Friday, April 3, 2026
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बाल फिल्मों की उपेक्षा के कारण बड़ों के कंटेंट देखने को मजबूर हैं बच्चे

भारत के पहले सुपरहीरो के तौर पर पहचान बनाने वाले मुकेश खन्ना ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से नाराज़गी जताते हुए भारतीय बाल फिल्म सोसाइटी (सीएफएसआई) के चेयरमेन पद पर रह चुके है ं और उनका  मानना है कि बाल फिल्मों को इस देश में प्रोत्साहन सरकार से नहीं मिल रहा। उनका कहना है कि मंत्रालय बच्चों के लिए फ़िल्म बनाने को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाता। शक्तिमान में ‘शक्तिमान’ और महाभारत में ‘भीष्म पितामह’ जैसे किरदार निभा चुके मुकेश का कहना है कि वो पहले भी कई बार इस बात की शिकायत कर चुके थे, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया।

मुकेश कहते हैं कि बच्चों के लिए फ़िल्मों की भरमार है, लेकिन ये फ़िल्में कभी रिलीज़ ही नहीं हुईं। बच्चों को कभी मालूम ही नहीं चल पाता है कि उनके लिए भी फ़िल्में बनती हैं। ”मुझे लगता है कि मुझसे पहले जो भी लोग यहां रहे उन्होंने कभी बच्चों के लिए फ़िल्म बनाने के बारे में इस तरीक़े से सोचा ही नहीं। शायद यही वजह है कि जो फ़िल्में वयस्क देखते हैं, वही छोटे बच्चे भी देखते हैं।’ मुकेश कहते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में आठ फ़िल्में बनाईं और मंत्रालय से कहा कि वो फ़ंड बढ़ाए। उनका दावा है कि उनकी चिट्ठी प्रधानमंत्री तक जा चुकी है, लेकिन कोई भी ऐक्शन नहीं लिया गया।

उनके अनुसार, ”मैं फ़िल्में डिस्ट्रीब्यूट करना चाहता हूं, लेकिन वो कहते हैं इसे टेंडर कर दो लेकिन आप ही सोचिए जिस देश में बच्चों की फ़िल्म को लेकर इतनी उदासीनता हो वहां टेंडर निकालकर क्या मिलेगा।”कई बार चेयरपर्सन होने के बावजूद मुझे फ़ैसले लेने में दिक्क़त आई, लेकिन सबसे बड़ी समस्या पैसों की है। मैं यहां 25 फ़िल्में अप्रूव करके बैठा हूं लेकिन मेरे पास पैसा सिर्फ़ चार फ़िल्मों का है।” मुकेश कहते हैं कि बड़े-बड़े निर्देशक जैसे अनुपम खेर, राजकुमार संतोषी, नीरज पांडेय संयुक्त रूप से बच्चों के लिए फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें देने के लिए हमारे पास पैसे ही नहीं हैं। ‘ बच्चों के पास अपनी फ़िल्में ही नहीं हैं. ऐसे में वो मजबूरी में सास-बहू वाले सीरियल देख रहे हैं या फिर गंदी-गंदी फिल़्में।”

इतनी देर से प्रतिक्रिया क्यों?

अगर आपको लग रहा था कि मंत्रालय आपका सहयोग नहीं कर रहा तो आपने इतनी देर से इस्तीफ़ा क्यों दिया? इस सवाल के जवाब में मुकेश कहते हैं, ”मेरे पास 12 फिल्में थी. उनका बजट अप्रूव कराना मेरी ज़िम्मेदारी थी। साथ ही ये सारी समस्याएं बीते एक साल में ज़्यादा बढ़ी हैं। ‘मुकेश मानते हैं कि ‘यहां लोगों की सोच है कि फ़िल्में बनाकर गोदाम में डाल दो। वो कहां लगेंगी, लोगों तक कैसे पहुंच पाएंगी इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता.’

क्यों नहीं चुना कोई दूसरा रास्ता?

मुकेश कहते हैं कि ‘ऑनलाइन विकल्प हैं, लेकिन इससे सीएफ़एसआई का कोई भला नहीं होगा। डिजिटल माध्यम से बच्चों तक फ़िल्में पहुंच तो जाएंगी, लेकिन इससे किसी को सीएफ़एसआई के बारे में नहीं पता चलेगा। फ़िल्म का हिट होना ज़रूरी है. तभी लोगों को ये समझ आएगा कि बच्चों के लिए भी फ़िल्में बनना ज़रूरी है। ‘ बड़ों का कन्टेंट, बच्चों के लिए कैसे हो सकता है? मुकेश कहते हैं, ‘आज के समय में इससे ख़तरनाक कुछ नहीं. चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को अपने से दोगुनी उम्र की वो बातें पता होती हैं जो उसे उस वक्त नहीं पता होनी चाहिए।  ये सारी चीज़ें कहीं न कहीं बच्चे में अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम करती हैं।’

क्या है सीएफएसआई?

सीएफएसआई की स्थापना आज़ादी के कुछ ही समय बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई थी. 1955 से सीएफएसआई ने बतौर स्वायत्त संस्थान काम करना शुरू किया. 1957 में वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सीएफएसआई की फ़िल्म ‘जलदीप’ को पहला इनाम मिला था।

सीएफएसआई का मक़सद बच्चों के लिए ऐसी फ़िल्मों का निर्माण करना है जो उनके विकास में सहायक हो। सीएफएसआई की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार अब तक वह 10 अलग-अलग भाषाओं में 250 फिल्मों का निर्माण कर चुकी है.

…लेकिन इस बीच सवाल वहीं का वहीं रह जाता है कि भारत में बच्चों के लिए मनोरंजन की भारी कमी है और इस कमी को वो बड़ों वाले कन्टेंट देखकर ही पूरा कर रहे हैं।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

जिन्दगी का जहर पीकर मुस्कान से दीवाना बनाने वाली मधुबाला

भारतीय बॉलीवुड के सबसे ख़ूबसूरत चेहरों की जब भी बात होती है तो लोग मधुबाला का नाम सबसे पहले लेते हैं और मधुबाला का नाम लेते ही आपके जेहन में उनकी कई छवियां उभर आती हैं। महल में सस्पेंस जगाने वाली मधुबाला हों या फिर मिस्टेर एंड मिसेज 55 की शहरी बाला या फिर हावड़ा ब्रिज की मादक डांसर हो या फिर मुगले आज़म की कनीज अनारकली जिसका जलवा किसी शहजादी से कम नहीं लगता।

मोहक, ख़ूबसूरत, दिलकश और ताज़गी से भरपूर, जिसके चेहरे से नूर टपकता रहा हो, तो आप मधुबाला के अलावा शायद ही किसी दूसरे चेहरे के बारे में सोच पाएं। मधुबाला की ख़ूबसूरती का अंदाज़ा लगाना हो तो 1990 में एक फ़िल्मी पत्रिका मूवी के बॉलीवुड की आल टाइम ग्रेटेस्ट अभिनेत्रियों की लोकप्रियता वाले सर्वेक्षण को देखिए, उसमें 58 फ़ीसदी लोगों के वोट के साथ मधुबाला नंबर एक पर रहीं थीं, उनके आसपास कोई दूसरा नहीं पहुंच पाया था। इसमें नरगिस 13 फ़ीसदी वोटों के साथ दूसरे पायदान पर रहीं थीं। शोख और अल्हड़ अंदाज़ के साथ अपनी ख़ूबसूरती के लिए मशहूर मधुबाला को गुजरे पांच दशक हो चुके हैं लेकिन आज भी उनके चाहने वाले उन्हें जिस शिद्दत से याद करते हैं, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती।

सबसे ख़ूबसूरत मधुबाला

मधुबाला के साथ ही अपना डेब्यू करने वाले राजकपूर ने मधुबाला के बारे में एक बार कहा था लगता है कि ईश्वर ने खुद अपने हाथों से संगमरमर से उन्हें तराशा है। पेंगुइन इंडिया से प्रकाशित और भाईचंद पटेल की संपादित बॉलीवुड टॉप 20- सुपरस्टार्स ऑफ़ इंडिया में राजकपूर का ये बयान दर्ज है। इसी पुस्तक के मुताबिक शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने अपने फ़िल्मी जगत में काम करने के दिनों को याद करते हुए कहा कि जब एक दिन उन्होंने शूटिंग करते हुए मधुबाला को देखा था उन्हें लगा कि उनका दिन बन गया।

शम्मी कपूर ने अपनी ऑटोबोयोग्राफी शम्मी कपूर द गेम चेंजर में एक पूरा चैप्टर मधुबाला को समर्पित किया है। इसका शीर्षक है- फेल मेडली इन लव विद मधुबाला। शम्मी कपूर इसमें कहते हैं- मैं ये जानता था कि मधु किसी और के प्यार में हैं, लेकिन इसके बाद भी मैं ये स्वीकार करना चाहता हूं कि मैं उनसे पागलों की तरह प्यार करने लगा था। इसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि मैं ने उनसे ख़ूबसूरत औरत कभी नहीं देखी। शम्मी कपूर ने 2011 में प्रकाशित इस आत्मकथा में कहा कि छह दशक बाद आज भी जब वो कभी मधुबाला के बारे में सोचते हैं तो उनके दिल की धड़कन मानो थम जाती है। मधुबाला की ख़ूबसूरती का ये आलम था कि शम्मी कपूर अपनी डेब्यू फ़िल्म रेल का डब्बा फ़िल्म की शूटिंग के दौरान मधुबाला को देखते ही अपने डॉयलाग भूल जाया करते थे।

महज 36 साल की उम्र, जीवन के आख़िरी नौ साल अपने घर में क़ैद हो कर रहने की मज़बूरी और केवल 66 फ़िल्में. लेकिन मधुबाला ने इन सबसे वो मुकाम हासिल कर लिया जो उन्हें हमेशा हमेशा के लिए अमर कर गया। जन्म से ही मधुबाला के दिल में छेद था और डॉक्टरों के मुताबिक उस बीमारी में उन्हें बहुत ज्यादा आराम की ज़रूरत थी लेकिन मधुबाला के पिता ने उन्हें ऐसी दुनिया में धकेला हुआ था जहां उन्हें लगातार काम करना पड़ा था।

दरअसल मधुबाला अपने माता-पिता ही नहीं 11 भाई बहन वाले परिवार में इकलौती आजीविका कमाने वाली थीं। पिता इंपीरियरल टौबेको कंपनी में काम किया करते थे, लाहौर में, वो नौकरी छूटी तो दिल्ली आए और फिर दिल्ली से बंबई पहुंचे तो यही ध्यान था कि ख़ूबसूरत मधुबाला को फ़िल्मों में काम मिल जाएगा। महज छह साल साल की उम्र से मधुबाला ने मायानगरी में अपने क़दम रख दिए थे।

इस काम ने उन्हें कितना खपा दिया इसकी झलक 1957 में फ़िल्मफेयर की उस ख़ास सिरीज़ में मिलती है जिसमें पत्रिका ने उस जमाने के सुपरस्टार से अपने बारे में कुछ लिखने को कहा था। नरगिस, मीना कुमारी, नूतन, राजकपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद, किशोर कुमार, अशोक कुमार सबने इसमें अपने बारे में लिखा था।

अपने बारे में मधुबाला

इस सिरीज़ में मधुबाला ने अपने बारे में कुछ लिखने से इनकार करते हुए माफ़ी मांगी थी, माफ़ीनामे में मधुबाला ने लिखा था, “मैं खुद को खो चुकी हूं। ऐसे में खुद के बारे में क्या लिखूं. मुझे ऐसा लग रहा है कि आपने मुझे उसके बारे में लिखने को कहा है जिसे मैं नहीं जानती। समय ने मुझे खुद से मिलने का वक्त नहीं दिया। जब मैं पांच साल की थी तो किसी ने मेरे बारे में पूछा नहीं और मैं इस भूल भुलैया में आ गई. फिल्म इंडस्ट्री ने मुझे पहली सीख यही दी थी कि आपको अपने बारे में सबकुछ भूलना होता है, सबकुछ खुद को भी तभी आप एक्ट कर पाते हैं, ऐसे में मैं खुद के बारे में क्या लिखूं।”

मधुबाला के फिल्मी जीवन पर ख़तीजा अक़बर ने आई वांट टू लिव- द स्टोरी ऑफ़ मधुबाला लिखी है। इस पुस्तक से गुजरने के दौरान पता चलता है कि मधुबाला की ख़ूबसूरती ने उनके अभिनय के प्रति अनुशासन और सीखने की लगन को कभी कम नहीं होने दिया। मधुबाला उस दौर में फिल्मी दुनिया की इकलौती कलाकार थीं जो समय से पहले सेट पर मौजूद होती थीं. हालांकि स्वास्थ्य कारणों से वो रात में शूटिंग नहीं किया करती थीं और अपने पूरे करियर में उन्होंने कभी आउटडोर शूटिंग में हिस्सा नहीं लिया। इसके बावजूद मधुबाला अपने समय की टॉप अभिनेत्रियों में शुमार होती रहीं।

