Friday, March 27, 2026
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22 वर्षीय प्रतीक सीए की पढ़ाई छोड़ किसानों को आय दुगनी करना सिखा रहे हैं

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प्रतीक बजाज सहयोगी बायोटेक नाम की कंपनी चलाते हैं। उनकी कंपनी वर्मी खाद से सैकड़ों किसानों की जिंदगी बदल चुकी है। प्रतीक ‘ये लो खाद’ ब्रैंड से वर्मीकंपोस्ट बेचते हैं। उनका सालाना कारोबार लगभग 12 लाख रुपये का है। 2015 का वक्त था उस समय प्रतीक सिर्फ 19 साल के थे। बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सीए बनने के लिए पहली सीढ़ी यानी सीपीटी की परीक्षा पास की। उसके बाद वे सीए की पढ़ाई में लग गए। उनके बड़े भाई ने उसी वक्त एक डेयरी फार्म शुरू किया था और डेयरी का काम आगे बढ़ाने के लिए वे कृषि विज्ञान केंद्र से ट्रेनिंग ले रहे थे। संयोग से एक बार प्रतीक ने भी वहीं से वर्मीकंपोस्ट बनाने का गुर सीख लिया। इसके बाद प्रतीक को लगा कि सीए बनने से बेहतर है, कि कुछ ऐसा काम किया जाये कि अच्छी खासी इनकम होने के साथ ही किसानों का भी फायदा हो।

प्रतीक के भाई के डेयरी फार्म से जो गाय और भैंस का गोबर निकलता था वो बेकार चला जाता था, उसका सामान्य तरीके से ही खेतों में इस्तेमाल होता था। उन्हें लगा कि इसको वर्मीकंपोस्ट में तब्दील करके खाद का अच्छा इस्तेमाल करने के साथ ही पैसे भी बनाये जा सकते हैं।

प्रतीक बजाज ने IVRI इज्जतनगर के वैज्ञानिकों की मदद से वर्मीकंपोस्ट के बारे में रिसर्च की और वर्मीकंपोस्ट को और बेहतर बनाने का प्रयास किया। लगभग छह महीने बाद प्रतीक ने अपने घरवालों को बता दिया कि अब सीए की पढ़ाई में उनका मन नहीं लग रहा है और वे सीए बनने के बजाय ये बिजनेस शुरू करना चाहते हैं। उनके घर में पहले तो किसी ने यकीन ही नहीं किया, लेकिन जब उन्होंने अपनी पहली वर्मीकंपोस्ट बेची तो घर वालों को लगा कि प्रतीक ये बिजनेस अच्छे से कर सकता है।

प्रतीक बताते हैं,कि अगर वे दिन में 10 घंटे की पढ़ाई करके सीए बनते तो शायद उन्हें इतनी खुशी नहीं मिलती, लेकिन अब वे अपने खेतों और प्लांट में 24 घंटे लगे रहते हैं और ऐसा करने से उन्हें बेइंतहा खुशी मिलती है। साथ ही वे ये भी कहते हैं, कि जिस काम में आपका मन लगे, जो आपको खुशी दे, वही काम करना चाहिए।

प्रतीक ने अपने पूरे सात बीघे खेत में वर्मी कंपोस्ट तैयार करना शुरू कर दिया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह कचरा प्रबंधन के साथ-साथ उसे खाद में कैसे बदला जाए, इस पर भी काम कर रहे हैं।

वर्मीकंपोस्ट के साथ ही प्रतीक मंदिर में पूजा के बाद बेकार हो जाने वाली पूजन सामग्री और फूल, घर में खराब हो जाने वाली सब्जी और चीनी बनाने के बाद निकले कचरे से खाद बनाने का काम कर रहे हैं। धीरे-धीरे प्रतीक ने वर्मीकंपोस्ट के जरिए अॉर्गेनिक खेती भी शुरू कर दी। अब वे जानवरों के मूत्र में नीम की पत्ती मिलाकर खेतों में छिड़काव करते हैं और रासायनिक खाद का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं करते हैं। वह किसानों को बिलकुल फ्री में वर्मीकंपोस्ट और और्गैनिक खेती करने के बारे में ट्रेनिंग देते हैं। एक छोटे से मटके में वर्मीकंपोस्ट कैसे बनाई जाये इसकी भी वे ट्रेनिंग देते हैं।

प्रतीक दावा करते हैं, कि पहले जहां किसान हर एकड़ में रासायनिक खाद और कीटनाशक पर 4500 रुपये खर्च करते थे वहीं अब उन्हें सिर्फ 1,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं और इससे खेत की जमीन के साथ ही फसल को भी कोई नुकसान नहीं होता है। ऑर्गेनिक तरीके से उगाए गए गेहूं और चावल का दाम सामान्य तरीके से रासायनिक खाद और कीटनाशक का प्रयोग कर उगाए गए गेहूं से अधिक दाम मिलते हैं। अब प्रतीक अपना प्रोडक्ट नोएडा, गाजियाबाद, शाहजहांपुर, बरेली और यूपी के तमाम जिलों में बेचने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी लगन देश के उन तमाम युवाओं को प्रेरित कर रही है, जो बिजनेस करने का सपना देखते हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

