Sunday, March 22, 2026
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एक विद्रोही गायिका-अभिनेत्री शांता आप्टे

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रजत जयंती मनाने वाली पहली मराठी और हिंदी फिल्में शांता आप्टे के नाम दर्ज हो गर्इं, तो हिंदी फिल्मों की पहली गजल भी उनकी आवाज में सजी। 1936 में शांताराम के ही निर्देशन में उन्होंने फिल्म ‘अमर ज्योति’ में एक प्रमुख भूमिका निभाई, जिसमें उनके साथ सह-कलाकारों में दुर्गा खोटे, वसंती और चंद्र मोहन थे।

भारत में, शुरुआती दौर में सिनेमा को कई समस्याओं से जूझना पड़ा। सिनेमा ने जब बोलना शुरू किया तो पहली मुश्किल अपना मुहावरा गढ़ने को लेकर आई। बांग्ला सिनेमा में काननबाला यानी कानन देवी ने उसे पहचान दिलाई तो मराठी सिनेमा में शांता आप्टे कामयाबी के झंडे गाड़ रही थीं। पिछली सदी के चौथे दशक में शांता आप्टे के नाम कई चीजें दर्ज हुर्इं। मराठी और हिंदी सिनेमा की पहली रजत जयंती प्रदर्शन करने वाली फिल्में इसी दशक में दर्ज हुर्इं, तो हिंदी फिल्मों के लिए पहली गजल भी रिकॉर्ड हुई। फिल्म ‘दुनिया न माने’ महिला सशक्तीकरण के समर्थन में उठने वाली सिनेमा की पहली दमदार आवाज का दस्तावेज बनी, तो शांता ने वास्तविक जीवन में भी प्रोडक्शन हाउस के खिलाफ भूख हड़ताल कर नारी सशक्तीकरण की आवाज बुलंद की।

1916 में महाराष्ट्र में दुधनी के एक ब्राह्मण परिवार में शांता का जन्म हुआ था। स्टेशन मास्टर पिता का गायन के प्रति खासा झुकाव था। पंढरपुर के महाराष्ट्र संगीत विद्यालय में शांता ने संगीत की सरगम सीखी और छोटी-सी उम्र में ही पूना के स्थानीय गणेश उत्सवों में भजन गाने लगीं। महज नौ वर्ष की आयु में अभिनेता-निर्देशक बाबूराव पेंढरकर उन्हें बतौर बाल कलाकार फिल्मों में ले गए और वहीं से शुरू हुआ उनका अभिनय करिअ‍ॅर, लेकिन 1932 में जब भालजी पेंढरकर निर्देशित मराठी फिल्म ‘श्यामसुंदर’ में शांता नवयुवती राधा के रूप में दिखीं, तो सिने उद्योग में एक हलचल-सी मच गई। बतौर अभिनेत्री अपनी पहली ही फिल्म से शांता और सफलता एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए। ‘श्यामसुंदर’ पहली मराठी फिल्म बनी, जिसने एक ही सिनेमाघर में रजत जयंती मनाई और यह संभव हुआ उनके बड़े भाई बाबूराव आप्टे के मार्गदर्शन के कारण, जिन्होंने ‘श्यामसुंदर’ में राधा के पति की भूमिका निभाई। इसके बाद ही व्ही शांताराम ने लगातार तीन फिल्मों में शांता आप्टे को अभिनेत्री चुना।