काम के प्रति उनके परफैक्शन की मिसाल देखनी हो तो मुगले आज़म फिल्म के वो प्रेम दृश्यों को देखिए जिसमें शहजादा सलीम, अनारकली को मोर के पंखों से छेड़ता है। इस दृश्य को भारतीय सिने संसार के सबसे रोमांटिक दृश्यों में शुमार किया जाता है। ये जानना दिलचस्प है कि इन दृश्यों के अलावा भी मुगले आज़म के तमाम प्रेम दृश्यों के वक्त दिलीप कुमार और मधुबाला की आपसी बातचीत बंद थी।

दिलीप कुमार-मधुबाला की प्रेम कहानी

दोनों को एक समय में भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे रोमांटिक जोड़ी माना जाता था, दोनों एक दूसरे से प्यार भी करते थे। 1955 में पहली बार फ़िल्म इंसानियत के प्रीमियर के दौरान मधुबाला दिलीप कुमार के साथ सार्वजनिक तौर पर नज़र आईं थीं। ये पहला और इकलौता मौका था जब दिलीप कुमार और मधुबाला एक साथ सार्वजनिक तौर पर साथ नजर आए थे। इस मौके को कवर करने वाले पत्रकार के. राजदान ने बाद में लिखा था कि मधुबाला इससे ज़्यादा ख़ुश पहले कभी नज़र नहीं आई थीं। रॉक्सी सिनेमा में हुए इस प्रीमियर में मधुबाला हमेशा दिलीप कुमार की बांह थामे हुए नज़र आती रहीं। शम्मी कपूर ने इस बात का जिक्र भी किया है कि किस तरह से दिलीप कुमार केवल मधुबाला को देखने के लिए मुंबई से पूना तक कार चला कर आया करते थे और दूर खड़े होकर मधुबाला को देखा करते थे।

बहरहाल, एक आम धारणा ये है कि मुधबाला के पिता नहीं चाहते थे कि मधुबाला और दिलीप कुमार की शादी हो। इसको लेकर फ़िल्मी पत्र पत्रिकाओं में काफ़ी कुछ छपता भी रहा है. लेकिन दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा दिलीप कुमार- द सब्सटेंस एंड द शैडो में इससे उलट बात कही है।

मधुबाला-दिलीप ऐसे हुए अलग?

उन्होंने लिखा है, “जैसा कि कहा जाता है, उसके उलट मधु और मेरी शादी के ख़िलाफ़ उनके पिता नहीं थे। उनकी अपनी प्रॉडक्शन कंपनी थी और वे इस बात से बेहद ख़ुश थे कि एक ही घर में दो बड़े स्टार मौजूद होंगे। वे तो चाहते थे कि दिलीप कुमार और मधुबाला एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले अपने करियर के अंत तक उनकी फिल्मों में डूएट गाते नजर आएं।”

फिर ऐसी क्या बात हुई, जिसके चलते बॉलीवुड की सबसे मशहूर प्रेम कहानी शादी तक नहीं पहुंच पाई. दिलीप कुमार ने इसके बारे में भी लिखा है, “जब मुझे मधु से उनके पिता की योजनाओं के बारे में पता चला तो मेरी उनसे कई बार बातचीत हुई जिसमें मैंने उन दोनों से कहा कि मेरे काम करने का अपना तरीका है, मैं अपने हिसाब से प्रोजेक्ट चुनता हूं और उसमें मेरा अपना भी प्रॉडक्शन हाउस हो तो भी ढिलाई नहीं कर सकता।”

दिलीप कुमार के मुताबिक उनकी यही बात मधुबाला के पिता अयातुल्ला ख़ान को पसंद नहीं आई और उन्होंने दिलीप कुमार को जिद्दी और अड़ियल मानना शुरू कर दिया। दिलीप के मुताबिक मधुबाला का रुझान हमेशा अपने पिता की तरफ़ रहा और वो कहती रहीं कि शादी होने के बाद सबकुछ ठीक हो जाएगा।

ऐसा भी नहीं था कि दिलीप शादी के लिए तैयार नहीं थे, 1956 में ढाके की मलमल फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक दिन उन्होंने मधुबाला से कहा भी काज़ी इंतज़ार कर रहे हैं चलो मेरे घर आज शादी कर लेते हैं लेकिन उनकी बातों पर मुधबाला रोने लगीं. दिलीप कुमार कहते रहे कि अगर आज तुम नहीं चली तो मैं तुम्हारे पास लौटकर नहीं आऊंगा, कभी नहीं आऊंगा।

दिलीप कुमार उसके बाद मधुबाला के पास नहीं लौटे क्योंकि दोनों के बीच 1957 में ऐसा विवाद हो गया जिसकी आंच ने इस मोहब्बत को असमय ख़त्म कर डाला। 1957 में प्रदर्शित नया दौर फ़िल्म के लिए दिलीप कुमार और मुधबाला को निर्देशक बीआर चोपड़ा ने साइन किया. इस फ़िल्म की आउटडोर शूटिंग पूना और भोपाल में होनी थी, लेकिन मधुबाला के पिता ने मधुबाला को भोपाल भेजने से इनकार कर दिया तब तक बीआर चोपड़ा अपनी फ़िल्म की काफ़ी शूटिंग कर चुके थे।

पेशे से वकील रह चुके बीआर चोपड़ा मामले को कोर्ट में ले गए और इस बीच उन्होंने मधुबाला की जगह वैजयंती माला को साइन कर लिया। इसी मामले की सुनवाई के दौरान दिलीप कुमार ने कोर्ट में कहा था कि वे मधुबाला से मोहब्बत करते हैं और उनके मरने तक तक मोहब्बत करते रहेंगे लेकिन उन्होंने अपना बयान बीआर चोपड़ा के पक्ष में दिया था।

दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में इसके बारे में लिखा है कि उन्होंने अपनी ओर से सुलह की बहुत कोशिश की थी लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ था और पूरे मामले में बीआर चोपड़ा का पक्ष सही था।  इसके बाद मधुबाला को यक़ीन हो गया कि दिलीप कुमार उनके पास कभी नहीं लौटेंगे।

किशोर कुमार से शादी

इस अलगाव के चलते ही मधुबाला ने शादी करने का मन बनाया होगा लेकिन वो किशोर कुमार से एक दिन शादी कर लेंगी, इसका भरोसा किसी को नहीं था. लेकिन जिस वक्त मधुबाला और दिलीप कुमार की राहें अलग होने लगी थीं, उसी वक्त किशोर कुमार का अपनी पहली पत्नी रोमा देवी से तलाक़ हुआ था और दोनों एक साथ कई फ़िल्मों में काम कर रहे थे।

इस वजह से दोनों के बीच एक आकर्षण हुआ हो और 1960 में किशोर कुमार और मधुबाला ने शादी कर ली। किशोर कुमार के साथ शादी के फ़ैसले ने मधुबाला को दिलीप कुमार से अलग होने के तुलना में कहीं ज़्यादा अाघात पहुंचाया। किशोर कुमार को मधुबाला की बीमारी के बारे में पता तो था लेकिन उसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं था. वे मधुबाला को इलाज़ के लिए लंदन ले गए, जहां डॉक्टरों ने जवाब देते हुए कहा कि अब ज्यादा से ज्यादा मधुबाला एक से दो साल ही जी पाएंगी।

इसके बाद किशोर कुमार जब लौटे तो उन्होंने मधुबाला को उनके पिता और बहनों के पास छोड़ आए और कहा कि वे इतने व्यस्त रहते हैं कि मधुबाला की देखभाल नहीं कर पाऐेंगे। वो मधुबाला से मिलने के लिए आते ज़रूर रहे लेकिन तीन चार महीनों के अंतराल पर यानी जब मधुबाला को किशोर कुमार के साथ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब किशोर कुमार के पास उनके लिए समय ही नहीं था।

ऐसे में दिल की बीमारी बढ़ती गई लेकिन मधुबाला के अंदर जीने की इच्छा काफ़ी भरी हुई थी, लिहाजा वो डॉक्टरों के हाथ खड़े करने के बाद नौ साल तक जीवित रहीं लेकिन जीवन के आख़िरी नौ साल उन्होंने बेहद एकाकी में गुजारे। इस दौरान बेहद गिने चुने लोग ही उनका हाल चाल जानने के लिए उनके घर जाते रहे थे। इसमें दिलीप कुमार का परिवार भी शामिल था।

हालांकि मुगले आज़म के रिलीज़ होने के ठीक बाद मधुबाला गंभीर रूप से बीमार हो गईं, हालांकि अगले चार साल तक उनके काम वाली फिल्में रिलीज़ होती रहीं लेकिन मुधबाला आख़िरी दिनों में देखने में कैसी थीं, इसको लेकर भी कम कयास नहीं लगाए जाते रहे हैं.

बॉलीवुड टॉप 20- सुपरस्टार्स ऑफ़ इंडिया में मधुबाला के अंतिम दिनों की झलक मिलती है। दिलीप कुमार की बहन सईदा ख़ान के मुताबिक मधुबाला की मौत से एक दिन पहले वो उनसे मिली थीं और उस वक्त तक उनकी ख़ूबसूरती में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई थी।

हालांकि लंबी बीमारी के चलते वो थकी हारीं ज़रूर हुई थीं लेकिन चेहरे का नूर बना रहा था लेकिन शायद बीमारी ने मधुबाला के आत्मबल को कमज़ोर किया था, तभी अपने अंतिम दिनों में वो मेकअप करने लगीं थीं। सुपरस्टार्श ऑफ़ इंडिया में फिल्म निर्देशक शक्ति सामंता ने बताया कि वो भी मधुबाला की मौत से ठीक एक दिन पहले उनसे मिले थे और वो काफी मेकअप में थीं हालांकि अपने पूरे फ़िल्मी करियर के दौरान वो काफ़ी कम मेकअप करने के लिए मशहूर रही थीं।

उनकी जिस ख़ूबसूरती का बॉलीवुड में कभी डंका बजता था, उस दुनिया ने उन्हें भुला दिया लेकिन वो भारतीय सिने प्रेमियों के दिलों पर राज करती रहीं। भारतीय डाक सेवा ने 18 मार्च, 2008 को मधुबाला की याद में एक डाक टिकट जारी किया था, इस मौके पर फ़िल्म अभिनेता मनोज कुमार ने कहा था, मधुबाला देश का चेहरा थीं। शताब्दी में कोई एक मधुबाला ही हो सकती हैं. जब भी उन्हें मैं देखता था तो मेरे दिल में ग़जल गूंजने लगती थी। वाकई में मधुबाला कोई दूसरी नहीं हो सकती थीं, जिसकी तस्वीर देखने मात्र से दिलों में संवेदनाओं के तार झंकृत होने लगते हों. हमारे भी और आपके भी।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

बिहार की आकाँक्षा ने बनाया बच्चों को पढ़ाने वाला रोबोट

बेंगलुरु से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली आकांक्षा आनंद ने एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो बच्चों की पढ़ाई में उनकी मदद करेगा। उनका बनाया हुआ ये रोबोट बच्चों को खेल-खेल में पढ़ने लिखने की चीजें सिखाएगा। इस रोबोट का नाम निनो रखा गया है।

बता दें, आकांक्षा एजुकेशन सिस्टम को एक नया रूप देना चाहती हैं जिसके बाद उन्होंने इस मॉडल को बनाने की तैयारी की वह बिहार की राजधानी पटना की रहने वाली हैं. बेंगलुरु से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने दो साल तक एक आईटी कंपनी में नौकरी की. फिर वह ‘सिरेना टेक्नॉलजी’ के साथ काम करने लगी। इस कंपनी में वह रोबोटिक्स के क्षेत्र में काम करती हैं।

आकांक्षा ने पढ़ाई के दौरान हांगकांग, चीन और ताइवान घूम चुकी हैं. वहां के बच्चों में उन्होंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चों को रोबोट बना रहे हैं और उनके साथ खेल रहे हैं। तब उन्होंने सोचा कि जब दूसरे देश के बच्चे इसे आसानी से समझ सकते हैं तो हमारे देश के बच्चे भी इसे आसानी से समझ सकते हैं जिसके बाद उन्होंने ऐसा रोबोट बनाने की सोची जो बच्चों को नए और अलग तरीके से पढ़ाना, खेलना, डांस जैसी चीजों को सिखाने में मदद करें ताकि बच्चे पढ़ाई में रुचि लें। रोबोट की खासियत है कि ये बात कर लेता है और डांस भी करता है। इसे ऐप या वॉइस कमांड के जरिए संचालित किया जा सकता है।

