Friday, March 27, 2026
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पिता बेच रहे सब्जी, बेटा यूथ एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में लगाएगा पंच

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संगमनगरी की एक और खेल प्रतिभा दुनिया भर में जलवा बिखेरने को बेताब है। झूंसी के सुदीप कुमार का चयन यूथ एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए हुआ है। यह चैंपियनशिप थाईलैंड में एक जुलाई से शुरू होगी। वह भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करेंगे। सुदीप के पिता बल्लू यादव झूंसी में सब्जी की दुकान लगाते हैं।

सुदीप ने पांच साल पहले झूंसी से बॉकि्ंसग का प्रशिक्षण लेना शुरू किया तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। दो साल तक बॉक्सिंग संघ के सचिव भारत भूषण और अंकित प्रताप सिंह से दो साल तक प्रशिक्षण लिया। इसके बाद झांसी हॉस्टल में चयनित हो गए। तीन साल तक वहां प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उत्तराखंड स्थित काशीपुर छात्रावास गए।

वहां से देश की बॉक्सिंग टीम में शामिल हो गए। फिलहाल, वह हरियाणा में नेशनल टीम में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। सुदीप ने अपने चयन पर खुशी जताई है। कहा कि चयन से उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है। वह इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाएंगे। जिला बॉक्सिंग संघ के सचिव भारत भूषण ने बताया कि थाईलैंड में होने वाली यूथ एशियन एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए देश के कुल 10 बॉक्सरों का चयन हुआ है। यूपी से सुदीप के अलावा मुजफ्फरनगर के हर्षप्रीत भी शामिल हैं।

 

जब विराट ने पिता के निधन के बीच खेला मैच

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भारत-पाकिस्तान के इस मैच में सबकी निगाह भारतीय कप्तान विराट कोहली पर है और इसे अजब इत्तेफाक ही कहेंगे कि आज ही फादर्स डे है। आज के दिन हम आपको बता रहे हैं विराट कोहली और उनके पिता के जीवन से जुड़ी एक ऐसी घटना जो आपको झकझोर देगी और ये साबित कर देगी कि क्यों मात्र 28 साल के विराट कोहली आज देश के सबसे प्रतिभावान खिलाड़ियों की सूची में शामिल हैं।

ये बात है 18 दिसंबर 2006 की। दिल्ली के फिरोजशाह कोटला क्रिकेट मैदान पर दिल्ली और कर्नाटक के बीच रणजी मैच खेला जा रहा था। इसी मैच में दिल्ली की ओर से खेल रहे 18 साल के एक बच्चे ने कुछ ऐसा किया जिसने उसकी अपनी ही टीम नहीं बल्कि, विरोधियों को भी चौंका दिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस घटना को फिरोजशाह कोटला क्रिकेट मैदान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

कर्नाटक ने पहले खेलते हुए अपनी पहली पारी में 446 रन का लक्ष्य रखा था। ‌उस दिन दिल्ली में जबरदस्त सर्दी पड़ रही थी। लक्ष्य का पीछा करते हुए दिल्ली की टीम ने अपने शुरुआती पांच विकेट गंवा दिए थे।

अब मैच में बने रहने और फॉलोऑन से बचने की जिम्मेदारी इसी 18 साल के युवा विराट कोहली पर थी। विराट के साथ टीम के विकेट कीपर पुनीत बिष्ट बैटिंग कर रहे थे। दूसरे दिन का खेल खत्म होने पर विराट ने अपना विकेट बचाए रखा था और वो 40 रन पर नॉटआउट थे।

लेकिन दिल्ली को फॉलोऑन बचाने के लिए अभी भी लंबी दूरी तय करनी थी। दिल्ली टीम का स्कोर 103 रन था जिसमें अकेले विराट का योगदान 40 रन का था। अब सबकी निगाह तीसरे दिन के मैच पर टीकी थी।

लेकिन उस रात अचानक विराट के 54 वर्षीय पिता प्रेम कोहली को दिल का दौरा पड़ा और उनका देहांत हो गया। ये खबर जंगल में आग की तरह फैली और टीम के कोच को इसकी सूचना दी गई। कोच ने विराट को इस दुखद समाचार से अवगत कराया।

अब विराट के पास दो विकल्प थे। या तो वो अगले दिन सुबह अपने पिता का अंतिम संस्कार करने घर जाएं या दिल्ली को हार से बचाने के लिए मैदान में उतरें।

अगले दिन सुबह कोहली के बाद बैटिंग करने वाले चेतन्य नंदा को तैयार होने को कहा गया। लेकिन इससे पहले कि चेतन्य मैदान में उतरते सब ये देखकर चौंक गए कि विराट कोहली ड्रेसिंग रूम में है और अपने पैर में पैड बांधकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

मैदान में जब विरोधी दल ने विराट को देखा तो उन्हें भी इस दृश्य को देखकर यकीन नहीं हुआ‌ कि वो लड़का जिसके पिता का पिछली रात देहांत हो गया है वो आज मैदान में खेलने के लिए हाजिर है।

इस मैच में विराट ने 281 मिनट तक बल्लेबाजी की और 238 गेंदों का सामना करते हुए 90 रन बनाए। जब विराट आउट हुए तो उनकी टीम खतरे से बाहर थी। अब दिल्ली की टीम को फॉलोऑन बचाने के लिए केवल 36 रनों की जरूरत थी।

आउट होने के बाद दोपहर करीब 12 बचे विराट कोहली ड्रेसिंग रूम में पहुंचे और अपने आउट होने का रिप्ले टीवी पर देखा। इसके बाद चुपचाप अपने पैड, ग्लब्स व हेलमेट उतारे और अपने पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए निकल पड़े।

