Monday, April 6, 2026
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भैय्याजी जोशी चौथी बार चुने गए आरएसएस के सरकार्यवाह

नागपुर :  अगले साल होने वाले चुनाव के मद्देनजर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बदलाव के बदले स्थायित्व को तरजीह देते हुए अपने महामंत्री यानी सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी को ही अगले 3 साल के लिए फिर चुन लिया है। कार्यकारिणी के शेष सदस्यों का चुनाव रविवार को होगा।

संघ के सूत्रों ने पहले संकेत दिए थे कि 9 साल से लगातार सरकार्यवाह की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे भैयाजी ने अवकाश लेने की इच्छा जताई थी। उनकी जगह सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले लेने वाले थे। प्रतिनिधि सभा के 1500 में से अधिकतर सदस्यों ने यही राय दी कि चुनाव से ठीक पहले इतने महत्वपूर्ण पद पर बदलाव करना उचित नहीं होगा।

उनमें से कुछ की राय थी कि होसबोले की प्रधानमंत्री मोदी से नजदीकियां भी उनके निष्पक्ष काम करने में आड़े आ सकती हैं। हालांकि ‘संघ को जानें’ पुस्तक के लेखक अरुण आनंद का कहना है कि संघ एक गैर-राजनीतिक संगठन है और किसी राजनीतिक दल या चुनाव का उसके किसी नीतिगत फैसले पर असर नहीं पड़ता।
ऐसे होता है सरकार्यवाह का चयन
यह आरएसएस में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली बॉडी होती है। इसकी मीटिंग हर साल मार्च के दूसरे और तीसरे सप्ताह में होती है। यह मीटिंग महीने के दूसरे और तीसरे रविवार को होती है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में 1300 सदस्य होते हैं।  इनमें एक बड़ा हिस्सा अखिल भारतीय प्रतिनिधि का भी होता है। जो सक्रिय स्वयंसेवकों का है।

इसमें शामिल करीब 50 सक्रिय स्वयंसेवकों का प्रतिनिधित्व एक प्रान्त प्रतिनिधि (राज्य प्रतिनिधि) द्वारा किया जाता है। प्रत्येक अखिल भारतीय प्रतिनिधि 20 राज्य प्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व करता है।

 

बालकृष्ण दोशी बने प्रित्जकर आर्किटेक्चर पाने वाले पहले भारतीय 

भारत के वरिष्ठ आर्किटेक्ट बालकृष्ण दोशी जिन्होंने केवल इमारते ही नहीं बल्कि संस्थान भी डिजायन किए हैं। उन्हें नोबल पुरस्कार के बराबर प्रित्जकर आर्किटेक्चर प्राइज से अपने क्षेत्र में महान कार्य करने की वजह से सम्मानित किया जाएगा। पुणे में जन्मे 90 साल के दोशी इस सम्मान को प्राप्त करने वाले पहले भारतीय हैं। इससे पहले दुनिया के मशहूर आर्किटेक्ट जाहा हदीद, फ्रैंक गहरी, आईएम पेई और शिगेरू बान के नाम शामिल हैं।

प्रित्जकर की ज्यूरी का कहना है कि सालों से बालकृष्ण दोशी ने एक ऐसा आर्किटेक्ट बनाया है जो गंभीर, गैर-आकर्षक और ट्रेंड्स को फॉलो नहीं करते हैं। उनके अंदर अपने देश और लोगों के जीवन में योगदान देने की इच्छा होने के साथ ही जिम्मेदारी की गहरी समझ है। उच्च गुणवत्ता, प्रामाणिक वास्तुकला के जरिए उन्होंने सार्वजनिक प्रशासन और उपयोगिताओं, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थान और रिहायशी और प्राइवेट क्लांइट्स और दूसरी इमारते बनाई हैं।

मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर से पढ़ाई करने वाले दोशी ने वरिष्ठ आर्किटेक्ट ले कॉर्ब्यूसर के साथ पेरिस में साल 1950 में काम किया था। उसके बाद वह भारत के प्रोजेक्ट्स का संचालन करने के लिए वापस देश लौट आए। उन्होंने साल 1955 में अपने स्टूडियो वास्तु-शिल्प की स्थापना की और लुईस काह्न और अनंत राजे के साथ मिलकर अहमदाबाद के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के कैंपस को डिजायन किया। इसके बाद उन्होंने आईआईएम बंगलूरू और लखनऊ, द नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी, टैगोर मेमोरियल हॉल, अहमदाबाद का द इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी के अलावा भारत भर में कई कैंपस सहित इमारतों को डिजायन किया है। जिसमें कुछ कम लागत वाली परियोजनाए भी शामिल हैं। पुरस्कार लेने के लिए दोशी मई में टोरोंटो जाएंगे और वहां वह एक लेक्चर भी देंगे।

 

पूर्व सांसदों को पेंशन क्यों नहीं मिलनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सांसद अपना पूरा जीवन राजनीति में खर्च कर देते हैं। ऐसे में पूर्व सांसदों को पेंशन और अन्य सुविधाएं देने का नौतिक आधार पर विरोध नहीं किया जा सकता। कोर्ट का कहना है कि समय के साथ चीजें बदलती हैं। जब संविधान में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है तो हमें इसमें क्यों दखल देना चाहिए।

न्यायमूर्ति जे चेलमेश्र्वर की अध्यक्षता वाली दो सदसीय पीठ का कहना है कि हम ये जानना चाहते हैं कि क्या पूर्व सांसदों को पेंशन सहित अन्य सुविधाएं देना कानून के खिलाफ है। पीठ ने याचिकाकर्ता संगठन लोकप्रहरी की ओर से पेश एसएन शुक्ला की दलील को खारिज कर दिया। पीठ का कहना है कि पहले संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन वर्षों बाद संविधान में संशोधन कर यह कानून बनाया गया। पीठ ने कहा कि समय के साथ चीजें बदलती हैं। शुरू में सुप्रीम कोर्ट में भी सात जज थे मगर अब उनकी संख्या भी बढ़ाई गई है।

पीठ ने आगे कहा कि सांसद या विधायक अपना पूरा जीवन राजनीति में खर्च कर देते हैं। तो ऐसे में उन्हें सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए? पीठ का कहना है कि नैतिक आधार पर इस तरह की सुविधाएं देने में कोई दिक्कत नहीं है। राजनीतिक रूप से यह सही है या गलत, हम यह तय नहीं कर सकते। बुधवार को केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखेंगे।

 

न्यूयार्क टाइम्स ने मधुबाला की खूबसूरती को किया सलाम

न्यूयार्क : अमेरिका के एक प्रमुख अखबार ने अपने एक खंड में बॉलीवुड की अब तक की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक मधुबाला को दुनियाभर की15 असाधारण महिलाओं के साथ जगह दी है। गुजरे जमाने की इन महिलाओं को अपने अंदाज में श्रद्धांजलि देते हुए‘ न्यूयार्क टाइम्स’ ने अपने नये खंड‘ ओवरलुक्ड’ में इनके योगदान का जिक्र किया है।

अखबार ने लिखा, वर्ष1851 से‘ न्यूयार्क टाइम्स’ में प्रकाशित जीवन परिचय खंड में श्वेत व्यक्तियों को प्रमुखता दी जाती थी लेकिन अब हमने15 असाधारण महिलाओं की कहानियां शामिल की है।
अखबार ने लिखा कि जीवन परिचय में किसी शख्स की मृत्यु से अधिक उसके जीवन के बारे में लिखा जाता है। उनके आखिरी शब्द, उनकी यादें और अपने अपने क्षेत्र में उनके योगदान को याद किया जाता है।
अखबार में मधुबाला का जीवन परिचय आयशा खान ने लिखा है। इस खूबसूरत अभिनेत्री की तुलना अक्सर मर्लिन मुनरो से की जाती है।
अखबार उन्हें याद करते हुए लिखता है कि महज16 साल की उम्र में अशोक कुमार के साथ वह फिल्म‘‘ महल’’ में दिखीं और इसके ठीक20 साल बाद उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। बेपनाह खूबसूरती की मलिका और अपने अंदर अथाह दर्द समेटने वाली मधुबाला का जीवन किसी फिल्म से कम नहीं था, जिसमें सबकुछ था– शानदार कॅरियर, असफल प्रेम कहानी और आखिरकार गंभीर बीमारी से मौत।

