Friday, April 10, 2026
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केंद्र ने स्वच्छ भारत इंटर्नशिप शुरू की

नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा युवाओं का स्वच्छ भारत पहल में इंटर्न के तौर पर जुड़ने का आह्वान करने के एक दिन बाद सरकार ने स्वच्छ भारत ग्रीष्मकालीन इंटर्नशिप शुरू की। एक बयान में कहा गया है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय और युवा एवं खेल मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय की अपने तरह की इस पहली पहल के तहत तीन महीने की अवधि की यह इंटर्नशिप कल ( एक मई ) से शुरू होगी और इसका समापन 31 जुलाई को होगा।

पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के बयान के अनुसार , ‘‘ कार्यक्रम का उद्देश्य पूरे देश में लाखों युवाओं को इसके लिए प्रोत्साहित करना है कि वे स्वच्छ भारत अभियान में सच्चे जन आंदोलन की भावना के तहत योगदान करें। प्रधानमंत्री ने अपनी ‘ मन की बात ’ कार्यक्रम में युवाओं का आह्वान किया था कि वे इंटर्नशिप का लाभ उठायें और आंदोलन को आगे ले जाएं। ’’

कालेज और विश्वविद्यालय के छात्र तथा नेहरू युवा केंद्र संगठन से जुड़े छात्र डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू . एसबीएसआई . माईजीओवी . इन पर लागइन करके इंटर्नशिप के लिए पंजीकरण करा सकते हैं।

बयान में कहा गया है कि सभी इंटर्न को गांवों में कम से कम 100 घंटे की सफाई संबंधी कार्य पूरा करने पर स्वच्छ भारत प्रमाणपत्र दिये जाएंगे। इसके लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि 15 मई है।

इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक की सभी 650 शाखायें शुरू

भोपाल : केन्द्रीय संचार मंत्री मनोज सिन्हा ने आज कहा कि अगले महीने से इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) की सभी 650 शाखायें काम करना शुरू कर देंगी। सिन्हा ने बताया, ‘‘आईपीपीबी चालू करने के लिए सभी तकनीकी काम लगभग पूरे हो चुके हैं। इसे चालू करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक कि आईपीपीबी की सभी 650 शाखायें मई से काम करना शुरू कर देंगी। इससे देश भर में फैले 50 लाख से अधिक डाकघर आईपीबीबी के ग्राहक केंद्र (एक्सेस पॉइंट) के तौर पर काम करने लगेंगे। यह सरकार के सुदूर क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन और सीधे नकद लाभ हस्तांतरण को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।’’ जबलपुर में डाक विभाग का एक नया क्षेत्रीय कार्यालय खोला जाएगा। सिन्हा ने कहा कि गत वर्ष के दौरान विभाग द्वारा सराहनीय कार्य किया गया है। देश के 1.29 लाख शाखा डाकघरों में से 62,000 से अधिक दर्पण (डिजिटिलाइजेशन ऑफ रूरल पोस्‍ट ऑफिसेस फॉर न्‍यू इंडिया) परियोजना के तहत जोड़े जा चुके हैं। इस परियोजना के माध्‍यम से ग्रामीण क्षेत्रों में हाथ में रखे जाने वाले उपकरण (हैंडहेल्ड डिवाइस) के माध्‍यम से ग्राहकों को नवीन तकनीकी पर आधरित सेवाएं मिल रही हैं, जिनमें बैकिंग लेन-देन, बिल, बीमा प्रीमियम संग्रहण, रजिस्‍ट्री, पार्सल आदि का बुकिंग एवं वितरण शामिल है। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा पूरे देश में 995 एटीएम लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि गत वर्ष विभाग द्वारा कुछ लोकोन्‍मुखी सेवाएं शुरू की गई हैं। उन्होंने विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि डाक विभाग ने विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर डाकघर पासपोर्ट सेवा शुरू की है। अभी तक 187 डाकघरों में पासपोर्ट सेवा केन्‍द्र स्थापित किए जा चुके हैं। शीघ्र ही और पासपोर्ट सेवा केंद्र इसी कड़ी में जुड़ने जा रहे है। उन्होंने कहा कि डाक विभाग द्वारा 13,000 से अधिक डाकघरों में आधार पंजीकरण एवं आधार नवीनीकरण का कार्य भी शुरू किया गया है। इससे आम जनता, खासतौर से समाज के गरीब एवं पिछड़ा तबके को विशेष रूप से लाभ होगा।

भारत की धरोहर : द्रोपदी और बुद्ध की नगरी काम्पिल्य

अभय प्रकाश जैन

काम्पिल्य एक पौराणिक नगर है जो महाभारत के समय पांचाल जनपद की राजधानी थी जिसके राजा द्रुपद थे। इसके नाम का सर्वप्रथम उल्लेख यजुर्वेदकी तैत्तरीय संहिता में ‘कंपिला’ रूप में मिलता है। बहुत संभव है, पुराणों में वर्णित पंचाल नरेश भृम्यश्व के पुत्र कपिल या कांपिल्य के नाम पर ही इस नगरी का नामकरण हुआ हो। महाभारत काल से पहले पंचाल जनपद गंगा के दोनों ओर विस्तृत था। उत्तर-पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिण पंचाल की कांपिल्य थी। दक्षिण पंचाल के सर्वप्रथम राजा अजमीढ़ का पुराणों में उल्लेख है। इसी वंश में प्रसिद्ध राजा नीप और ब्रह्मदत्त हुए थे। महाभारत के समय द्रोणाचार्य ने पंचाल नरेश द्रुपद को पराजित कर उससे उत्तर-पंचाल का प्रदेश छीन लिया था। इस प्रसंग के वर्णन में महाभारत में कांपिल्य को दक्षिण पंचाल की राजधानी बताया गया है। उस समय दक्षिण पंचाल का विस्तार गंगा के दक्षिण तट से चंबल नदी तक था। ब्रह्मदत्त जातक में भी दक्षिण पंचाल का नाम कंपिलरट्ठ या कांपिल्य राष्ट्र है। बौद्ध साहित्य में कांपिल्य का बुद्ध के जीवनचरित के संबंध में वर्णन मिलता है। किंवदंति के अनुसार इसी स्थान पर बुद्ध ने कुछ आश्चर्यजनक कार्य किए थे, जैसे स्वर्ग में जाकर अपनी माता को उपदेश देने के पश्चात् वह इसी स्थान पर उतरे थे। चीनी यात्री युवान च्वांग ने भी सातवीं सदी ई. में इस नगर को अपनी यात्रा के प्रसंग में देखा था।

