Wednesday, April 1, 2026
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परिवार और समाज के खिलाफ जाकर कराई विधवा मां की शादी

समय बदल रहा है और इस बात तस्दीक करती है यह घटना। जयपुर की एक लड़की जिसने परिवार और समाज के खिलाफ जाकर अपने विधवा मां की शादी करवाई।

संहिता अग्रवाल जयपुर की रहने वाली हैं। साल 2016 में इनके पिता मुकेश गुप्ता की दिल का दौरा पड़ने के कारण मृत्यु हो गई थी। इनकी मां गीता पेशे से एक अध्यापिका हैं। पति की मौत के बाद गीता का जीवन काफी खाली हो गया था। वे अकेली रहने लगी थीं और डिप्रेशन का शिकार हो गईं थी।

स्थिति और चिंताजनक हो गई जब बेटी संहिता को काम के सिलसिले में गुड़गांव शिफ्ट होना पड़ा। संहिता बताती हैं, ‘मुझे मां को वहां अकेला छोड़ना काफी बुरा लगता था। मैं वीकेंड्स में उनके पास चली जाती थी लेकिन मुझे लगने लगा था कि मेरा घर छोड़ने का फैसला स्वार्थपूर्ण था।’ संहिता ने अगस्त 2017 से अपनी 53 वर्षीय मां के लिए पार्टनर खोजना शुरू कर दिया था।

संहिता आगे कहती हैं, ‘हर किसी को एक साथी की तलाश होती है। मैंने अपनी मां के नाम की प्रोफाइल एक मैट्रीमोनियल वेबसाइट पर बनाई। मां को मैंने सितंबर में इस बारे में बताया। वे थोड़ी घबरा गईं। घर वालों का रिएक्शन भी अजीब था।’

अक्टूबर में पेशे से रेवेन्यू इंस्पेक्टर केजी गुप्ता ने वेबसाइट पर दिए संहिता के नंबर पर कॉल किया और गीता के शादी करने की इच्छा जताई। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी की मृत्यु कैंसर के कारण 2010 में हो गई थी और वे दो बच्चों के पिता हैं।

पहले तो गीता ने शादी से इंकार कर दिया लेकिन नवंबर में डॉक्टर्स ने गीता को हिस्टरेक्टमी के सर्जरी का सुझाव दिया। इसमें गर्भाशय को शरीर से बाहर निकाला जाता है. गीता की सर्जरी के दौरान तीन दिनों तक केजी गुप्ता मौजूद रहे और गीता का हर तरह से ख्याल रखने की कोशिश की। उनके इस कदम से गीता ने दोबारा शादी करने का विचार किया.

संहिता बताती हैं कि फैसला इतना आसान नहीं था. 2017 दिसम्बर में गीता ने दोबारा शादी कर ली। लोगों ने दबी जुबान में इसका विरोध किया लेकिन संहिता दोबारा से अपनी मां को खुश देखना चाहती थीं। उनके इस कदम की खूब प्रशंसा हो रही है।

 

कहानियों को सब तक पहुँचाने की कोशिश है…..सुनो कहानी

अनिमेष जोशी

फेसबुक, सरीखा माध्यम बहुत बड़ा वर्चुअल अड्डा है…! जहां हम सब भांति – भांति के अनुभवों से दो – चार होते है। ये माध्यम किसी भी तरह की सूचनाओं को बड़े फलक तक ले जाने का एक महत्वपूर्ण टूल भी है। इस माध्यम ने बहुत से लोगों से जुड़ने का मौका दिया। जो इस माध्यम का खूबसूरत पहलू है…इला से नबम्बर २०१६ के आस-पास जुड़ना हुआ। फिर हम गाहे-बगाहे कहानियों पर खूब बातें करने लगे…जहाँ मुझे ज्ञात हुआ कि इला ने समकालीन कहानियाँ कम पढ़ी है…लेकिन समकालीन को जानने व समझने की रूचि उनमेँ लगीं.और मैंने उन्हें कुछ कहानियाँ पढ़ने के लिए भेजी। ये सिलसिला कुछ महीनों तक चलता रहा…इसी सिलसिले के आधार पर हमें समकालीन हिन्दी कहानियों को केंद्र में रखकर कुछ करने का विचार आया। एक बहुत बड़ा वर्ग हैं जो आज नेट इस्तेमाल करता है…और उस वर्ग को साहित्य से जोड़ने के लिए आज साउंड क्लाउड और यू ट्यूब सबसे उपयोगी टूल हैं। हमने सोचा कि कहानियों को रिकॉर्ड कर यू ट्यूब पर डाला जाए…इस तरह के उपक्रम की शुरुआत हम लोगों ने ‘कथा कथन’ नामक यू ट्यूब चैनल पर कुछ कहानियाँ डाल कर की, जो भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का एक मंच हैं लेकिन, कुछ समय बाद हमें लगा कि एक चैनल क्यों न ऐसा शुरू किया जाए जिसका फोकस हिंदी कहानियों पर ही  हो…। उसी आइडिया का नाम -“सुनो कहानी” है… जहाँ समकालीन लेखकों के साथ स्थापित लेखकों की भी कहानियाँ आप सुन सकेंगे… हर शुक्रवार आप एक नई कहानी से रूबरू होंगे। इस मुहिम में उन लेखकों की भी कहानियां समय-समय पर सुनाई जाएगी जो शायद कहीं छपे नहीं हो! हर उपक्रम को पूरा करने के लिए एक टीम की भी जरूरत रहती है, तो ‘सुनो कहानी’ की छोटी सी टीम इस प्रकार हैं-
इला जोशी
अनिमेष जोशी
मयंक सक्सेना
अनुज श्रीवास्तव
आलोक कुमार
अधिक जानकारी के लिए आप इस लिंक पर जाए-
https://www.youtube.com/channel/UCW_xd1Eyin-kqVeAbLBe2kA

