Tuesday, September 29, 2026
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वैज्ञानिक, शिक्षाविद यश पाल का निधन

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नयी दिल्ली : कॉस्मिक किरणों के अध्ययन एवं शिक्षा संस्थानों के निर्माण में अपने योगदान के लिए पहचाने जाने वाले मशहूर भारतीय वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद प्रोफेसर यश पाल का निधन हो गया। उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा, ‘‘प्रोफेसर यश पाल के निधन से दुखी हूं। हमने एक वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद खो दिया जिन्होंने भारतीय शिक्षा में अपना बहमूल्य योगदान दिया है।’’ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष यशपाल ने अपना करियर टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च से शुरू किया था और उन्हें उनके योगदान के लिए देश के दूसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म् विभूषण से सम्मानित किया गया था ।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके निधन पर शोक जाहिर करते हुए कहा कि कॉस्मिक किरणों केअध्ययन , शिक्षा संस्था निर्माण और उल्लेखनीय प्रशासक के तौर पर उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें याद किया जाएगा।
कांग्रेस उपाध्यक्ष ने शिक्षाविद के निधन को एक बड़ी क्षति बताया। राहुल ने ट्वीट किया, ‘‘एक वैज्ञानिक एवं उत्साही शिक्षक, जो सीखने और सिखाने का महत्व समझते थे, प्रोफेसर यश पाल का निधन हमारे लिए एक बड़ी क्षति है।’’ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्री हर्षवर्धन ने ट्वीट किया, ‘‘पूर्ण विज्ञान के लिए प्रोफेसर यश पाल आपका शुक्रिया। आपको जाता देखना काफी दुखद है, यह बेहद बड़ी क्षति है लेकिन आप हमेशा हमारे साथ रहेंगे। ओम शांति।’’

 

एडविना और नेहरू में प्रेम था, एक दूसरे का सम्मान करते थे

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भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लूईस माउंटबेटन की पुत्री के मुताबिक जवाहरलाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन आपस में प्रेम करते थे और एक-दूसरे का काफी सम्मान करते थे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनके बीच के रिश्ते कभी भी जिस्मानी नहीं रहे क्योंकि वे कभी अकेले नहीं मिले थे।

पामेला कहती हैं, मैंने अपनी मां एडविना एश्ले और नेहरू के बीच गहरे संबंध विकसित होते हुए देखा था। उन्हें पंडितजी में वह साथी, आत्मिक समानता और बुद्धिमतता मिली, जिसे वह हमेशा से चाहती थीं। उन्होंने बताया कि मां को लिखे नेहरू के एक पत्र को पढ़ने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि पंडितजी और मेरी मां किस कदर आपस में प्रेम करते थे और एक-दूसरे का सम्मान करते थे।

‘डॉटर ऑफ एंपायर : लाइफ एज ए माउंटबेटन’ नामक अपनी पुस्तक में पामेला ने लिखा है कि मेरी मां या पंडितजी के पास जिस्मानी संबंधों के लिए समय नहीं था, दोनों अकेले में कम ही होते थे। दोनों हमेशा कर्मचारियों, पुलिस और दूसरे लोगों से घिरे होते थे।

पामेला की यह पुस्तक ब्रिटेन में पहली बार 2012 में प्रकाशित हुई थी। अब यह पुस्तक पेपरबैक की शक्ल में भारत आई है। माउंटबेटन के एडीसी फ्रेडी बर्नबाई एत्किन्स ने पामेला को बताया था कि नेहरू और उनकी मां का जीवन इतना सार्वजनिक था कि दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ते संभव ही नहीं थे।

पामेला ने किताब में लिखा है कि माउंटबेटन परिवार के विदाई समारोह में नेहरू ने सीधे एडविना को संबोधित किया था। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि आप (एडविना) जहां भी गई हैं, आपने उम्मीद और उत्साह जगाया है। कहते हैं कि माउंटबेटन जब भारत के अंतिम वायसराय नियुक्त होकर आए थे, उस समय पामेला हिक्स नी माउंटबेटन करीब 17 साल की थीं।

नेहरू को पन्ने की अंगूठी भेंट करना चाहती थीं एडविना
पामेला ने किताब में लिखा है कि भारत से जाते हुए एडविना अपनी पन्ने की अंगूठी पंडितजी को भेंट करना चाहती थीं। हालांकि वह यह भी जानती थीं कि नेहरू इसे स्वीकार नहीं करेंगे। इसी वजह से उन्होंने वह अंगूठी उन्होंने इंदिराजी को दे दी थी। उन्होंने इंदिराजी से कहा था कि यदि पंडितजी कभी भी वित्तीय संकट में पड़ते हैं, तो उनके लिए इसे बेच दें क्योंकि वे अपना सारा धन बांटने के लिए चर्चित हैं।

 

