Friday, March 27, 2026
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मशहूर पंजाबी साहित्यकार अजमेर औलख नहीं रहे

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पंजाबी के प्रसिद्ध नाटककार और उपन्यासकार अजमेर औलख का वीरवार सुबह देहांत हो गया। वे काफी समय से कैंसर से जूझ रहे थे। 75 वर्षीय औलख ने अपने मानसा स्थित घर में ही अंतिम सांस ली। 16 जून शुक्रवार को मानसा में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

अजमेर औलख को साल 2008 में कैंसर की बीमारी का पता चला था, जिसके चलते उनकी रीड की हड्डी में तकलीफ शुरू हो गई थी। अमजेर सिंह औलख पिछले एक महीने से फोर्टिस अस्पताल में भर्ती थे और एक हफ्ता पहले ही डिस्चार्ज हुए थे।

सिद्धू ने अपनी जेब से दिया था 8 लाख का चेक

विशेष उल्लेखनीय है कि काफी समय से कैंसर से जूझ रहे औलख के इलाज में आया 8 लाख रुपये का बिल पंजाब कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने अपनी जेब से भरा था। सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी उनका हाल चाल जाना था।

वहीं हाल ही में सेहत मंत्री ब्रह्म मोहिंद्रा ने ऐलान किया था कि सरकार उनके इलाज का सारा खर्च वहन करेगी। साथ ही अस्पताल को निर्देश दिया था कि वे उनके इलाज का बिल सीधा सरकार को भेजें। महिंद्रा खुद निजी तौर पर औलख का हाल जानने को अस्पताल गए थे।

गांव की सड़कों पर महिलाएं दौड़ाएंगी कैब, सरकार देगी छह लाख

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गांव की सड़कों पर महिलाओं को कैब और छोटे वाहन चलाने के लिए सरकार एक नई योजना की शुरुआत करने वाली है। इस योजना के तहत ग्रामीण इलाकों में महिला स्वयं सहायता समूहों को कैब खरीदने के लिए केंद्र सरकार ब्याज मुक्त ऋण देगी। सार्वजनिक परिवहन और रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू होने वाली इस योजना का नाम ‘प्रधानमंत्री ग्राम योजना’ हो सकता है और इसका शुभारंभ 15 अगस्त को किया जा सकता है।

मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार शुरुआत में इस योजना को देश के 250 प्रखंडों में लागू किया जाएगा। इस योजना के तहत केंद्र सरकार दस-दस लोगों के बैठने की क्षमता वाले 1500 छोटे वाहनों पर ब्याजमुक्त कर्ज प्रदान करेगी।
यह योजना खासतौर से महिलाओं के लिए ही होगी। योजना के तहत ऋण राशि की सीमा छह लाख रुपये तक होगी और इसे चुकाने की अवधि करीब छह साल होगी। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि यह योजना क्रांतिकारी होगी, क्योंकि यह न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में सुधार करेगी बल्कि खासकर महिलाओं के लिए पर्याप्त रोजगार विकल्प भी पैदा करेगी।

 

खादी दे सकती हैं आपको फैशनेबल लुक

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गर्मियों के मौसम में खादी के कपड़े आपके लिए उपयुक्त साबित हो सकते हैं। खादी के कपड़े से बने स्पेगेटी टॉप, डेनिम से लेकर शॉर्ट ड्रेस तक इस मौसम में न केवल आपके लिए आरामदेह साबित होंगे बल्कि आपको नया और स्मार्ट लुक भी देंगे। खादी को और भी कूल बनाना है तो इन बातों पर ध्यान दें –
खादी की हाथ से बनी साड़ी सबसे बेहतर होती है और ये विभिन्न रंगों और स्टाइल में मिलती हैं. खादी साड़ी को पहनने से कोई समस्या नहीं होती है क्योंकि ये गर्मी में आरामदेह होती है. मॉडर्न लुक के लिए जरदोजी की कढ़ाई और ब्लॉक प्रिंट वाली खादी की साड़ी चुनें। आप रंगीन प्लेन खादी साड़ी को कढ़ाईदार शर्ट ब्लाउज के साथ भी पहन सकती हैं, जो आपको एकदम नया लुक देगा।