इस एक घटना ने एक रात में ही 18 साल के इस युवा को एक परिपक्व और गंभीर खिलाड़ी में तब्दील कर दिया। इसके बाद विराट कोहली ने ‌कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा और हर रोज नई ऊंचाइयों को छूते गए।

 

 

सड़कों पर रिक्शा चलाने वाले हरिकिशन बने कामयाब उद्यमी

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हरिकिशन पिप्पल ने जिस कंपनी में हेल्पर का काम किया, आगे चलकर उसी कंपनी के साथ उन्होंने कारोबार करना शुरू किया। जीवन में हालात कुछ इस तरह से खराब हुए थे, कि उन्हें रिक्शा चलाने के लिए भी मजबूर होना पड़ा था। कुछ साथियों ने उन्हें धोखा भी दिया, कारोबार में उन्हें घाटा भी झेलना पड़ा, संकट कुछ इतना बढ़ गया था कि उनके मन में ख़ुदकुशी करने के भी ख्याल आने लगे थे, लेकिन किसी तरह हरिकिशन के खुद को संभाला और आगे बढ़े।

बचपन से ही खाए हैं गरीबी के थपेड़े

हरिकिशन पिप्पल के पिता उत्तरप्रदेश के आगरा में जूते बनाने की एक छोटी-सी फैक्टरी चलाते थे। आमदनी ज्यादा थी नहीं। मुश्किल से घर-परिवार का गुज़र-बसर होती थी। पढ़ाई-लिखाई के खर्च के लिए हरिकिशन बचपन में ही मेहनत-मजदूरी करने लगे थे। गर्मी के दिनों में हरिकिशन ने आगरा एयरपोर्ट पर खस की चादरों पर पानी डालने का काम भी किया और इस काम के लिए उन्हें हर महीने 60 रुपये मिलते थे। जब वे दसवीं में थे तब उनके पिताजी बीमार पड़ गये जिससे फैक्टरी का काम बंद हो गया। तबीयत कुछ इस तरह से बिगड़ी कि पिता काम करने की स्थिति में नहीं रहे, इसीलिए घर-परिवार चलाने की जिम्मेदारी हरिकिशन के कंधों पर आ गयी। घरवालों को बताए बिना वे शाम को साइकिल-रिक्शा चलाने लगे जो उनके मामा के बेटे की थी। कोई उन्हें पहचान न ले इस मकसद से वे अपने चेहरे पर कपड़ा लपेटकर साइकिल-रिक्शा चलाया करते थे।

पिता की फैक्ट्री दोबारा शुरु करने के फैसले ने डाली मजबूत नींव

गरीबी के थपेड़े हरिकिशन को तोड़ नहीं पाये, बल्कि इससे उनका हौसला और बढ़ गया। उन्होंने निश्चय किया कि एक दिन वे अपने पिता की फैक्टरी दोबारा शुरू करेंगे। हरिकिशन ने आगरा के जैनसन पिस्टन में मजदूरी का काम भी किया, यहाँ उनकी तनख्वाह प्रतिमाह 80 रुपये थी। इसी बीच हरिकिशन की शादी भी हो गयी। साल 1975 में हरिकिशन पिप्पल ने अपनी पत्नी गीता की सलाह पर पंजाब नेशनल बैंक में लोन का आवेदन दिया जिससे पुश्तैनी व्यवसाय फिर से शुरू किया जा सके। बैंक ने 15 हज़ार का लोन पास कर दिया। कुछ घरेलू समस्याओं के चलते आया हुआ पैसा जाता हुए दिखा, तो पत्नी ने हरिकिशन से लोन की रकम बैंक को वापस करने को कहा, लेकिन वे इरादों के पक्के थे। बड़ी मुश्किल से जो रास्ता दिखा था उसे वे छोड़ नहीं सकते थे। उन्होंने वह पुश्तैनी घर ही छोड़ दिया और आगरा के गांधी नगर में एक कमरा किराये से लेकर अपने कारखाने की नींव रखी।

पहले कॉन्ट्रैक्ट ने ही दिखा दिया अपना दम-ख़म

किसी तरह भागदौड़ कर उन्हें सरकारी कंपनी स्टेट ट्रेडिंग कार्पोरेशन से 10 हज़ार जोड़ी जूते बनाने का ऑर्डर मिल गया। ये जूते विदेश में निर्यात किए जाने थे। दिन-रात मेहनत कर उन्होंने यह ऑर्डर समय पर पूरा कर लिया। तीन महीनों में ही बैंक ने उनकी क्रेडिट लिमिट बढ़ाकर तीन लाख रुपये तक कर दी। जल्द ही उन्हें अच्छा मुनाफा होने लगा और हेरिक्सन नाम से उनके जूतों का ब्रांड मशहूर हो गया। उनके जूतों के दाम भले ही दूसरी ब्रांड के जूतों से कुछ अधिक थे लेकिन क्वालिटी भी सबसे बेहतर थी।