 

नासा के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में तारों के बीच खोजा पानी 

नासा के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में तारों के बीच पानी की खोज की है। इसे जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप की मदद से देखा गया है। यह एक ऐसे बादल है जिनमें पूरे ब्रम्हांड में सबसे अधिक पानी मौजूद रहता है। यह अणुओं से बना एक बादल है, जो धूल, गैस और छोटे-छोटे अणुओं से मिलकर बना है।

यह पानी तारों के ग्रहों की छोटी कक्षा तक पहुंचाया जाता है। इन बादलों के भीतर, छोटे धूल कणों की सतहों पर पानी बनाने के लिए ऑक्सीजन के साथ हाइड्रोजन परमाणु जुड़े होते हैं। यह कार्बन मिथेन बनाने के लिए हाइड्रोजन के साथ जुड़ जाता है।

यह हाइड्रोजन के साथ नाइट्रोजन बॉन्ड से अमोनिया बनाते हैं। यह अणु धूल के कणों की सतह पर चिपकते हैं, जिससे लाखों वर्षों में बर्फीली परतें जमा करते हैं।

 

पंडित महिला की अंतिम यात्रा में शरीक हुआ मुस्लिम समुदाय

श्रीनगर : कश्मीरर घाटी में एक बार फिर से कश्मीरियत की मिसाल देखने को मिली है। सदियों से चले आ रहे आपसी भाईचारे की परंपरा को निभाते हुए मुस्लिम समुदाय के लोग त्राल में एक पंडित महिला की अंतिम यात्रा में शरीक हुए।

जानकारी के मुताबिक शुक्रवार तड़के कश्मीरी महिला पंडित कमलावती (80) का निधन उसके पैतृक गांव त्राल के नूरपुर में हो गया। वो काफी समय से बीमार चल रही थी। जैसे ही यह खबर फैली आस-पास के गांव के लोग परिवार के प्रति सहानुभूति प्रकट करने पहुंच गए।

उन्होंने अंतिम संस्कार की तैयारियों में हाथ बंटाया। इसके साथ ही अंतिम यात्रा में कांधा भी दिया। दु:ख की इस घड़ी में गांव की मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हुईं। मृतक के परिवार के एक सदस्य ने बताया कि देख कर अच्छा लगा कि आस-पास के इलाकों में रहने वाले दूसरे समुदाय के लोग भी न केवल हमारे दुख में शामिल हुए बल्कि हर काम में हाथ भी बंटाया।

उन्होंने कहा कि ऐसे स्थानीय लोगों और पड़ोसियों की वजह से आज भी हम अपने घरों में महफूज हैं।

 

किंग खान पर भारी पड़े विराट कोहली, छीना नंबर वन का ताज

नयी दिल्ली : भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने बॉलीवुड के किंग खान कहे जाने वाले शाहरुख खान को पछाड़ते हुए नंबर एक का मुकाम हासिल कर लिया है। केवलब्रांड प्रमोशन करने के मामले में विराट कोहली शाहरुख समेत अन्य बॉलीवुड एक्टर्स  को काफी पीछे छोड़ दिया है।

