Friday, April 3, 2026
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लिटिल थेस्पियन के नाटक – #रूहें का सार……

हुकूमत क्या है

एक खेल का नाम है

सियासत इस खेल की चाल

और हाकिम खिलाड़ी है

जो अपने विरोधियों के साथ खेलता है

 

अवाम तमाशाई हैं

इस खेल के

ऐसे तमाशाई

जो कभी खामोश रहते हैं

कभी सहमे हुए

कभी बेचैन

कभी जज़्बाती हो जाते हैं

लेकिन हाकिम जज्बाती नहीं होता

वो दिमाग से खेलता है

 

इस खेल में आते हैं कई पड़ाव

पहले पड़ाव में खेल की बाज़ी

खिलाड़ी के हाथ में होती है

खिलाड़ी अपने विरोधी को

देता है मौका चाल चलने का

उसे दौडाता है

भगाता है

और मारता है

 

दूसरे पडाव में

खेल का रोमांच ज़रा

खतरनाक मोड़ पे होता है

विरोधी के चौक्कने वार पर

खिलाड़ी होशियारी से ठिठकता है

फिर उसे खेलने का मौका देकर

कभी भागता है

कभी मार खाता है

कभी खुद को बचाता है

 

तीसरा पडाव होता है आख़िरी

जहाँ दोनों तरफ के खिलाड़ी

लगा देते हैं अपनी पूरी ताकत

जीत हासिल करने के लिए

जैसे चौगान का खिलाड़ी

घोड़े पे सवार अपनी छड़ी से

आंधी सी रफ़्तार लिए

गेंद को मारता हुआ

भागता है ऐसे सरपट

कि खेल की शक्ल

लगने लगती है खौफ़नाक

जैसे घुड़सवार गेंद छोड़

विरोधी की कटी गर्दन को

छड़ी से ठोकरे मार

भाग रहा हो बेतहाशा

अपनी सरहद की ओर…

 

ठीक उसी तरह

हुकुमत के खिलाड़ी

एक दूसरे की चालों को मात देते

लगा देते हैं अपनी पूरी ताक़त

अपने हिस्से की भीड़

अपने हिस्से का इतिहास

अपने हिस्से की गाथाएँ

अपने हिस्से के किसान

अपने हिस्से के नौजवान

और अपने हिस्से की तमाम रूहें

 

जीत मगर किसी एक की होती है

हवा में लहराते हों

जिसके उद्घोष

बजते हों ढोल जिसके

घडियाली आँसू के

बता सकता हो जो

कागज़ में गुल की खुशबू

बिना किसी आधार के

बना सकता हो जो महल

हवा को मुट्ठी में बंद करने का

कर सकता हो जो दावा

जीत का डंका उसी का बजता है

 

अतीत के गर्भ में

साँसे लेता भविष्य मगर

हार और जीत से परे

बिल्कुल आश्वस्त है

 

कि जानता है वो

अँधेरे और उजाले के बीच

जो इक पतली सी झिल्ली है

इंसानियत की नाल से ही जुडी है

इसलिए खेल में इंसानियत जीतेगी साथी

और यही भरोसा

ज़िन्दगी का इतिहास है

अतीत, वर्तमान और भविष्य है

 

 

 

 

इसमें तुम्हें जंगली पत्तों की खुशबू मिलेगी

विमलेश त्रिपाठी

केदारनाथ सिंह मेरे प्रिय कवि हैं। इसका कारण यह नहीं है कि मेरा शोध-कार्य केदार जी पर ही है। इसका कारण उनकी कविताएं हैं जो जादू की तरह असर करती हैं। केदार की कविताएं मुक्तिबोध की तरह कठिन भी नहीं हैं। सहज होकर गंभीर बातों को कहना और ऐसे कहना कि आपके अंदर एक हलचल और एक बेचैनी पैदा हो जाए, यह इसी एक कवि में मुझे मिलता है। यह कवि आपके साथ बोलते-बतियाते हुए आपको एक ऐसी जगह पर लेकर जाता है, एक ऐसे लोक में जहां से यथार्थ का एक नया चेहरा आपको दिखायी पड़ने लगता है, – नया और भयावह और आपको कई बार तिलमिला देने वाला भी।
केदार जी कि कविताएं एक ताजगी लेकर उपस्थित होती हैं। उनमें बोलने बतियाने का एक गंवई ठाट है। वहां कोई बड़बोलापन नहीं है, और है भी तो इतना सहज की वह अखरता तो कतई नहीं।

