नयी दिल्ली : देश में हाल ही में राम नवमी और हनुमान जयंती के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में जाने-माने शायर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ.गौहर रज़ा का कहना है कि हिन्दुस्तान मुसलमानों की वजह से नहीं बल्कि हिन्दुओं की वजह से धर्मनिरपेक्ष मुल्क है और देश को बचाने के लिए अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए अल्पसंख्यकों को उनका साथ देना चाहिए। शायर, वैज्ञानिक और सामाजिक कार्याकर्ता डॉ.गौहर रज़ा ने कहा कि ‘‘इस देश में मुसलमान और दलित बड़ी ताकत हैं। दलित तो और भी बड़ी ताकत हैं। दोनों मिलकर देश को बदलने में अहम किरदार अदा कर सकते हैं।’’ रज़ा ने कहा, ‘‘हिन्दुस्तान मुसलमानों की वजह से धर्मनिरपेक्ष नहीं है। यह देश यहां के धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं की वजह से धर्मनिरपेक्ष है।’’ हाल ही में रामनवमी और हनुमान जयंती पर सांप्रदायिक हिंसा और मुस्लिम मौहल्लों से जुलूस निकाले जाने की पृष्ठभूमि में शायर ने कहा, ‘‘ सवाल राजनीतिक संस्कृति का है और वह :भाजपाः इसे बदलने में लगी हुई है। मैं नहीं समझता कि हिंदूवादी ताकतें मुसलमानों या ईसाइयों से नफरत करती हैं लेकिन यह इनकी राजनीति है। जब धार्मिक नारे लगाए जाते हैं तो यह मजहबी नहीं सियासी हरकत है। इससे लड़ने की कोशिश भी सियासी होनी चाहिए। अगर इसे मजहबी रंग दिया गया तो इससे लड़ना मुमकिन नहीं है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुसलमान अकेले न खुद को बचा सकता है और न देश को बचा सकता है। उसे इन धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं का साथ देना चाहिए और इनके साथ मिलकर लड़ना चाहिए।’ मुसलमानों को कथित तौर पर उकसाने की घटनाओं पर रज़ा ने कहा, ‘‘ मुसलमानों ने अब तक खुद पर काबू रखा है जो उम्मीद पैदा करता है।’उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘ महात्मा गांधी ने हमें अहिंसा का रास्ता दिखाया है। मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं के साथ मिलकर अहिंसक तरीके से विरोध करना चाहिए। हो सकता है कि शुरू में दुश्वारियां आएं लेकिन आखिरकार जिस तरह से देश को आजादी मिली थी उसी तरह के नतीजे आएंगे।’’
देश के मौजूदा हालात पर रज़ा ने कहा, ‘‘ नफरत कभी एक कौम तक सीमित नहीं रहती। जब नफरत के पंख फैलने शुरू होते हैं तो यह पूरे समाज को अपनी जद में लेती है। हमने यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अन्य मुल्कों में देखा है। हमारी संस्थाओं का जिस तरह से राजनीतिकरण किया जा रहा है उसके नतीजे बहुत भयावह होंगे।’’
हिन्दुस्तान मुसलमानों की नहीं, धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं की वजह से धर्मनिरपेक्ष : गौहर रज़ा
मां ने मूंगफली बेचकर क्रिस गेल को बनाया क्रिकेट का सबसे सफल खिलाड़ी
आईपीएल 2018 की जंग शुरू हो चुकी है और सभी टीमें चैम्पियन बनने की जंग में भिड़ चुकी हैं। विश्व क्रिकेट के सबसे खतरनाक खिलाड़ी आईपीएल में नजर आ रहे हैं. उसी में है क्रिस गेल जो किंग्स इलेवन पंजाब की तरफ से खेल रहे हैं। उनके प्रशंसक सिर्फ वेस्टइंडीज में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं। वो पहले बल्लेबाज हैं जिन्होंने टी-20 में शतक जड़ा था। आईपीएल में सबसे ज्यादा छक्के (265) लगाने वाले बल्लेबाज भी हैं।
