Friday, March 27, 2026
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17 साल की लड़की ने लेह में लाइब्रेरी बनवाने के लिए इकट्ठे किए 10 लाख रुपए

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कुछ लोग सच में आत्मनिर्भर हैं, जो अपने साथ-साथ दूसरों को भी आत्मनिर्भर बनाने की सोच रखते हैं। उन्हीं में से एक है 17 साल की अनन्या सलूजा, जो मीलों का सफर तय करके जाती हैं सिर्फ कुछ चेहरों में मुस्कान लाने के लिए। अनन्या उन इंसानों में से हैं, जो अपने से पहले दुनिया और उसमें रह रहे लोगों के बारे में सोचती हैं।

अनन्या 11वीं क्लास की स्टूडेंट हैं और गुरुग्राम के द श्रीराम स्कूल में पढ़ती हैं। पिछले तीन साल की गर्मियों की छुट्टियां अनन्या ने लेह में ही बितायी हैं। अनन्या ने बच्चों को पढ़ाने के अलावा 10 लाख तक की धनराशि इकट्ठी कर ली है, ताकि लेह में लाइब्रेरी और खेलने के लिए एक मैदान बनवाया जा सके।

अनन्या महज 11वीं की छात्रा हैं। अपने परीक्षा से पहले के महत्वपूर्ण समय को वो जम्मू कश्मीर के सुविधा से वंचित बच्चों को पढ़ाने में बिताती हैं। अनन्या दो महीने के वॉलंटियर प्रोग्राम में बच्चों तक अच्छी से अच्छी शिक्षा पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। अनन्या का मानना है, कि बच्चे उनसे नहीं बल्कि बच्चों से वो बहुत कुछ सिखती हैं। इस प्रोग्राम के ज़रिए वो जान पायी हैं कि कैसे लोग रोज़मर्रा की समस्यों का सामना करते हैं।

अनन्या कहती हैं ‘टैबलेट हमारे लिए रोज़मर्रा की चीजों में से एक है पर इन बच्चों ने मुश्किल से ही कम्प्यूटर को देखा है। उनके लिए टैबलेट एक जादुई स्क्रीन जैसा है जो बिना तारों के काम करता है। हमारे रहन-सहन, खाना-पान में भिन्नता के कारण मुझे उनके साथ घूलने-मिलने में थोड़ा वक्त लगा। कुछ समय बीत जाने के बाद इन सभी भिन्नता के बावजूद हमारे बीच मज़बूत रिश्ता बन गया है जो मुझे उनसे बांधे रखता है।’ अनन्या जो एक छात्रा है और गुरुग्राम के द श्रीराम स्कूल में पढ़ती हैं। पिछले तीन साल की गर्मियों की छुट्टियां अनन्या ने लेह में ही बितायी हैं। अनन्या ने बच्चों को पढ़ाने के अलावा 10 लाख तक की धनराशि इकट्ठी कर ली है, ताकि लेह में लाइब्रेरी और खेलने के लिए मैदान बनवाया जा सके।

यह सब दो साल पहले शुरू हुआ जब अनन्या के स्कूल ने एक कार्यक्रम शुरू किया जिसमें उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचे का लक्ष्य था, जो इस सुविधा से वंचित है। कार्यक्रम तो खत्म हो गया पर फिर भी अनन्या ने इस काम को जारी रखने की ठानी।

टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए एक इन्टरव्यू में अनन्या ने बताया की ‘ये अनुभव पूरी तरह से बदल देने वाला था। कार्यक्रम के दौरान में उन लड़कियों के बहुत करीब आ गई जिन्हें मैं लेह में जानती थी। अब मैं पीछे नहीं हट सकती।’ साथ ही अनन्या ये भी बताती हैं, कि अपने दोस्तों से बातचीत के दौरान उन्हें एक संस्थान (17000 फीट फाउंडेशन) के बारे में पता चला जिसे सुजाता साहू चलाती हैं। सुजाता साहू पूर्व अध्यापिका और उनके एक दोस्त की मां भी थी। अनन्या ने उनसे बात की और लद्दाख की और रवाना हो गई। अब अनन्या के लिए लेह और लद्दाख के दूर-दराज़ इलाकों में जाना हर गर्मी छुट्टियों का काम बन गया है।
2015 में अनन्या लेह के लिक्त्सीय, तुरतुक और त्यालिंग जिलों में बच्चों को पढ़ाने गई थी। 2016 में लेह के माथो जिले में गई थी। वहाँ अनन्या ने बच्चों के लिए एक खेल मैदान बनवाने में मदद की है। जो उन्हें शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक विकास में भी सहायता करेगा। इन छुट्टियों में वो कारगिल जिले में लाइब्रेरी खुलवाने के प्रयास में लगी हुई हैं। अनन्या कुल 600 गांवों और 1000 सरकारी स्कूलों के साथ काम कर चुकी हैं। जहाँ जनसुविधाओं की भारी कमी थी। अनन्या साल में एक बारी प्रोग्राम से कुछ ज्यादा करना चाहती थी। अनन्या ने इस कार्यक्रम में क्षेत्रिय लोगों को भी जोड़ा और जनसहयोग द्वारा धनराशि इकट्ठा करना शुरु किया।