वे चाहे मारिशस या सुरिनाम पर कविताएं लिख रहे हों उनके पांव कहीं न कहीं अपनी मिट्टी में इतने गहरे घंसे हुए रहते हैं कि उनकी हर कविता में उसकी सुगंध देखने को मिल जाती है। लेकिन क्या यह इसका प्रमाण है कि केदार की कविताएं गांव और कस्बे के इर्द-गिर्द घुमती हैं। इस तथ्य को उनकी कविताएं ही नकारती भी हैं। इसे एक तथ्य के रूप में समझा जाना चाहिए कि जिस कवि की अपनी कोई जमीन नहीं है, वह ‘कवि’ भले हो जाए लेकिन केदार जी जैसा ‘बड़ा कवि’ तो कहीं से भी नहीं हो सकता।

डॉ. शंभुनाथ एक लेख में जिक्र करते हैं कि एक समय हिन्दी के कवियों को विश्व कविता लिखने का चश्का लग गया था। वे आगे यह भी कहते हैं कि साठ के बाद जो भी महत्वपूर्ण कविताएं हैं उनमें से अधिकांश पर इस विश्वबोध का चश्का काम करता है। शंभुनाथ एक गंभीर आलोचक हैं और जाहिर है कि उनके सामने इस तथ्य को कहते समय बहुत सारे कवि होंगे – जाहिर है कि केदारनाथ सिंह भी। लेकिन जिन कविताओं की मार्फत हम केदार को जानते हैं उनमें तो हमें विश्वबोध की कविताओं का चश्का नहीं दिखता। माझी का पुल कविता में कवि को लालमोहर की याद आती है और वह हल चलाते हुए दिखता है और उसे खैनी की तलब लगी है। पानी में घिरे हुए लोग उस अंचल के लोग ही हैं जो बाढ़ की भयावहता को समय-.समय पर अपने कंधे पर झेल चुके हैं। लेकिन केदार की खास विशेषता यह है कि वे गांव और जवार की बात करते हुए भी एक आधुनिक भावबोध से संवलित आधुनिक कवि हैं जिनकी कविताओं में समय की गूंज साफ-साफ सुनाई और दिखायी पड़ती है। हां, इस बात की ओर भी इशारा करने की जरूरत तो है ही कि उनके यहां लोक और नागर के बीच लोक संस्कृति और आधुनिकता के बीच एक द्वद्व, एक ‘क्लैश’ भी दिखायी पड़ता है और यह उद्देश्यहीन नहीं है।

इस कवि ने कभी भी यह नहीं माना कि भारतीय आधुनिकता बाहर से आयातित की हुई कोई अवधारणा है, बल्कि उसका कहना है कि भारतीय आधुनिकता का विकास भी अपने तरीके से ठेठ भारतीय संदर्भ में हुआ है। मेरे समय के शब्द में एक जगह वो साफ-साफ लिखते हैं जिससे हमारी उपरोक्त बातों को बल मिलता है। वे लिखते हैं – आधुनिकता के विकास की प्रक्रिया की पहचान और पुनरावलोकन हमें भारतीय संदर्भ में करना चाहिए। उनका तर्क है कि आधुनिकता संबंधी बहस खत्म हो गई है लेकिन आधुनिकता की प्रक्रिया अपने खास ढंग से पूरे भारतीय संदर्भ में आज भी जारी है। यह स्थिति पश्चिम से थोड़ी भिन्न है और इसलिए ठेठ भारतीय भी। यह एक विकासशील देश की अपनी बनावट और उसकी खास जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे सही संदर्भ में रखकर देखा जाना चाहिए । आगे वे अपनी आधुनिकता में लोक मूल्यों की संश्लिष्टता का उद्घाटन करते हुए लिखते हैं कि हमारा देश सामंतवाद के विरूद्ध एक लंबे संघर्ष के बावजूद भी, अपने मूल्यों और आचरण में सामंती अवशेषों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। उसी अवशेष का एक रूप है जाति व्यवस्था, जो हमारे चारों ओर है। अपने सारे मानववाद के बावजूद, हम एक जाति विशेष के सदस्य माने जाते हैं। यह हमारी सामाजिक संरचना की एक ऐसी सीमा है, जिससे कवि की संवेदना बार-बार टकराती और क्षत-विक्षत होती है। वे स्वीकार करते हैं कि उनकी आधुनिकता में यह खंरोच भी शामिल है।
कहने का आशय सिर्फ इतना है कि उस खंरोच को समझे बिना केदार की कविताओं को समझना और उसका सटिक मूल्यांकन करना लगभग असंभव है। क्योंकि लोक का ठेठपन और पूर्णतः आधुनिक होने के बावजूद उनकी आधुनिकता की एक चिंता यह भी है कि उसमें ‘लालमोहर’ कहां है। लालमोहर को समझे बिना केदार की कविताओं को समझना समंदर के किनारे खड़े होकर लहरें गिनने जैसा है। जाहिर है कि इस दृष्टि से जब हम केदार की कविताएं पढ़ेंगे तो जो हमें मिलेगा वह बकौल केदारनाथ सिंह –