दो पूर्व छात्राओं ने अपने स्कूल की हजारों छात्राओं को मिलवा दिया

माधवी श्री

सुबह अगर आँख खुले और दो दशक से ज्यादा हो चुके अपने स्कूल के दिनों की सहपाहियों को आप धड़ा – धड़ एक के बाद एक आप मिलने लगे तो दो चीजों का आप तहे दिल से शुक्रिया अदा करेगे – एक फेसबुक जो मीलों दूर बैठे आपको आपके अपनों से मिलवाता है और उनका जिन्होंने  इस स्कूल  रीयूनियन यानी पुनर्मिलन का सफल आयोजन किया।

आज फेसबुक के इस युग में जहाँ लोग इसका गलत इस्तेमाल कर रहे है वही कई सकारात्मक लोग इसका इस्तेमाल  हज़ारों दिलों को जोड़ने के लिए भी  कर रहे है।  ऐसा ही कुछ नाम बालिका शिक्षा सदन की कुछ पूर्व छात्राओं ने किया।  अपने देश से दूर सिंगापुर में बैठी अनु चोमल शर्मा ने एक फेसबुक पेज के माध्यम से अपने स्कूल की पूर्व छात्राओं को जोड़ने की कोशिश की।  वही कोलकाता में ज्योति केडिया भी यही काम  दूसरे फेसबुक पेज के माध्यम से कर रही थी।  बाद में दोनों लड़कियों ने फैसला किया कि वे इसे एक पेज में बदल देगी और इसी एक पेज के माध्यम से सभी बालिका शिक्षा सदन की पूर्व छात्राओं को जोड़ेगी।

दो लोगो से शुरू हुई यह यात्रा 30  दिसंबर 2017 को 550 लड़कियों के रीयूनियन में बदल गयी ।  फेसबुक पेज के माध्यम से कुछ ही दिनों में  रीयूनियन फेसबुक पेज की सदस्यता” रीयूनियन” के बाद 1500 से बढ़ कर से 2500 के लगभग पहुँच गयी। करीब डेढ़ – दो साल के कठिन परिश्रम और 15 -25 पूर्व छात्राओं की  व्यवस्थापक की  भूमिका के कारण और स्कूल की प्रधानाध्यापिका श्रीमती शर्मिष्ठा चटर्जी के दिशानिर्देश में पूरे कार्यक्रम को मूर्त रूप दिया गया।  मुख्य भूमिका अनु चोमल , ज्योति केडिया ,श्वेता केडिया , ज्योति नाहटा , वृजबाला खेतान , कविता भानुका ,सरिता अग्रवाल , पूजा  जायसवाल , शालिनी झंवर , पूनम साव और दिव्या तिवारी ने निभाई कार्यक्रम के आयोजन में ।  इस रीयूनियन में 1968 से की  पूर्व छात्राओं ने शिरकत की वही कई पुरानी स्कूल की शिक्षिकाओं को खोज – खोज कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर  पूर्व छात्राओं ने रंगा -रंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।

1948 में इस स्कूल का निर्माण कोलकाता में  गिरधारी लाल मेहता , राधा किशन कानोड़िया , रघुनाथ प्रसाद खेतान , डी पी काजरिया , आई सी केजरीवाल और बैजनाथ तापड़िया ने करवाया था।  इस बालिका विद्यालय ने उत्तर कोलकाता में कई लड़कियों के जीवन में महत्वपूर्ण दिशा देने का काम किया है ।

आगे भी इस रीयूनियन को हर वर्ष आयोजित किये जाने  का संकल्प है।  इस रीयूनियन के माध्यम से स्कूल के रखरखाव और उसके तरक्की के लिए भी प्रयास किये जाने की योजना है।  फिलहाल देश – विदेश में फ़ैल चुकी इस स्कूल की छात्राये इस रीयूनियन से काफी खुश है और आनेवाले समय में अपना – अपना योगदान देने की योजना बना रही है।