1934 में उन्हें प्रभात फिल्म्स की व्ही शांताराम निर्देशित ‘अमृत मंथन’ में नायक की बहन का किरदार मिला। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म थी, जो उनके लिए बड़ा ब्रेक साबित हुई। ‘अमृत मंथन’ वेनिस के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी शामिल हुई। शांता मूलरूप से अभिनेत्री थीं, लेकिन इस फिल्म से उन्होंने गायन के क्षेत्र में भी पदार्पण कर अपना ऐतिहासिक मुकाम बनाया और वह कानन देवी के साथ पार्श्व गायन युग के शुरुआती गायकों में शुमार हो गर्इं। फिल्म में उन्होंने केशवराव भोले के संगीत निर्देशन में चार एकल गीत गाए, जिनमें ‘कमसिनी में दिल पे गम का’ हिंदी फिल्मों के लिए रिकॉर्ड होने वाली पहली गजल बनी। रजत जयंती मनाने वाली पहली मराठी और हिंदी फिल्में शांता आप्टे के नाम दर्ज हो गर्इं, तो हिंदी फिल्मों की पहली गजल भी उनकी आवाज में सजी। 1936 में शांताराम के ही निर्देशन में उन्होंने फिल्म ‘अमर ज्योति’ में एक प्रमुख भूमिका निभाई, जिसमें उनके साथ सह-कलाकारों में दुर्गा खोटे, वसंती और चंद्र मोहन थे। यह प्रभात फिल्म बैनर की पहली फिल्म थी, जिसमें पार्श्व गायन हुआ।

शांता आप्टे के नाम उपलब्धियों और सफलताओं के सुनहरे पन्नों का सफर जारी था। तभी 1937 में व्ही शांताराम की ‘दुनिया न माने’ रिलीज हुई, तो एक कभी न भूलने वाला इतिहास रच गया। समीक्षक इस फिल्म को आज तक एक क्लासिक मानते हैं। दरअसल, जब-जब सिनेमा ने साहित्य का दामन थामा, अधिकतर क्लासिक या श्रेष्ठ फिल्में देखने को मिलीं। हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में इनका चोली-दामन का साथ रहा, जो बाद में छूटता गया और धागे उधड़ते चले गए। ‘दुनिया न माने’ नारायण हरि आप्टे लिखित उपन्यास ‘न पटणारी गोष्ट’ पर आधारित थी, जिसमें शांता ने नवयुवती निर्मला की भूमिका निभाई थी। निर्मला का विवाह केशवराव दाते अभिनीत एक अमीर उम्रदराज व्यक्ति से हो जाता है, जिसकी पत्नी का देहांत हो चुका है। निर्मला सामाजिक मर्यादाओं और परंपराओं का विरोध करती है और उस वृद्ध विधुर को पति मानने से इनकार कर देती है। उसका संघर्ष वृद्ध की सोच बदलता है और अंतत: वह निर्मला को पुनर्विवाह की अनुमति देकर आत्महत्या कर लेता है। ‘दुनिया न माने’ उस समय समाज में प्रचलित बेमेल विवाह जैसी कुरीति के विरुद्ध एक फिल्मकार की जाग्रत चेतना का चित्र सिद्ध हुई और इस फिल्म ने सिनेमा के माध्यम का सशक्त उपयोग भी लक्ष्य किया। अपनी कहानी की वजह से यह फिल्म उस समय बहुत विचारोत्तेजक रही और अब तक क्लासिक की श्रेणी में शुमार की जाती है। फिल्म में शांता ने एचडब्ल्यू लांगफेलो की अंग्रेजी कविता ‘सांग ऑफ लाइफ’ भी गाई। इस फिल्म की अपार सफलता से उत्साहित शांताराम ने शांता को लेकर उसी वर्ष ‘कुंकू’ नाम से इसको मराठी में भी बनाया और वहां भी यह दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। इस तरह यह फिल्म शांता के करिअ‍ॅर की सबसे बड़ी सफलता साबित हुई। 1938 में उन्होंने शांताराम के ही निर्देशन में प्रभात फिल्म्स की एक अन्य प्रसिद्ध फिल्म ‘गोपाल कृष्ण’ में अभिनय किया। शांता ने तमिल फिल्म ‘सावित्री’ में अभिनय 1941 में किया, जिसमें संगीत की रानी एमएस सुब्बुलक्ष्मी नारद की भूमिका में दिखीं। 1943 में एक सामाजिक फिल्म ‘दुहाई’ में उनके साथ सह-नायिका के किरदार में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां नजर आर्इं।