इसमें तुम्हें जंगली पत्तों की खुशबू
और एक जानवर के रोओं की गरमाहट मिलेगी
तुम्हे एक मजबूत पत्थर मिलेगा
जिसपर तुम बैठ सकते हो
पत्थर को छुओ
तुम्हें पानी का संगीत सुनाई पड़ेगा
एक पत्ता उठा लो
और तुम पाओगे तुम उसकी नसों में
खून की तरह बह रहे हो
तुम बाहर निकलोगे
और तुम्हे सूरज मिल जाएगा।

***
केदार की कविता का जादू
——————————

केदार जी की कविताएं पढ़ते समय हमें यह कभी नहीं लगता कि हम कोई लयमुक्त या छंदहीन कविता पढ़ रहे हैं। कहने की बात नहीं कि केदार जी ने लिखने की शुरूआत छंदबद्ध कविताओं से की थी और एक समय उनके गीत सुनने के लिए लोग सभागारों में बैठे इंतजार करते रहते थे। उन गीतों में क्या था कि नवगीत के पुरोधा कवियों के बीच भी केदार को अलग से सुनने का मन करता था। मेरी समझ से केदार जी के गीतों में एक तरह की भाषिक नवीनता तो थी ही, साथ ही उसमें उसमें अपने लोक, अपने अंचल की वाणी भोजपुरी की मिठास भी शामिल थी। अलावा इसके केदार जी के पास सर्वथा नूतन एक आधुनिक दृष्टि थी जो उनकी कविता में एक तरह की नवीनता के साथ जादू जैसा कुछ पैदा करती थी।
केदार जी एक इंटरव्यू में याद करते हैं कि कविता से पहला परिचय उन्हें गांव में औरतों के द्वारा गाए जाने वाले गीतों की मार्फत हुआ। वे कहते हैं कि सुबह-सुबह अधनींदी अवस्था में कई बार कानों में भोजपुरी के लोक गीत सुनने को मिलते थे – उन गीतों का असर आज भी मेरे लेखन में है, इसे मैं कितना भी चाहूं, अस्वीकार नहीं कर सकता। उन गीतों में क्या जादू है, यह तो वही समझ सकता है, जो गांव में रहा हो और उस जिंदा जादू को पत्यछ देखा-सुना हो। केदार की कविताओं में एक तरह की सहजता के साथ जो जादू है, कहीं न कहीं उसका उत्स वे लोक गीत ही हैं, जिन्होंने केदार को कहीं गहरे प्रभावित किया है।
उनकी बोलने-बतियाने और उसी दौरान कोई गूढ़ बात कह देने की शैली भी रेखांकित करने लायक है। कई बार वे पाठकों से बातचीत के लहजे में कविता की शुरूआत करते हैं, कई बार पाठक से सवाल करते हैं कि अब क्या किया जाए, कि अब आप ही बताएं कि अब तो यह तय करना मुश्किल है इत्यादि। तात्पर्य यह कि उनके लिए पाठक कविता के बाहर की कोई वस्तु नहीं है, वे हर कविता के साथ पाठक को शामिल करते चलते हैं, जैसे कोई बच्चा इधर-उधर न जाए इसलिए उसका अभिभावक अपनी उंगली पकड़ा देता है। एक बार बच्चे ने उंगली पकड़ ली तो अभिभावक अपनी रौ में अपनी राह चलता जाता है। केदार की कविता की रचना प्रक्रिया को इसी तरह समझने की जरूरत हमें महसूस होती है।
उपर केदार जी के लोक गीतों से जुड़ाव की बातें कही गई हैं। भोजपुर अंचल में रहने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो लोक गीतों से अपना जुड़ाव न रखता हो। यह अलग बात है कि अब वे परंपराएं मिट रही हैं और लोक गीतों के नाम पर कुछ फूहड़ और अश्लील गीत ही बाजार में रह गए हैं। लेकिन केदार जी का जो समय रहा है, उस समय भोजपुरी लोकगीतों में एक समृद्ध साहित्यिक एवं काव्यात्मक तत्व दिखायी पड़ता है। भोजपुरी लोक गीतों के महानायक भिखारी ठाकुर के बारे में केदार जी के संस्मरणों को पढ़ने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि केदार जी का लोक और लोक गीतों से कितना गहरा जुड़ाव रहा है। यह गौर तलब है कि अपनी कविता की किताब ‘उत्तर कबीर व अन्य कविताएं’ में केदार जी ने ‘भिखारी ठाकुर’ नाम से एक बहुत ही मार्मिक कविता भी लिखी है।
‘नई कविता के मंच पर भिखारी ठाकुर’ नामक संस्मरणात्मक लेख उपरोक्त बातों की पुष्टि करता है। तो इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि केदार जी की शुरूआती कविताएं लयबद्ध हैं, उनमें गीतात्मकता है। हमारा कहने का मतलब यह है कि यह लयात्मकता और गीतात्मकता की गूंज हमें केदार जी की हर कविता में सुनाई पड़ती है। इसलिए जब हम आज की उनकी कविताएं पढ़ते हैं, तब भी हमें लोकगीतों की लय और गीत की मिठास की गूंज उनकी कविताओं में सुन पाते हैं। यही केदार की कविता का जादू है तो सिर चढ़कर बोलता है और यही कारण है कि एक पूरी पीढ़ी उनकी कविताओं से प्रभावित है और पाठकों के बीच उनकी कविताएं असाधारण रूप से लोकप्रिय हैं।