देश के 13वें उपराष्ट्रपति होंगे वेंकैया नायडू

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वेंकेया नायडू देश के 13वें उपराष्ट्रपति बन गए हैं। नायडू ने एनडीए उम्मीदवार के तौर पर उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार गोपालकृष्ण गांधी को हराया। वैंकेया नायडू को 516 वोट मिले, तो गोपालकृष्ण गांधी को 244 मिले। वैंकेया नायडू ने गोपालकृष्ण गांधी को 272 वोटों से हराया। प्रधानमंत्री मोदी ने वैंकेया नायडू को बधाई दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी में वैंकेया नायडू के साथ काम करने वाले दिनों को याद करते हुए कहा कि वैंकेया नायडू देश को आगे ले जाएंगे। हमें सहयोग मिलता रहेगा। इससे पहले, देश का 13वां उपराष्ट्रपति तय करने के लिए शनिवार को संसद के दोनों सदनों के सदस्यों ने वोटिंग की। उपराष्ट्रपति पद के लिए शनिवार को संसद भवन में मतदान हुआ, जिसमें 771 सांसदों ने वोट डाले। कुल 785 सांसदों को वोट करना था। इस तरह से 98.21 प्रतिशत सांसदों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतगणना की शुरुआत से ही वैंकेया नायडू ने बढ़त बना ली। और आखिर तक उन्होंने बढ़त बनाए रखी।

उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में बीजेपी की जीत के साथ ही नया रिकॉर्ड भी बना है, जिसमें बीजेपी ने पिछली बार की तुलना में कहीं जोरदार जीत दर्ज की है। देश के उप राष्ट्रपति पद के चुनाव में मुख्य मुकाबला राजग उम्मीदवार वैंकेया नायडू और विपक्ष की तरफ से खड़े किए गए महात्मा गांधी के प्रपौत्र गोपाल कृष्ण गांधी के बीच था, जिसमें वैंकेया नायडू ने बाजी मारी।
उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में शुरूआत से ही आंकड़े राजग उम्मीदवार वैंकेया नायडू के ही पक्ष में थे। ऐसे में राष्ट्रपति चुनाव की तरह ही उपराष्ट्रपति चुनाव को भी महज औपचारिकता माना जा रहा था। इस चुनाव में राजग में अपने बूते अपने उम्मीदवार को जीत हासिल कराने माद्दा था। इस बीच राजग के इतर 5 दलों के समर्थन में आ जाने के बाद मुकाबला एकतरफा हो गया। हालांकि विपक्ष की तरफ से घोषित उम्मीदवार और महात्मा गांधी के प्रपौत्र गोपालकृष्ण गांधी ने कहा कि इस चुनाव को एकतरफा नहीं माना जा सकता है, क्योंकि दो लोग लड़ रहे हैं। जीतेगा कोई एक ही व्यक्ति ही।
इस चुनाव में पीएम मोदी ने सबसे पहले वोट डाला। इसके बाद वैंकेया नायडू, गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई सांसदों ने वोट डाला। इस चुनाव में राज्यसभा सांसद रेखा, डिंपल यादव और बीजेपी एमपी हेमामालिनी ने भी अपने मताधिकार का प्रयोग किया। वोटिंग के दौरान ही हेमामालिनी ने दावा कर दिया था कि जीत नायडू की ही होगी।
उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में वोटिंग के बाद सचिन तेंदुलकर ने कहा कि देश में जिन जगहों पर वोटिगं हो रही है, सभी को अपना वोट डालना चाहिए।

गोपाल कृष्ण गाँधी

इससे पहले, उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में अपना वोट डालने से ठीक पहले नायडू ने कहा था कि ‘यह लड़ाई किसी पार्टी की नहीं हैं अधिकतर दल मेरे समर्थन में हैं। मुझे उम्मीद है मतदाता मेरे समर्थन में करेंगे वोट।’ इस चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, गुलाम नबी आजाद और गोपाल कृष्ण गांधी ने भी अपने मताधिकार का प्रयोग किया। तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी अपना वोट डाला।
वोट डालने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी पहुंचे थे।
ऐसे होती है उपराष्ट्रपति पद के लिए वोटिंग
सीक्रेट बैलेट के माध्यम से उपराष्ट्रपति का चुनाव होता है। इसमें लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य ही केवल वोट डाल सकते हैं। अपनी पसंद को मार्क करने के लिए सांसद एक खास पेन का इस्तेमाल करते हैं। अगर कोई सदस्य किसी दूसरे पेन का उपयोग करता है तो फिर वो वोट खारिज हो जाता है। बैलेट पेपर में चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार का नाम होता है लेकिन इस पर किसी तरह का चुनाव चिह्न नहीं होता। गौरतलब है कि मौजूदा समय में लोकसभा में राजग के 340 तो राज्यसभा में 85 सांसद हैं। इसके अलावा एआईएडीएमके के दोनों धड़ों, इनेलो, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस ने भी राजग उम्मीदवार वेंकैया नायडू को समर्थन देने की घोषणा की है। इन दलों के सांसदों की संख्या 26 है।