बाटा से जुड़ने के बाद कामयाबी की राह पर रफ़्तार हुई तेज़

हरिकिशन ने बाटा के लिए भी नॉर्थ स्टार जूते बनाने का काम किया। इसके लिए कंपनी डिज़ाइन और कच्चा माल देती थी और हरिकिशन की कंपनी पीपल्स एक्स्पोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ऑर्डर पूरा करके उन्हें सौंपती थी। नब्बे के दशक में बाटा ने अमेरिका के मशहूर ब्रांड हश पपीज़ का जूता भारतीय बाज़ार में लाने का फैसला किया। इसके लिए हश पपीज़ की टीम अमेरिका से आई थी और उम्दा जूते बनाने वाले की खोज में आगरा पहुंची। हरिकिशन पहले से ही बाटा के साथ काम कर चुके थे इसीलिए उन्हें भी सैंपल लेकर बुलाया गया। पहली बार में उन्हें हरिकिशन का बनाया जूता पसंद नहीं आया, लेकिन उन्होंने अगले तीन घंटे में टीम के प्रमुख जॉन बेस्ट के पैर के साइज़ का जूता तैयार करके उन्हें दिखाया। काम बेहतर था और उन्हें कॉन्ट्रैक्ट मिल गया। हरिकिशन ने कामयाबी की राह पकड़ ली थी लेकिन मुश्किलों का दौर खत्म नहीं हुआ, नयी-नयी चुनौतियां सामने आती ही गयीं। अस्सी दशक के अंतिम सालों में पूर्वी यूरोप में बड़े राजनीतिक परिवर्तन हुए। कम्युनिस्ट देशों में सोवियत रूस टूट गया और पूर्वी तथा पश्चिमी जर्मनी एक हो गए। इसका काफी असर जूतों के कारोबार पर पड़ा क्योंकि इसका अधिकतर व्यापार निर्यात से ही होता था। हरिकिशन को भी कारोबार में घाटा होने लगा। हरिकिशन जल्द ही समझ गए कि जूतों के कारोबार के सहारे वे तरक्की की राह पर नहीं बढ़ सकते हैं और उन्हें ये एहसास हो गया कि दूसरे कारोबार से ही उनकी ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ेगी।

कठिनाइयों के नए दौर में हरिकिशन ने रेस्टोरेंट खोलने का निर्णय लिया, नाम रखा अग्रवाल रेस्टोरेंट। एक दलित का अग्रवाल समाज के नाम से रेस्तरां चलाना अजीब था लेकिन इसका जवाब भी हरिकिशन अपने ही अंदाज़ में देते हैं। उनका कहना होता है कि यदि दूसरे व्यापारी जूते बनाने जैसे उनके पुश्तैनी कारोबार में हाथ डाल सकते हैं तो वे अग्रवाल उपनाम का इस्तेमाल अपने बिज़नेस में क्यों नहीं कर सकते। रेस्टोरेंट अच्छा चल पड़ा और इसी काम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने वहीं ‘मैरिज हाल’ यानी शादीखाना शुरू कर दिया। शादीखाना लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन धीरे-धीरे उनका शादीखाना ट्रेंड-सेंटर बन गया और आस-पास और भी मैरिज हॉल खुल गए। इससे हरिकिशन की आय में कमी आने लगी। मैरिज-हॉल का बिज़नेस अधिक न चलता देख दो डॉक्टर हरिकिशन के पास आए और उन्हें प्रस्ताव दिया कि वे मैरिज हॉल की ज़मीन उन्हें अस्पताल खोलने के लिए दे दें। हरिकिशन उन्हें टालते रहे लेकिन वे लोग नहीं माने। आखिर हरिकिशन को उनकी बात माननी पड़ी लेकिन इस शर्त पर कि अस्पताल के लिए वे डॉक्टर एक लाख रुपये किराया देंगे तथा बाकी सारा निवेश हरिकिशन ही करेंगे। मुनाफे में दोनों (हरिकिशन और डॉक्टर) का हिस्सा 50-50 प्रतिशत रहेगा।

अस्पताल में भारी घाटा, आत्महत्या तक का ख्याल आया था मन में

2001 में हैरिटेज पीपुल्स हॉस्पिटल की स्थापना हुई। इसके लिए हरिकिशन ने बैंक से 4-5 करोड़ रुपये का कर्ज़ लिया लेकिन कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार हरिकिशन का हॉस्पिटल के काम में कोई दखल नहीं होता था। इस क्षेत्र में कोई जानकारी न होने के कारण वे काफी नुकसान में रहे, उनका परिवार कर्ज़ में डूब गया। इतना बड़ा घाटा वे सहन करने की स्थिति में नहीं थे। यहाँ तक कि उनके मन में आत्महत्या तक का ख्याल आने लगा। उनके बेटों ने उन्हें हौसला दिया और यह तय हुआ कि अब ये हॉस्पिटल पिप्पल परिवार खुद चलाएगा। दोनों डाक्टरों को हटा दिया गया। बाद में हरिकिशन को अहसास हुआ कि डॉक्टर उन्हें धोखा दे रहे थे।