(लेेखक की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया लेख)

 इन देशों में भी मनाई जाती है जाती है रामनवमी

श्रीराम सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में पूजे जाते हैं। कई देशों में राम के मंदिर हैं और श्रद्धालुओं के बीच उनका नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। सनातन धर्म मानने वाले रामनवमी का उत्‍सव हर साल पूरे उल्‍लास से मनाते हैं। रामनवमी चैत मास में शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। इस दिन अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौसल्या के पुत्र भगवान राम का जन्म हुआ था ।रामनवमी का त्‍योहार भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम के जन्‍मोत्‍सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां दुर्गा के नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्र का समापन भी होता है।  आइए जानते हैं किन-किन देशों में रामनवमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है –

थाइलैंड – थाइलैंड दक्षिण-पूर्वी एशिया का देश है, जिसकी राजधानी है बैंकॉक। यहां भगवान राम और रामायण का काफी महत्व दिया जाता है। थाइलैंड के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है। यहां कई जगहों पर रामलीलाएं होती हैं और लोग राम के भजन गाते हैं। खास बात ये है कि ‘रामायण’ थाइलैंड का राष्ट्रीय ग्रंथ है। भगवान राम के अलावा थाइलैंड में शिव जी, भगवान विष्णु, इंद्र देव, सरस्वती देवी, गणेश जी समेत कई देवी देवताओं के सैकड़ों मंदिर है। यहां तक कि थाइलैंड सरकार का अधिकृत प्रतीक चिह्न ‘गरुड़’ है।

नेपाल – नेपाल के लोग भी भगवान राम को काफी महत्व देते हैं। यहां रामनवमी हिंदू त्योहारों के महत्वपूर्ण पर्व में से एक है। पूरे नेपाल में भगवान राम के कई मंदिर है। खासतौर पर रामनवमी वाले दिन मंदिरों को सजाया जाता है और हजारों लोग यहां पूजा के लिए आते हैं। कुछ इलाकों में भगवान राम की शोभायात्रा भी निकाली जाती है।

श्रीलंका – भगवान राम और सीता के जीवन का काफी भाग श्रीलंका से जुड़ा हुआ है। भगवान राम के जीवन का उद्देश्य ही ऋष‍ि-मुनियों के काम में बाधा डालने वाले राक्षसों और लंका के राजा रावण का अंत करना था। आज भी श्रीलंका में कई जगहों पर राम-सीता, हनुमान, रावण से जुड़ी निशानियां मौजूद हैं। श्रीलंका में हिंदू देवी-देवताओं के सैकड़ों मंदिर हैं. भारत की तरह श्रीलंका में भी पूरी श्रद्धा के साथ इन देवताओं की पूजा की जाती है। इन देशों के अलावा सिंगापुर, मॉरिशस, इंडोनेशिया, भूटान, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, बांग्लादेश जैसे कई देशों में रहने वाले भारतीय हिंदू समुदाय के लोग भगवान राम को मानते हैं. त्‍योहार के मौके पर मंदिरों में उत्सव का आयोजन होता है।

जायज तो नहीं..

