Saturday, April 11, 2026
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महज अंकों के सहारे जीवन का युद्ध नहीं जीता जा सकता

ये दौर प्रतियोगिता का दौर है और गलाकाट प्रतियोगिता का दौर है जो कि परीक्षाओं से होकर गुजरती हैं। अधिक से अधिक प्रतिशत अंक देकर उदार बनने की होड़ हर बोर्ड में लगी है और सीआईएससीई के बाद सीबीएसई और राज्य के बोर्ड भी दबाव में आकर इसका अनुकरण कर रहे हैं। इससे झोली भर नम्बर तो मिल रहे हैं मगर व्यावहारिक स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रतिभा का आकलन जब उम्मीदों के अनुरूप न हो तो यही अवसाद का कारण भी बन रहा है। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि माता – पिता के लिए बच्चों की शिक्षा और उनके अंक स्टेटस सिम्बल बन चुके हैं और इसके लिए वे अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर इस कदर थोपते हैं कि बच्चों के सपने, उनकी चाह छिल जा रही है और नतीजा यह है कि उनको मौत जिन्दगी से अधिक आसान लग रही है। यहाँ तक कि सुसाइड नोट में भी बच्चों का अपराध बोध पीछा नहीं छोड़ता और ऐसी घटनाएँ देखकर एकबारगी सोचना पड़ जाता है कि क्या माता – पिता वाकई ममता और करुणा को धारण करते हैं? हर साल जाने कितने टॉपर आते हैं और साल भर की चमक के बाद गायब हो जाते हैं। मेरा अनुभव यह है कि अंकों की सफलता का जीवन की सफलता से कोई लेना – देना नहीं है बल्कि जिन बच्चों को स्वाभाविक जीवन मिलता है, उन्मुक्त वातावरण मिलता है, वे बैकबेंचर्स होकर भी सफल हो जाते हैं। यहाँ तक कि असमय स्कूल छोड़ने वालों ने भी सफलता के झंडे गाड़े हैं। अंकों के सहारे जीवन का युद्ध पूरा नहीं जीता जा सकता और न ही यह ज्ञान को परिभाषित करता है। अंक सूचना दे सकते हैं क्योंकि आज की परीक्षाओं में हर चीज ऑब्जेक्टिव है, वे विस्तृत वर्णन या चित्रण करना जानते ही नहीं हैं मगर व्यावहारिक जीवन में आपको इनकी जरूरत पड़ती है।

आपको समझाने और ब्योरा देने की कला आनी चाहिए क्योंकि यह कला, वाणिज्य और विज्ञान, तीनों ही क्षेत्रों में समान रूप से प्रभाव छोड़ता है और आवश्यक भी है इसलिए वर्णनात्मक प्रश्नों का होना बहुत आवश्यक है। मोबाइल और टेलिग्राम के युग में भी अपनी बात समझाने की कला का होना बेहद आवश्यक है। सिद्धांत रट देने से आप प्रभाव नहीं छोड़ सकते। बोर्ड के 99 प्रतिशत अंक भी तब काम नहीं आते। जिनको आप 30 या 40 प्रतिशत अंक के कारण दुत्कारते हैं, जिनका मजाक उड़ाते हैं, कई बार वे बच्चे आपसे आगे निकलने में सक्षम होते हैं। सोशल मीडिया इस बीमारी प्रदर्शन का एक और माध्यम बन गया है। मुझे लगता है कि कम अंक पाने वाले बच्चों को भी सराहा जाना चाहिए और उनको प्रोत्साहन और मार्गदर्शन देने की भी जरूरत है। कम से कम ऐसा करने से शैक्षणिक व सामाजिक पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। बाकी पर्यावरण की सुरक्षा सिर्फ पेड़ लगाकर छोड़ने से सम्भव नहीं है बल्कि छोटी – छोटी आदतों में यह भाव शामिल करने की जरूरत है। इलेक्टॉनिक कचरा और सेनेटरी नैपकिनों के अतिरिक्त अन्य कचरे का प्रबंधन बहुत जरूरी है। बाकी पर्यावरण और समाज दोनों, सुरक्षित रहे…यह दायित्व हमारा ही है।

