Friday, April 3, 2026
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नासा ने खोजा आठ ग्रहों वाला सौरमंडल

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने महत्वपूर्ण खोज की है। एजेंसी ने पहली बार हमारे सौरमंडल की तरह ही आठ ग्रहों वाला नया सोलर सिस्टम ढूंढ़ने का दावा किया है। नासा ने गुरुवार को इसकी घोषणा करते हुए बताया कि केप्लर टेलीस्कोप की मदद से सुदूर अंतरिक्ष में आठ ग्रहों वाला नया सौरमंडल ढूंढ़ा गया है। अमेरिकी सामाचारपत्र इंडीपेंडेंट ने यह जानकारी दी है। अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में यह महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। प्रारंभिक आकलन में यह मनुष्यों के रहने योग्य नहीं है।

नासा वैज्ञानिकों ने केप्लर टेलीस्कोप से भेजे गए आंकड़ों का विश्लेषण करने में गूगल की आर्टीफिशियल तकनीक की मदद लेने की बात कही है। केप्लर टेलीस्कोप सूर्य सरीखे स्टार और उसके सौरमंडल के बारे में पहले ही पता लगा चुका था। लेकिन, अब नए ग्रहों की मौजूदगी का पता चला है। ऐसे में नए सौरमंडल में कुल आठ ग्रह हो गए हैं। हमारे सौरमंडल को छोड़ कर अंतरिक्ष में आठ ग्रहों वाला यह पहला सोलर सिस्टम है। नासा ने बताया कि एआई की मदद से केप्लर द्वारा मुहैया डाटा का नए तरीके से विश्वलेषण संभव हो सका है। नए सौरमंडल में केप्लर-90आई सबसे छोटा ग्रह है। यह नया ग्रह पृथ्वी की तुलना में 30 प्रतिशत ज्यादा बड़ा है। टेक्सास यूनिवर्सिटी (ऑस्टिन) के एस्ट्रोनॉमर एंड्रयू वांडरबर्ग ने बताया कि नया ग्रह पृथ्वी से बड़ा जरूर है, लेकिन वहां कोई जाना नहीं चाहेगा। हालांकि, इसकी मदद से अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में और जानकारी जुटाने की उम्मीद जताई जा रही है।

केप्लर टेलीस्कोप को वर्ष 2009 में अंतरिक्ष में स्थापित किया गया था। तब से यह पृथ्वी स्थित नियंत्रण कक्ष को डाटा भेज रहा है। इसकी मदद से हमारे सौरमंडल के बाहर कई सोलर सिस्टम का पता लगाया जा चुका है। केप्लर टेलीस्कोप अब तक 4,034 ग्रह या उसके समान आकाशीय पिंडों का पता लगा चुका है। इनमें से 2,335 की बाहरी ग्रह के तौर पर पुष्टि की जा चुकी है। इनमें से 30 पृथ्वी के आकार के हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों ने प्याज के छिलके से बनाई बिजली

दुनिया के कई देश कृषि के कचरे से बिजली का उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय इससे कहां पीछे रहने वाले। जी हां, आईआईटी खड़गपुर के विज्ञानियों ने प्याज के छिलके से बिजली बनाने वाली एक सस्ती डिवाइस का इजाद किया है। यह डिवाइस शरीर के मूवमेंट से ग्रीन बिजली उत्पन्न कर सकती है। इस बिजली का इस्तेमाल पेसमेकर, स्मार्ट गोलियां और पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों में किया जा सकता है।पश्चिम बंगाल स्थित आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर भानू भूषण खातुआ ने कहा कि गैर-विषाक्त, बायोडिग्रेडेबल और बायोकॉम्पसिबेटेड डिवाइस प्याज के छिलकों से उपयुक्त पाइजेइलेक्ट्रिक गुणों का फायदा उठाते हैं।

पाइजेइलेक्ट्रिक सामग्री में रोजमर्रा के यांत्रिक ऊर्जा को बिजली में बदलने की क्षमता होती है। विज्ञानियों ने अपने नए शोध में सस्ते दर पर बिजली उत्पादन करने में सफलता पाई है। एक आम व्यक्ति इस डिवाइस की मदद से प्याज के छिलकों से काफी किफायती बिजली का उत्पादन कर सकता है।

तीन बहनों ने खोला महानगर में निःशुल्क पुस्तकालय

अक्सर हम सुनते हैं कि किताबों की दुनिया से बच्चे दूर भाग रहे हैं। सोशल मीडिया, टीवी और फिल्मों की मनमोहक दुनिया में कैद बच्चे को अक्षरों की दुनिया नहीं लुभाती, ये भी हम देख रहे हैं। ऐसे में दो बच्चियाँ पुस्तकालय खोलने के बारे में सोचें और खोलकर दिखा भी दें। यह हैरत में डालने वाली सुखद उम्मीद है। महानगर में सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में पढ़ने वाली दो बहनों 12 साल की मनस्वी और 9 साल की सुहासिनी दूगड़ ने निःशुल्क पुस्तकालय खोला है और किताबों की शौकीन और अपनी बहनों में पढ़ने की आदत डालने वाली बड़ी बहन यशस्वी ने इस पुस्तकालय को संवारने और इंटीरियर और डिजिटल कार्यों का जिम्मा सम्भाला। तीनों बहनें ब्रिटिश काउंसिल में जाती रही हैं, वहाँ की लाइब्रेरी में पढ़ती भी रही हैं।