(लेखिका स्कूल की पूर्व छात्रा और फिलहाल दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

 

 

 

 

 

 

मैत्रेयी पुष्पा को मिलेगा भारतीय भाषा परिषद का कृतित्व समग्र पुरस्कार

 

भारतीय भाषा परिषद की कार्यसमिति ने 4 भारतीय भाषाओं के वरिष्ठ साहित्यकारों को एक-एक लाख रुपए का कृतित्व समग्र सम्मान और इक्कीस-इक्कीस हजार रुपये का युवा पुरस्कार देने का सर्वसम्मति से निर्णय ले लिया  है। हिन्दी में कृतित्व समग्र सम्मान इस बार वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को प्रदान किये जायेंगे ये पुरस्कार विद्वानों को 10 मार्च परिषद के सभागार में प्रदान किए जाएंगे। कृतित्व समग्र सम्मान और युवा पुरस्कार प्रति वर्ष बारी-बारी से 4 भारतीय भाषाओं को दिए जाते हैं। यह घोषणा की जा रही है कि इस बार ये पुरस्कार हिंदी, तमिल, गुजराती और उड़िया भाषाओं के  निम्नलिखित साहित्यकारों को प्रदान किए जाएंगे –

कृतित्व समग्र सम्मान –  (एक-एक लाख रुपए का)

  1. (हिंदी) श्री मैत्रेयी पुष्पा
  2. (तमिल) श्री मालव व्ही. नारायणन
  3. (गुजराती) श्री सीतांशु यश्शचंद्र
  4. (ओड़िया) श्रीमती ममता दाश

युवा पुरस्कार (इक्कीस-इक्कीस हजार रुपए का)

  1. (हिंदी) श्री अनुज लुगुन
  2. (तमिल) श्री हरिकृष्णन
  3. (गुजराती) श्री राम मोरी
  4. (ओड़िया) श्री रंजन प्रधान

पुरस्कृत लेखकों को नगद राशि के अलावा अंगवस्त्र, स्मृति फलक आदि देकर पूरी गरिमा से सम्मानित किया जाता है। सम्मान समारोह के अवसर पर ‘भारतीय भाषाएँ – सांस्कृतिक संवाद की परंपरा’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी 10-11 मार्च को आयोजित है जिसमें देश के कई विद्वान भाग लेंगे।

भारतीय भाषा परिषद भारतीय भाषाओं और साहित्य के विकास और प्रोत्साहन के लिए कार्य कर रही देश की प्रतिनिधि सांस्कृतिक संस्था है। इसकी स्थापना 1974 में हुई थी। 1980 में कृतित्व समग्र सम्मान की शुरुआत हुई। इसके बाद 2007 से युवा पुरस्कार भी शुरू कर दिया गया। हिंदी, तमिल, संस्कृत, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, राजस्थानी आदि विभिन्न भारतीय भाषाओं में अब तक सौ से अधिक वरिष्ठ और युवा साहित्यकार पुरस्कृत किए जा चुके हैं। यह कार्य भारतीय भाषाओं के बीच सद्भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रेरित है।

 

साहित्यिकी ने राहुल सांकृत्यायन पर आयोजित की संगोष्ठी

“साहित्यिकी” द्वारा भारतीय भाषा परिषद में राहुल सांकृत्यायन की 125वीं जयंती मनायी गयी। इस उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए किरण सिपानी ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को राहुल से प्रेरणा लेने की जरूरत है। राहुल के काम को जितना महत्व मिलना चाहिए था, नहीं मिला है। राहुल में अद्भुत ज्ञान पिपासा थी और संकीर्णता जरा भी न थी।साथ ही वह एक सहज मनुष्य भी थे। अतिथियों का स्वागत करते हुए गीता दूबे ने राहुल सांकृत्यायन के बहुआयामी व्यक्तित्व को रेखांकित किया।

डा रेशमी पांडा मुखर्जी ने  कहा कि राहुल ने लेखन के अतिरिक्त एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी जमीनी स्तर पर काफी काम किया था। किसानों और मजदूरों के हक के लिए वह सामंतों से टकराने से भी नहीं घबराए। राहुल आर्यसमाज से प्रभावित थे और कुसंस्कारों का विरोध किया ।‌ राहुल बहुभाषाविद थे। उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में यथार्थ और कल्पना का सुंदर सम्मिश्रण हुआ है।‌