144 मिलियन डॉलर के पार हुई ब्रांड वैल्यू
विराट कोहली की ब्रांड वैल्यू 144 मिलियन डॉलर के पार चली गई है। ऐप बेस्ड टैक्सी सर्विस उबर के ब्रांड अंबेसडर बन जाने के बाद कोहली की ब्रांडिंग से होने वाली रोजाना की कमाई 5 करोड़ रुपये के पार चली गई है। क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट का कप्तान बनने के बाद कोहली केवल ब्रांडिंग से रोजाना 4 करोड़ रुपये कमाते थे।

इन फिल्मी स्टार्स की यह है कमाई
कोहली के बाद शाहरुख खान 106 मिलियन डॉलर, दीपिका पादुकोण 93 मिलियन डॉलर, अक्षय कुमार 47 मिलियन डॉलर और रणवीर सिंह 42 मिलियन डॉलर कमाते हैं। यह स्टार्स भी विराट से काफी पीछे चल रहे हैं।

17 ब्रांड्स के हैं अंबेसडर 
विराट कोहली फिलहाल 17 ब्रांड्स के अंबेसडर हैं जिनमें ऑडी, मान्यवर, एमआरएफ टायर, बूस्ट हेल्थ ड्रिंक, जियोनी मोबाइल फोन शामिल हैं। कोहली फिलहाल पंजाब नेशनल बैंक के भी ब्रांड अंबेसडर हैं, जिससे वो इस वित्त वर्ष के बाद से नाता तोड़ देंगे। कोहली के इंस्टाग्राम पर 17 मिलियन से अधिक फॉलोवर्स हैं।

 

 

कानूनी लड़ाई जीती, बंगाल की पहली ट्रांसजेंडर देंगी यूपीएससी की परीक्षा

ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को समाज में तो भेदभाव का सामना करना ही पड़ता है, सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक जगहों पर भी उनके साथ कई बार वही रवैया अपनाया जाता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के अपने एक आदेश में ट्रांसजेंडर्स को कॉलेजों और सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करते वक्त ‘अन्य’ कैटिगरी के तहत आवेदन करने की सुविधा प्रदान कर दी है, लेकिन हकीकत में अभी इसका अनुपालन सही तरीके से नहीं हो पाया है, तभी तो पश्चिम बंगाल की रहने वाली ट्रांसजेंडर अत्री कर जैसे लोगों के लिए बंगाल पीसीएस और यूपीएससी की परीक्षा देने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है।

अत्री को काफी कोशिशों के बाद बंगाल पीएससी के एग्जाम में बैठने की इजाजत मिली। 28 वर्षीय अत्री पेशे से शिक्षिका  हैं। वह सिविल सेवक बनना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने तैयारी की। लेकिन 2017 में यूपीएससी का फॉर्म भरते वक्त वे हैरत में पड़ गईं। उन्होंने देखा कि फॉर्म में लिंग वाले विकल्प में सिर्फ पुरुष और स्त्री का ही कॉलम है। ऐसा ही पीसीएस की परीक्षा में भी हुआ था। बंगाल लोक सेवा आयोग ने सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया था। अत्री लोक सेवा के अधिकारियों के पास अपनी शिकायत लेकर पहुंचीं, लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया। उन्होंने रेलवे में एक पद के लिए भी फॉर्म भरा था, जिसमें महिला और पुरुष के साथ ‘अन्य’ का भी विकल्प था। वहां पर हालांकि उन्हें जनरल कैटिगरी में रख दिया गया। अत्री इन दोनों मामलों को लेकर कोलकाता हाई कोर्ट पहुंचीं। कोर्ट ने बंगाल लोक सेवा आयोग और रेलवे चयन बोर्ड को फटकार लगाई। कोर्ट ने बंगाल लोक सेवा आयोग से कहा कि वह ‘अन्य’ का विकल्प उपलब्ध करवाए और रेलवे चयन बोर्ड अत्री को आरक्षित वर्ग में रखे। इस साल 29 जनवरी को पीसीएस की परीक्षा में अत्री को बैठने का मौका मिला। वह बंगाल की पहली ट्रांसजेंडर हैं जिसे सिविल सर्विस एग्जाम में बैठने का मौका मिला है। इसी के साथ ही वह 2018 की यूपीएससी की सिविल सर्विस प्रीलिम्स की परीक्षा में भी बैठेंगी।

