर पर भी प्रमोट किया जाए।

उन्होंने एक संस्था की भी स्थापना की है जिसका नाम है Stop Spild Af Mad… डेनमार्क सरकार ने इस संस्था को फूड वेस्टेज के खिलाफ लड़ाई में अहम बताया। वे अब सेमिनार होस्ट करती हैं, वर्कशॉप चलाती हैं।