जातिवाद’ ने भी डाले कामयाबी की राह में रोड़े

अस्पताल का प्रबंधन पिप्पल परिवार के हाथों में आ गया, लेकिन चुनौतियां नए सिरे से सामने आकर खड़ी हो गयीं। जातिवाद की सोच ने उनकी राह में रुकावटें खड़ी करनी शुरू कर दीं। कई डॉक्टर अस्पताल आने से कतराने लगे। उन्हें मनाने के लिए पिप्पल परिवार को नई और ख़ास नीति अपनानी पड़ी। पिप्पल परिवार ने डॉक्टरों को ऑपरेशन के लिए एडवांस देना शुरू किया। ये तरकीब कामयाब रही और धीरे-धीरे डॉक्टर और मरीजों को अस्पताल पर भरोसा बढ़ने लगा। जल्द ही अस्पताल लोकप्रिय हो गया। साल 2005 में पिप्पल के अस्पताल ने दिल्ली के एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट से एक करार किया जिसके तहत वहाँ से दिल के मरीजों को एस्कॉर्ट्स भेजा जाएगा। मीडिया में आयी ख़बरों से पता चलता है कि दलित होने के कारण उनके अस्पताल के प्रतिस्पर्धियों ने उन्हें रास्ते से हटाने के प्रयास भी किए। उनका अस्पताल आगरा में रेलवे के पैनल के तीन अस्पतालों में से एक है, अन्य दोनों अस्पताल ऊँची जाति वालों के हैं। 2010 में कुछ मरीजों ने इलाज को लेकर उनके अस्पताल की रेलवे पैनल में शिकायत कर दी थी जिसके चलते रेलवे ने उऩ्हें पैनल से हटा दिया। पिप्पल ने खुद इसकी जांच-पड़ताल की और पाया कि अन्य अस्पतालों में से एक ने रिश्वत देकर यह झूठी शिकायत दर्ज करवाई थी। हरिकिशन ने अपने कारोबारी जीवन में जूतों का बिज़नेस करने और अस्पताल चलाने के अलावा होंडा की डीलरशिप ली और एक पब्लिकेशन हाउस भी शुरू किया। हरिकिशन ने नायाब कामयाबी के बाद अपना कारोबार अपने बेटों को सौंप दिया है और खुद समाजसेवा में जुट गए हैं। वे राजनीति के दंगल में भी कूदे। हरिकिशन कहते हैं, कि अपने और अपने परिवार के लिए वे बहुत कुछ कर चुके हैं और अब उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वे समाज के उत्थान के लिए काम करें। उनका मानना है कि नामुमकिन कुछ भी नहीं है, इंसान को अपने अंदर के जूनून और जज़्बे को मरने नहीं देना चाहिए। दूसरों की कामयाबी से जलने की बजाय उनसे प्रेरणा लेने की प्रवृति किसी को भी सफलता के रास्ते पर आगे ले जा सकती है।

 

(साभार – योर स्टोरी)

चन्द्रलेखा की 5 कविताएं

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चंद्रलेखा

 

कहाँ गलत थी ?

 तुम्हें न हो याद शायद

पर मैं भूली नहीं

रखी थी जो शर्त तुमने

मुझे ‘अपना’ कहने से पहले

सच्ची ‘अर्धांगिनी’ तभी कहलाऊंगी

अपने लिए जीना नहीं,

औरों के लिए जीना जब

मैं सीख जाऊँगी ;

घूँघट उठाने से पहले,

मुझे छूने से पहले यही कहा था

तुम्हें याद न हो मगर

मैं भूली नहीं;

 

धन्य समझा था अपने जीवन को

और तुम्हें महान

एक नहीं सात जन्मों तक

कर सकती थी मैं इंतजार ;

बहुत आसान लगा मुझे

तुम्हारी शर्त पूरी करना

दिन, हफ्ते, महीने, साल बीते

और बीतते चले गए

तुम्हारी ख़ुशी, चाहतों और तुम्हारी शर्तों को

पूरा करते-करते मैं

पूरी से आधी

आधी से तिहाई और चौथाई में बंटती गई,

बंटते- बंटते फिर

सिमट गई शून्यों में ;

 

तुम्हारे सपनों को सच किया

सपने देखना मैंने छोड़ दिया ;

छोटे-छोटे तुम्हारे दुखों को सहेजा

अपने पहाड़ से दुखों को

बिखरने कभी न दिया ;

बढ़ते बच्चों की आशा- उम्मीदों को

ईंधन दिया

सुबह के नाश्ते और रात के खाने के बीच

घुटती आवाज़ को मैंने

कभी बोलने न दिया

 

तुमको ‘तुम्हारे’ परिवार, बच्चों, दफ्तर, सपनों

औ’ ‘समाज’ से जोड़ दिया

दूर होती गई तुमसे

मैं धीरे-धीरे-धीरे

तुम यह  जान न पाए

कह भी न सकी मैं

मुझे तुम्हारी सच्ची ‘अर्धांगिनी’ जो बनना था

मैं भूली नहीं कभी ;

 

मुझसे विलग होकर ही जुड़े तुम

अपने ‘अपनों’ से,

जीते रहे तुम ‘अपनों’ के लिए

देव! कितनी स्वार्थी हो गई मैं

जोड़ना चाहती थी तुम्हें सिर्फ अपने से

 

अपनों का सुख, परायों का दुःख

सहेजा तुमने कितनी सहजता से

मैं क्या थी तुम्हारे लिए?

‘अपनी’ या कि ‘पराई’ ?

‘अर्धांगिनी’ न बन सकी तुम्हारे लिए

हार गई मैं शर्त

तुम्हारे लिए जीते-जीते

अपने लिए जीना न सीख पाई मैं

 

2. आज़ादी

 

उड़ सकती हूँ मैं

बादलों के भी पार

गा सकती हूँ सुरीला गान

होगा जो कोकिल से भी मीठा

रच सकती हूँ कोई

एक नया महाकाव्य

दायरे हैं न बंदिशे कोई

मैं आज़ाद हूँ घर में

‘अकेली’ हूँ ‘अपने साथ’

 

 

3. स्वीकार

तुम्हारे साथ  जिया मैंने जीवन

और (शायद) तुमने भी  !

जो दिया तुमने

जिस रूप में भी दिया

मैंने, स्वीकार किया ;

धर्म इसी को बताया गया

आराधना यही ईश्वर की

जीवन की साधना यही

लक्ष्य जीवन का यही

आदि यही और अंत भी  यही

शास्त्रों में यही समझाया गया ;

 

स्वीकार किया तुम्हें मैंने

और तुमसे मिले हर दान को

लेकिन ;

तुमने कभी पूछा  नहीं

मुझे यह स्वीकार है ?

या नहीं ?

 

 

4. शिकायत है तुमसे

लगाया  दांव पर द्रुपद सुता को

फिर भी धर्मराज कहलाये

बने रहे पुरुषोतम तुम

और सिया ने कष्ट उठाये

 

त्याग यशोधरा का करके

योगी, ज्ञानी, बुद्ध हुए तुम

कभी अहिल्या, कभी जानकी

और द्रौपदी बनी रही मैं

तिरस्कार,त्याग नहीं यह मेरा

अपमान हुआ सिर्फ नारी देह का;

 

तुम देवराज ! तुम्ही धर्मराज !