वह रेलवे की परीक्षा देने  वाली भी पहली ट्रांसजेंडर थीं। वह बताती हैं कि इस छोटे से काम के लिए उन्हें काफी लंबा संघर्ष करना पड़ा। पहले उन्होंने लोक सेवा आयोग के चक्कर लगाए, लेकिन वहां के अधिकारी उन्हें सिर्फ आश्वासन देते रहे। इसके बाद मजबूर होकर उन्हें कोर्ट का रुख करना पड़ा। उन्होंने मानवाधिकार कानून नेटवर्क की मदद ली और कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। वह कहती हैं कि इस पूरे काम में काफी लंबा समय लगा और उन्हें मुश्किल भरे दौर देखने पड़े। कई बार तो ऐसा भी लगा कि धैर्य जवाब दे जाएगा और वह यह नहीं कर सकेंगी।

हुगली जिले के त्रिवेणी में रहने वाली अत्री एक प्राइमरी स्कूल में  शिक्षिका हैं। अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए उन्हें स्कूल को भी सम्भालना करना पड़ा। कोर्ट पहुंचने के लिए उन्हें पांच घंटे का सफर करना पड़ता था और स्कूल को भी देखना पड़ता था। अत्री इंग्लिश ऑनर्स में ग्रैजुएट हैं। एक कोचिंग संस्थान ने उन्हें मुफ्त में सिविल सर्विस की कोचिंग कराने का भी वादा किया था, लेकिन कानूनी लड़ाई के बीच में वह भी छूट गया। वह कहती हैं कि अएगर एक पढ़े लिखे इंसान को अपने हक के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है को बिना पढ़े-लिखे ट्रांसजेंडर्स को किन हालातों में जीना पड़ता होगा।

 

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर, कहा- इज्जत से मरना इंसान का हक

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराया है। इस संबंध में अदालत ने विस्तृत दिशानिर्देश भी जारी करते हुए कहा है कि जब तक सरकार इस संबंध में कानून नहीं बना देती, तब तक ये दिशानिर्देश लागू रहेंगे।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने 2005 में कॉमन कॉज नामक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याची की ओर से पेश मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी थी कि मेडिकल एक्सपर्ट की राय में मरीज के ठीक होने की संभावना खत्म हो चुकी हो तो उसे जीवन रक्षक प्रणाली से हटाने की अनुमति दी जानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उसकी यंत्रणा बढ़ती ही जाएगी। सरकार ने भी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का समर्थन किया। याची और सरकार की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने पिछले साल 11 अक्तूबर में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने 42 साल तक कॉमा में रही अरुणा शानबाग के मामले में सुनवाई करते हुए इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी थी, लेकिन इसके संबंध में कोई कानूनी प्रावधान न होने के कारण स्थिति स्पष्ट नहीं हुई थी। ताजा फैसले में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 में शामिल कर लिया गया है, जो हर नागरिक को जीने का अधिकार देता है।

अहम साबित हुआ अरुणा शानबाग केस

मरते हैं आरजू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती, मिर्जा गालिब के इस शेर का उल्लेख करते हुए जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने 2011 में अरुणा शानबाग मामले में सुनवाई करते हुए निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की इजाजत दी थी। बाद में संसद से आईपीसी की धारा 309 (आत्महत्या की कोशिश) को खत्म करने की सिफारिश की थी।