अनन्या कहती हैं ‘मैंने संस्थान को बेहतरीन काम करते हुए देखा है पर कुछ हफ्तों के अलावा मैं कुछ और नहीं दे पाती। मैनें दूसरी तरह से मदद करने का रास्ता खोज लिया है। मैं धनराशि इकट्ठा कर के उनकी पहुंच लेह की सीमाओं से आगे बढ़ाने में लगी हुई हूं। मुझे अब लेह के कारगिल जिले में लाइब्रेरियों की स्थापना करनr है। मैंने 19 लाइब्रेरियों के लिए धनराशि इकट्ठा कर ली है। उम्मीद करती हूं कि मैं अपने बच्चों और कश्मीर के लिए ज्यादा से ज्यादा रकम जमा कर सकूं।’

(साभार – योर स्टोरी)

कचरा प्रबन्धन व जरूरतों पर नियन्त्रण से प्रदूषण कम हो सकता है

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मोनालिसा दत्त पिछले कई सालों से पर्यावरण को सुरक्षित रखने और प्रदूषण के बढ़ते खतरों के प्रति लोगों को सजग बनाने के लिए काम कर रही हैं। टॉक्सिक लिंक में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर कार्यरत मोनालिसा ने आई आई एस डब्ल्यूबीएम, कोलकाता से इनन्वायरन्मेंट मैनेजमेंट की डिग्री ली है। उनको आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में 4 साल और दिव्यांगता के क्षेत्र में 3 साल काम करने का अनुभव भी है। बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर वे प्रबन्धन, नेटवर्किंग, परामर्श देने का काम काम कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के साथ कर रही हैं। अपराजिता ने मोनालिसा दत्त से खास बातचीत की –

प्रदूषण सारी दुनिया की समस्या है

प्रदूषण सारी दुनिया एक बेहद महत्वपूर्ण मसला है। भारत में लोगों को इसके बारे में खास जानकारी नहीं है इसलिए यह बेहद जागरुकता कम है। लोग प्रदूषण से बचने के तरीके के बारे में अधिक नहीं जानते। अभी काम हो रहा है मगर बहुत कुछ करने की जरूरत है।

प्रदूषण को लेकर न तो लोग सोचते हैं और न जानकारी है

प्रदूषण को लेकर लोग सोचते भी नहीं हैं इसलिए समस्या नहीं है, मसलन जो खाने – पीने की चीजें और उनके पैकेट हम सड़कों पर फेंकते हैं, उसके बारे में सोचते नहीं है और जहाँ – तहाँ भेज देते हैं। ऐसी स्थिति में इलेक्ट्रानिक उपकरणों से निकलने वाले ई – वेस्ट के बारे में लोग सोचेंगे, दूर की बात है।

ई – कचरा और वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है

अब आज लोग गाड़ियाँ खरीदते हैं या इलेक्ट्रानिक उपकरण खरीदते हैं, बढ़ती माँग के साथ उत्पादन बढ़ रहा है। उत्पादन के साथ खरीद और खरीद के साथ ई – वेस्ट और वायु प्रदूषण बढ़ रहा है क्योंकि हम नयी गाड़ी या गजट खरीद तो रहे हैं मगर पुरानी चीजें किसी को न दे रहे हैं और न बाहर निकाल रहे हैं, इससे ई – कचरा ही बढ़ रहा है।

