Sunday, March 22, 2026
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शादी के बाद दामाद नहीं बेटा बनना चाहते हैं लड़के – सर्वे

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हमारे देश में दामाद को सिर आँखों पर बैठाया जाता है, इतनी इज्जत दी जाती है कि पूछिए मत। शायद ही कभी आपने सोचा हो कि अपनी बेटी को खुश रखने के लिए आप दामाद को सम्मान से लाद देते हैं, वह उसे असहज करती है। हमारे समाज में बहू को बेटी और दामाद को बेटा कहा तो जाता है मगर यह विचार लागू नहीं किया जाता। मुमकिन है कि पहले के समय में दामादों को बहुत ज्यादा आवभगत और सम्मान की जरूरत पड़ती थी मगर अब समय बदल रहा है और लड़के भी। अब वे आपका बेटा बनना चाहते हैं, उनको आपसे ऐसी इज्जत नहीं चाहिए जो उनको आपसे दूर कर दे, वे आपका बेटा बनकर आपके करीब आना चाहते हैं, यह हमारा विश्लेषण नहीं है बल्कि एक सर्वे में यह बात सामने आयी है। मेट्रोमोनी वेबसाइट की तरफ से कराएं गए सर्वे के अनुसार 100 प्रतिशत लड़के चाहते हैं कि उनके ससुर उन्हें दामाद की जगह बेटे की तरह व्‍यवहार करें। ज्‍यादात्‍तर लड़के चाहते हैं कि उन्‍हें उनके सुसराल में आदर की जगह प्‍यार मिलें। और वो ससुराल में एक दोस्ताना माहौल चाहते है।

इस सोशल मीडिया सर्वे का उद्देश्य ये जानना था कि भारतीय लड़के और लड़कियां अपने होने वाले ससुर जी से कैसा रिश्ता या व्यवहार चाहते हैं।  सर्वे, “मेरे ससुर कैसे हों (माय फादर-इन-लॉ-टू-बी)” में 2000 से ज़्यादा लोगों ने भाग लिया। लव मैरिज या अरेंज मैरिज, कौन सी होती है अच्‍छी? कुंवारे लड़के और लड़कियां अपने होने वाले ससुराल से कैसा रिश्ता और कैसा साथ चाहते हैं इसे जानने के लिए 10 प्रश्न रखे। सर्वे की मुख्य बातें –

बेटे की तरह प्‍यार करें –  100% लड़के चाहते हैं कि उनके ससुर उन्हें दामाद के बजाय बेटे की तरह व्‍यवहार करें। वे कहते हैं कि “वे आदरणीय होने से ज्यादा ससुराल में सबके चहेते होना ज्‍यादा पसंद करेंगे”।

ससुर कराएं सुलह – 60% लड़कियां चाहती हैं कि उनके और उनके पति के बीच कोई विवाद होने पर उनके ससुर सही गलत का निर्णय करें, 40% लड़के भी ऐसा ही मानते हैं।

सलाह लेना पसंद करेंगे – 73% लड़के अपने ससुराल वालों से सलाह या राय लेना पसंद करेंगे जब कि बाकी के 27% को ऐसी कोई अनचाही सलाह नहीं चाहिए। अधिकांश लड़के मानते हैं कि बड़े लोग अनुभवी होते हैं इसलिए उनसे सलाह ली जानी चाहिए।

फैमिली प्‍लानिंग खुद की पसंद से – 57% लड़के महसूस करते हैं कि पति-पत्नी को निर्णय लेना चाहिए कि बच्चे कब पैदा करने हैं, वहीं 43% लड़कियां भी ऐसा ही महसूस करती हैं।

आदर देंगे – 53% लड़कियां कहती हैं कि वे अपने सास-ससुर को मम्मी-पापा की तरह मानेंगी, जब कि 47% लड़के भी इस बात से सहमत हैं।

स्वच्छंद रहना पसंद करेंगे – अधिकतर लड़के-लड़कियां चाहती हैं कि शादी के बाद वे स्वच्छंद रहना पसंद करेंगे आखिर उन्हें ही अपनी ज़िंदगी साथ बितानी है।

(सााभार )

महिला पत्रकारों की उर्जा का सृजनात्मक उपयोग जरूरी है – विश्वम्भर नेवर

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कोलकाता : वरिष्ठ पत्रकार तथा ताजा टीवी समूह के चेयरमैन विश्वम्भर नेवर का कहना है कि आज महिला पत्रकारों की उर्जा का सृजनात्मक उपयोग जरूरी है। वेबपत्रिका अपराजिता के प्रथम वर्षपूर्ति समारोह में अपराजिता तथा रंगप्रवाह द्वारा भारतीय भाषा परिषद के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए मीडिया में अवसर भी हैं और चुनौती भी हैं।

भारतीय भाषा परिषद सभागार में आयोजित संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि हमारी सामाजिक सीमाओं के कारण काम नहीं कर पातीं। पुरुष और महिलाओं के बीच सहयोग की भावना जरूरी है।

 

वरिष्ठ आलोचक शम्भुनाथ ने कहा कि हिन्दी में यह पहली परिचर्चा हुई जिसमें महिला पत्रकारों ने सक्रिय भूमिका निभायीं। यह अच्छी शुरुआत है। पहले मीडिया में महिला पत्रकार कम मिलती थीं। आज कार्यक्षेत्र बढ़ा है। स्त्री की सबसे कमजोर आवाज मीडिया में है। मीडिया में स्त्री महज एक कथा है, वह ताकत नहीं बनी है। वह जब स्टोरी नहीं पावर के रूप में आएंगी तो एक गुणात्मक परिवर्तन होगा। अभी भी मीडिया पुरुष सत्ता का वर्चस्व है। 99 प्रतिशत सम्पादक पुरुष ही हैं और स्त्रियाँ भी पुरुष मूल्यों को ढो रही हैं।

