Thursday, July 9, 2026
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भारत की धरोहर…. महाभारतकालीन इन्द्रप्रस्थ यानि आज का पुराना किला

कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिनमें रहस्य भी छुपे हैं और संवेदना भी..मगर लोग महसूस कर पाते होंगे…यह कहना कठिन है। एक वक्त के बाद इमारतें खंडहर में तब्दील हो जाती हैं और वह जगह लोगों के मनोरंजन और वक्त बिताने की जगह बन जाती है। अफसोस है कि दिल्ली का प्राचीन ऐतिहासिक और पुराना किला भी ऐसी जगह बनता जा रहा है। कुछ लोग होते हैं जिनको किले के विशाल परिसर में दबे इतिहास के प्रति मोह और कौतुहल होता है खासकर महाभारत से इस किले का संबंध होना इस मोह को और बढ़ाता है मगर सबके आने का मकसद एक जैसा नहीं होता।

लोग यहाँ वक्त बिताने आते हैं और युवा जोड़ों के लिए तो यह भीड़ से दूर एक शरणस्थली है…आप हर दो कदम पर किले के विशाल परिसर में प्रेमिल मुद्राओं में देख सकते हैं…। फिलहाल किले में खुदाई चल रही है जो शीघ्र ही समाप्त होने वाली है। पुराने किले के बाहर और भीतर सँग्रहालय में इस किले के महाभारतकालीन होने का उल्लेख किया गया है। यहाँ दी गयी जानकारी के अनुसार पांडवों और कौरवों, दोनों की राजधानी यमुना नदी के तट पर स्थित थी।

महाभारत के युद्ध के उपरांत परिक्षित के बाद क्रमानुसार पाँचवें नरेश निचक्षु ने अपनी राजधानी को हस्तिनापुर से कौशाम्बी स्थानांतरित किया था पर इससे इन्द्रप्रस्थ का महत्व कम नहीं हुआ। इन्द्रप्रस्थ का नाम परवर्ती पुराणों में आता है मगर कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती और ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त काल तक आते – आते इसकी महत्ता खत्म होने लगी थी।

1955 में पुराना किला टीले पर उत्खनन हुआ और यहाँ स्थित लगभग 1 हजार ई.पू. प्राचीन बस्ती जिसमें धूसर मृदभांड का प्रयोग होता था, के प्रमाण प्राप्त हुए। इसके बाद 1969 में बृजवासी लाल, बालकृष्ण थापर और मुनीश चन्द्र जोशी में नेतृत्व में 4 वर्ष तक उत्खनन हुआ और पुरात्वविदों को मौर्य, कुषाण, परवर्ती गुप्त, राजपूत, दिल्ली सल्तनत और मुगल काल से संबंधित अवशेष प्राप्त हुए। यह महाभारत में व्याख्यायित स्थान है।

किला जिस टीले पर है, उसके नीचे इन्द्रप्रस्थ अथवा इन्दरपत बस्ती है। खांडवप्रस्थ के अतिरिक्त बागपत, तिलपत,सोनीपत और पानीपत, ये गाँव पांडवों ने माँगे थे। उत्तर – दक्षिण की ओर बहती यमुना, खांडवप्रस्थ के पूर्व में तथा अरावली पहाड़ की रिज नामक श्रृंखला के पश्चिम में थी। पुरात्विक उत्खनन से ज्ञात हुआ है कि यहाँ लगभग 1000 ई.पू. बस्ती बस चुकी थी और यह कोटला फिरोजशाह तथा हुमायूँ के मकबरे के बीच स्थित थी। इन्द्रप्रस्थ का जिक्र इतिहासकारों ने यहाँ तक कि अबुल फजल ने भी आइने अकबरी में किया है।

आश्चर्य की बात यह है कि ह्वेनसांग और मेगस्थनीज खामोश हैं मगर अलेक्जेन्ड्रिया के भूगोलशास्त्री टॉलेमी ने इन्द्रप्रस्थ के निकट दैदला नामक स्थान का उल्लेख किया है। किले की विद्यमान प्राचीर एवं अन्य इमारतें शेरशाह सूरी ने हुँमायूँ द्वारा 1533 में स्थापित दीनपनाह नामक शहर को ध्वस्त कर निर्मित की थीं। 1555 में फारस से लौटने के बाद मृत्यु पयर्न्त हुँमायूँ यही रहा। पुराना किला एक अनियमित आयत के रूप में बना है और इसके कोनों तथा पश्चिमी दीवार पर बुर्ज हैं। उत्तर, पश्चिम तथा दक्षिण की ओर किले के तीन प्रमुख द्वार हैं जिनके ऊपर छतरियाँ हैं। इनको क्रमशः तलाकी., बड़ा और हुमायूँ दरवाजा कहते हैं।

कहते हैं कि इसी पुस्तकालय में किताबों के बोझ ले लदा हुमायूँ सीढ़ियों से गिरा था और उसकी मृत्यु हो गयी थी

किले की भीतरी इमारतों में शेरशाह की मस्जिद तथा शेर मण्डल के नाम से प्रसिद्ध मंडप उल्लेखनीय है। प्रारम्भ में दुर्ग प्राचीर के चारों ओर एक खाई थी जो पहले यमुना से जुड़ी थी।इंद्रप्रस्थ बारहमासी नदी यमुना के किनारे है जो आज से लगभग 5000 साल पहले पांडवो की राजधानी के रूप में स्थापित की गयी थी।

सँग्रहालय में रखे गये पुरातन आभूषण

किले के भीतर एक कुंती मंदिर भी मौजूद है, ऐसा माना जाता है की कुंती जो पांडवो की माता थी यही रहा करती थीं। ऐसा भी माना जाता है की ये किला दिल्ली का पहला शहर हुआ करता था। शोधकर्ताओं ने इस बात की पुष्टि की है, 1913 तक एक गांव जिसे इंद्रपत कहा जाता था का अस्तित्व केवल किले की दीवारो के भीतर तक ही था।

यहाँ अब इन्द्रप्रस्थ और पांडवों के आधार पर खुदाई चल रही है

जब एडविन लुटियन द्वारा 1920s दशक के दौरान ब्रिटिश इंडिया की नई राजधानी के रूप में नई दिल्ली को तैयार किया तब उन्होंने केंद्रीय विस्टा, जिसे अब राजपथ कहा जाता है और पुराना किला को श्रेणी बध्य किया। भारत के विभाजन के वक्त, अगस्त 1947 के दौरान पुराना किला हुमायूँ के मकबरे के सबसे समीप था, जो नए पाकिस्तान से आये मुस्लिमो के लिए शरण शिविरों का स्थल बन गया था।

किले के पीछे की झील

इन सभी व्यक्तियों में 12,000 से अधिक सरकारी कर्मचारी थे जिन्हे पाकिस्तान की सेवा के लिए चुना गया था और 150,000 – 200,000 के बीच मुस्लिम शरणार्थियों थे, जो सितंबर 1947 तक पुराने किले में ही रहे जब भारत सरकार ने दो शिविरो का प्रबंध लिया था। पुराना किला कैंप सन 1948 की शुरुआत तक कार्यात्मक रूप से चलता रहा।

किले को संरक्षण की जरूरत है

किले के सँग्रहालय में उत्खनन से प्राप्त प्रागऐतिहासिक मृदभांड के अतिरिक्त तत्कालीन आभूषण और खुदाई स्थल के छायाचित्र व मानचित्र भी देखे जा सकते हैं। ये मृदभांड महाभारतकालीन बताये जा रहे हैं। यह तो तय है कि खुदाई को सही दिशा में ले जाने पर कई नये रहस्य खुलेंगे मगर किले को संरक्षित करने के लिए अधिक सख्ती और जागरुकता की जरूरत है जिससे लोग इसे गम्भीरता से लें।

आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रणेता थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

राजेन्द्र परदेसी

हिन्दी के गद्य एवं पद्य दोनों को ही नया स्वरुप, नयी ऊर्जा और नये आस्वाद से सुसम्पन्न करने वाले युगावतार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य साधक ने जो अनन्यतम साहित्यिक अवदान किया है वह हिन्दी के साहित्येतिहास में स्वर्ण अध्याय के रूप में व्यक्त हुआ है। इसकी आभा कभी भी मंद नहीं होगी और हिन्दी के सृजेताओं का युगों-युगों तक मार्ग दर्शन करती रहेगी। आचार्य द्विवेदी जैसे युग प्रवर्तक साहित्य सेवी एवं सम्पादक युगों बाद जन्मते हैं।