कचरा प्रबन्धन के प्रति जागरुकता होनी चाहिए

सबको इससे बचाव के तरीकों को जानना होगा, मसलन घर से जो कचरा निकालते हैं, उसमें रिसाइकल होने वाले और नहीं रिसाइकल नहीं होने वाले कचरे को अलग कर सकते हैं, इससे बाहर जाने वाला कचरा कम हो सकता है क्योंकि फल – सब्जी के छिलकों का इस्तेमाल खाद की तरह किया जा सकता है। भारत सरकार यह कर रही है मगर हर घर में इसके प्रति जागरुकता होनी चाहिए। मुश्किल यह है कि ठोस कचरा प्रबन्धन के नियम तो हैं ही, उनका नियमन मजबूत किया गया है मगर लोग इसके बारे में, फायदे और नुकसान के बारे में नहीं जानते हैं तो वहाँ भी जागरुकता की जरूरत है।

सेनेटरी नैपकिन का डिस्पोजल व रिसाइकिलिंग निर्माता की जिम्मेदारी है

सेनेटरी नैपकिन के साथ दिक्कत है और जो नियम संशोधित हुए हैं, उसके तहत नियम है कि सेनेटरी नैपकिन की निर्माता कम्पनी हर पैकेट के साथ इसे फेंकने के लिए एक पाउच देगी। सेनेटरी नैपकिन का डिस्पोजल और उसके रिसाइकलिंग की जिम्मेदारी कम्पनी की है मगर जानकारी नहीं होने के कारण उन पर न तो सवाल उठते हैं और न कोई कुछ कहता है। इस बाबत जानकारी देना सेनेटरी नैपकिन बनाने वाली कम्पनी की जिम्मेदारी है, जानकारी तो मिलनी चाहिए।

निजी संगठनों तथा संस्थानों के साथ काम करने को लेकर हिचक है

टॉक्सिक लिंक हर तरह के कचरे के प्रति जागरुकता लाने के लिए काम कर रहा है। हम कई सरकारी तथा गैर सरकारी संगठनों के साथ काम करते हैं, कई अधिकारियों को ही नियमों की जानकारी नहीं है। जिला स्तर पर जानकारी होगी, इसकी तो कल्पना नहीं की जा सकती। निजी संस्थानों के साथ काम करने को लेकर अब भी हिचक है।

पुराने नियमों को संशोधित कर जमीनी स्तर पर ले जाया जा रहा है

पिछले 3 साल में पर्यावरण को लेकर सख्ती हुई है। नियम थे मगर संशोधन करके इनको नए तरीके से लागू किया जा रहा है। सजावटी रंगों में सीसे का अनुपात तय करना, यह पहली बार हुआ और पिछले साल नवम्बर में यह लागू हुआ है। पेंट निर्माता तय अनुपात से ज्यादा इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसके साथ खरीदने वालों को भी नियमों का ध्यान होना चाहिए। घर –घर में जागरुकता लाना, सेनेटरी नैपकिन से लेकर पहले से मौजूद नियमों को जमीनी स्तर पर लागू की दिशा में कदम उठाए गए हैं।

कचरा प्रबन्धन व जरूरतों पर नियन्त्रण से प्रदूषण कम हो सकता है

व्यक्तिगत स्तर पर कचरा प्रबन्धन करके, अपनी जरूरतों को नियंत्रित करके हम प्रदूषण से बचाव करना सम्भव है।

अपनी जहरीली सोच पर काबू रखिए, दुनिया बची रहेगी

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इस दुनिया को कुदरत ने बनाया है, हवा, पानी, मिट्टी, आग, और आसमान से बनी इस जमीन ने हमारी परवरिश की है मगर ये कुदरत ही हमसे परेशान है। हम अपना जहर हर जगह फैला रहे हैं, पेड़ों को काटा, नदियों को सुखा दिया और अपनी तरक्की का जहर हवा में घोल रहे हैं। इन्सानों से अधिक तो सड़कों पर गाड़ियाँ दौड़ रही हें और अगले कुछ दिनों में हम पर्यावरण दिवस मनाने जा रहे हैं। नीयत ऐसी कि इन्सान तो इन्सान, अब हम पक्षियों और जानवरों को भी नहीं बख्शते। यह तहजीब और सलीकेदारों की दुनिया है और हक माँगने के लिए हम क्रूर होते जा रहे हैं।