आकांक्षा के इस प्रोजेक्ट में कर्नाटक सरकार ने भी मदद की है और इस प्रयास के लिए प्रोत्साहित भी किया. वही इस रोबोट से पहले आकांक्षा ने अभी तक कई तरह के रोबोट बनाए हैं, जो अलग-अलग काम करते हैं।  इनमें ह्यूमेनाइड रोबोट, रोबोटिक आर्म, ऑटोमोबाइल किट, पेट रोबोट, क्वार्डबोट रोबोट जैसे कई रोबोट शामिल हैं।

युवाओं को डेटिंग ऐप ज्यादा पसंद

भारतीय युवा वैवाहिक साइटों और विज्ञापनों के बजाय मोबाइल डेटिंग एप और सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से जुड़ना ज्यादा पसंद करते हैं. मंगलवार को जारी एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ है। सर्वेक्षण के हवाले से एसोचैम ने एक बयान में कहा, कुल उत्तरदाताओं में से करीब 55 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने निर्धारित मानदंडों और परंपराओं से हटकर अनौपचारिक डेटिंग और किसी से जुड़ने के लिए डेटिंग ऐप का इस्तेमाल किया।

एसोचैम के सोशल मीडिया शाखा ने चार मेट्रो शहर समेत 10 बड़े शहरों में 20 से 30 साल की आयुसीमा के 1,500 लोगों पर 1 जनवरी से 10 फरवरी के बीच यह सर्वे आयोजित किया था। बयान में कहा गया, उत्तरदाताओं में अधिकतर लोगों ने कहा कि यह सुरक्षित है, क्योंकि इससे उन्हें अपनी पहचान ना बताने की अनुमति मिलती है, भले ही उनके पास उसे दिखाने का विकल्प हो। एसोचैम के प्रधानसचिव डी.एस. रावत ने कहा कि निकट भविष्य में डेटिंग ऐप को और ज्यादा प्रसिद्धि मिलेगी, क्योंकि यह ऑनलाइन लोगों से मिलने और उनके साथ जुड़ने के अवसरों की पेशकश करते हैं। उन्होंने कहा, फिलहाल यह एक नवोदित स्तर पर है और इसका मूल्य 500 करोड़ रुपये का भी नहीं है, लेकिन भारत मे बढ़ती युवाओं की संख्या ऑनलाइन डेटिंग के लिए प्रयास कर रही है और आने वाले दिनों में यह करोड़ों का उद्योग बन जाएगा।

विटामिन डी नहीं मिलने से खोखली हो रही हैं हड्डियाँ

शीशे से बंद एयरकंडीशनिंग वाले घर और दफ्तर भले ही आरामदायक महसूस होते हों, लेकिन ये आपकी हड्डियों को खोखला बना रहे हैं। आधुनिक जीवन शैली की प्रतीक माने जाने वाले ऐसे घर और दफ्तर न केवल ताजा हवा, बल्कि धूप से भी लोगों को वंचित करते हैं, जिस कारण शरीर में विटामिन-डी की कमी होती है और हड्डियां कमजोर होती हैं। नई दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ अस्थि शल्य चिकित्सक डॉ. राजू वैश्य ने देश के अलग-अलग शहरों में जोड़ों में दर्द एवं गठिया (अर्थराइटिस) के एक हजार मरीजों पर अध्ययन कर पाया कि ऐसे मरीजों में से 95 प्रतिशत मरीजों में विटामिन-डी की कमी होती है और इसका एक मुख्य कारण पर्याप्त मात्रा में धूप न मिलना है, जो विटामिन-डी का मुख्य स्रोत है।

दरअसल विटामिन-डी का मुख्य स्रोत सूर्य की रोशनी है, जो हड्डियों के अलावा पाचन क्रिया में भी बहुत उपयोगी है। व्यस्त दिनचर्या और आधुनिक संसाधनों के कारण लोग तेज धूप नहीं ले पाते। खुले मैदान में घूमना-फिरना और खेलना भी बंद हो गया. इस कारण धूप के जरिए मिलने वाला विटामिन-डी उन तक नहीं पहुंच पाता।

जब भी किसी को घुटने या जोड़ में दर्द होता है, तो उसे लगता है कि कैल्शियम की कमी हो गई है, जबकि विटामिन-डी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। डॉक्टरों का कहना है अगर कैल्शियम के साथ-साथ विटामिन-डी की भी समय पर जांच करवा ली जाए तो आर्थराइटिस को बढ़ने से रोका जा सकता है।

बचपन में खानपान की गलत आदतों व कैल्शियम की कमी के कारण आर्थराइटिस के अलावा ऑस्टियोपोरोसिस की भी संभावना बहुत अधिक होती है. ऑस्टियोपोरोसिस में कैल्शियम की कमी के कारण हड्डियों का घनत्व एवं अस्थि मज्जा बहुत कम हो जाता है। साथ ही हड्डियों की बनावट भी खराब हो जाती है, जिससे हड्डियां अत्यंत भुरभुरी और अति संवेदनशील हो जाती हैं। इस कारण हड्डियों पर हल्का दबाव पड़ने या हल्की चोट लगने पर भी वे टूट जाती हैं।

 अमेरिकन सोसाइटी फॉर बोन एंड मेडिकल रिसर्च में पेश किए गए एक शोधपत्र में बताया गया है कि प्रतिदिन केवल एक पेय पदार्थ जैसे कोला पीने वाली महिलाओं की तुलना में प्रतिदिन तीन कोला पीने वाली महिलाओं के कूल्हे की हड्डियों का घनत्व 2. 3 से 5.1 प्रतिशत तक कम पाया गया।

यूजीसी ने विश्वविद्यालयों से तीन वर्ष में पाठ्यचर्या का उन्नयन एवं समीक्षा करने का सुझाव दिया

नयी दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग :यूजीसी: ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को प्रत्येक तीन वर्ष में अपनी पाठ्यचर्या का उन्नयन करने और उसकी समीक्षा करने का सुझाव दिया है । मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक अधिकारी ने  बताया, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्चतर शिक्षा में गुणवत्ता और उत्कृष्ठता में सुधार लाने के लिये कई उपाए किये हैं । शैक्षिक स्तर बढ़ाने के लिये की गई महत्वपूर्ण पहल में यूजीसी ने पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या सुधार के लिये उपाए शुरू किये हैं। उन्होंने बताया कि उच्चतर शैक्षिक संस्थाएं अपने पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या तैयार करने के लिये स्वतंत्र हैं ।

मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यूजीसी ने उच्चतर शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की दृष्टि से ऐच्छिक और अनिवार्य पाठ्यक्रम के लिये विभिन्न विषयों में माडल पाठ्यक्रम निर्धारित किये हैं । इन पाठ्यक्रमों की समय समय पर समीक्षा की जाती है ।

अधिकारी ने बताया ‘‘ यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को प्रत्येक तीन वर्ष में अपनी पाठ्यचर्या का उन्नयन और समीक्षा करने का सुझाव दिया है ताकि इन्हें रोजगारोन्मुखी बनाने के साथ कौशल सम्पन्न बनाया जा सके । ’’ यूजीसी ने पाठ्यक्रमों में नवाचार और सुधार लाने, शिक्षण सुगम बनाने के साथ परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली के माध्यम से उच्चतर शिक्षा में शैक्षिक मानकों एवं गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिये विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली :सीबीसीएस: जैसी पहलें की हैं ।

उन्होंने बताया कि सीबीसीएस एक ‘‘कैफिटेरिया’’ जैसा दृष्टिकोण उपलब्ध कराती है जहां छात्र अपनी पसंद के पाठ्यक्रम ले सकते हैं, अपनी गति से अध्ययन कर सकते हैं, अतिरिक्त पाठ्यक्रम ले सकते हैं, क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं और शिक्षण के प्रति अलग अलग विषयों पर आधारित दृष्टिकोण को अपना सकते हैं ।

सीबीसीएस की शुरूआत से पाठ्यचर्याओं का प्रारूप बनाने के साथ सेमेस्टर प्रणाली सुनिश्चित की जा सकेगी । मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यूजीसी ने अब तक 91 मुख्य पाठ्यक्रमों और 18 विशिष्ठ पाठ्यक्रमों की पाठ्यचर्या का नमूना तैयार किया है ।

(साभार – पीटीआई)

यूजीसी नेट परीक्षा 8 जुलाई को, जेआरएफ में उच्च आयु सीमा दो साल बढ़ायी गई

नयी दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) आठ जुलाई को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा का आयोजन करेगा और इसके तहत जूनियर रिसर्च फेलोशिप में सम्मिलित होने के लिये अधिकतम आयु सीमा दो साल बढ़ा दी गई है । सीबीएसई के एक अधिकारी ने  बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (यूजीसी नेट) के लिये उम्मीदवार 6 मार्च 2018 से आनलाइन आवेदन कर सकेंगे । आनलाइन आवेदन करने की आखिरी तरीख 5 अप्रैल 2018 है और शुल्क का भुगतान 6 अप्रैल 2018 तक किया जा सकेगा ।

यूजीसी नेट के तहत जूनियर रिसर्च फेलोशिप :जेआरएफ: में सम्मिलित होने के लिये अधिकतम आयु सीमा दो साल बढ़ा दी गई है, अर्थात वर्तमान उच्च आयु सीमा को 28 वर्ष से बढ़ाकर 30 वर्ष कर दिया गया है ।

सहायक प्रोफेसर और जूनियर रिसर्च फोलोशिप की पात्रता के लिये आयोजित होने वाले यूजीसी नेट की संशोधित स्कीम के अनुसार परीक्षा में दो पत्र होंगे । इसमें पहला पत्र 100 अंकों का होगा जिसमें 50 प्रश्न पूछे जायेंगे और सभी प्रश्न अनिवार्य होंगे । दूसरा पत्र 200 अंकों का होगा जिसमें 100 प्रश्न होंगे और सभी प्रश्न अनिवार्य होंगे ।

प्रश्नपत्र प्रथम में 50 वस्तुनिष्ठ प्रश्न होंगे और प्रत्येक प्रश्न दो अंकों के होंगे । ये प्रश्न सामान्य प्रकृति के होंगे जिनका उद्देश्य उम्मीदवारों की शिक्षण और अनुसंधान अभिरूचि का निर्धारण करना है । यह मूल रूप से उम्मीदवारों की तार्किक क्षमता, सोच और सामान्य जागरूकता का परीक्षण करने के लिये तैयार किया गया है । दूसरे प्रश्नपत्र में उम्मीदवारों द्वारा चयन किये गए विषय पर आधारित 100 वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न होंगे और सभी प्रश्न दो अंकों के होंगे ।

(साभार – पीटीआई)

आशा भोसले को मिला यश चोपड़ा मेमोरियल अवॉर्ड

मुंबई : लोकप्रिय गायिका आशा भोसले को पांचवा यश चोपड़ा मेमोरियल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। गायिका को सदाबहार अभिनेत्री रेखा ने इस अवार्ड से नवाजते हुए कहा कि उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ा कलाकार बनाने का श्रेय गायिका और यश चोपड़ा को जाता है।
उन्होंने कहा, “ मैं यहां दो लोगों यशजी और आशा भोसले की वजह से हूं। वह मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं। गायिका अंदर और बाहर से खूबसूरत हैं। मैंने मंगेशकर परिवार से काफी कुछ सीखा है।”  इससे पहले इस अवॉर्ड से लता मंगेशकर, अमिताभ बच्चन, रेखा और शाहरुख खान को नवाजा गया है।
इस मौके पर गायिका ने कहा, “अवॉर्ड पाना अच्छा लगता है। यह एक विशेष अवॉर्ड है। मैं उनके नाम का अवॉर्ड पाकर खुश हूं लेकिन मैं दुखी हूं कि वह आज जिंदा नहीं है। मैं हमेशा सोचती हूं कि अगर वह जिंदा होते तो। मुझे कोई उत्तर नहीं मिलता।”

तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

महादेवी वर्मा

तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या?

तेरा मुख सहास अरूणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल-खेल, थक-थक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?

तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या?

चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?