रंजीत कुमार ने कहा कि राहुल से हम सीखते हैं कि हम कैसे महान बन सकते हैं। मार्क्सवाद उनके चिंतन का घर था। राहुल जी ने तत्वज्ञान, दर्शन और इतिहास की गूढ़तम बातों को बिलकुल सहज भाषा में लिखा है। राहुल से हमें यह सीखने को मिलता है कि महान लोगों का जीवन अपने लिए नहीं आम जनता के लिए होता है। उनमें ज्ञान की प्रबल भूख थी और उन्होंने विपुल साहित्य की रचना भी की।

सुषमा हंस ने कहा कि राहुल की भाषा बड़ी सशक्त थी। संगोष्ठी का संचालन गीता दूबे और धन्यवाद ज्ञापन विजयलक्ष्मी मिश्रा ने किया।

 

 

धैर्य, श्रद्धा और विनम्रता से सपने पूरे होंगे

अपराजिता की ओर से

अपराजिता की कोशिश रही है कि नयी प्रतिभाओं को सामने लाया जाए और ऐसे लोगों की कहानी कही जाए जिन्होंने अपना एक मुकाम बनाया है और प्रेरक रहे हैं। आज के बदलते दौर में जहाँ सफलता की पूजा होती है, वहीं जरूरी है कि हम उन लोगों की भी बात करें जिन्होंने सफलता की इमारत की बुनियाद रखी। समय कुछ ऐसा है कि आज नींव की ईंट ही गुम हो जाती है। ऐसी स्थिति में यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन लोगों को सामने लायें क्योंकि अगर नींव ही न हो तो महलों को ढहते देर नहीं लगेगी। इसी सोच के साथ नववर्ष पर अपराजिता एक नयी पहल करने जा रही है जिसका नाम नींव की ईंट है। हम मुलाकात के तहत जहाँ नयी और स्थापित प्रतिभाओं को हमेशा की तरह सामने लाएंगे, वहीं समय – समय पर नींव की ईंट स्तम्भ के तहत ऐसे लोगों से भी आपकी मुलाकात करवाएंँगे या उनकी कहानी बताएंगे जिन्होंने एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत की। आज नींव की ईंट के तहत हम आपकी मुलाकात राजन – साजन मिश्र के पं.  राजन मिश्र से करवाने जा रहे हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के माधुर्य को प्रसारित करने के लिए जाने जाते हैं

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित राजन-साजन मिश्र का नाम बेहद आदर से लिया जाने वाला नाम है। बनारस घराने की गूँज को विश्‍व तक ले जाने में इन भाइयों का महत्वपूर्ण योगदान है। संगीत को विश्‍व शांति का माध्यम मानने वाले राजन – साजन मिश्र ने भैरव से भैरवी तक’ की यात्रा आरम्भ की है। इसकी शुरुआत कला की समृद्ध भूमि बनारस से 18 नवंबर 2017 से हुई है जो अहमदाबाद और कोलकाता से होते हुए ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोपीय देशों तक जारी रहेगी। 7 जनवरी को कोलकाता के जोड़ासांको में होने वाले इस कार्यक्रम के सिलसिले में पद्मभूषण पंडित राजन मिश्र महानगर आए जहाँ हमने उनसे संगीत की दुनिया को लेकर बात की, पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश

संगीतमय बचपन बीता

हमारी तो आँखें ही संगीत के बीच खुली। हम बनारस के कबीर चौरा मोहल्ले में रहते हैं जहाँ कबीर का स्थान है। वहीं बड़े – बड़े कलाकार रहते हैं। जब आँख खुली तो हर जगह स्वर लहरियाँ गूँज रही थीं। कहीं तबले, तो कहीं नृत्य, कहीं सितार की आवाज, कहीं सारंगी की आवाज, संगीतमय बचपन जीता। 4 -5 साल की उम्र से गंडाबंधन पंडित बड़े रामदास जी से हो गया और तब से शिक्षा शुरू हो गयी और अब तक चल ही रही है।

बनारस से रिश्ता मजबूत है

समय के साथ तो बदलाव आता ही है। बहुत से लोग इधर – उधर चले गये। हम भी स्थायी तौर पर दिल्ली रहने लगे मगर बनारस से नाता टूटा नहीं है। हर एक -दो महीने पर बनारस जाते हैं, वहाँ हमारा अपना निवास स्थान है। गुरु लोगों का स्थान है, वहाँ जाकर माथा टेकते हैं।

बॉलीवुड गीत बाजार के दबाव में बनते हैं

80 और 90 के दशक तक जो फिल्मी गाने बने….उसे हम 50 बार भी सुनें तब भी अच्छे लगते हैं क्योंकि उस जमाने के संगीत निर्देशक पार्श्‍व गायक होते थे। वो सब शास्त्रीय संगीत सीखे हुए होते हैं। अब बैजू बावरा के गाने, झनक – झनक पायल बाजे के गाने और मुगले आजम के गाने सालों बाद आज भी कर्णप्रिय लगते हैं। बाजार का दबाव है कि लोगों को वैसे गीत बनाने पड़ते हैं। एक बार कविता कृष्णमूर्ति के साथ यात्रा कर रहे थे हम, तब उन्होंने ये बात बतायी कि संगीत निर्देशक अगर अच्छे और कर्णप्रिय गाने बनाना चाहते हैं मगर निर्माताओं का नजरिया कुछ अलग होता है और वे हर किसी की पसन्द को ध्यान में रखकर ऐसे गीत बनवाना चाहते हैं जिन पर लोग थिरक सकें।