गीता, रामायण, कुरान और बाइबल एक दूसरे से नहीं लड़ते और न ही गाय, बकरे और भैंसे लड़ते हैं मगर गाय अब हिन्दू और सुअर मुसलमान हो गया है। क्या हिन्दुओं को विष्णु के वराह अवतार की याद दिलानी होगी। नदी जब बहती है तो मजहब नहीं देखती, आसमान की बारिश पर हर किसी का हक है, मिट्टी में एक दिन हम सबको मिलना है, माटी का ही तो शरीर है, कोई राख होकर मिले तो कोई दफन होकर मिले। अगर कब्र है तो समाधि भी है, तो फिर फर्क कहाँ है।

सच कहें तो हवा में फैलते गाड़ियों के जहर से खतरा है, मोबाइल से निकलता ई कचरा एक खतरा है, नदियों में बढ़ती गन्दगी और रसायनों से खतरा है, तरक्की के नाम पर कटते पेड़ों के कारण कुदरत के संतुलन के बिगड़ने में खतरा है मगर इन्सान के दिमाग में जो प्रदूषण है, उसके सामने ये खतरे कुछ भी नहीं हैं। दिमाग में जो केमिकल है, वह आपको जहरीला बना रहा है, तभी तो आप औरतों को एक जिस्म से ज्यादा कुछ नहीं समझते, औरत की उम्र मायने नहीं रखती, बस वह एक औरत है, आपकी जहरीली सोच और जहरीली जुबान में जो खतरा है, उसके सामने गाड़ियों का काला धुआँ भी फीका है। आप उन सारी चीजों को बाँट रहे हैं, जो आपकी हैं ही नहीं।  गाय, बकरी, मोर….ये सब आपकी सियासत बन गयी है। गाय ही क्यों, हर जानवर की सुरक्षा की जानी चाहिए, गँगा ही क्यों, हर नदी का संरक्षण की जरूरत है, जब ईश्वर ने सारी दुनिया को एक बनाया है तो आप अपनी जहरीली सोच से उसे बर्बाद क्यों कर रहे हैं और किसने आपको यह अधिकार दिया है? आप अपनी सोच और जुबान को साफ कीजिए, दुनिया और ये मुल्क यूँ ही खूबसूरत बन जाएँगे। अपनी सियासत के लिए कुदरत को जहरीला मत बनाइए, दुनिया भी सुरक्षित रहेगी और पर्यावरण भी।

विमान से दुनिया का अकेले चक्कर लगाएगी अफगान की पहली महिला पायलट

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मुस्ल‍िम देश में महिलाओं की बदहाली किसी से छुपी नहीं अफगानिस्तान भी उन्हीं देशों की फेहरिस्त में शुमार है, जहां महिलाओं के पास नाम मात्र के ही अधिकार हैं।

इसी अफगानिस्तान मूल की 29 वर्षीय एक युवती अकेले फ्लाइट चलाकर दुनियाभर की सैर करने वाली है. अगर ऐसा होता है तो वो सबसे युवा अफगान पायलट कहलाएंगी।

शाइस्ता अपनी 5 बहनों और माता-पिता के साथ कैलीफोर्निया के रिचमोन्ड में रहने लगीं, जहां उनका एडमिशन एक साधारण से स्कूल में करा दिया गया, जहां बच्चों का फेल होना और पढ़ाई बीच में ही छोड़कर बाहर निकल जाना आम बात थी।इस अफगानी युवती का नाम है शाइस्ता वेज। शाइस्ता का जन्म सोवियत वार के दौरान अफगानिस्तान के रिफ्यूजी कैंप में हुआ था। हालांकि साल 1987 में वो और उनका परिवार अमेरिका पलायन कर गया।

शाइस्ता को भी यही लगता था कि कम उम्र उनकी शादी कर दी जाएगी और उनका जीवन ऐसे ही कट जाएगा पर एक दिन शाइस्ता को अपने फ्लाइंग पैशन का एहसास हुआ और इसके बाद वो अपने करियर और कॉलेज की पढ़ाई के बारे में सोचने लगीं।

अपनी कोशि‍शों और मेहनत के दम पर शाइस्ता ने पायलट लाइसेंस हासिल कर लिया। शाइस्ता की वेबसाइट ‘ड्रीम्स सोर’ पर दी गई जानकारी के मुताबिक लाइसेंस लेने के साथ ही शाइस्ता अफगानिस्तान की सबसे युवा महिला पायलट बन गईं।