यही सच है

मन्नू भंडारी

कानपुर

सामने आंगन में फैली धूप सिमटकर दीवारों पर चढ ग़ई और कन्धे पर बस्ता लटकाए नन्हे-नन्हे बच्चों के झुंड-के-झुंड दिखाई दिए, तो एकाएक ही मुझे समय का आभास हुआ। घंटा भर हो गया यहां खडे-ख़डे और संजय का अभी तक पता नहीं! झुंझलाती-सी मैं कमरे में आती हूं। कोने में रखी मेज पर किताबें बिखरी पडी हैं, कुछ खुली, कुछ बन्द। एक क्षण मैं उन्हें देखती रहती हूं, फिर निरूद्देश्य-सी कपडोंं की अलमारी खोलकर सरसरी-सी नजर से कपडे देखती हूं। सब बिखरे पडे हैं। इतनी देर यों ही व्यर्थ खडी रही; इन्हें ही ठीक कर लेती। पर मन नहीं करता और फिर बन्द कर देती हूं।

नहीं आना था तो व्यर्थ ही मुझे समय क्यों दिया? फिर यह कोई आज ही की बात है! हमेशा संजय अपने बताए हुए समय से घंटे-दो घंटे देरी करके आता है, और मैं हूं कि उसी क्षण से प्रतीक्षा करने लगती हूं। उसके बाद लाख कोशिश करके भी तो किसी काम में अपना मन नहीं लगा पाती। वह क्यों नहीं समझता कि मेरा समय बहुत अमूल्य है; थीसिस पूरी करने के लिए अब मुझे अपना सारा समय पढाई में ही लगाना चाहिए। पर यह बात उसे कैसे समझाऊं!

मेज पर बैठकर मैं फिर पढने का उपक्रम करने लगती हूं, पर मन है कि लगता ही नहीं। पर्दे के जरा-से हिलने से दिल की धडक़न बढ ज़ाती है और बार-बार नजर घडी क़े सरकते हुए कांटों पर दौड ज़ाती है। हर समय यही लगता है, वह आया!   वह आया!

तभी मेहता साहब की पांच साल की छोटी बच्ची झिझकती-सी कमरे में आती है,
”आंटी, हमें कहानी सुनाओगी?”
”नहीं, अभी नहीं, पीछे आना!” मैं रूखाई से जवाब देती हूं। वह भाग जाती है। ये मिसेज मेहता भी एक ही हैं! यों तो महीनों शायद मेरी सूरत नहीं देखतीं; पर बच्ची को जब-तब मेरा सिर खाने को भेज देती हैं। मेहता साहब तो फिर भी कभी-कभी आठ-दस दिन में खैरियत पूछ ही लेते हैं, पर वे तो बेहद अकडू मालूम होती हैं। अच्छा ही है, ज्यादा दिलचस्पी दिखाती तो क्या मैं इतनी आजादी से घूम-फिर सकती थी?

खट-खट-खट   वही परिचित पद-ध्वनि! तो आ गया संजय। मैं बरबस ही अपना सारा ध्यान पुस्तक में केंन्द्रित कर लेती हूं। रजनीगन्धा के ढेर-सारे फूल लिए संजय मुस्कुराता-सा दरवाजे पर खडा है। मैं देखती हूं, पर मुस्कुराकर स्वागत नहीं करती। हंसता हुआ वह आगे बढता है और फूलों को मेज पर पटककर, पीछे से मेरे दोनों कन्धे दबाता हुआ पूछता है, ”बहुत नाराज हो?”

रजनीगन्धा की महक से जैसे सारा कमरा महकने लगता है।

”मुझे क्या करना है नाराज होकर?” रूखाई से मैं कहती हूं। वह कुर्सी सहित मुझे घुमाकर अपने सामने कर लेता है, और बडे दुलार के साथ ठोडी उठाकर कहता, ”तुम्हीं बताओ क्या करता? क्वालिटी में दोस्तों के बीच फंसा था। बहुत कोशिश करके भी उठ नहीं पाया। सबको नाराज क़रके आना अच्छा भी नहीं लगता।”

इच्छा होती है, कह दूं- ”तुम्हें दोस्तों का खयाल है, उनके बुरा मानने की चिन्ता है, बस मेरी ही नहीं!” पर कुछ कह नहीं पाती, एकटक उसके चेहरे की ओर देखती रहती हूं   उसके सांवले चेहरे पर पसीने की बूंदें चमक रही हैं। कोई और समय होता तो मैंने अपने आंचल से इन्हें पोंछ दिया होता, पर आज नहीं। वह मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा है, उसकी आंखें क्षमा-याचना कर रही हैं, पर मैं क्या करूं? तभी वह अपनी आदत के अनुसार कुर्सी के हत्थे पर बैठकर मेरे गाल सहलाने लगता है। मुझे उसकी इसी बात पर गुस्सा आता है। हमेशा इसी तरह करेगा और फिर दुनिया-भर का लाड-दुलार दिखलाएगा। वह जानता जो है कि इसके आगे मेरा क्रोध टिक नहीं पाता। फिर उठकर वह फूलदान के पुराने फूल फेंक देता है, और नए फूल लगाता है। फूल सजाने में वह कितना कुशल है! एक बार मैंने यों ही कह दिया था कि मुझे रजनीगन्धा के फूल बडे पसन्द हैं, तो उसने नियम ही बना लिया कि हर चौथे दिन ढेर-सारे फूल लाकर मेरे कमरे में लगा देता है। और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।

थोडी देर बाद हम घूमने निकल जाते हैं। एकाएक ही मुझे इरा के पत्र की बात याद आती है। जो बात सुनने के लिए में सवेरे से ही आतुर थी, इस गुस्सेबाजी में जाने कैसे उसे ही भूल गई!

”सुनो, इरा ने लिखा है कि किसी दिन भी मेरे पास इंटरव्यू का बुलावा आ सकता है, मुझे तैयार रहना चाहिए।”
”कहां, कलकत्ता से?” कुछ याद करते हुए संजय पूछता है, और फिर एकाएक ही उछल पडता है, ”यदि तुम्हें वह जॉब मिल जाए तो मजा आ जाए, दीपा, मजा आ जाए!”

हम सडक़ पर हैं, नहीं तो अवश्य ही उसने आवेश में आकर कोई हरकत कर डाली होती। जाने क्यों, मुझे उसका इस प्रकार प्रसन्न होना अच्छा नहीं लगता। क्या वह चाहता है कि मैं कलकत्ता चली जाऊं, उससे दूर?
तभी सुनाई देता है, ”तुम्हें यह जॉब मिल जाए तो मैं भी अपना तबादला कलकत्ता ही करवा लूं, हेड अॉफिस में। यहां की रोज क़ी किच-किच से तो मेरा मन ऊब गया है। कितनी ही बार सोचा कि तबादले की कोशिश करूं, पर तुम्हारे खयाल ने हमेशा मुझे बांध लिया। ऑफिस में शान्ति हो जाएगी, पर मेरी शामें कितनी वीरान हो जाएंगी!”

उसके स्वर की आर्द्रता ने मुझे छू लिया। एकाएक ही मुझे लगने लगा कि रात बडी सुहावनी हो चली है।

हम दूर निकलकर अपनी प्रिय टेकरी पर जाकर बैठ जाते हैं। दूर-दूर तक हल्की-सी चांदनी फैली हुई है और शहर की तरह यहां का वातावरण धुएं से भरा हुआ नहीं है। वह दोनों पैर फैलाकर बैठ जाता है और घंटों मुझे अपने ऑफिस के झगडे क़ी बात सुनाता है और फिर कलकत्ता जाकर साथ जीवन बिताने की योजनाएं बनाता है। मैं कुछ नहीं बोलती, बस एकटक उसे देखती हूं, देखती रहती हूं।

जब वह चुप हो जाता है तो बोलती हूं, ”मुझे तो इंटरव्यू में जाते हुए बडा डर लगता है। पता नहीं, कैसे-क्या पूछते होंगे! मेरे लिए तो यह पहला ही मौका है।”

वह खिलखिलाकर हंस पडता है।

”तुम भी एक ही मूर्ख हो! घर से दूर, यहां कमरा लेकर अकेली रहती हो, रिसर्च कर रही हो, दुनिया-भर में घूमती-फिरती हो और इंटरव्यू के नाम से डर लगता है। क्यों?” और गाल पर हल्की-सी चपत जमा देता है। फिर समझाता हुआ कहता है, ”और देखो, आजकल ये इंटरव्यू आदि तो सब दिखावा-मात्र होते हैं। वहां किसी जान-पहचान वाले से इन्फ्लुएंस डलवाना जाकर!”
”पर कलकत्ता तो मेरे लिए एकदम नई जगह है। वहां इरा को छोडक़र मैं किसी को जानती भी नहीं। अब उन लोगों की कोई जान-पहचान हो तो बात दूसरी है,” असहाय-सी मैं कहती हूं।
”और किसी को नहीं जानतीं?” फिर मेरे चेहरे पर नजरें गडाकर पूछता है, ”निशीथ भी तो वहीं है?”
”होगा, मुझे क्या करना है उससे?” मैं एकदम ही भन्नाकर जवाब देती हूं। पता नहीं क्यों, मुझे लग ही रहा था कि अब वह यही बात कहेगा।
”कुछ नहीं करना?” वह छेडने के लहजे में कहता है।
और मैं भभक पडती हूं, ”देखो संजय, मैं हजार बार तुमसे कह चुकी हूं कि उसे लेकर मुझसे मजाक मत किया करो! मुझे इस तरह का मजाक जरा भी पसन्द नहीं है!”

वह खिलखिलाकर हंस पडता है, पर मेरा तो मूड ही खराब हो जाता है।
हम लौट पडते हैं। वह मुझे खुश करने के इरादे से मेरे कन्धे पर हाथ रख देता है। मैं झपटकर हाथ हटा देती हूं, ”क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?”
”कौन है यहां जो देख लेगा? और देख लेगा तो देख ले, आप ही कुढेग़ा।”
”नहीं, हमें पसन्द नहीं हैं यह बेशर्मी!” और सच ही मुझे रास्ते में ऐसी हरकतें पसन्द नहीं हैं चाहे रास्ता निर्जन ही क्यों न हो; पर है तो रास्ता ही; फिर कानपुर जैसी जगह।

कमरे में लौटकर मैं उसे बैठने को कहती हूं; पर वह बैठता नहीं; बस, बांहों में भरकर एक बार चूम लेता है। यह भी जैसे उसका रोज क़ा नियम है।

वह चला जाता है। मैं बाहर बालकनी में निकलकर उसे देखती रहती हूं। उसका आकार छोटा होते-होते सडक़ के मोड पर जाकर लुप्त हो जाता है। मैं उधर ही देखती रहती हूं – निरूद्देश्य-सी खोई-खोई-सी। फिर आकर पढने बैठ जाती हूं।

रात में सोती हूं तो देर तक मेरी आंखें मेज पर लगे रजनीगन्धा के फूलों को ही निहारती रहती हैं। जाने क्यों, अक्सर मुझे भ्रम हो जाता है कि ये फूल नहीं हैं, मानो संजय की अनेकानेक आंखें हैं, जो मुझे देख रही हैं, सहला रही हैं, दुलरा रही हैं। और अपने को यों असंख्य आंखों से निरन्तर देखे जाने की कल्पना से ही मैं लजा जाती हूं।

मैंने संजय को भी एक बार यह बात बताई थी, तो वह खूब हंसा था और फिर मेरे गालों को सहलाते हुए उसने कहा था कि मैं पागल हूं, निरी मूर्खा हूं!

कौन जाने, शायद उसका कहना ही ठीक हो, शायद मैं पागल ही होऊं!