भारतेन्दु युग के बाद सन् १९०० के आसपास साहित्यिक सुधारों के कारण द्विवेदी युग का आरम्भ हुआ जो साहित्य के क्षेत्र में खडी बोली को काव्योपयुक्त भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किया साथ ही द्विवेदी युग की मान्यता प्रदान किया। साथ ही भारतेन्दु युग की भाषायी कमियों को सुधारते हुए उसे व्याकरण सम्मत बनाने का प्रयास किया गया। जन की रूचि एवं आकांक्षाओं के अनुरूप साहित्य को अनुशासित ढांचे में ढालने के उद्देश्य से समकालीन रचनाकारों के दिशा निर्देशक आचार्य के रूप मे पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्य जगत में आगमन हुआ, जिन्होंने साहित्य के भाशा को संस्कारबद्ध बनाने के संल्प को पूरा करने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और इन्हीं के नाम पर साहित्य का यह युग ‘द्विवेदी युग’ के नाम पुकारा जाने लगा।
आधुनिक काल के आरम्भिक दो उप विभाग हिन्दी जगत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहे। भारतेन्दु युग रीतिकालीन परम्पराओं से साहित्य को अलग किया तो द्विवेदी युग भाषा और साहित्य में नया सुधार लाया और खडी बोली को साहित्य की भाषा का दर्जा दिया। ये उपलब्धियाँ दो साहित्यकारों की सक्रियता से ही संभव हो सकी। भारतेन्दु हरिशचन्द्र और पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, वास्तव में ये व्यक्त नहीं एक युग थे। इसीलिए इन दो साहित्यकारों के नाम पर ही साहित्य युग का नामकरण किया गया।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म १५ मई १८६४ को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद के दौलतपुर ग्राम में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा गांव के पाठशाला में ही हुई। उसके पश्चात अंग्रेजी पढने के लिए रायबरेली शहर के विद्यालय में प्रवेश लिया। यहाँ की पढाई करने के बाद पिता के पास मुम्बई चले गये। जहाँ पर संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त किया। पढाई समाप्त कर वह रेलवे में नौकरी करने लगे। किन्तु उच्चाधिकारियों से अनबन होने के कारण रेलवे की नौकरी छोडकर साहित्य सेवा में लग गये। सन् १९०३ में साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक बने जहाँ सन १९२० तक बडी निष्ठा और लगन से हिन्दी भाषा और साहित्य के उत्थान में संलग* रहे। उन्होंने अपने रचनाकाल में दो महत्वपूर्ण कार्य किये। एक ओर सरस्वती के सम्पादक के रूप में भाषा के परिष्कार और स्वरूप निर्धारण का काम किया तो दूसरी ओर हिन्दी के लेखकों एवं कवियों की एक सशक्त पीढी तैयार किया। काव्य-मंजूषा, कविता-कलाप, सुमन, काव्यकुन्ज, अबला विलाप, गंगालहरी ऋतुतरंगिणी, कुमारसम्भव सार (काव्य) आलोचनांजलि, प्राचीन पंडित और कवि नाट्यशास्त्र, साहित्य संदर्भ, हिन्दी भाषा की उन्नति (निबंध) विनय-विनोद, भामिनी-विलाप (अनुवाद) इत्यादि इनकी प्रमुख
रचनाएं हैं।
आधुनिक हिन्दी साहित्य में नवीन भावनाओं और अवधारणाओं के अभ्युत्थान का श्रेय एक ओर भारतेन्दु को मिला तो उन नवीन भावनाओं के परिष्कार एवं शोधन का श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को। गद्य यो या पद्य सब पर द्विवेदी जी ने अपना प्रभाव डाला। उनके प्रयासों से साहित्य जगत को उच्च कोटि के अनेक साहित्यकार मिले। उन्होंने अपनी लेखनी से पूरे युग के साहित्यकारों का नियमन किया। उनके सद्प्रयासों से खडी बोली हिन्दी न केवल अस्तित्व में आयी, अपितु उसका पर्याप्त सम्बर्द्धन भी हुआ, भावों के परिष्कार के साथ-साथ भाषा को व्याकरण सम्मन संस्कार मिला। भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों की साहित्य सर्जना के मनमाने पन पर अंकुश लगा। आचार्य महावीर प्रसाद ने मनमाने पर पर अंकुश लगाया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ही देन है कि हिन्दी आज जगह बना
पायी है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी मूलतः निबंधकार थे। उन्होंने निबंधकला को पत्रकारिता से जोडकर उसके प्रसार में काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने करीब ढाई सौ निबंध लिखा, बेंटेन को आदर्श मानकर उनके निबंधों का अनुवाद भी किया। उसके बहुसंख्यक निबंध परिचयात्मक और आलोचनात्मक टिप्पणियों के रूप में दिखायी देते हैं, वस्तुः उनके निबंधों कें आत्मव्यंजना कम मिलती है। आक्रोश और क्षोभ की स्थिति में कहीं-कहीं उन्होंने अनुचित कार्यों का जब विरोध किया है वहाँ व्यंग्य रूप में उनकी आन्तरिक भावना अवश्य उजागर हुई है। जिसमें न्यायनिष्ठ आत्मा की झलक मिलती है, म्युनिसिपैलिटी के कारनामें, निबंध में व्यंग्य शैली देखने योग्य है, आत्मनिवेदन, प्रभात, सुतापराधे, जनकस्य दण्ड आदि निबंधों में व्यक्तित्व-व्यंजना के तत्व देखे जा सकते हैं।
‘सरस्वती’ के माध्यम से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने परिचयात्मक आलोचना का सूत्रपात किया। समालोचना को वे पत्रकारिता से जोडकर ही देखते थे। इसमें भी उन्होंने कुछ आदर्श और सिद्धान्त निर्धारित किया। समालोचक के कर्त्तव्य पर टिप्पणी करते उन्होंने लिखा है – किसी पुस् क या प्रबंध में क्या लिखा गया है, किस ढंग से लिखा गया है, वह विषय उपयोगी है या नहीं, उससे किसी का मनोरंजन हो सकता है या नहीं, उससे किसी को भी लाभ पहुँच सकता है या नहीं। लेखक ने कोई नई बात लिखी है या नहीं यही विचारणीय विषय है। समालोचक को प्रधानतः इन्हीं बातों पर विचार करना चाहिए।
द्विवेदी जी ने विषय विवेचना के साथ-साथ भाषा संबंधी त्रुटियों की ओर भी विशेष ध्यान दिया। वे सिद्धान्तों से समझौता करना जानते ही नहीं थे। भाषा और साहितय में स्वयं अनुशासित थे और अन्य को भी अनुशासित देखना चाहते थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उनके महत्व को स्वीकार करते हुए लिखा है – यदि द्विवेदी जी न उठ खडे होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखायी पडती थी, उसकी परम्वपरा जल्दी न रूकती निर्णयात्मक आलोचना की शुरूआत आचार्य द्विवेदी ने ही की। कालिदास की आलोचना नैषधचरितचर्चा और विक्रमांक देव चरित चर्चा जैसी आलोचनाएं लिखी। अपने काव्य सिद्धांत प्रतिपादक कुछ निबंधों में कई अंग्रेज लेखकों को भी आधार बनाया। इसका प्रभाव यह हुआ कि इस क्षेत्र में ऐसी पृष्ठ भूमि तैयार हुई, जिस पर आगे चलकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा बाबू श्याम सुंदर दास ने हिन्दी की वैज्ञानिक आलोचना की भव्य इमारत को
खडा किया और आलोचना एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकृत हुई।
गद्य साहित्य की अन्य विधाओं में भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का रचनात्मक व्यक्तित्व उजागर हुआ है भारतेन्दु हरिशचन्द्र की भाँति ही आचार्य द्विवेदी ने भी जीवनी साहित्य में रूचि दिखायी और समकालीन रचनाकारों का मार्गदर्शन किया। उनके द्वारा रचित जीवनियाँ, प्राचीन पंडित और कवि (१९१८) सुकवि संर्कीतन (१९२४),
चरित चर्चा (१९२९) आदि ग्रंथों में प्रकाशित है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से संस्मरण साहित्य भी आचार्य द्विवेदी के द्वारा अस्तित्व में आया। ‘सरस्वती’ में समय-समय पर रोचक संस्मरण प्रकाशित हुए। उन्होंने अनुमोदन का अंत (फरवरी १९०५), सभा की सभ्यता (अप्रेल १९०७), विज्ञानाचार्य बसु का विज्ञान मंदिर (जनवरी १९१८) की रचना करके संस्मरण साहित्य को समृद्ध किया।
शिक्षा के क्षेत्र में भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के रचनात्मक व्यक्तित्व का निखार हुआ है, उनके द्वारा शिक्षा पर आधारित शिक्षा (१९१६) एक महत्वपूर्ण गं*थ है। भाषा, व्याकरण और लिपि संबंधी विचार-विमर्श की शुरुआत भी इस युग में हुई। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और बालमुकुन्द गुप्त जैसे साहित्यकारों ने इन विषयों पर विद्वतापूर्ण लेखों की रचना की है।
वस्तुतः महावीर प्रसाद द्विवेदी आलोचक, निबंधकार, अनुवादक तथा पत्र-सम्पादक थे, किन्तु काव्य-रचना में भी इनका कोशल दिखायी देता है। वैसे कविता के क्षेत्र में इनकी रूचि नहीं थी। गद्य लेखन में ही आचार्य द्विवेदी को विशेष सफलता मिली। कविता में तत्सम प्रधान समस्त भाषा तथा प्रचलित शब्दावली युक्त सरल भाषा का समिश्रण मिलता है दृष्टव्य है –
पृथ्वी-समुद्र सरित नर-नाग सृष्टि
मांगल्य-मूल-मय वारिद-वारि दृष्टि
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन काल में ‘सरस्वती’ के माध्यम से साहित्य का सृजन, समाज-सुधार, स्वतंत्रता चरित्र निर्माण तथा व्यापक राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किया गया, इसलिए द्विवेदी युग में कलात्मक निखार कम, किन्तु साहित्य का स्वर गंभीर और दायित्व बोध से अधिक अनुप्राणित रहा7 साहित्य को सभ्य और शिष्ट समाज में सही जगह मिली। भाषा और साहित्य को जो गौरव इस युग में प्राप्त हुआ उसका सारा श्रेय आचार्य द्विवेदी को ही है। प्रखर प्रतिभा के बल पर अपनी साहित्य साधना से हिन्दी भाषा और साहित्य को मौलिक स्वरूप प्रदान करने में उनकी भूमिका अवसिमरणीय है। एक युगान्तकारी व्यक्तित्व के रूप में उनकी छवि स्मरणीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। २१ दिसम्बर १९३८ को हिन्दी का इतना बडा साहित्य सेवी देश दुनिया को अलविदा करकर पंचतत्व में विलीन हो गया।
(साभार – राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)