अपने परिवार में भी वो पहली शख्स बन गईं, जिसके पास बैचलर और मास्टर डिग्री थी।

अब शाइस्ता आजादी के इस एहसास को दुनियाभर की महिलाओं खासकर अफगानी महिलाओं तक पहुंचाना चाहती हैं।

शाइस्ता की वेबसाइट उन्होंने कहा है कि मुझे जैसे ही यह अंदाजा हुआ कि मुझे उड़ना पसंद है, मैंने चुनौतियों का सामना करना शुरू कर दिया। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया. मैथ्स पर ध्यान दिया। मैं अब दुनिया को एक नये नजरिये से देखती हूं।

शाइस्ता कहती हैं कि अपने पैशन को पहचानना और उसके पीछे जाना जरूरी है।

International Civil Aviation Organization (ICAO) के अनुसार सिर्फ 5 फीसदी महिलाएं ही कॉमशियल पायलट्स हैं।

ऐसे में शाइस्ता कहती हैं कि अगर आप वाकई साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं तो उससे जुड़े करियर के विभिन्न क्षेत्रों पर भी गौर करें।

शाइस्ता कहती हैं कि एयरक्राफ्ट का दरवाजा हर बार खोलते समय मैं खुद से यही पूछती हूं कि मेरे जैसे बैकग्राउंड वाली लड़की कैसे इतनी भाग्यशाली बन गई। सच्चाई ये है कि कोई भी मुझ जैसा बन सकता है।

 

नहीं रहीं बॉलवुड की खुशमिजाज माँ रीमा लागू

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बॉलीवुड में हंसती-मुस्कुराती खुशमिज़ाज मां के किरदारों से लोकप्रिय हुई अभिनेत्री रीमा लागू नहीं रहीं। 58 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

उन्हें सीने में दर्द की शिकायत के बाद मुंबई के कोकिला बेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में दाखिल कराया गया था जहाँ रात के एक बजे उनकी मौत हो गई.

वे मराठी और हिंदी फिल्मों का जाना-पहचाना चेहरा थीं। टेलीविज़न की दुनिया में भी वो ख़ासी लोकप्रिय थीं। उन्होंने कई सीरियलों में काम किया।

मराठी रंगमंच पर दशकों तक वो सक्रिय रहीं और बॉलीवुड की ममतामयी ग्लैमरस मदर के तौर पर जानी गईं।

उन्होंने ‘मैंने प्यार किया’, ‘आशिक़ी’, ‘साजन’, ‘हम आपके हैं कौन’, ‘वास्तव’ और ‘हम साथ-साथ हैं’ जैसी यादगार फ़िल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया था।

‘हम साथ-साथ हैं’ में उनकी भूमिका कैकेयी से प्रेरित थी फिर भी उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया। ‘वास्तव’ में उन्होंने ‘मदर इंडिया’ की नरगिस की यादें ताज़ा करा दी थीं।

म्यूज़िकल रोमांटिक फ़िल्म ‘मैंने प्यार किया’ के लिए उन्हें 1990 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड का नोमिनेशन मिला।

उनके आने से पहले बॉलीवुड में मां के रोल् की अलग छवि थी। रीमा लागू ने नई लकीर खींच दी थी।

इसके अलावा ‘आशिक़ी’, ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘वास्तव’ के लिए भी उन्हें नोमिनेट किया गया था। उनका फ़िल्मी करियर श्याम बेनेगल की फ़िल्म ‘कलयुग’ से शुरू हुआ था।

 

बॉस बनने पर ऐसा हो सहयोगियों से व्यवहार

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ऑफिस में एक साथ काम करनेवाले एक-दूसरे के साथी हो जाते हैं। ऐसे में साल के अंत में मिली पदोन्नत्ति से क्या अब आपको उन्हीं दोस्तों के साथ पहले जैसा व्यवहार करना अनुचित लग रहा है? ये लाज़मी है कि ऊंचा पद पाने से आप थोड़े असहज हो जाएं, लेकिन उसके साथ ही इस बात को भी न भूलें कि बॉस और एंप्लॉयी के बीच की दूरी को कैसे बनाए रखना है? आइए, हम आपको बताते हैं कि सहकर्मी से बॉस बनने के बाद कैसे करें सहयोगियों से व्यवहार?