डिजिटल ब्रांड्स की निदेशक रितुस्मिता विश्वास ने कहा कि मीडिया महज ग्लैमर और सेलिब्रिटी नहीं है। मीडिया ताकत की बात करती है। उत्पीड़न को सामने लाने के साथ यह जरूरी है कि अच्छे कामों पर बात की जाए जिससे सभी को प्रेरणा मिले। महिलाओं को उनकी पहचान मिलनी चाहिए।

आर जे नीलम ने कहा कि महिलाओं से उम्मीदें अधिक की जाती हैं और वे उन पर खरी भी उतरती हैं। उससे उम्मीद की जाती है कि वह घर में किसी की मदद लें। यूनिस्को के अनुसार 24 प्रतिशत महिलाएं ही ओपिनियन मेकर हैं। टीवी विज्ञापनों में भी महिलाओं से खूबसूरत दिखने की उम्मीद की जाती है। जब तक महिलाएं उत्पाद के तौर पर देखी जाती रहेंगी, स्त्रियाँ एक दूसरे का सहयोग नहीं करतीं तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी। न्यूज चैनल, अखबारों के मालिक और सम्पादक परिवर्तन लाने के लिए आगे बढ़ सकते हैं, उनको आगे आना होगा।

सलाम दुनिया के सम्पादक सन्तोष सिंह ने कहा कि मैं चीजों को सकारात्मक तरीके से देखने में विश्वास करता हूँ। अगर आप के अन्दर प्रतिभा है तो उसे कोई नहीं रोक सकता। सबको महसूस हो रहा है कि महिलाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। समस्याओं से आगे निकलकर समाधान खोजना होगा, ऐसी कोई बाधा नहीं है। संरचना बड़ा मसला है।

पत्रकार तथा कवियत्री पापिया पांडे ने कहा कि पहले ही पायदान पर महिलाएं हतोत्साहित की जाती हैं। सुरक्षा बड़ा मसला है। बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए।

अंगीरा नाटक का एक दृश्य। तस्वीर एक समीक्षक ने ली है

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में रंगप्रवाह के चर्चित नाटक अंगिरा का मंचन हुआ। नाटक में कल्पना ठाकुर और जयदेव दास के जबरदस्त अभिनय ने दर्शकों को मोहित कर दिया। कार्यक्रम का संचालन अपराजिता की सम्पादक सुषमा त्रिपाठी ने किया।

 

(सभी तस्वीरें साभार अदिति साहा)

क़ातिल मुंसिफ : एक और एनकाउंटर, हावड़ा में सोये हुए रंगमंच को जगाने का प्रयास

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एक लम्बे समय बाद हावड़ा रंगमंच पर एक ऐसा नाटक देखने को मिला, जो अपने भीतर कुछ सम्भावनाऐं सम्माहित किये हुए था। नीलांबर के सचिव और निर्देशक, रंगमंच के सक्रिय रंगकर्मी, अभिनेता ऋतेश पांडेय ने एक ऐसा कदम उठाया जो इस दौर में उठाने का ज़ोखिम रंगकर्मी आसानी से नहीं कर पाते हैं। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस इलैक्ट्रॉनिक युग में प्रेक्षागृह तक दर्शकों को ला पाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

फ्रेंच नाटककार दारियो फो द्वारा लिखे नाटक ‘एन एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनारकिस्ट‘ के हिन्दी रूपान्तरण ‘क़ातिल मुंसिफ‘ को देखने का मौका मिला। नीलांबर द्वारा प्रस्तुत इस नाटक का मंचन सरत सदन हावड़ा में किया गया। सशक्त पटकथा वाले इस नाटक का मंचन 11 फरवरी को हुआ था।

सबसे पहले हम नाटक की पटकथा पर आते हैं, तो हम पाते हैं कि नाटक में पुलिस प्रशासन की व्यवस्था को सटीक ढंग से उधेड़ा गया है, थाने में तथाकथित आतंकवादी की दुर्घाटना व मृत्यु हो जाने के पश्चात् जब पुलिसकर्मियों से बात-चीत की जाती है तो धीरे धीरे पर्त दर पर्त साफ होते जाते हैं और पता चलता है कि ये कोई दुर्घटना नहीं थी बल्कि जानबूझकर अंजाम दी गई घटना है, इस इन्वेस्टीगेशन के दौरान पुलिस प्रशासन की पोल खुलती चली जाती है और पता चलता है कि घटना को अंजाम देने के लिए ऊपर से नीचे तक पूरी प्रणाली दोषी है। घटनाक्रम के दौरान पुलिस व्यवस्था के साथ साथ समाज के अन्य बिन्दुओं पर भी रेखांकित किया गया है। नोबेल विजेता दारियो फो के इस नाटक की समकालीनता हमेशा बनी रहेगी। साथ ही नाटक को भारतीय परिवेश से जोड़ने की कोशिश भी की गई है, भोपाल के किसी गाँधीपुर की घटना का जिक्र भी किया जाता है, प्रकारान्तर से यह घटना सिमी उग्रवादियों की जेल फरारी और हत्या से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। नाटक के आरंभ में ही बैकग्राउंड से एनकाउंटर का परिवेश रचा गया और वहीं से दर्शक पूरी तरह से स्टेज पर आंखें गड़ाये रहता है और यह सिलसिला अंत तक बना रहता है। ये भी काबिलेतारीफ है कि रूपान्तरकार ने फ्रेंच नाटक को भारतीय जामा सटीक ढंग से पहनाया है।

नाटक की मंच सज्जा, वेशभूषा वाले पक्ष को देखें तो निर्देशक की तारीफ करनी होगी। बहुत ही कम साज सज्जा से नाटक प्रभावी बनाया।  पर पुलिस स्टेशन के दृश्य को और भी सुन्दर तरीके से सजाया जा सकता था। लेकिन माहौल वाकई एक थाने का सा लगता है। अगर कुछ छोटी-मोटी गलतियों को नज़रअंदाज कर दें तो मंच सज्जा व वेशभूषा नाटक को सफल बनाने के लिए अपना पूरा योगदान दे रहे हैं। संगीत व प्रकाश पक्ष पर बात करें तो कभी समझ नहीं आता कि संगीत और संवाद के बीच तालमेल क्या है, संगीत नाटक के लिए है ना कि नाटक संगीत के लिए, कई स्थानों पर संगीत पक्ष नाटक को सटीक भाव प्रदान करने पूर्णतया सक्षम होने के बावजूद संगीत पक्ष पर और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।