विष्णु व्यास निर्देशित इस फिल्म में रफीक गजनवी और पन्नालाल घोष ने संगीत दिया था। 1946 में मास्टर विनायक निर्मित और निर्देशित एक पौराणिक फिल्म ‘सुभद्रा’ में उनके साथ सह-भूमिकाओं में याकूब, ईश्वरलाल और स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने अभिनय किया। फिल्म में वसंत देसाई के संगीत निर्देशन में ‘मैं खिली-खिली फुलवारी’ गीत में शांता और लता ने सुर से सुर भी मिलाए। इस प्रकार शांता आप्टे ने भारतीय सिनेमा की तीन सर्वश्रेष्ठ आवाजों के साथ परदे पर साझेदारी की और परदे के पीछे आवाज भी मिलाई। उसके बाद उनकी पारस पिक्चर्स की सर्वोत्तम बडामी निर्देशित और साहू मोदक अभिनीत ‘उत्तरा अभिमन्यु’ और वीएम गुंजाल निर्देशित, सुरेंद्र और याकूब अभिनीत ‘पनिहारी’ फिल्में आर्इं। पृथ्वीराज और राजकपूर के अभिनय से सजी भालजी पेंढरकर निर्देशित शांता की फिल्म ‘वाल्मीकि’ भी उसी वर्ष रिलीज हुई। छठे दशक तक आते-आते शांता आप्टे कम ही फिल्मों में नजर आने लगीं। वह 1950 में केशवराव दाते और लीला चिटनिस के साथ राजा परांजपे की ‘जर जपून’, 1951 में दत्ता धर्माधिकारी निर्देशित ‘कुंकवच ढाणी’, 1953 में केपी भावे निर्देशित ‘तई तेलीन’ और 1955 में मनहर रंगीलदास रस्कापुर निर्देशित ‘मुलु माणेक’ जैसी मराठी फिल्मों में ही दिखीं। उनकी आखिरी दो फिल्में हिंदी में थीं- निरूपा रॉय, मनहर देसाई व प्रेम अदीब अभिनीत और रमन बी देसाई निर्देशित ‘चंडी पूजा’ और इन्हीं कलाकारों के साथ समर चटर्जी निर्देशित 1958 में अंतिम रिलीज फिल्म ‘राम भक्त विभीषण’।
शांता आप्टे एक ऐसी सशक्त महिला के रूप में याद की जाती हैं, जो परदे पर और परदे के बाहर- दोनों जगह महिलाओं की शक्ति का प्रतीक रहीं। ‘दुनिया न माने’ में निर्मला की भूमिका के बाद ‘घरेलू गुरिल्ला’ के रूप में उद्धृत की जाने वाली शांता उस समय कॉलेज छात्राओं के लिए एक प्रेरक रोल-मॉडल बन गई थीं। 1939 में जब प्रभात फिल्म्स के साथ अनुबंध बाहर की फिल्मों में अभिनय करने में बाधक बना तो उन्होंने उस समझौते को चुनौती दी और स्टूडियो गेट के सामने भूख हड़ताल की।

आखिरकार प्रभात फिल्म्स को उन्हें अनुबंध से मुक्त करना पड़ा। यही नहीं, एक सिने-पत्रिका के संपादक बाबूराव पटेल को उनके कार्यालय में लताड़कर शांता ने निजी जीवन में सशक्त नारी का उदाहरण प्रस्तुत किया था। वह अपने सहज इशारों और नेत्रों की भाव-भंगिमाओं से फिल्मों में गीत-गायन की स्थिर शैली में बदलाव लाकर 1937 में मराठी सिनेमा की सबसे महंगी अभिनेत्री बन गई थीं। कानन देवी ने भी आत्मकथा लिखी थी, लेकिन मराठी में लिखी शांता आप्टे की ‘जाउ मी सिनेमात’ (क्या मुझे फिल्मों में प्रवेश करना चाहिए था) किसी भारतीय फिल्म कलाकार की पहली आत्मकथा मानी जाती है। 1932 से 58 तक भारतीय सिनेमा में सक्रिय रहीं शांता आप्टे छह महीने बीमारी के बाद 24 फरवरी, 1964 को मुंबई में सदा के लिए शांत हो गर्इं। दुर्लभ क्षमता की नारी शांता आप्टे की मृत्यु के दस साल बाद अभिनेत्री नयना आप्टे ने खुद को उनकी बेटी बताते हुए दावा कि उनकी मां शांता ने 1947 में दूर के एक चचेरे भाई से विवाह किया और जब वह तीन महीने की गर्भवती थीं, तब पति को छोड़ दिया था। हालांकि विजय रंचन ने अपनी पुस्तक ‘स्टोरी ऑफ ए बॉलीवुड सांग’ में शांता आप्टे पर आधारित ‘विद्रोही आम व्यक्ति’ अध्याय में लिखा है, ‘शांता अविवाहित थीं, लेकिन उनकी एक बेटी, मराठी फिल्म और रंगमंच अभिनेत्री नयना आप्टे हैं।’ १