मनस्वी बताती है कि वह जब भी लाइब्रेरी जाती, उसे महसूस होता कि बहुत से बच्चों को पढ़ने का मौका नहीं मिल पाता। वह कहती है कि पढ़ना एक अच्छी आदत है और सबको किताबें पढ़नी चाहिए। मनस्वी की माँ शीतल कहती हैं कि ये मनस्वी की इच्छा थी और इन बहनों के आग्रह को देखकर शीतल और उनके पति ने पुस्तकालय खोलने में मदद दी। तीनों बहनों के पापा के दफ्तर का एक अतिरिक्त कमरा पुस्तकालय में बदला गया। किताबें रखने के लिए आलमारी लायी गयी और साहित्यकारों की तस्वीरों से उसको सजाया गया। अब रीडर्स प्लानेट पुस्तकालय बनकर तैयार है और इसमें 15 साल तक संचित किया गया किताबों का खजाना शामिल है। पुस्तकालय में 1 हजार किताबें हैं। बालीगंज फांड़ी के डोवर रोड स्थित इस 300 वर्ग फीट जगह में स्थित इस रीडर्स प्लानेट में विज्ञान, इतिहास, भूगोल, सामान्य ज्ञान, नैतिक शिक्षा और अँग्रेजी की किताबें भी शामिल हैं। वैसे तो यह पुस्तकालय सभी के लिए है मगर जरूरतमंद बच्चों खासकर 5 से 5 साल की उम्र के बच्चों को विशेष रूप से ध्यान में रखा गया है। पुस्तकालय में इन किताबों में पढ़ने के शौकीन मगर किताबों से वंचित हर बच्चे के लिए यह पुस्तकालय किसी वरदान से कम नहीं है। मनस्वी को इनसाइक्लोपीडिया पढ़ने में दिलचस्पी है जबकि खेलों की शौकीन सुहासिनी को फैंटेसी पढ़ना अच्छा लगता है। यशस्वी को हमेशा से पढ़ने का शौक रहा है और उसके निजी पुस्तकालय में 150 से ऊपर किताबें हैं। सिडनी में मार्केटिंग और फाइनेंस की पढ़ाई कर रही यशस्वी बताती है कि यहाँ पर बच्चों के लिए स्टोरी टेलिंग और लेखन पर कार्यशालाएँ भी आयोजित होंगी और वह खुद भी इस तरह की कार्यशालाएँ आयोजित करेगी। माँ शीतल दूगड़ को हिन्दी पसन्द है इसलिए हिन्दी किताबों का एक अलग सेक्शन है? रीडर्स प्लानेट सोमवार से शनिवार तक सुबह 11 से शाम 7 बजे तक खुला  रहेगा।

विराट का वर्चस्व, मिताली ने भी खुद को स्थापित किया

प्रतिद्वंद्वी टीमों को लगातार रौंदने से विराट कोहली की महानता में इस वर्ष तेजी से बढ़ोतरी हुई जबकि भारतीय महिला टीम को भी अपने शानदार विश्व कप अभियान की बदौलत अंतत: ‘क्रिकेट को लेकर जुनूनी’ देश से प्यार और सम्मान मिला।

‘किंग कोहली’ लगातार नौ सीरीज जीतने के बाद अब अगले 18 महीनों में मिलने वाली चुनौती के लिये तैयार हैं जबकि पिछले छह महीनों में मिताली राज महिला क्रिकेट टीम की कप्तान से अब एक ब्रांड बन गयी हैं।

भारतीय महिला टीम भले ही मेजबान इंग्लैंड से विश्व कप के रोमांचक फाइनल में हार गयी हों, लेकिन इस प्रदर्शन की बदौलत उन्हें देश में लोगों का प्यार और वित्तीय प्रोत्साहन मिला जिससे महिला टीम देश में सुर्खिंयों में रहीं। यह पहली बार है जब देश में महिला क्रिकेट को इतनी गम्भीरता से लिया गया और आज महिला खिलाड़ियों को हर जगह देखा जाने लगा है जिसका श्रेय मिताली की लाजवाब कप्तानी को जाता है।

वहीं प्रतिद्वंद्वी टीमों के लिये भारतीय पुरूष टीम के बेहतरीन सफर को रोकना नामुमकिन रहा।

हालांकि भारतीय टीम ने अपने ज्यादातर मैच घरेलू मैदान पर ही खेले लेकिन लगातार नौंवी टेस्ट सीरीज जीतना और लगातार आठ वनडे सीरीज अपने नाम करना कोई उपलब्धि से कम नहीं।