अगर हम अभिनय पक्ष पर नज़र डालते है, तो हम ऋतेश पांडेय जो कि नाटक में सनकी के पात्र को निभा रहे हैं, अपने चरित्र के साथ न्याय करते हुए नज़र आते हैं। सनकी का चरित्र नाटक में एक सूत्रधार की तरह से भी दिखाई देता है, जो कथानक को आगे बढा रहा है। ऋतेश पांडेय के अभिनय के लिए भी इस नाटक को याद किया जाना चाहिए। पुलिस के सिपाही की भूमिका निभा रहे कलाकार दीपक कुमार ठाकुर बार-बार दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। और बाकी कलाकारों में  पंकज सिंह (सब इंस्पेक्टर), विशाल पांडेय (इंस्पेक्टर) ने अच्छा अभिनय किया और प्रभावी रहे, परन्तु एस. पी (मनोज झा) अपने पद की गरिमा को बनाये रखने में बीच बीच में नाकाम से दिखाई दिये। कभी -कभी ये कलाकार अपने पात्रों की सीमा लॉघकर बाहर आते दिखाई देते हैं, जिस कारण नाटक के कसाव में कमी दिखाई देने लगती है। लेकिन ऐसा बस एक दो बार ही हुआ।  प्रेस रिपोर्टर के रूप में प्रियंका सिंह ने अच्छा काम किया पर संवाद अदायगी में वे थोड़ा जल्दी कर दे रही थीं। चोर के किरदार में विजय शर्मा ने बहुत ही उम्दा अभिनय किया पर उनके लिए कोई खास स्कोप नहीं था।

निर्देशन की दृष्टि से नाटक पूरी तरह से एक निर्देशक का नाटक नजर आता है, नाटक मे सशक्त निर्देशन नाटक पूरा देखने को मजबूर करता है। नाटक में स्थितियाँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि उसकी नाटकीयता को संतुलित बनाए रखना ही निर्देशक के लिए एक चुनौती बन जाती है। और निर्देशक उसमें सफल रहे। कुछ बिन्दुओं पर निर्देशक व रूपान्तरकार (स्क्रिप्ट राईटर) को समझने की जरूरत है कि हम नाटक को किस परिवेश में कर रहे हैं। ऐसे परिवेश में नाटक में अपशब्दों को अत्याधिक उपयोग नाटक को कमजोर करता है। इस बात पर ध्यान देने की अति आवश्यकता है।

कुल मिलाकर बहुत समय पश्चात् हावड़ा में एक लीक से हटकर नाटक देखने को मिला, जो यहां के सोये रंगकर्मियों को जागने पर मजबूर करेगा। मंच संस्था व ऋतेश पांडेय और ममता पांडेय की सरहाना करनी होगी कि दर्शकों व धन के अभाव केा झेल रहे हावड़ा रंगमंच को जीवंत करने में एक सक्षम प्रयास किया।

(सतीश शर्मा, रंगकर्मी और नाटककार)

अपराजिता….आप और एक साल का यह सफर

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आज अपराजिता एक साल की हो गयी। अपराजिता…वेब पत्रिका…कितना कुछ पढ़ते हैं हम इंटरनेट पर औरतों के बारे में…खबरें पढ़ते हैं, साहित्य पढ़ते हैं, सभी कुछ तो पढ़ते हैं मगर बात जब स्त्री की आती है तो पन्नों का दायरा आँगन, घर – परिवार, खूबसूरती, सेहत, फैशन, बाजार और रसोई तक सिमट जाता है, क्यों भला? पति कैसे खुश रहे, परिवार कैसे खुश रहे, बॉस कैसे खुश रहे….सभी कुछ तो स्त्री को लेकर होने वाली पत्रकारिता हमें बता रही है।

बजट से, देश की राजनीति से, अर्थव्यवस्था, खेल से….क्या इन सभी बातों से स्त्री को फर्क नहीं पड़ता? दरअसल, यह सब हमारी सोच से जुड़ा है, लड़का हो तो बन्दूक, लड़की हो तो गुड़िया, लड़का हो नीला और लड़की हो तो गुलाबी। समय बीता, औरतें अंतरिक्ष से लेकर सेना में जा रही हैं मगर पत्रकारिता में स्त्री ठहर गयी है और ठहर गयी है महिला पत्रकारों की दुनिया। अँग्रेजी और बांग्ला अखबारों को छोड़ दें तो लाइफस्टाइल और फीचर महिलाओं के जिम्मे है।

आज से 10 साल पहले जब मैं पत्रकारिता में आयी थी तो महिलाएं इस क्षेत्र में बेहद कम थीं और हिन्दी पत्रकारिता में तो न के बराबर। आज महिलाएं हैं और पहले की तुलना में उनकी स्थिति सुधरी भी है पर क्या उनके हालात भी सुधरे हैं? अगर ऊपरी तौर पर देखा जाए तो हाँ मगर थोड़ी गहराई में जाकर देखिए तो हालत वही है।

महिला पत्रकार दोहरी जिम्मेदारी निभाती है। काम तो वह अपने लिए कर रही है मगर उसकी जगह तो वही घर के भीतर परिवार और बच्चों को सम्भालने तक सीमित है। बहुत सी महिला पत्रकार यह दोहरा दायित्व कुशलतापूर्वक निभा भी रही हैं मगर यह सब इतना आसान नहीं है क्योंकि पत्रकारिता सुबह 10 से शाम 5 की नौकरी नहीं है।