नाना पाटेकर निभा सकते हैं हमारा किरदार

हमने एक फिल्म की थी सुर संगम, जो तमिल फिल्म की रीमेक थी। इस फिल्म में 11 गाने हमने गाए। उसमें हमारा लता जी, अनुराधा पौंडवाल जी और कविता जी के साथ गाना है। बहुत अच्छी फिल्म बनी थी। वह फिल्म गुरु शिष्य परम्परा पर बनी थी और एक शास्त्रीय संगीतज्ञ के व्यक्तित्व पर फिल्म बनी है। तब बॉलीवुड का अनुभव लेने का मौका मिला। बीच में माटी नाम की फिल्म में संगीत दिया था। एक फिल्म निर्माता -निर्देशक के मतभेद में बंद पड़ी है, उसमें सोनू निगम, श्रेया घोषाल और आकृति कक्कड़ के साथ गाने हैं और वे रिकॉर्ड हो चुके हैं। नाना पाटेकर हमारा किरदार निभा सकते हैं।

युवाओं को संदेश

धैर्य, श्रद्धा और विनम्रता से युवा अपने सपने पूरे कर सकते हैं।

हिन्दी मेला…नयी पीढ़ी का मंच और हम सबका ऑक्सीजन

बस एक साल और पूरे 25 साल हो जाएंगे….हिन्दी मेले को। पहली बार आई तो प्रतिभागी के रूप में…सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज में स्नातक की छात्रा थी और अब बतौर पत्रकार 15 साल होने जा रहे हैं और 20 साल हो रहे हैं मेले से जुड़े हुए। इन 20 सालों में उतार चढ़ाव भी देखे मगर मेला और मेला परिवार हमेशा साथ रहा। सही है कि आज बहुत से लोग जा चुके हैं मगर मेला कल भी मिलवाता था और आज भी मिलवाता आ रहा है…मेले का तो काम ही यही है।

हमारे समय की बड़ी चुनौतियाँ भाषा और अपसंस्कृति तो है ही मगर उससे भी बड़ी चुनौती है युवाओं के साथ तमाम पीढ़ी को एक सृजनात्मक तथा संगठनात्मक राह पर लाना…मैं अपनी बात करूँ तो जब मेले में पहली बार आई तो ऐसे मोड़ पर थी जहाँ कोई राह नहीं सूझ रही थी..बहुत कुछ कहना था…बहुत कुछ करना था मगर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था…कई बार ऐसे मोड़ भी आये….जहाँ लगा कि हर रास्ता बंद हो चुका है…निराश हुई मगर हारी नहीं तो इसके पीछे यह एक मंच था जिसने साहित्य को किताबों से निकालकर जीवन से जोड़ा। हिन्दी मेला ऐसी जगह है जिसने कभी किसी रिप्लेस नहीं किया, कभी अजनबी नहीं बनाया, कभी किसी को बाँधा नहीं और बगैर भेद भाव के सबकी बातें सुनीं और अपनाया।

मतभेद हुए मगर मनभेद नहीं बल्कि सब एक दूसरे की जरूरत में खड़े रहे…तमाम दिक्कतों और मतभेदों के बावजूद…परिवार इसे ही तो कहते हैं न। पत्रकारिता में जब मैं आयी तो स्पष्ट तौर पर कह सकती हूँ कि साहित्य को बेहद उपेक्षा से देखा जाता था…साहित्यिक विज्ञप्तियों की जगह कचरे के डब्बे में होती थी…साहित्यिक खबरें न के बराबर होती थीं और साहित्य का मतलब कहानियाँ भर होता था। कई बार मुझे कहा जाता कि साहित्य पढ़ने वाले अच्छे पत्रकार नहीं हो सकते क्योंकि वे संवेदनशील होते हैं और संवेदना के लिए अखबारों की खबरों में जगह नहीं होती…जाहिर है कि यह एक भी संघर्ष था। इस पर ये भी सच है कि ऐसे अखबार कम बेहद कम थे। अधिकतर अखबारों और मीडिया के बड़े  वर्ग का सहयोग हिन्दी मेले को मिला है। फिर भी जद्दोजहद और उपेक्षा के बीच पूरा एक दशक गुजरा और ऐसे मे हिन्दी मेला और मिशन मेरा ऑक्सीजन बने रहे और मेरी संवेदना और जीजिविषा अगर जिन्दा भी है तो इसका श्रेय हिन्दी मेले को जाता है।