जब भी वो आईपीएल में खेलने उतरते हैं तो भारतीय समर्थक भी उनको सपोर्ट करते हैं. गेल ने ये मुकाम बहुत संघर्षों के बाद पाया है। गेल का जन्म वेस्टइंडीज के जमैका के किंग्सटन में 21 सितंबर 1979 को हुआ। उनका बचपन काफी संघर्षों में बीता। उनका बचपन गरीबी में बीता। दो वक्त की रोटी भी खाना मुश्किल था। उनके पिता पुलिस में थे तो वहीं मां मूंगफली बेचा करती थीं। उस वक्त क्रिस गेल गली-महल्ले में ही क्रिकेट खेला करते थे। उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो ग्राउंड पर क्रिकेट प्रैक्टिस कर सकें। बड़े होते ही वो जमैका का लुकास क्रिकेट क्लब में शामिल हो गए। उनकी बल्लेबाजी के चर्चे हर जगह थे। इसको देखते हुए 19 साल की उम्र में ही उनको फर्स्ट क्लास मैच खेलने का मौका मिल गया।
फर्स्ट क्लास में उन्होंने शानदार परफॉर्म किया और वेस्टइंडीज के लिए खेलने का मौका मिल गया। उन्होंने पहला वनडे भारत के खिलाफ 1998 में खेला था. जिसके बाद टेस्ट मैच में भी उन्हें मौका दिया गया लेकिन वो इंटरनेशनल में ठीक परफॉर्म नहीं कर पाए जिसकी वजह से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया लेकिन अंदर आने के लिए गेल संघर्ष करते रहे और 2002 में उनको वेस्टइंडीज में फिर जगह मिल गई। उसी साल उन्होंने भारत के खिलाफ 3 सेंचुरी जड़ीं जिसके बाद उनका नाम पूरे विश्व में छा गया।
2005 में पता चला कि दिल में छेद है
2005 में गेल जब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेल रहे थे तो वो चक्कर खाकर ग्राउंड पर ही गिर गए थे। उनको सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच के दौरान पता चला कि उनके दिल में छेद है. जिसके बाद क्रिकेट छोड़ उन्होंने इलाज कराया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करना शुरू कर दिया। शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें 2006 में चैम्पियंस ट्रॉफी में प्लेयर ऑफ द मैच दिया गया। 2007 टी-20 वर्ल्ड कप के दौरान उन्होंने दक्षिणअफ्रीका के खिलाफ शानदार 117 रन की पारी खेली. इसी के साथ वो टी-20 में पहला शतक बनाने वाले खिलाड़ी बन गए थे।
राज कपूर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित होंगे धर्मेंद्र
नई दिल्ली: महाराष्ट्र सरकार ने दिग्गज अभिनेता धर्मेद्र को राज कपूर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए चुना है जबकि निर्देशक राजकुमार हिरानी को राज कपूर स्पेशल कंट्रीब्यूशन अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा। महाराष्ट्र शिक्षा एवं सांस्कृतिक मामलों के मंत्री विनोद तावड़े ने सोशल मीडिया के जरिए यह घोषणा की।
तावडे ने ट्वीट कर कहा, “महाराष्ट्र सरकार के राज कपूर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए धर्मेद्र जी और राज कपूर स्पेशल कंट्रीब्यूशन अवॉर्ड के लिए निर्देशक राजकुमार हिरानी के नाम का ऐलान कर बहुत खुशी हो रही है. बधाई।”
मराठी अभिनेता विजय चौहान और अभिनेत्री मृणाल कुलकर्णी को भी सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने कहा, “दिग्गज अभिनेता विजय चौहान को प्रतिष्ठित चित्रापति वी शांताराम जीवन गौरव पुरस्कार और अभिनेत्री-निर्देशक मृणाल कुलकर्णी को चित्रापति वी शांताराम विशेष योगदान पुरस्कार के लिए बधाई। “
शिल्पकारों, दस्तकारों के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय शुरू करेगा ‘विरासत योजना’