रंगकृति ने किया खानाबदोश का मंचन

रंगकृति नाट्य संस्था ने पंजाबी लेखिका अजीत कौर की आत्मकथा खानाबदोश के कुछ हिस्सों को नाट्य रूप देकर एकल नाटक के रूप में प्रस्तुत किया । खानाबदोश नारी प्रधान स्वर लेकर लिखी गई अजीत कौर की आत्मकथा है ।यह आत्मकथा साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कृति है । जिसे रंगकृति नाट्य संस्था के निर्देशक जीतेन्द्र सिंह द्वारा प्रस्तुत किया है । महिला आत्मकथा लेखन कई मायने में विवादित रहा ,समाज में बहस का मुद्दा रहा ।इस नाटक के माध्यम से यह मुद्दा फिर से रंगकृति के इस नाटक ने फिर से उठा कर दर्शकों की उत्कंठा बढ़ा दिया है । लगता है लेखिका अपने जीवन के गोपनीय पक्षों को सार्वजनिक कर महिला गरिमा को धक्का पहुंचाती है मर्यादा का उल्लंघन करती है लेकिन सच बयान कर दरअसल समाजिक समस्याओं पर प्रश्न चिन्ह लगाकर पुरुषों को कटघरे में खड़ा करती है । अजीत कौर की स्वोकारोति महिलाओं के बचाव में योग्य ठहरती है । वह एक जगह लिखती हैं कि औरत होना ही सबसे बड़ा गुनाह है,सबसे बड़ा गुनाह है, गुनाह ए अव्वल । इस नाटक में स्त्री पुरूष संबधों की जटिलताओं को बेहतर से समझाने की कोशिश की गयी है कि यह संबध सिर्फ शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं बल्कि यह बताने कोशिश है कि स्त्रियों के जीवन में जीने के लिए सम्मानित जनित विकल्प पर कितना प्रभाव है । अजीत कौर की भूमिका कोलकाता की वरिष्ठ अभिनेत्री निवेदिता भट्टाचार्य ने इस एकल चरित्र को बहुत ही उम्दा तरीके से निभाया है ,दर्शकों में कुछ का कहना था अभी तक का उनके अभिनय में में यह सबसे बेहतरीन अभिनय था । साहित्यिक कृतियाँ जब प्रस्तुत होती है तो जरूर अपना प्रभाव दर्शकों पर छोड़ जाती है । निर्देशक जीतेन्द्र सिंह ने बड़ी बारीकियों के साथ अभिनय करवाया है ।सुमित राय की प्रकाश योजना नाट्य प्रस्तुति को सकून और चरित्र को गति देती है ।

मासिक धर्म के प्रति जागरुक करेगी पहेली की सहेली

मासिक धर्म यानी पीरियड्स पर अब खुलकर बात हो रही है। इसी कड़ी में स्ट्रेफी और यूनिसेफ ने नयी पहल की जिसे पहेली की सहेली का नाम दिया गया है। पिछले 6 साल से इस अभियान के तहत लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान स्वास्थ्य व स्वच्छता के बारे में शिक्षित कर रहा है। यह अभियान खासकर किशोरियों को ध्यान में रखकर चलाया जा रहा है। पहेली की सहेली में माँओं और शिक्षिकाओं को भी ध्यान में रखा गया है। पहेली की सहेली सचित्र फ्लिप बुक है जिसमें 5 मिनट की शॉर्ट फिल्में, रिडल्स और गतिविधि केन्द्रित खेल हैं यानी कहा जा सकता है कि यह मासिक धर्म के प्रति जागरूकता लाने के लिए निर्मित एडुकेशन पैकेज है। एक शोध के अनुसार 93 प्रतिशत लड़कियाँ पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जातीं। इस मौके पर जॉनसन एंड जॉनसन के उपाध्यक्ष (विपणन) डिम्पल सिधर और यूनिसेफ इंडिया की प्रतिनिधि डॉ. यास्मिन अली हक भी शामिल उपस्थित थीं।

कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज में आर्ट एंड क्राफ्ट प्रदर्शनी

कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज में हाल ही में एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसमें छात्राओं और पूर्व छात्राओं ने भी भाग लिया। इस प्रदर्शनी में किताबों से लेकर परिधान और चॉकलेट और फैशन ज्वेलरी, हैंड पेंटेड वस्तुएँ भी रखी गयी थी। प्रदर्शनी में 7 प्रकाशकों की किताबें थीं जिनमें हिन्दी, बांग्ला और अँग्रेजी के भी स्टॉल थे। इसके साथ ही शिक्षक – शिक्षिकाओं द्वारा लिखी गयीं किताबें भी उपलब्ध थीं। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. सत्या उपाध्याय ने बताया कि सीजीसी सहारा नामक प्रदर्शनी से होने वाली आय जरूरतमंद छात्राओं को दी गयी। प्रदर्शनी में ब्लाइंड ब्वायज अकादमी, रामकृष्ण मिशन, नरेन्द्रपुर के अतिरिक्त शांतिनिकेतन, कल्याणी, जलपाईगुड़ी, बारासात और गड़िया के भी लघु उद्यमी शामिल हुए।

मजीठिया पर महाभारत

मीडियाकर्मियों के लिए उचित वेतनमान और दूसरी सहूलियतों के लिए गठित किए गए विभिन्न आयोगों की सिफारिशें अधिकांश मीडिया संस्थान लागू नहीं करते। मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों का भी यही हाल है । इस आयोग की सिफारिशें मीडिया कर्मचारियों के लिए सिर्फ सपना बनकर रह गई हैं, जिसे हकीकत बनाने के लिए तमाम मीडिया मालिकान के खिलाफ मुट्ठी-भर पत्रकार ही संघर्ष कर रहे हैं। न्यायपालिका के सख्त आदेशों के बावजूद मीडिया संस्थान इसे लागू करने में आनाकानी कर रहे हैं। सिफारिशें न लागू करने के हर तरह के हथकंडे संस्थान अपना रहे हैं। मसलन उनके खिलाफ कोर्ट में जाने वाले पत्रकारों का शोषण, कंपनी को छोटी यूनिटों में बांटना, कम आय दिखाना, कर्मचारियों से कांट्रैक्ट साइन करवाना कि उन्हें आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए। इतने झंझावातों के बावजूद पत्रकार अपने हक के लिए लगातार लड़ रहे हैं। हालांकि इस लड़ाई में अभी भी पत्रकारों की एकजुटता काफी कम है. पत्रकारों के लिए दिवतिया आयोग, शिंदे आयोग, पालेकर आयोग, बछावत आयोग, मणिसाना आयोग और उसके बाद मजीठिया वेतन आयोग आया है, जिनका उद्देश्य पत्रकारों को एक समान वेतनमान दिलाना और उनके आर्थिक पहलू को मजबूत करना है। हाल ये है कि आज भी बड़े-बड़े अखबारों में होने वाला सबसे छोटे पद ‘उपसंपादक’ का मासिक वेतनमान 12 से 15 हजार रुपये है, जबकि आयोग की सिफारिशें लागू करने पर यह तनख्वाह कम से कम 35 हजार हो जाएगी।
मजीठिया आयोग ने अखबारी और एजेंसी कर्मियों के लिए 65 प्रतिशत तक वेतन वृद्धि की सिफारिश की है। साथ में मूल वेतन का 40 प्रतिशत तक आवास भत्ता और 20 प्रतिशत तक परिवहन भत्ता देने का सुझाव दिया है, जिसे आज तक मीडिया मालिकों ने लागू नहीं किया. आयोग की सिफारिशों के अनुसार पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों के मूल वेतन और डीए में, 30 प्रतिशत अंतरिम राहत राशि और 35 प्रतिशत वैरिएबल पे को जोड़कर तय किया गया है। समाचार पत्र उद्योग के इतिहास में किसी आयोग ने इस तरह की सिफारिश पहली बार की है। महंगाई भत्ता मूल वेतन में शत प्रतिशत ‘न्यूट्रलाइजेशन’ के साथ जुड़ेगा. ऐसा अब तक केवल सरकारी कर्मचारियों के मामले में होता आया है। वेतन बोर्ड ने 60 करोड़ रुपये या इससे अधिक के सकल राजस्व वाली समाचार एजेंसियों को शीर्ष श्रेणी वाले समाचार पत्रों के साथ रखा है। इस प्रकार समाचार एजेंसी पीटीआई शीर्ष श्रेणी में जबकि यूएनआई दूसरी श्रेणी में है। उदाहरण के अनुसार सिफारिशें लागू हों तो 1000 करोड़ की कंपनी में वरिष्ठ उप संपादक का वेतन 85 हजार से ऊपर हो जाएगा लेकिन इस समय उसे मात्र 17 हजार से 25 हजार के बीच ही वेतन मिल रहा है। इसके अलावा शहरों की श्रेणी के अनुसार पत्रकारों को तमाम दूसरी तरह की सहूलियतें देने की भी सिफारिश की गई हैं.