गर्मियों को खास बनाएगा आम का स्वाद

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आम रबड़ी

सामग्री- ढाई कप दूध, 1 कप पका और टुकड़ों में कटा हुआ आम (पीस में), 1/4 कप चीनी, 5-6 पिस्‍ता, 4 बादाम, 1/4 चम्‍मच दालचीनी पाउडर, 4 रेशे केसर के।

विधि- बादाम को गरम पानी में भिगोइये और 20 मिनट के बाद उसका छिलका छील कर उसे बारीक काट लें। पिस्‍ता को भी बारीक काट कर किनारे रख दें। केसर को भी एक कटोरी में थोड़ा सा दूध डाल कर भिगो दें। कटे हुए आम को मिक्‍सर में थोड़ा सा दूध डाल कर गाढा फेंट लें। एक पैन में दूध को आधा होने तक उबालें। फिर उसमें चीनी डाल कर घोल लें। आंच को धीमा रखें। दूध जब गाढा पक जाए तब इसे ठंडा होने के लिये आंच से उतार कर रख दें। जब दूध ठंडा हो जाए तब उसमें आम की प्‍यूरी , इलायची पावडर, कटे हुए पिस्‍ता और बादाम तथा केसर वाला दूध मिक्‍स करें। अब आप इसे ठंडा ही सर्व कर सकते हैं।

 

 

आम का सूप

सामग्री – 2 आम, 1 नींबू, 1 कप चीनी, 1/2 कप दही

विधि- सबसे पहले आम को छील कर उसकी गुठली निकाल लें। गूदे में चीनी मिला कर मिक्‍सी में खूब फेंटे। नींबू का रस और दही मिलाएं। क्रीमी होने तक फिर से फेंटें। फ्रिज में ठंडा होने के लिये रख दें। जब यह ठंडा हो जाए तब इसे सर्व करें।

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे

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बशीर बद्र

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे
हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे

हुई शाम यादों के इक गाँव में
परिंदे उदासी के आने लगे

घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते-आते ज़माने लगे

कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं
दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे

वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे

पढाई-लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे

गंगा का प्रदूषण

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नज़ीर बनारसी

डरता हूँ रूक न जाये कविता की बहती धारा

मैली है जब से गंगा, मैला है मन हमारा

छाती पे आज उसकी कतवार तैरते हैं
राजा सगर के बेटो तुम सबको जिसने तारा

कब्ज़ा है आज इस पर भैंसों की गन्दगी का
स्नान करने वालो जिस पर है है हक़ तुम्हारा

श्रद्धाएँ चीख़ती है विश्वास रो रहा है
ख़तरे में पड़ गया है परलोक का सहारा

किस आईने में देखें मुँह अपना चाँद-तारे
गंगा का सारा जल हो जब गन्दगी का मारा

इस पर भी इक नज़र कर, भारत की राजधानी
क़िस्मत समझ के जिसको राजाओं ने सँवारा

बूढ़े हैं हम तो जल्दी लग जायेंगे किनारे
सोचो तुम्हीं जवानो क्या फ़र्ज़ है तुम्हारा

कविता ’नजीर’ की है तेरी ही देन गंगे
तेरी लहर लहर है उसकी विचारधारा

गर्मियों में चेहरे पर खूबसूरती दिखे, तेल नहीं

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तापमान बढ़ने के कारण आपके शरीर से अतिरिक्त तेल निकलने लगता है जो चेहरे पर जमा होने लगता है जिससे आपकी त्वचा तैलीय दिखने लगती है। इन आसान तरीकों से आप गर्मियों में चेहरे पर आने वाले अतिरिक्त तेल को नियंत्रित कर सकते हैं। कभी कभी जब आप अपने चेहरे पर नमी वाला लुक नहीं चाहते तो भी आपके चेहरे पर तेल दिखाई देने लगता है। यदि आप त्वचा पर अतिरिक्त तेल जमने की समस्या से परेशान हैं तो यहाँ हम आपको गर्मियों में चेहरे की त्वचा से अतिरिक्त तेल को सोखने के लिए कुछ आसान उपाय बता रहे हैं –