कानपुर

मैं जानती हूं, संजय का मन निशीथ को लेकर जब-तब सशंकित हो उठता है; पर मैं उसे कैसे विश्वास दिलाऊं कि मैं निशीथ से नफरत करती हूं, उसकी याद-मात्र से मेरा मन घृणा से भर उठता है। फिर अठारह वर्ष की आयु में किया हुआ प्यार भी कोई प्यार होता है भला! निरा बचपन होता है, महज पागलपन! उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं, गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरम्भ होता है, जरा-सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है। और उसके बाद आहों, आंसुओं और सिसकियों का एक दौर, सारी दुनिया की निस्सारता और आत्महत्या करने के अनेकानेक संकल्प और फिर एक तीखी घृणा। जैसे ही जीवन को दूसरा आधार मिल जाता है, उन सबको भूलने में एक दिन भी नहीं लगता। फिर तो वह सब ऐसी बेवकूफी लगती है, जिस पर बैठकर घंटों हंसने की तबीयत होती है। तब एकाएक ही इस बात का अहसास होता है कि ये सारे आंसूं, ये सारी आहें उस प्रेमी के लिए नहीं थीं, वरन् जीवन की उस रिक्तता और शून्यता के लिए थीं, जिसने जीवन को नीरस बनाकर बोझिल कर दिया था।

तभी तो संजय को पाते ही मैं निशीथ को भूल गई। मेरे आंसू हंसी में बदल गए और आहों की जगह किलकारियां गूंजने लगीं। पर संजय है कि जब-तब निशीथ की बात को लेकर व्यर्थ ही खिन्न-सा हो उठता है। मेरे कुछ कहने पर वह खिलखिला अवश्य पडता है; पर मैं जानती हूं, वह पूर्ण रूप से आश्वस्त नहीं है।

उसे कैसे बताऊं कि मेरे प्यार का, मेरी कोमल भावनाओं का, भविष्य की मेरी अनेकानेक योजनाओं का एकमात्र केन्द्र संजय ही है। यह बात दूसरी है कि चांदनी रात में, किसी निर्जन स्थान में, पेड-तले बैठकर भी मैं अपनी थीसिस की बात करती हूं या वह अपने ऑफिस की, मित्रों की बातें करता है,या हम किसी और विषय पर बात करने लगते हैं   पर इस सबका यह मतलब तो नहीं कि हम प्रेम नहीं करते! वह क्यों नहीं समझता कि आज हमारी भावुकता यथार्थ में बदल गई हैं, सपनों की जगह हम वास्तविकता में जीते हैं! हमारे प्रेम को परिपक्वता मिल गई हैं, जिसका आधार पाकर वह अधिक गहरा हो गया है, स्थायी हो गया है।

पर संजय को कैसे समझाऊं यह सब? कैसे उसे समझाऊं कि निशीथ ने मेरा अपमान किया है, ऐसा अपमान, जिसकी कचोट से मैं आज भी तिलमिला जाती हूं। सम्बन्ध तोडने से पहले एक बार तो उसने मुझे बताया होता कि आखिर मैंने ऐसा कौन-सा अपराध कर डाला था, जिसके कारण उसने मुझे इतना कठोर दंड दे डाला? सारी दुनिया की भर्त्सना, तिरस्कार, परिहास और दया का विष मुझे पीना पडा। विश्वासघाती! नीच कहीं का! और संजय सोचता है कि आज भी मेरे मन में उसके लिए कोई कोमल स्थान है! छिः! मैं उससे नफरत करती हूं! और सच पूछो तो अपने को भाग्यशालिनी समझती हूं कि मैं एक ऐसे व्यक्ति के चंगुल में फंसने से बच गई, जिसके लिए प्रेम महज एक खिलवाड है।

संजय, यह तो सोचो कि यदि ऐसी कोई भी बात होती, तो क्या मैं तुम्हारे आगे, तुम्हारी हर उचित-अनुचित चेष्टा के आगे, यों आत्मसमर्पण करती? तुम्हारे चुम्बनों और आलिंगनों में अपने को यों बिखरने देती? जानते हो, विवाह से पहले कोई भी लडक़ी किसी को इन सबका अधिकार नहीं देती। पर मैंने दिया। क्या केवल इसीलिए नहीं कि मैं तुम्हें प्यार करती हूं, बहुत-बहुत प्यार करती हूं? विश्वास करो संजय, तुम्हारा-मेरा प्यार ही सच है। निशीथ का प्यार तो मात्र छल था, भ्रम था, झूठ था।

कानपुर

परसों मुझे कलकत्ता जाना है। बडा डर लग रहा है। कैसे क्या होगा? मान लो, इंटरव्यू में बहुत नर्वस हो गई, तो? संजय को कह रही हूं कि वह भी साथ चले; पर उसे ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल सकती। एक तो नया शहर, फिर इंटरव्यू! अपना कोई साथ होता तो बडा सहारा मिल जाता। मैं कमरा लेकर अकेली रहती हूं यों अकेली घूम-फिर भी लेती हूं तो संजय सोचता है, मुझमें बडी हिम्मत है, पर सच, बडा डर लग रहा है।

बार-बार मैं यह मान लेती हूं कि मुझे नौकरी मिल गई है और मैं संजय के साथ वहां रहने लगी हूं। कितनी सुन्दर कल्पना है, कितनी मादक! पर इंटरव्यू का भय मादकता से भरे इस स्वप्नजाल को छिन्न-भिन्न कर देता है   ।

काश, संजय भी किसी तरह मेरे साथ चल पाता!

कलकत्ता

गाडी ज़ब हावडा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर प्रवेश करती है तो जाने कैसी विचित्र आशंका, विचित्र-से भय से मेरा मन भर जाता है। प्लेटफॉर्म पर खडे असंख्य नर-नारियों में मैं इरा को ढूंढती हूं। वह कहीं दिखाई नहीं देती। नीचे उतरने के बजाय खिडक़ी में से ही दूर-दूर तक नजरें दौडाती हूं। आखिर एक कुली को बुलाकर, अपना छोटा-सा सूटकेस और बिस्तर उतारने का आदेश दे, मैं नीचे उतर पडती हूं। उस भीड क़ो देखकर मेरी दहशत जैसे और बढ ज़ाती है। तभी किसी के हाथ के स्पर्श से मैं बुरी तरह चौंक जाती हूं। पीछे देखती हूं तो इरा खडी है।

रूमाल से चेहरे का पसीना पोंछते हुए कहती हूं, ”ओफ! तुझे न देखकर मैं घबरा रही थी कि तुम्हारे घर भी कैसे पहुंचूंगी!”

बाहर आकर हम टैक्सी में बैठते हैं। अभी तक मैं स्वस्थ नहीं हो पाई हूं। जैसे ही हावडा-पुल पर गाडी पहुंचती है, हुगली के जल को स्पर्श करती हुई ठंडी हवाएं तन-मन को एक ताजग़ी से भर देती हैं। इरा मुझे इस पुल की विशेषता बताती है और मैं विस्मित-सी उस पुल को देखती हूं, दूर-दूर तक फैले हुगली के विस्तार को देखती हूं, उसकी छाती पर खडी और विहार करती अनेक नौकाओं को देखती हूं, बडे-बडे ज़हाजों को देखती हूं

उसके बाद बहुत ही भीड-भरी सडक़ों पर हमारी टैक्सी रूकती-रूकती चलती है। ऊंची-ऊंची इमारतों और चारों ओर के वातावरण से कुछ विचित्र-सी विराटता का आभास होता है, और इस सबके बीच जैसे मैं अपने को बडा खोया-खोया-सा महसूस करती हूं। कहां पटना और कानपुर और कहां यह कलकत्ता! मैंने तो आज तक कभी बहुत बडे शहर देखे ही नहीं!

सारी भीड क़ो चीरकर हम रैड रोड पर आ जाते हैं। चौडी शान्त सडक़। मेरे दोनों ओर लम्बे-चौडे ख़ुले मैदान।

”क्यों इरा, कौन-कौन लोग होंगे इंटरव्यू में? मुझे तो बडा डर लग रहा है।”
”अरे, सब ठीक हो जाएगा! तू और डर? हम जैसे डरें तो कोई बात भी है। जिसने अपना सारा कैरियर अपने-आप बनाया, वह भला इंटरव्यू में डरे! फिर कुछ देर ठहरकर कहती है, ”अच्छा, भैया-भाभी तो पटना ही होंगे? जाती है कभी उनके पास भी या नहीं?”
”कानपुर आने के बाद एक बार गई थी। कभी-कभी यों ही पत्र लिख देती हूं।”
”भई कमाल के लोग हैं! बहन को भी नहीं निभा सके!”

मुझे यह प्रसंग कतई पसन्द नहीं। मैं नहीं चाहती कि कोई इस विषय पर बात करे। मैं मौन ही रहती हूं।

इरा का छोटा-सा घर है, सुन्दर ढंग से सजाया हुआ। उसके पति के दौरे पर जाने की बात सुनकर पहले तो मुझे अफसोस हुआ था; वे होते तो कुछ मदद ही करते! पर फिर एकाएक लगा कि उनकी अनुपस्थिति में मैं शायद अधिक स्वतन्त्रता का अनुभव कर सकूं। उनका बच्चा भी बडा प्यारा है।

शाम को इरा मुझे कॉफी-हाउस ले जाती है। अचानक मुझे वहां निशीथ दिखाई देता है। मैं सकपकाकर नजर घुमा लेती हूं। पर वह हमारी मेज पर ही आ पहुंचता है। विवश होकर मुझे उधर देखना पडता है, नमस्कार भी करना पडता है; इरा का परिचय भी करवाना पडता है। इरा पास की कुर्सी पर बैठने का निमन्त्रण दे देती है। मुझे लगता है, मेरी सांस रूक जाएगी।
”कब आईं?”
”आज सवेरे ही।”
”अभी ठहरोगी? ठहरी कहां हो?”

जवाब इरा देती है। मैं देख रही हूं, निशीथ बहुत बदल गया है। उसने कवियों की तरह बाल बढा लिए हैं। यह क्या शौक चर्राया? उसका रंग स्याह पड ग़या है। वह दुबला भी हो गया है।

विशेष बातचीत नहीं होती और हम लोग उठ पडते हैं। इरा को मुन्नू की चिन्ता सता रही थी, और मैं स्वयं भी घर पहुंचने को उतावली हो रही थी। कॉफी-हाउस से धर्मतल्ला तक वह पैदल चलता हुआ हमारे साथ आता है। इरा उससे बात कर रही है, मानो वह इरा का ही मित्र हो! इरा अपना पता समझा देती है और वह दूसरे दिन नौ बजे आने का वायदा करके चला जाता है।

पूरे तीन साल बाद निशीथ का यों मिलना! न चाहकर भी जैसे सारा अतीत आंखों के सामने खुल जाता है। बहुत दुबला हो गया है निशीथ! लगता है,जैसे मन में कहीं कोई गहरी पीडा छिपाए बैठा है।

मुझसे अलग होने का दुःख तो नहीं साल रहा है इसे?

कल्पना चाहे कितनी भी मधुर क्यों न हो, एक तृप्ति-युक्त आनन्द देनेवाली क्यों न हो; पर मैं जानती हूं, यह झूठ है। यदि ऐसा ही था तो कौन उसे कहने गया था कि तुम इस सम्बन्ध को तोड दो? उसने अपनी इच्छा से ही तो यह सब किया था।

एकाएक ही मेरा मन कटु हो उठता है। यही तो है वह व्यक्ति जिसने मुझे अपमानित करके सारी दुनिया के सामने छोड दिया था, महज उपहास का पात्र बनाकर! ओह, क्यों नहीं मैंने उसे पहचानने से इनकार कर दिया? जब वह मेज क़े पास आकर खडा हुआ, तो क्यों नहीं मैंने कह दिया कि माफ कीजिए, मैं आपको पहचानती नहीं? जरा उसका खिसियाना तो देखती! वह कल भी आएगा। मुझे उसे साफ-साफ मना कर देना चाहिए था कि मैं उसकी सूरत भी नहीं देखना चाहती, मैं उससे नफरत करती हूं!

अच्छा है, आए कल! मैं उसे बता दूंगी कि जल्दी ही मैं संजय से विवाह करनेवाली हूं। यह भी बता दूंगी कि मैं पिछला सब कुछ भूल चुकी हूं। यह भी बता दूंगी कि मैं उससे घृणा करती हूं और उसे जिन्दगी में कभी माफ नहीं कर सकती

यह सब सोचने के साथ-साथ जाने क्यों, मेरे मन में यह बात भी उठ रही थी कि तीन साल हो गए, अभी तक निशीथ ने विवाह क्यों नहीं किया? करे न करे, मुझे क्या   ?

क्या वह आज भी मुझसे कुछ उम्मीद रखता है? हूं! मूर्ख कहीं का!

संजय! मैंने तुमसे कितना कहा था कि तुम मेरे साथ चलो; पर तुम नहीं आए। इस समय जबकि मुझे तुम्हारी इतनी-इतनी याद आ रही है, बताओ, मैं क्या करूं?

कलकत्ता

नौकरी पाना इतना मुश्किल है, इसका मुझे गुमान तक नहीं था। इरा कहती है कि डेढ सौ की नौकरी के लिए खुद मिनिस्टर तक सिफारिश करने पहुंच जाते हैं, फिर यह तो तीन सौ का जॉब है। निशीथ सवेरे से शाम तक इसी चक्कर में भटका है, यहां तक कि उसने अपने ऑफिस से भी छुट्टी ले ली है। वह क्यों मेरे काम में इतनी दिलचस्पी ले रहा है? उसका परिचय बडे-बडे लोगों से है और वह कहता है कि जैसे भी होगा, वह काम मुझे दिलाकर ही मानेगा। पर आखिर क्यों?