राम भी तुम्ही, रावण भी तुम्ही

तुम समाज के,  समाज तुम्हारा

बने समाज के तुम्ही अधिष्ठाता !

अपना तिलक आप सजा के

ऊँचे सिंहासन जा बिराजे

भूले से भी याद नहीं क्यों

इसी देह से तुम भी जन्मे !

 

नियति नहीं थी फिर भी,लेकिन

होती रही ये देह तिरस्कृत;

अदेह शक्ति को पूज-पूज कर

किया अपमान नारी देह का

मान तुम्हारा रखने खातिर
लुटती रही ये देह सदा
बली सदा तुम बने रहे

रह गई ये देह अबला;

आँचल रात्रि जब ले समेट

तब होता हर रोज़ उजाला

इठलाता सागर का यौवन

नदियाँ ले जब देह समेट;

 

न ये माता, न ये भार्या

न सुता , न भगिनि तुम्हारी

हर युग हर काल  में

रही सामने  देह सदा ;

 

बहता रक्त शिराओं मे

और सांस भी चलती

भावना जगती, सपने पलते

ठीक तुम्हारे भीतर जैसे

समझो न केवल देह इसे

 

रोष नहीं यह, न कोई विरोध

पीछे चलने की चाहत, न

आगे निकलने की होड़

गिला नहीं विधाता से

पर हाँ, शिकायत !

तुम से…सिर्फ तुम्ही से है

भूले  से ही सही, कभी तो

इंसा  ही समझ लिया होता

देह से परे कभी तो जाकर

मन में झाँक लिया होता …

 

5.  आधी दुनिया

 

बचपन गुज़रा

जवानी बीती

बुढ़ापे तक भी

छिपी रही पहचान;

 

देवी सी पूजी गयी

तिरस्कृत हुई  दासी-सी

रही महरूम हमेशा ही

अपनी ही पहचान से ;

 

पाषण से कंप्यूटर तक

पहुँच चुका संसार

घर आँगन में ही

दफन है

आधी दुनिया का संसार !

 

(कवियित्री पूनम पाठक ‘ चन्द्रलेखा की कविताओं में स्त्री की मनोदशा का चित्रण ही नहीं बल्कि उन सवालों की गूँज भी सुनाई पड़ती है जो वह करना चाहती थी मगर वे दबे रहे या दबा दिए गए। उपरोक्त कविताएँ चन्द्रलेखा के काव्य सँग्रह ‘संग्रह ‘सन्नाटा बुनता है कौन’ से ली गयी हैॆ। सम्पर्क सूत्र – 9433700506)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बनारस की ये महिलाएं ला रही हैं हजारों किसानों के चेहरे पर खुशी

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हर साल गरीबी, कर्ज, सूखे की मार से सैकड़ों किसान आत्महत्या कर लेते हैं। उनकी मौत पर संसद में शोर-शराबा होता है, हम-आप सोशल मीडिया पर शोक मना लेते हैं और किसानों के हालात जस के तस बने रहते हैं। लेकिन बनारस की कुछ महिलाओं ने सिर्फ दुख न जताकर किसानों के लिए कुछ करके दिखाया है। हाईब्रीड बीजों, रासायनिक दवाओं व उर्वरकों के दामों में बेतहाशा वृद्धि और महंगाई की मार को कम करने के लिए महिलाओं ने ‘अपना बीज बैंक’ बना डाला। किसानों की मदद के लिए महिलाओं ने ये बैंक शुरू किया है। इस बीज बैंक में देसी प्रजाति के सभी प्रकार के फल, सब्जी, अनाज, दलहनी और तिलहनी आदि उन्नतशील बीजों का संग्रह है। बीज बैंक से किसान बीज विनिमय के माध्यम से बिना पैसे के बीज प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसे काम करता है ये बैंक – ‘अपना बीज बैंक’ की खासियत ये है कि कोई भी किसान बैंक सदस्य बनकर मुफ्त में बीज प्राप्त कर सकता है। इसके लिए किसान को बदले में दूसरी प्रजाति का बीज बैंक में जमा करना होता है या फसल तैयार होने के बाद किसान को बीज के एवज में बीज देना पड़ता है।

बैंक के माध्यम से किसानों को हाईब्रीड, नपुंसक बीजों, रासायनिक दवाओं और रासायनिक उर्वरकों से ज़मीन, पानी और स्वास्थ्य आदि पर पड़ रहे बुरे प्रभाव बताकर जागरूक भी किया जाता है। किसानों को जैविक खेती, प्राकृतिक खेती जैसी कम लागत वाली खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस बीज बैंक के खुलने से किसान बहुत खुश हैं। बीज बैंक के खुलने से गांव के किसानों के चेहरे खिल गए हैं। किसानों का मानना है, कि ‘जो बीज हम बाजार से महंगे दामों पर खरीदते थे, वो जल्द ही खराब हो जाते थे। अब इस बैंक के माध्यम से हमें मुफ्त में बेहतर बीज मिलेंगे, जिससे हमारी खेती को नया आयाम मिलेगा और हमारी जिंदगी बदल जाएगी।’