  1. अल्कोहल रगड़ें सौंदर्य विशेषज्ञों के अनुसार चेहरे पर बहुत कम मात्रा में अल्कोहल का उपयोग करके भी अतिरिक्त तेल को रोका जा सकता है। बहुत थोड़ी मात्रा में अल्कोहल का उपयोग करके आप चेहरे पर तेल के कारण आने वाली अतिरिक्त चमक को दूर कर सकते हैं। थोड़ी मात्रा में अल्कोहल लें और कॉटन बॉल की सहायता से इसे चेहरे पर लगायें। प्राकृतिक तरीके से सूखने दें और बाद में थोडा सा फेस पाउडर लगायें।
  2. क्लीन्जर्स चेहरे पर तेल के कारण आने वाली अतिरिक्त चमक से छुटकारा पाने के लिए आप क्लीन्जर्स का उपयोग कर सकते हैं। आपको उच्च सैलिसिलिक एसिड युक्त क्लीन्ज़र्स का उपयोग करना चाहिए क्योंकि यह त्वचा को सूखा और कोमल रखता है। फैशन के नाम पर ये 3. मेटीफाइंग प्राइमर यदि आप कही यात्रा कर रहे हैं और अतिरिक्त तेल को दूर रखना चाहते हैं तो आप मेटीफाइंग प्राइमर का उपयोग कर सकते हैं। बाज़ार में बहुत प्रकार के मेटीफाइंग प्राइमर उपलब्ध है जो चेहरे पर आने वाले अतिरिक्त तेल को सोखने में सहायता करता है।
  3. फेस मास्क चेहरे पर जमा हुए अतिरिक्त तेल को हटाने के लिए फेस मास्क का उपयोग किया जा सकता है। आपको चारकोल, ओट्स या सैलिसिलिक एसिड युक्त फेस मास्क का उपयोग करना चाहिए क्योंकि इससे त्वचा सूखी और कोमल रहती है। चेहरे की त्वचा के तेल को नियंत्रित करने के लिए मिट्टी का मास्क सबसे अच्छा होता है।
  4. दूध का उपयोग करें तैलीय त्वचा की समस्या से लड़ने के लिए और अपनी त्वचा की देखभाल के लिए कच्चे, ठंडे दूध का उपयोग करें। दूध में उपस्थित मैग्नीशियम त्वचा को साफ़ और कोमल बनाये रखता है।
  5. मेकअप लगाने से पहले ब्लॉटिंग पेपर का उपयोग करें – मेकअप करने से पहले ब्लॉटिंग पेपर का उपयोग करने से चेहरे से अतिरिक्त ऑइल निकल जाता है। मॉस्चराइज़र लगाने के बाद एक टिश्यू पेपर लेकर उसे चेहरे पर रख दें। टिश्यू पेपर चेहरे पर जमा हुआ से अतिरिक्त तेल और नमी सोख लेता है।
  6. उचित फाउंडेशन चुनें – जब आप ऑयली त्वचा के लिए फाउंडेशन चुनें तो ध्यान रहे कि ये आपकी त्वचा के अनुसार होना चाहिए। चेहरे से अतिरिक्त तेल को सोखने के लिए मिनरल पाउडर फाउंडेशन भी अच्छा विकल्प है। इसके अलावा मेटीफाइंग फाउंडेशन भी तैलीय त्वचा के लिए उपयुक्त है।
  7. हेवी क्रीम न लगायें – आपको चेहरे पर हेवी क्रीम्स नहीं लगानी चाहिए क्योंकि इससे रोम छिद्र बंद हो जाते हैं और त्वचा पर अधिक तेल निकलने लगता है। गर्मियों के मौसम में दिन तथा रात के समय हेवी क्रीम न लगायें।

तेलंगाना के 17 वर्षीय सिद्धार्थ ने बनाई रेप रोकने की डिवाइस

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2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने तेलंगाना के सिद्धार्थ मंडल को पूरी तरह से हिला कर रख दिया और उस कांड के कुछ सालों बाद ही सिद्धार्थ ने एक ऐसी डिवाईस बना डाली, जिससे रेप को रोका जा सकता है। सिद्धार्थ ने इंटरनेट पर काफी रिसर्च की और अपने दोस्त की मदद से ये डिवाइस तैयार की है। इस डिवाईस की मदद से चप्पल में एक ऐसा सिस्टम फिट किया जाता है, जिससे खतरे की हालत में पुलिस और घरवालों को मदद के लिए तुरंत सूचना पहुंचाई जा सकती है और सर्किट बोर्ड की मदद से डिवाईस चलते कदमों से खुद ही चार्ज हो जाती है।

जैसे ही सिद्धार्थ की मेहनत रंग लाई वह अपने आप को सुपरहीरो जैसा फील करने लगे। उन्हें लगा कि अगर यह प्रयोग कामयाब हुआ तो उनकी वजह से न जाने कितनी जिंदगियां बच जाएंगी। सिद्धार्थ की इस मेहनत और प्रयास से खुश होकर तेलंगाना के शिक्षा मंत्री कादियम श्रीहरि ने उनकी तारीफ की और एक प्रशस्ति पत्र भी दिया।

साल 2012 की बात है। देश की राजधानी दिल्ली में हुए वीभत्स निर्भया रेप कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। उस घटना के बाद देश के अलग-अलग जगहों से आवाजें उठनी शुरू हुईं। हर जगह विरोध प्रदर्शन हुए और आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांग उठी। उसी वक्त तेलंगाना में एक 12 साल का बच्चा सिद्धार्थ अपनी आंखों से यह सब घटते देख रहा था। वह इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बन रहा था। लगातार हो रही रेप घटनाएं उसे विचलित करने के साथ ही कुछ सोचने को मजबूर कर रही थीं। उस घटना से सिद्धार्थ इतना प्रभावित हुआ, कि रेप को रोकने के तरीके खोजने लगा। आज उसकी मेहनत रंग लाई है और उसने रेप को रोकने में सहायक होने वाली एक डिवाइस तैयार कर दी है।

जब निर्भया कांड हुआ था तो सिद्धार्थ की मां विरोध प्रदर्शन में जाया करती थीं। सिद्धार्थ भी अपनी मां से इजाजत लेकर उन विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बन जाया करता था। धीरे-धीरे हर हफ्ते वह इन प्रदर्शनों में जाने लगा। सिद्धार्थ ने बताया,

‘विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनना मुझे विचलित करने के साथ ही काफी कुछ सोचने को मजबूर कर देता था। मैं सोचता था, कि अगर यही घटना मेरी मां के साथ हो जाती तो क्या होता? अगर मेरी कोई दोस्त उन दरिंदों का शिकार बन जाती तो?’