नयी दिल्ली : अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब दस्तकारों, शिल्पकारों और कारीगरों को पूंजी मुहैया कराने के लिए सरकार ‘‘विरासत योजना’’ शुरू करने की तैयारी में है। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की इस प्रस्तावित योजना के तहत दस्तकारों, शिल्पकारों और दूसरे पुश्तैनी कामों में लगे कारीगरों को 10 लाख रुपये तक का ऋण मुहैया कराए जाएगा। इस पर ब्याज की दर पांच फीसदी से भी कम रखे जाने की संभावना है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताया कि ‘इस प्रस्तावित योजना को लेकर जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा किया जा रहा है और अगले डेढ़-दो महीनों में इसके शुरू हो जाने की उम्मीद है।’ दरअसल, इस योजना को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम (एनएमडीएफसी) के माध्यम से क्रियान्वित किया जाना है और इसका मसौदा भी एनएमडीएफसी द्वारा तैयार किया गया है। एनएमडीएफसी के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक मोहम्मद शहबाज अली ने बताया, ‘करीब तीन महीने पहले हमने इस योजना का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा था। मंत्रालय की ओर से हमसे कुछ और ब्यौरा मांगा गया था और हमने वो भी भेज दिया है। मंत्रालय इस योजना को लागू करने के लिए तैयार है। उम्मीद है कि यह योजना जल्द शुरू हो जाएगी।’ उन्होंने कहा कि एनएमडीएफसी की ओर से इस प्रस्तावित योजना का जो मसौदा तैयार किया गया है उसमें शिल्पकारों, दस्तकारों और कारीगरों को पांच फीसदी से भी कम के ब्याज पर 10 लाख रुपये तक की पूंजी मुहैया कराने का प्रावधान किया गया है ताकि ये लोग अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा सकें।
गौरतलब है कि शिल्पकारों, दस्तकारों और कारीगरों को बाजार और अवसर प्रदान करने के लिए अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय समय समय पर ‘हुनर हाट’ का आयोजन करता है। अली का कहना है, ‘शिल्पकारों, दस्तकारों और दूसरे पुश्तैनी कामों में लगे कारीगरों को ‘हुनर हाट’ से बड़ा बाजार और अवसर मिला है, लेकिन अभी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनको अपने कारोबार के लिए पूंजी की जरूरत है। इन्हीं लोगों की मदद के लिए इस योजना का प्रस्ताव दिया गया है।’
उन्होंने कहा, ‘‘पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि पुश्तैनी पेशों से जुड़े लोगों की दिक्कतें बढ़ी हैं। उनके सामने सबसे बड़ी दिक्कत वित्तीय इंतजाम न होने की है। हमारे पास कई लोगों के सुझाव आए थे। इसके बाद हमने इस तरह की योजना का प्रस्ताव तैयार किया।’’
50 की उम्र के बाद हो सकती हैं ये मनोवैज्ञानिक समस्यायें
अकसर काम और जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद लोग अपने भविष्य को लेकर तरह -तरह की दुशचिंताओं में पड़ जाता है और उसे कई तरह की मानसिक या मनोवैज्ञानिक समस्याएं घेर लेती है। उम्र के दूसरे पड़ाव में होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं एक बहस का मुददा हो सकती है। इस उम्र में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और उसकी प्रकृति के अनुसार उससे लड़ने के लिए डॉक्टर बहुत सारे सलाह दे सकते है। मध्य उम्र में होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं 30 की उम्र पार करने और 50 के पहले तक शुरू हो सकती है। यह स्थित कई तरह की बीमारियों के लक्षण को प्रकट होने का संकेत देती है लेकिन यह निश्चिंत करना बड़ा कठिन होता है कि ये समस्याएं शरीर में हार्मोंस के असंतुलित होने से होता है या मानसिक स्थिति से।
क्या होते है इसके कारण
रिटायरमेंट के बाद पुरूषों का अपने दैनिक जीवन और दिनचर्या में काफी बदलाव करना पड़ता है। अपनें जीवन में होने वाले इस बदलाव से वह काफी विचलित हो जाता है। जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण इसे इस बदलाव के अनुकूल उसे ढालने में मदद करता है।जिन लोगों की पहचान उनकी नौकरी या व्यवसाय से जुड़ी रहती है वैसे लोगों को सेवानिवृति के बाद मानसिक तौर पर अस्वस्थ होने की संभावना अधिक रहती है। जिन लोगों में बढती उम्र का एहसास कुछ ज्यादा होता है और वह देखने में भी बूढ़े लगने लगते है उनमें स्वंय को लाचार और असहाय समझने जैसी हीन भावना आ जाती है। जो लोग अपनी उम्र बढने के साथ अपनी नौकरी पेशा से रिटायर होने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होते है, उन लोगों में सेवानिवृति के बाद खास तौर पर भावनात्मक समस्याएं और प्रकट होने लगती है।