वर्तमान कंपिला में एक अति प्राचीन ढूह आज भी राजा द्रुपद का कोट कहलाता है एवं बूढ़ी गंगा के तट पर द्रौपदीकुंड है जिससे, महाभारत की कथा के अनुसार, द्रौपदी और धृष्टद्युम्न का जन्म हुआ था। कुंड से बड़े परिमाण की, संभवत: मौर्यकालीन, ईंटें निकली हैं। कंपिला के मंदिरों से अनेक प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। कंपिला बौद्धधर्म के समान जैनधर्म का भी कुछ दिनों तक केंद्र रह चुकी है, जैसा यहाँ से प्राप्त तीर्थंकरों की अनेक प्रतिमाओं तथा जैन अभिलेखों से सूचित होता है। कांपिल्य के ‘कंपिलनगर’, ‘कंपिल्लनगर’ और ‘कंपिला’ नाम साहित्य में उपलब्ध हैं। इसका अपभ्रंश रूप कांपिल भी मिलता है। कांपिल्य नगरी प्राचीन काल में काशी, उज्जयिनी आदि की भाँति ही प्रसिद्ध थी और प्राचीन साहित्य में इसे अनेक कथाओं की घटनास्थली बनाया गया है, जैसे महाभारत, शांतिपर्व (१३९, २) में राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़िया की कथा को कांपिल्य में ही घटित कहा गया है।

पत्रकार अनुभूति विश्नोई के ट्विटर वॉल से साभार…

प्राचीन किंवदंती के अनुसार प्रसिद्ध भारतीय ज्योतिषाचार्य बराहमिहिर का जन्म कांपिल्य में ही हुआ था। पांचाल प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध रहा है। यह इन्द्रप्रस्थ से तीस योजन दूरी पर कुरुक्षेत्र से पश्चिम और उत्तर में अवस्थित था। पांचाल जनपद तीन भागों में विभक्त था

(१) पूर्व पांचाल,

(२) उत्तर पांचाल, और

(३) दक्षिण पांचाल।

महाभारत के अनुसार दक्षिण और उत्तर पांचाल के बीच गंगा नदी की सीमा थी। वर्तमान एटा और फरुखाबाद जिले दक्षिण पांचाल में थे। वर्णनों से ज्ञात होता है कि उत्तर पांचाल के पूर्व और अपर दो भाग थे। दोनों को रामगंगा विभक्त करती थी। अहिक्षत्र उत्तरी पांचाल तथा काम्पिल्य दक्षिणी पांचाल की राजधानी रही है। काम्पिल्य नगर जैन, शैव, बौद्ध ,वैष्णव धर्मों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पांचाल जनपद का भी महत्त्व कम नहीं है। भगवान ऋषभदेव से लेकर अनेकानेक तीर्थंकरों का बिहार यहाँ हुआ।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के आदिपर्व में लिखा है कि पांचाल की राजधानी काम्पिल्य थी, जहाँ महाराज द्रुपद की पुत्री द्रोपदी का इतिहास प्रसिद्ध स्वयंबर हुआ था। धारावाहिक ‘‘महाभारत’’ प्रत्येक रविवार को सभी दूरदर्शन पर देख चुके हैं तथा काम्पिल्य का नाम भी सुन चुके हैं। काम्पिल्य के इतिहास, शौर्य और पुरातात्विक सामग्री और साहित्य पर दृष्टिपात करते हुये विवेचन करना यहाँ लेखक का अभिप्रेत है। उत्तरप्रदेश के जनपद फरुखाबाद की तहसील कायमगंज से १० कि.मी.दूर गंगा नदी के तट पर काम्पिल्य नगरी बसी है। कम्पिल या काम्पिल्यापुरी, भारत के अतिप्राचीन सोलह नगरों में से एक थी। वेदों में भी इसका वर्णन है।

माध्यान्दिन संहिता [३] में काम्पिल्य शब्द अम्बा, अम्बालिका के साथ आया है

अम्बे आम्बिके अम्बालिके न मानयति कश्वन।
स सत्यश्यक: सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्।।

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पांचाल का प्राचीन नाम क्रिवि था तथा परिचक्रा एवं कम्पील रुप में भी वर्णन मिलाता है।  पांचाल राजाओं में वैत्य, दुर्मुख, शोभ और प्रवाहण जैवालिका का नाम मिलता है।काम्पिल्य का नाम तैत्तरीय: संहिता (७ /४/१९११), मैत्रायिणी संहिता (३/१०/२०) काठक संहिता आश्व मिधिक (४/८),माध्यान्दिन संहिता (३३/१८), तैत्तरीय ब्राहण (३/९/६) शतपथ ब्राह्मण (१३ / २ / ८३) आदि में देखने को मिलता है। उपनिषद् साहित्य में वृहदारण्यक उपनिषद (६/१/१) छांदीग्य उपनिषद् ५/३११) तधा सारसायन श्रोतसूत्र (१२/१३/६) में भी वर्णन मिलता है। महाकवि वाल्मीक ने (स—२३) ब्रह्मदत्त के प्रसंग में काम्पिल्य का वर्णन किया है। महाभारत (अध्याय ९८, पृष्ठ ८१/८२) के पर्व—१२८ में भी वर्णन है। काम्पिल नगरी अति सुन्दर थी तथा गंगा किराने स्थित थी।