गुंजन सैनी की यह कविता वैवाहिक बलात्कार की पीड़ा को बयां करती है

Ek hawas bhare insaan ke bacche ko apni kokh me rakhnaJaayaz To nahi – Gunjan SainiVideo Courtesy- YourQuoteSubscribe Our YouTube channel for More Beautiful Poetrieshttp://bit.do/BolPoetryFor media updates visit http://aprajita.co.in

Posted by Bol Poetry on Tuesday, March 20, 2018

बोल पोएट्री से साभार

विश्वास का पर्व राजस्थान का गणगौर

अनुराधा अग्रवाल

कुंवारी लड़कियाँ अच्छे पति की कामना और विवाहिता अपने पति की लंबी उम्र और उनकी मंगल कामना के लिए पूजा करती हैं । गनगोर के गीत गाकर ईशर  और गोरा की पूजा होती है ।

तीज वाले दिन सभी लड़कियाँ सुबह-सुबह सुन्दर कपड़े और गहने पहन कर तैयार होती है ।गनगोर की मूर्तियों को भी सुन्दर कपड़ों  और गहनों से सजाया जाता है ।फिर फूल और दूब से पूजा की जाती है ।

पूजा के दौरान सब काजल , मेहंदी और रोली की सोलह –सोलह  बिंदी लगाती है ।फिर पीतल के कटोरे में हल्दी की गाँठ ,कोड़ी, छल्ला और सिक्का रखा जाता है ।उससे पूजा की विधि शुरू की जाती है ।

पूजा में गाये गये गीतों में पूजारिन   अपने -अपने परिवार के सदस्यों के नाम लेती हैं  । जितनी इच्छा उतने गीत गा सकते हैं और अंत में एक कहानी भी सुननी पड़ती है ।

 

गणगौर के दो गीत

पग दे पावड़िया, ईसरदास जी चढ़िया।
लैर बाई रोवां , देवो ना आसीस जी।
पग दे  पावड़िया , कानीराम चढ़िया।
लैर बाई रोवां , देवो ना आसीस जी।
गोर ईसरदास फूल गुलाब को ,
बहू गोरल ए फूलड़ांरी सेज,
गैरो फूल गुलाब को।
गोर कानीराम फूल गुलाब को ,
बहू लाडेल ए फूलड़ांरी सेज, गैरो फूल गुलाब को।

स्टीफन हॉकिंग : वैज्ञानिक जो ईश्वर को चुनौती दे गया

विज्ञान जगत का एक सितारा 14 मार्च 2018 को सितारों की दुनिया में विलीन हो गया। एक ऐसा सितारा, जिसने ना केवल विज्ञान के जटिल रहस्यों को समझने में दुनिया की मदद की। बल्कि दुनिया भर के शारीरिक अक्षमता से जूझने वाले लोगों के लिए भी मिसाल बनकर उनके अंदर जोश और आत्मविश्वास भरने का काम किया। जी हां, हम बात कर रहे हैं विश्वविख्यात भौतिकविद स्टीफन हॉकिंग की। जिनका कल 76 वर्ष की उम्र में कैंब्रिज में उनके निजी आवास पर निधन हो गया। उनका यूँ दुनिया छोड़ कर जाना समूचे विज्ञान जगत को अनाथ कर देने जैसा है। लेकिन इस ब्रम्हांड का निर्माण और ब्लैक होल जैसे तमाम विषयों पर उनके द्वारा दिए गए सिद्धांतों से वह हमारे बीच हमेशा जीवित रहेंगे। जानिए उनके बारे में कुछ खास बातें –