 

जिस रक्षा सूत्र से राजा बलि बंधे, उसी से बंधे भाई

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हमारे यहां हिंदू धर्म में प्रत्येक पूजा कार्य में हाथ में कलावा बांधने का विधान है। यह धागा व्यक्ति के उपनयन संस्कार से लेकर उसके अंतिम संस्कार तक सभी संस्कारों में बांधा जाता है। राखी का धागा भावनात्मक एकता का प्रतीक है। स्नेह और विश्वास की डोर है।

हाथ में बांधे जाने वाले धागे से संपन्ना होने वाले संस्कारों में उपनयन संस्कार, विवाह और रक्षाबंधन प्रमुख हैं। रक्षाबंधन से जुड़ी कई कथाएं ऐसी भी हैं जिनमें राखी बांधने वाली बहन नहीं हो तो पत्नी या ब्राह्मण भी रक्षासूत्र बांधता है। यह सूत्र रक्षा का सूत्र है।

पुरातन काल में वृक्षों को भी रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा रही है। बरगद के वृक्ष को स्त्रियां धागा लपेटकर रोली, अक्षत, चंदन, धूप और दीप दिखाकर पूजा कर अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती हैं। आंवले के पेड़ पर धागा लपेटने के पीछे मान्यता है कि इससे परिवार में धन-धान्य की प्रचुरता बनी रहती है।

श्रावण मास की पूर्णिमा का महत्व इससे और बढ़ जाता है कि इस दिन कष्टों पर पुण्यों की विजय का आरंभ हो जाता है। जो व्यक्ति अपने शत्रुओं या प्रतिद्वंद्वियों को परास्त करना चाहता है उसे इस दिन वरुण देव की पूजा करनी चाहिए। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवों और असुरों में युद्ध छिड़ा।

लगातार 12 वर्ष तक युद्ध चलता रहा। असुरों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर देवराज इंद्र के सिंहासन सहित तीनों लोकों को जीत लिया। इसके बाद इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास पहुंचे और सलाह मांगी। बृहस्पति ने इन्हें मंत्रोच्चारण के साथ रक्षा विधान करने को कहा।

तब श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति ने रक्षा विधान संस्कार आरंभ किया। मंत्रोच्चार से रक्षा सूत्र को मजबूत किया गया और देवराज इंद्र की पत्नी शचि जिन्हें इंद्राणी भी कहते हैं उन्होंने इस सूत्र को देवराज इंद्र के दाहिने हाथ पर बांधा।

इसकी ताकत से ही देवराज इंद्र असुरों को हराने में और अपना खोया राज्य वापस पाने में कामयाब हुए। जिस दिन यह रक्षासूत्र बांधा गया उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी और तभी से इस दिन रक्षासूत्र बांधने की परंपरा की शुरुआत हुई।

इसके अलावा एक अन्य कथा है कि जब राजा बलि ने भगवान विष्णु के वामन अवतार से वचन में पाताल लोक में निवास करने का आग्रह किया था तो विष्णु भगवान रात-दिन उनके सामने रहने लगे। जब भगवान विष्णुलोक नहीं पहुंचे तो लक्ष्मीजी चिंतित हुईं।

नारदजी ने लक्ष्मीजी को सलाह दी कि राजा बली को रक्षासूत्र बांधकर उपहार में विष्णुजी को अपने साथ ले आइए। जिस दिन मां लक्ष्मी जी ने राजा बलि से विष्णुजी को मांगा उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी और इसलिए यह प्रसंग भी रक्षाबंधन के साथ जुड़ा है।

महाभारत में भी रक्षाबंधन पर्व का उल्लेख है। जब युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं तब कृष्ण ने उन्हें तथा उनकी सेना को राखी का त्योहार बनाने की सलाह दी थी।

शिशुपाल का वध करते समय कृष्ण की की तर्जनी में चोट आ गई थी तो द्रौपदी ने लहू को बहने से रोकने के लिए अपनी साड़ी फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दी थी। कृष्ण ने चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाकर इस रक्षासूत्र का कर्ज चुकाया था।

कब बांधें राखी 

इस वर्ष राखी पर चंद्रग्रहण है। पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 6 अगस्त को 10.28 मिनट पर होगा परंतु भद्रा काल व्याप्त रहेगा। रक्षाबंधन का पर्व भद्रा रहित काल में ही मनाना चाहिए। अत: उदयातिथि के अनुसार रक्षाबंधन 7 अगस्त को भद्रारहित काल में मनाया जाएगा। किसी कारणवश भद्राकाल में रक्षाबंधन मनाना भी हो तो भद्रामुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में रक्षा बंधन का त्योहार मनाना श्रेष्ठ होगा।