कोहली और उनकी टीम को हालांकि कुछ मौकों पर परीक्षा से भी गुजरना पड़ा जैसे आस्ट्रेलिया के खिलाफ पुणे टेस्ट में मिली हार या ईडन गार्डंस में श्रीलंका के खिलाफ तेज गेंदबाजों के मुफीद पिच पर पहली पारी में सिमटना मुश्किल मौके रहे। लेकिन ऐसा एकाध बार ही हुआ।

इस इतने शानदार वर्ष में सबसे निराशाजनक प्रदर्शन चैम्पियंस ट्राफी का फाइनल रहा जिसमें उसे पाकिस्तान से हार का मुंह देखना पड़ा जबकि भारतीय टीम इसमें गत चैम्पियन के तौर पर खेल रही थी।

लेकिन इस हार के बाद जो विवाद भारतीय टीम से जुड़ा, वह भारतीय क्रिकेट इतिहास के भुलाने वाले अध्याय में शामिल हो गया। कोहली और कोच अनिल कुंबले के बीच बढ़ता विवाद खुले में आ गया जिसके बाद कुंबले को एक साल के सफल कार्यकाल के बाद इस्तीफा देने के लिये बाध्य होना पड़ा।

इस पूरे प्रकरण से हालांकि इस बार की फिर से पुष्टि हो गयी कि भारतीय टीम में केवल एक ही ‘बॉस’ है और वो कप्तान है।

हालांकि कोहली-कुंबले ब्रेक-अप से टीम के मैदानी प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ा और थोड़े ही समय में यह सामान्य हो गया तथा ड्रेसिंग रूम में पसंदीदा रवि शास्त्री ने इस महान स्पिनर की जगह वापसी की।

मैदान के बाहर उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति ने चार लोगों के साथ बीसीसीआई का काम शुरू किया लेकिन बाद में लोगों की संख्या घटकर दो हो गयी। रामचंद्र गुहा ने सीओए के काम करने के तरीके पर कड़वाहट भरा पत्र लिखकर असंतुष्टि व्यक्त करते हुए इस पद से इस्तीफा दे दिया।

मैदान में कप्तान के प्रदर्शन पर जरा भी असर नहीं पड़ा और उनका रनों का अंबार लगाना जारी रहा, जिसमें उन्होंने टेस्ट और वनडे में 11 शतक जुटाये जिसमें पांच दिवसीय प्रारूप में तीन दोहरे शतक शामिल थे।

रोहित शर्मा का भी चोट के बाद वर्ष शानदार रहा, उन्होंने सत्र में वनडे में तीसरा दोहरा शतक जड़ने के अलावा श्रीलंका के खिलाफ टी20 सीरीज के दौरान सबसे तेज शतक भी जड़ा।

25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है क्रिसमस

25 दिसंबर को हर साल क्रिसमस डे के रुप में मनाया जाता है। इस साल भी ढेर सारी खुशियों और सेलिब्रेशन को लेकर क्रिसमस का त्योहार आ गया है। ईसाई समुदाय की मान्यता के अनुसार क्रिसमस से रौशनी का आरंभ होता है। इस दिन को यीशू मसीह के जन्मदिवस के रुप में मनाया जाता है। इस उत्सव पर अपने प्रियजनों को गिफ्ट्स देना, चर्च में आयोजन और सजावट करना शामिल होता है। क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि 24 दिसंबर की शाम को ही इस पर्व का उल्लास अपने चरम पर पहुंच जाता है। इसी के साथ इस दिन पेड़ सजाने की परंपरा है और गिफ्ट्स, लाइट आदि से सजे हुए पेड़ को क्रिसमस ट्री के नाम से जाना जाता है।

25 दिसंबर को ईसाई समुदाय के लोग यीशू मसीह के जन्मदिवस के रुप में मनाते हैं। मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि इस दिन ईसा मसीह का का जन्म नहीं हुआ था। चौथी शताब्दी से पहले ईसाई समुदाय इस दिन को त्योहार के रुप में नहीं मनाते थे, लेकिन चौथी शताब्दी के बाद इस दिन ईसाईयों का प्रमुख त्योहार मनाया जाने लगा। माना जाता है कि यूरोप में गैर ईसाई समुदाय के लोग सूर्य के उत्तरायण के मौके पर त्योहार मनाते थे। इस दिन सूर्य के लंबी यात्रा से लौट कर आने की खुशी मनाई जाती है, इसी कारण से इसे बड़ा दिन भी कहा जाता है। इस दिन की प्रमुखता देखते हुए ही ईसाई समुदाय ने इस दिन को ईशू के जन्मदिन के रुप में चुना। क्रिसमस से पहले ईस्टर का पर्व ईसाई समुदाय का प्रमुख त्योहार माना जाता था।