  1. आधुनिक विज्ञान के पिता कहे जाने वाले गैलीलियो गैलिली के जन्म के 300 साल बाद 8 जनवरी, 1942 ​को स्टीफन हॉकिंग का जन्म हुआ था। वो मानते थे कि विज्ञान ही उनका मुकद्दर है। स्टीफन हॉकिंग को अम्योट्रॉफिक लेटरल क्लेरोसिस (ALS) नाम की खतरनाक बीमारी थी और वो करीब 50 वर्षों तक व्हिलचेयर पर रहे। फन हॉकिंग चिकित्सा विशेषज्ञों के तमाम दावों को झुठलाते हुए उन्होंने अपनी जिंदगी के 76 साल बिताए। वो क्म्यूटर स्पीच सिंथेजाइजर के माध्यम से बोल पाते थे।
  2. 1974 में ही हॉकिंग ने दुनिया को अपनी सबसे महत्वपूर्ण खोज ब्लैक होल थ्योरी से दी थी। उन्होंने बताया था कि कैसे ब्लैक होल क्वांटम प्रभावों की वजह गर्मी फैलाते हैं। महज 32 वर्ष की उम्र में वह ब्रिटेन की प्रतिष्ठित रॉयल सोसाइटी के सबसे कम उम्र के सदस्य बने जबकि पांच साल बाद ही वह कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गए। उनकी तुलना महान वैज्ञानिक आइंस्टीन से की जाती थी और  यह वही पद था जिस पर कभी महान वैज्ञानिक आईजैक न्यूटन भी नियुक्त थे।
  3. हॉकिंग ने अपने व्हील चेयर को इतना आधुनिक बनाया था और उसमें इतने  उपकरण लगाए थे जिसकी मदद से वह न केवल रोजमर्रा के काम करते थे बल्कि अपने शोध में भी जुटे रहते थे।  बीते बरसों में हॉकिंग ने अपने सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करने के लिए भारतीय वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर इंजीनियर अरुण मेहता से भी संपर्क किया था।
  4. स्टीफन हॉकिंग ने 2016 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर का उद्धघाटन करते हुए दुनिया को इस तकनीक के फायदे और नुकसान के बारे में चेतावनी दी थी।उन्होंने कहा था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक गरीबी और बीमारियों के उन्मूलन में कारगर साबित होगी। लेकिन यह तकनीक शक्तिशाली स्वचालित हथियारों के रूप में बर्बादी भी लाएगी।
  5. स्टीफन हॉकिंग ने 2007 में विकलांगता के बावजूद विशेष रूप से तैयार किए गए विमान में बिना गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र में उड़ान भरी। वह 25-25 सेकेण्ड के कई चरणों में गुरुत्वहीन क्षेत्र में रहे। इसके बाद उन्होंने अंतरिक्ष में उड़ान भरने के अपने सपने के और नजदीक पहुंचने का दावा भी किया। वहीं उन्होंने स्वर्ग की परिकल्पना को सिरे से खारिज कर दिया था। उन्होंने स्वर्ग को सिर्फ डरने वालों की कहानी करार दिया था।
  6. उन्होंने कहा की उन्हें मौत से डर नहीं लगता बल्कि इससे जीवन का और अधिक आनंद लेने की प्रेरणा मिलती है हॉकिंग ने ये भी कहा है की हमारा दिमाग एक कम्पूटर की तरह है जब इसके पुर्जे खराब हो जाएंगे तो यह काम करना बंद कर देगा। खराब हो चुके कंप्यूटरों के लिए स्वर्ग और उसके बाद का जीवन नहीं है।  स्वर्ग केवल अंधेरे से डरने वालों के लिए बनाई गई कहानी है।  अपनी किताब द ग्रैंड डिजायन में प्रोफेसर हॉकिंग ने कहा है कि ब्रह्मांड खुद ही बना है।  यह बताने के लिए विज्ञान को किसी दैवीय शक्ति की जरूरत नहीं है।
  7. प्रोफेसर हॉकिंग ने यह कहकर भी सनसनी फैला दी थी कि 200 साल के भीतर धरती का विनाश हो जाएगा।  2010 में दिए अपने इस बयान में हॉकिंग ने कहा था कि बढ़ती आबादी, घटते संसाधन और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का खतरा लगातार धरती पर मंडरा रहा है। अगर इंसान को इससे बचना है तो अंतरिक्ष में आशियाना बनाना पड़ेगा। विपरीत परिस्थितियों में जिंदा रहने के सिद्धांत का हवाला देते हुए हॉकिंग ने कहा की पहले इंसान के अनुवांशिक कोड में लड़ने-जूझने की जबरदस्त शक्ति थी। 100 साल बाद यदि इंसान को अपना अस्तित्व बचाना है तो धरती को छोड़कर कोई दूसरा ठिकाना खोजना होगा।
  8. स्टीफन हॉकिंग ने सबसे पहले 1965 में अपनी प्रेमिका जेन विल्डे से शादी की। जिनसे उनके तीन बच्चे हैं। 25 सालों के बाद दोनों अलग हो गए और स्टीफन हॉकिंग ने अपनी देखभाल करने वाली नर्स ऐलेन मैसन से दोबारा शादी की। हालांकि, ऐलेन मैसन के साथ भी स्टीफन हॉकिंग का रिश्ता लंबा नहीं चल सका और दोनों अलग हो गए।
  9. स्टीफन हॉकिंग और जेन विल्डे की लव स्टोरी पर साल 2014 में फिल्म बनी ‘द थ्यौरी आॅफ एवरीथिंग’। इस फिल्म में ब्रिटिश एक्टर एडी रेडमेन ने स्टीफन हॉकिंग का किरदार निभाया, जिसके लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का आॅस्कर भी मिला। स्टीफन हॉकिंग ने भी आॅस्कर जीतने पर जश्न मनाया और कहा, ‘जब वो फिल्म देख रहे थे तो उन्हें लगा कि वो खुद अभिनय कर रहे हैं।’
  10. स्टीफन हॉकिंग पर साल ‘2013’ में एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनी, जिसका नाम ‘हॉकिंग’ रखा गया। इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म में स्टीफन हॉकिंग ने अपने जीवन के बारे में बात किया। उन्होंने कहा, ‘क्योंकि मेरे जीवन का हर दिन आखिरी दिन हो सकता है, मेरी यही इच्छा है कि मैं हर एक पल का उपयोग करूं।’