करीब छह साल बाद  सुप्रीम कोर्ट ने  इच्छा मृत्यु को मंजूरी दे दी और  इसे कानूनी जामा पहनाने की लड़ाई में अरुणा शानबाग का केस अहम मोड़ साबित हुआ।  7 मार्च, 2011 को आए इस फैसले ने ठीक न होने की हालत में पहुंच चुके मरीजों एवं उनके परिजनों को राहत प्रदान करते हुए विशेष परिस्थितियों में इच्छा मृत्यु की अनुमति दी। मालूम हो कि मुंबई के किंग एडवर्ड्स मेमोरियल अस्पताल में नर्स अरुणा शानबाग के साथ 1973 में उसी अस्पताल के सोहनलाल वाल्मीकि नाम के वार्ड बॉय ने बलात्कार किया था। इसके बाद कुत्तों को बांधने वाली जंजीर से गला घोंटकर उसकी जान लेने की भी कोशिश की। दिमाग में ऑक्सीजन की सप्लाई न पहुंचने के कारण वह कॉमा में चली गई और 42 साल बाद 18 मई, 2015 को उसकी मौत हो गई।

हालांकि इससे पहले 26 अप्रैल, 1994 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने भी इच्छा मृत्यु का समर्थन करते हुए आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) को असंवैधानिक करार दिया था। पीठ ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीने के अधिकार के साथ मरने का अधिकार भी मौलिक अधिकार के रूप में निहित है लेकिन इसके दो साल बाद 21 मार्च, 1996 को पांच जजों की संविधान पीठ ने ज्ञान कौर बनाम भारत सरकार के मामले में इस फैसले को पलटते हुए कहा कि इच्छा मृत्यु और किसी की मदद से आत्महत्या देश में गैरकानूनी हैं।

 

 

अब रेलवे स्टेशनों पर सेल्फी खींचने के लिए बनाए जाएंगे प्वाइंट

आपको जल्द ही रेलवे स्टेशनों पर सेल्पी के लिए प्वाइंट्स बने दिख सकते हैं। भारतीय रेलवे ने सेल्फी प्वाइंट के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। जानकारी के मुताबिक दिसंबर 2018 तक देश के 70 रेलवे स्टेशनों पर यह सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है। यह सुविधा उन स्टेशनों पर उपलब्ध कराई जाएगी जहां पर लिफ्ट, एस्कीलेटर या इस तरह की दूसरी सुविधाएं मौजूद होंगी। पिछली कुछ घटनाओं को ध्यान में रखते हुए रेलवे ने यह कदम उठाया है।

आपको बता दें कि रेलवे स्टेशन डेवलेपमेंट कॉरपोरेशन, निजी कंपनी के साथ मिलकर देश के 600 स्टेशनों के रिडिवलेपिंग के काम में जुट गए हैं। इसके अलावा 70 रेलवे स्टेशन ऐसे हैं जिनके विकास के लिए रेलवे खुद काम कर रहा है। इनमें लोनावाला, पुणे, मुंबई, नागपुर, लखनऊ, वाराणसी, जयपुर, दिल्ली और मैसूर का नाम शामिल है।

रेलवे बोर्ड के चेयरमेन अश्वनी लोहणी ने विभिन्न जोन्स के अधिकारियों को पत्र के माध्यम से कहा है कि यात्रियों बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए रेलवे प्रयासरत है। पूरे भारत वर्ष में 600 स्टेशनों को चिह्नित किया गया है जिनके विकास का काम आईआरएसडीसी और रेलवे विभाग मिलकर करेगा।

उन्होंने कहा कि 2018-19 के बजट में यात्रियों को सुविधा देने का जिक्र किया गया था। जहां लिफ्ट और एस्किलेटर जैसी सुविधाओं को जोड़ने का जिक्र किया गया है। डिआरएम को निर्देश दिए गए हैं कि वह संबंधित काम के लिए आर्किटेक्ट की नियुक्ति करें। रेलवे ने तय किया है कि कर्मशियल बिल्डिंग में तैयार करेंगे ताकि भविष्य में होटल और हॉस्पिटल जैसी सुविधा भी रेलवे द्वारा दी जा सके।