कल मैंने सोचा था कि अपने व्यवहार की रूखाई से मैं स्पष्ट कर दूंगी कि अब वह मेरे पास न आए। पौने नौ बजे के करीब, जब मैं अपने टूटे हुए बाल फेंकने खिडक़ी पर गई, तो देखा, घर से थोडी दूर पर निशीथ टहल रहा है। वही लम्बे बाल, कुरता-पाजामा। तो वह समय से पहले ही आ गया! संजय होता तो ग्यारह के पहले नहीं पहुंचता, समय पर पहुंचना तो वह जानता ही नहीं।

उसे यों चक्कर काटते देख मेरा मन जाने कैसा हो आया। और जब वह आया तो मैं चाहकर भी कटु नहीं हो सकी। मैंने उसे कलकत्ता आने का मकसद बताया, तो लगा कि वह बडा प्रसन्न हुआ। वहीं बैठे-बैठे फोन करके उसने इस नौकरी के सम्बन्ध में सारी जानकारी प्राप्त कर ली, कैसे क्या करना होगा, उसकी योजना भी बना डाली; बैठे-बैठे फोन से ऑफिस को सूचना भी दे दी कि आज वह ऑफिस नहीं आएगा।

विवित्र स्थिति मेरी हो रही थी। उसके इस अपनत्व-भरे व्यवहार को मैं स्वीकार भी नहीं कर पाती थी, नकार भी नहीं पाती थी। सारा दिन मैं उसके साथ घूमती रही; पर काम की बात के अतिरिक्त उसने एक भी बात नहीं की। मैंने कई बार चाहा कि संजय की बात बता दूं;

पर बता नहीं सकी। सोचा, कहीं वह सुनकर यह दिलचस्पी लेना कम न कर दे। उसके आज-भर के प्रयत्नों से ही मुझे काफी उम्मीद हो चली थी। यह नौकरी मेरे लिए कितनी आवश्यक है, मिल जाए तो संजय कितना प्रसन्न होगा, हमारे विवाहित जीवन के आरम्भिक दिन कितने सुख में बीतेंगे!

शाम को हम घर लौटते हैं। मैं उसे बैठने को कहती हूं; पर वह बैठता नहीं, बस खडा ही रहता है। उसके चौडे ललाट पर पसीने की बूंदें चमक रही हैं। एकाएक ही मुझे लगता है, इस समय संजय होता, तो? मैं अपने आंचल से उसका पसीना पोंछ देती, और वह   क्या बिना बाहों में भरे, बिना प्यार किए यों ही चला जाता?
”अच्छा, तो चलता हूं।”

यन्त्रचलित-से मेरे हाथ जुड ज़ाते हैं, वह लौट पडता है और मैं ठगी-सी देखती रहती हूं।

सोते समय मेरी आदत है कि संजय के लाए हुए फूलों को निहारती रहती हूं। यहां वे फूल नहीं हैं तो बडा सूना-सूना सा लग रहा है।

पता नहीं संजय, तुम इस समय क्या कर रहे हो! तीन दिन हो गए, किसी ने बांहों में भरकर प्यार तक नहीं किया।

कलकत्ता

आज सवेरे मेरा इंटरव्यू हो गया है। मैं शायद बहुत नर्वस हो गई थी और जैसे उत्तर मुझे देने चाहिए, वैसे नहीं दे पाई। पर निशीथ ने आकर बताया कि मेरा चुना जाना करीब-करीब तय हो गया है। मैं जानती हूं, यह सब निशीथ की वजह से ही हुआ।

ढलते सूरज की धूप निशीथ के बाएं गाल पर पड रही थी और सामने बैठा निशीथ इतने दिन बाद एक बार फिर मुझे बडा प्यारा-सा लगा।

मैंने देखा, मुझसे ज्यादा वह प्रसन्न है। वह कभी किसी का अहसान नहीं लेता; पर मेरी खातिर उसने न जाने कितने लोगों को अहसान लिया। आखिर क्यों? क्या वह चाहता है कि मैं कलकत्ता आकर रहूं उसके साथ, उसके पास? एक अजीब-सी पुलक से मेरा तन-मन सिहर उठता है। वह ऐसा क्यों चाहता है? उसका ऐसा चाहना बहुत गलत है, बहुत अनुचित है! मैं अपने मन को समझाती हूं, ऐसी कोई बात नहीं है, शायद वह केवल मेरे प्रति किए गए अन्याय का प्रतिकार करने के लिए यह सब कर रहा है! पर क्या वह समझता है कि उसकी मदद से नौकरी पाकर मैं उसे क्षमा कर दूंगी, या जो कुछ उसने किया है, उसे भूल जाऊंगी? असम्भव! मैं कल ही उसे संजय की बात बता दूंगी।
”आज तो इस खुशी में पार्टी हो जाए!”
काम की बात के अलावा यह पहला वाक्य मैं उसके मुंह से सुनती हूं, मैं इरा की ओर देखती हूं। वह प्रस्ताव का समर्थन करके भी मुन्नू की तबीयत का बहाना लेकर अपने को काट लेती है। अकेले जाना मुझे कुछ अटपटा-सा लगता है। अभी तक तो काम का बहाना लेकर घूम रही थी, पर अब? फिर भी मैं मना नहीं कर पाती। अन्दर जाकर तैयार होती हूं। मुझे याद आता है, निशीथ को नीला रंग बहुत पसन्द था, मैं नीली साडी ही पहनती हूं। बडे चाव और सतर्कता से अपना प्रसाधन करती हूं, और बार-बार अपने को टोकती जाती हूं – किसको रिझाने के लिए यह सब हो रहा है? क्या यह निरा पागलपन नहीं है?

सीढियों पर निशीथ हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ कहता है, ”इस साडी में तुम बहुत सुन्दर लग रही हो।”

मेरा चेहरा तमतमा जाता है; कनपटियां सुर्ख हो जाती हैं। मैं चुपचाप ही इस वाक्य के लिए तैयार नहीं थी। यह सदा चुप रहनेवाला निशीथ बोला भी तो ऐसी बात।

मुझे ऐसी बातें सुनने की जरा भी आदत नहीं है। संजय न कभी मेरे कपडोंं पर ध्यान देता है, न ऐसी बातें करता है, जब कि उसे पूरा अधिकार है। और यह बिना अधिकार ऐसी बातें करे?

पर जाने क्या है कि मैं उस पर नाराज नहीं हो पाती हूं; बल्कि एक पुलकमय सिहरन महसूस करती हूं। सच, संजय के मुंह से ऐसा वाक्य सुनने को मेरा मन तरसता रहता है, पर उसने कभी ऐसी बात नहीं की। पिछले ढाई साल से मैं संजय के साथ रह रही हूं। रोज ही शाम को हम घूमने जाते हैं। कितनी ही बार मैंने श्रृंगार किया, अच्छे कपडे पहने, पर प्रशंसा का एक शब्द भी उसके मुंह से नहीं सुना। इन बातों पर उसका ध्यान ही नहीं जाता; यह देखकर भी जैसे यह सब नहीं देख पाता। इस वाक्य को सुनने के लिए तरसता हुआ मेरा मन जैसे रस से नहा जाता है। पर निशीथ ने यह बात क्यों कही? उसे क्या अधिकार है?

क्या सचमुच ही उसे अधिकार नहीं है? नहीं है?

जाने कैसी मजबूरी है, कैसी विवशता है कि मैं इस बात का जवाब नहीं दे पाती हूं। निश्चयात्मक दृढता से नहीं कह पाती कि साथ चलते इस व्यक्ति को सचमुच ही मेरे विषय में ऐसी अवांछित बात कहने का कोई अधिकार नहीं है।

हम दोनों टैक्सी में बैठते हैं। मैं सोचती हूं, आज मैं इसे संजय की बात बता दूंगी।
”स्काई-रूम!” निशीथ टैक्सीवाले को आदेश देता है।

‘टुन की घंटी के साथ मीटर डाउन होता है और टैक्सी हवा से बातें करने लगती है। निशीथ बहुत सतर्कता से कोने में बैठा है, बीच में इतनी जगह छोडक़र कि यदि हिचकोला खाकर भी टैक्सी रूके, तो हमारा स्पर्श न हो। हवा के झोंके से मेरी रेशमी साडी क़ा पल्लू उसके समूचे बदन को स्पर्श करता हुआ उसकी गोदी में पडक़र फरफराता है। वह उसे हटाता नहीं है। मुझे लगता है, यह रेशमी, सुवासित पल्लू उसके तन-मन को रस से भिगो रहा है, यह स्पर्श उसे पुलकित कर रहा है, मैं विजय के अकथनीय आह्लाद से भर जाती हूं।

आज भी मैं संजय की बात नहीं कह पाती। चाहकर भी नहीं कह पाती। अपनी इस विवशता पर मुझे खीज भी आती है, पर मेरा मुंह है कि खुलता ही नहीं। मुझे लगता है कि मैं जैसे कोई बहुत बडा अपराध कर रही होऊं; पर फिर भी मैं कुछ नहीं कह सकी।

यह निशीथ कुछ बोलता क्यों नहीं? उसका यों कोने में दुबककर निर्विकार भाव से बैठे रहना मुझे कतई अच्छा नहीं लगता। एकाएक ही मुझे संजय की याद आने लगती है। इस समय वह यहां होता तो उसका हाथ मेरी कमर में लिपटा होता! यों सडक़ पर ऐसी हरकतें मुझे स्वयं पसन्द नहीं; पर जाने क्यों, किसी की बाहों की लपेट के लिए मेरा मन ललक उठता है। मैं जानती हूं कि जब निशीथ बगल में बैठा हो, उस समय ऐसी इच्छा करना,

या ऐसी बात सोचना भी कितना अनुचित है। पर मैं क्या करूं? जितनी द्रुतगति से टैक्सी चली जा रही है, मुझे लगता है, उतनी ही द्रुतगति से मैं भी बही जा रही हूं, अनुचित, अवांछित दिशाओं की ओर।

टैक्सी झटका खाकर रूकती है तो मेरी चेतना लौटती है। मैं जल्दी से दाहिनी ओर का फाटक खोलकर कुछ इस हडबडी से नीचे उतर पडती हूं; मानो अन्दर निशीथ मेरे साथ कोई बदतमीजी कर रहा हो।

”अजी, इधर से उतरना चाहिए कभी?” टैक्सीवाला कहता है मुझे अपनी गलती का भान होता है। उधर निशीथ खडा है, इधर मैं, बीच में टैक्सी!

पैसे लेकर टैक्सी चली जाती है तो हम दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने हो जाते हैं। एकाएक ही मुझे खयाल आता है कि टैक्सी के पैसे तो मुझे ही देने चाहिए थे। पर अब क्या हो सकता था! चुपचाप हम दोनों अन्दर जाते हैं। आस-पास बहुत कुछ है, चहल-पहल, रौशनी, रौनक। पर मेरे लिए जैसे सबका अस्तित्व ही मिट जाता है। मैं अपने को सबकी नजरों से ऐसे बचाकर चलती हूं, मानो मैंने कोई अपराध कर डाला हो, और कोई मुझे पकड न ले।

क्या सचमुच ही मुझसे कोई अपराध हो गया है?

आमने-सामने हम दोनों बैठ जाते हैं। मैं होस्ट हूं, फिर भी उसका पार्ट वही अदा कर रहा है। वही ऑर्डर देता है। बाहर की हलचल और उससे अधिक मन की हलचल में मैं अपने को खोया-खोया-सा महसूस करती हूं।

हम दोनों के सामने बैरा कोल्ड-कॉफी के गिलास और खाने का कुछ सामान रख जाता है। मुझे बार-बार लगता है कि निशीथ कुछ कहना चाह रहा है। मैं उसके होंठों की धडक़न तक महसूस करती हूं। वह जल्दी से कॉफी का स्ट्रॉ मुंह से लगा लेता है।

मूर्ख कहीं का! वह सोचता है, मैं बेवकूफ हूं। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि इस समय वह क्या सोच रहा है।

तीन दिन साथ रहकर भी हमने उस प्रसंग को नहीं छेडा। शायद नौकरी की बात ही हमारे दिमागों पर छाई हुई थी। पर आज   आज अवश्य ही वह बात आएगी! न आए, यह कितना अस्वाभाविक है! पर नहीं, स्वाभाविक शायद यही है। तीन साल पहले जो अध्याय सदा के लिए बन्द हो गया, उसे उलटकर देखने का साहस शायद हम दोनों में से किसी में नहीं है। जो सम्बन्ध टूट गए, टूट गए। अब उन पर कौन बात करे? मैं तो कभी नहीं करूंगी। पर उसे तो करना चाहिए। तोडा उसने था, बात भी वही आरम्भ करे। मैं क्यों करूं, और मुझे क्या पडी है? मैं तो जल्दी ही संजय से विवाह करनेवाली हूं। क्यों नहीं मैं इसे अभी संजय की बात बता देती? पर जाने कैसी विवशता है, जाने कैसा मोह है कि मैं मुंह नहीं खोल पाती। एकाएक मुझे लगता है जैसे उसने कुछ कहा
”आपने कुछ कहा?”
”नहीं तो!”
मैं खिसिया जाती हूं।
फिर वही मौन! खाने में मेरा जरा भी मन नहीं लग रहा है; पर यन्त्रचलित-सी मैं खा रही हूं। शायद वह भी ऐसे ही खा रहा है। मुझे फिर लगता है कि उसके होंठ फडक़ रहे हैं, और स्ट्रॉ पकडे हुए उंगलियां कांप रही हैं। मैं जानती हूं, वह पूछना चाहता है, ”दीपा, तुमने मुझे माफ तो कर दिया न?