उम्र बढने के साथ ही पुरूषों में जीवन के प्रति अनिश्चितत्ता, भ्रम और एक नकारात्मक भाव पैदा होने लगता है जो कई तरह की बीमारियों का वाहक बनता है। इस के कई कारण हो सकते है। उम्र बढने के साथ अचानक मरने का विचार मन में आने लगना। अपने जीवन में होने वाले बदलावों के प्रति असंतुष्ठि का भाव और कुछ अधुरे सपने और दमित इच्छाओं को पानेे की अपेक्षाएं। अपने परिवार में पत्नी, बच्चे या किसी अन्य इष्ट की मौत हो जाने या किसी सहकर्मी की मौत से भी व्यक्ति व्यथित हो जाता है। बढती उम्र में पत्नी से तलाक आदि की स्थित पैदा होने पर भी व्यक्ति इस तरह के मानसिक पीड़ा का अनुभव करता है। रिटायमेंट के बाद अपनी जिम्मेदारी और पहचान के संकट से उत्पन्न खतरे के कारण भी आदमी मानसिक रूप से दुखी हो जाता है। परिवार में बच्चों द्वारा अपने माता पिता को घर में अकला छोड़ कर खुद अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहने की बढती प्रवृति के कारण भी बूढे लोगों में एक तरह से असुरक्षा का भाव पनपने लगता है। वह भावनात्मक रूप से काफी संवेदनशील हो जाता है। इसी कमी को दूर करने के लिए अकसर वृद्ध लोग अपनी उम्र के लोगों के साथ समय गुजारने लगते है और अपनी परेशानी और दुशचिंताओ को एक दूसरे से शेयर करते है।
उम्र बढने के बाद अपनी नौकरी पेशा से रिटायरमेंट होने के लिए समय रहते ही खुद को मानसिक रूप से तैयारी करना शुरू कर दे। आप अपने रिटायरेमेंट के कुछ माह पहले से ही अपने काम को करने में मजा लेने और काम के प्रति थोड़ा कंम गंभीर या कहे तो लापरवाह बन कर पहले से सेवानिवृति का अभ्यास कर सकते है।
(साभार ओनली माई हेल्थ डॉट कॉम)
आम्बेडकर जयंती : डॉ. भीमराव आम्बेडर के कुछ विचार
डॉ भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल सन् 1891 में मध्यप्रदेश के महू में हुआ था। बाबा साहेब के नाम से मशहूर आंबेडकर ही भारत के संविधान के निर्माता हैं। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर का जीवन संघर्ष और सफलता की ऐसी अद्भुत मिसाल है
नयी उमंग का और श्रद्धा का पर्व बैसाखी
बैसाखी बैसाख से बना है। बैसाखी का त्योहार पंजाब हरियाणा सहित अन्य कई स्थानों पर व्यापक स्तर पर मनाया जाता है। बैसाखी को पंजाब और हरियाणा में किसान फसल काटने के बाद नए साल की खुशियां मानते हैं।
इसलिए बैसाखी पंजाब और हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में सबसे बड़े त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। बैसाखी रबी फसल के पकने की खुशी में मनाया जाता है। साल 2018 में बैसाखी 14 अप्रैल (शनिवार) को है।
बैसाखी का महत्व
बैसाख (अप्रैल) माह में रबी फसल कटकर घर आती है। इस फसल को बेचकर किसान धन कमाते हैं। इसलिए भी बैसाखी का यह पर्व उल्लास का पर्व माना गया है।
वैसे तो हर वर्ष बैसाखी के दिन पंजाब में कई मेले लगते हैं। लेकिन जब बैसाखी में कुंभ का मेला भी हो तो इस दिन स्नान करने का महत्व और भी बढ़ जाता है। बैसाखी के दिन ही सिख गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी।
गुरुगोविंद सिंह ने बैसाखी के दिन ही आनंदयुर साहब के गुरूद्वारे में पांच प्यारों से बैसाखी पर्व पर ही बलिदान के लिए आह्वान किया गया था। सिख धर्म में बैसाखी को बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार माना गया है।