माकंदि नाम गंगाया स्तीरे जनपदं युतं।
सोउध्यावसद दीनमना काम्पिल्यच्च पुरोत्तमम्।।

अष्टध्यायी पर वामन जयादित्य ने कशिका वृत्ति लिखी। इस वृत्ति से स्पष्ट है कि काम्पिल्य तथ संकाश्य पास—पास बसे थे या एक ही बड़े शहर में थे। चीनी त्रिपिटक साहित्य में लिखा है कि भगवान बुद्ध ने काम्पिल्य और संकाश्य में विहार किया। तेशोत्रिपिटिक (पृष्ठ २२/७ भाग ४२) में इसका उल्लेख है। इस तथ्य की पुष्टि प्रो—हाजिमेनाकामुरा ने अपने शोध ग्रंथ में की है।[५] संकाश्य बौद्धमत का तीर्थस्थल है। आज भी सैकड़ों तीर्थयात्री देश—विदेश से यहाँ आते हैं। आगरा—फरूखाबाद, ब्रांच रेवले लाईन पर मखना रेल्वे स्टेशन से ८ कि.मी. दूर सराय अगहत गाँव के पास संकाश्य के खंडहर, भग्नावशेष आज भी देखने को मिलते हैं। बुद्ध विहार के प्रमाण एवं साक्ष्यों को देखते हुये भारत एवं उ.प्र. शासन ने काम्पिल्य एवं संकाश्य दोनों ही स्थानों को अपने संरक्षण में ले लिया है।

महासती द्रोपदी का जन्म एवं स्वयंवर यहीं हुआ था, जिसकी याद यहाँ स्थित द्रोपदी—कुण्ड आज भी हमें दिला रहा है। महान् तपस्वी कपिल मुनि का आश्रम भी यहीं था तथा मुनि श्री ने तपस्या भी यहीं की थी। कपिल मुनि आश्रम और उसके प्राचीन भग्नावशेष इसके साक्ष्य है। यहाँ अतिप्राचीन दो जैन मंदिर हैं तथा कुछ जैन मूर्तियों सहित खंडहर भी है द्रोपदी कुण्ड पर हर वर्ष मेला लगता है। श्रीलंका से लाये शिव लिंग की स्थापना शत्रुध्न ने यहाँ की थी, जो वत्र्तमान में रामेश्वरम् मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर दक्षिण शैली का है।

प्राय: सभी पुराणों में पांचाल तथा काम्पिल्य दोनों का ही उल्लेख है। श्रीमद् भागवत् में लिखा है कि राजा भृम्यश्य के पुत्र का नाम काम्पिल्य थ। उसी के नाम पर नगर का नाम काम्पिल्य रखा गया था। कथित काम्पिल्य राजकुमार के पांचालादिक पाँच पुत्र थे जिन्होंने इस प्रदेश को विजय किया तथा उसी के नाम से यह प्रदेश पांचाल कहलाया कर्निंधम का मत है कि क्रिवि, तुरुव, सम केसिन, शृंतयस, और इक्ष्वाकु इन पांच क्षत्रियों के कारण यह देश पांचाल कहलाया।

बौद्ध साहित्य के अनुसंधान से ज्ञात होता है कि भगवान बुद्ध के जन्म से पहले सोलह महा जनपद विद्यमान थे मगध, कौशल, वत्स अवंति, काशी, अंग चेदि, कुरु, पांचाल, मत्स्य शूरसेन, अश्यमक, गान्धार, काम्बोज, वैन्जैन तथा मल्ल। पांचाल दो भागों में विभक्त हो चुका था। उत्तर पांचाल तथा दक्षिण पांचाल उत्तर पांचाल की राजधानी, अहिच्छत्रपुर (जैन तीर्थ) तथा दक्षिण पांचाल की राजधानी, काम्पिल्य थी। वृहज्जातक की महधीर टीका में कम्पिल्ला का सन्निवेश काययित्थिक बताया है। काययित्थिक आज वैथिया नाम के प्रसिद्ध है जो कम्पिला से २०/२१ मील दूर है। वाराणसी उस समय व्यापार का बड़ा केन्द्र था। कम्बोज, काम्पिल्य, कौशल, कुरुक्षेत्र कुरु कुशीनारा, कौशम्बी, मिथिला पांचाल, सिन्ध, उज्जैन, विदेह, आदि के साथ बनारस का व्यापारिक सम्बन्ध था।

जैन साहित्य में काम्पिल्य का वर्णन बड़ा मनोहारी एवं प्राचीन है। जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर श्री विमलनाथ स्वामी के चार कल्याण गर्भ, जन्म, तप एवं ज्ञान काम्पिल्य में ही हुये।

विमलनाथ पुराण में इसका नाम कम्पिला लिखा है

तंत्रैय कंम्पिला नाम्ना विद्यते परमापुरी।
दोषमुक्ता गुणैक्र्युता धनाढ्या स्वर्ण सगृहा।।

काम्पिल्य में इक्वाकुवंश के कृत वर्मा नामक शासक थे उनकी पत्नी का नाम जय श्यामा था। तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ का जन्म उन्हीं के गर्भ से हुआ था। ई. पू. चौथी शती की विमलनाथ की प्रतिमा गंगा नदी से निकली थी जो मूल वेदी पर विराजमान है। अंतिम तीर्थंकर भ.महावीर ने संसार से विरक्त होकर कठोर साधना की तथा जीवों के उद्धार के लिये उद्बोधन किया। इस काम्पिल्य नगरी में भगवान महावीर का पदार्पण भी हुआ था उनका समोशरण भी आया था। तेईसवें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ का बिहार भी इस नगरी में हुआ था।

यहाँ प्रति वर्ष दिगम्बर जैन मेला एवं रथयात्रा महोत्सव प्रथम चैत्रवदी अमावस्या से चैत्र सुदी चौथ तक तथा दूसरा महोत्सव क्वांर वदी २ से वदी ४ तक सदियोें से हो रहे हैं। वाराह मिहिर (५०५ ई.) जैन मतावलम्बी ज्योतिष शास्त्री थे, इन्होंने अपने ग्रंथ वृहज्जातक में लिख है——