 

उपराष्ट्रपति की पत्नी सलमा अंसारी बोलीं- तीन बार तलाक कहने से नहीं होता तलाक

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उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने कहा कि तीन बार तलाक बोलने से तलाक नहीं होता है, इसलिए मैं कहती हूं कि कुरान पढ़िये। ट्रिपल तलाक बेकार की बात है। बोलीं, कुरान पढ़ें, तो इसका हल मिल सकता है।

शनिवार को वो मदरसा चाचा नेहरू में आयोजित एक कार्यक्रम में मीडिया से मुखातिब थीं। उन्होंने कहा कि महिलाएं खुद कुरान पढ़ें और उसके बारे में समझें, सोचें, जानकारी हासिल करें कि शरीयत क्या कहती है? पैगंबर मोहम्मद मुस्तफा ने क्या फरमाया है?

किसी ऐसे को फॉलो नहीं करना चाहिए, जो रास्ता भटका दे। कहा, बहुत-सी ऐसी महिलाएं सामने आएंगी, जिन्होंने कुरान नहीं पढ़ी। जो कुरान पढ़ती हैं वह अरबी भाषा में है, उसका अनुवाद पढ़ती नहीं हैं। मौलाना ने जो कह दिया, उसी को मान लिया। कुरान पढ़ के देखिये, हदीस पढ़िये, देखिये रसूल ने क्या कहा है।

उन्होंने कहा कि जब आप कुरान नहीं पढ़ेंगे और समझेंगे नहीं, तो कोई भी आपको गुमराह कर सकता है? कहा, ट्रिपल तलाक कोई मुद्दा नहीं है, बिल्कुल बेकार की चीज है।

 

बॉलीवुड छोड़, जहां ड्रग्स छोड़ी वहीं अस्पताल बनाएगा ये अभिनेता

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प्रतीक बब्बर काफी समय से बड़े पर्दे से दूर हिमाचल की खूबसूरत वादियों में भी रह रहे हैं। प्रतीक को पहाड़ों से अब इतना प्यार हो गया है कि उन्होंने वहां वेलनेस सेंटर खोलने का तय किया है।

प्रतीक काफी वक्त तक शराब और ड्रग्स की गिरफ्त में रहे हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने हिमाचल का रुख किया था। वहां वे कई दिनों तक रहे और अपनी लत से पीछा छुड़ाया। अब प्रतीक बाकी लोगों को इसके बारे में जागरुक बनाना चाहते हैं। अपने दोस्त के साथ वो इस वेलनेस सेंटर को खोलेंगे।

इस बारे में प्रतीक ने कहा, ‘ये मेरे लिए सोशल सर्विस ज्यादा होगी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा कुछ करूंगा लेकिन मेरे परिवार ने मेरी इसमें बहुत मदद की है।’ वेलनेस सेंटर का लॉन्च इस साल हिमाचल के धर्मशाला में होगा। प्रतीक 2018 तक बाकी हिल स्टेशन में भी इस सेंटर को खोलने का विचार कर रहे हैं।

इस सेंटर में प्रतीक लोगों को हेल्दी तरह से जीना सीखाएंगे। डिप्रेशन और शराब की लट से निजात पाने कि लिए आयुर्वेद का सहारा भी लिया जाएगा।