स्वाभिमान और वीरता के प्रतीक महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप मेवाड़ के शासक और एक वीर योद्धा थे जिन्होंने कभी अकबर की अधीनता स्वीकार नही की। उनका जन्म सिसोदिया कुल में हुआ था। महाराणा प्रताप जीवनपर्यन्त मुगलों से लड़ते रहे और कभी हार नही मानी। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुम्भलगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह द्वितीय और माता का नाम रानी जीवंत कंवर [जयवंता बाई] था। महाराणा प्रताप अपने पच्चीस भाइयो में सबसे बड़े थे इसलिए उनको मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाया गया। वो सिसोदिया राजवंश के 54वें शासक कहलाते हैं।

महाराणा प्रताप को बचपन में ही ढाल तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा क्योंकि उनके पिता उन्हें अपनी तरह कुशल योद्धा बनाना चाहते थे। बालक प्रताप ने कम उम्र में ही अपने अदम्य साहस का परिचय दे दिया था। धीरे धीरे समय बीतता गया। दिन महीनों में और महीने सालों में परिवर्तित होते गये। इसी बीच प्रताप अस्त्र शस्त्र चलाने में निपुण हो गये।
महाराणा प्रताप के काल में दिल्ली पर अकबर का शासन था और अकबर की निति हिन्दू राजाओं की शक्ति का उपयोग कर दूसरे हिन्दू राजा को अपने नियन्त्रण में लेना था। 1567 में जब राजकुमार प्रताप को उत्तराधिकारी बनाया गया उस वक्त उनकी उम्र केवल 27 वर्ष थी और मुगल सेनाओं ने चित्तोड़गढ़ को चारों ओर से घेर लिया था। उस वक्त महाराणा उदय सिंह मुगलों से भिड़ने की बजाय चित्तोड़गढ़ छोड़कर परिवार सहित गोगुन्दा चले गये। वयस्क प्रताप सिंह फिर से चित्तोड़गढ़ जाकर मुगलों से सामना करना चाहते थे लेकिन उनके परिवार ने चित्तोड़गढ़ जाने से मना कर दिया।
गोगुन्दा में रहते हुए महाराणा उदय सिंह और उसके विश्वासपात्रों ने मेवाड़ की अस्थायी सरकार बना ली थी। 1572 में महाराणा उदय सिंह अपने पुत्र प्रताप को महाराणा का खि़ताब देकर मृत्यु को प्राप्त हो गये। वैसे महाराणा उदय सिंह अपने अंतिम समय में अपनी प्रिय पत्नी रानी भटियानी के प्रभाव में आकर उनके पुत्र जगमाल को राजगद्दी पर बिठाना चाहते थे। महाराणा उदय सिंह के मृत्यु के बाद जब उनके शव को श्मशान तक ले जाया जा रहा था तब प्रताप भी उस शवयात्रा में शामिल हुए थे जबकि परम्परा के अनुसार राजतिलक के वक्त राजकुमार प्रताप को पिता के शव के साथ जाने की अनुमति नहीं होती थी बल्कि राजतिलक की तैयारी में लगना पड़ता था। प्रताप ने राजपरिवार की इस परिपाटी को तोड़ा था और इसके बाद ये परम्परा कभी नहीं निभायी गयी।
प्रताप ने अपने पिता की अंतिम इच्छा के अनुसार उसके सौतेले भाई जगमाल को राजा बनाने का निश्चय किया लेकिन मेवाड़ के विश्वासपात्र चुंडावत राजपूतों ने जगमाल के सिंहासन पर बैठने को विनाशकारी मानते हुए जगमाल को राजगद्दी छोड़ने को बाध्य किया। जगमाल सिंहासन को छोड़ने का इच्छुक नहीं था लेकिन बदला लेने के लिए अजमेर जाकर अकबर की सेना में शामिल हो गया और उसके बदले उसको जहाजपुर की जागीर मिल गयी। इस दौरान राजकुमार प्रताप को मेवाड़ के 54वें शासक के साथ महाराणा का खि़ताब मिला।
1572 में प्रताप सिंह मेवाड़ के महाराणा बन गये थे लेकिन वो पिछले पांच सालों से चित्तोड़गढ़ कभी नहीं गये थे। उनका जन्म स्थान और चित्तोड़गढ़ का किला महाराणा प्रताप को पुकार रहा था। महाराणा प्रताप को अपने पिता के चित्तोड़गढ़ को पुन: देख बिना मौत हो जाने का बहुत अफ़सोस था। अकबर ने चित्तोड़गढ़ पर तो कब्जा कर लिया था लेकिन मेवाड़ का राज अभी भी उससे दूर था। अकबर ने कई बार अपने हिंदुस्तान के जहापनाह बनने की चाह में कई दूतों को महाराणा प्रताप से संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए भेजा लेकिन हर बार राणा प्रताप ने शांति संधि करने की बात कही लेकिन मेवाड़ की प्रभुता उनके पास ही रहेगी। 1573 में संधि प्रस्तावों को ठुकराने के बाद अकबर ने मेवाड़ का बाहरी राज्यों से सम्पर्क तोड़ दिया और मेवाड़ के सहयोगी दलों को अलग थलग कर दिया जिसमें से कुछ महाराणा प्रताप के मित्र और रिश्तेदार थे। अकबर ने चित्तोड़गढ़ के सभी लोगों को प्रताप की सहायता करने से मना कर दिया।
महाराणा प्रताप ने मुगलों से सामना करने के लिए अपनी सेना को सचेत कर दिया। प्रताप ने अपनी सेना को मेवाड़ की राजधानी कुम्भलगढ़ भेज दिया। उसने अपने सैनिकों को अरावली की पहाड़ियों में चले जाने की आज्ञा दी और दुश्मन के लिए पीछे कोई सेना नही छोड़ी। महाराणा युद्ध उस पहाड़ी इलाके में लडऩा चाहते थे जिसके बारे में मेवाड़ सेना आदि थी लेकिन मुगल सेना को बिलकुल भी अनुभव नहीं था। अपने राजा की बात मानते हुए उनकी सारी सेना पहाड़ियों की ओर कूच कर गयी। अरावली पहाड़ियों पर रहने वाले भील भी राणा प्रताप की सेना के साथ हो गये। महाराणा प्रताप खुद जंगलों में रहे ताकि वो जान सकें कि स्वंत्रतता और अधिकारों को पाने के लिए कितना दर्द सहना पड़ता है। उन्होंने पत्तल में भोजन किया, जमीन पर सोये और दाढ़ी नहीं बनाई। दरिद्रता के दौर में वो  कच्ची झोपड़ियों में रहते थे जो मटि्टी और बांस की बनी होती थीं।
शांति प्रयत्नों की विफलता के कारण 18 जून 1576 को महाराण प्रताप के 20000 और मुगल सेना के 80000 सैनिकों के बीच हल्दीघाटी का युद्ध शुरू हो गया। उस समय मुगल सेना की कमान अकबर के सेनापति मान सिंह ने संभाली थी। महाराणा प्रताप की सेना मुगलों की सेना को खदेड़ रही थी। महाराणा प्रताप की सेना में झालामान, डोडिया भील, रामदास राठोड़ और हाकिम खां सूर जैसे शूरवीर थे। मुगल सेना के पास कई तोंपे और विशाल सेना थी लेकिन प्रताप की सेना के पास केवल हिम्मत और साहसी जांबाजों की सेना के अलावा कुछ भी नहीं था। महाराणा प्रताप की सेना तो पराजित नहीं हुयी लेकिन महाराणा प्रताप स्वयं मुगल सैनिकों से घिर गये थे। महाराणा प्रताप के बारे में कहा जाता है कि उनके भाले का वजन 80 किलो और कवच का वजन 72 किलो हुआ करता था और इस तरह उनके भाले, कवच, ढाल और तलवारों को मिलाकर कुल 200 किलो का वजन साथ लेकर युद्ध करते थे। ऐसा कहा जाता है इस वक्त राणा प्रताप के हमशक्ल भाई शक्ति सिंह ने प्रताप की मदद की। एक दूसरी दुर्घटना में महाराणा प्रताप का प्रिय और वफादार घोड़ा चेतक प्रताप की जान बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया।
इतिहासकार कर्नल टॉड ने हल्दी घाटी के युद्ध को मेवाड़ की ‘‘थर्मोपल्ली‘‘ की संज्ञा दी है। इस युद्ध में महाराणा प्रताप का स्वामी भक्त एवं प्रिय घोड़ा चेतक मारा गया। हल्दी घाटी के युद्ध में पराजय के बावजूद महाराणा प्रताप के यश और कीर्ति में कोई कमी नहीं आई। बल्कि हल्दी घाटी को इस युद्ध ने समूचे भारत के स्वाधीनता प्रेमियों के लिए पूजनीय क्षेत्र बना दिया। वहीं इस युद्ध ने महाराणा प्रताप को जननायक के रूप में सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रसिद्ध कर दिया। हल्दी घाटी के युद्ध में पराजय के बाद राणा प्रताप के जीवन में जिस संकट काल का प्रारंभ हुआ वह लगभग दस वर्ष (1576-1586) तक चला और बीतते समय के साथ वह अधिक विषम होता चला गया। इस दौरान गोगुन्दा से दक्षिण में स्थित राजा गांव में राणा के परिवार को घास की रोटी भी नसीब नहीं हुई और एक बार वन विलाव उनके भूख से बिलखते बच्चों के हाथ से घास की रोटी भी छीन कर ले गया था।
सम्पूर्ण मेवाड़ प्रान्त पर अपना आधिपत्य जमाने और प्रताप को पकड़ने के उद्देश्य से अकबर ने अक्टूबर 1576 को पुन: मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी, परन्तु वह प्रताप को पकड़ने में सफल नहीं हो सका। अकबर ने 15 अक्टूबर 1577 को अपने शिपहसालार शाहबाज खां को कुम्भलमेर के गढ़ को फतेह करने के लिए भेजा। उसने जून 1578 में किला तो फतेह कर लिया, किन्तु वह भी महाराणा प्रताप को नहीं पकड़ सका।
इस संकट के समय में महाराणा प्रताप के मंत्री भामाशाह और उनके भाई ताराचंद ने मुल्क मालवे से दण्ड के 25 लाख रूपए तथा 20 हजार स्वर्ण मुद्राएं उनको भेंट कर अपनी स्वामी भक्ति का परिचय दिया। इस धन से उन्होंने पुन: सेना जुटाकर ‘‘दिवेर” को जीत लिया और ‘‘चांवड‘‘ पंहुचकर अपना सुरिक्षत मुकाम बनाया। मेवाड़ के बचे भाग पर फिर से महाराणा का ध्वज लहराने लगा। बांसवाडा और डूंगरपुर के शासकों को भी पराजित कर प्रताप ने अपने अधीन कर लिया। यह समाचार पाकर अकबर तिलमिला उठा और उसने पुन: शाहबाज खां को 15 दिसंबर 1578 को महाराणा को कुचलने के लिए शाही लवाजमें के साथ यह आदेश देते हुए भेजा कि यदि तुम प्रताप का दमन किए बिना वापिस लौटे, तो तुम्हारे सिर कलम कर दिए जाएंगे। शाही लवाजमें और कठोर आदेश के बावजूद शाहबाज खां प्रताप को नहीं पकड़ सका। तीसरी बार बादशाह ने 9 नवम्बर 1579 को शाहबाज खां को प्रताप को पकड़ने के लिए मेवाड़ भेजा, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली।
1580 में बादशाह अकबर ने अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया और उसे मेवाड़ विजय का अभियान सौंपा। अब्दुर्रहीम ने अपने परिवार को शेरगढ़ में छोड़कर राणा पर चढ़ाई कर दी। कुंवर अमरसिंह ने खानखाना का ध्यान बढ़ाने के लिए शेरगढ़ के पास आक्रमण किया और खानखाना की बेगमों सहित उसके परिवार को बंदी बना लिया। जब महाराणा प्रताप को इस बात का पता चला, तो उन्हें बहुत आत्मग्लानि हुई और उन्होंने कुंवर को खानखाना के परिवार को ससम्मान पंहुचाने की आज्ञा दी। इससे प्रमाणित होता है कि प्रताप अपने शत्रु की स्त्रियों को भी कितना सम्मान देते थे। अकबर ने प्रताप को समाप्त कर उसके साम्राज्य पर आधिपत्य करने के उद्देश्य से विभिन्न सेनापतियों को समय-समय पर मेवाड भेजा, किन्तु 12 वर्ष तक उसे इस उद्देश्य में सफलता नहीं मिली।
अकबर के आक्रमक अभियानों की समाप्ति के बाद मेवाड़ में नए युग का सूत्रपात हुआ। महाराणा प्रताप ने एक वर्ष में ही चितौडग़ढ़ और जहाजपुर को छोड़कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर सत्ता कायम कर ली। उन्होंने चांवड को अपनी राजधानी बनाकर सारे राज्य में शांति व्यवस्था कायम की, जिससे खेत फिर से लहलहाने लगे, उद्योग-व्यवसायों में प्रगति हुई और उजड़े नगर-कस्बे पुन: आबाद हुए और मेवाड़ फिर से चमन बन गया।
महाराणा प्रताप कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ पीड़ितों और विद्वानों का आदर भी करते थे। उनकी प्रेरणा से ही मथुरा के चक्रपाणी मिश्र ने‘‘ विश्व वल्लभ‘‘ नामक स्थापत्य तथा ”मुहूर्त माला” नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की। चांवड में चावंड माता के मंदिर का निर्माण भी राणा प्रताप ने ही करवाया था। उनके दरबार में कई विख्यात चारण कवि भी थे, जिनमें कविवर माला सांदू और दुरासा आढा ने उनकी प्रशंसा में उच्च कोटि की काव्य रचना की। सादडी में जैन साधू हेमरत्न सूरि ने ”गोरा बादल-पद्मिनी चौपाई” की रचना भी प्रताप के समय ही की थी। महाराणा प्रताप ने चावंड को चित्रकला का केन्द्र बनाकर नई चित्र शैली ”मेवाड शैली” का प्रारम्भ करवाया।
महाराणा प्रताप की 11 रानियां, 17 पुत्र और 5 पुत्रिया थीं। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने पहले पुत्र अमर सिंह को सिंहासन पर बिठाया। महाराणा प्रताप कभी चित्तोड़गढ़ वापस नहीं जा सके लेकिन वो उसे पाने के लिए जीवनपर्यन्त प्रयास करते रहे। जनवरी 1597 को मेवाड़ के महान नायक महाराणा प्रताप शिकार के दौरान बुरी तरह घायल हो गये और उनकी 56 वर्ष की आयु में मौत हो गयी। उन्होंने मृत्यु से पहले अमर सिंह को मुगलों के सामने कभी समर्पण ना करने का वचन लिया और चित्तोड़गढ़ पर फिर विजय प्राप्त करने को कहा। ऐसा कहा जाता है कि प्रताप की मौत पर अकबर खूब रोया था कि एक बहादुर वीर इस दुनिया से अलविदा हो गया। उनके शव को 29 जनवरी 1597 को चावंड लाया गया। इस तरह महाराणा प्रताप इतिहास के पन्नों में अपनी बहादुरी और जनप्रियता के लिए अमर हो गये। महाराणा प्रताप अपनी मृत्यु तक घास के बिछौने पर सोते थे, क्योंकि चितौड़गढ़ को मुक्त करने की उनकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई थी।