यह सब सोचने के बाद लगातार कई दिन सिद्धार्थ को नींद भी नहीं आती थी। यहां तक कि उनके गले से खाना नीचे नहीं उतरता था। इसके बाद उन्हें यह अहसास हुआ कि रेप होने के बाद समाज के लोग ही लड़की या महिला को बुरी नजर से देखने लगते हैं। जब कोर्ट ने इस मामले में अपना पहला फैसला सुनाया तो सिद्धार्थ 15 साल के हो चुके थे। उन्होंने फैसला लिया कि वह इसे रोकने के लिए कुछ तो करेंगे और लग गए अपने मिशन में।

सिद्धार्थ ने इंटरनेट पर काफी रिसर्च की और अपने साथी अभिषेक की मदद से एक ऐसी डिवाइस तैयार की जो रेप होने से बचा सकती है। उन्होंने चप्पल में एक ऐसा सिस्टम फिट किया, जिससे अनहोनी की हालत में आने पर पुलिस और घरवालों को मदद के लिए तुरंत सूचना पहुंचाई जा सके। इसे बनाने के लिए सिद्धार्थ ने एक ऐसा सर्किट बोर्ड तैयार किया है जो चलने पर कदमों के साथ खुद ही चार्ज हो जाता है। इसे पहनने वाला जितना चलेगा यह डिवाइस उतनी ही चार्ज होती जाएगी। इसमें एक रीचार्जेबल बैटरी लगी है। हालांकि इसे बनाना इतना आसान भी नहीं था। इसमें काफी मुश्किलें आईं। सिद्धार्थ बताते हैं कि बनाने के दौरान अनगिनत समस्याएं झेलनी पड़ती थीं। कई बार तो दोस्तों ने मदद करना बंद कर दिया। प्रोटोटाइप ही 17 बार फेल हो गया। इतना ही नहीं कई बार करेंट भी झेलना पड़ा। एक बार तो उनके दोस्त अभिषेक की नाक से खून तक निकलने लगा।

लेकिन सिद्धार्थ ने हार नहीं मानी। जितने बार उन्हें निराशा मिलती उतने बार वह अपने पसंदीदा वैज्ञानिक थॉमस एडिसन के बारे में सोचते जिन्होंने बिजली के बल्ब का अविष्कार करने में 1000 बार से ज्यादा असफलता का सामना किया था। वह लगे रहे और दो साल में एक ऐसा प्रोटोटाइप तैयार किया जो सही से काम करता है। जैसे ही सिद्धार्थ की मेहनत रंग लाई वह अपने आप को सुपरहीरो जैसा फील करने लगे। उन्हें लगा कि अगर यह प्रयोग कामयाब हुआ तो उनकी वजह से न जाने कितनी जिंदगियां बच जाएंगी। सिद्धार्थ की इस मेहनत और प्रयास से खुश होकर तेलंगाना के शिक्षा मंत्री कादियम श्रीहरि ने उनकी तारीफ की और एक प्रशस्ति पत्र भी दिया।

इस अविष्कार के साथ ही सिद्धार्थ ऐक्टिविस्ट भी बन गए। उन्होंने एक एनजीओ बनाया जिसका नाम है- कॉग्निजेंस वेलफेयर इनीशिएटिव। यह एनजीओ रेप को रोकने के लिए समाज में जागरूकता फैलाने का काम करता है। वह सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को माइक्रो कंट्रोलर बनाने के बारे में बताते हैं। उनकी टीम में लगभग 30 लोग हैं। इतना ही नहीं वह सरकारी स्कूलों में गरीब बच्चों को कॉपी, कलम और किताबें बांटते हैं। इसके साथ ही उन्हें अमेरिकी ऑर्गनाइजेशन एम्पॉवर&एक्सेल के साथ काम करने का मौका मिला और अब वह इंडिया की तरफ से टीम लीडर के तौर पर काम करते हैं।

एक रेप कांड के बाद पूरे देश में भड़के गुस्से ने एक बच्चे को इतने बडे़ काम के लिए प्रेरित कर दिया। हमारे देश के किसी न किसी हिस्से में हर रोज रेप होते हैं। अगर हम उनसे थोड़ा सा भी सबक लें और लोगों को जागरूक करने का काम करें तो शायद रेप की घटनाओं में कुछ तो कमी आएगी। क्योंकि सरकारें तो सिर्फ कानून बना सकती हैं, आरोपी को सजा दिला सकती हैं लेकिन मानसिकता नहीं बदल सकतीं। इसके लिए सिद्धार्थ एक नजीर है कि हमी को आगे आना पड़ेगा तब जाकर समाज में कुछ बदलाव आ पाएगा।

 

समझें पेरिस जलवायु समझौता, अमेरिका के हटने से होगा यह अस

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 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग कर लिया। इस तरह ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबले में अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से अमेरिका अलग हो गया। इस समझौते में सीरिया और निकारागुआ के सभी देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। जानते हैं पेरिस जलवायु समझौते के बारे में अहम बातें और अमेरिका के इस समझौते से हटने का क्या होगा असर।