प्रतीक ने अपने करियर की शुरुआत फिल्म ‘जानें तू… या जाने ना से की थी’। प्रतीक ने कई फिल्मों में काम किया लेकिन खुद को एक एक्टर के रूप में स्थापित करने में नाकाम रहे। उनकी आखिरी फिल्म ‘उमरिका’ थी। वैसे खबरें हैं कि प्रतीक जल्द ही धर्मा प्रोडक्शन्स की ‘स्टूडेंट ऑफ दी इयर’ के पार्ट 2 में टाइगर श्रॉफ के साथ नजर आ सकते हैं।

 

सीता वनवास से दो कविताएं

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  • गुलाब खण्डेलवाल

मन कैसे ‘सीताराम’ कहे!
सिंहासन पर रहें राम, सीता वन बीच दहे!

‘पढ़ते ही वह सकरुण गाथा
झुक जाता लज्जा से माथा
क्या सीता का दोष भला था
यों लांछना सहे!

जब ले चले सती को लक्ष्मण
भूला कभी आपको वह क्षण!
प्राणप्रिया को दे निर्वासन
प्रभु क्या सुखी रहे!

‘विरह जगत की अंतिम गति हो
पर क्यों इतना क्रूर  नियति हो
जब फूलों से भरी प्रकृति हो,  आँधी तेज बहे!’
मन कैसे ‘सीताराम’ कहे!
सिंहासन पर रहें राम,

सीता वन बीच दहे!

”प्रभो! अच्छा पत्नीव्रत पाला

प्रभो अच्छा पत्नीव्रत पाला !
धोबी के ही कहे प्रिया को निर्वासन दे डाला !

बजवा सत्य-न्याय का डंका
जिसके लिए विजय की लंका
उसी सती को करके शंका घर से तुरत निकला

‘सोचा भी न तनिक यह मन में
क्या बीतेगी उस पर वन में !
चाँद बिना चाँदनी भुवन में पा सकती उजियाला !

‘यदि लोकापवाद था गन्दा
न्याय सदा होता है अँधा
तो क्यों नहीं राज्य का फन्दा अपने सिर से टाला !’

प्रभो अच्छा पत्नीव्रत पाला !
धोबी के ही कहे प्रिया को निर्वासन दे डाला !

(साभार – कविता कोश)

 

 

 

 

रामनवमी पर मैथिली और भोजपुरी लोकगीत

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अय बाबू, चैत रामनवमी अयोध्या मे / मैथिली लोकगीत

अय बाबू, चैत रामनवमी अयोध्या मे
रामजी के जन्म भेलै ना
बक्खो जे दान मांगै अंगना नचौनी
पमरिया जे दान मांगै चिल्हका खेलौनी
अयोध्या में रामजी के जन्म भेलै ना
दगरिन जे दान मांगै नाड़ के छिलौनी
नउइन जे दान मांगै आरत लगौनी
अयोध्या में रामजी के जन्म भेलै ना
धोबिन जे दान मांगै सीरक धोऔनी
ननदो जे दान मांगै कजरा सेदौनी
अयोध्या में रामजी के जन्म भेलै ना

मैं ना जीओं बिनु राम / भोजपुरी

मैं ना जीओं बिनु राम हो जननी, मैं ना जिओं बिनु राम।
राम जइहें संग हमहु जाएब,
अवध अइहें कवन काम जननी हो, मैं ना जीओं बिनु राम।
राम लखन दुनो वन के गवनकिन,
नृपति गयो सुरधाम, मैं न जीओं बिनु राम।
भूख लगी तहाँ भोजन बनैहों, प्यास लगी तहँ पानी
नींद लगी तहँ सेज लगैहों, चरण दबैहों सुबह-साम,
मैं न जीओ बिनु राम।

हाईवे के किनारे 500 नहीं 220 मीटर के दायरे में नहीं होंगे ठेके, सुप्रीम कोर्ट की रोक

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राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों केकिनारे शराब की दुकानों पर पाबंदी के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने थोड़ी ढील देते हुए कहा है कि उन निगम क्षेत्र जिनकी आबादी 20 हजार या इससे कम हो, वहां 500 मीटर के दायरे में नहीं बल्कि 220 मीटर केदायरे में शराब की दुकानें नहीं होंगी। वहीं सिक्किम और मेघालय की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए इस तरह की पाबंदी से छूट दे दी गई है।