अलग अंदाज और स्टाइल में नजर आने के लिए आप खादी की स्पेगेटी, टॉप को स्कर्ट या ढीले ढाले पैंट के साथ पहन सकती हैं। आप खादी के क्रॉप टॉप को हल्के घेरदार (रैप-अराउंड ) स्कर्ट के साथ पहनकर बेहद आकर्षक नजर आ सकती हैं।

-बच्चों के लिए खादी का कपड़ा सबसे अच्छा होता है। साधारण प्रिंट वाले ड्रेस या विभिन्न डिजाइनों वाले कट फ्लेअर्ड खादी के टॉप लड़कियों के लिए बेहतर होंगे, जबकि लड़के हाथ से तैयार खादी के शर्ट और पैंट पहन सकते हैं। बच्चों के लिए खादी को पहनना आसान और आरामदेह होता है।

अगर आप गर्मियों के मौसम में और सहज महसूस करना चाहती हैं तो खादी के कुर्ते या शॉर्ट ड्रेस पहन सकती हैं. आप गले पर बढ़िया कढ़ाई वाली कुर्ती के साथ कुछ आभूषण भी पहन सकती हैं, जिसमें आप बेहद खूबसूरत दिखेंगी।

चटख रंग के खादी के स्कॉर्फ या दुपट्टे को आप प्लेन ड्रेस के साथ पहन सकती हैं. दुपट्टे को हल्के रंग की कुर्ती के ऊपर पहनें, जिससे आप निश्चित रूप से भीड़ से अलग नजर आएंगी।

गर्मियों में आप खादी के शॉर्ट पैंट या श्रग भी पहन सकती हैं। शॉर्ट के ऊपर खादी का श्रग पहनें, जो आपको स्मार्ट लुक देगा।

स्टाइल और सहजता के हिसाब से खादी का डेनिम बेहतर होता है. डेनिम खादी पैंट को ऑफ शोल्डर या कोल्ड शोल्डर टॉप के साथ पहनें।

 

कंफर्ट और स्टाइल में बेस्ट है जॉगर शर्ट

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पुरुषों के लिए फैशन की कमी नहीं बस जरूरत है उनके बारे में जानने की. जी हां, कई सारे फैशन आकर फैशन से आउट भी हो जाते हैं लेकिन उनके बारे में बहुत ही कम लोगों को पता चल पाता है। लिमिटेड फैशन में इन चीज़ का ध्यान रख पाना थोड़ा आसान होता है.

पुरुषों के लिए शर्ट एक ऐसा आउटफिट है जिसे कैजुअल से लेकर ऑफिशियल लगभग सभी जगहों पर कैरी किया जा सकता है। इनकी वैराइटी को अलग-अलग पेयर करके स्टाइलिश और फैशनेबल का टैग अपने नाम किया जा सकता है।

जॉगर शर्ट और डेनिम पैंट्स का कॉम्बो इन दिनों बहुत पहना जा रहा है। वाइल्ड लुक हॉट है और भीड़ से अलग भी है। जॉगर शर्ट को इंडिगो पैंट्स के साथ पेयर किया जा रहा है। लुक को पूरा करने केलिए स्नीकर्स पहने जा रहे हैं।

जो वर्कआउट करते हैं लेकिन शर्ट कलेक्शन ऐसा है कि मसल्स दिखाई नहीं देते तो उनकेलिए जॉगर शर्ट है। जॉगर शर्ट को बटन करके रोल-अप किया जा रहा है जिससे बाइसेप्स साफ दिखाई देते हैं।

इन्हें खाकी और ब्लेजर के साथ भी पहना जा रहा है। ये कॉम्बो बहुत ही कूल और कॉन्फिडेंट लुक देता है।

जॉगर शर्ट ऐयरपोर्ट स्टाइल में भी शामिल हो रहा है. नीचे वाइट टी पहनकर शर्ट की स्लीव्स को रोल करना है। इस तरह ये स्टाइल ज्यादा डिफाइन किया जा रहा है।