सहज रहें
अचानक मिली तरक्क़ी से ख़ुशी के साथ थोड़ा असहज होना आम बात है. ऐसे में कभी हमजोली रहे कलीग पर अचानक बॉसगीरी दिखाना उचित नहीं, लेकिन पहले जैसा व्यवहार करना भी जायज़ नहीं। काम के समय काम और उसके बाद आप अपने कलीग से पहले जैसा ही व्यवहार करें। उदाहरण के लिए उसके साथ चाय/कॉफ़ी पीने जाना, साथ में लंच करना वगैरह-वगैरह। इस तरह से आप अपने कलीग के दिल के बहुत क़रीब रहेंगे और उनके बीच आपकी वाहवाही भी होगी।

दूरी बनाकर करें
कलीग से ढंग से बात करना और उनसे दूरी बरक़रार रखना, ये दोनों ही आपको बख़ूबी आना चाहिए. इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि आप उनसे पूरी तरह से बात न करें, उन्हें नजरअंदाज करें या फिर अपनी केबिन/जगह/चेयर छोड़कर दिनभर उन्हीं के आसपास भटकते रहें। काम से काम रखना आप दोनों के संबंध के लिए और कंपनी की तरक्क़ी के लिए बेहतर होगा. ऑफिस के अंदर बॉस का फ़र्ज़ तो ऑफिस से निकलने के बाद उन सहकर्मियों के साथ दोस्ताना व्यवहार निभाना आपकी समझदारी को दर्शाता है।

ज्यादा तारीफ करने से बचें
जब तक आप सहकर्मी होते हैं, आपके क्रियाकलाप से बहुत ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन जैसे ही आप बॉस की कुर्सी संभालते हैं पूरे ऑफिस की निगाहें आप पर टिक जाती हैं. ऐसे में किसी एंप्लॉयी को बढ़ावा देना, या मीटिंग में उसकी तारीफ़ के पुल बांधना, दूसरों से उसे अच्छा बताना आदि आपके ओहदे के लिए सही नहीं है। बॉस की कुर्सी पर बैठने के बाद सभी ज़िम्मेदारियों को सही तरह से हैंडल करें. ऑफिस में किसी को भी ये एहसास न दिलाएं कि आप किसी एक के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं।

व्यक्तिगत चीज़ों से बचें
अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को अलग-अलग रखें। चाहे कोई सहकर्मी आपका कितना भी ख़ास क्यों न हो, उससे अपनी पर्सनल बातें करने से बचें। अब आप बॉस हैं। ऐसे में ख़ुद की प्राइवेसी रखना आपकी ज़िम्मेदारी है। अपने सहयोगियों के साथ प्यार से लेकिन एक दूरी बरक़रार रखते हुए काम लेने की कोशिश करें।

सख़्त रहें
ऑफिस के पुराने स्टाफ जो कभी आपके सहकर्मी हुआ करते थे, उनके साथ थोड़ी सख़्ती बरतना बहुत ज़रूरी है। हर बार उनकी हां में हां मिलाना और कंपनी या बॉस की बुराई करना अब आपका काम नहीं। उनकी ग़लतियों पर पर्दा डालने की बजाय उनको केबिन में बुलाकर ग़लतियों के बारे में बताएं. इसके साथ ही फिर कभी ऐसा न करने की हिदायत दें।

 

पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए आगे आएंगी निर्भया की मां

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2012 में देश की राजधानी में हुए सबसे भयावह गैंगरेप में अपनी बेटी होने वाली निर्भया की मां आशा देवी पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए आगे आ रही हैं। अपनी बेटी ज्योति के नाम से निर्भया ज्योति ट्रस्ट चलाने वाली आशा देवी पीड़ित महिलाओं और अत्याचार झेल रही महिलाओं की हर संभव मदद करने की कोशिश में लगी हैं। पीड़ित महिलाओं की इसी मदद को आगे रखने के लिए निर्भया की मां ने न्याय ज्योति नामक संगठन के साथ हाथ मिलाया है। नामी गिरामी वकीलों के समूह न्याय ज्योति के जरिए आशा देवी देश के अलग-अलग इलाकों में हिंसा और बर्बरता की शिकार महिलाओं को हरसंभव न्यायिक मदद मुफ्त में देना चाहती हैं।