महिलाएं चलाती हैं ‘अपना बीज बैंक’ – अपना बीज बैंक का संचालन महिला किसान समूह करता है। उन सबने खुद के जुटाए हुए पैसों से ये बैंक तैयार किया है। लोगों ने गांव की भलाई के लिए दुकान के लिए जगह दे दी थी। बैंक की नींव रखने वाली अनीता के मुताबिक, ‘किसानों की समस्या को ध्यान में रखकर इस बैंक को खोला गया है। इस बीज बैंक में भारतीय देसी प्रजाति के सभी फल, सब्जी, अनाज, दलहनी और तिलहनी वगैरह की उन्नतशील बीजों का संग्रह रहता है।’ अपने आप में अनोखा ये बीज बैंक फिलहाल किसानों के सामने खड़ी बीज समस्या का समाधान करेगा। खेती लगातार महंगे होते बीज के चलते बढ़ रही है, जिससे लागत को कम करने में इससे काफी मदद मिलेगी। दूसरी ओर उन्नतशील देसी बीज से पैदा अनाज, दालें और सब्जियां स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी लाभदायक होंगी।

गरीब बच्चों को आईएएस की तैयारी कराने के लिए एक किसान ने दान कर दी अपनी 32 करोड़ की सम्पत्ति

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आईएएस बनने का सपना जितना बड़ा और आकर्षक है उतना ही मुश्किल भी। सही से तैयारी करने के लिए कोचिंग से लेकर किताबें और किसी बड़े शहर में रहकर पढ़ाई करने में काफी पैसे खर्च हो जाते हैं। ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को आईएएस की तैयारी करने में तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

उस खास वर्ग के उन बच्चों की मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए ही महाराष्ट्र के एक किसान ने अपनी 32 करोड़ की कीमत वाली सम्पत्ति दान कर दी। श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट IAS की तैयारी कराने के लिए एक अकेडमी बनाना चाहता है, ऐसे में वसई के रहने वाले काशीनाथ पाटिल ने इसके लिए अपनी दो इमारतें (जिनकी कीमत 32 करोड़ रुपये हैं) दान में दे दी हैं। शिरडी के पास एक कस्बे में स्थित ये अकादमी बच्चों को आईएएस बनाने के लिए तैयार करेगी।

काशीनाथ गोविंद पाटिल साईं बाबा के बहुत बड़े भक्त हैं। वे शिरडी साईं बाबा के दर्शन के लिए आने वाले लोगों के लिए मुंबई-शिरडी रूट पर रहने की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। हालांकि पाटिल ने अपनी बिल्डिंग ट्रस्ट को फ्री में दी है, लेकिन ट्रस्ट को इसके लिए लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की स्टांप ड्यूटी भरनी पड़ी।

इस प्रोजेक्ट की देख रेख करने वाले और ट्रस्ट के अध्यक्ष सुरेश हावड़े अपनी योजनाओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं, कि ‘ये अकेडमी गरीब बच्चों को फ्री में ट्रेनिंग और गाइडेंस उपलब्ध करायेगी। बच्चों को पढ़ाने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए रिटायर आईएएस अधिकारी आएंगे।’ साथ ही उन्होंने ये भी कहा, कि ‘मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में उत्तर महाराष्ट्र से भी कई बच्चे आईएएस की लिस्ट में अपनी जगह बनाएंगे।’

भारत में आईएएस के एग्जाम को सबसे कठिन एग्ज़ाम माना जाता है। सिविल सर्विस की परीक्षा तीन चरणों में होती है, प्री, मेंस और इंटरव्यू। इसकी कठिनाई का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि सिर्फ प्री एग्ज़ाम में 95 प्रतिशत से अधिक छात्र असफल करार दिये जाते हैं और जो बचते हैं, वे ही आगे के एग्ज़ाम्स में बैठ पाते हैं।

ऑफिस में काम करने वाले सीखें हाई बीपी को काबू करने के तरीके

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ऑफिस में जॉब करने वालों को वैसे तो अनेको बीमारियां हो जाती हैं लेकिन उनमें से हाई बीपी की समस्‍या और भी ज्‍यादा लोंगो को होती है। अगर आपको भी हाई बीपी की समस्‍या है, तो दवाइयों पर निर्भर ना रह कर अपनी लाइफस्‍टाइल में चेंज कीजिये। इससे आपकी दवाइयों का खर्च घटेगा और धीरे धीरे आप दवायों का सेवन करना भी बंद कर देंगे।

अगर ऑफिस वाले हैं तो अब ऑफिस का बहाना मत दीजिये क्‍योंकि हाई बीपी बहुत खतरनाक बीमारी है। आज हम उन लोंगो के लिये टिप्‍स लाए हैं, जिन्‍हें हाई बीपी है और वे ऑफिस में काम करते हैं। लिफ्ट की जगह करें सीढ़ियों का प्रयोग सीढ़ियां चढ़ने से आपके शरीर का ब्‍लड सर्कुलेशन ठीक होगा और लगे हाथों आपकी एक्‍सरसाइज भी हो जाएगी। इससे दिल भी स्‍वस्‍थ रहेगा लेकिन हां, अगर सीने में दर्द शुरु हो जाए या सांस फूलने लगे, तो अपने डॉक्‍टर को जरुर दिखाएं।

कॉफी ज्‍यादा ना पिएं ऑफिस में थकान और आलस को दूर करने के लिये ज्‍यादा कॉफी पा पिएं। इससे आपका ब्‍लड प्रेशर बढ़ेगा। जिनको हाई बीपी की समस्‍या है उन्‍हें लंबे समय तक बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। इसकी जगह पर ग्रीन टी पिएं।  बाहर का खाना ऑर्डर ना करें ऑफिस में बाहर की जगह घर पर खाना लाएं।