 

ए औरत

उमा झुनझुनवाला

ए औरत
सब कहते हैं
तू दुर्गा है
तू काली है
तू सरस्वती है
पार्वती और लक्ष्मी है तू
तब मान ले न
कि पूज्यनीय है तू
हर हाल में
सशरीर न सही
पत्थरों में ही सही
क्या फ़र्क पड़ता है
जो पैर छूते छूते
छू लेते हैं छाती
दबोच लेते हैं अंग अंग
लिंग-पूजन भी तो अनिवार्य है
जानती हो न
मूर्तियाँ कौन गढ़ता है
औरत का वजूद मर्द से ही है
फिर क्यों करना पड़े संघर्ष
सौंप दे ख़ुद को तू उसे सहर्ष
आदिकालीन है रीत
स्त्रियाँ बनाती आईं हैं भोजन
नाना प्रकार के स्वादों का
पुरुषों के लिए हर पहर
स्वाद पुरुषों के लिए ही बने हैं
युगों युगों पहले ही
लिख दिया गया था शास्त्रों में
डेढ़ बरस की हो शरारत
या हो सौ बरस की लाचारी
व्याकरण में स्त्रीलिंग ही कहलाएगी
लज्जित न हो तू
कि गर्भ में ही
कर दी जाती है हत्या
मगर कन्या-पूजन तो करते हैं न
घर की सुख समृद्धि के लिए
और सुनो
बलात्कार शरीर का होता है
मूर्ति का नहीं
दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती
इसीलिए सब पत्थरों में तराशी गईं
ए औरत
अपने दुखों को कठोर बना
और बन जा बुत
हमेशा के लिए तू
कि पत्थर प्रजनन नहीं करते
         *

संजय जायसवाल की दो कवितायें

संजय जायसवाल

बहुत थक गया ऐ दरख्त

इंतजार करते करते

अब तो सूरज भी छिपने लगा

तुमने तो कहा था

वे आएंगी

गीत गुनगुनाएंगी

क्यों नहीं आईं कोयल

क्यों नहीं आया कठफोड़वा

कम से कम गौरैया यह आ जाती

देखो निशा अपनी जादू बिखेरनी लगी अब

लौट रहे हैं निजाम के अब्बा भी बाजार से

दरख्त कुछ कहते क्यों नहीं

आंखें अब उतरना चाहती हैं

कब तक टंगी रहेंगी

तुम्हारे ऊपर

कान अब भी खड़े हैं सुनने को

दरख्त इतनी वीरानी क्यों

इतनी गहरी शून्यता

कब तक बोहते रहोगे उम्मीद को अपने जर्जर कंधों पर

सुनो तुम

नीड़ बना लो पहले

बिन ठौर कुछ नहीं टिकता

देखो दिन भी बीत गया

ठहर न सकी किरणें

सुनो मैं थक चुका हूं

गर वे आएं तो कहना

वह थका था और चुका था

समय के सागर में वह वृथा था।

 

2.