‘‘आदित्य दास तनय स्त दवाप्त बोध: काम्पिल्यके सवितृलब्ध्वरप्रसाद आवन्ति को मुनिमलन्य वलोक्य सम्यग्धोरं वाराहमिहिरो रुचिरांचकार।।

काम्पिल्य में सूर्य से वर प्राप्त करके अपने पिता से ज्योतिष शास्त्र की शिक्षा ली। उनके ग्रंथ वृहज्जातक, लघुजातक, विवाह पटल, योग यात्रा, समास संहिता कहे जाते हैं। वाराह मिहिर भारतीय ज्योतिष के निर्माता माने जाते हैं। पाश्चात्य विद्धानों का कथन है कि वाराहमिहिर ने भारत की ज्योतिष को केवल ग्रह नक्षत्र तक ही सीमित नहीं रखा वरन् मानव जीवन के साथ विभिन्न पहलुओं द्वारा व्यापकता बतायी तथा जीवन के आलोच्य विषयों की व्याख्यायें की।[६] जैन मंदिर में अनेक अतिप्राचीन पांडुलिपियाँ शोधार्थियों की बाट जोह रहीं हैं। पुरातन खंडहर के रूप में एक संग्रहालय भी है जहाँ अनेक शिलालेख जैन मूर्तियों और प्राचीन ग्रंथ हैं, लेकिन इसकी व्यवस्थित सूची भी नहीं है। काम्पिल का वर्णन उत्तर पुराण, (पर्व—५९) तथा हरिवंश पुराण, (सर्ग—६०) में मनोरम ढँग से मिलता है। हरिवंश पुराण में द्रुपद को मारुंदी नामक नगर का शासक लिखा है। इससे प्रतीत होता है कि संभवत: किसी काल में इसका नाम माकन्दी भी प्रसिद्ध रहा हो।

प्राप्ता मार्गवशद्धिश्वे माकंदी नगरी दिब:।
प्रतिष्छंदा स्थिति दिव्या दधाना देववि भ्रया:।।१२०।।
द्रपदोउस्थास्तदा भूप स्तस्थ भोगवती प्रिया।
धृष्ट द्युम्नादय: पुत्रा प्रत्येक दृष्तशक्तया:।।१२१।।

महाभारत आदिपर्व (सर्ग १२८/३) में काम्पिल्य तथा मांकदी दो शब्द देखने को मिलते है:—

माकंदी अथ गंगायास्तीरे जनपद युतं।
सोध्यावसद दीन मना: काम्पिन्ल्यच्च पुरोत्तमम्।।

भीमदेव बदोला ने चालुकवंश प्रदीप में लिख है कि अंबुदगिरि के महायज्ञ से उत्पन्न सोलंकी वंश के मूल पुरुष माण्डत्य हारीत ने सोरों (एटा) में आकर महान तपस्या की। यहाँ पर काम्पिल्य के राजा शशिशेखर से उनका परिचय हुआ। शशिशेखर ने हारीत आतिवंश का श्रेष्ठ क्षत्रिय जानकर अपने साथ काम्पिल्य ले जाकर अपनी कन्या वारमति का उनके साथ विवाह संस्कार कर दिया। शशिशेखर के कोइ अन्य संतान नहीं थी अत: कुछ काल पश् चात् हारित को ही राज्य दे दिया। हारीत के बैन नाम चक्रवर्ती तेजस्वी पुत्र हुआ जिसने अंग, कलिंग, बंग मगध, पाटिल, कन्नोज अवध, प्रयाग, उड़ीसा तथा इन्द्रप्रस्थ को भी विजय किया। बैन ने अतिरंजीपुर नामक नगर भी स्थापित किया। उपर्युक्त गंथ के आधार पर सोलंकी वंश का मूल स्थान सूकर क्षेत्र (सोरों प्रतीत होता है। सौभाग्य विजय जी कृत ‘‘तीर्थ माला’’ (हस्तलिखित स्व. अगरचंद नाहटा संग्रहालय, बीकानेर) में काम्पिल्य का वर्णन है तथा पटियाली के पास इसे बताया है पटियाली एटा में ऐतिहासिक स्थान है।

‘‘जिहां अयोध्या थी पश्चिमदिशिं, जहां काम्पिल्लपुर छैढाय।
जिहाँ विमल जन्म भूमि जाणओ, जिहां पीटमारी वही जाय।।

जिहां व्रेह्यदत्त चक्री इसां, जिहां चुलणी ना चारित होय।
जिहां केसर वन मृग क्रीड़तो, जिहां संजय राजा जोय।।

जिहां गर्दमिल्ल गुरु व संती जिहां गंगा तट व्रतसार।
जिहां उत्तराध्याय ने जाण जो जिहां द्रुपदी पीहर वासा।।

 

उपर्युक्त प्रमाणों, संदर्भों से स्पष्ट है कि काम्पिल्य (वत्र्तमान कम्पिल) ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से कन्नोज, अहिच्छपुर, हस्तिनापुर नगरों से किसी भी प्रकार न्यून नहीं है। आज आवश्यकता है काम्पिल्य के पुरातत्व में गहरे जाने की, तथा शोधकणों का मंथन करके अमृततत्व को सामने लाने की।

साभार –  इन्साइक्लोपीडिया ऑफ जैनिज्म में प्रकाशित आलेख

सन्दर्भ –

  1.  Studies in the Geography of Ancient $ Medieval India, P-12
  2. महाभारत—आदिपर्व, अध्याय १४, पृ.८१—८२, गीता प्रेस, गोरखपुर
  3.  माध्यन्दिन संहिता, २३/१८
  4. शतपथ ब्राह्मण, १३/५/४—७
  5.  A commentary on the satastra I/II Taisho Tr-Vol 42, P/244 By Prof. Hozime Nakamura, Tokyo-Japan
  6.  भारतीय ज्योतिष, डॉ. नेमीचंद जैन, शास्त्री, पृ. १२६, भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली

 