बहुत सी महिलाओं ने इस वजह से या तो क्षेत्र ही छोड़ दिया या स्वतन्त्र पत्रकार के रूप में अपनी इच्छा पूरी कर रही हैं। इसके लिए उनको रोज एक लड़ाई लड़नी पड़ती है, घर का विरोध सहना पड़ता है या फिर घर की कमाई का एकमात्र माध्यम होने के कारण वह दोहरी चक्की में पिसती है। अपवादों को छोड़ दिया जाए अपनी स्वतन्त्र सोच और सम्मान के साथ काम करना महिलाओं के लिए इतना आसान नहीं है।

न तो उनकी बात रखने के लिए कोई संगठन था और न ही उसकी सोच को समझकर उसके क्षेत्र को विस्तृत रूप में रखने के लिए उसके हिस्से की खबरें चुनने वाली कोई गम्भीर पत्रिका दिखी। महिलाओं की सोच को महिलाओं के नजरिए से देखना जरूरी है। यही बात पुरुषों के बारे में कही जा सकती है। ढेरों पत्रिकाएं मगर पुरुषों की मानसिकता, जीवनशैली, सोच को रखने के लिए सकारात्मक लेखन हिन्दी में कम है।

आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई अखबार पुरुषों के लिए परिशिष्ठ निकाले और उनको ये बताए कि उनके सामने क्या विकल्प हैं या उनकी दुनिया में क्या हो रहा है। पुरुषों की जीवनशैली से जुड़ा कोई भी काम आसान नहीं है, खासकर फैशन की दुनिया में। पुरुष हमेशा खलनायक नहीं होते मगर उसका संवेदनशील पक्ष आज भी उसकी कमजोरी माना जाता है। मुझे ये सवाल हमेशा से परेशान करते रहे हैं….कुछ करना था मगर कौन करेगा….ये बड़ा प्रश्न था…पिछले 10 सालों में काम करते हुए यह कमी महसूस की और जब इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला तो दिल से आवाज आयी….चलो, कोशिश करके देखते हैं…अपराजिता वही प्रयास है।

काम करते हुए बहुत से अच्छे और बुरे अनुभव हुए और हर अनुभव ने मजबूत बनाया। आपको अपराजिता में विज्ञापन नहीं दिखते और इसकी वजह यह नहीं है कि विज्ञापनों से कोई मोहभंग हुआ है मगर वह वह प्राथमिकता तब नहीं थी। स्वतन्त्र होकर काम करने के लिए मानसिक दबाव से मुक्त होना जरूरी था..इसलिए तब ध्यान नहीं दिया। अब देना है। कोई बड़ा नाम नहीं था और न ही किसी बड़े समूह का साथ मगर बड़ों का आशीर्वाद रहा है और आप लोगों का प्यार है कि आज 10 हजार से अधिक लोग वेबपत्रिका को जानते हैं। कोशिश जारी है, बस सहयोग की जरूरत है।

लखनऊ में महिलाओं ने बनाई मस्जिद, कहा – चुनाव में रहम नहीं हक चाहिए

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साल 2000 की एक दोपहर में यह मुस्लिम महिला स्कूल जाने वाले अपने बेटे को लेकर स्कूटर पर कुछ ढूंढ रही थी। उन दिनों लखनऊ का तेलीबाग इलाक़ा न तो इतना आबाद था और न ही इस महिला को कोई मस्जिद मिल रही थी।

आख़िरकार शाइस्ता अंबर को एक मस्जिद मिली लेकिन इमाम ने उनके बेटे को अपने पास बुलाते ही शाइस्ता से दूर जाने को कहा। शाइस्ता याद करतीं हैं, “शौहर सरकारी अफ़सर थे और कहीं पोस्टेड थे। मुझे लगा कि बेटे को मैं ही ले जा कर नमाज़ पढ़वा दूं, लेकिन जितनी हिकारत से मुझे मस्जिद के दरवाज़े से हटने को कहा गया बस मैंने ठान लिया की महिलाओं के लिए भी मस्जिद होनी चाहिए”.

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शाइस्ता उन दिनों को याद कर के भावुक हो उठती हैं। नम आंखों से कहा, “पति से लेकर मेरे अपने पिता से भी मेरी तकरार होती रही। मुझे बाहर से धमकियाँ मिलती रहीं. मेरी कार के टायर पंक्चर कर दिए जाते थे, लेकिन बस मन में कहीं एक भरोसा था कि जो कर रहीं हूँ उसे ऊपर वाला समझ रहा होगा।

ज़मीन लेकर वर्ष 2005 में अंबर मस्जिद बन कर तैयार हुई और पहले महिलाओं और फिर पुरुषों ने भी यहाँ साथ-साथ नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी। ट्रिपल तलाक़ जैसे मामलों पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से इत्तेफ़ाक़ न रखने वाली शाइस्ता और उनकी सोच वाली कुछ और महिलाओं ने एक और साहसी क़दम उठाया।

इन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना कर दी जिससे ‘महिलाओं के हितों की रक्षा की जा सके’. पिछले 10 वर्षों से हर शुक्रवार इस मस्जिद में महिलाओं के लिए कई तरह के कैंप लगते हैं जिनमें राशन कार्ड से लेकर बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

हाल ही में इस मस्जिद में कुछ ग़ैरसरकारी संगठनों की मदद से एक सोलर पावर प्लांट भी लगवाया गया है.पर्यावरण मामलों की जानकार सीमा जावेद ने बताया कि इसके पीछे कोशिश यही थी कि प्रार्थना करने की ये जगह भी ग्रीन या पर्यावरण का बचाव करने वाली हो।

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उन्होंने कहा, “चूंकि मस्जिद के प्रांगण में बाहर लोग रहते हैं. दिन भर काम चलता रहता है तो बिजली का खर्च भी कम हो सकेगा, लेकिन उससे महत्वपूर्ण ये है कि पर्यावरण बचाव में ये योगदान भी दे सकेगी”.