आशा देवी कहती हैं कि न्याय ज्योति संस्था वकीलों के एक समूह लोरेटो ने शुरू की है। सीईओ रोहन महाजन ने कहा कि उनकी संस्था हर पीड़ित महिलाओं को मुफ्त में  कानूनी सलाह उपलब्ध कराने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर वकीलों की सुविधा भी मुफ्त में उपलब्ध कराएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया के तमाम गुनहगारों की फांसी की सजा बरकरार रखी है जिसके बाद पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले हिंसा के आरोपियों और दोषियों को जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा मिलने की उम्मीद मजबूत होती दिख रही है। ऐसे में निर्भया की मां खुद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को लेकर उनकी आवाज बुलंद करने के साथ उनकी हर संभव मदद करने के लिए भी तैयार हो गई हैं।

 

पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे का निधन

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नयी दिल्ली, : पर्यावरण मंत्री और मध्य प्रदेश से दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे अनिल माधव दवे का आज यहां निधन हो गया।
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक 60 वर्षीय दवे ने अपने घर पर बेचैनी की शिकायत की और तब उन्हें एम्स ले जाया गया। वहां उनका निधन हो गया।

दवे वर्ष 2009 से राज्यसभा के सदस्य थे। पिछले वर्ष उन्हें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग का स्वतंत्र प्रभार मिला था। उन्होंने विवाह नहीं किया था।

वह लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और वर्ष 2003 में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को हराने के लिए रणनीति बनाकर चर्चा में आए थे।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उनके आकस्मिक निधन पर शोक जताया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दवे के निधन पर शोक व्यक्त किया है।

उन्होंने ट्वीट में कहा, ‘‘अपने मित्र एवं सम्मानित सहकर्मी पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे जी के आकस्मिक निधन से सदमे में हूं। मैं संवेदनाएं व्यक्त करता हूं।’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि दवे को एक समर्पित लोकसेवक के तौर पर याद किया जाएगा, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति बेहद जुनूनी थे।

एक अन्य ट्वीट में मोदी ने कहा, ‘‘कल देर शाम तक मैं अनिल माधव दवे जी के साथ था और मुख्य नीतिगत मुद्दों पर चर्चा कर रहा था। उनका निधन एक निजी क्षति है।’’ गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि मंत्री के निधन की खबर से वह दुखी हैं।

राजनाथ ने कहा, ‘‘दवे पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को लेकर काफी सक्रिय और संवदेनशील थे। काम के प्रति उनका समर्पण सराहनीय है। दवे के परिवार के सदस्यों के प्रति मेरी संवदेनाएं।’’ वित्त मंत्री अरण जेटली ने भी दवे के निधन पर दुख जताया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी दवे के निधन पर शोक जताया।

रमेश ने भाजपा नेता दवे को ‘‘बहुत अच्छा व्यक्ति’’ बताया और याद किया कि किस तरह पूर्ववर्ती कांग्रेस नीत संप्रग सरकार में जब वह खुद पर्यावरण मंत्री थे तब दवे ने उन्हें कितना समर्थन दिया था।

मेनका गांधी ने लिखा रेल मंत्री को पत्र, स्तनपान के लिए हो रेलवे स्टेशन में अलग इंतजाम

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नई दिल्ली – रेल से यात्रा करने वाली कई महिलाओं ने महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से यह शिकायत की है कि रेलवे स्टेशनों में ब्रेस्टफीडिंग यानि स्तनपान के लिए कोई अलग जगह न होने की वजह से उन्हें दिक्कत का सामना करना पड़ा है। कुछ महिलाओं ने लिखा कि उन्हें असहज स्थिति से गुजरना पड़ता है या बच्चे भूखे रह जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया की एक सीनेटर के सदन में बच्चे को ब्रेस्टफीड कराने की खबर के बाद बड़ी संख्या में महिलाओं ने मेनका गांधी को लिखा और रेलवे स्टेशनों में अलग रूम के इंतजाम की मांग की।

मेनका गांधी ने अब रेल मंत्री सुरेश प्रभु को पत्र लिखा है। पत्र में लिखा है,’महिलाओं का कहना है कि वह रेलवे स्टेशन में ट्रेन का इंतजार करते हुए अपने बच्चों को दूध नहीं पिला पाती या कपड़े चेंज नहीं कर पातीं क्योंकि ऐसा कोई कमरा या नर्सिंग प्लैटफॉर्म नहीं है।’ पत्र में लिखा है कि मैंने सिविल एविएशन मिनिस्टर को भी कहा था और उन्होंने यह कन्फर्म किया है कि नर्सिंग रूम हर एयरपोर्ट पर हैं।