स्त्री का पत्र

– रवीन्द्र नाथ टैगोर


पूज्यवर,
आज पन्द्रह साल हुए हमारे ब्याह को। हम तब से साथ ही रहे। अब तक चिट्ठी लिखने का मौका ही नहीं मिला। तुम्हारे घर की मझली बहू जगन्नाथपुरी आई थी, तीर्थ करने।

आई तो जाना कि दुनिया और भगवान् के साथ मेरा एक और नाता भी है इसलिए आज चिट्ठी लिखने का साहस कर रही हूँ. इसे मझली बहू की चिट्ठी न समझना।

वह दिन याद आता है, जब तुम लोग मुझे देखने आए थे. मुझे बारहवां साल लगा था।

सुदूर गांव में हमारा घर था। पहुँचने में कितनी मुश्किल हुई तुम सबको। मेरे घर के लोग आव-भगत करते-करते हैरान हो गए।

विदाई की करूण धुन गूंज उठी। मैं मझली बहू बनकर तुम्हारे घर आई। सभी औरतों ने नई दुल्हन को जाँच परखकर देखा। सबको मानना पड़ा – बहू सुन्दर है।
मैं सुन्दर हूँ, यह तो तुम लोग जल्दी भूल गए पर मुझ में बुद्धि है, यह बाद तुम लोग चाहकर भी न भूल सके। माँ कहती थी, औरत के लिए तेज दिमाग भी एक बला है।

लेकिन मैं क्या करूं। तुम लोगों ने उठते बैठते कहा, “यह बहू तेज है।”

लोग बुरा भला कहते हैं सो कहते रहें। मैंने सब साफ कर दिया।

मैं छिप-छिपकर कविता लिखती थी। कविताएँ थीं तो मामूली, लेकिन उनमें मेरी अपनी आवाज थी। वे कविताएँ तुम्हारे रीति रिवाजों के बन्धनों से आजाद थीं।

मेरी नन्हीं बेटी को छीनने के लिए मौत मेरे बहुत पास आई। उसे ले गई पर मुझे छोड़ गई। माँ बनने का दर्द मैंने उठाया, पर माँ कहलाने का सुख न पा सकी।

इस हादसे को भी पार किया। फिर से जुट गई रोज-मर्रा के काम-काज में। गाय-भैंस, सानी-पानी में लग गई। तुम्हारे घर का माहौल रूखा और घुटन भरा था। यह गाय-भैंस ही मुझे अपने से लगते थे। इसी तरह शायद जीवन बीत जाता।

आज का यह पत्र लिखा ही नहीं जाता लेकिन अचानक मेरी गृहस्थी में जिन्दगी का एक बीज आ गिरा। यह बीज जड़ पकड़ने लगा और गृहस्थी की पकड़ ढीली होने लगी। जेठानी जी की बहन बिन्दू, अपनी माँ के गुजरने पर, हमारे घर आ गई।

मैंने देखा तुम सभी परेशान थे। जेठानी के पीहर की लड़की, न रूपवती न धनवती। जेठानी दीदी इस समस्या को लेकर उलझ गई एक तरफ बहन का प्यार तो एक तरफ ससुराल की नाराजगी।

अनाथ लड़की के साथ ऐसा रूखा बर्ताव होते देख मुझसे रहा न गया। मैंने बिन्दू को अपने पास जगह दी। जेठानी दीदी ने चैन की सांस ली। अब गलती का सारा बोझ मुझ पर आ पड़ा।

पहले-पहले मेरा स्नेह पाकर बिन्दू सकुचाती थी पर धीरे-धीरे वह मुझे बहुत प्यार करने लगी। बिन्दू ने प्रेम का विशाल सागर मुझ पर उड़ेल दिया। मुझे कोई इतना प्यार और सम्मान दे सकेगा, यह मैंने सोचा भी न था।

बिन्दू को जो प्यार दुलार मुझसे मिला वह तुम लोगों को फूटी आँखों न सुहाया। याद आता है वह दिन, जब बाजूबन्ध गायब हुआ। बिन्दू पर चोरी का इल्जाम लगाने में तुम लोगों को पलभर की झिझक न हुई।

बिन्दू के बदन पर जरा सी लाल घमोरी क्या निकली, तुम लोग झट बोले- चेचक. किसी इल्जाम का सुबूत न था। सुबूत के लिए उसका ‘बिन्दू’ होना ही काफी था।

बिन्दू बड़ी होने लगी। साथ-साथ तुम लोगों की नाराजगी भी बढ़ने लगी। जब लड़की को घर से निकालने की हर कोशिश नाकाम हुई तब तुमने उसका ब्याह तय कर दिया।

लड़के वाले लड़की देखने तक न आए। तुम लोगों ने कहा, ब्याह लड़के के घर से होगा। यही उनके घर का रिवाज है।

सुनकर मेरा दिल काँप उठा। ब्याह के दिन तक बिन्दू अपनी दीदी के पाँव पकड़कर बोली, “दीदी, मुझे इस तरह मत निकालो. मैं तुम्हारी गौशाला में पड़ी रहूँगी। जो कहोगी सो करूंगी…।”

बेसहारा लड़की सिसकती हुई मुझसे बोली, “दीदी, क्या मैं सचमुच अकेली हो गई हूँ?”

मैंने कहा, “ना बिन्दी, ना. तुम्हारी जो भी दशा हो, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।” जेठानी दीदी की आँखों में आँसू थे। उन्हें रोककर वह बोलीं, “बिन्दिया, याद रख, पति ही पत्नी का परमेश्वर है।”

तीन दिन हुए बिन्दू के ब्याह को। सुबह गाय-भैंस को देखने गौशाला में गई तो देखा एक कोने में पड़ी थी बिन्दू। मुझे देख फफककर रोने लगी।

बिन्दू ने कहा कि उसका पति पागल है। बेरहम सास और पागल पति से बचकर वह बड़ी मुश्किल से भागी।

गुस्से और घृणा से मेरे तनबदन में आग लग गई। मैं बोल उठी, “इस तरह का धोखा भी भला कोई ब्याह है? तू मेरे पास ही रहेगी। देखूं तुछे कौन ले जाता है।”

तुम सबको मुझ पर बहुत गुस्सा आया. सब कहने लगे, “बिन्दू झूठ बोल रही है।” कुछ ही देर में बिन्दू के ससुराल वाले उसे लेने आ पहुँचे.