क्रिसमस का त्योहार पूरे विश्व में लोग धूमधाम से मनाते हैं। ईसाई समुदाय के साथ गैर ईसाई समुदाय के लोग भी इस दिन इकठ्ठे होते हैं और एक दूसरे को गिफ्ट्स देते हैं। भारत में पाइन के पेड़ों की जगह लोग आम और केले के पेड़ों को भी सजाया जाता है। बच्चे इस दिन गिफ्ट्स पाने के लिए बहुत ही उत्सुक रहते हैं। क्रिसमस के दिन बच्चों में सांता क्लॉज को लेकर उत्सुकता रहती है। सांता निकोलस को सांता क्लॉज के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म ईसा मसीह की मृत्यु के लगभग 280 साल बाद मायरा नामक जगह पर हुआ था। उन्हें लोगों की मदद करना और सेवा करना बेहद पसंद था, वो यीशू के कदमों पर चलते थे। इसी कारण वो यीशू के जन्मदिन पर रात के अंधेरे में बच्चों को गिफ्ट दिया करते थे।

नए साल में सुखी और सफल रहे जीवन, लें कुछ ऐसे संकल्प

नए साल 2018 में प्रवेश हम कर चुके हैं। हममें से अधिकतर लोग ऐसे भी होंगे जो कि  यह संकल्प लेंगे कि जो उन्होने बीते वर्ष में गलतियां की या कुछ भी गलत किया हो, वैसा इस आने वाले साल में न करें। माना जाता है नए साल का संकल्प हम सभी अपनी किसी खामी को दूर करने के लिए लेते हैं। कोई जिम में वर्कआउट करने का संकल्प लेता है तो कोई सिगरेट छोड़ने का। कोई अपनी पढ़ाई अच्छे से करने का संकल्प लेता है तो कोई अपने शौक पूरे करने का संकल्प लेता है।

ऐसे ही संकल्पों की लंबी फेहरिस्त है। आपको अपना कोई संकल्प चुनने में कोई परेशानी हो रही है तो आप इनमें से कोई चुन सकते हैं। तो चलिए देखते हैं 2018 में आप क्या संकल्प ले सकते हैं।

 

अनूठा है गंगा सागर, लोकप्रिय गंगा सागर मेला

हिमाच्छादित हिमालय के हिमनद से आरम्भ होकर गंगा नदी, पर्वतों से नीचे उतरती है, और हरिद्वार से मैदानी स्थानों पर पहुँचती है| आगे बढ़ते हुए प्राचीन बनारस व प्रयाग से प्रवाहित होती हुई, बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। बंगाल में हुगली नदी के मुहाने पर जहाँ गंगा सहस्रों जलधाराओं में फूट पड़ती है तथा वहाँ पहुँचकर समुद्र में बह जाती है, उस स्थान को  सागर द्वीप कहा जाता है|

गंगासागर मेला पश्चिम बंगाल में आयोजित होने वाले सबसे बड़े मेलों में से एक है। इस मेले का आयोजन कोलकाता के निकट हुगली नदी के तट पर ठीक उस स्थान पर किया जाता है, जहाँ पर गंगा बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इस द्वीप में ही रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। यहां मैन्ग्रोव की दलदल, जलमार्ग तथा छोटी छोटी नदियां,नहरें है| इस द्वीप पर ही प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर लाखों हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगता है, जो गंगा नदी के सागर से संगम पर नदी में स्नान करने के इच्छुक होते हैं। इसीलिए इस मेले का नाम गंगासागर मेला है। यह मेला विक्रमी संवत के अनुसार प्रतिवर्ष पौष मास के अन्तिम दिन लगता है। यह मकर संक्रान्ति का दिन होता है|

यहाँ एक मंदिर भी है जो कपिल मुनि के प्राचीन आश्रम स्थल पर बना है।यहाँ लोग कपिल मुनि के मंदिर में पूजा अर्चना भी करते हैं। पुराणों के अनुसार कपिल मुनि के श्राप के कारण ही राजा सगर के ६० हज़ार पुत्रों की इसी स्थान पर तत्काल मृत्यु हो गई थी। उनके मोक्ष के लिए राजा सगर के वंश के राजा भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए थे और गंगा यहीं सागर से मिली थीं। कहा जाता है कि एक बार गंगा सागर में डुबकी लगाने पर 10 अश्वमेध यज्ञ और एक हज़ार गाय दान करने के समान फल मिलता है। जहां गंगासागर का मेला लगता है, वहां से कुछ दूरी पर उत्तर वामनखल स्थान में एक प्राचीन मंदिर है। उसके पास चंदनपीड़िवन में एक जीर्ण मंदिर है और बुड़बुड़ीर तट पर विशालाक्षी का मंदिर है|

गंगासागर में स्नान का महत्व

मकर संक्रांति के दिन किसी भी पवित्र नदी एवं तालाब में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। विशेष तौर पर इस दिन गंगा स्नान का खास महत्व है। इसलिए हर वर्ष गंगा तटों पर खासतौर पर हरिद्वार एवं प्रयाग में मकर संक्रांति के दिन मेला लगता है। लेकिन इससे कोलकाता स्थित गंगासागर का महत्व कमतर नहीं हुआ है। गंगा के सागर में मिलने के स्थान पर स्नान करना अत्यन्त शुभ व पवित्र माना जाता है। स्नान यदि विशेष रूप से मकर संक्रान्ति के दिन किया जाए, तो उसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है।

मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस अवसर पर यह स्थान बड़े मेले का केन्द्र बन जाता है। यहाँ पर यात्री व सन्न्यासी पूरे देश से आते हैं। गंगा में स्नान कर ये लोग सूर्य देव को अर्ध्य देते हैं। मान्यतानुसार यह स्नान उन्हें पुण्य दान करता है। अच्छी फ़सल प्रदान करने के लिए धन्यवाद स्वरूप सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है। इस त्यौहार पर तिल व तेल का विशेष महत्व है, इसलिए लोग इस दिन चावल का ही विशेष भोजन करते हैं| शास्त्रों में कहा गया है कि मकर संक्रांति के दिन गंगासागर में स्नान और दान का जो महत्व है वह कहीं अन्यत्र नहीं है। इसलिए कहा जाता है “सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार”। कहने का तात्पर्य यह है कि सभी तीर्थों में कई बार यात्रा का जो पुण्य होता है वह मात्र एक बार गंगा सागर में स्नान और दान करने से प्राप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार गंगा सागर में एक डुबकी लगाने से 10 अश्वमेघ यज्ञ एवं एक हजार गाय दान करने का पुण्य मिलता है|

गंगासागर के संगम पर श्रद्धालु ‘समुद्र देवता’ को नारियल और यज्ञोपवीत भेंट करते हैं। पूजन एवं पिण्डदान के लिए बहुत से पंडागण गाय–बछिया के साथ खड़े रहते हैं, जो उनकी इच्छित पूजा करा देते हैं। समुद्र में पितरों को जल अवश्य अर्पित करना चाहिए तथा स्नान के बाद कपिल मुनि का दर्शन कपिल मन्दिर में करना चाहिए। गंगासागर में स्नान–दान का महत्व शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है| स्थानीय मान्यतानुसार जो युवतियाँ यहाँ पर स्नान करती हैं, उन्हें अपनी इच्छानुसार वर तथा युवकों को स्वेच्छित वधु प्राप्त होती है।अनुष्ठान आदि के पश्चात् सभी लोग कपिल मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं तथा श्रद्धा से उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं। मन्दिर में गंगा देवी, कपिल मुनि तथा भागीरथी की मूर्तियाँ स्थापित हैं|

छह साल बाद मकर संक्रांति पर बन रहा है यह योग

छह साल बाद मकर संक्रांति  रविवार को आ रही है। इसी दिन सर्वार्थसिद्धि एवं रवि प्रदोष का योग भी बन रहा है। ऐसे में सूर्योपासना करने एवं दान-पुण्य का कई गुना फल मिलेगा।

सूर्य भी उत्तरायण में होगा। संक्रांति पर सर्वार्थसिद्धि योग दिनभर मान्य रहेगा, क्योंकि शनिवार मध्य रात से यह योग शुरू हो जाएगा और दोपहर 1:13 बजे तक रहेगा। सूर्योदय के समय यह योग रहने से दिनभर पूजा-खरीदी भी की जा सकेगी। यह पर्व चूंकि सूर्य की उपासना से जुड़ा है। संयोग से इसी दिन सूर्य का दिन रविवार भी है। ऐसे में यह पर्व खास हो जाएगा। प्रदोष होने से रवि प्रदोष का भी संयोग बनेगा।

पं. अक्षय शास्त्री के अनुसार इससे पहले 2012 में भी रविवार को ही मकर संक्रांति आई थी। एक वर्ष में सूर्य क्रम से  राशि में भ्रमण करते हैं। इस तरह 12 वर्ष में 12 राशियों का भ्रमण करते हैं। राशि बदलने की प्रक्रिया को ही संक्रांति कहा जाता है। सूर्य अभी धनु राशि में हैं। आगे धनु से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे तो यह मकर संक्रांति कहलाएगी। यह परिवर्तन 14 जनवरी को होगा, इसलिए इस दिन पर्व मनाया जाएगा।