जयपुर रग्स’ वेबसाइट के माध्यम से देता है कारीगरों को उनका वाज़िब हक़

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वास्तव में व्यवसाय के साथ-साथ अनेकों लोगों की भलाई सम्भव है। इसका एक बेहतरीन उदहारण जयपुर स्थितसामाजिक उद्यम ‘जयपुर रग्स’ है। अपने संस्थापक के मजबूत मूल्यों पर आधारित, पूरे परिवार के आशीर्वाद से पल्लवित ‘जयपुर रग्स’ की शुरुआत नंद किशोर चौधरी द्वारा 1978 में की गयी थी और तब से ‘जयपुर रग्स’ ने एक लंबा सफर तय किया है।

अपने सिद्धान्तों और मूल्यों के धनी नन्द किशोर चौधरी कहते हैं- मैंने अपनी खुद की कंपनी ‘जयपुर रग्स’ बिलकुल शून्य से शुरू की थी और आज पाँच करोड़ से शुरू की गयी यह कंपनी, एक सौ पच्चासी करोड़ के व्यवसाय तक पहुंच गयी है।” यह व्यापार जो सिर्फ 09 कारीगरों के साथ शुरू किया गया था, आज काफी बड़ा हो गया है और आज इसका भारत में 4000 कारीगरों और 40 देशों के ग्राहकों का नेटवर्क है।

यह सामाजिक उद्यम, यहां दूरस्थ गांवों के कारीगरों के साथ भी काम करता है और सतत आजीविका उपलब्ध कराने में उनकी सहायता करता है। वो बताते हैं, “दो करघे अपने घर पर लगाकर हमने 9 बुनकरों के साथ काम शुरू किया था। शुरुआत में जो सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने आयी वो ये कि हमारे साथ उस वक़्त जो काम करने वाले सारे बुनकर थे वो हरिजन, चमार और बेगर जाति से थे, जिनको अछूत कहा जाता है। मैं जानता था कि हमारे समाज में, परिवार में भी, बहुत अधिक आडम्बर है, वास्तव में लोग अंदर से कुछ और हैं और बाहर से कुछ और हैं और इन सब से ऊपर मुझे इन लोगों में ज्यादा सरलता दिखाई दी तो एक तरह से मेरा प्रेम उन लोगों के प्रति इतना बढ़ता चला गया कि एक दिन ये परिवार 40000 लोगों के परिवार में परिवर्तित हो गया।” ‘जयपुर रग्स’ अनिवार्य रूप से एक ई-कॉमर्स मंच है। इसकी वेबसाइट अपने ग्राहकों के लिए एक प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करती है और सभी के लिए ब्रांड जिन चीजों के लिए जाना जाता है, उसका प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय अपील के साथ एक उपयुक्त डोमेन नाम का चुनाव करना उनकी सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण था।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए नन्द किशोर चौधरी कहते हैं, “क़ालीनों की इस मूल्य श्रृंखला में ग्राहकों का बहुत शोषण हुआ है, साथ ही बुनकरों का भी शोषण हुआ है। तो हमने सोचा कि क्यों न हम हमारे सम्बंधित सारे हितधारकों को शिक्षित करें जिस से हमारी इस कोशिश की कहानी उन तक पहुँच सके और उन सभी लोगों से हमारा एक भावनात्मक रिश्ता बन सके और इसी उद्देश्य के साथ हमने अपनी इस वेबसाइट की शुरुआत की। हमने डॉट कॉम को चुना, क्योंकि डॉट कॉम एक तो ग्लोबल है, दूसरे याद रखने में, बोलने में, बहुत सहज है।”

 

(साभार – योर स्टोरी)

ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रोफेसर ने छोड़ी अमेरिका की नौकरी

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केरल के पलक्कड़ इलाके में एक समय घर के बाहर काम करने में पुरुषों का वर्चस्व रहा करता था। लेकिन आज महिलाएं घर से बाहर निकलकर काम कर रही हैं और पैसे कमाकर घर भी चला रही हैं। इस बदलाव का सारा श्रेय डॉक्टर प्रभाकर को जाता है। डॉ. प्रभाकर ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अमेरिका में प्रोफेसर की अच्छी खासी नौकरी छोड़ गांव की महिलाओं का उत्थान करने और उन्हें सशक्त बनाने का काम शुरू किया है। एक बार वह गांव आए थे तो उन्होंने देखा कि गांव की महिलाओं की हालत काफी दयनीय है और उन्हें अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्होंने देखा कि गांव की लड़कियां स्कूली शिक्षा से वंचित रह जा रही हैं।