ऑल इंडिया आईटीआर ऐप हुआ लॉन्च, मोबाइल से करें ई-फाइलिंग

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अखिल भारतीय आईटीआर ने ई-फाइलिंग की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए मोबाइल ऐप लॉन्च कर दिया है। इस ऐप को गूगल प्ले-स्टोर और ऐप स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। ऐप के लॉन्चिंग के मौके पर अखिल भारतीय आईटीआर के संस्थापक और निदेशक विकास दहिया ने कहा कि यह ऐप ई-फाइलिंग में क्रांति लाएगा। साथ ही इस ऐप से टैक्स रिटर्न करने पर लोगों के वह पैसे बचेंगे जो किसी एक्सपर्ट को दिए जाते हैं।

इस ऐप में रिफंड स्टेटस पता करने, बकाया टैक्स की जांच करने, एचआरए छूट की गणना और रेंट रसीद क्रिएट करने की सुविधा है। इसके अलावा इस ऐप के जरिए टैक्स से संबंधित सवाल भी चार्टड अकाउंटेंट टीम से पूछ सकते हैं और उनसे सलाह ले सकते हैं। इस ऐप के जरिए आप खुद ही आयकर तैयार कर सकेंगे और जमा कर सकेंगे। यह ऐप आपके चार्टड अकाउंटेंट के ऊपर खर्च होने वाले पैसों को बचाएगा।

आराधना धूप: स्वरोजगार की प्रेरणा बनीं सुषमा

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नौकरी करने का एक क्रेज चल चुका है, जिसको देखो वो नौकरी के लिए ही भाग रहा है। लोगों को ये नहीं समझ आ रहा कि अगर सब नौकरी ही करेंगे तो और नई नौकरी बनाने वाला संस्थान कैसे बनेगा। जब तक खुद का कुछ नया व्यवसाय नहीं करेंगे या नई संस्था नहीं खोलेंगे तो रोजगार के अवसर निरंतर कम होते जाएंगे। बहुत से लोगों के पास कुछ नया शुरू करने का आईडिया भी होता है लेकिन असफल होने का डर उन्हें घेर लेता है। आज जब रोजगार के लिए पलायन लोगों की नियति बन चुका है, ऐसे में हिमाचल प्रदेश की एक महिला न सिर्फ स्वरोजगार के क्षेत्र में प्रतिमान गढ़ रही है, बल्कि अन्य महिलाओं को भी रोजगार की राह दिखाकर उनकी प्रेरणा बनी हुई है। धूपबत्ती बनाने का कारोबार शुरू कर खुद की अलग पहचान कायम करने वाली सुषमा बहुगुणा के साथ आज दो दर्जन से अधिक महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति संवार रही हैं। सुषमा उत्तराखंड के चंबा जिले में रहती हैं। वो 33 साल की हैं।

सुषमा बहुगुणा काफी शिक्षित हैं। उन्होंने एमए बीएड किया हुआ है। इसके बाद वे आसानी से कहीं भी शिक्षिका के तौर पर काम कर सकती हैं लेकिन नौकरी के पीछे भागने के बजाय उन्होंने खुद का काम शुरू करने की योजना बनाई। सुषमा बहुगुणा के पति  बेरोजगार थे, इसलिए सुषमा ने तय किया कि किसी ऐसे काम में हाथ डाला जाए, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति तो मजबूत हो ही साथ ही दूसरी महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें। डेढ़ साल पहले सुषमा ने खुद धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण लिया और फिर महिलाओं का समूह गठित कर रानीचौरी में ‘आराधना धूप’ के नाम से लघु उद्योग की शुरुआत की। इसके साथ ही उसने आसपास के गांवों की महिलाओं को भी धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस काम में पति ने भी उनका साथ दिया। आज यह दंपति तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। सुषमा का कहना है कि ‘उत्पाद सही होना चाहिए फिर बाजार की चिंता नहीं सताती। धूपबत्ती बनाने के काम में बड़े उपकरणों की भी जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही महिलाएं इस काम को आसानी से कर लेती हैं।’