वैसे पंजाब ही नहीं, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी बैसाखी की धूम रहती है। इसके साथ ही जहां-जहां सिख धर्म के मानने वाले लोग हैं वहां बैसाखी जरूर मनाई जाती है। इस दिन तीर्थों में स्नान का महत्व भी है।
गुरु गोविन्द सिंह और खालसा पंथ : बलिदान की शौर्य गाथा
भगवान और उनके भक्तों के बीच सदियों से ही एक अटूट रिश्ता देखने को मिला है। यह एक ऐसे बंधन की डोर है जो विश्वास के धागे में बंधी है। कुछ ऐसा ही रिश्ता देखने को मिलता है सिख धर्म के दसवें गुरु ‘श्री गुरु गोबिंद सिंह जी’ और उनकी संगत (भक्तों) में। कहते हैं एक बादशाह होते हुए भी अपनी संगत के लिए कुछ भी कर जाने का जज़्बा रखते थे गुरु गोबिंद सिंह जी।
सिख धर्म की स्थापना पहले गुरु ‘गुरु नानक देव जी’ ने की थी परंतु सिखों को ‘सिंह’ उनके दसवें गुरु, ‘गुरु गोबिंद सिंह’ ने बनाया था। गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर, 1666 में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी और माता गुजरी के घर पटना (बिहार) में हुआ था। उनका विवाह माता सुंदरी जी से महज 11 साल की उम्र में 1677 में हुआ था।
गुरु जी के चार साहिज़ादे (पुत्र) थे जिनमें से बड़े दो पुत्र (अजीत सिंह और जुह्गार सिंह) युद्ध में शहीद हुए और छोटे दो पुत्रों (जोरावर सिंह और फतहि सिंह) को मुगलों ने ज़िंदा दीवार में चिनवाया था। इस महान शहीदी के बाद ही सिख धर्म इन चार साहिबज़ादों के नाम के आगे ‘बाबा’ लगाकर उनका सम्मान करते हैं।
कहते हैं गुरु गोबिंद सिंह बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई और तलवारबाज़ी में कुशल थे। महज़ 10 वर्ष की उम्र में अपने पिता की शहीदी के बाद उन्हें राजा की गद्दी पर बैठा दिया गया था। गुरु गोबिंद सिंह के लिए उनके सिख ‘सिंह’ (शेर) के समान थे, वह शेर जो ना किसी से डरते हैं और ना ही घबराते हैं। सिख धर्म को वर्षों पहले यह पहचान गुरु गोबिंद सिंह द्वारा एक अलग ही अंदाज़ में दी गई थी, जो इतिहास में कभी नहीं देखी गई थी।
13 अप्रैल, 1699, बैसाखी के पर्व का दिन, गुरु जी ने इस दिन के लिए एक खास दीवान (कीर्तन समारोह) आयोजित कराने का आदेश दिया और साथ ही कहा, “मेरी प्यारी संगत से कह दो कि मैं उनसे एक खास बात भी करना चाहता हूं।“ वर्तमान पंजाब में स्थित, आनंदपुर साहिब के ‘केशगढ़’ किले में जहां दूर-दूर से संगतों का हुजूम आया।
सब गुरु जी के दर्शन करने के लिए एकत्रित हो गए। लेकिन साथ ही सबके मन में एक सवाल भी था, कि आखिरकार ऐसी क्या बात है जो इस वर्ष गुरु जी ने इतना बड़ा समारोह आयोजित कराया है। रीति अनुसार दीवान सजाए गए और फिर कीर्तन समाप्त होते ही गुरु जी संगत के सामने प्रस्तुत हुए और उनका स्वागत किया। अपने एक बुलावे पर संगतों की इतनी बड़ी संख्या देखकर गुरु जी को बेहद खुशी हुई।
वे आगे बढ़े, म्यान में से अपनी तलवार निकाली और नंगी तलवार लेकर मंच के बीचो-बीच जाकर बोले, “मेरी संगत मेरे लिए सबसे प्यारी है। मेरी संगत मेरी ताकत है, मेरा सब कुछ है। लेकिन क्या आप सब में से ऐसा कोई है, जो अभी, इसी वक्त मेरे लिए अपना सिर कलम करवाने की क्षमता रखता हो?”
संगत में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया, किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक गुरु जी नी ऐसी बात क्यों की। गुरु जी फिर बोले, “क्या है कोई ऐसा मेरा प्यारा, जो मुझे अपना सिर दे सके? यह तलवार खून की प्यासी है। है कोई ऐसा जो इसी क्षण मेरी इस मांग को पूरा कर सके?”