डॉ. प्रभाकर कहते हैं, ‘जब मैं केरल वापस आया तो देखा कि यहां बदलाव की सख्त की जरूरत है। मैं बांग्लादेश के माइक्रो फाइनैंस बैंकर यूनुस खान से काफी प्रभावित था। इसलिए मैं बांग्लादेश गया और उनके साथ 6 महीने रहकर माइक्रो क्रेडिट मॉडल को अच्छे से समझा। मैं उस मॉडल को केरल में भी लागू करना चाहता था। मुझे मालूम था कि इसे सफल तरीके से लागू करना एक चैलेंज था, लेकिन हर हाल में मैं इसे करना चाहता था।’ डॉ. प्रभाकर ने 1996 में गांव की गरीब महिलाओं को सपोर्ट करने के लिए सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट नाम से एक नॉन प्रोफिट ऑर्गनाइजेशन की शुरुआत की।

शुरु करने से पहले अपने गांव की महिलाओं को देखकर डॉ. प्रभाकर को लगा कि महिलाओं को केवल सशक्त ही नहीं बनाना है बल्कि उन्हें आर्थिक आजादी और स्थिरता भी प्रदान करनी है जिससे वे अपनी जिंदगी के स्वतंत्र निर्णय ले सकें। इस मॉडल के जरिए उन्होंने महिलाओं को मुफ्त में ऋण देना शुरू किया। उन्होंने शुरुआत में अपनी जेब से 2 लाख रुपये के ऋण बांट दिए। वह कहते हैं, ‘हम महिलाओं को सिर्फ ऋण देते हैं, उस ऋण का कैसे और किस काम में इस्तेमाल करना है इसकी उन्हें पूरी आजादी रहती है। वह जो व्यवसाय चाहे शुरू कर सकती हैं। इनमें से कुछ महिलाएं चाय की दुकान खोल लेती हैं, कुछ छोटा-मोटा काम शुरू कर देती हैं। हम मैनेजर बनने की कोशिश नहीं कर रहे हैं बल्कि हम सिर्फ एक सहायक बने रहना चाहते हैं।’

जब उनसे बिना किसी गारंटी के लोन देने में जोखिम के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ऋण वापस करने की दर 99 % है। उन्होंने बताया कि लाभार्थियों की पहचान करना थोड़ा कठिन काम है और इसके बारे में लोगों की और उनकी आवश्यकताओ के बारे में रिसर्च करनी पड़ती है। डॉ प्रभाकर बताते हैं कहते हैं, ‘हम ऐसे लोगों की पहचान करते हैं जो रिमोट एरिया में रहते हैं और जहां अभी तक कोई सुविधाएं नहीं पहुंची हैं।’ डॉ प्रभाकर उन महिलाओं की खास तौर पर मदद करते हैं जिनके पति या जिनका परिवार उनका साथ नहीं देता है।

महिलाओं की जरूरत के मुताबिक सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट के लोन मॉडल को कस्टमाइज किया गया है। इसके अंतर्गत कम से कम 10,000 का लोन दिया जाता है जिसे साप्ताहिक रूप  से भरना होता है।

डॉ. प्रभाकर पर्सनली महिलाओं के संपर्क में रहते हैं और उनसे काम की प्रगति के बारे में जानकारी लेते रहते हैं और यही उनकी सफलता का मंत्र है। सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट मॉडल के जरिए महिलाओं को दिये जाने वाले लोन की ब्याज दर काफी कम है। इसके साथ ही वे महिलाओं को सामूहिक रूप से बचत करने के लिए प्रेरित भी करते हैं।

पूवनकोड गांव की रहने वाली 40 साल की वेलम्मा ने गाय पालने के लिए 5,000 का छोटा लोन लिया था। उन्होंने कुछ महीने में ही लोन चुकता कर दिया। उसके बाद उन्होंने बकरी पालने के लिए लोन लिया। धीरे-धीरे उनका बिजनेस बढ़ता गया और फिर उन्होंने 20,000 का लोन ले लिया। इन पैसों से उन्होंने सुपारी से बने उत्पादों को बनाने की मशीन खरीद ली। अब उनके साथ दो और महिलाएं भी काम करती हैं।

वेलम्मा सैकड़ों महिलाओं के बीच एक उदाहरण हैं। उनके जैसी तमाम महिलाएं डॉ. प्रभाकर के जरिए सशक्त हो रही हैं। डॉ, प्रभाकर कहते हैं कि इस पुरुषवादी समाज में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वह हमेशा काम करते रहेंगे।

(साभार – योर स्टोरी)

काशी के अखाड़े में पहली बार उतरीं महिला पहलवान

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बदलते दौर के साथ काशी में परंपराएं भी नया रूप ले रही हैं। हाल ही में नागपंचमी पर गोस्वामी तुलसीदास अखाड़े में महिला पहलवानों को लड़ाने की नई परंपरा की शुरुआत हुई। काशी समेत पूर्वांचल के विभिन्न जनपदों की 12 महिला पहलवानों को पहली बार दांव-पेच आजमाने का मौका मिला।