केंद्र ने स्वच्छ भारत इंटर्नशिप शुरू की

नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा युवाओं का स्वच्छ भारत पहल में इंटर्न के तौर पर जुड़ने का आह्वान करने के एक दिन बाद सरकार ने स्वच्छ भारत ग्रीष्मकालीन इंटर्नशिप शुरू की। एक बयान में कहा गया है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय और युवा एवं खेल मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय की अपने तरह की इस पहली पहल के तहत तीन महीने की अवधि की यह इंटर्नशिप कल ( एक मई ) से शुरू होगी और इसका समापन 31 जुलाई को होगा।

पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के बयान के अनुसार , ‘‘ कार्यक्रम का उद्देश्य पूरे देश में लाखों युवाओं को इसके लिए प्रोत्साहित करना है कि वे स्वच्छ भारत अभियान में सच्चे जन आंदोलन की भावना के तहत योगदान करें। प्रधानमंत्री ने अपनी ‘ मन की बात ’ कार्यक्रम में युवाओं का आह्वान किया था कि वे इंटर्नशिप का लाभ उठायें और आंदोलन को आगे ले जाएं। ’’

कालेज और विश्वविद्यालय के छात्र तथा नेहरू युवा केंद्र संगठन से जुड़े छात्र डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू . एसबीएसआई . माईजीओवी . इन पर लागइन करके इंटर्नशिप के लिए पंजीकरण करा सकते हैं।

बयान में कहा गया है कि सभी इंटर्न को गांवों में कम से कम 100 घंटे की सफाई संबंधी कार्य पूरा करने पर स्वच्छ भारत प्रमाणपत्र दिये जाएंगे। इसके लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि 15 मई है।

इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक की सभी 650 शाखायें शुरू

भोपाल : केन्द्रीय संचार मंत्री मनोज सिन्हा ने आज कहा कि अगले महीने से इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) की सभी 650 शाखायें काम करना शुरू कर देंगी। सिन्हा ने बताया, ‘‘आईपीपीबी चालू करने के लिए सभी तकनीकी काम लगभग पूरे हो चुके हैं। इसे चालू करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक कि आईपीपीबी की सभी 650 शाखायें मई से काम करना शुरू कर देंगी। इससे देश भर में फैले 50 लाख से अधिक डाकघर आईपीबीबी के ग्राहक केंद्र (एक्सेस पॉइंट) के तौर पर काम करने लगेंगे। यह सरकार के सुदूर क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन और सीधे नकद लाभ हस्तांतरण को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।’’ जबलपुर में डाक विभाग का एक नया क्षेत्रीय कार्यालय खोला जाएगा। सिन्हा ने कहा कि गत वर्ष के दौरान विभाग द्वारा सराहनीय कार्य किया गया है। देश के 1.29 लाख शाखा डाकघरों में से 62,000 से अधिक दर्पण (डिजिटिलाइजेशन ऑफ रूरल पोस्‍ट ऑफिसेस फॉर न्‍यू इंडिया) परियोजना के तहत जोड़े जा चुके हैं। इस परियोजना के माध्‍यम से ग्रामीण क्षेत्रों में हाथ में रखे जाने वाले उपकरण (हैंडहेल्ड डिवाइस) के माध्‍यम से ग्राहकों को नवीन तकनीकी पर आधरित सेवाएं मिल रही हैं, जिनमें बैकिंग लेन-देन, बिल, बीमा प्रीमियम संग्रहण, रजिस्‍ट्री, पार्सल आदि का बुकिंग एवं वितरण शामिल है। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा पूरे देश में 995 एटीएम लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि गत वर्ष विभाग द्वारा कुछ लोकोन्‍मुखी सेवाएं शुरू की गई हैं। उन्होंने विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि डाक विभाग ने विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर डाकघर पासपोर्ट सेवा शुरू की है। अभी तक 187 डाकघरों में पासपोर्ट सेवा केन्‍द्र स्थापित किए जा चुके हैं। शीघ्र ही और पासपोर्ट सेवा केंद्र इसी कड़ी में जुड़ने जा रहे है। उन्होंने कहा कि डाक विभाग द्वारा 13,000 से अधिक डाकघरों में आधार पंजीकरण एवं आधार नवीनीकरण का कार्य भी शुरू किया गया है। इससे आम जनता, खासतौर से समाज के गरीब एवं पिछड़ा तबके को विशेष रूप से लाभ होगा।

भारत की धरोहर : द्रोपदी और बुद्ध की नगरी काम्पिल्य

अभय प्रकाश जैन

काम्पिल्य एक पौराणिक नगर है जो महाभारत के समय पांचाल जनपद की राजधानी थी जिसके राजा द्रुपद थे। इसके नाम का सर्वप्रथम उल्लेख यजुर्वेदकी तैत्तरीय संहिता में ‘कंपिला’ रूप में मिलता है। बहुत संभव है, पुराणों में वर्णित पंचाल नरेश भृम्यश्व के पुत्र कपिल या कांपिल्य के नाम पर ही इस नगरी का नामकरण हुआ हो। महाभारत काल से पहले पंचाल जनपद गंगा के दोनों ओर विस्तृत था। उत्तर-पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिण पंचाल की कांपिल्य थी। दक्षिण पंचाल के सर्वप्रथम राजा अजमीढ़ का पुराणों में उल्लेख है। इसी वंश में प्रसिद्ध राजा नीप और ब्रह्मदत्त हुए थे। महाभारत के समय द्रोणाचार्य ने पंचाल नरेश द्रुपद को पराजित कर उससे उत्तर-पंचाल का प्रदेश छीन लिया था। इस प्रसंग के वर्णन में महाभारत में कांपिल्य को दक्षिण पंचाल की राजधानी बताया गया है। उस समय दक्षिण पंचाल का विस्तार गंगा के दक्षिण तट से चंबल नदी तक था। ब्रह्मदत्त जातक में भी दक्षिण पंचाल का नाम कंपिलरट्ठ या कांपिल्य राष्ट्र है। बौद्ध साहित्य में कांपिल्य का बुद्ध के जीवनचरित के संबंध में वर्णन मिलता है। किंवदंति के अनुसार इसी स्थान पर बुद्ध ने कुछ आश्चर्यजनक कार्य किए थे, जैसे स्वर्ग में जाकर अपनी माता को उपदेश देने के पश्चात् वह इसी स्थान पर उतरे थे। चीनी यात्री युवान च्वांग ने भी सातवीं सदी ई. में इस नगर को अपनी यात्रा के प्रसंग में देखा था।

वर्तमान कंपिला में एक अति प्राचीन ढूह आज भी राजा द्रुपद का कोट कहलाता है एवं बूढ़ी गंगा के तट पर द्रौपदीकुंड है जिससे, महाभारत की कथा के अनुसार, द्रौपदी और धृष्टद्युम्न का जन्म हुआ था। कुंड से बड़े परिमाण की, संभवत: मौर्यकालीन, ईंटें निकली हैं। कंपिला के मंदिरों से अनेक प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। कंपिला बौद्धधर्म के समान जैनधर्म का भी कुछ दिनों तक केंद्र रह चुकी है, जैसा यहाँ से प्राप्त तीर्थंकरों की अनेक प्रतिमाओं तथा जैन अभिलेखों से सूचित होता है। कांपिल्य के ‘कंपिलनगर’, ‘कंपिल्लनगर’ और ‘कंपिला’ नाम साहित्य में उपलब्ध हैं। इसका अपभ्रंश रूप कांपिल भी मिलता है। कांपिल्य नगरी प्राचीन काल में काशी, उज्जयिनी आदि की भाँति ही प्रसिद्ध थी और प्राचीन साहित्य में इसे अनेक कथाओं की घटनास्थली बनाया गया है, जैसे महाभारत, शांतिपर्व (१३९, २) में राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़िया की कथा को कांपिल्य में ही घटित कहा गया है।

पत्रकार अनुभूति विश्नोई के ट्विटर वॉल से साभार…

प्राचीन किंवदंती के अनुसार प्रसिद्ध भारतीय ज्योतिषाचार्य बराहमिहिर का जन्म कांपिल्य में ही हुआ था। पांचाल प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध रहा है। यह इन्द्रप्रस्थ से तीस योजन दूरी पर कुरुक्षेत्र से पश्चिम और उत्तर में अवस्थित था। पांचाल जनपद तीन भागों में विभक्त था

(१) पूर्व पांचाल,

(२) उत्तर पांचाल, और

(३) दक्षिण पांचाल।

महाभारत के अनुसार दक्षिण और उत्तर पांचाल के बीच गंगा नदी की सीमा थी। वर्तमान एटा और फरुखाबाद जिले दक्षिण पांचाल में थे। वर्णनों से ज्ञात होता है कि उत्तर पांचाल के पूर्व और अपर दो भाग थे। दोनों को रामगंगा विभक्त करती थी। अहिक्षत्र उत्तरी पांचाल तथा काम्पिल्य दक्षिणी पांचाल की राजधानी रही है। काम्पिल्य नगर जैन, शैव, बौद्ध ,वैष्णव धर्मों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पांचाल जनपद का भी महत्त्व कम नहीं है। भगवान ऋषभदेव से लेकर अनेकानेक तीर्थंकरों का बिहार यहाँ हुआ।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के आदिपर्व में लिखा है कि पांचाल की राजधानी काम्पिल्य थी, जहाँ महाराज द्रुपद की पुत्री द्रोपदी का इतिहास प्रसिद्ध स्वयंबर हुआ था। धारावाहिक ‘‘महाभारत’’ प्रत्येक रविवार को सभी दूरदर्शन पर देख चुके हैं तथा काम्पिल्य का नाम भी सुन चुके हैं। काम्पिल्य के इतिहास, शौर्य और पुरातात्विक सामग्री और साहित्य पर दृष्टिपात करते हुये विवेचन करना यहाँ लेखक का अभिप्रेत है। उत्तरप्रदेश के जनपद फरुखाबाद की तहसील कायमगंज से १० कि.मी.दूर गंगा नदी के तट पर काम्पिल्य नगरी बसी है। कम्पिल या काम्पिल्यापुरी, भारत के अतिप्राचीन सोलह नगरों में से एक थी। वेदों में भी इसका वर्णन है।

माध्यान्दिन संहिता [३] में काम्पिल्य शब्द अम्बा, अम्बालिका के साथ आया है

अम्बे आम्बिके अम्बालिके न मानयति कश्वन।
स सत्यश्यक: सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्।।

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पांचाल का प्राचीन नाम क्रिवि था तथा परिचक्रा एवं कम्पील रुप में भी वर्णन मिलाता है।  पांचाल राजाओं में वैत्य, दुर्मुख, शोभ और प्रवाहण जैवालिका का नाम मिलता है।काम्पिल्य का नाम तैत्तरीय: संहिता (७ /४/१९११), मैत्रायिणी संहिता (३/१०/२०) काठक संहिता आश्व मिधिक (४/८),माध्यान्दिन संहिता (३३/१८), तैत्तरीय ब्राहण (३/९/६) शतपथ ब्राह्मण (१३ / २ / ८३) आदि में देखने को मिलता है। उपनिषद् साहित्य में वृहदारण्यक उपनिषद (६/१/१) छांदीग्य उपनिषद् ५/३११) तधा सारसायन श्रोतसूत्र (१२/१३/६) में भी वर्णन मिलता है। महाकवि वाल्मीक ने (स—२३) ब्रह्मदत्त के प्रसंग में काम्पिल्य का वर्णन किया है। महाभारत (अध्याय ९८, पृष्ठ ८१/८२) के पर्व—१२८ में भी वर्णन है। काम्पिल नगरी अति सुन्दर थी तथा गंगा किराने स्थित थी।