अपनापन ही हिन्दी मेले  की संस्कृति है। आपको यहाँ भले ही तामझाम न मिले…बहुते ज्यादा सुविधाएं भी न मिलें मगर जो लगाव और अपनापन मिलेगा….वह आपको ऑक्सीजन देता है….मुझे भी मिला। हिन्दी मेले ने ऐसा परिवार दिया है जो तमाम शिकवे  शिकायतों के बीच आपको एक अपनेपन की मिठास देता है…आपकी सृजनात्मकता को मंच देता है। 

सर, राजेश भइया, ऋतेश भइया….मनोज भइया..ममता…..कितने नाम लूँ…..जगह कम पड़ जाएगी….। एक ऐसी जगह जो अपरिचित को भी परिचित बनाती है….जहाँ छोटे से छोटा और नये से नया व्यक्ति भी अपनी बात रख सकता है और सबसे अच्छी बात कि उसे न सिर्फ सुना जाता है बल्कि जरूरत पड़े तो अपनाया भी जाता है। आज संवेदनशीलता ने मेरी कलम को मजबूत बनाया है क्योंकि वह सोच सकती है…उपेक्षाओं के बीच लड़ने और जीतने की जिद भी हिन्दी मेले से मिली है…अभिव्यक्तिगत स्वतंत्रता युवाओं की ही नहीं सबकी जरूरत है। वो यहाँ मिलती है।

एक ऐसा उत्सव जो कोलकाता के पूरे साहित्यिक जगत को एक छत के नीचे ला देता है…मरुस्थल में हरीतिमा जैसा है। यहाँ छोटों की बात सुनी जाती है तो बड़ों को भी सम्मान मिलता है… अखबार जब प्रमुखता से मेले की खबरों को स्थान देते हैं तो अजीब सा संतोष मिलता है। मेले ने हर कार्यक्षेत्र को प्रतिभाएं दी हैं और वे हर जगह अपनी छाप छोड़ रहे हैं। पत्रकारिता तो है ही मगर हमारी एक अटूट पहचान य़ह है कि हम हिन्दी मेले से बोल रहे हैं और यह पहचान काफी है। मीडिया और सांस्कृतिक जगत में बगैर मान्यताप्राप्त पत्रकारों के लिए जगह तो है मगर पहचान नहीं…हिन्दी मेले की ओर से दिया जाने वाला पत्रकारिता, शिक्षा और नाट्य सम्मान इस कमी को पूरा करता है।

लगभग 20 साल तो हो रहे हैं मगर समाज को एक स्वस्थ और संवेदनात्मक वातावरण देना है तो ऐसे एक नहीं कई मेलों की जरूरत है। कम से कम इस मुहिम को मजबूत बनाना समय की ही नहीं हमारी भी जरूरत है….आइए न हाथ बढ़ाएं। जो जा चुके हैं….एक बार फिर लौटें….अपना मेला तो अपना ही है न तो आइए एक बार…..फिर अपनी जड़ों की ओर…