मुझे अपमान से बचाने के लिए बिन्दू खुद ही उन लोगों के सामने आ खड़ी हुई। वे लोग बिन्दू को ले गए। मेरा दिल दर्द से चीख उठा।

मैं बिन्दू को रोक न सकी। मैं समझ गई कि चाहे बिन्दू मर भी जाए, वह अब कभी हमारी शरण में नहीं आएगी।

तभी मैंने सुना कि बड़ी बुआजी जगन्नाथपुरी तीर्थ करने जाएंगी. मैंने कहा, “मैं भी साथ जाऊँगी.” तुम सब यह सुनकर बहुत खुश हुए।

मैंने अपने भाई शरत को बुला भेजा. उससे बोली, “भाई अगले बुधवार मैं जगन्नाथपुरी जाऊँगी. जैसे भी हो बिन्दू को भी उसी गाड़ी में बिठाना होगा.”

उसी दिन शाम को शरत लौट आया। उसका पीला चेहरा देखकर मेरे सीने पर सांप लोट गया। मैंने सवाल किया, “उसे राज़ी नहीं कर पाए?”

“उसकी जरूरत नहीं। बिन्दू ने कल अपने आपको आग लगाकर आत्महत्या कर ली।” शरत ने उत्तर दिया। मैं स्तब्ध रह गई।

मैं तीर्थ करने जगन्नाथपुरी आई हूँ। बिन्दू को यहाँ तक आने की जरूरत नहीं पड़ी लेकिन मेरे लिए यह जरूरी था।

जिसे लोग दुःख-कष्ट कहते हैं, वह मेरे जीवन में नहीं था। तुम्हारे घर में खाने-पीने की कमी कभी नहीं हुई। तुम्हारे बड़े भैया का चरित्र जैसा भी हो, तुम्हारे चरित्र में कोई खोट न था। मुझे कोई शिकायत नहीं है।

लेकिन अब मैं लौटकर तुम्हारे घर नहीं जाऊँगी। मैंने बिन्दू को देखा। घर गृहस्थी में लिपटी औरत का परिचय मैं पा चुकी। अब मुझे उसकी जरूरत नहीं। मैं तुम्हारी चौखट लांघ चुकी। इस वक्त मैं अनन्त नीले समुद्र के सामने खड़ी हूँ।

तुम लोगों ने अपने रीति-रिवाजों के पर्दे में मुझे बन्द कर दिया था। न जाने कहाँ से बिन्दू ने इस पर्दे के पीछे से झांककर मुझे देख लिया और उसी बिन्दू की मौत ने हर पर्दा गिराकर मुझे आजाद किया। मझली बहू अब खत्म हुई।

क्या तुम सोच रहे हो कि मैं अब बिन्दू की तरह मरने चली हूँ। डरो मत. मैं तुम्हारे साथ ऐसा पुराना मजाक नहीं करूंगी।

मीराबाई भी मेरी तरह एक औरत थी। उसके बन्धन भी कम नहीं थे। उनसे मुक्ति पाने के लिए उसे आत्महत्या तो नहीं करनी पड़ी। मुझे अपने आप पर भरोसा है। मैं जी सकती हूँ। मैं जीऊँगी।

तुम लोगों के आश्रय से मुक्त,
मृणाल.

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घर तो आपका भी है तो घर के काम क्यों नहीं?     

बात जब भी घर की होती है तो सबका ध्यान लड़कियों पर जाता है, आपका भी जाता होगा। आपको एक गिलास पानी की भी उम्मीद अपने घर की किसी महिला से होगी या आपने अपनी बहनों को यह सुनते हुए देखा होगा कि उनको घर के कामकाज पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि वे पराया धन हैं और आप इत्मिनान से आगे भी बढ़ गये होंगे। लड़कों की परवरिश भी यह कहकर की जाती है कि कोई आएगी जो उनका ध्यान रखेगी…उनके सारे काम यहाँ तक कि निजी काम भी करेगी और आप ये सोच लेते हैं कि ये आपके निजी काम यानि खाना बनाने से कपड़े धोने तक की जिम्मेदारी आपकी बहन, पत्नी, माँ या बेटी उठा लेगी या उसे उठा लेनी चाहिए क्योंकि यही होता आया है और इस रवैये ने ही आपको एक आम इन्सान की जगह बादशाहत वाली सोच दी होगी मगर रुकिए क्योंकि जब आप यह सोच रखते हैं तो घर में रहते वो अधिकार भी आपसे छूट रहे होते हैं। कई मामलों में तो आप चाहकर भी नहीं बोल पाते क्योंकि ये औरतों का मामला है और कुछ गलत देखते हैं तो भी हस्तक्षेप नहीं कर पाते…।

क्या आपको नहीं लगता कि पूरी तरह निर्भर हो जाना आपको घर और परिवार से दूर करता है। आप चाहें भी तो बच्चों के साथ खुलकर जीवन का आनंद नहीं उठा सकते। उनके साथ वक्त नहीं बिता पाते और न ही इसके लिए पत्नी से शिकायत कर सकते हैं क्योंकि ये स्थिति तो आपने ही बनायी है।