मस्जिद में नियमित आने वाले कई पुरुषों ने भी इस बात की हामी भरी कि यहाँ महिलाओं के उत्थान के लिए उठाए जा रहे क़दम सराहनीय हैं। फिलहाल जब उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव जारी हैं तब यहाँ पर प्रार्थना करने वाली कुछ महिलाओं ने अपनी बेबसी के बारे में भी बताया.

36 वर्षीय मुनीरन ने कहा, “तीन साल हो गए, यहाँ से बस दो किलोमीटर दूर रहते हैं. तीन बार फ़ॉर्म भी भरा लेकिन वोटर आईडी आज तक नहीं बनवा सके हैं। नूरजहाँ नामक एक दूसरी महिला की शिकायत उन नेताओं से है जो प्रचार के समय वादे कर बाद में भूल जाते है.

आख़िरकार शाइस्ता ने ज़्यादातर का दर्द ये कह कर समेटा कि, “संसद में कितनी महिलाएं हैं? इन चुनावों में कितनी महिलाओं को टिकट मिला? हमें बराबरी चाहिए, रहम नहीं”.

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

यूपी की इन महिलाओं के आगे है चुनाव जीतने की चुनौती

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शनिवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा के पहले चरण में 15 ज़िलों की कुल 73 सीटों पर होने वाले मतदान के साथ ही राज्य में चुनावी घमासान शुरू हो चुका है। करीब महीने भर तक चलने वाले इस घमासान में तिकोना मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी-कांग्रेस एलायंस और बहुजन समाज पार्टी के बीच माना जा रहा है, हालांकि पहले चरण में अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल इसे चतुष्कोणीय बना रहा है।

इस लिहाज से देखें तो यूपी का चुनाव बेहद दिलचस्प होने जा रहा है, ऐसे में हम आपको यूपी के उन चार महिला उम्मीदवारों के बारे में बता रहे हैं, जिनकी उम्मीदवारी ने स्थानीय स्तर मुक़ाबले को दिलचस्प बना दिया है। इन चार में जो एक बात सबसे ख़ास है- वो ये है कि इन महिलाओं के सामने उस सीट को जीतने की चुनौती दी गई है, जहां अब तक के इतिहास में उनकी पार्टी ने कभी चुनाव नहीं जीता है।

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राजबाला चौधरी: पहले चरण में जिन सीटों पर चुनाव होना है उनमें बागपत का छपरौली भी है। इसे अजित सिंह का गढ़ माना जाता है लेकिन अजित सिंह के दबदबे को बहुजन समाज पार्टी की राजबाला चौधरी चुनौती दे रही हैं। करीब 55 साल की राजबाला बीते दस महीने से चुनाव प्रचार कर रही हैं। वे मौजूदा समय में नगर पंचायत की चेयरमैन हैं। उनको उम्मीद है कि लोग उनके काम को देख कर लोग उन्हें वोट देंगे।

राजबाला ख़ुद जाट हैं और छपरौली की ही हैं। उनके पति नरेश राठी कभी राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकर्ता हुआ करते थे, लेकिन 12 साल पहले उनकी हत्या कर दी गई थी। राजबाला कहती हैं वह अपने पति के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए चुनाव मैदान में उतरी हैं।

उनका एक बेटा कुख्यात अपराधी सुनील राठी है जो फिलहाल उत्तराखंड की जेल में बंद है। दूसरी ओर, चौधरी अजित सिंह की पार्टी से यहां से सहेंद्र रमेला को चुनाव मैदान में हैं। उनके मुताबिक बेटे की छवि के चलते राजबाला कई जगहों पर चुनाव प्रचार करने में कामयाब हुई हैं, नहीं तो यहां राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार के सामने कोई चुनाव प्रचार भी नहीं कर पाता था।

इस सीट पर मुक़ाबला इन्हीं दोनों में माना जा रहा है. वैसे ये वही सीट है जहां 1937 से लेकर 1974 तक होने वाले चुनाव में चौधरी चरण सिंह जीतते रहे और बाद में भी उनकी पार्टी लोकदल का यहीं दबदबा रहा है।

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अपर्णा यादव: समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव चाहतीं थी कोई आसान सीट से चुनाव लड़ सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपने लिए लखनऊ कैंट की उस सीट का चुनाव किया, जहां से अब तक समाजवादी पार्टी कभी चुनाव नहीं जीत पाई है। लखनऊ कैंट पर विधानसभा के तीसरे चरण में 19 फरवरी को चुनाव होना है.

अपर्णा यादव इस बारे में कहती हैं, “मेरा तो जन्म ही लखनऊ कैंट में हुआ है, तो मैं अपने लोगों को छोड़कर कहां से चुनाव लड़ती। मैं अपनी जन्मभूमि के लोगों के बीच ही काम करना चाहती हूं।”

इस सीट पर अपर्णा का मुक़ाबला मौजूदा विधायक रीता बहुगुणा जोशी से है, जो कांग्रेस से भारतीय जनता पार्टी के पाले में आई हैं। रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, “मैंने इलाके की विधायक के तौर पर जितना काम किया है, उसका फ़ायदा मुझे हर गली मुहल्ले में मिलता दिख रहा है।”

वहीं 28 साल की अपर्णा के मुताबिक उनकी इस सीट पर उम्मीदवारी ये साबित करती है कि समाजवादी पार्टी शहरी मतदाताओं के बीच भी अपनी पैठ बना चुकी है।

Lucknow: Expelled BJP leader Daya Shankar Singh's wife Swati Singh (C) and mother Tetra Devi (Left) give a CD to Governor Ram Naik at Rajbhawan demanding action against BSP leaders and security for them in Lucknow on Sunday. PTI Photo by Nand Kumar  (PTI7_24_2016_000210B)