घर के खाने में कम नमक, तेल और प्रिजर्वेटिव्‍स होते हैं। साथ ही अपने लंच बॉक्‍स में ढेर सारे फल और सब्‍जियां पैक करें, जिसे आप शामा को स्‍नैक के तौर पर खा सकते हैं। डेस्‍क से थोडी-थोड़ी देर पर उठें लंबे समय तक सीट पर ना बैठें और एक आधे घंटे पर उठ कर टहलें। लंबे समय तक बैठे रहने से मेटाबॉलिज्‍म घटता है और मोटापा, हाई बीपी और मधुमेह की बीमारियां होती हैं।

प्रेशर और स्‍ट्रेस से दूर रहें काम का बोझ ज्‍यादा ना लें, प्रेशर आने पर सीट से उठ कर कुछ देर टहलें या अपने दोस्‍तों से इस बारे में बात करें। काम में प्रेशर तो आएगा ही लेकिन इसे हैंडल करने का तरीका भी आपको ही सीखना होगा।

इजरायली नर्स ने फिलिस्तीनी बच्चे को कराया स्तनपान

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पूरी दुनिया जानती है कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच किस हद तक दुश्मनी हैं. दोनों देश एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने का एक भी मौका नहीं गंवाते हैं, लेकिन इस बार एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे जानकर लोग हैरत जताने के साथ भावुक हो रहे हैं. दरअसल, इन दिनों सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रही हैं, जिसमें इजरायली की एक नर्स फिलिस्तीनी महिला की कोख से पैदा हुए नवजात को स्तनपान करा रही है. मानवता की मिसाल पेश करती इस तस्वीर की दुनिया भर में चर्चा हो रही है. जिस किसी की भी इसपर नजर पड़ रही है वह हैरानी के जताने के साथ यह भी लिख रहे हैं, ‘दुनिया में इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं है, सदैव इसकी जीत होती है.’

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सड़क दुर्घटना में फिलिस्तीनी महिला बुरी तरीके से घायल हो गई थी और उसके पति की मौत हो गई थी. महिला को इजरायल के करीम अस्पताल में भर्ती कराया है. उसके बच्चे को भूख के मारे बिलखता देख इजरायली नर्स का कलेजा पसीज गया. उसने बच्चे को गोद में उठाया और स्तनपान कराने लगी. इंसानियत की मिसाल पेश करने वाली यहूदी नर्स का नाम उला ओस्‍ट्रोवस्‍की-जक है।

इजरायली नर्स ने पहले करीब सात घंटे तक बच्चे को बोतल से दूध पिलाने की कोशिश की, लेकिन उसने रोना बंद नहीं किया. इसके बाद उसने स्तनपान कराने का फैसला लिया।

नर्स ने कहा, ‘उसकी (बच्‍चे की) मौसी बेहद हैरान थी कि एक यहूदी कैसे दूध पिलाने को तैयार हो गई, मगर मैंने उनसे कहा कि हर मां यही करेगी।’ अपनी शिफ्ट के दौरान नर्स ने नवजात को पांच बार स्‍तनपान कराया और जब परिवार इस बात को लेकर चिंतित था कि नर्स के जाने के बाद क्‍या होगा, तो उला ने उसका भी बंदोबस्‍त किया। नर्स ने एक फेसबुक ग्रुप पर पोस्ट लिखी, जिसपर हजारों जवाब आए और कई महिलाओं ने आकर बच्‍चे को खिलाने के लिए कॉल किया। यह तस्‍वीर सोशल मीडिया पर हजारों बार शेयर की गई है।
मालूम हो कि इजरायल की स्थापना 1948 में हुई थी। इससे पहले इजरायल देश का कोई अस्तित्व नहीं था। यहां मूल रूप से फिलिस्तीनी निवास करते थे। 1947 में संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली ने अंतरराष्ट्रीय देख-रेख में फिलिस्तीन को एक स्वायत्त येरुशलम के साथ यहूदी स्टेट और अरब स्टेट में बांटने के लिए वोट दिया था, जिसके बाद इसकी स्थापना हुई। पिछले 60 साल से दोनों देशों के बीच इसी वजह से लगातार झगड़े होते आ रहे हैं.

 

 

पांच वक्त के नमाजी कृष्ण भक्त अब्दुल बोलते हैं श्रीराम

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घर में वो गीता, कुरान रखता है, जुबां पर राधे-राधे नाम रखता है
गफ्फार तो सांवरे का दीवाना है, वो इंसानियत से काम रखता है॥

सियासत है, जिसने हिंदू-मुस्लिम बीच दीवार खड़ी की। धर्म के ठेकेदारों ने कभी इस खाई को पटने नहीं दिया। ऐसे लोगों को आगरा की टेढ़ी बगिया के अब्दुल गफ्फार आइना दिखाते हैं।

43 साल के गफ्फार का ताल्लुकात भले ही उनका इस्लाम से है, लेकिन सांवरे से प्रीत की डोर ऐसी बंधी कि मुख से श्रीराधे-श्रीराधे ही निकलता। अब्दुल गफ्फार वक्त मिलते ही श्रीमद् भागवत कथा, गीता, रामचरित मानस का पाठ करते हैं। उन्होंने इस्लाम से नाता नहीं तोड़ा है, वो पांचों वक्त के नमाजी हैं।

गफ्फार कहते हैं कि सात साल पहले मथुरा में एक हिंदू मित्र की शादी में गए थे। वहां दोस्तों ने बांकेबिहारी के दर्शन की बात कही। बोले, वह भी चलेंगे। खुशकिस्मत देखिए, दोस्त सभी बारात के साथ लौट लिए, लेकिन वो नहीं आए। सोच लिया, दर्शन करके ही जाऊंगा। दोपहर मंदिर पहुंचे तो पट बंद थे, पुजारी से पता चला कि शाम के साढे़ चार बजे दर्शन होंगे।