वह पूछ ही क्यों नहीं लेता? मान लो, यदि पूछ ही ले, तो क्या मैं कह सकूंगी कि मैं तुम्हें ज्ािन्दगी-भर माफ नहीं कर सकती, मैं तुमसे नफरत करती हूं, मैं तुम्हारे साथ घूम-फिर ली, या कॉफी पी ली, तो यह मत समझो कि मैं तुम्हारे विश्वासघात की बात को भूल गई हूं?

और एकाएक ही पिछला सब कुछ मेरी आंखों के आगे तैरने लगता है। पर यह क्या? असह्य अपमानजनित पीडा, क्रोध और कटुता क्यों नहीं याद आती? मेरे सामने तो पटना में गुजारी सुहानी सन्ध्याओं और चांदनी रातों के वे चित्र उभरकर आते हैं, जब घंटों समीप बैठ, मौन भाव से हम एक-दूसरे को निहारा करते थे। बिना स्पर्श किए भी जाने कैसी मादकता तन-मन को विभोर किए रहती थी, जाने कैसी तन्मयता में हम डूबे रहते थे   एक विचित्र-सी, स्वप्निल दुनिया में! मैं कुछ बोलना भी चाहती तो वह मेरे मुंह पर उंगली रखकर कहता, ”आत्मीयता के ये क्षण अनकहे ही रहने दो, दीपा!”

आज भी तो हम मौन ही हैं, एक-दूसरे के निकट ही हैं। क्या आज भी हम आत्मीयता के उन्हीं क्षणों में गुजर रहे हैं? मैं अपनी सारी शक्ति लगाकर चीख पडना चाहती हूं, नही!   नहीं!   नहीं!   पर कॉफी सिप करने के अतिरिक्त मैं कुछ नहीं कर पाती। मेरा यह विरोध हृदय की न जाने कौन-सी अतल गहराइयों में डूब जाता है!

निशीथ मुझे बिल नहीं देने देता। एक विचित्र-सी भावना मेरे मन में उठती है कि छीना-झपटी में किसी तरह मेरा हाथ इसके हाथ से छू जाए! मैं अपने स्पर्श से उसके मन के तारों को झनझना देना चाहती हूं। पर वैसा अवसर नहीं आता। बिल वही देता है, मुझसे तो विरोध भी नहीं किया जाता।

मन में प्रचंड तूफान! पर फिर भी निर्विकार भाव से मैं टैक्सी में आकर बैठती हूं   फ़िर वही मौन, वही दूरी। पर जाने क्या है कि मुझे लगता है कि निशीथ मेरे बहुत निकट आ गया है, बहुत ही निकट! बार-बार मेरा मन करता है कि क्यों नहीं निशीथ मेरा हाथ पकड लेता, क्यों नहीं मेरे कन्धे पर हाथ रख देता? मैं जरा भी बुरा नहीं मानूंगी, जरा भी नहीं! पर वह कुछ भी नहीं करता।

सोते समय रोज क़ी तरह मैं आज भी संजय का ध्यान करते हुए ही सोना चाहती हूं, पर निशीथ है कि बार-बार संजय की आकृति को हटाकर स्वयं आ खडा होता है

कलकत्ता

अपनी मजबूरी पर खीज-खीज जाती हूं। आज कितना अच्छा मौका था सारी बात बता देने का! पर मैं जाने कहां भटकी थी कि कुछ भी नहीं बता पाई।

शाम को मुझे निशीथ अपने साथ लेक ले गया। पानी के किनारे हम घास पर बैठ गए। कुछ दूर पर काफी भीड-भाड और चहल-पहल थी, पर यह स्थान अपेक्षाकृत शान्त था। सामने लेक के पानी में छोटी-छोटी लहरें उठ रही थीं। चारों ओर के वातावरण का कुछ विचित्र-सा भाव मन पर पड रहा था।

”अब तो तुम यहां आ जाओगी!” मेरी ओर देखकर उसने कहा।
”हां!”
”नौकरी के बाद क्या इरादा है?”
मैंने देखा, उसकी आंखों में कुछ जानने की आतुरता फैलती जा रही है, शायद कुछ कहने की भी। मुझसे कुछ जानकर वह अपनी बात कहेगा।
”कुछ नहीं!” जाने क्यों मैं यह कह गई। कोई है जो मुझे कचोटे डाल रहा है। क्यों नहीं मैं बता देती कि नौकरी के बाद मैं संजय से विवाह करूंगी, मैं संजय से प्रेम करती हूं, वह मुझसे प्रेम करता है? वह बहुत अच्छा है, बहुत ही! वह मुझे तुम्हारी तरह धोखा नहीं देगा; पर मैं कुछ भी तो नहीं कह पाती। अपनी इस बेबसी पर मेरी आंखें छलछला आती हैं। मैं दूसरी ओर मुंह फेर लेती हूं।

”तुम्हारे यहां आने से मैं बहुत खुश हूं!”

मेरी सांस जहां-की-तहां रूक जाती है आगे के शब्द सुनने के लिए; पर शब्द नहीं आते। बडी क़ातर, करूण और याचना-भरी दृष्टि से मैं उसे देखती हूं, मानो कह रही होऊं कि तुम कह क्यों नहीं देते निशीथ, कि आज भी तुम मुझे प्यार करते हो, तुम मुझे सदा अपने पास रखना चाहते हो, जो कुछ हो गया है, उसे भूलकर तुम मुझसे विवाह करना चाहते हो? कह दो, निशीथ, कह दो!   यह सुनने के लिए मेरा मन अकुला रहा है, छटपटा रहा है! मैं बुरा नहीं मानूंगी, जरा भी बुरा नहीं मांनूंगी। मान ही कैसे सकती हूं निशीथ! इतना सब हो जाने के बाद भी शायद मैं तुम्हें प्यार करती हूं – शायद नहीं, सचमुच ही मैं तुम्हें प्यार करती हूं!

मैं जानती हूं-तुम कुछ नहीं कहोगे, सदा के ही मितभाषी जो हो। फिर भी कुछ सुनने की आतुरता लिये मैं तुम्हारी तरफ देखती रहती हूं। पर तुम्हारी नजर तो लेक के पानी पर जमी हुई है   शान्त, मौन!

आत्मीयता के ये क्षण अनकहे भले ही रह जाएं पर अनबूझे नहीं रह सकते। तुम चाहे न कहो, पर मैं जानती हूं, तुम आज भी मुझे प्यार करते हो, बहुत प्यार करते हो! मेरे कलकत्ता आ जाने के बाद इस टूटे सम्बन्ध को फिर से जोडने की बात ही तुम इस समय सोच रहे हो। तुम आज भी मुझे अपना ही समझते हो, तुम जानते हो, आज भी दीपा तुम्हारी है!   और मैं?

लगता है, इस प्रश्न का उत्तर देने का साहस मुझमें नहीं है। मुझे डर है कि जिस आधार पर मैं तुमसे नफरत करती थी, उसी आधार पर कहीं मुझे अपने से नफरत न करनी पडे।
लगता है, रात आधी से भी अधिक ढल गई है।

कानपुर

मन में उत्कट अभिलाषा होते हुए भी निशीथ की आवश्यक मीटिंग की बात सुनकर मैंने कह दिया था कि तुम स्टेशन मत आना। इरा आई थी; पर गाडी पर बिठाकर ही चली गई, या कहूं कि मैंने जबर्दस्ती ही उसे भेज दिया। मैं जानती थी कि लाख मना करने पर भी निशीथ आएगा और विदा के उन अन्तिम क्षणों में मैं उसके साथ अकेली ही रहना चाहती थी। मन में एक दबी-सी आशा थी कि चलते समय ही शायद वह कुछ कह दे।

गाडी चलने में जब दस मिनट रह गए तो देखा, बडी व्यग्रता से डिब्बों में झांकता-झांकता निशीथ आ रहा था।   पागल! उसे इतना तो समझना चाहिए कि उसकी प्रतीक्षा में मैं यहां बाहर खडी हूं!

मैं दौडक़र उसके पास जाती हूं, ”आप क्यों आए?” पर मुझे उसका आना बडा अच्छा लगता है! वह बहुत थका हुआ लग रहा है। शायद सारा दिन बहुत व्यस्त रहा और दौडता-दौडता मुझे सी-ऑफ करने यहां आ पहुंचा। मन करता है कुछ ऐसा करूं, जिससे इसकी सारी थकान दूर हो जाए। पर क्या करूं? हम डिब्बे के पास आ जाते हैं।
”जगह अच्छी मिल गई?” वह अन्दर झांकते हुए पूछता है।
”हां!”
”पानी-वानी तो है?”
”है।”
”बिस्तर फैला लिया?”
मैं खीज पडती हूं। वह शायद समझ जाता है, सो चुप हो जाता है। हम दोनों एक क्षण को एक-दूसरे की ओर देखते हैं। मैं उसकी आंखों में विचित्र-सी छायाएं देखती हूं; मानो कुछ है, जो उसके मन में घुट रहा है, उसे मथ रहा है, पर वह कह नहीं पा रहा है। वह क्यों नहीं कह देता? क्यों नहीं अपने मन की इस घुटन को हल्का कर लेता?

”आज भीड विशेष नहीं है,” चारों ओर नजर डालकर वह कहता है।
मैं भी एक बार चारों ओर देख लेती हूं, पर नजर मेरी बार-बार घडी पर ही जा रही है। जैसे-जैसे समय सरक रहा है, मेरा मन किसी गहरे अवसाद में डूब रहा है। मुझे कभी उस पर दया आती है तो कभी खीज। गाडी चलने में केवल तीन मिनट बाकी रह गए हैं। एक बार फिर हमारी नजरें मिलती हैं।

”ऊपर चढ ज़ाओ, अब गाडी चलनेवाली है।”
बडी असहाय-सी नजर से मैं उसे देखती हूं; मानो कह रही होऊं, तुम्हीं चढा दो।   और फिर धीरे-धीरे चढ ज़ाती हूं। दरवाजे पर मैं खडी हूं और वह नीचे प्लेटफॉर्म पर।
”जाकर पहुंचने की खबर देना। जैसे ही मुझे इधर कुछ निश्चित रूप से मालूम होगा, तुम्हें सूचना दूंगा।”

मैं कुछ बोलती नहीं, बस उसे देखती रहती हूं
सीटी   हरी झंडी   फ़िर सीटी। मेरी आंखें छलछला आती हैं।

गाडी एक हल्के-से झटके के साथ सरकने लगती है। वह गाडी क़े साथ कदम आगे बढाता है और मेरे हाथ पर धीरे-से अपना हाथ रख देता है। मेरा रोम-रोम सिहर उठता है। मन करता है चिल्ला पडूं-मैं सब समझ गई, निशीथ, सब समझ गई! जो कुछ तुम इन चार दिनों में नहीं कह पाए, वह तुम्हारे इस क्षणिक स्पर्श ने कह दिया। विश्वास करो, यदि तुम मेरे हो तो मैं भी तुम्हारी हूं; केवल तुम्हारी, एकमात्र तुम्हारी!   पर मैं कुछ कह नहीं पाती। बस, साथ चलते निशीथ को देखती-भर रहती हूं। गाडी क़े गति पकडते ही वह हाथ को जरा-सा दबाकर छोड देता है। मेरी छलछलाई आंखें मुंद जाती हैं। मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, बाकी सब झूठ है; अपने को भूलने का, भरमाने का, छलने का असफल प्रयास है।

आंसू-भरी आंखों से मैं प्लेटफॉर्म को पीछे छूटता हुआ देखती हूं। सारी आकृतियां धुंधली-सी दिखाई देती हैं। असंख्य हिलते हुए हाथों के बीच निशीथ के हाथ को, उस हाथ को, जिसने मेरा हाथ पकडा था, ढूंढने का असफल-सा प्रयास करती हूं। गाडी प्लेटफॉर्म को पार कर जाती है, और दूर-दूर तक कलकत्ता की जगमगाती बत्तियां दिखाई देती हैं। धीरे-धीरे वे सब दूर हो जाती हैं, पीछे छूटती जाती हैं। मुझे लगता है, यह दैत्याकार ट्रेन मुझे मेरे घर से कहीं दूर ले जा रही है – अनदेखी, अनजानी राहों में गुमराह करने के लिए, भटकाने के लिए!