महीने में 40 हजार का मुनाफा

सुषमा हर महीने 5000 के आसपास धूपबत्ती के बॉक्स तैयार करती है। इन्हें बेचने में भी उसे कोई परेशानी नहीं होती। जिले में ही सारे उत्पाद बिक जाते हैं। सुषमा के मुताबिक, अगर आप सही उत्पाद तैयार कर रहे हैं तो आपको बाजार की चिन्ता नहीं सताती है। इस समय दो दर्जन से अधिक महिलाएं सुषमा के साथ फुलटाइम काम करती हैं। वो सब 07 से 10 हजार रुपये महीना कमा रही हैं। सुषमा खुद भी 30 से 40 हजार रुपये प्रतिमाह कमा लेती है। इससे वह अपनी बेटी व बेटे को अच्छी शिक्षा दे रही हैं। अब उनका लक्ष्य अन्य उत्पादों को तैयार करना भी है जिससे अधिक से अधिक महिलाओं को स्वरोजगार मिल सके।

गांव की महिलाओं को भी जोड़ा स्वरोजगार से

सुषमा बहुगुणा ने आसपास के गांवों की महिलाओं को भी धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि धूपबत्ती बनाने के काम में बड़े उपकरणों की भी जरूरत नहीं पड़ती है इस वजह से महिलाएं इस काम को आसानी से कर लेती हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

अब सरकार का जोर महिला नहीं बल्कि पुरुष नसबंदी पर

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देश का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय चाहता है कि नसबंदी योजना में पुरुषों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी हो। मंत्रालय ने महिलाओं के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय नीति में इस प्रस्ताव को शामिल कराया है। 1970 में आपातकाल के समय संजय गांधी के इस विवादित कदम के बाद पहली बार किसी सरकार ने ऐसा प्रस्ताव लाया है। अधिकारियों का तर्क है कि पुरुषों में परिवार नियोजन की जिम्मेदारी डालने के लिए इस तरह का कदम उठाना जरूरी है।

मेनका गांधी के मंत्रालय का कहना है कि इस तरह का कदम महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा। मंत्रालय के अनुसार देश में महिला नसबंदी बढ़ रही है, जबकि पुरुष नसबंदी न के बराबर है।

स्वास्थ्य मंत्रालय का 2015 का सर्वे बताता है कि 1986-87 में आठ लाख के करीब पुरुषों की नसबंदी की गई, मगर 2014-15 में यह संख्या एक लाख से भी कम रही। इसके उलट 1980-81 में एक लाख से कम महिलाओं की नसबंदी की गई, जबकि 2014-15 में यह संख्या चार लाख के करीब रही। वहीं, 2010-11 में चार लाख से ज्यादा महिलाओं की नसबंदी की गई।

युक्त राष्ट्र आबादी संभाग के अर्थशास्त्र एवं सामाजिक मामलों के विभाग की रिपोर्ट कहती है कि किसी भी देश के मुकाबले भारत का परिवार नियोजन महिला नसबंदी पर ज्यादा निर्भर करता है। अध्ययन बताता है कि पुरुष कंडोम समेत परिवार नियोजन के तमाम उपाय के मुकाबले सबसे ज्यादा निर्भरता महिला नसबंदी पर है।

भ्रम के कारण पुरुष नहीं कराते नसबंदी
विशेषज्ञों के मुताबिक समाज के अंदर भ्रामक प्रचार और मानसिकता की वजह से भी पुरुष नसबंदी जोर नहीं पकड़ रही है। समाज के अंदर ऐसी बातें फैला दी गई हैं कि पुरुषों में नसबंदी के बाद उनकी मर्दानगी या काम करने की क्षमता कम हो जाएगी।  प्रोफेसर इम्तियाज अहमद कहते है कि पुरुषों में नसबंदी का प्रस्ताव बहुत संवेदनशील है। इसे जल्दबाजी में लागू करना खतरनाक हो सकता है। लिहाजा, ऐसा कदम उठाने से पहले समाज में जागरूकता फैलाना बहुत जरूरी है।

 

अनूठी पहल से सुर्खियां बन गया किसान के बेटे की शादी का कार्ड

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अपनी ‘शादी’ को यादगार बनाने के लिए ‘आसमान में वर माला डालना’, ‘हेलीकॉप्टर से दूल्हे का पहुंचना’ और ‘एयर बैलून’ में विवाह रचाने जैसी खबरें आपने जरूर पढ़ी होंगी लेकिन मिश्रिख के एक किसान ने अपने बेटे की शादी के कार्ड पर बेहद अनूठा ‘स्लोगन’ छपवाकर लोगों की सुर्खियां बटोरीं हैं।