इस पर वे मंदिर के बाहर ही बैठ गए। पट खुले और कान्हा की सांवरी मूरत के दर्शन किए। बोले, जैसे ही कान्हा के दर्शन हुए उनकी मूरत मन में बस गई। हृदय में एक ज्योति से जलने लगी। घर लौटा तो रात-दिन कान्हा की मूरत मनमस्तिष्क में आने लगी। फिर क्या, हिंदू धर्म, ग्रंथ और कान्हा को समझने की जिज्ञासा बढ़ी और अब पूरी तरह से सांवरे से डोर बंध गई है।

गफ्फार का हर साल गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने जाते हैं। अभी तक छह बार ऐसा कर चुके हैं। 84 कोस की परिक्रमा भी वे तीन बार कर चुके हैं। कहते हैं कि भी हिंदू मित्रमंडली के साथ तो कभी अकेले ही मथुरा के लिए रवाना हो जाते हैं। आसपास भागवत होने पर वो सुनने का मौका नहीं छोड़ते।

कान्हा की भक्ति में रमे गफ्फार पिछले आठ साल से अपने यहां भागवत कथा, सत्संग कराते हैं। खास बात इसके लिए वह किसी से चंदे के तौर पर रुपये नहीं लेते। सारे व्यसन से दूर गफ्फार पूरी तरह से सात्विक जीवन बिताते हैं। उनके पास हिंदू धर्म से जुड़ी हुई 900 से अधिक ग्रंथ, पुस्तकें, साहित्य और पत्रिकाएं हैं।

ऐसा नहीं कि गफ्फार को विरोध नहीं झेलना पड़ा। नाते-रिश्तेदारों तक ने उलाहने दिए। धार्मिक गुरुओं ने भी उनका विरोध कर इसे इस्लाम के खिलाफ बताया। तीन बच्चे और पत्नी ने भी विरोध किया, पर गफ्फार की भक्ति में कोई कमी नहीं आई। उनकी भक्ति के आगे अब तो परिवार-नाते रिश्तेदारों का विरोध भी हल्का पड़ने लगा है।

उम्र को धूल चटातीं 97 साल की योग गुरु ननम्मल  

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ननम्मल ने कोयम्बटूर में 20,000 से अधिक छात्र और उत्साही लोगों को योग का प्रशिक्षण देकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाने का प्रयास किया ।

ननम्मल के पिता एक मार्शल आर्ट कलाकार थे। ननम्मल ने योग की मूल बातें अपने पिता से ही सीखी हैं। ये पिता की सीख ही है, कि वे 97 वर्ष की उम्र में भी अपने शरीर को अपनी इच्छानुसार तोड़-मरोड़ सकती हैं।

भारत में संभवतः सबसे वृद्ध योग प्रशिक्षक वी ननम्मल दैनिक आधार पर 100 से अधिक छात्रों को योगा सिखाती हैं और उनके छात्रों में सभी आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। नन्नाममल ने योग की मूल बातें अपने पिता से सीखी हैं। उनके पिता आठ साल की उम्र से ही एक मार्शल आर्ट कलाकार थे। स्वाभाविक रूप से सुबह जल्दी जागने वाली नन्नाममल सुबह उठते ही 500 मिलीलीटर पानी पीती हैं और अपने दांतो को साफ़ करने के लिए नीम कि दातुन का इस्तेमाल करती हैं और इसीलिए जब कभी वो शहर से बाहर यात्रा पर होती हैं, तो भी अपने साथ नीम की दातुन ले जाना नहीं भूलतीं। ननम्मल दिन के समय फल, शहद के साथ दूध और हल्दी पाउडर जैसा स्वस्थ भोजन खाती हैं।

डेक्कन क्रॉनिकल के साथ बात करते हुए ननम्मल कहती हैं, ‘मेरे पति ‘सिद्ध’ का अभ्यास करने के साथ ही खेती करते थे। इस प्रकार से शादी के बाद प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति मेरे लगाव कि शुरुआत हुई। मैंने अपने जीवन में कभी भी योग के अभ्यास को नहीं छोड़ा और यही मेरे स्वास्थ्य का रहस्य है। मेरे द्वारा प्रति दिन किया जाने वाला भोजन भी फाइबर और कैल्शियम से अत्यंत समृद्ध होता है। मैं हर रोज एक अलग शाकाहारी व्यंजन के साथ कांजी लेती हूँ। हमारे द्वारा उपयोग की गई सभी सब्जियां हमारे अपने खेत में उगाई जाती हैं।’

ननम्मल ने कोयम्बटूर में 20,000 से अधिक छात्र और उत्साही लोगों को योग का प्रशिक्षण देकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी अपना नाम दर्ज करवाने का प्रयास किया है। वर्तमान में उनका उद्देश्य महिलाओं और मुख्य रूप से कन्या छात्राओं को विशेष रूप से शादी के बाद, उनकी बहुत से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को हल करने के लिए विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में जाकर योग तकनीकों के बारे में जागरूकता पैदा करना है।

ननम्मल बेटे वी एलुसामी कहते हैं, ‘उन्होंने दुनिया भर से कई योग महासंघों से आये प्रस्तावों को सिर्फ इसलिए रिजेक्ट करना पड़ गया, क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती है।’

नन्नाममल से योग का प्रशिक्षण लिए हुए लगभग 600 लोग आज योग प्रशिक्षक की भूमिका में हैं और दुनिया भर को योग का प्रशिक्षण दे रहे हैं। अभी उनके परिवार के 36 सदस्य गंभीरता से योग अभ्यास से जुड़े हुए हैं। ननम्मल का दृढ़ विश्वास है, कि यदि ‘इंसान इरादा सही है तो फिर कोई बहाना या सीमा उसे रोक नहीं सकती है।’