गुरु जी की आवाज़ मानो एक गूंज की तरह वातावरण में फैल गई, लेकिन अभी भी ऐसा कोई ना था जो उनके इस सवाल का जवाब देने के लिए आगे आया हो। परंतु अगले ही क्षण भीड़ में से एक आवाज़ आई। वो आवाज़ ‘दया राम’ की थी। लाहौर के खत्री परिवार का दया राम गुरु गोबिंद सिंह जी का परम भक्त था।
वह आगे बढ़ा और बोला, “गुरु जी, आपके लिए मेरी जान कुर्बान है। यह जीवन आप ही का दिया हुआ है, तो इसे चलाने या खत्म करने का अधिकार भी आपको ही है।“ गुरु जी खुश हुए और दया राम को अपने पास बुलाया। वे दोनों तम्बू के पीछे गए और कुछ देरे बाद अकेले गुरु जी ही बाहर आए।
गुरु जी की नंगी तलवार में ताज़ा खून की बूंदें टपक रही थी। खून से लथपथ तलवार देख कर लोगों में भय की चिंगारी दौड़ पड़ी, परंतु कोई भी अपनी जगह से ना उठा। गुरु जी फिर बोले, “एक और कुर्बानी चाहिए। है कोई संगत में से कोई, जो आगे बढ़कर अपना सिर कुर्बान कर सके?” इस बार हस्तिनापुर के चमार वर्ग का धर्म दास आगे बढ़ा।
गुरु जी उसे भी लेकर तम्बू के पीछे चले गए और फिर कुछ देर बाद खून से रंगी तलवार लेकर अकेले ही बाहर निकले। यह देख लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था। कुछ लोग आपस में बात करने लगे। कहने लगे कि क्या सच में गुरु जी ने उन दोनों को मार दिया? लेकिन गुरु जी ने ऐसा क्यों किया?
सवाल सब के मन में थे लेकिन कोई भी आगे आकर गुरु जी से यह पूछने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था, क्योंकि संगत को एक विश्वास यह भी था कि गुरु जी तो परमात्मा हैं। और परमात्मा कभी भी अपने श्रद्धालुओं का बुरा नहीं करते। अब गुरु जी ने तीसरे सिर की मांग की। यह सुन लोग हैरान थे कि आखिरकार गुरु जी कर क्या रहे हैं।
इस बार मोहकम चंद खड़े हुए जो कि एक साधारण दर्जी थे और द्वारका के निवासी थे। वह भी गुरु जी के साथ तम्बू के पीछे गया लेकिन बाहर नहीं आया। इसके बाद गुरु जी ने दो और सिरों की मांग की, जिसके अनुसार जगन्नाथ पुरी के हिम्मत राय और बिदर (महाराष्ट्र) के साहिब चंद आगे बढ़े।
पांच सिर की मांग पूरी करने के बाद गुरु जी वापस तम्बू के अंदर चले गए। मान्यता है कि गुरु जी जब तम्बू के पीछे पहुंचे तो उन्होंने उन पांच सिखों पर पवित्र अमृत छिड़का और उनमें जान डाली। बाहर बैठी संगत परेशान थी कि गुरु जी कब से अंदर गए हैं लेकिन अब तक बाहर नहीं आए। परंतु कुछ देर बाद का दृश्य देख लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
केसरिया रंग के लिबास में पांच नौजवान हाथों में हाथ डाले बाहर आ रहे थे। उनके सिर पर सुंदर केसरिया रंग की एक ही प्रकार की पगड़ी बंधी हुई थी। पांचों लोगों के साथ गुरु जी भी ठीक उसी प्रकार की वेशभूषा में बाहर निकले। यह वही पांच नौजवान थे, जिन्होंने कुछ देर पहले ही गुरु गोबिंद सिंह के कहने पर अपने सिर की कुर्बानी दी थी।
परंतु अब वह बिलकुल सही सलामत नज़र आ रहे थे और केसरिया लिबास में बेहद आकर्षक लग रहे थे। पांच नौजवानों के साथ गुरु जी मंच के बीचो-बीच पहुंचे और बोले, “सिख धर्म को अपने पंज प्यारे मिल गए हैं।“
गुरु जी ने अपने हाथ में लोहे का एक कटोरा लिया। उसमें साफ जल (पानी) भरा और माता जीतो जी को कुछ पताशे (चीनी) लाने के लिए आग्रह किया। गुरु जी ने जल में पताशे डाले और उसे एक दो-धारी छोटी सी किरपान (तलवार) से मिलाया। इस तरह से सिख धर्म का पवित्र ‘अमृत’ तैयार हुआ।