लगभग 2 डिग्री कम रखना है तापमान

पेरिस समझौते का मुख्य लक्ष्य सदी के अंत तक वैश्विक औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से रोकना है। तापमान 2 डिग्री से अधिक बढ़ने पर समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, मौसम में परिवर्तन, भोजन और पानी के संकट के साथ ही दुनिया के सामने कई तरह के जोखिम पैदा हो जाएंगे। आलोचकों का तर्क है कि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस कम करना काफी नहीं है क्योंकि इससे कोई बड़ा अंतर नहीं होगा। मगर, यह एक शुरूआत है। पेरिस समझौते से पहले दुनिया के सभी देश बेतहाशा कार्बन उत्सर्जन करने के रास्ते पर चल रहे थे।

समझौता बाध्यकारी नहीं है

समझौते में कहा गया है कि इस 2 डिग्री के लक्ष्य को पूरा करने के लिए देशों को जितनी जल्दी हो सके चरम उत्सर्जन में कटौती करने का प्रयास करना चाहिए। मगर, समझौते में यह बिल्कुल भी विस्तार से नहीं बताया गया है कि इन देशों को ऐसा कैसे करना चाहिए। इसके बजाय यह कुछ निरीक्षण और जवाबदेही के साथ ग्रीनहाउस गैस में कमी लाने की रूपरेखा देता है।

अमेरिका के लिए लक्ष्य था कि वह 2025 तक 26 से 28 प्रतिशत की कटौती करे। मगर, ट्रम्प की मौजूदा नीतियों के अनुसार, इस लक्ष्य को पूरा करना असंभव है। 195 देशों ने इसके लिए सहमति व्यक्त की है। मगर, इसे तोड़ने पर किसी भी तरह की सजा का प्रावधान नहीं किया गया है। इस समझौते के पीछे यह विचार है कि देश उत्तरदायित्व की संस्कृति पैदा करें और अपनी जलवायु को बेहतर रखने के लिए काम करें।

अमीर देश करें, गरीब देशों की मदद

वैश्विक उत्सर्जन के मामले में मौलिक असमानता है। अमीर देशों ने भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन जला दिया है और उनसे वे अमीर हो गए हैं। अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित करने की मांग करने वाले गरीब देशों को अब ईंधन का इस्तेमाल करने से वंचित कर दिया गया है। जलवायु परिवर्तन के सबसे खराब प्रभावों को सहन करने वाले पहले देशों में वे गरीब देश ही शामिल होंगे।

पेरिस समझौते के तहत अमेरिका जैसे अमीर देशों को साल 2020 तक 10 करोड़ डॉलर सालाना की मदद गरीब देशों को करनी चाहिए। इस राशि को समय-समय पर बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, समझौते के अन्य प्रावधानों की तरह यह भी बाध्यकारी नहीं है।

बिखर सकता है अंतरराष्ट्रीय गठबंधन

इस समझौते के मुद्दे इसलिए हैं क्योंकि इन मुद्दे पर गति देने की जरूरत है। पेरिस समझौता काफी हद तक प्रतीकात्मक है। अब जबकि ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया है, तो उम्मीद है कि यह समझौता कमजोर हो जाएगा। इससे भी महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जलवायु परिवर्तन के मामले में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बिखर सकता है।

 

माँ की तकलीफ को देखकर दो बेटियों ने खोद डाला कुआँ

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रायपुर:  छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले की दो बेटियों ने भी अपनी मां की खातिर धरती का सीना चीर कुआं खोद डाला, जिसकी आज हर ओर चर्चा हो रही है। इन बेटियों ने अपनी मां को दो किलोमीटर दूर से पानी भरकर लाता देख, घर के नजदीक ही कुआं खोदने का बीड़ा उठाया और कुदरत ने उन्हें 20 फीट में पानी का उपहार दे दिया।
बेटियों की मां के प्रति प्रेम और वेदना के साथ-साथ ही उनके हौसलों के आगे हर कोई नतमस्तक हो रहा है। छत्तीसगढ़ की संसदीय सचिव चंपादेवी पावले ने भी बेटियों की इस हौसले की तारीफ की और हरसंभव मदद की बात कही है।

कछौड़ के कसहियापारा में अमरसिंह गोंड़ और उनकी पत्नी जुकमुल अपनी दो बेटियों शांति और विज्ञांति के साथ रहते हैं.

बताया जाता है कि कसहियापारा में 15 परिवार रहता हैं जहां उनके लिए तीन हैंडपंपों की व्यवस्था की गई है, लेकिन दो खराब हैं और एक में दूषित पानी आता है जो किसी काम का नहीं है। ऐसी स्थिति में इस पारे के लोग पानी के लिए दो किलोमीटर दूर मुड़धोवा नाले पर निर्भर हैं।

परिवार की जरूरतों को पूरा करने शांति और विज्ञांति की मां भी हर रोज दो किलोमीटर का सफर पानी के लिए किया करती थी। अपनी मां की इस तकलीफ को देख बेटियों ने घर के नजदीक कुआं खोदने की ठानी और सारी समस्या का समाधान अपने हौसलों से कर दिया।