बोझिल मन से मैं अपने फैलाए हुए बिस्तर पर लेट जाती हूं। आंखें बन्द करते ही सबसे पहले मेरे सामने संजय का चित्र उभरता है   क़ानपुर जाकर मैं उसे क्या कहूंगी? इतने दिनों तक उसे छलती आई, अपने को छलती आई, पर अब नहीं। मैं उसे सारी बात समझा दूंगी। कहूंगी, संजय जिस सम्बन्ध को टूटा हुआ जानकर मैं भूल चुकी थी, उसकी जडें हृदय की किन अतल गहराइयों में जमी हुई थीं, इसका अहसास कलकत्ता में निशीथ से मिलकर हुआ। याद आता है, तुम निशीथ को लेकर सदैव ही संदिग्ध रहते थे; पर तब मैं तुम्हेंर् ईष्यालु समझती थी; आज स्वीकार करती हूं कि तुम जीते, मैं हारी!

सच मानना संजय, ढाई साल मैं स्वयं भ्रम में थी और तुम्हें भी भ्रम में डाल रखा था; पर आज भ्रम के, छलना के सारे ही जाल छिन्न-भिन्न हो गए हैं। मैं आज भी निशीथ को प्यार करती हूं। और यह जानने के बाद, एक दिन भी तुम्हारे साथ और छल करने का दुस्साहस कैसे करूं? आज पहली बार मैंने अपने सम्बन्धों का विश्लेषण किया, तो जैसे सब कुछ ही स्पष्ट हो गया और जब मेरे सामने सब कुछ स्पष्ट हो गया, तो तुमसे कुछ भी नहीं छिपाऊंगी, तुम्हारे सामने मैं चाहूं तो भी झूठ नहीं बोल सकती।

आज लग रहा है, तुम्हारे प्रति मेरे मन में जो भी भावना है वह प्यार की नहीं, केवल कृतज्ञता की है। तुमने मुझे उस समय सहारा दिया था, जब अपने पिता और निशीथ को खोकर मैं चूर-चूर हो चुकी थी। सारा संसार मुझे वीरान नजर आने लगा था, उस समय तुमने अपने स्नेहिल स्पर्श से मुझे जिला दिया; मेरा मुरझाया, मरा मन हरा हो उठा; मैं कृतकृत्य हो उठी, और समझने लगी कि मैं तुमसे प्यार करती हूं। पर प्यार की बेसुध घडियां, वे विभोर क्षण, तन्मयता के वे पल, जहां शब्द चुक जाते हैं, हमारे जीवन में कभी नहीं आए। तुम्हीं बताओ, आए कभी? तुम्हारे असंख्य आलिंगनों और चुम्बनों के बीच भी, एक क्षण के लिए भी तो मैंने कभी तन-मन की सुध बिसरा देनेवाली पुलक या मादकता का अनुभव नहीं किया।

सोचती हूं, निशीथ के चले जाने के बाद मेरे जीवन में एक विराट शून्यता आ गई थी, एक खोखलापन आ गया था, तुमने उसकी पूर्ति की। तुम पूरक थे, मैं गलती से तुम्हें प्रियतम समझ बैठी।

मुझे क्षमा कर दो संजय और लौट जाओ। तुम्हें मुझ जैसी अनेक दीपाएं मिल जाएंगी, जो सचमुच ही तुम्हें प्रियतम की तरह प्यार करेंगी। आज एक बात अच्छी तरह जान गई हूं कि प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है; बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयास-मात्र होता है

इसी तरह की असंख्य बातें मेरे दिमाग में आती हैं, जो मैं संजय से कहूंगी। कह सकूंगी यह सब? लेकिन कहना तो होगा ही। उसके साथ अब एक दिन भी छल नहीं कर सकती। मन से किसी और की आराधना करके तन से उसकी होने का अभिनय करती रहूं? छीः! नहीं जानती, यही सब सोचते-सोचते मुझे कब नींद आ गई।

लौटकर अपना कमरा खोलती हूं, तो देखती हूं, सब कुछ ज्यों-का-त्यों है, सिर्फ फूलदान को रजनीगन्धा मुरझा गए हैं। कुछ फूल झरकर जमीन पर इधर-उधर भी बिखर गए हैं।

आगे बढती हूं तो जमीन पर पडा एक लिफाफा दिखाई देता है। संजय की लिखाई है, खोला तो छोटा-सा पत्र थाः

दीपा,
तुमने जो कलकत्ता जाकर कोई सूचना ही नहीं दी। मैं आज ऑफिस के काम से कटक जा रहा हूं। पांच-छः दिन में लौट आऊंगा। तब तक तुम आ ही जाओगी। जानने को उत्सुक हूं कि कलकत्ता में क्या हुआ?

तुम्हारा
संजय

एक लम्बा निःश्वास निकल जाता है। लगता है, एक बडा बोझ हट गया। इस अवधि में तो मैं अपने को अच्छी तरह तैयार कर लूंगी।

नहा-धोकर सबसे पहले में निशीथ को पत्र लिखती हूं। उसकी उपस्थिति से जो हिचक मेरे होंठ बन्द किए हुए थी, दूर रहकर वह अपने-आप ही टूट जाती हैं। मैं स्पष्ट शब्दों में लिख देती हूं कि चाहे उसने कुछ नहीं कहा, फिर भी मैं सब कुछ समझ गई हूं। साथ ही यह भी लिख देती हूं कि मैं उसकी उस हरकत से बहुत दुखी थी, बहुत नाराज भी; पर उसे देखते ही जैसे सारा क्रोध बह गया। इस अपनत्व में क्रोध भला टिक भी कैसे पाता? लौटी हूं, तब से न जाने कैसी रंगीनी और मादकता मेरी आंखों के आगे छाई है   !

एक खूबसूरत-से लिफाफे में उसे बन्द करके मैं स्वयं पोस्ट करने जाती हूं।
रात में सोती हूं तो अनायास ही मेरी नजर सूने फूलदान पर जाती है। मैं करवट बदलकर सो जाती हूं।

कानपुर

आज निशीथ को पत्र लिखे पांचवां दिन है। मैं तो कल ही उसके पत्र की राह देख रही थी। पर आज की भी दोनों डाकें निकल गईं। जाने कैसा सूना-सूना, अनमना-अनमना लगता रहा सारा दिन! किसी भी तो काम में जी नहीं लगता। क्यों नहीं लौटती डाक से ही उत्तर दे दिया उसने? समझ में नहीं आता, कैसे समय गुजारूं!

मैं बाहर बालकनी में जाकर खडी हो जाती हूं। एकाएक खयाल आता है, पिछले ढाई सालों से करीब इसी समय, यहीं खडे होकर मैंने संजय की प्रतीक्षा की है। क्या आज मैं संजय की प्रतीक्षा कर रही हूं? या मैं निशीथ के पत्र की प्रतीक्षा कर रही हूं? शायद किसी की नहीं, क्योंकि जानती हूं कि दोनों में से कोई भी नहीं आएगा। फिर?

निरूद्देश्य-सी कमरे में लौट पडती हूं। शाम का समय मुझसे घर में नहीं काटा जाता। रोज ही तो संजय के साथ घूमने निकल जाया करती थी। लगता है; यहीं बैठी रही तो दम ही घुट जाएगा। कमरा बन्द करके मैं अपने को धकेलती-सी सडक़ पर ले आती हूं। शाम का धुंधलका मन के बोझ को और भी बढा देता है। कहां जाऊं? लगता है, जैसे मेरी राहें भटक गई हैं, मंजिल खो गई है। मैं स्वयं नहीं जानती, आखिर मुझे जाना कहां है। फिर भी निरूद्देश्य-सी चलती रहती हूं। पर आखिर कब तक यूं भटकती रहूं? हारकर लौट पडती हूं।

आते ही मेहता साहब की बच्ची तार का एक लिफाफा देती है।
धडक़ते दिल से मैं उसे खोलती हूं। इरा का तार था।
नियुक्ति हो गई है। बधाई!

इतनी बडी ख़ुशखबरी पाकर भी जाने क्या है कि खुश नहीं हो पाती। यह खबर तो निशीथ भेजनेवाला था। एकाएक ही एक विचार मन में आता है ः क्या जो कुछ मैं सोच गई, वह निरा भ्रम ही था, मात्र मेरी कल्पना, मेरा अनुमान? नहीं-नहीं! उस स्पर्श को मैं भ्रम कैसे मान लूं, जिसने मेरे तन-मन को डुबो दिया था, जिसके द्वारा उसके हृदय की एक-एक परत मेरे सामने खुल गई थी? लेक पर बिताए उन मधुर क्षणों को भ्रम कैसे मान लूं, जहां उसका मौन ही मुखरित होकर सब कुछ कह गया था? आत्मीयता के वे अनकहे क्षण! तो फिर उसने पत्र क्यों नहीं लिखा? क्या कल उसका पत्र आएगा? क्या आज भी उसे वही हिचक रोके हुए है?

तभी सामने की घडी टन्-टन् करके नौ बजाती है। मैं उसे देखती हूं। यह संजय की लाई हुई है। लगता है, जैसे यह घडी घंटे सुना-सुनाकर मुझे संजय की याद दिला रही है। फहराते ये हरे पर्दे, यह हरी बुक-रैक, यह टेबल, यह फूलदान, सभी तो संजय के ही लाए हुए हैं। मेज पर रखा यह पेन उसने मुझे साल-गिरह पर लाकर दिया था।

अपनी चेतना के इन बिखरे सूत्रों को समेटकर मैं फिर पढने का प्रयास करती हूं, पर पढ नहीं पाती। हारकर मैं पलंग पर लेट जाती हूं।

सामने के फूलदान का सूनापन मेरे मन के सूनेपन को और अधिक बढा देता है। मैं कसकर आंखें मूंद लेती हूं। एक बार फिर मेरी आंखों के आगे लेक का स्वच्छ, नीला जल उभर आता है, जिसमें छोटी-छोटी लहरें उठ रही थीं। उस जल की ओर देखते हुए निशीथ की आकृति उभरकर आती है। वह लाख जल की ओर देखे; पर चेहरे पर अंकित उसके मन की हलचल को मैं आज भी, इतनी दूर रहकर भी महसूस करती हूं। कुछ न कह पाने की मजबूरी, उसकी विवशता, उसकी घुटन आज भी मेरे सामने साकार हो उठती है। धीरे-धीरे लेक के पानी का विस्तार सिमटता जाता है, और एक छोटी-सी राइटिंग टेबल में बदल जाता है, और मैं देखती हूं कि एक हाथ में पेन लिए और दूसरे हाथ की उंगलियों को बालों में उलझाए निशीथ बैठा है   वही मजबूरी, वही विवशता, वही घुटन लिए। वह चाहता है; पर जैसे लिख नहीं पाता। वह कोशिश करता है, पर उसका हाथ बस कांपकर रह जाता है। ओह! लगता है, उसकी घुटन मेरा दम घोंटकर रख देगी। मैं एकाएक ही आंखें खोल देती हूं। वही फूलदान, पर्दे, मेज, घडी …!

आखिर आज निशीथ का पत्र आ गया। धडक़ते दिल से मैंने उसे खोला। इतना छोटा-सा पत्र!

प्रिय दीपा,
तुम अच्छी तरह पहुंच गई, यह जानकर प्रसन्नता हुई।
तुम्हें अपनी नियुक्ति का तार तो मिल ही गया होगा। मैंने कल ही इराजी को फोन करके सूचना दे दी थी, और उन्होंने बताया था कि तार दे देंगी। ऑफिस की ओर से भी सूचना मिल जाएगी।
इस सफलता के लिए मेरी ओर से हार्दिक बधाई स्वीकार करना। सच, मैं बहुत खुश हूं कि तुम्हें यह काम मिल गया! मेहनत सफल हो गई। शेष फिर।
शुभेच्छु,
निशीथ

बस? धीरे-धीरे पत्र के सारे शब्द आंखों के आगे लुप्त हो जाते हैं, रह जाता है केवल, ”शेष फिर!”

तो अभी उसके पास कुछ लिखने को शेष है? क्यों नहीं लिख दिया उसने अभी? क्या लिखेगा वह?
”दीप!”

मैं मुडक़र दरवाजे क़ी ओर देखती हूं। रजनीगन्धा के ढेर सारे फूल लिए मुस्कुराता-सा संजय खडा है। एक क्षण मैं संज्ञा-शून्य-सी उसे इस तरह देखती हूं, मानो पहचानने की कोशिश कर रही हूं। वह आगे बढता है, तो मेरी खोई हुई चेतना लौटती है, और विक्षिप्त-सी दौडक़र उससे लिपट जाती हूं।
”क्या हो गया है तुम्हें, पागल हो गई हो क्या?”
”तुम कहां चले गए थे संजय?” और मेरा स्वर टूट जाता है। अनायास ही आंखों से आंसू बह चलते हैं।
”क्या हो गया? कलकत्ता का काम नहीं मिला क्या? मारो भी गोली काम को। तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो उसके लिए?”

पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस, मेरी बांहों की जकड क़सती जाती है, कसती जाती है। रजनीगन्धा की महक धीरे-धीरे मेरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूं, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था   ।

और हम दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में बंधे रहते हैं- चुम्बित, प्रति-चुम्बित!