समाज को नई सीख देने वाले इस किसान के बेटे की शादी 23 जून को है। सुर्खियां बटोर रहे शादी के कार्ड पर लाल घेरे में ‘शराब पीकर बारात में आना सख्त मना है’ का संदेश लिखवाया गया है। शादी-पार्टियों में शराब के चलन पर आधुनिकता का परदा डाल इसे आज के नए जमाने का फैशन मानने वालों को यह कार्ड ‘आइना’ दिखा रहा है। मिश्रिख के बलियापुर गांव में रहने वाले किसान कैलाश प्रसाद के बेटे अश्विनी का इसी माह 19 जून को तिलक है। 23 जून को शादी है। इस शादी के कार्ड जब कैलाश के सगे-संबंधियों तक पहुंचे तो यह कार्ड सुर्खियां बन गया। कार्ड पर सबसे ऊपर शराब पीकर बारात में न आने का अनुरोध छपवाया गया है। ज्यादातर लोग इस अनूठी ‘पहल’ की सराहना कर रहे हैं।

शादी-पार्टी में शराब की वजह से अक्सर होता है बवाल

कैलाश कहते हैं, कि शादी-पार्टी में शराब पीने की वजह से अक्सर नशे में बवाल होता है। जिससे वर-वधू पक्ष नाहक परेशान तो होते ही हैं, शादी का सारा उल्लास खत्म हो जाता है। नशा एक सामाजिक बुराई है। कैलाश का मानना है, कि शादी से दो जिंदगियों का नया जीवन शुरू होता है। शुरुआत किसी भी काम की हो उसमें किसी भी तरह की बुराई शामिल नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि नशे के दुष्परिणामों को देखते हुए शादी के कार्ड पर यह संदेश छपवाने का विचार आया। समाज में विरोध के डर से एक बारगी तो ऐसा न करने का सोच लिया, फिर ख्याल आया किसी भी अनहोनी को टालने के लिए यह कदम उठाना बेहद जरूरी है। हालांकि लोग कैलाश के इस सामाजिक संदेश को काफी पसंद कर रहे हैं। कैलाश समाज के लिए एक मिसाल बन गए हैं।

कुछ रिश्तेदार नाराज भी हुए

कैलाश कहते हैं, कि शादी के कार्ड पर शराब पीकर न आने की बात छपी देख कुछ रिश्तेदार नाराज भी हुए। कॉल कर इसका विरोध दर्ज कराया। कुछ ने तो शादी में शरीक न होने तक की बात कह डाली लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं है।

कुछ अनोखा करने में माहिर
अनोखी पहल से सुर्खियों में आने वाली जिले की यह पहली शादी नहीं है। इससे पहले भी सीतापुरियों ने कुछ अलग करने की धुन में एक शादी को चर्चित किया है। दरअसल, मार्च 2015 में जिले के कमलापुर में एक शादी के दौरान दूल्हा-दुल्हन को ‘तोहफे’ में अरहर की ‘दाल’ दी गई थी। उस समय महंगाई के सारे रिकार्ड तोड़ने वाली अरहर की दाल 200 रुपये प्रतिकिलो में बिक रही थी। शादी के तोहफे में दाल दिया जाना खूब सुर्खियों में रहा था।

स्वच्छता अपनाने की अपील भी…
शादी के कार्ड पर साफ-सफाई रखने की अपील भी की गई है। कैलाश बताते हैं, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर स्वच्छ भारत और एक कदम स्वच्छता की ओर लोगो भी छपवाया है। ताकि शादी-विवाह में अक्सर दोना-पत्तल से होने वाली गंदगी को रोकने में मदद मिले।