अब मेरा लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा

सुषमा त्रिपाठी

जीवन में आश्वस्ति हो तो संघर्ष आसान हो जाते हैं और पुस्तकालयाध्यक्ष आश्वस्त करने वाला हो तो किताबों तक पहुँचना आसान हो जाता है। जालान पुस्तकालय में वह आश्वस्त करने वाली कुर्सी सूनी हो गयी है…तिवारी सर नहीं हैं वहाँ पर। अब मुझसे कोई नहीं कहेगा  कहाँ हो आजकल। दिखायी नहीं पड़ती हो या कार्ड बनवा लिया….आज की दुनिया में ये शब्द बड़े अनमोल है, ऐसी दुनिया में जहाँ किसी के पास किसी के लिए कोई फुरसत नहीं है। मेरे जीवन में लाइब्रेरी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है…वह मेरी शरणस्थली है और एक ऐसी जगह जहाँ मुझे आश्वस्त करने वाले, सही राह दिखाने वाले लोग मिले हैं….किताबों के बीच से जिन्दगी को जीने का रास्ता निकला है…जालान गर्ल्स कॉलेज में मैंने पास कोर्स किया था और ऑनर्स नहीं होने के कारण एम ए में मेरा दाखिला उस समय नहीं हो पा रहा था इसलिए उन दिनों स्पेशल ऑनर्स करना पड़ता था मगर मुझे कोई जानकारी नहीं थी। होती भी कहाँ से, मेरी दुनिया घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक सीमित थी…मधुलता मैम ने सावित्री गर्ल्स कॉलेज के बारे में बताया मगर किसी कारणवश वहाँ भी मेरा दाखिला नहीं हो पा रहा था…ऐसी स्थिति में श्रीराम तिवारी सर देवदूत बनकर आए और मेरा दाखिला हो गया…तब से लेकर आज तक…सर हमेशा मेरे लिए आदरणीय रहे। कॉलेज के हर आयोजन में उनका सहयोग मिला। तिवारी सर मुझे कभी सिर्फ पुस्तकालयाध्यक्ष लगे ही नहीं, कभी एहसास ही नहीं हुआ कि पुस्तकालय में मैं एक आम लड़की हूँ… कभी कोई औपचारिकता महसूस ही नहीं होने दी उन्होंने और भइया ने। शायद यही वजह है कि परेशान होती हूँ तो सीधे लाइब्रेरी ही जाती हूँ…थोड़ी देर किताबों के बीच रहकर फिर खड़ी हो जाती रही हूँ और किताबों से प्रेम के पीछे यह स्नेह भी सम्बल बना है। हमेशा बेखटके फोन किया या सीधे लाइब्रेरी पहुँच गयी और कभी भी वे नाराज नहीं होते थे। उनका होना पिता की छाँव जैसी आश्वस्ति देता था और लाइब्रेरी एक परिवार की तरह थी जहाँ…नोक झोंक में श्रीमोहन भइया को हम सहेलियाँ परेशान करतीं थीं और कई बार हमारे चक्कर में भइया को तिवारी सर से डाँट पड़ जाती…वे दिन दुर्लभ हैं और तमाम सफलताओं पर भारी हैं…वे जीवन के स्वर्णिम दिन हैं….भइया नियमों का हवाला देते तो तिवारी सर से बोलकर हम ज्यादा किताबें लिया करते…तब जीवन इतना जटिल नहीं था….पत्रकारिता जीवन में व्यस्तता के बावजूद समय निकालकर कुछ मिनटों के लिए ही सही मैं लाइब्रेरी जाती रही हूँ…और वहाँ सर मुझे कुल्हड़ वाली चाय पिलाना नहीं भूलते थे। मेरे लाइब्रेरी कार्ड पर उनके हस्ताक्षर रहते…अब वह लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा। सर मेरी खबरें पढ़ते थे और नाम भी खोजते थे…पिता भी तो ऐसे ही होते हैं। पिछले साल जब पुस्तकालयों को लेकर स्टोरी की तो सर का साक्षात्कार लिया था…इसके बाद प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय और बड़ाबाजार के संबंधों पर स्टोरी की तो सर ने फोन करके तारीफ की…तारीफें मिलती हैं मगर सर की तारीफ मेरे लिए बहुत खास है। वह महानगरीय पुस्तकालय परम्परा के स्तम्भ हैं…पुस्तकालय और कोलकाता के इतिहास को लेकर उनके पास जितनी जानकारी थी, उसका कोई विकल्प नहीं है। तिवारी सर का जाना मेरी ही नहीं इस परम्परा की क्षति है जिसकी भरपाई कर पाना आसान नहीं होगा। सर….जहाँ भी रहें….हम सब उनके लिए बच्चे ही थे…बच्चे ही रहेंगे…और वे हमेशा हमारे आस  पास हैं..।