इसे महिला कुश्ती के क्षेत्र में बड़ी पहल के रूप में देखा जा रहा है। शुक्रवार को अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास का नजारा कुछ हटकर था। नागपंचमी पर महिला पहलवानों ने इस अखाड़े में कदम रखे तो लोग देखते रह गए।

अखाड़े की पीली मिट्टी को नमन कर जब आस्था वर्मा और नंदिनी सरकार दांव लगाने उतरीं तो परिसर हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठा। दोनों पहलवानों ने एक-दूसरे पर कई दांव लगाए लेकिन दोनों का पलड़ा बराबर रहा।

इसी क्रम में संध्या ने निधि, मधु ने प्रीति, भावना ने संध्या, नंदनी ने भावना, अपेक्षा ने निधि और मधु ने अपेक्षा से जोर आजमाइश की। महिला मल्ल एक-दूसरे को चित करने के लिए दांव लगाती रहीं।

कभी धोबी पछाड़ तो कभी कांखी दाव, सांडी तोड़ से सभी ने विरोधियों को धूल चटाने का प्रयास किया। महिला खिलाड़ियों के दांव देखकर दर्शक दीर्घा में बैठे पुरुष पहलवान और अन्य लोग तालियों से उनका उत्साहवर्धन करते रहे।

सकंट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि  महिलाएं हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान गढ़ रही हैं बावजूद इसके आज भी लड़कियों को अखाड़े में भेजना अच्छा नहीं माना जाता।

इस सोच से ऊपर उठकर अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास में पहली बार नागपंचमी पर महिला पहलवानों कोदांव-पेंच दिखाने का मौका दिया गया। यह नारी सशक्तीकरण की दिशा में हमारा एक प्रयास है। आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ के बाद कुश्ती में महिलाओं की रुचि बढ़ी है।

कुश्ती पर्यवेक्षक और ध्यानचंद अवार्डी कैप्टन राजेंद्र सिंह ने कहा कि अखाड़ों में लड़कियों का प्रवेश बेहद सराहनीय कदम है। कुश्ती में लड़कियों को आगे लाने के लिए साई प्रयासरत है। निवेदिता शिक्षा सदन इंटर कॉलेज में पूर्वांचल का पहला कुश्ती प्रशिक्षण केंद्र खोला गया है। इसमें 16 बालिकाओं का चयन किया गया है।

 

 

इतिहास के पन्नों से रक्षाबंधन के किस्से

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चन्द्रशेखर आजाद का रक्षासूत्र

बात उन दिनों की है जब क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थे और फ़िरंगी उनके पीछे लगे थे।  फिरंगियों से बचने के लिए शरण लेने हेतु आज़ाद एक तूफानी रात को एक घर में जा पहुंचे जहां एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। हट्टे-कट्टे आज़ाद को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इनकार कर दिया लेकिन जब आज़ाद ने अपना परिचय दिया तो उसने उन्हें ससम्मान अपने घर में शरण दे दी। बातचीत से आज़ाद को आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है। आज़ाद ने महिला को कहा, ‘मेरे सिर पर पाँच हजार रुपए का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ़्तारी पर पाँच हजार रुपए का इनाम पा सकती हैं जिससे आप अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं।

यह सुन विधवा रो पड़ी व कहा- “भैया! तुम देश की आज़ादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकती।” यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आज़ाद के हाथों में बाँध कर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो आज़ाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रुपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- “अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आज़ाद।”

 

महादेवी का वह अनोखा भाई

महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, तो एक साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था, ‘आप इस एक लाख रुपये का क्या करेंगी? ‘

कहने लगी, ‘न तो मैं अब कोई कीमती साड़ियाँ पहनती हूँ , न कोई सिंगार-पटार कर सकती हूँ, ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूँ न जाने देती.’ कहते-कहते उनका दिल भर आया. कौन था उनका वो ‘भाई’? हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी के मुंहबोले भाई थे।

एक बार वे रक्षा-बंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से बोले, ‘दीदी, जरा बारह रुपये तो लेकर आना।’ महादेवी रुपये तो तत्काल ले आई, पर पूछा, ‘यह तो बताओ भैय्या, यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी?

हालाँकि, ‘दीदी’ जानती थी कि उनका यह दानवीर भाई रोजाना ही किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आ जाता है, पर आज तो रक्षा-बंधन है, आज क्यों?