अब गुरु जी द्वारा पंज प्यारों को आगे आने के लिए निवेदन किया गया। वे आगे बढ़े और नीचे झुककर अपने दोनों हाथ आगे किए। गुरु जी ने एक-एक प्यारे को अमृत छकाया (पिलाया) और उन्हें खालसा पंथ के पंज प्यारे निर्धारित किया। फिर गुरु जी ने उन्हीं पंज प्यारों के हाथ से स्वयं आगे झुककर अमृत पीया। इतिहासनुसार गुरु जी द्वारा अमृत छ्काने से पहले पंज प्यारों को पांच ककार (कड़ा, केश, कंघा, किरपान और कछहरा) भी अर्पित किए गए थे।
पंज प्यारों के सामने गुरु जी को यूं झुकता हुआ देख सारी संगत चकित रह गई। गुरु जी द्वारा निभाए गए इस वाकए को सिख संगत में ‘वाहो वाहो गोबिंद सिंह आपे गुरु चेला’ वाक्या से उच्चारित किया जाता है। इसका अर्थ है – गुरु गोबिंद सिंह ही गुरु हैं और समय आने पर वही अपने पंज प्यारों के चेला (आज्ञा का पालन करने वाले) भी हैं”।
यह केवल कहने की बात नहीं है। मान्यता है कि गुरु गोबिंद सिंह के पंज प्यारों को स्वयं गुरु जी द्वारा ही कुछ अधिकार प्रदान किए गए थे। गुरु जी की अनुपस्थिति में सिख धर्म से जुड़ी बड़ी-छोटी गतिविधियों की देख-रेख इन्हीं पंज प्यारों के हाथ में सौंपी गई।
गुरु जी की अनुपस्थिति में यह पंज प्यारे गुरु जी के बराबर ही आदेश देने के हकदार बनाए गए। केवल गुरु गोबिंद सिंह के ना होने पर ही नहीं, बल्कि समय आने पर आपसी सलाह से यह पंज प्यारे खुद गुरु गोबिंद सिंह को भी आदेश देने का अधिकार रखते थे।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण चमकौर की गढ़ी के युद्ध के दौरान देखा गया था, जब मुगलों की बड़ी फौज के सामने मुट्ठी भर सिखों को देख पंज प्यारों को गुरु गोबिंद सिंह और सिख धर्म के भविष्य की चिंता सताने लगी। तब गुरु जी स्वयं युद्ध के मैदान में उतरने को तैयार थे, परंतु पंज प्यारों ने उन्हें रोका और उनके अधिकार का इस्तेमाल किया।
उन्होंने गुरु जी से चमकौर का किला छोड़ जाने के लिए विनम्रतापूर्वक निवेदन किया। पंज प्यारों का हुक्म गुरु जी किसी भी हाल में नकार नहीं सकते थे, इसलिए गुरु जी मान तो गए लेकिन जाते-जाते शेर की दहाड़ के बराबर मुगलों के लिए एक गूंज छोड़कर गए।
एक राजा का बाणा (पहनावा) छोड़ एक साधारण व्यक्ति का लिबास धारण कर जब गुरु से किले से बाहर निकल रहे थे तो उन्होंने दुश्मनों के लिए एक संदेश छोड़ना सही समझा। वे बोले, “हिन्द का पीर जा रहा है, कोई रोक सके तो रोक लो।“ यह कहकर गुरु जी माछीवाड़े के जंगल की ओर निकल गए।
आज इतने वर्षों बाद भी सिख संगत में बैसाखी का पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है। जगह-जगह कीर्तन समारोह आयोजित किए जाते हैं और गुरुद्वारों में अमृत छकाने का आयोजन भी किया जाता है। गुरु जी द्वारा सजाए गए पंज प्यारे जो पहले तो अलग-अलग जाति के थे, उन्हें ‘सिंह’ की उपाधि देकर सिख बनाया गया।
अब वे पंज प्यारे ‘भाई दया सिंह’, ‘भाई धर्म सिंह’, ‘भाई हिम्मत सिंह’, ‘भाई मोहकम सिंह’ और ‘भाई साहिब सिंह’ के नाम से जाने जाते हैं। सिख धर्म के प्रत्येक पर्व में नगर कीर्तन के दौरान, जिसे ‘गुरुपर्व’ भी कहा जाता है, उनमें गुरु ग्रंथ साहिब की सुंदर पालकी के आगे इन पंज प्यारों को जगह दी जाती है।
(साभार – स्पीकिंग ट्री से गुलनीत कौर का आलेख)
जलियाँवाला बाग में बसंत
– सुभद्रा कुमारी चौहान

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।
सोचो तुम एक लड़की हो….
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वीडियो – साभार बोल पोएट्री