स्वाति सिंह: मायावती पर अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में भारतीय जनता पार्टी से निकाले गए नेता दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को बीजेपी ने सरोजनीनगर से अपना उम्मीदवार बनाया है। स्वाति सिंह पिछले कुछ महीनों से बीजेपी की यूपी महिला विंग की अध्यक्ष हैं। उनके सामने दो बड़ी मुश्किल है- पहली मुश्किल तो यही है कि सरोजनीनगर में अब तक बीजेपी ने कभी चुनाव नहीं जीता है।

लेकिन स्वाति सिंह के सामने दूसरी चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है। समाजवादी पार्टी ने राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चचेरे भाई अनुराग यादव को उम्मीदवार बनाया है। अनुराग यादव को अखिलेश की मौजूदा सरकार के मंत्री रहे शारदा प्रताप शुक्ल का टिकट काटकर उम्मीदवार बनाया गया है, जो अब राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं।

स्वाति कहती हैं, “पहले हम लोग चाहते थे कि पार्टी बलिया से हमें उम्मीदवार बनाए। मेरा घर है और पति का ननिहाल भी। वहां चुनौती आसान होती लेकिन सरोजनीनगर में भी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बदौलत हम समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को कड़ी चुनौती देंगे।.”

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आयशा बेगम: उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण का मतदान 15 फरवरी को होना है। इसमें पीलीभीत ज़िले का पूरणपुर(सुरक्षित सीट) पर भी वोट डाले जाएंगे। इस सीट पर पहली बार राष्ट्रीय लोकदल को जीत दिलाने की चुनौती आयशा बेगम पर है। 38 साल की आयशा बेगम जिला पंचायत की सदस्य हैं. वो पहले तो हिंदू थीं लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकर्ता रिज़वान ख़ान से शादी के बाद वह आयशा बेगम बन गईं। रिज़वान के मुताबिक वे बीते कई सालों से लोकदल के लिए इलाके में काम करते रहे हैं और उनकी पत्नी को मुस्लिम और दलितों का साथ मिलेगा।

किसान बहुल्य और खेतीबारी वाले इस इलाके में मुख्य मुक़ाबला समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक पीतमराम और भारतीय जनता पार्टी के बाबूराम पासवान के बीच है लेकिन आयशा बेगम का दावा है कि उनकी चुनौती किसी से कमज़ोर नहीं है।

इन चार महिलाओं के सामने वो इतिहास बनाने की चुनौती है, जो उनकी पार्टी अब तक नहीं दिखा पाई है। वैसे, इस बार उत्तर प्रदेश चुनाव के मैदान मे महिला उम्मीदवारों की संख्या बहुत ही कम है। भारतीय जनता पार्टी ने 371 में 42 महिलाओं को टिकट दिए हैं जबकि समाजवादी पार्टी ने 298 में 31 महिला उम्मीदवार खड़े किए हैं.

बहुजन समाज पार्टी ने पूरे राज्य में केवल 19 महिलाओं को टिकट दिया है, वहीं कांग्रेस ने 105 सीटों में छह सीटों पर महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

कश्मीरी लड़कियों में सिविल सेवा का बढ़ता क्रेज़

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कश्मीर सिर्फ आतंक का नाम नहीं है।  यहाँ के युुवा हर क्षेत्र  में आगे आ रहे हैं और लड़कियों में भी आत्मनिर्भर होने की चाह दिख रही है।   सेहर, इक़रा, समरीन और फ़ौज़िया साल भर से सिविल सर्विसेज़ इम्तिहान की तैयारी कर रही हैं। कश्मीर में सिविल सर्विसेज़ के लिए ज़्यादातर मर्द ही आगे आते रहे हैं, लेकिन अब न सिर्फ़ औरतें सामने आ रही हैं बल्कि अब गांवों से आनेवाली महिलाओं की तादाद भी बढ़ रही है।

पहलगाम की रहनेवाली 22 साल की सेहर कहती हैं कि लोग बेटियों को बोझ समझते हैं और मैं उस नज़रिये को बदलना चाहती हूं। उन्होंने कहा, “माँ बाप को नहीं लगना चाहिए कि बेटियां नहीं होनी चाहिए।.”

सेहर को लगता है कि सिविल सर्विसेज़ में आने के बाद वो महिलाओं की बेहतरी के लिए बहुत कुछ कर सकती हैं। सेहर के पिता एक निजी स्कूल में काम करते हैं और आईएएस टॉपर शाह फैसल उनके रोल मॉडल हैं। पिछले साल भी सिविल सर्विसेज़ में एक कश्मीरी लड़के को चुना गया था।

सोपोर निवासी इक़रा जो पहले पत्रकार बनना चाहती थीं, लेकिन अब वो बीटेक करने के बाद सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रही हैं। इक़रा को घर वालों से पैसे माँगना अच्छा नहीं लगता तो उन्हें लगा कि वो नौकरी के लिए इस रास्ते को आज़मा सकती हैं और अधिकारी बनकर महिलाओं के लिए कुछ कर सकती हैं।

कुपवाड़ा की 20 साल की समरीन को लगता है कि महिलाओं को हर जगह ख़ौफ़ में जीना पड़ता है और वो उसके ख़िलाफ़ जंग करना चाहती हैं। समरीन की रोल मॉडल रोहिदह सलाम हैं जो कुछ सालों पहले आईपीएस के लिए चुनी गई थीं।

साल 2011 में दक्षिणी कश्मीर के बिजबिहाड़ाह इलाके की रहने वाली नाज़िया जान ने जेकेएएस (जम्मू कश्मीर की राज्य प्रशासनिक सेवा) परीक्षा पास की थी। नाज़िया अब एक एक्साइज अफ़सर हैं. श्रीनगर में इस समय सिविल सर्विसिेज़ के आठ कोचिंग सेंटर हैं जिनमें 30 प्रतिशत महिलाएं सिविल सर्विसेज़ की कोचिंग कर रही हैं।

सिविल सर्विसेज़ कोचिंग एसोसिएशन के मुखिया जी. एन. वार कहते हैं कि पहले लोगों को यहां सिविल सर्विसेज़ परीक्षा के बारे में मालूम ही नहीं था। इनमें से एकने तो इस साल से सिवाए मामूली रजिस्ट्रेशन फ़ीस के किसी और तरह के पैसे लेना बंद कर दिया है जिससे महिलाओं को मदद मिल रही है.