निरालाजी सरलता से बोले, “ये दुई रुपया तो इस रिक्शा वाले के लिए और दस रुपये तुम्हें देना है। आज राखी है ना! तुम्हें भी तो राखी बँधवाई के पैसे देने होंगे।”

ऐसे थे फक्कड़ निराला और ऐसी थी उनकी वह स्नेहमयी ‘दीदी’।

(साभार –  भारत दर्शन)

रक्षाबंधन का त्योहार है तो पहनना तो कुछ खास है

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रक्षाबंधन बड़ा खूबसूरत त्योहार है जिसमें शरारतें भी हैं और मस्ती भी। भाई बहन के रिश्ते को मजबूत बनाने वाले इस दिन पर चटकीले रंग वाले परिधान पहने जा सकते हैं। कोई जरूरी नहीं है कि आप भड़कीली बनारसी पहनें मगर खुशनुमा रंग आपका मूड अच्छा जरूर करेंगे। राखी के दिन आप चटक व भड़कीले रंग जैसे रॉयल ब्लू, पैरट ग्रीन, गहरे मरून, लाल और गहरे गुलाबी रंग के परिधान पहन सकती हैं।

ब्लिंग या चमकीले कुर्ती के साथ आप चूड़ीदार पहन सकती हैं और बांधनी दुपट्टा ले सकती हैं, हल्के मेकअप के साथ कानों में बड़े झुमके पहन सकती हैं।

फ्यूजन (भारतीय-पश्चिमी) लुक के लिए ब्लिंग टॉप के साथ आप प्रिंटेड सिल्क स्कर्ट पहन सकती हैं, या चाहें तो दुपट्टा भी ले सकती हैं।

परंपरागत परिधान के साथ वेस्टर्न लुक के लिए आप इकत का लंबा गाउन और मंगलापुरी ड्रेस आजमा सकती हैं, इसके साथ झुमका और रस्टिक सिल्वर नेकपीस पहनें।

 

ब्राइडल ड्रेस में कुछ आसान से बदलाव के साथ आप इसे फिर से पहन सकती हैं। साड़ी भारी है तो ब्लाइज और जेवर सादगी भरे हों मगर बहुत भारी – भरकम साड़ी या गहनों से परहेज करें। आप राखी बाँधने जा रही हैं, वहाँ अपना लेटेस्ट कलेक्शन नहीं दिखाएंगी तो भी चलेगा।

प्लेन जॉर्जेट या शिफॉन साड़ी के साथ कंट्रास्ट कलर का ब्लाउज पहनें। यह भारी काम वाले ब्लाउज पहनने पर आपके लुक को बैलेंस करेगा। अगर आप चोली पहन रही हैं तो उसके साथ दिन या शाम के फंक्शन के लिए साथ जॉर्जेट या शिफॉन की चौड़े बॉर्डर वाली साड़ी पहनें।

लॉन्ग कुरता और प्लाजो आपका बेहतर करेंगे और एक क्लासिक लुक देंगे। सिम्पल अनारकली पहनें जिसमें बहुत ज्यादा काम न हो।

 

क्या आपके पास भी हैं ऐसी सहेलियाँ और दोस्त

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महिलाएँ दोस्ती करने में और दोस्तों से गप लड़ाने में माहिर होती हैं। बचपन से ही सहेलियों के साथ कहीं भी बैठ जाती हैं तो विंडो शॉपिंग करने के लिए सहेलियों का झुंड लेकर निकल जाती हैं और सहेलियाँ भी कई तरह की होती हैं – कोई खर्च करवाने वाली तो कोई शो ऑफ करने वाली, किसी की बात सितारों से निकलकर सितारों पर ही खत्म होती है तो कोई छोले – भटूरे पर अटक जाती है, कोई महापढ़ाकू, तो कोई एकदम लड़ाकू…जाने कितनी सहेलियाँ और सबका साथ ही जिन्दगी को खूबसूरत बनाता है। कुछ को लड़कों पर भरोसा ज्यादा होता है और आज की दुनिया में सहेलियों के साथ सखा भी होते हैं मगर किसी लड़के से दोस्ती निभाना आज भी थोड़ा मुश्किल है।

हाल ही में हुए एक सर्वे में पता चला है कि महिलाओं के कुल 10 प्रकार के दोस्‍त होते है। इस सर्वे को प्रमोशनलकोड्स.आर्गेनाइजेशन.यूके के द्वारा करवाया गया था। यहां महिलाओं के दस प्रकार के दोस्‍तों के बारे में बताया जा रहा है :

भरोसेमंद दोस्‍त : महिलाओं के ग्रुप में कुछ दोस्‍त बहुत भरोसेमंद होते है। महिलाएं अपने इन दोस्‍तों पर आंख मूंदकर भरोसा करती है। अपनी हर बात को इनके साथ शेयर कर लेती है, ऐसे दोस्‍तों के साथ महिलाएं इतनी खुली होती है कि वह ठीक वैसे ही बात बताती है जैसा वह खुद मानती है। आप देखिए कि इसमें किस प्रकार की सहेलियाँ और दोस्त आपके ग्रुप में है –