बताया जाता है कि जब शांति और विज्ञांति ने घर के समीप कुआं खोदने की बात कही तो मां-पिता सहित सभी ने मजाक समझ कर टाल दिया, लेकिन बेटियों को कुआं खोदते देख वे सभी सहयोग के लिए जुट गए और उनकी मेहनत रंग लाई।

पेप्सी का विज्ञापन नहीं करेंगे विराट, बोले- जो खुद नहीं पीता तो दूसरों से कैसे कहूं

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भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने कोला इंडस्ट्री को जोरदार झटका दिया है। उन्होंने कोला का ऐड करने से खुद का हाथ खींच लिया है। दरअसल, शक्कर और कार्बोनेटेड पेय पदार्थों से स्वास्थ्य के खतरों पर बढ़ती चर्चा के बीच विराट ने यह फैसला किया है। विराट पिछले छह साल से पेप्सी से जुड़े रहे। कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद पेप्सी उनके साथ कॉन्ट्रैक्ट को आगे बढ़ाना चाहती थी।

उन्होंने कहा, ‘इससे पहले मैंने जिन चीजों को अपनाया, मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा, लेकिन अब मुझे लगता है कि अब उनसे खुद को जुड़ा नहीं पाता हूं। अगर मैं खुद ही ये चीजें नहीं खा-पी सकता, तो सिर्फ अपनी कमाई के लिए लोगों से इन्हें खाने-पीने के लिए कैसे कह सकता..?’इंग्लैंड में आईसीसीसी चैंपियंस ट्रॉफी खेल रहे विराट ने एक न्यूज चैनल से कहा कि ‘जब मैंने अपना फिटनेस टर्नअराउंड शुरू किया, तो शुरुआती दिनों में यह मेरे लिए लाइफस्टाइल से बड़ी बात थी लेकिन जब कुछ इससे हटकर होता है, तो मैं उसका भागीदार बनना नहीं चाहूंगा।’

विराट फिलहाल 18 ब्रैंड से जुड़े हैं जिनमें एमआरएफ टायर्स, टिसॉट वॉचेज, प्यूमा स्पोर्ट्स गीयर, कोलगेट ऑरल केयर, ऑडी कार्स और सैमसनाइट लगेज जैसे ब्रैंड्स शामिल हैं।

 

तम्बाकू सेवन – विकास के सभी प्रयासों को क्षीण करने में सबसे बड़ी बाधा 

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  • संतोष जैन पस्सी तथा आकांक्षा जैन

तम्बाकू सेवन – दुनिया भर में विकास के लाभों को क्षीण करने में प्रमुख बाधा है। यह समय से पहले की विकृति /मृत्यु दर का सबसे बड़ा कारण है। तम्बाकू के उत्पादों में लगभग 5000 से 7000 विषाक्त पदार्थ होते हैं, इनमें से सबसे खतरनाक निकोटीन, कार्बन मोनोऑक्साइड और टार है। आमतौर पर तम्बाकू का इस्तेमाल सिगरेट, बीडी, सिगार, हुक्का, शीशा, तम्बाकू चबाना, लौंग सिगरेट, तम्बाकू सूंघना और ई-सिगरेट के रूप में होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) की रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रति वर्ष प्रत्‍यक्ष तम्बाकू के इस्तेमाल/तम्बाकू के धूएं से लगभग छह मिलियन लोगों की मृत्यु होती है और यह अधिकतर एनसीडी के लिए प्रमुख खतरे का कारक है। इसके अलावा संक्रमण की बीमारियों में से श्वसन संक्रमण और तपेदिक की वजह से लगभग 4 – 5 प्रतिशत मृत्यु दर का कारण तम्बाकू सेवन है। माना जाता है कि 2030 तक तम्बाकू से संबंधित बीमारियों के कारण मृत्यु दर लगभग 8 मिलियन होगी।

तम्बाकू से सभी व्यक्तियों को खतरा है, फिर चाहे वे किसी भी उम्र, लिंग, जाति और सांस्कृतिक/शैक्षिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति क्यों न हो। प्रकार/रूप पर ध्यान दिए बिना तम्बाकू व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है। दुनिया भर में अभी भी मृत्यु दर सबसे महत्वपूर्ण कारण धूम्रपान है, जिसे रोका जा सकता है। सिगरेट के धूएं में मौजूद विषाक्त पदार्थ से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ जाती है और डीएनए को नुकसान पहुंचता है, जिससे कैंसर/ट्यूमर की बीमारी होती हैं। सिगरेट के धूएं से प्रभावित होने वाले अन्य लोगों के हृदयवाहिनी प्रणाली पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे उनमें कोरोनरी हृदय रोग/ स्ट्रोक हो जाते हैं। सिगरेट के धूएं के कारण शिशुओं/बच्चों को बार-बार/ गंभीर अस्थमा के दौरे पड़ते हैं, श्वसन/कान संक्रमण होता है और शिशु की अचानक मृत्यु हो सकती है।