अनंतनाग में कुछ स्थानीय अधिकारियों ने सिविल सर्विसेज़ कोचिंग की शुरुआत की है जहां किसी तरह का कोई पैसा नहीं देना पड़ता है। वहां भी लगभग 25 फ़ीसद महिलाएं हैं जो इन क्लासेज़ को अटेंड कर रही हैं।

श्रीनगर के बाग़ात में कोचिंग सेंटर चलाने वाले उमर जान कहते हैं कि उनके सेंटर में लड़कियों की तादाद अभी 28 के क़रीब हैं जिनमें से 25 ग्रामीण कश्मीर की हैं. उमर के मुताबिक़ ये संख्या हाल के सालों में बढ़ती जा रही है।

 

अब गांव और कस्बों में सफाई कराएंगी अनुष्का शर्मा

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बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के बाद अब खूबसूरत अदाकारा अनुष्का शर्मा प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बन गई हैं। शहरी विकास मंत्रालय ने अभिनेत्री अनुष्का शर्मा को राष्ट्रव्यापी स्वास्थ्य और स्वच्छता अभियान के हिस्से के रूप में चुना है यानी अब अनुष्का गांव और कस्बों में खुले में शौच करने और महिला केंद्रित पहलुओं को देखेंगी।ऐसा माना जा रहा है कि युवाओं के बीच अनुष्का की प्रसिद्धि और महिलाओं के बीच लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्हें मंत्रालय द्वारा नियुक्त किया गया है। ऐसे में विभिन्न मुद्दों पर गांव की महिलाओं से बात करना अनुष्का शर्मा के लिए मुश्क‍िल नहीं होगा। आईएएनएस के एक हालिया साक्षात्कार में अनुष्का शर्मा ने कहा था कि खूबसूरती आपकी सहूलियत में है और अपने अनोखे अंदाज में हर महिला खूबसूरत दिखती है।

 

तुम मेरे कौन हो

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तुम मेरे कौन हो कनु

मैं तो आज तक नहीं जान पाई

बार-बार मुझ से मेरे मन ने
आग्रह से, विस्मय से, तन्मयता से पूछा है-
‘यह कनु तेरा है कौन? बूझ तो !’

बार-बार मुझ से मेरी सखियों ने
व्यंग्य से, कटाक्ष से, कुटिल संकेत से पूछा है-
‘कनु तेरा कौन है री, बोलती क्यों नहीं?’

बार-बार मुझ से मेरे गुरुजनों ने
कठोरता से, अप्रसन्नता से, रोष से पूछा है-
‘यह कान्ह आखिर तेरा है कौन?’

मैं तो आज तक कुछ नहीं बता पाई
तुम मेरे सचमुच कौन हो कनु !

अक्सर जब तुम ने
माला गूँथने के लिए
कँटीले झाड़ों में चढ़-चढ़ कर मेरे लिए
श्वेत रतनारे करौंदे तोड़ कर
मेरे आँचल में डाल दिये हैं
तो मैंने अत्यन्त सहज प्रीति से
गरदन झटका कर
वेणी झुलाते हुए कहा है :
‘कनु ही मेरा एकमात्र अंतरंग सखा है !’

अक्सर जब तुम ने
दावाग्नि में सुलगती डालियों,
टूटते वृक्षों, हहराती हुई लपटों और
घुटते हुए धुएँ के बीच
निरुपाय, असहाय, बावली-सी भटकती हुई
मुझे
साहसपूर्वक अपने दोनों हाथों में
फूल की थाली-सी सहेज कर उठा लिया
और लपटें चीर कर बाहर ले आये
तो मैंने आदर, आभार और प्रगाढ़ स्नेह से
भरे-भरे स्वर में कहा है:
‘कान्हा मेरा रक्षक है, मेरा बन्धु है
सहोदर है।’

अक्सर जब तुम ने वंशी बजा कर मुझे बुलाया है
और मैं मोहित मृगी-सी भागती चली आयी हूँ
और तुम ने मुझे अपनी बाँहों में कस लिया है
तो मैंने डूब कर कहा है:

‘कनु मेरा लक्ष्य है, मेरा आराध्य, मेरा गन्तव्य!’

पर जब तुम ने दुष्टता से
अक्सर सखी के सामने मुझे बुरी तरह छेड़ा है
तब मैंने खीझ कर
आँखों में आँसू भर कर
शपथें खा-खा कर
सखी से कहा है :
‘कान्हा मेरा कोई नहीं है, कोई नहीं है
मैं कसम खाकर कहती हूँ
मेरा कोई नहीं है !’

पर दूसरे ही क्षण
जब घनघोर बादल उमड़ आये हैं
और बिजली तड़पने लगी है
और घनी वर्षा होने लगी है
और सारे वनपथ धुँधला कर छिप गये हैं
तो मैंने अपने आँचल में तुम्हें दुबका लिया है
तुम्हें सहारा दे-दे कर
अपनी बाँहों मे घेर गाँव की सीमा तक तुम्हें ले आई हूँ
और सच-सच बताऊँ तुझे कनु साँवरे !
कि उस समय मैं बिलकुल भूल गयी हूँ
कि मैं कितनी छोटी हूँ
और तुम वही कान्हा हो
जो सारे वृन्दावन को
जलप्रलय से बचाने की सामर्थ्य रखते हो,
और मुझे केवल यही लगा है
कि तुम एक छोटे-से शिशु हो
असहाय, वर्षा में भीग-भीग कर
मेरे आँचल में दुबके हुए

और जब मैंने सखियों को बताया कि
गाँव की सीमा पर
छितवन की छाँह में खड़े हो कर
ममता से मैंने अपने वक्ष में
उस छौने का ठण्डा माथा दुबका कर
अपने आँचल से उसके घने घुँघराले बाल पोंछ दिए
तो मेरे उस सहज उद्गार पर
सखियाँ क्यों कुटिलता से मुसकाने लगीं
यह मैं आज तक नहीं समझ पायी!