शॉपिंग कराने वाली : महिलाओं के गैंग में शॉपिंग के शौकीन जरूर होते है। जब भी शॉपिंग करने का मन होता है, ये सभी दोस्‍त इक्‍ट्ठा होकर खूब मस्‍ती करते है और शॉपिंग करते है। ऐसे दोस्‍त अक्‍सर साथ मिलकर विंडो शॉपिंग ही करते है।

व्‍यथा सुनाने वाले दोस्‍त : महिलाओं की कुछ सहेलियाँ या दोस्त ऐसे होते हैं जो उनसे उम्र में बड़ी होती है, ऐसी दोस्‍त को महिलाएं वह सभी बातें बताती है जो वह अपनी मां से नहीं बताना चाहती है। उनकी ऐसी दोस्‍त, जिंदगी में कई उतार – चढ़ाव देख चुकी होती है। इसीकारण, वह उन्‍हे अच्‍छी तरह हर बात समझा देती है।

करीबी दोस्‍त : महिलाओं के कुछ दोस्‍त बहुत करीबी होते है। ऐसे दोस्‍तों के कंधे पर महिलाएं सिर रखकर रो सकती हैं। ऐसे दोस्‍तों के साथ महिलाएं जब भी बात करना शुरू कर देती है तो उन्‍हे वक्‍त का पता ही नहीं चलता है। कई बार इस तरह के दोस्‍तों के बीच घंटों तक इमोशनल बातें होती है। दो सहेलियों के बीच ऐसा अक्सर होता है।

बोल्ड और बेबाक – आपके पास ऐसी बेबाक सहेली भी होती है जो किसी से नहीं डरती और जो दिल में आता है, बोल देती है। वह कुछ भी नहीं छिपाती और आप सोच में पड़ जाती हैं कि ये इतना बोल कैसी लेती हैं।

घरेलू सहेली – क्‍या आप हमेशा अपने दोस्‍तों को पार्टी पर बुलाती है, या फिर सिर्फ अपने घर की नई सजावट दिखाने के लिए उन्‍हे बुला लेती है। कोई न कोई ऐसी दोस्‍त जरूर होती है जो सभी घरेलू कामों में निपुण होती है और आपको लगता है कि आपकी जगह इसे मम्मी के पास होना था।

दोस्‍तों की दोस्‍त : महिलाएं किसी से भी दोस्‍ती कर लेती है। अगर उनकी दोस्‍त की रूममेट या क्‍लासमेट से वो दो – चार बार मिल लेती है तो उनकी दोस्‍ती हो जाती है। ऐसी दोस्‍ती अक्‍सर फेसबुक पर ज्‍यादा परवान चढ़ती है। ऐसी दोस्‍ती सिर्फ हाय हैलो के लिए होती है। राह चलते, मॉल में, पार्टी में ऐसी जगहों पर ऐसे दोस्‍तों से मिलना होता है। इस प्रकार के दोस्‍तों से बातचीत बहुत लिमिटेड होती है और कई बार तो उनके नाम भी याद नहीं रहते है।

बचकाने दोस्‍त : महिलाओं के कुछ दोस्‍त ऐसे भी होते है जो बचपने से भरे होते है। उनकी शादी नहीं हुई होती है, जल्‍दी ही वह किसी के साथ रिश्ते में बंधने वाले होते है। ऐसे दोस्‍त एनर्जी से भरे होते है। गैजेट से उन्‍हे प्‍यार होता है और धींगा – मस्ती अच्छी लगती है। ऐसे दोस्‍त शादी करने की तैयारी में होते है लेकिन अपने पुराने दोस्‍तों को कभी नहीं भूलते।

खम्भे की तरह अटल दोस्‍त : हर किसी के पास कोई न कोई ऐसा दोस्‍त होता है जो आपके खास दोस्‍त न होने पर आपका साथ निभाता है। अगर आप उनसे कभी बात नहीं करती है तो भी वह बुरा नहीं मानते है लेकिन आप जब भी उनसे बात करें, वो हमेशा उतने ही प्‍यार से जबाब देते है। ऐसे लोगों के साथ आप बेहद महसूस करती है।

आंखों का तारा वाली दोस्‍त : हर महिला की कुछ दोस्‍तें ऐसी होती है जिनसे वह मस्‍त होकर गपशप मारती है। वह उन लोगों के साथ बैठकर चुगली करती है, नौकरी में पैसे कट जाने के बारे में बताती है, पति की शिकायत करती है, सास की चुगली करती है। ऐसे दोस्‍त, महिलाओं के फर्स्‍ट सर्कल में आते है। ऐसे दोस्‍तों के साथ महिला का सबसे ज्‍यादा समय बीतता है।