कई बार आपको लगता होगा कि जब घर के पुरुष कमाते हैं वे बाहर काम करते हैं तो महिलाओं को ही घर का काम करना चाहिए मगर आपकी यह सोच आपको अकेला करती है। आज की महँगाई के जमाने में गृहस्थी की गाड़ी अकेले खींच लेना आसान नहीं है मगर आपकी सोच ने आपको अकेला कर दिया और आप चाहें भी तो किसी की मदद नहीं ले पाते। ऐसा सबके साथ तो नहीं है। अपनी असुरक्षा के कारण आपका अधिकतर समय अपने घर की महिलाओं की निगरानी में जब बीतता है तो उससे आपकी उर्जा और समय भी खर्च होता है। इसका सीधा असर आपके काम पर पड़ता है और जब आप उनको नियंत्रित करना चाहते हैं तो खुद ही बँध भी जाते हैं और इसका असर आपके काम पर पड़ना तय है क्योंकि जब महिलाएँ निर्भर होंगी तो उनका छोटे से छोटा काम भी आपके ही सिर पर पड़ेगा जबकि इसकी कोई जरूरत ही नहीं है। दूसरी बात अगर योग्य हो भी गईं तो शादी के बाद अक्सर उनकी नौकरी छुड़वा दी जाती है। ऐसा करके आप अपनी बेटी या बहन का ही नहीं अपना भविष्य भी दाँव पर लगाते हैं क्योंकि देर –सवेर उसके प्रोमोशन का लाभ भी आपको ही मिलता और उसके साथ आपके रिश्ते मजबूत होते सो अलग।अगर नौकरी नहीं छुड़वाई तो घर और ऑफिस दोनों का काम महिलाओं को ही करना पड़ता है और आपको अपना वक्त अकेले बिताना पड़ता है।

ग्लोबल ट्रेंड्स सर्वे 2017 के मुताबिक 64 प्रतिशत पुरुषों का अभी भी मानना है कि महिलाओं को घर के कामकाज तक ही सीमित रहना चाहिए। महिलाएं हफ्ते में कम से कम 33 घंटे तक घर के कामकाज करती हैं। अक्सर आप लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि उनसे पूछा जाए तो वे घर का काम करेंगे लेकिन ऐसा होता नहीं है। ज्यादातर लोग पूछे जाने पर जरूरी काम निपटाने का बहाना करके खिसक लेते हैं और भारतीय पुरुष तो अपनी रूढ़िबद्ध सोच के कारण एक गिलास पानी लेना भी अपनी तौहीन समझते हैं। दरअसल, उनकी परवरिश ही इसी सोच के साथ की गयी है और यह एक बड़ा कारण है। हमें यह समझना होगा कि घर पर काम कर रही महिलाएं भी काम करती हैं। उनके काम को भी सम्मान के साथ देखना चाहिए और जरूरत पड़ने पर बिना कहे हाथ बटाना चाहिए। इसी तरह जहां घरेलू काम करने वाली महिलाओं को अपने काम को हीन भावना से नहीं देखना चाहिए उसी नौकरी करने वाली महिलाओं को भी खुद पर गर्व नहीं करना चाहिए।

काम है तो उसे सबको मिलकर निपटाना चाहिए. पति और पत्नी दोनों को मिलकर जल्दी काम निपटाना चाहिए जिससे वे जल्दी से एक दूसरे के साथ पर्याप्त समय बिता सकें और एक-दूसरे से जी भरके बात कर सकें। देखिएगा आपकी जिन्दगी में एक खूबसूरत संतुलन होगा और आत्मसंतुष्टि भी होगी।

 

गर्मियों में तरोताजा रखेंगे ये पेय

पुदीना मसाला छाछ

सामग्री : एक कप दही, एक छोटी कटोरी पुदीना पत्ती, एक छोटी कटोरी धनिया पत्ती
दो बारीक कटी हरी मिर्च, एक छोटा चम्मच काला नमक, एक छोटा चम्मच भुना जीरा पाउडर, एक छोटा चम्मच चाट मसाला, पानी आवश्यकतानुसार

विधि :  सबसे पहले पुदीना पत्ती और धनिया पत्ती को धोकर बारीक काट लें। अब एक बर्तन में सभी सामग्री डालकर अच्छे से मिक्स कर लें। मिश्रण को अच्छी तरह पीस लें। इसे तब तक अच्छे से फेंटते रहें जब तक कि यह पूरी तरह से मिक्स न हो जाए। तैयार है मसाला छाछ । कुछ देर फ्रिज में रखकर ठंडा-ठंडा सर्व करें। आप आपने स्वादानुसार नमक कम ज्यादा कर सकती हैं।

 

 

लेमन स्क्वाश

 

सामग्री : दो छोटा चम्मच नींबू का रस, चार कप पानी, दो कप चीनी, आधा चम्मच नींबू का एसेंस, कुछ बूंदे नींबू का रंग

विधि : लेमन स्क्वैश बनाने के लिए मीडियम आंच में एक बर्तन में पानी गरम होने के लिए रख दें। चीनी डालकर पानी को पकने के लिए छोड़ दें. पानी को तक तक खौलाते रहें जब तक कि चीनी पानी में घुल ना जाए। जब सारी चीनी घुल जाए तो आंच बंद कर दें और कुछ देर ठंडा होने के लिए छोड़ दें।  अब ठंडी चाशनी- में रंग और एसेंस मिलाकर कुछ देर के लिए रख दें। लेमन स्क्वैश तैयार है इसे एक बोतल में भर कर फ्रीज में रख लें।

 

 

भोजपुरी, मगही व मैथिली का हिन्दी में अनुवाद हुआ आसान

वाराणसी : अंग्रेजी से हिन्दी या हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद की सुविधा तो गूगल पर उपलब्ध है, अगर भोजपुरी व मगही बोलियों या फिर मैथिली भाषा का हिंदी में अनुवाद करना हो तो इस मामले में शायद गूगल फेल हो सकता, लेकिन अब आपको अधिक चिंतित होने की जरूरत नहीं है। दरअसल, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बीएचयू ने भोजपुरी व मगही बोलियों और मैथिली भाषा बोलने वालों की इस परेशानी का समाधान कर दिया है। यहां की टीम ने एक वेबसाइट (मशीन अनुवाद सिस्टम) तैयार की है, जिसके जरिये आसानी से हिंदी में अनुवाद किया जा सकता है।

जबरन शादी पर सुप्रीम कोर्ट ने बेटी से कहा, मां-बाप और पति से तोड़ दो नाता

नई दिल्ली : कर्नाटक के एक प्रभावी राजनेता की बेटी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जबरन शादी के मामले में सुनवाई करते हुए कर्नाटक पुलिस को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि वह अपनी जिंदगी को अपनी मर्जी से जीने के लिए आजाद है।