भारत में लगभग 274.9 मिलियन लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं। इनमें से 163.7 मिलियन लोग धुआं रहित तम्बाकू (एसएलटी), 68.9 मिलियन धूम्रपान करते हैं और 42.3 मिलियन दोनों का इस्तेमाल करते हैं। एसएलटी का इस्तेमाल विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र (वैश्विक वयस्क तम्बाकू सर्वेक्षण, 2009-10) में अधिक किया जाता है। एनएफएचएस-3 (2005-06) की तुलना में एनएफएचएस-4 (2015-16) के आंकड़ों से वयस्कों में (पुरूषः 57 प्रतिशत से 44.5 प्रतिशत, महिलाः 10.8 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत) तम्बाकू के इस्तेमाल में कमी के संकेत मिलते हैं।

तम्‍बाकू के इस्‍तेमाल से जुड़े स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी खतरों को उजागर करने और तम्‍बाकू के उपभोग  को रोकने के लिये प्रभावी नीतियों की हिमायत करने के वास्ते प्रति वर्ष 31 मई को ‘विश्‍व तम्बाकू निषेध दिवस’ मनाया जाता है। इस वर्ष का विषय है- “तम्बाकू-विकास के लिए खतरा”, जो तम्बाकू के इस्तेमाल, तम्बाकू नियंत्रण और सतत् विकास के बीच के संबंध को रेखांकित करता है। सीवीडी, कैंसर और सीओपीडी सहित एनसीडी के कारण समय से पहले होने वाली मृत्यु में एक तिहाई कमी लाने के 3.4 एसडीजी के लक्ष्य को 2030 तक हासिल करने के लिए सतत् विकास एजेंडा में तम्बाकू पर नियंत्रण को सख्ती से शामिल किया गया है। तम्बाकू की खेती के लिए प्रति वर्ष 2-4 प्रतिशत वैश्विक वनों की कटाई की जाती है और इसके उत्पाद निर्माण से 2एमटी से अधिक का ठोस कचरा पैदा होता है। तम्बाकू की खेती के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशक/उर्वरक आमतौर पर जहरीले होते हैं और जलापूर्ति को प्रदूषित करते हैं।

तम्बाकू पर व्यापक नियंत्रण से तम्बाकू की खेती, उत्‍पादन, व्यापार और उपभोग से पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्‍प्रभाव से निपटने के साथ ही गरीबी और भूख के दुष्चक्र को रोका जा सकता है। इसके अतिरिक्‍त इससे सतत कृषि/आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया और जलवायु परिवर्तन के ज्‍वलंत मुद्दे से निपटा जा सकता है। तम्बाकू उत्पादों पर कर बढ़ाना व्‍यापक स्वास्थ्य कवरेज और अन्य विकास कार्यक्रमों के वित्त पोषण के लिये सहायक हो सकता है।

सतत तम्बाकू-मुक्त विश्‍व के लिए सरकारी प्रयासों के अलावा, व्यक्ति/समुदाय भी काफी योगदान दे सकते हैं। तम्बाकू एनसीडी के लिए प्रमुख निवारक खतरे का कारक होने का कारण, लगातार बढ़ती बीमारी के बोझ को कम करने और देशों का विकास को सुनिश्चित करने में सामूहिक तम्बाकू नियंत्रण प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। तंबाकू की महामारी से निपटने के लिए तंबाकू नियंत्रण पर डब्ल्यूएचओ फ्रेमवर्क कन्वेंशन में विश्व बैंक ने तम्बाकू उत्पादों को अवहनीय बनाने के लिए कर नीति में सुधार का प्रस्ताव किया, जिससे तम्‍बाकू का इस्‍तेमाल कम और लोगों के स्वास्थ्य में सुधार होगा।

एमएचएफडब्ल्यू (भारत सरकार) द्वारा शुरू किया गया राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम (2007-08) का उद्देश्य तम्बाकू नियंत्रण कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के साथ ही तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों के संबंध में जागरूकता फैलाना है। इस कार्यक्रम के तहत समग्र नीति तैयार करने, योजना बनाने, निगरानी करने और विभिन्न गतिविधियों का मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण इकाई की है।

तम्बाकू पर कर बढ़ाकर इसकी कीमत में बढ़ोत्तरी एक प्रभावी रणनीति है, देश में सिगरेट और बड़े पैमाने पर बीडी उत्पादन (लघु/ कुटीर उद्योगों को छोड़कर) उद्योग पर उत्पाद शुल्क लागू है। तम्बाकू के इस्तेमाल को रोकने के अऩ्य प्रयासों में स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव के बारे में जागरूकता बढ़ाना, तम्बाकू रोधी अभियान, तम्बाकू का सेवन करने वालों के लिए व्यसन से बचाव/पुनर्वास के कार्यक्रम बढ़ाना, अन्य लोगों का धूम्रपान के संपर्क को कम करना, तम्बाकू के विज्ञापनों, प्रसार और प्रायोजन पर प्रतिबंध लगाना शामिल है। इसके अतिरिक्त एम तम्बाकू समाप्ति कार्यक्रम भी चल रहे हैं।