पिता ऐसे, जिन्‍होंने बेटियों के लिए बदली दुनिया

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मां बच्चों को गर्भ में पालती है और पिता अपने दिमाग में… दंगल फिल्‍म का यह डॉयलॉग तो आपको याद ही होगा। वास्‍तविकता में यह बात बिल्‍कुल सही है, क्योंकि बच्चें के पैदा होने से लेकर बड़े होने तक पिता हर सुख ​सुविधा का इंतजाम करने में व्‍यस्‍त रहते हैं। आज फादर्स डे के मौके पर हम कुछ ऐसे पिता की दास्‍तां बता रहे हैं जिन्होंने अपनी बेटियों के हक और प्रतिष्‍ठा के लिए समाज के खिलाफ खड़े होकर आवाज उठाई। जिन्‍होंने अपने बेटियों की समानता के लिए जंग लड़ी तो किसी ने अपनी बेटी के सपने पूरा करने के लिए समाज की हर बनाई दीवार तोड़ दी। इनकी इस परवरिश के चलते उन्हें ‘फेमिनिस्ट फादर्स’ कहा जाने लगा है। आइए इस फादर्स डे पर हम आपको दुनिया के फेमिनिस्‍ट फादर से मिलवाते हैं, जिन्‍होंने अपनी बेटियों की दुनिया संवारने के लिए दुनिया ही बदल दी।

खतना रोकने के लिए बनाया अनकट गर्ल्सग्रुप

खतना या सुन्नत एक तरह कि शारीरिक शल्यक्रिया है जिसमें आमतौर पर मुसलमान नवजात लड़के और लड़कियों के लिंग के ऊपर की चमड़ी काटकर अलग की जाती है। लड़कियों के केस में खतना में योनि के एक हिस्से क्लाइटॉरिस को निकाल दिया जाता है। या फिर कुछ जगहों पर क्लाइटॉरिस और योनि की अंदरूनी त्वचा को भी आंशिक रूप से हटा दिया जाता है। ऐसे में इथोपिया के 38 वर्षीय केबिबी के इस खतने के खिलाफ थे। और वह नहीं चाहते थे कि उनकी 9 साल कि बेटी का खतना हो। इसलिए उन्होंने बेटी कि शिक्षा पर जोर दिया और स्कूल स्टूडेट्स संग मिलकर इस दर्दनाक प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रेरित किया। लोगों को जागरुक करने के लिए उन्होंने अपने स्कूल में ‘अनकट गर्ल्स’ नामक ग्रुप बनाया है, जिसके तहत वह इस प्रथा के विरोध में काम करते है। लोगों में एफजीएम (फीमेल जेंटल मुटीलेशन) के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए केबिबि बच्चों के साथ मिलकर रैली निकालते है और संदेश देते है। उनके इन्हीं प्रयासों के चलते उनके इस फाउंडेशन से शहर के कुछ और लड़के भी जुड़ चुके है।

सपनो को पूरे करने लिए दिए पंख

गुटामेला के अलविरों को जब पता चला कि उसकी 11साल कि बेटी नेदीलिन, आम बच्चों कि तरह चलने में असमर्थ है, तब उन्होंने परेशान होने के बजाएं बच्ची के लिए कुछ करने कि ठानी। अपनी इस लगन के चलते ही अलविरों ने नेदीलिन के लिए स्पेशल ऐसे जूते बनाएं, जिनकी मदद से वह आज आराम से चल फिर सकती है। आज नेदीलिन अपने हमउम्र के बच्चों के साथ आराम से स्कूल जा सकती है। अलविरों खुश है कि आज उनकी बच्ची स्कूल जा रही है और पढ़ाई पूरी कर वह अपने कदमों पर खड़ी हो सकती है।

ईको फ्रैंडली सेनेटरी पेड

मासिक धर्म कि प्रक्रिया से हर लड़की हो हर महीनें गुजरना होता है। ऐसे में युगांडा के विलियम ने अपनी 11 साल कि बेटी एंजी के पहले मासिक धर्म पर न सिर्फ उसका विश्वास बढ़ाया बल्कि उसके लिए ईको सैनेटरी पैड्स बनाएं। हालांकि यह स्थिति विलियम और एंजी दोनों के लिए असहज थी। मासिक धर्म के दौरान एंजी को स्‍कूल जाने में बहुत समस्‍या होती थी और महंगे डिस्‍पोजल सेनेटरी पैड खरीदना बहुत मुश्किल काम था।हालांकि युगांडा में लड़कियां इस बारे में अपने पिता से खुलकर इस बारे में बात करने में झिझक करने में क्योंकि एंजी अपने पिता से लड़की होने के नाते अपने पिता से यह बातें साझा नहीं कर सकती थी। और विलियम एक पुरुष होने के नाते इस स्थिति को समझते हुए विलियम ने एंजी जैसी बच्चियों के लिए आगे बढ़कर ईको सैनेटरी पैड्स उपलब्ध करवाना शुरू कर दिया।