माकंदि नाम गंगाया स्तीरे जनपदं युतं।
सोउध्यावसद दीनमना काम्पिल्यच्च पुरोत्तमम्।।

अष्टध्यायी पर वामन जयादित्य ने कशिका वृत्ति लिखी। इस वृत्ति से स्पष्ट है कि काम्पिल्य तथ संकाश्य पास—पास बसे थे या एक ही बड़े शहर में थे। चीनी त्रिपिटक साहित्य में लिखा है कि भगवान बुद्ध ने काम्पिल्य और संकाश्य में विहार किया। तेशोत्रिपिटिक (पृष्ठ २२/७ भाग ४२) में इसका उल्लेख है। इस तथ्य की पुष्टि प्रो—हाजिमेनाकामुरा ने अपने शोध ग्रंथ में की है।[५] संकाश्य बौद्धमत का तीर्थस्थल है। आज भी सैकड़ों तीर्थयात्री देश—विदेश से यहाँ आते हैं। आगरा—फरूखाबाद, ब्रांच रेवले लाईन पर मखना रेल्वे स्टेशन से ८ कि.मी. दूर सराय अगहत गाँव के पास संकाश्य के खंडहर, भग्नावशेष आज भी देखने को मिलते हैं। बुद्ध विहार के प्रमाण एवं साक्ष्यों को देखते हुये भारत एवं उ.प्र. शासन ने काम्पिल्य एवं संकाश्य दोनों ही स्थानों को अपने संरक्षण में ले लिया है।

महासती द्रोपदी का जन्म एवं स्वयंवर यहीं हुआ था, जिसकी याद यहाँ स्थित द्रोपदी—कुण्ड आज भी हमें दिला रहा है। महान् तपस्वी कपिल मुनि का आश्रम भी यहीं था तथा मुनि श्री ने तपस्या भी यहीं की थी। कपिल मुनि आश्रम और उसके प्राचीन भग्नावशेष इसके साक्ष्य है। यहाँ अतिप्राचीन दो जैन मंदिर हैं तथा कुछ जैन मूर्तियों सहित खंडहर भी है द्रोपदी कुण्ड पर हर वर्ष मेला लगता है। श्रीलंका से लाये शिव लिंग की स्थापना शत्रुध्न ने यहाँ की थी, जो वत्र्तमान में रामेश्वरम् मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर दक्षिण शैली का है।

प्राय: सभी पुराणों में पांचाल तथा काम्पिल्य दोनों का ही उल्लेख है। श्रीमद् भागवत् में लिखा है कि राजा भृम्यश्य के पुत्र का नाम काम्पिल्य थ। उसी के नाम पर नगर का नाम काम्पिल्य रखा गया था। कथित काम्पिल्य राजकुमार के पांचालादिक पाँच पुत्र थे जिन्होंने इस प्रदेश को विजय किया तथा उसी के नाम से यह प्रदेश पांचाल कहलाया कर्निंधम का मत है कि क्रिवि, तुरुव, सम केसिन, शृंतयस, और इक्ष्वाकु इन पांच क्षत्रियों के कारण यह देश पांचाल कहलाया।

बौद्ध साहित्य के अनुसंधान से ज्ञात होता है कि भगवान बुद्ध के जन्म से पहले सोलह महा जनपद विद्यमान थे मगध, कौशल, वत्स अवंति, काशी, अंग चेदि, कुरु, पांचाल, मत्स्य शूरसेन, अश्यमक, गान्धार, काम्बोज, वैन्जैन तथा मल्ल। पांचाल दो भागों में विभक्त हो चुका था। उत्तर पांचाल तथा दक्षिण पांचाल उत्तर पांचाल की राजधानी, अहिच्छत्रपुर (जैन तीर्थ) तथा दक्षिण पांचाल की राजधानी, काम्पिल्य थी। वृहज्जातक की महधीर टीका में कम्पिल्ला का सन्निवेश काययित्थिक बताया है। काययित्थिक आज वैथिया नाम के प्रसिद्ध है जो कम्पिला से २०/२१ मील दूर है। वाराणसी उस समय व्यापार का बड़ा केन्द्र था। कम्बोज, काम्पिल्य, कौशल, कुरुक्षेत्र कुरु कुशीनारा, कौशम्बी, मिथिला पांचाल, सिन्ध, उज्जैन, विदेह, आदि के साथ बनारस का व्यापारिक सम्बन्ध था।

जैन साहित्य में काम्पिल्य का वर्णन बड़ा मनोहारी एवं प्राचीन है। जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर श्री विमलनाथ स्वामी के चार कल्याण गर्भ, जन्म, तप एवं ज्ञान काम्पिल्य में ही हुये।

विमलनाथ पुराण में इसका नाम कम्पिला लिखा है

तंत्रैय कंम्पिला नाम्ना विद्यते परमापुरी।
दोषमुक्ता गुणैक्र्युता धनाढ्या स्वर्ण सगृहा।।

काम्पिल्य में इक्वाकुवंश के कृत वर्मा नामक शासक थे उनकी पत्नी का नाम जय श्यामा था। तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ का जन्म उन्हीं के गर्भ से हुआ था। ई. पू. चौथी शती की विमलनाथ की प्रतिमा गंगा नदी से निकली थी जो मूल वेदी पर विराजमान है। अंतिम तीर्थंकर भ.महावीर ने संसार से विरक्त होकर कठोर साधना की तथा जीवों के उद्धार के लिये उद्बोधन किया। इस काम्पिल्य नगरी में भगवान महावीर का पदार्पण भी हुआ था उनका समोशरण भी आया था। तेईसवें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ का बिहार भी इस नगरी में हुआ था।

यहाँ प्रति वर्ष दिगम्बर जैन मेला एवं रथयात्रा महोत्सव प्रथम चैत्रवदी अमावस्या से चैत्र सुदी चौथ तक तथा दूसरा महोत्सव क्वांर वदी २ से वदी ४ तक सदियोें से हो रहे हैं। वाराह मिहिर (५०५ ई.) जैन मतावलम्बी ज्योतिष शास्त्री थे, इन्होंने अपने ग्रंथ वृहज्जातक में लिख है——

‘‘आदित्य दास तनय स्त दवाप्त बोध: काम्पिल्यके सवितृलब्ध्वरप्रसाद आवन्ति को मुनिमलन्य वलोक्य सम्यग्धोरं वाराहमिहिरो रुचिरांचकार।।

काम्पिल्य में सूर्य से वर प्राप्त करके अपने पिता से ज्योतिष शास्त्र की शिक्षा ली। उनके ग्रंथ वृहज्जातक, लघुजातक, विवाह पटल, योग यात्रा, समास संहिता कहे जाते हैं। वाराह मिहिर भारतीय ज्योतिष के निर्माता माने जाते हैं। पाश्चात्य विद्धानों का कथन है कि वाराहमिहिर ने भारत की ज्योतिष को केवल ग्रह नक्षत्र तक ही सीमित नहीं रखा वरन् मानव जीवन के साथ विभिन्न पहलुओं द्वारा व्यापकता बतायी तथा जीवन के आलोच्य विषयों की व्याख्यायें की।[६] जैन मंदिर में अनेक अतिप्राचीन पांडुलिपियाँ शोधार्थियों की बाट जोह रहीं हैं। पुरातन खंडहर के रूप में एक संग्रहालय भी है जहाँ अनेक शिलालेख जैन मूर्तियों और प्राचीन ग्रंथ हैं, लेकिन इसकी व्यवस्थित सूची भी नहीं है। काम्पिल का वर्णन उत्तर पुराण, (पर्व—५९) तथा हरिवंश पुराण, (सर्ग—६०) में मनोरम ढँग से मिलता है। हरिवंश पुराण में द्रुपद को मारुंदी नामक नगर का शासक लिखा है। इससे प्रतीत होता है कि संभवत: किसी काल में इसका नाम माकन्दी भी प्रसिद्ध रहा हो।

प्राप्ता मार्गवशद्धिश्वे माकंदी नगरी दिब:।
प्रतिष्छंदा स्थिति दिव्या दधाना देववि भ्रया:।।१२०।।
द्रपदोउस्थास्तदा भूप स्तस्थ भोगवती प्रिया।
धृष्ट द्युम्नादय: पुत्रा प्रत्येक दृष्तशक्तया:।।१२१।।

महाभारत आदिपर्व (सर्ग १२८/३) में काम्पिल्य तथा मांकदी दो शब्द देखने को मिलते है:—

माकंदी अथ गंगायास्तीरे जनपद युतं।
सोध्यावसद दीन मना: काम्पिन्ल्यच्च पुरोत्तमम्।।

भीमदेव बदोला ने चालुकवंश प्रदीप में लिख है कि अंबुदगिरि के महायज्ञ से उत्पन्न सोलंकी वंश के मूल पुरुष माण्डत्य हारीत ने सोरों (एटा) में आकर महान तपस्या की। यहाँ पर काम्पिल्य के राजा शशिशेखर से उनका परिचय हुआ। शशिशेखर ने हारीत आतिवंश का श्रेष्ठ क्षत्रिय जानकर अपने साथ काम्पिल्य ले जाकर अपनी कन्या वारमति का उनके साथ विवाह संस्कार कर दिया। शशिशेखर के कोइ अन्य संतान नहीं थी अत: कुछ काल पश् चात् हारित को ही राज्य दे दिया। हारीत के बैन नाम चक्रवर्ती तेजस्वी पुत्र हुआ जिसने अंग, कलिंग, बंग मगध, पाटिल, कन्नोज अवध, प्रयाग, उड़ीसा तथा इन्द्रप्रस्थ को भी विजय किया। बैन ने अतिरंजीपुर नामक नगर भी स्थापित किया। उपर्युक्त गंथ के आधार पर सोलंकी वंश का मूल स्थान सूकर क्षेत्र (सोरों प्रतीत होता है। सौभाग्य विजय जी कृत ‘‘तीर्थ माला’’ (हस्तलिखित स्व. अगरचंद नाहटा संग्रहालय, बीकानेर) में काम्पिल्य का वर्णन है तथा पटियाली के पास इसे बताया है पटियाली एटा में ऐतिहासिक स्थान है।