मेनका ने लिखा है कि सरकार रेलवे स्टेशनों में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने का काम कर रही है तो हमें महिला यात्रियों की इस बेहद अहम जरूरत को भी पूरा करना चाहिए। पत्र में यह भी लिखा है कि हर स्टेशन में महिलाओं के लिए एक अलग से वेटिंग रूम होना चाहिए जिसके एंट्रेस पर सीसीटीवी कैमरा लगा हो। कई महिलाओं ने शिकायत की कि छोटे स्टेशनों पर अलग वेटिंग रूम नहीं है और जहां है भी तो वह बंद रहता है। मेनका ने लिखा है कि भले ही छोटा सा रूम हो लेकिन अलग रूम होने से अकेले ट्रैवल कर ही महिलाओं की दिक्कत दूर होगी।

मेनका के मुताबिक कई महिलाओं को रात में सफर करना होता है और वह तड़के स्टेशन पहुंचती हैं और आगे सफर करने से बेहतर रेलवे स्टेशन पर इंतजार करने को सुरक्षित मानती हैं। ऐसी महिलाओं के लिए एक सुरक्षित रूम बेहद जरुरी है। एंट्रेस में सीसीटीवी होने से महिलाएं सुरक्षित महसूस करेंगी। रेल मंत्री को लिखे पत्र में लिखा है कि रेलवे स्टेशनों में महिलाओं के लिए अलग से टॉइलट भी बेहद जरूरी है। यह वेटिंग रूम से जुड़ा होना चाहिए।
कई महिलाओं ने शिकायत की है कि कई जगह महिला शौचालय इस्तेमाल लायक नहीं है जिससे महिलाओं को बहुत ही असहज स्थिति से गुजरता पड़ता है क्योंकि उनके पास दूसरे ऑप्शन नहीं हैं जो दुर्भाग्य से पुरुषों के पास हैं। पत्र में आगे लिखा है कि हर रेलवे स्टेशनों में प्लैटफॉर्म पर कोई न कोई अधिकारी रहता है। यह अहम है कि इन अधिकारियों में कम से कम एक महिला हो जिससे मुश्किल वक्त में महिला यात्री इन महिला अधिकारियों से संपर्क कर सकें। मेनका ने पत्र में इस बात का भी जिक्र किया कि 24 घंटे हर रेलवे स्टेशन पर एक महिला अधिकारी का होना बहुत आसान नहीं है लेकिन धीरे धीरे इसे अचीव किया जा सकता है।

 

अगर तीन तलाक की प्रथा नहीं रूकी तो सरकार कदम उठा सकती है : नायडू

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अमरावती : मुस्लिम समुदाय अगर तीन तलाक की प्रथा को ‘‘बदलने’’ में विफल रहता है तो सरकार कदम उठा सकती है और इसको प्रतिबंधित करने के लिए कानून बना सकती है।

नायडू ने कहा, ‘‘मुद्दे को देखना समाज पर निर्भर करता है और अच्छा होगा अगर :मुस्लिम: समाज खुद ही इस प्रथा को बदल दे। अन्यथा ऐसी स्थिति उभरेगी कि सरकार को कानून :तीन तलाक को प्रतिबंधित करने का: लाना होगा।’’ केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री ने कहा, ‘‘यह किसी के निजी मामले में हस्तक्षेप करना नहीं है बल्कि महिलाओं के लिए न्याय का सवाल है। सभी महिलाओं को समान अधिकार होना चाहिए। कानून के समक्ष समानता..यह मुद्दा है।’’ उन्होंने कहा कि हिंदू समाज में भी बाल विवाह, सती और दहेज जैसी बुरी प्रथाओं को समाप्त करने के लिए कानून बनाए गए।

केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘‘हिंदू समाज ने बाल विवाह पर चर्चा की और इसे प्रतिबंधित करने के लिए संसद में कानून पारित किया गया। दूसरा है सती प्रथा, जिसमें प्राचीन समय में पति की मौत के बाद पत्नी मौत को गले लगा लेती थी । इसे हिंदू समाज ने ही कानून बनाकर बंद किया। तीसरा दहेज का मामला है। दहेज उन्मूलन कानून पारित किया गया और हिंदू समाज ने इसे स्वीकार किया।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जब लगा कि इस तरह की प्रथा समाज की भलाई के खिलाफ है तो हिंदू समाज ने उन पर चर्चा की और उनमें सुधार किए। कुछ और सुधार करने की जरूरत है और उस दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।’