मालूम हो कि गत 15 दिसंबर के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के 500 मीटर केदायरे में एक अप्रैल, 2017 से शराब की दुकानें नहीं होंगी। यह आदेश बार, पब और होटलों पर भी लागू था। साथ ही राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर शराब के दुकानों की मौजूदगी केसंकेतक या बोर्ड लगाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने शुक्रवार को अपने फैसले में फेरबदल करते हुए कहा कि वैसे निगम क्षेत्र या शहर जिनकी आबादी 20 हजार या इससे कम हो, वहां 500 मीटर की बजाय 220 मीटर केदायरे में शराब की दुकानें नहीं होंगी।

पीठ ने बार एवं रेस्तरां को किसी तरह का छूट देने से इनकार कर दिया है। पीठ ने कहा कि अगर 15 दिसंबर केआदेश से इन्हें मुक्त रखा जाएगा तो उद्देश्य ही नहीं पूरा होगा। आदेश शराब पीकर वाहन चलाने को रोकने को ध्यान में रखते हुए लिया गया था।

दिसंबर केआदेश में हाईवे के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों के लिए नए लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा दी थी। 31 मार्च, 2017 केबाद राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे तक किसी भी शराब के ठेके का लाइसेंस नवीनीकरण पर पाबंदी लगा दी थी।

इस आदेश में भी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बदलाव किए। अब जिनकेपास लाइसेंस है वह 30 सिंतबर तक बने रहेंगे। वास्तव में अदालत ने पाया कि सभी राज्य एक अप्रैल से लेकर 30 मार्च केलिए ही लाइसेंस जारी नहीं करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस प्रमुख को सुनिश्चित करने के लिए कहा है वह योजना तैयार करें जिससे कि निर्देशों का पालन हो सके। पीठ ने कहा कि यह आदेश लाखों लोगों की जिंदगी को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

मालूम हो कि कुछ राज्यों समेत कई संगठनों ने याचिका दायर कर 15 दिसंबर केआदेश में बदलाव करने की गुहार की थी। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय केवर्ष 2015 के आंकड़े के मुताबिक, देश में हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष करीब डेढ़ लाख लोगों की मौत होती है जबकि इससे तिगुनी संख्या में लोग घायल होते हैं। अधिकतर दुर्घटनाओं की वजह शराब पीकर वाहन चलाना है।

 

समलैंगिकों के लिए इंद्रधनुषी झंडा बनाने वाले गिल्बर्ट बेकर का निधन

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विश्व भर में समलैंगिक सम्मान के प्रतीक के रूप में जाने जाने वाले इंद्रधनुषी झंडा डिजाइन करने वाले अमेरिकी कलाकार गिल्बर्ट बेकर का निधन हो गया है। यह जानकारी उनके करीबी दोस्त और मानवाधिकार कार्यकर्ता क्लीव जोन्स ने शनिवार (1 अप्रैल) को दी। बेकर 1978 में सैन फ्रांस्सिको के समलैंगिक स्वतंत्रता दिवस पर आठ रंगों के इंडे के साथ सामने आए थे। 1978 के इस दिन के आधार पर आधुनिक समलैंगिक दिवस मनाया जाता है।

वह सैन फ्रांस्सिको एलजीबीटी अधिकार आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे और हार्वे मिल्क के करीबी दोस्त थे। मिल्क की हत्या कर दी गई थी।

जोन्स ने फेसबुक पर लिखा है, ‘‘मेरा दिल टूट गया। दुनिया में मेरा सबसे प्यारा दोस्त नहीं रहा। गिल्बर्ट ने दुनिया को इंद्रधनुषी झंडा दिया। उनसे मुझे 40 साल तक प्रेम और दोस्ती मिला।’’

उन्होंने लिखा है, ‘‘मैं खुद को रोने से नहीं रोक पा रहा हूं। मैं तुम्हें हमेशा प्यार करता रहूंगा गिल्बर्ट बेकर।’’

 