कोई एक रिश्ता सारे रिश्तों की जगह नहीं ले सकता

जिन्दगी में अच्छे दोस्तों की जरूरत सबको पड़ती है फिर भले ही आप सिंगल हों या मिंगल। दोस्त होते भी हैं मगर आमतौर पर उनका साथ शादी के बाद कम हो जाता है और अगर दोस्ती महिलाओं और पुरुषों के बीच हुई तो खत्म ही हो जाती है। यकीन नहीं होता मगर एक अजनबीपन रिश्ते में तो आ ही जाता है क्योंकि अपने जीवनसाथी के सामने किसी महिला या पुरुष दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर, या धौल मारकर आप खिलखिला नहीं सकते और न ही उसकी खिंचाई कर सकते हैं। सच तो यह है कि हम चाहते ही नहीं हैं कि हमारा जीवनसाथी हमारे दोस्तों के करीब हो या हमारी जिन्दगी के उन अनछुए पहलुओं को जाने जो हम छिपाकर रखना चाहते हैं। एक बात तो तय है कि शादी के बाद आपकी प्राथमिकता बदल जाती है क्योंकि सहेलियों या दोस्तों के साथ रहते हुए भी आप उनके साथ नहीं होते। आपकी जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं। सच तो यह है कि दोस्ती और प्यार या फिर शादी में लोग अपनी शादी बचाते हैं या फिर प्यार बचाते हैं। ये लड़कियों के साथ भी होता है और लड़कों के साथ भी होता है। जिन्दगी का एक लम्बा अरसा किसी शख्स के साथ गुजारने के बाद आप एक शख्स को इसलिए धोखा देने और छोड़ने पर मजबूर होते हैं क्योंकि आपका जीवनसाथी या परिवार उसे पसन्द नहीं करता और आप दोनों पर शक किया जाता है। हमारे समाज का ढांचा ही विचित्र है जो स्मार्ट फोन चलाता है मगर अपनी सोच को अपडेट करने की जरूरत नहीं समझता। इसके बाद जिन्दगी भर या तो खुदगर्ज होकर जीने पर मजबूर होते हैं या फिर अपराधबोध के साथ घुटते रहते हैं क्योंकि आपकी स्थिति ऐसी हो जाती है कि आप सैंडविच बन चुके होते हैं और अनायास ही आप अपने दोस्त को खो चुके होते हैं जो आपके हर अच्छे – बुरे वक्त में आपके साथ रहा, आपके दुःख में रोया और आपकी सफलता पर नाचा…जिसके कँधे पर सिर रखकर आप रोये..आप जानते हैं कि यह आपकी निजी क्षति है और आप इसकी भरपाई कभी नहीं कर सकेंगे और न ही आपका जीवनसाथी कर सकेगा।

लव यू जिन्दगी में एक संवाद है….हम अपने एक रोमांटिक रिश्ते पर सारे रिश्तों का बोझ डाल देते हैं और उसी से सारी अपेक्षायें रखते हैं मगर ये नहीं समझ पाते कि ऐसा नहीं हो सकता। जब ये उम्मीदें पूरी नहीं होतीं तो विश्वास दरकने में समय नहीं लगता और जब आपका त्याग कुंठा में बदलता जाता है। आप न चाहते हुए भी अपने साथी को दोषी मानते हैं और आपकी तल्खी आपके व्यवहार में दिखती है। आप चाहे किसी एक को चुनें या किसी एक को छोड़ें, वह क्षति तो आपकी ही है। जिन्दगी में हर रिश्ते की अपनी एक जगह है और एक रिश्ता दूसरे रिश्ते की कमी पूरी नहीं कर सकता। अगर दोस्त आपके जीवनसाथी नहीं बन सकते तो आपका जीवनसाथी हर बार आपका अच्छा दोस्त साबित हो या आपका हमराज बन जाये, यह जरूरी नहीं है। बेहतर हो कि दोस्ती का दायरा भी ऐसा ही विस्तृत हो और आपका साथी उसका हिस्सा बने। आप भी अपने साथी को उसका स्पेस दें और उसके पुराने दोस्तों से मिलवायें या खुद दोस्ती करें…मुश्किल है..मगर नामुमकिन नहीं है।

अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों होता है.कि शादी के बाद आप बदलते हैं या आपकी प्राथमिकतायें बदलती हैं। खुद से सवाल कीजिये कि क्या आपने कभी अपनी पत्नी या अपने पति को उसका स्पेस दिया है या उसके दोस्तों के बीच में आये हैं? ..जरा अपनी आदतों और बातचीत के तरीके पर गौर फरमाइये…अधिकतर लड़के या लड़कियों की शब्दावली अपने जीवनसाथी को लेकर कुछ ऐसी होती है कि मैं रखूँगा..मैं करवाऊंगा….मेरा होगा…मेरी पसन्अद चलेगी। अच्छा लगता है यह सुनने में मगर आपके ये शब्द अनायास ही वह स्पेस छीन रहे हैं कि जो कि उसका है। शादी के बाद क्या किसी का व्यक्तित्व खत्म हो जाना चाहिए…? लड़कों की बात करें तो यह सोच ही क्यों रहे कि उसके फैसले आप लेंगे और यही बात लड़कियों पर भी लागू होती है। कई लोग अपने साथी का सोशल प्रोफाइल से लेकर मोबाइल तक चेक करते हैं तो कुछ ऐसे होते हैं कि चाहते ही नहीं कि उसकी पत्नी फेसबुक या व्हाट्सऐप इस्तेमाल करे। अगर वह इस्तेमाल करती या करता है तो उसके दोस्तों पर नजर रखते हैं और अगर लड़कों या लड़कियों की संख्या ज्यादा हुई तो कई बार अकाउंट बंद करवा देते हैं। उस पर दोहरापन ये कि खुद लड़कियों से दोस्ती करेंगे तो ऐसी स्थिति में घर में अगर झगड़े नहीं होंगे तो क्या होगा? दूसरी ओर लड़कियाँ ऐसी होती हैं कि हर आधे घंटे पर फोन बजाकर पति की जासूसी करती हैं….या फिर उन पर नजर रखती हैं। कई लड़कियाँ ऐसी भी हैं जो इस हद तक शक्की होती हैं कि पति के दफ्तर में जाकर उसकी सहकर्मी से लड़ बैठती हैं। अब सवाल यह है कि क्या आप ऐसा करके अपनी गरिमा नहीं गिरा रहीं और क्या आपका यह कदम आपके पति को आपसे क्या दूर नहीं करेगा क्या उसकी सहानुभूति उस सहकर्मी के प्रति नहीं होगी? ये तमाशा आपकी समस्या का समाधान तो कतई नहीं है, आपको तमाशा जरूर बना देगा। इससे ये होगा कि आपके स्वभाव के कारण अगर कोई रिश्ता न भी हुआ तो बन बैठेगा और फिर आपके पास बचाने के लिए कुछ नहीं बचेगा। बतौर पति अपनी पत्नी को सात परदों में रखने की जगह आप उसके सपनों को पूरा करने में मदद करेंगे तो आपके प्रति विश्वास और गहरा होगा। पजेसिव होना हर बार प्यार नहीं होता बल्कि एक घुटन भर देता है। शादी के बाद पति की दोस्त या सहकर्मी लड़कियों को इसलिए खटकने लगती है क्योंकि पति उस दोस्त की बहुत इज्जत करता है या मानता है या चाहता है। हर चाहत का मतलब सिर्फ दैहिक भूख नहीं होती और न हर बार  प्यार का मतलब रोमांस होता है। कुछ रिश्ते विशुद्ध संवेदनात्मक और भावनात्मक होते हैं और उनका एक ही नाम होता है…इंसानियत….। जो रिश्ता आपकी ढाल बन सकता है, अनजाने में आप उसे कटार बना देती हैं और वह अंततः आपके पति के सीने से होती हुई आपको ही चीरती है। यह सिर्फ आपकी असुरक्षा के कारण होता है। अगर आप सारे रिश्तों का बोझ और अपेक्षायें सिर्फ अपने कंधों पर उठाएँगे तो कन्धे टूटेंगे…इन सारी मुश्किलों का एक ही समाधान है कि अपने जीवनसाथी को अपने जीवन के हर मोड़ पर शामिल करिए…स्पष्टवादी बनना एक समय के लिए बुरा होता है मगर आगे चलकर इसके नतीजे अच्छे ही होते हैं। बेहतर है कि आप अपने उस खास दोस्त के बारे में पहले से ही अपने साथी को बताकर रखें…उनसे मिलवायें और उनकी दोस्ती करवायें…। आपके जीवनसाथी का दोस्त आपके लिए वरदान भी बन सकता है क्योंकि ये तो सच है कि वह आपके पति को आपसे ज्यादा समझता या समझती है…आप उसकी मदद से अपने जीवनसाथी को बेहतर समझ सकेंगे जब आप रिश्तों में स्पेस देंगे तो विश्वास का बंधन ही मजबूत होगा और एक नैतिक जिम्मेदारी बनेगी। एक रिश्ता निभाने के लिए दूसरा रिश्ता तोड़ लेना अक्लमंदी का काम नहीं है और न ही इसमें ईमानदारी है…जरूरी है कि आपके साथ इस तरह की स्थिति हो तो आप स्पष्ट तौर पर अपने साथी और अपने दोस्त से खुलकर बात करें और बतायें कि आप दोनों की जगह तय है और एक रिश्ता कभी दूसरे रिश्ते की जगह नहीं ले सकेगा…आपको दोनों चाहिए। लड़कियों के मामले में यह मुश्किल हो सकता है मगर बेहतर यही है कि आपका दोस्त आप दोनों का दोस्त बनें और इसके लिए माहौल बनाना तो आपको ही होगा। सच तो यह है कि आपको यह समझना होगा कि आपकी एक सीमा है और आप अपने साथी उन तमाम रिश्तों की जगह न तो ले सकते हैं और न ही वह कमी पूरी कर सकते हैं जो आपके आने के पहले थी तो फिर ऐसी जिद किस काम की जो पूरी हो ही न सके। इसके साथ ही अगर आप दोस्त हैं तो यह आपको समझना होगा कि शादी के बाद आपके दोस्त की प्राथमिकतायें और जिम्मेदारियाँ बदलनी स्वाभाविक है…आपने दोस्ती निभायी मगर आप अपने दोस्त के पति या पत्नी की जगह नहीं ले सकते और न ही ऐसी कोशिश करनी चाहिए। शर्तें मत लादिये और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहिए और जब लगे कि आप तमाम उलझनों का कारण हैं तो बेहतर है कि अपने कदम आगे बढ़ा लें क्योंकि कई बार हमारे चाहने से चीजें हमारे हिसाब से नहीं ढलतीं। हमें उनके हिसाब से ढलना पड़ता है….अगर आप अपने दोस्त को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा..दोस्ती भी समझने का ही नाम है तो बेहतर है कि समय रहते एक गरिमामय दूरी बनाकर रखी जाए कि ताकि आपके हिस्से की कुछ अच्छी यादें बची रहें…जरा सा संयम और समझदारी हर बिगड़े काम को बना सकती है क्योंकि कोई एक रिश्ता सारे रिश्तों की जगह नहीं ले सकता।