जनता के स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए 2003 में भारत सरकार ने सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद (विज्ञापन पर प्रतिबंध और व्यापार तथा वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति तथा वितरण का नियमन) अधिनियम लागू किया था, जिसमें (सीओपीटीए) 2014 में संशोधन किया गया। इसमें सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान करने पर प्रतिबंध, विज्ञापन और नाबालिगों/शैक्षिक संस्थानों के नजदीक तम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर रोक, तम्बाकू उत्पादों के पैकेट पर सचित्र स्वास्थ्य चेतावनी तथा उत्पाद में टार/निकोटीन के भाग को नियंत्रित करने का प्रावधान है। सीओटीपीए को लागू करने में राज्यों के अधिकार बढ़ाने तथा तम्बाकू के सेवन से स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव और अन्य लोगों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 2007 में भारत सरकार ने पायलट राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम (एनटीसीपी) का शुभारंभ किया था। 2012-17 के दौरान सभी 36 राज्यों/ 672 जिलों को चरणबद्ध रूप से कवर करने के लिए 700 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन के साथ एनटीपीसी का विस्तार किया जा रहा है।

डॉ. मार्गरेट चैन (महानिदेशक, डब्ल्यूएचओ) ने तम्बाकू नियंत्रण उपायों एमपीओडब्ल्यूईआर के तुरंत कार्यान्वयन पर बल दिया है। जिसमें तम्बाकू के इस्तेमाल की निगरानी/रोकथाम नीतियां, लोगों की धूम्रपान के धूएं से सुरक्षा, तम्बाकू का सेवन बंद करने में मदद करना, तम्बाकू के खतरों के बारे में चेतावनी देना, तम्बाकू के विज्ञापन/प्रसार/प्रायोजन पर पाबंदी लगाना और तम्बाकू उत्पादों पर कर बढ़ाना शामिल है।

मई 2016 में एमएचएफडब्ल्यू, डब्ल्यूएचओ-भारत कार्यालय और हृदय ने संयुक्त रूप से भारत में तम्बाकू नियंत्रण उपायों के लिए तकनीकी चर्चा आयोजित की थी। बच्चों और किशोरों के बीच तम्बाकू के इस्तेमाल को रोकने के लिए युवा उत्प्रेरक के रूप में अपने साथियों, परिवारों और समाज में तम्बाकू का इस्तेमाल न करने की वकालत कर सकते हैं।  इसलिए तम्बाकू के सेवन के दुष्प्रभावों को उजागर करने के लिए स्कूल आधारित कार्यक्रमों के जरिए उनमें जागरूकता फैलाना अति आवश्यक है। इसके अलावा डब्ल्यूएचओ ने सभी राष्ट्रों को तम्बाकू उत्पादों की सादी पैकेजिंग करने का निर्देश दिया है।

राष्ट्रीय कैंसर रोकथाम और अनुसंधान संस्थान में  “वैश्विक धूआं रहित तम्बाकू ज्ञान केंद्र” की स्थापना की गई है। तम्बाकू या निकोटीन वाले गुटखा/पान मसाला के उत्पादन और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। “स्वस्थ्य रहें, गतिशील रहें, पहल” के अंतर्गत भारत सरकार ने टोलफ्री टोबैको सेसेशन क्वीटलाइन और एम सेसेशन सर्विस का शुभारंभ किया है। तम्बाकू का उपभोग दर्शाने वाली फिल्मों में तम्बाकू रोधी स्वास्थ्य स्थलों, चेतावनी और संदेश प्रदर्शित करना अनिवार्य है।

मार्च, 2017 में हमारी सरकार ने सभी तम्बाकू उत्पादों के लिए निर्दिष्ट स्वास्थ्य चेतावनी के 2 चित्र को शामिल करने के लिए सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद (पैकेजिंग/लैबलिंग) नियम 2008 में, संशोधन किया जो एक अप्रैल, 2017 से प्रभावी है।

तम्बाकू उत्पादों के विज्ञापन पर प्रतिबंध के बावजूद एसएलटी निर्माता अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए भ्रामक ब्रांड साझा करने की रणनीतियों और मशहूर हस्तियों द्वारा विज्ञापन करवाने जैसे अन्य उपायों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि सरकार पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और अन्य विनियमों के जरिए एसएलटी उत्पादों को सख्ती से नियमित करती है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम में पैक किए गए एसएलटी उत्पादों का उत्पादन, बिक्री, परिवहन और भंडारण पर रोक का प्रावधान है। इसके अलावा एसएलटी के बारे में जन जागरूकता संदेश और प्रभावी /व्यवस्थित निगरानी प्रणाली व्यापक तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम के आवश्यक अंग है।

हमें सामूहिक रूप से रोके जा सकने वाले विकृति/मृत्यु दर के इस प्रमुख कारण का मुकाबला करना होगा। तम्बाकू के उपभोग/तम्बाकू के धूएं के संपर्क के विनाशकारी परिणामों से हमारी वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी के स्वास्थ्य/ सामाजिक/पर्यावरणीय/आर्थिक सुरक्षा की तुरंत आवश्यकता है।

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*डॉ. संतोष जैन पस्सी – जन स्वास्थ्य पोषण सलाहकार; पूर्व निदेशक, इंस्टिट्यूट ऑफ होम इकॉनोमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय।

**सुश्री आकांक्षा जैन – पीएचडी की छात्रा, एमिटी विश्वविद्यालय, नोएडा, उत्तर प्रदेश; अनुसंधान अधिकारी – जन स्वास्थ्य पोषण विभाग, एलएसटैक, वेंचर्स लिमिटेड, गुड़गांव, हरियाणा, भारत।

(साभार – पत्र सूचना कार्यालय)