‘‘जिहां अयोध्या थी पश्चिमदिशिं, जहां काम्पिल्लपुर छैढाय।
जिहाँ विमल जन्म भूमि जाणओ, जिहां पीटमारी वही जाय।।

जिहां व्रेह्यदत्त चक्री इसां, जिहां चुलणी ना चारित होय।
जिहां केसर वन मृग क्रीड़तो, जिहां संजय राजा जोय।।

जिहां गर्दमिल्ल गुरु व संती जिहां गंगा तट व्रतसार।
जिहां उत्तराध्याय ने जाण जो जिहां द्रुपदी पीहर वासा।।

 

उपर्युक्त प्रमाणों, संदर्भों से स्पष्ट है कि काम्पिल्य (वत्र्तमान कम्पिल) ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से कन्नोज, अहिच्छपुर, हस्तिनापुर नगरों से किसी भी प्रकार न्यून नहीं है। आज आवश्यकता है काम्पिल्य के पुरातत्व में गहरे जाने की, तथा शोधकणों का मंथन करके अमृततत्व को सामने लाने की।

साभार –  इन्साइक्लोपीडिया ऑफ जैनिज्म में प्रकाशित आलेख

सन्दर्भ –

  1.  Studies in the Geography of Ancient $ Medieval India, P-12
  2. महाभारत—आदिपर्व, अध्याय १४, पृ.८१—८२, गीता प्रेस, गोरखपुर
  3.  माध्यन्दिन संहिता, २३/१८
  4. शतपथ ब्राह्मण, १३/५/४—७
  5.  A commentary on the satastra I/II Taisho Tr-Vol 42, P/244 By Prof. Hozime Nakamura, Tokyo-Japan
  6.  भारतीय ज्योतिष, डॉ. नेमीचंद जैन, शास्त्री, पृ. १२६, भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली

 

स्त्री का पत्र

– रवीन्द्र नाथ टैगोर


पूज्यवर,
आज पन्द्रह साल हुए हमारे ब्याह को। हम तब से साथ ही रहे। अब तक चिट्ठी लिखने का मौका ही नहीं मिला। तुम्हारे घर की मझली बहू जगन्नाथपुरी आई थी, तीर्थ करने।

आई तो जाना कि दुनिया और भगवान् के साथ मेरा एक और नाता भी है इसलिए आज चिट्ठी लिखने का साहस कर रही हूँ. इसे मझली बहू की चिट्ठी न समझना।

वह दिन याद आता है, जब तुम लोग मुझे देखने आए थे. मुझे बारहवां साल लगा था।

सुदूर गांव में हमारा घर था। पहुँचने में कितनी मुश्किल हुई तुम सबको। मेरे घर के लोग आव-भगत करते-करते हैरान हो गए।

विदाई की करूण धुन गूंज उठी। मैं मझली बहू बनकर तुम्हारे घर आई। सभी औरतों ने नई दुल्हन को जाँच परखकर देखा। सबको मानना पड़ा – बहू सुन्दर है।
मैं सुन्दर हूँ, यह तो तुम लोग जल्दी भूल गए पर मुझ में बुद्धि है, यह बाद तुम लोग चाहकर भी न भूल सके। माँ कहती थी, औरत के लिए तेज दिमाग भी एक बला है।

लेकिन मैं क्या करूं। तुम लोगों ने उठते बैठते कहा, “यह बहू तेज है।”

लोग बुरा भला कहते हैं सो कहते रहें। मैंने सब साफ कर दिया।

मैं छिप-छिपकर कविता लिखती थी। कविताएँ थीं तो मामूली, लेकिन उनमें मेरी अपनी आवाज थी। वे कविताएँ तुम्हारे रीति रिवाजों के बन्धनों से आजाद थीं।

मेरी नन्हीं बेटी को छीनने के लिए मौत मेरे बहुत पास आई। उसे ले गई पर मुझे छोड़ गई। माँ बनने का दर्द मैंने उठाया, पर माँ कहलाने का सुख न पा सकी।

इस हादसे को भी पार किया। फिर से जुट गई रोज-मर्रा के काम-काज में। गाय-भैंस, सानी-पानी में लग गई। तुम्हारे घर का माहौल रूखा और घुटन भरा था। यह गाय-भैंस ही मुझे अपने से लगते थे। इसी तरह शायद जीवन बीत जाता।

आज का यह पत्र लिखा ही नहीं जाता लेकिन अचानक मेरी गृहस्थी में जिन्दगी का एक बीज आ गिरा। यह बीज जड़ पकड़ने लगा और गृहस्थी की पकड़ ढीली होने लगी। जेठानी जी की बहन बिन्दू, अपनी माँ के गुजरने पर, हमारे घर आ गई।

मैंने देखा तुम सभी परेशान थे। जेठानी के पीहर की लड़की, न रूपवती न धनवती। जेठानी दीदी इस समस्या को लेकर उलझ गई एक तरफ बहन का प्यार तो एक तरफ ससुराल की नाराजगी।

अनाथ लड़की के साथ ऐसा रूखा बर्ताव होते देख मुझसे रहा न गया। मैंने बिन्दू को अपने पास जगह दी। जेठानी दीदी ने चैन की सांस ली। अब गलती का सारा बोझ मुझ पर आ पड़ा।

पहले-पहले मेरा स्नेह पाकर बिन्दू सकुचाती थी पर धीरे-धीरे वह मुझे बहुत प्यार करने लगी। बिन्दू ने प्रेम का विशाल सागर मुझ पर उड़ेल दिया। मुझे कोई इतना प्यार और सम्मान दे सकेगा, यह मैंने सोचा भी न था।

बिन्दू को जो प्यार दुलार मुझसे मिला वह तुम लोगों को फूटी आँखों न सुहाया। याद आता है वह दिन, जब बाजूबन्ध गायब हुआ। बिन्दू पर चोरी का इल्जाम लगाने में तुम लोगों को पलभर की झिझक न हुई।

बिन्दू के बदन पर जरा सी लाल घमोरी क्या निकली, तुम लोग झट बोले- चेचक. किसी इल्जाम का सुबूत न था। सुबूत के लिए उसका ‘बिन्दू’ होना ही काफी था।

बिन्दू बड़ी होने लगी। साथ-साथ तुम लोगों की नाराजगी भी बढ़ने लगी। जब लड़की को घर से निकालने की हर कोशिश नाकाम हुई तब तुमने उसका ब्याह तय कर दिया।

लड़के वाले लड़की देखने तक न आए। तुम लोगों ने कहा, ब्याह लड़के के घर से होगा। यही उनके घर का रिवाज है।

सुनकर मेरा दिल काँप उठा। ब्याह के दिन तक बिन्दू अपनी दीदी के पाँव पकड़कर बोली, “दीदी, मुझे इस तरह मत निकालो. मैं तुम्हारी गौशाला में पड़ी रहूँगी। जो कहोगी सो करूंगी…।”

बेसहारा लड़की सिसकती हुई मुझसे बोली, “दीदी, क्या मैं सचमुच अकेली हो गई हूँ?”

मैंने कहा, “ना बिन्दी, ना. तुम्हारी जो भी दशा हो, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।” जेठानी दीदी की आँखों में आँसू थे। उन्हें रोककर वह बोलीं, “बिन्दिया, याद रख, पति ही पत्नी का परमेश्वर है।”

तीन दिन हुए बिन्दू के ब्याह को। सुबह गाय-भैंस को देखने गौशाला में गई तो देखा एक कोने में पड़ी थी बिन्दू। मुझे देख फफककर रोने लगी।

बिन्दू ने कहा कि उसका पति पागल है। बेरहम सास और पागल पति से बचकर वह बड़ी मुश्किल से भागी।

गुस्से और घृणा से मेरे तनबदन में आग लग गई। मैं बोल उठी, “इस तरह का धोखा भी भला कोई ब्याह है? तू मेरे पास ही रहेगी। देखूं तुछे कौन ले जाता है।”

तुम सबको मुझ पर बहुत गुस्सा आया. सब कहने लगे, “बिन्दू झूठ बोल रही है।” कुछ ही देर में बिन्दू के ससुराल वाले उसे लेने आ पहुँचे.

मुझे अपमान से बचाने के लिए बिन्दू खुद ही उन लोगों के सामने आ खड़ी हुई। वे लोग बिन्दू को ले गए। मेरा दिल दर्द से चीख उठा।

मैं बिन्दू को रोक न सकी। मैं समझ गई कि चाहे बिन्दू मर भी जाए, वह अब कभी हमारी शरण में नहीं आएगी।

तभी मैंने सुना कि बड़ी बुआजी जगन्नाथपुरी तीर्थ करने जाएंगी. मैंने कहा, “मैं भी साथ जाऊँगी.” तुम सब यह सुनकर बहुत खुश हुए।

मैंने अपने भाई शरत को बुला भेजा. उससे बोली, “भाई अगले बुधवार मैं जगन्नाथपुरी जाऊँगी. जैसे भी हो बिन्दू को भी उसी गाड़ी में बिठाना होगा.”

उसी दिन शाम को शरत लौट आया। उसका पीला चेहरा देखकर मेरे सीने पर सांप लोट गया। मैंने सवाल किया, “उसे राज़ी नहीं कर पाए?”