26 साल की महिला अपने घर से भाग गई थी। उसने शिकायत की थी कि उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके माता-पिता ने जबरन उसकी शादी करवा दी है। रिकॉर्ड्स में राजनेता की बेटी का नाम एक्स के तौर पर दर्ज है। महिला ने कोर्ट को बताया कि वह किसी और लड़के से शादी करना चाहती थी जो कि दूसरी जाति से ताल्लुक रखता है। याचिका में महिला का कहना था कि वह बेंगलुरू वापस जाना चाहती है क्योंकि उसे इंजीनियरिंग में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करनी है।

वह 20 दिन पहले गुलबर्गा के अपने माता-पिता के घर से भाग गई थी। कोर्ट जाने के कुछ घंटों बाद ही महिला दिल्ली महिला आयोग के संरक्षण में रह रही थी और उसे दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा मुहैया कराई थी। महिला ने अपनी वकील इंदिरा जयसिंह के जरिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

इस मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा सहित जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा कि आप व्यस्क हैं। आपकी जहां मर्जी हो, वहां जा सकती है और जो पढ़ाई करना चाहती हैं, स्वंतत्रतापूर्वक कर सकती हैं।

वकील ने कहा कि उसे माता-पिता और ससुराल वालों के अलावा किसी भी अत्याचारी कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा मुहैया करवाई जाए। इसके बाद बेंच ने आदेश दिया कि वह अपनी मर्जी से किसी भी स्थान पर जा सकती है। महिला ने कोर्ट को बताया कि 14 मार्च को जबरन शादी करने के लिए उसके माता-पिता और भाई ने शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताणित किया था।

एक अंक की लड़ाई, छात्रा को जाना पड़ा हाईकोर्ट, अब मिलेगा लैपटॉप

उज्जैन : जिले की एक छात्रा को एमपी बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में एक अंक हासिल करने के लिए हाईकोर्ट तक जाना पड़ गया। छात्रा ने कानूनी लड़ाई लड़ी और आखिरकार अदालत से न्याय मिला। दरअसल, एक अंक कम होने से छात्रा सरकार की ओर से मिलने वाली लैपटॉप की राशि से वंचित हो गई थी। अब उसे 25 हजार स्र्पए लैपटॉप खरीदने के लिए प्रदान किए जाएंगे।

मामला उज्जैन जिले की तराना तहसील के प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी हायर सेकंडरी स्कूल का है। छात्रा सोफिया गौरी खान ने वर्ष 2016-17 में हायर सेकंडरी की परीक्षा में 500 में से 424 अंक हासिल किए थे। महज एक अंक से वह प्रदेश सरकार से लैपटॉप की राशि पाने से वंचित रह गई थी। दरअसल, लेपटॉप के लिए 85 फीसदी अंक अनिवार्य हैं।

सोफिया ने पुनर्गणना और पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया। उसे उम्मीद थी कि इससे कम से कम 5 अंक अधिक मिल जाएंगे। हालांकि नतीजा सिफर रहा। इस पर सोफिया ने अभिभावकों की मदद से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई करने के बाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि छात्रा की कॉपी पुन: जांची जाए।

पुन: कॉपी जांचने पर अर्थशास्त्र विषय में उसे एक अंक अधिक मिला। अब उसे सरकार की ओर से लैपटॉप राशि प्रदान करने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। सोफिया बताती है कि पुनर्गणना, पुनर्मूल्यांकन सहित कोर्ट जाने में लैपटॉप के लिए मिलने वाली करीब आधी राशि खर्च हो गई है। हालांकि सुकून इस बात का है कि देरी से ही सही न्याय मिला।

इस साल दो से चार प्रतिशत घट जाएगी आभूषण की मांग : रिपोर्ट

मुम्बई : कमजोर वित्तपोषण माहौल और सोने की अधिक कीमत होने के कारण चालू कैलेंडर वर्ष में स्वर्ण आभूषण की मांग में दो से चार फीसदी की गिरावट आ सकती है। एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है।

साख निर्धारिक एजेंसी इक्रा ( आईसीआरए ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि समीक्षाधीन वर्ष में हालांकि मूल्य के संदर्भ में , सोने के आभूषणों की मांग पांच से सात प्रतिशत बढ़ने की संभावना है।

इक्रा के उपाध्यक्ष के श्रीकुमार ने कहा , ” वर्ष 2018 में मांग के दो से चार प्रतिशत कम होने की संभावना है। पिछले तीन महीनों में सोने की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई है और इसके साथ पर्व त्योहार जैसे शुभ दिनों की संख्या कम होने से आभूषणों की मांग प्रभावित हुई है। इसके अलावा , इस क्षेत्र के लिए कुछ कर्जदारों द्वा रा धोखाधड़ी की खबरों के बाद हाल के महीनों में रत्नों एवं आभूषणों क्षेत्र के लिए कर्ज प्रक्रिया को सख्त किया गया है।’’ उन्होंने कहा , परिसंपत्तियों और देनदारियों के निरीक्षण की बढ़ी हुई प्रक्रिया तथा रिण गुणवत्ता और भंडारण गुणवत्ता पर अंकुशों के कारण बैंकों द्वारा इस क्षेत्र में अधिक सतर्कता बरती जा रही है।

श्रीकुमार ने कहा , ” हमारा अनुमान है कि कर्ज उपलब्धता को सख्त किये जाने से आभूषण खुदरा विक्रेताओं , विशेष रूप से असंगठित लोगों की कार्यशील पूंजी की स्थिति प्रभावित होगी।” हालांकि , मध्यम से दीर्घ अवधि (3-5 साल ) में , इक्रा को उम्मीद है कि स्वर्ण आभूषण खुदरा उद्योग में मात्रा के स्तर पर छह से सात प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जाएगी। इस वृद्धि में स्थिर ग्रामीण एवं शादी विवाह की मांग , सोने के प्रति पारंपरिक लगाव , बढ़ती खर्चयोग्य आय इत्यादि का भी योगदान होगा।