लेकिन जब तुम्हीं ने बन्धु
तेज से प्रदीप्त हो कर इन्द्र को ललकारा है,
कालिय की खोज में विषैली यमुना को मथ डाला है
तो मुझे अकस्मात् लगा है
कि मेरे अंग-अंग से ज्योति फूटी पड़ रही है
तुम्हारी शक्ति तो मैं ही हूँ
तुम्हारा संबल,
तुम्हारी योगमाया,
इस निखिल पारावार में ही परिव्याप्त हूँ
विराट्,
सीमाहीन,
अदम्य,
दुर्दान्त;

किन्तु दूसरे ही क्षण
जब तुम ने वेतसलता-कुंज में
गहराती हुई गोधूलि वेला में
आम के एक बौर को चूर-चूर कर धीमे से
अपनी एक चुटकी में भर कर
मेरे सीमन्त पर बिखेर दिया
तो मैं हतप्रभ रह गयी
मुझे लगा इस निखिल पारावार में
शक्ति-सी, ज्योति-सी, गति-सी
फैली हुई मैं
अकस्मात् सिमट आयी हूँ
सीमा में बँध गयी हूँ
ऐसा क्यों चाहा तुमने कान्ह?

पर जब मुझे चेत हुआ
तो मैंने पाया कि हाय सीमा कैसी
मैं तो वह हूँ जिसे दिग्वधू कहते हैं, कालवधू-
समय और दिशाओं की सीमाहीन पगडंडियों पर
अनन्त काल से, अनन्त दिशाओं में
तुम्हारे साथ-साथ चलती आ रही हूँ, चलती
चली जाऊँगी…

इस यात्रा का आदि न तो तुम्हें स्मरण है न मुझे
और अन्त तो इस यात्रा का है ही नहीं मेरे सहयात्री!

पर तुम इतने निठुर हो
और इतने आतुर कि
तुमने चाहा है कि मैं इसी जन्म में
इसी थोड़-सी अवधि में जन्म-जन्मांतर की
समस्त यात्राएँ फिर से दोहरा लूँ
और इसी लिए सम्बन्धों की इस घुमावदार पगडंडी पर
क्षण-क्षण पर तुम्हारे साथ
मुझे इतने आकस्मिक मोड़ लेने पड़े हैं
कि मैं बिलकुल भूल ही गयी हूँ कि
मैं अब कहाँ हूँ
और तुम मेरे कौन हो
और इस निराधार भूमि पर
चारों ओर से पूछे जाते हुए प्रश्नों की बौछार से
घबरा कर मैंने बार-बार
तुम्हें शब्दों के फूलपाश में जकड़ना चाहा है।
सखा-बन्धु-आराध्य
शिशु-दिव्य-सहचर
और अपने को नयी व्याख्याएँ देनी चाही हैं
सखी-साधिका-बान्धवी-
माँ-वधू-सहचरी
और मैं बार-बार नये-नये रूपों में
उमड़- उम़ड कर
तुम्हारे तट तक आयी
और तुम ने हर बार अथाह समुद्र की भाँति
मुझे धारण कर लिया-
विलीन कर लिया-
फिर भी अकूल बने रहे

मेरे साँवले समुद्र
तुम आखिर हो मेरे कौन
मैं इसे कभी माप क्यों नहीं पाती?

(कनुप्रिया से)

प्यार भरी बातों में भरे चॉकलेटी स्वाद का जादू

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चॉकलेट फज

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सामग्री -एक कप कटे हुए ड्राई फ्रूट्स (बादाम, काजू, पिस्ता आदि), एक कप दूध, डेढ़ कप चीनी, 100 ग्राम मक्‍खन, आधा चम्मच वेनिला एसेंस, ढाई चम्मच कोको पाउडर

विधि – गैस पर पैन में मक्‍खन गरम करें और इसमें चीनी डालकर पकाएं। जब चीनी पिघलने लगे तो इसमें दूध डालें और चम्‍मच की मदद से मिलाएं।  अब इस में कोको पाउडर डालें और धीमी आंच पर करीब 20 मिनट तक पकाएं।  जब मिश्रण नरम और गाढ़ा हो जाए तो इसमें आधा चम्‍मच वेनिला एसेंस डालें। मिश्रण को चम्‍मच की मदद से चलाते रहें।  अब ड्राई फ्रूट्स डालें और लकड़ी की चम्मच से नरम होने तक चलाते रहें।  इसे गहरे तले की प्लेट में निकाल कर फ्रिज में 1 से 2 घंटे या अपने हिसाब से रखें। लीजिए तैयार है चॉकलेट फज। बर्फी के आकार में काट कर सर्व करें।

 

 

हॉट चॉकलेट

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सामग्री – 1 कप दूध, डेढ़ चम्मच कोको पाउडर, 2 चम्मच चीनी, 2 बूंद वनिला एसेंस, क्रीम, मार्शमैलोज़, चॅाकलेट सिरप

विधि – एक कप में कोका पाउडर, चीनी और 1-2 चम्मच दूध डालकर अच्छे से फेंट लें।  अब इस मिक्स को एक पैन में डालें और बाकी का दूध भी इसमें मिला लें । पैन को गैस पर रख कर गर्म करें। जैसे ही दूध गर्म हो जाए, उबाल आने से पहले ही तुरंत वनिला एसेंस की 2 बूंद डालें और गैस बंद कर दें। फिर इस दूध को अच्छी तरह से ब्लेंड कर लें। हॅाट चॅाकलेट तैयार है. इसे क्रीम, मार्शमैलोज़ और चॅाकलेट सिरप से गार्निश करके सर्व करें।