महिलाओं को 26 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलेगा, राष्ट्रपति ने नये कानून को मंजूरी दी

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नयी दिल्ली : नये कानून के तहत महिला कर्मचारियों को अब 12 हफ्ते की बजाए 26 हफ्ते का सवैतनिक अवकाश मिलेगा ।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मातृत्व लाभ :संशोधन: कानून, 2017 को अपनी मंजूरी दे दी । महिला कर्मचारियों के फायदे के लिए 55 वर्ष पुराने कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव किया गया है ।
नये कानून के तहत 50 या ज्यादा कर्मचारियों वाले हरेक संस्थान के लिए निर्धारित दूरी के भीतर क्रेच की सुविधा होना आवश्यक है ।
नियोक्ता भी एक महिला को दिन में चार बार क्रेच जाने की अनुमति देने के लिए बाध्य होगा ।
कानून कहता है कि हरेक प्रतिष्ठान को इसके तहत उपलब्ध हर सुविधा के बारे में हरेक महिला को उसकी शुरूआती नियुक्ति के वक्त लिखित और इलेक्ट्रॉनिक रूप से बताना होगा ।
नियोक्ता महिला को मातृत्व अवकाश पाने के बाद घर से काम करने की इजाजत दे सकता है ।
इसमें कहा गया है, ‘‘ऐसी स्थिति में जहां महिला को सौंपी गयी कार्य की प्रकृति उस तरह की हो कि वह घर से काम कर सकती है तो नियोक्ता ऐसी अवधि के लिए मातृत्व लाभ हासिल करने के बाद उसे ऐसा करने की अनुमति दे सकता है और ऐसी स्थिति में नियोक्ता और महिला आपसी तालमेल से राजी हो सकते है । ’’ कानून तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने और मां बनने :जैविक मां जो अपने अंडाणु को दूसरी महिला में प्रतिरोपित कर बच्चा पैदा करती हैं : वाली महिला को 12 हफ्ते मातृत्व छुट्टी की अनुमति देता है ।
कानून के तहत 26 हफ्ते की सवैतनिक छुट्टी केवल दो बच्चों के लिए है । दस या ज्यादा लोगों को नौकरी देने वाले सभी प्रतिष्ठानों पर लागू होने वाला कानून कहता है कि दो या ज्यादा बच्चों वाली महिला 12 हफ्ते के मातृत्व अवकाश की हकदार होगी ।

 

भीषण गर्मी पर योगेश्वर दत्त ने किया ट्वीट, तो खूब हुई वाहवाही

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पहलवानी में ओलिंपिक पदक जीतने वाले योगेश्नवर दत्त ने बढ़ती गर्मी पर ट्वीट करते हुए लोगों पर तंज कसा है। दत्त ने ट्वीट कर कहा, आम, नीम, पीपल और बरगद के पेड़ काटकर घर में मनी प्लांट लगाने वाली मानव जाति को भीषण गर्मी की शुभकामना। दत्त के इस ट्वीट को लोगों ने खूब पसंद किया है। अब तक 4.3 हजार लोगों ने इसे लाइक किया है और 2.4 हजार लोगों ने री- ट्वीट किया है। कई ट्विटर यूजर्स ने दत्त के इस ट्वीट का जवाब दिया है। @Dixit_G नाम के यूजर ने लिखा, जो लोग मनी प्लांट लगाते हैं वो एसी में रहते हैं और आम, नीम लगाने वाले भरी गर्मी में, यही विडंबना है। वहीं @Vandanaruhela ने लिखा, बात तो सही है भाई, मगर क्या करें। 150 स्क्वेयर यार्ड में मनी प्लांट ही लग सकता है। 500 मिले तो आम, नीम, पीपल सब लगा लें। वहीं @MaheshN48117609 नाम के यूजर ने लिखा, भाई जी इन लोगों को क्या पता गर्मी क्या होती है। ये गर्मी भी बेचारे गरीब को ही लेकर डूबेगी।

@DuttYogi जो लोग मनी प्लांट लगाते हैं वो AC में रहते हैं और आम नीम लगाने वाले भरी गर्मी में, यही बिडम्बना है इस धरती की