“उसकी जरूरत नहीं। बिन्दू ने कल अपने आपको आग लगाकर आत्महत्या कर ली।” शरत ने उत्तर दिया। मैं स्तब्ध रह गई।

मैं तीर्थ करने जगन्नाथपुरी आई हूँ। बिन्दू को यहाँ तक आने की जरूरत नहीं पड़ी लेकिन मेरे लिए यह जरूरी था।

जिसे लोग दुःख-कष्ट कहते हैं, वह मेरे जीवन में नहीं था। तुम्हारे घर में खाने-पीने की कमी कभी नहीं हुई। तुम्हारे बड़े भैया का चरित्र जैसा भी हो, तुम्हारे चरित्र में कोई खोट न था। मुझे कोई शिकायत नहीं है।

लेकिन अब मैं लौटकर तुम्हारे घर नहीं जाऊँगी। मैंने बिन्दू को देखा। घर गृहस्थी में लिपटी औरत का परिचय मैं पा चुकी। अब मुझे उसकी जरूरत नहीं। मैं तुम्हारी चौखट लांघ चुकी। इस वक्त मैं अनन्त नीले समुद्र के सामने खड़ी हूँ।

तुम लोगों ने अपने रीति-रिवाजों के पर्दे में मुझे बन्द कर दिया था। न जाने कहाँ से बिन्दू ने इस पर्दे के पीछे से झांककर मुझे देख लिया और उसी बिन्दू की मौत ने हर पर्दा गिराकर मुझे आजाद किया। मझली बहू अब खत्म हुई।

क्या तुम सोच रहे हो कि मैं अब बिन्दू की तरह मरने चली हूँ। डरो मत. मैं तुम्हारे साथ ऐसा पुराना मजाक नहीं करूंगी।

मीराबाई भी मेरी तरह एक औरत थी। उसके बन्धन भी कम नहीं थे। उनसे मुक्ति पाने के लिए उसे आत्महत्या तो नहीं करनी पड़ी। मुझे अपने आप पर भरोसा है। मैं जी सकती हूँ। मैं जीऊँगी।

तुम लोगों के आश्रय से मुक्त,
मृणाल.

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घर तो आपका भी है तो घर के काम क्यों नहीं?     

बात जब भी घर की होती है तो सबका ध्यान लड़कियों पर जाता है, आपका भी जाता होगा। आपको एक गिलास पानी की भी उम्मीद अपने घर की किसी महिला से होगी या आपने अपनी बहनों को यह सुनते हुए देखा होगा कि उनको घर के कामकाज पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि वे पराया धन हैं और आप इत्मिनान से आगे भी बढ़ गये होंगे। लड़कों की परवरिश भी यह कहकर की जाती है कि कोई आएगी जो उनका ध्यान रखेगी…उनके सारे काम यहाँ तक कि निजी काम भी करेगी और आप ये सोच लेते हैं कि ये आपके निजी काम यानि खाना बनाने से कपड़े धोने तक की जिम्मेदारी आपकी बहन, पत्नी, माँ या बेटी उठा लेगी या उसे उठा लेनी चाहिए क्योंकि यही होता आया है और इस रवैये ने ही आपको एक आम इन्सान की जगह बादशाहत वाली सोच दी होगी मगर रुकिए क्योंकि जब आप यह सोच रखते हैं तो घर में रहते वो अधिकार भी आपसे छूट रहे होते हैं। कई मामलों में तो आप चाहकर भी नहीं बोल पाते क्योंकि ये औरतों का मामला है और कुछ गलत देखते हैं तो भी हस्तक्षेप नहीं कर पाते…।

क्या आपको नहीं लगता कि पूरी तरह निर्भर हो जाना आपको घर और परिवार से दूर करता है। आप चाहें भी तो बच्चों के साथ खुलकर जीवन का आनंद नहीं उठा सकते। उनके साथ वक्त नहीं बिता पाते और न ही इसके लिए पत्नी से शिकायत कर सकते हैं क्योंकि ये स्थिति तो आपने ही बनायी है।

कई बार आपको लगता होगा कि जब घर के पुरुष कमाते हैं वे बाहर काम करते हैं तो महिलाओं को ही घर का काम करना चाहिए मगर आपकी यह सोच आपको अकेला करती है। आज की महँगाई के जमाने में गृहस्थी की गाड़ी अकेले खींच लेना आसान नहीं है मगर आपकी सोच ने आपको अकेला कर दिया और आप चाहें भी तो किसी की मदद नहीं ले पाते। ऐसा सबके साथ तो नहीं है। अपनी असुरक्षा के कारण आपका अधिकतर समय अपने घर की महिलाओं की निगरानी में जब बीतता है तो उससे आपकी उर्जा और समय भी खर्च होता है। इसका सीधा असर आपके काम पर पड़ता है और जब आप उनको नियंत्रित करना चाहते हैं तो खुद ही बँध भी जाते हैं और इसका असर आपके काम पर पड़ना तय है क्योंकि जब महिलाएँ निर्भर होंगी तो उनका छोटे से छोटा काम भी आपके ही सिर पर पड़ेगा जबकि इसकी कोई जरूरत ही नहीं है। दूसरी बात अगर योग्य हो भी गईं तो शादी के बाद अक्सर उनकी नौकरी छुड़वा दी जाती है। ऐसा करके आप अपनी बेटी या बहन का ही नहीं अपना भविष्य भी दाँव पर लगाते हैं क्योंकि देर –सवेर उसके प्रोमोशन का लाभ भी आपको ही मिलता और उसके साथ आपके रिश्ते मजबूत होते सो अलग।अगर नौकरी नहीं छुड़वाई तो घर और ऑफिस दोनों का काम महिलाओं को ही करना पड़ता है और आपको अपना वक्त अकेले बिताना पड़ता है।

ग्लोबल ट्रेंड्स सर्वे 2017 के मुताबिक 64 प्रतिशत पुरुषों का अभी भी मानना है कि महिलाओं को घर के कामकाज तक ही सीमित रहना चाहिए। महिलाएं हफ्ते में कम से कम 33 घंटे तक घर के कामकाज करती हैं। अक्सर आप लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि उनसे पूछा जाए तो वे घर का काम करेंगे लेकिन ऐसा होता नहीं है। ज्यादातर लोग पूछे जाने पर जरूरी काम निपटाने का बहाना करके खिसक लेते हैं और भारतीय पुरुष तो अपनी रूढ़िबद्ध सोच के कारण एक गिलास पानी लेना भी अपनी तौहीन समझते हैं। दरअसल, उनकी परवरिश ही इसी सोच के साथ की गयी है और यह एक बड़ा कारण है। हमें यह समझना होगा कि घर पर काम कर रही महिलाएं भी काम करती हैं। उनके काम को भी सम्मान के साथ देखना चाहिए और जरूरत पड़ने पर बिना कहे हाथ बटाना चाहिए। इसी तरह जहां घरेलू काम करने वाली महिलाओं को अपने काम को हीन भावना से नहीं देखना चाहिए उसी नौकरी करने वाली महिलाओं को भी खुद पर गर्व नहीं करना चाहिए।

काम है तो उसे सबको मिलकर निपटाना चाहिए. पति और पत्नी दोनों को मिलकर जल्दी काम निपटाना चाहिए जिससे वे जल्दी से एक दूसरे के साथ पर्याप्त समय बिता सकें और एक-दूसरे से जी भरके बात कर सकें। देखिएगा आपकी जिन्दगी में एक खूबसूरत संतुलन होगा और आत्मसंतुष्टि भी होगी।

 

गर्मियों में तरोताजा रखेंगे ये पेय

पुदीना मसाला छाछ

सामग्री : एक कप दही, एक छोटी कटोरी पुदीना पत्ती, एक छोटी कटोरी धनिया पत्ती
दो बारीक कटी हरी मिर्च, एक छोटा चम्मच काला नमक, एक छोटा चम्मच भुना जीरा पाउडर, एक छोटा चम्मच चाट मसाला, पानी आवश्यकतानुसार

विधि :  सबसे पहले पुदीना पत्ती और धनिया पत्ती को धोकर बारीक काट लें। अब एक बर्तन में सभी सामग्री डालकर अच्छे से मिक्स कर लें। मिश्रण को अच्छी तरह पीस लें। इसे तब तक अच्छे से फेंटते रहें जब तक कि यह पूरी तरह से मिक्स न हो जाए। तैयार है मसाला छाछ । कुछ देर फ्रिज में रखकर ठंडा-ठंडा सर्व करें। आप आपने स्वादानुसार नमक कम ज्यादा कर सकती हैं।

 

 

लेमन स्क्वाश

 

सामग्री : दो छोटा चम्मच नींबू का रस, चार कप पानी, दो कप चीनी, आधा चम्मच नींबू का एसेंस, कुछ बूंदे नींबू का रंग

विधि : लेमन स्क्वैश बनाने के लिए मीडियम आंच में एक बर्तन में पानी गरम होने के लिए रख दें। चीनी डालकर पानी को पकने के लिए छोड़ दें. पानी को तक तक खौलाते रहें जब तक कि चीनी पानी में घुल ना जाए। जब सारी चीनी घुल जाए तो आंच बंद कर दें और कुछ देर ठंडा होने के लिए छोड़ दें।  अब ठंडी चाशनी- में रंग और एसेंस मिलाकर कुछ देर के लिए रख दें। लेमन स्क्वैश तैयार है इसे एक बोतल में भर कर फ्रीज में रख लें।