बाल विवाह का विरोध

बांग्लादेश के नाजीर और शारीन का बाल विवाह हुआ, जिसके चलते उन्हें अपनी स्कूलिंग बीच में ही छोड़ने पड़ी। तभी से दोनों ने यह तय कर लिया था, कि वह अपने बच्चों को शिक्षा का पूरा अवसर देंगे। इसलिए जब उनके यहां बेटी टोनी का जन्म हुआ तो उन्होंने तय कर लिया कि वह टोनी को पढ़ा लिखाकर डॉक्टर बनाएंगे। इसलिए नाजीर और शारीन ने मिलकर बाल विवाह के विरूध मुहिम छेड़ी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 720 मिलियन लड़कियों को मजबूरन बाल विवाह करना पड़ता हैं।

बेटी को बनाया सक्षम

 

दिल्ली के सल्म ऐरिया में रहने वाले मजदूर विजय दिन का 350 रुपए कमाते है। ऐसे में बेटी कोमल को पढ़ा लिखाकर सक्षम बनाना एक चुनोती थी। लेकिन विजय ने हार नहीं मानी और उन्होंने एक एनजीओं कि मदद से बेटी को पढ़ाया। कोमल आज पढ़ लिखकर फास्ट फूड रेस्ट्रॉन्ट में काम कर हायर एजुकेशन के लिए फंड जमा कर रही है। साथ ही विजय भी खुश है कि उन्होंने सामाजिक नीतियों से परे सोचकर बेटी में विश्वास जगाया और उसे सक्षम बनाया।

 

पापा जब करते हैं ऐसी बातें, अच्छा लगता है

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फादर्स डे के मौके पर हर कोई अपने अपने पापा को याद कर रहा है। जो घर पर बैठे हैं वो पापा के साथ इस दिन को सेलिब्रेट करने की तैयारी कर रहे हैं और जो उनसे दूर हैं उनकी बातों को याद करके उन्हें मिस कर रहे हैं। इस बार अगर आप भी किसी वजह से अपने पापा से दूर हैं तो हम कुछ इस तरह आपको आपके पापा की याद दिला देते हैं। इस फादर्स डे पर जानें हर पापा के कुछ फेवरेट डायलॉग्स के बारे में जो कभी न कभी वो अपने बच्चों से जरूर बोलते हैं।

डोंट वरी तेरा बाप अभी जिंदा है
जब कभी आप किसी परेशानी में फंस जाते हैं तो आप अपने पापा के मुंह से ये बात अक्सर कहते सुनते होंगे कि डोंट वरी तेरा बाप अभी जिंदा है। तुझे घबराने की कोई जरूरत नहीं हैं।

मेरी बिटिया क्या किसी लड़के से कम है
जब कभी मम्मी ये कहकर किसी काम को करने से मना करती हैं कि तू कोई लड़का थोड़ी है जो ये करेगी तो पापा झट से बोलते हैं कि हमारी बिटिया क्या किसी लड़के से कम हैं और आप शान से पापा के कंधे पर हाथ रख देती हैंं।

मुझे गर्व है अपने बच्चों पर

स्कूल या कॉलेज में अच्छे नंबर लाने पर पापा अक्सर कहते हैं कि मुझे अपने बच्चों पर गर्व है। अपने मोबाइल पर हर किसी को आपकी सफलता की कहानी सुनाते हैं और जी खुश हो जाता है। आपकी टॉफी, खिलौने सब आपकी गैरमौजूदगी में उनके पास रहते हैं।

मेरे बच्चें मेरा गुरूर हैं
मम्मी जब छोटी-छोटी बातों के लिए डांटकर शिकायत की गठरी पापा को थमाती है तो पापा हमेशा यही कहते हैं कि मेरे बच्चें मेरा गुरूर हैं वो कोई गलत काम नहीं कर सकते जिसकी वजह से हमारा सिर लोगों के सामने नीचे हो।