@DuttYogi भाई जी इन लोगो को क्या पता गर्मी क्या होती हे।ये गर्मी भी बेचारे गरीब को ही लेकर डुबेगी।

 

@DuttYogi हम लोग काफी विकसित और जानकार हो गए है इसीलिए पेड़ो का #पूजन बन्द कर दिये।

— Satyam Barnaval

@DuttYogi पहलवान जी बातों बातों में जोरदार बात कह गए।

 

प्रत्यूषा बनर्जी की अंतिम शॉर्ट फिल्म रिलीज हुई

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18.45 मिनट की यह फिल्म प्रत्यूषा की असल जिंदगी से काफी मिलती-जुलती है। असल जिंदगी में उन्हें जिस तरह की परेशानी हो रही थी और ब्वॉयफ्रेंड के साथ इश्यू की वजह से उन्होंने शराब और स्मोकिंग करनी शुरू कर दी थी।

बालिका वधू की आनंदी उर्फ प्रत्यूषा बनर्जी की पहली पुण्यतिथि पर उनकी बेस्ट फ्रेंड काम्या पंजाबी ने उनकी आखिरी शॉर्ट फिल्म रिलीज की है। जिसे बनर्जी की मौत से डेढ़ महीने पहले शूट किया गया था। बॉम्बे सिटी सिविल और सेशल कोर्ट ने फिल्म की रिलीज पर स्टे लगाया था जोकि प्रत्यूषा की जिंदगी पर आधारित है लेकिन फाइनली यह रिलीज हो गई है। कोर्ट ने काम्या पंजाबी और फिल्म के प्रोडेयूसर को कोर्ट में पेश होने के लिए कहा था। फिल्म में लीड रोल प्रत्यूषा ने निभाया है। इसे लिखा और डायरेक्ट करण कश्यप ने और प्रोड्यूस निखत नीरुशा ने किया है। 18.45 मिनट की यह फिल्म प्रत्यूषा की असल जिंदगी से काफी मिलती-जुलती है। असल जिंदगी में उन्हें जिस तरह की परेशानी हो रही थी और ब्वॉयफ्रेंड के साथ इश्यू की वजह से उन्होंने शराब और स्मोकिंग करनी शुरू कर दी थी। उसे दिखाया गया है।

फिल्म का अंत राहुल और शालू के किरदार की लड़ाई पर खत्म हो जाती है। जिसमें शालू उर्फ प्रत्यूषा कहता हैं कि वो घर छोड़कर चला जाए या फिर वो उसे दोबारा कभी नहीं देख पाएगा। हालांकि फिल्म में जब राहुल उससे पूछता है कि क्या वो उसे ब्लैकमेल कर रही है तो वो कहती हैं- फिक्र मत करो अपने आप को खत्म नहीं करुंगी, सिर्फ मेरी जिंदगी से तु्म्हारी जरुरत खत्म हो जाएगी। काम्या ने कहा कि वो फिल्म का क्लाइमैक्स शूट नहीं कर पाए थे क्योंकि एक्ट्रेस ने आत्महत्या कर ली थी। बनर्जी का ब्वॉयफ्रेंड राहुल राज सिंह फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने के लिए कोर्ट पहुंच गया था।

काम्या ने ट्विटर पर फिल्म शेयर करते हुए लिखा- तो मैं यहां हूं, अभी देखो #humkuchhkehnaasakey #staytunedmedia“ फिल्म के प्रोमो ने लोगों के मन में उत्सुकता पैदा कर दी थी। इस फिल्म से एक बात तो साफ हो गई है कि इसकी शूटिंग के समय तक प्रत्यूषा के मन में आत्महत्या का कोई विचार नहीं था।

मुंबई के वर्सोवा पुलिस स्टेशन में राहुल ने शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में राहुल का कहना है कि काम्या ने प्रत्यूषा के फर्जी वीडियो के जरिए उनका (राहुल) का नाम खराब करने की कोशिश की है। राहुल ने अपनी शिकायत में बॉम्बे टाइम्स में की रिपोर्ट का भी जिक्र किया।