17 साल के राजीव ने बनाया डेंगू से लड़ने वाला ड्रोन

उम्र कोई भी हो, आर्थिक हालात कैसे भी हों, अगर मंशा अच्छी हो और मन में समर्पण हो तो समाज के लिए कुछ बेहतर करने से आपको कोई नहीं रोक सकता है। इस बात को सही साबित करती है, सिलिगुड़ी के राजीव घोष की कहानी है। राजीव की उम्र महज 17 साल है और वह 11वीं कक्षा में पढ़ते हैं। उनकी आर्थिक हालत भी खराब है, लेकिन ऐसे विपरीत हालात में भी राजीव ने डेंगू जैसी बीमारी से लड़ने में मददगार एक ड्रोन बनाया है।

राजीव के पिता, रंजीत घोष 56 वर्ष के हैं और सिलिगुड़ी में चाय की एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। राजीव अपने पिता के काम में हाथ भी बंटाते हैं और साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी करते हैं। इस चुनौती की वजह से राजीव 10वीं कक्षा में अच्छे अंक नहीं ला सके और 11वीं में उन्हें साइंस स्ट्रीम नहीं मिली।

इसके बावजूद भी विज्ञान और तकनीक के लिए राजीव का लगाव बिल्कुल भी कम नहीं हुआ। पिछले साल उनके शहर में डेंगू के खतरे ने काफी आतंक मचा रखा था। इस बात को ध्यान में रखते हुए राजीव एक ऐसा ड्रोन बनाने की जुगत में लग गए, जो मच्छरों के खतरे से लोगों को सुरक्षित रख सके। उन्हें इस ड्रोन को बनाने के लिए 1.5 लाख रुपए की जरूरत थी। उन्होंने यह राशि अपने माता-पिता और पड़ोसियों की मदद से इकट्ठा की। राजीव ने सात महीनों की कड़ी मेहनत के बाद यह ड्रोन तैयार किया।

राजीव ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए बताया, ‘मेरे माता-पिता ने सहमत होने के बाद कुछ पैसा उधार लिया। मेरे कुछ पड़ोसियों ने अपनी ओर से मदद की। मैंने इस ड्रोन को बनाने में 1.5 लाख रुपए खर्च किए।’ राजीव ने इकट्ठा किए हुए पैसों की मदद से चीन और अमेरिका से, तकनीकी रूप से अडवांस उपकरण मंगवाए।

क्या है ड्रोन की खासियत

राजीव ने अपने इस खास ड्रोन में एक हाई रेजॉलूशन का कैमरा लगाया है। इस कैमरे की मदद से डेंगू फैलाने वाले मच्छर के लारवा को ट्रैक किया जा सकता है। यह ड्रोन 1.8 किमी. की ऊंचाई तक जा सकता है, लेकिन सुरक्षा कारणों की वजह से इसकी क्षमता को 200 मीटर तक ही सीमित रखा गया है। इतनी ऊंचाई पर कैमरे की मदद से राजीव का ड्रोन यह पता लगा सकता है कि कहां-कहां पानी का जमाव है और वहां पर डेंगू के मच्छर होने की संभावना है।

अपने ड्रोन का 6 महीने तक परीक्षण करने के बाद राजीव ने सिलिगुड़ी के मेयर अशोक भट्टाचार्य को अपना प्रयोग दिखाया, जिसे देखकर वह काफी आश्चर्यचकित हुए। अशोक ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब राजीव ने उन्हें ड्रोन के फंक्शन के बारे में बताया तो वह राजीव के हुनर के कायल हो गए। मेयर ने बताया कि नगर निगम ने तय किया है कि राजीव के ड्रोन को इस्तेमाल में लाया जाएगा और राजीव को जरूरत की सारी चीजें मुहैया कराई जाएंगी।

सिलिगुड़ी नगर निगम ड्रोन के साथ कुछ प्रयोग करने की योजना बना रहा है और उनकी प्राथमिकता है कि जल्द-जल्द से इसकी मदद से इलाके में काम शुरू किया जाए। राजीव चाहते हैं कि भविष्य में वह अपने ड्रोन में और भी बेहतर रेजॉलूशन का कैमरा इस्तेमाल करें। नगर निगम का सहयोग मिलने के बाद राजीव जल्द ही एक और ड्रोन बनाना चाहते हैं। ड्रोन के जरिए डेंगू के खतरे से बचने की यह तरीका कोलकाता में पहले से इस्तेमाल हो रहा है। कोलकाता में साउथ सिटी मॉल के आस-पास के इलाके में ड्रोन्स को इस काम के लिए तैनात किया गया है।