कमजोरियों से भागकर हम इतिहास नहीं बदल सकते

साल की उल्टी गिनती आज से शुरू हो चुकी है और ऐसा लग रहा है जैसे हमारे विकास और प्रगतिशीलता की उल्टी गिनती शुरू हो रही है। परम्परा के नाम पर वर्चस्व की राजनीति करने वाले तमाम लोग एकजुट हो रहे हैं और बहाना है एक फिल्म। बहाना कहें या निशाना ही सही शब्द है और ये चिन्ता तमाम सतही बातों को लेकर ही है या यूँ कहें कि उनके हाथ में एक हथियार मिल गया है…जन भावना…जनभावना…सम्मान और प्रतिष्ठा की धुरी में पिस रहे इस देश और समाज ने क्या खो दिया है…उसे खुद अन्दाजा नहीं है। कभी – कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि ये परम्परा…इज्जत और धर्म इतने नाजुक क्यों हैं कि जरा सी चोट से खुद को बचा नहीं पाते। याद रखिए कि धर्म और समाज के ठेकेदारों ने इसी जनभावना का हवाला देकर लम्बे समय तक शोषण चक्र और वर्चस्व को जिन्दा रखा है…और आज हर राजनीतिक पार्टी यही कर रही है…कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अपने सिद्धांतों पर अडिग हो और सिद्धांत तो वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना बनकर रह गए हैं…आप यह नहीं देख रहे कि आप किस चीज की वकालत कर रहे हैं….सती प्रथा की या जौहर की या उसके नाम पर होने वाली हिंसा की….क्या इतिहास को चाटुकारिता में बदलना चाहिए। आपका इतिहास गौरवशाली रहा होगा मगर आप अपनी हार को भूलते हैं तो आपको जीत की प्रेरणा कभी नहीं मिलेगी। आदिम समय से ही कमजोरों खासकर स्त्रियों को दंडित करने के लिए उनका अंग – भंग करना, दबाना..या बलात्कार कर देना वर्चस्ववादी सत्ता की नीति रही है और आज भी यही चला आ रहा है। सोशल मीडिया पर यह जुबानी गंदगी तो छायी रहती है….आप कल्पना कीजिए कि हमें कहाँ बढ़ना था और हम कहाँ तक गिर रहे हैं….इस राष्ट्र ने कभी भी एक विशेष विचारधारा को कभी प्रश्रय नहीं दिया और अगर दिया होता तो वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा नहीं रही होती। जिस देश में पूरी वसुधा को समेटने की शक्ति है…उसे किसी एक धर्म, सम्प्रदाय और में समेटना ही ही परम्परा का अपमान है और राष्ट्रवाद के नाम पर यही हो रहा है। आप एक परिवार की परिकल्पना कीजिए जिसमें बहुएँ बाहर से ही आती हैं…सम्बन्ध बाहर से ही जुड़ते हैं..क्या आप यह कह सकते हैं कि परिवार के इन सदस्यों को घर में रहने का अधिकार नहीं है क्योंकि ये बाहर से हैं या आप उनको अपने परिवार का हिस्सा नहीं मानते। यही बात इस देश रूपी विशाल परिवार पर भी लागू होती है..हो सकता है कि हिन्दू या द्रविड़ सभ्यता यहाँ रही हो..और अन्य जातियाँ बाहर से हों मगर अब वे इस देश की संस्कृति का हिस्सा हैं…इसलिए यह देश उनका भी है जैसे कि आपका है और वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा का निर्वाह ही आपकी जड़ों को मजबूत करेगा…धर्म जड़ता नहीं है…समय के साथ वह खुद को कट्टर नहीं बल्कि उदार बनाता है। जो लोग लव जेहाद की बातें करते हैं…उनको एक बार इतिहास पर नजर डालनी चाहिए क्योंकि विदेशियों से विवाह तो तभी से चला आ रहा है…। अपनी कमजोरियों से भाग कर हम कभी मजबूत नहीं बन सकते। कला और साहित्य हमें आइना दिखाते हैं तो इसका सम्मान कीजिए और अगर कुछ गलत है तो उसका प्रतिवाद भी सृजनात्मक तरीके से ही होना चाहिए….दबाकर विद्रोह को रोका नहीं जा सकता…और न ही इतिहास चाटुकारिता में बदलेगा मगर आपकी हरकतें आपको एक अँधी और क्रूर याद के रूप में कैद जरूर कर देंगी। इतिहास को हम अपने स्वार्थ के हिसाब से नहीं ढाल सकते क्योंकि उसमें आपकी अच्छाई और बुराई दोनों समाहित है।

अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है

नया साल, नयी उम्मीदों का साल। पुरानी स्मृतियों से सीखने की सीख देता नया साल। हिंसा, कड़वाहटों और निराशा के बीच नये साल का आगमन उम्मीदें भरता है और इनको पूरा करने की जिम्मेदारी भी है। गुजरा साल हिंसा, कड़वाहटों, शिकायतों और रक्त से भरा रहा…..इस साल ऐसा बिलकुल न हो…इसकी तो कल्पना हम नहीं कर सकते मगर थोड़ा प्रेम, संवेदना, सहानुभूति की कोंपल तो हम अपने हृदय में रख ही सकते हैं..इनको पुष्पित पल्लवित होने दें…तो क्या एक सुन्दर दुनिया बनाना इतना कठिन कार्य होगा?

इस समय तो न जाने कितनी नाराजगी भरी है…थोड़ी हमारे अन्दर और थोड़ी आपके भीतर…इन शिकायतों और नाराजगी को हम सृजनात्मक रूप भी तो दे सकते हैं।

पता है कि अभी यह यूटोपिया ही है मगर यूटोपिया भी सच में बदल सकती है…जरूरत शुरुआत करने की है….अगर टूटी सड़कों से शिकायत है तो सरकार का इन्तजार करने की जगह हम और आप मिलकर बना दें…क्योंकि टूटी सड़कों से हमको और आपको गुजरना है। बच्चों को सरकार सीट नहीं देती तो हम और आप उनको बसों में बैठा सकते हैं। कहने को छोटी –छोटी बातें हैं मगर बड़े बदलावों की आधारशिला ऐसी ही छोटी बातों से होती है। नाराजगी है तो पास बैठाकर एक – दूसरे की बात सुनिए और सुनाइए…यह जरूरी है क्योंकि अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है..तमाम शिकायतों और नाराजगी के बीच। अपराजिता की ओर से

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं….नव वर्ष ही नहीं पूरा साल मंगलमय हो…..सुस्वागतम 2018