प्रेम रोज दबे पांव

आता है मेरी कविता में

शब्द हरसिंगार के फूल बन झरते हैं

शिशु बन किलकते हैं तुम्हारी गोद में

रोज दबे पांव आया प्रेम

निडर हो जाता है तुमको पा

भूल जाता है कि प्रेम बचाकर सबकी नजर

दाखिल हुआ है

प्रेम रोज नए नए सवालों के साथ आता है

और तुम उन सवालों की कुंजी बन जाती हो

प्रेम रोज आने से पहले

ले आता है थोड़ी हवा

थोड़ी धूप

थोड़ी सुगबुगाहट

और ले आता है मंदिर की घंटी की ध्वनि

जिसमें बजते हैं  खेत में जुताई कर रहे बैलों के खुर की धाप

चिड़ियों की चहचहाहट

भिखारियों की याचना

कितना कुछ प्रेम समेटे रहता है दाखिल होने से पहले

और सबसे आखिर में प्रेम

आशंका और उम्मीद के साथ दाखिल हो जाता है

इस तरह  रोज

दबे पांव प्रेम आता है मेरी कविता में

कविता लिखते हैं तो आपके लिए है सुनहरा मौका

कोलकाता/मुम्बई : कविता लिखने का शौक रखते हैं तो आपके लिए बोल पोएट्री लाया है सुनहरा मौका। अगर आपकी कविताओं में कुछ बात और रखते हैं तकनीक की जानकारी तो बोल पोएट्री आपकी रचनाओं को नया मंच देगा। श्रोताओं तक पहुँचेंगी आपकी कवितायें। ये कवितायें सोशल मीडिया के लिए हैं इसलिए आवृत्ति और प्रस्तुति पर विशेष ध्यान देना न भूलें। आप अपनी कवितायें 8286900027 नम्बर पर व्हाट्स ऐप कर सकते हैं। यह जानकारी बोल पोएट्री की ओर से धीरज पांडेय ने दी।

 

हावड़ा नवज्योति ने महिलाओं के लिए नि:शुल्क सेल्फ डिफेंस कोर्स की शुरुआत की

हावड़ा : बदलते समय में समाज ने भी मान लिया है कि नारी अबला नहीं सबला हैं। लगभग हर क्षेत्र में नारियों ने इसे साबित भी कर दिया। हालांकि समाज का एक हिस्सा इस विचार से सहमत नहीं। लिहाजा सुरक्षा के लिहाज से महिलाओं का स्वतंत्रता पूर्वक घर से निकलना आज भी सवालों के घेरे में हैं।

महिलाओं की शिक्षा व उत्थान में प्रयासरत समाजसेवी हावड़ा नवज्योति ने ऐसे सवालों के कई घेरों को तोडऩे का संकल्प लिया है। संस्था के सचिव प्रभात मिश्र ने आज अपनी बिटिया पीहू के दूसरे जन्मदिवस पर बतौर तोहफा उसे यही संकल्प देने का फैसला लिया है।

संस्था की ओर से शुक्रवार से महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए तैयार करने को नि:शुल्क कराटे कोर्स की शुरुआत की गई। सीएम ममता बनर्जी के आदर्शों को जीवंत करने की इस योजना में राज्य के युवा व खेल राज्य मंत्री लक्ष्मीरतन शुक्ला, हावड़ा बोरो 2 की चेयरपर्सन मनजीत राफेल, वार्ड 12 के पार्षद गौतम चौधरी(दिलु दा) का विशेष सहयोग मिला।

प्रशासन के सहयोग से शैलेंद्र बोस रोड स्थित संस्था के कार्यालय के सामने बेजार पड़े पार्क का पुनरुद्धार किया गया। इसी पार्क में राष्ट्रीय स्तर के कराटे प्रशिक्षक महेश दास के नेतृत्व में कराटे की कक्षाओं का शुभारंभ हुआ। पार्क के पुनरुद्धार से स्थानीय लोग भी खुश हैं। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष डॉ सिपाही सिंह, पूर्व अध्यापक बीएन पाडेंय, वार्ड 10 व 12 के यूथ प्रेसिडेंट व समाजसेवी सुभाष राफेल उपस्थित थे।

संस्था के सदस्य, राजू , संतोष विक्की, विश्वजीत, योगेश, धर्मेंद्र , जयंत, संजीत, अशोक, राजकुमार, गोरख, गोपाल, सोहन की मेहनत ने कार्यक्रम को सफल बनाया।