नवंबर 2011 से लागू करने की बात
सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अखबारों और समाचार एजेंसियों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने का आदेश दिया और कहा कि वे अपने कर्मचारियों को संशोधित पे स्केल के हिसाब से भुगतान करें। न्यायालय के आदेश के अनुसार यह वेतन आयोग 11 नवंबर 2011 से लागू होगा जब इसे सरकार ने पेश किया था और 11 नवंबर 2011 से मार्च 2014 के बीच बकाया वेतन भी पत्रकारों को एक साल के अंदर चार बराबर किस्तों में दिया जाएगा। आयोग की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल 2014 से नया वेतन लागू किया जाएगा। तत्कालीन चीफ जस्टिस पी. सतशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस एसके सिंह की बेंच ने इस आयोग की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं। बेंच ने सिफारिशों को वैध ठहराया और कहा कि सिफारिशें उचित विचार-विमर्श पर आधारित हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इसमें हस्तक्षेप करने का कोई वैध आधार नहीं है। बहरहाल तमाम अखबारों के प्रबंधन मजीठिया आयोग के विधान, काम के तरीके, प्रक्रियाओं और सिफारिशों से नाखुश थे। इनका मानना था कि अगर इन सिफारिशों को पूरी तरह माना गया तो वेतन में एकदम से 80 से 100 फीसदी तक इजाफा करना पड़ सकता है, जो छोटे और कमजोर समूहों व कंपनियों पर तालाबंदी का अंदेशा बढ़ा सकता है। दलील यह भी थी कि अन्य उद्योगों की तुलना में प्रिंट मीडिया में गैर-पत्रकार कर्मचारियों को वैसे भी ज्यादा वेतन दिया जा रहा है। अगर सिफारिशें लागू की गईं तो वेतन में अंतर का यह दायरा और बढ़ जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इनमें से किसी दलील को तवज्जो नहीं दी। साथ ही कहा कि यह केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है कि वह सिफारिशों को मंजूर करें या खारिज कर दे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सरकार ने कुछ सिफारिशें मंजूर नहीं कीं तो यह पूरी रिपोर्ट को खारिज करने का आधार नहीं है। इसके बाद मीडिया घरानों की रिव्यू पिटीशन भी सुप्रीम कोर्ट में 10 अप्रैल 2014 को खारिज हो चुकी है।
मीडिया मालिक यहां फंसा रहे पेंच
सूत्रों की मानें तो दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान व अन्य बड़े अखबारों के प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों से एक फॉर्म पर साइन ले लिए हैं, जिस पर लिखा है कि उन्हें मजीठिया आयोग नहीं चाहिए, वे कंपनी प्रदत्त वेतन एवं सुविधाओं से संतुष्ट हैं। कंपनी उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखती है। समय से उन्हें प्रमोशन मिलता है, अच्छा इंक्रीमेंट लगता है, बच्चों (अगर हैं) की पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य-चिकित्सा, उनकी बेहतरी का पूरा ख्याल कंपनी रखती है।
सुप्रीम कोर्ट में दे रहे ये दलील
एक बड़े अखबार में काम करने वाले वरिष्ठ उप संपादक सुरेश राय (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि कागजों पर हस्ताक्षर को लेकर ये दलील दी जा रही है कि कर्मचारी लिखित में दे चुका है कि वह मौजूदा वेतन से संतुष्ट है। मामले को लेकर कर्मचारी और अखबार सुप्रीम कोर्ट तक चले गए हैं। सुनवाई के दौरान कुछ अखबार मालिकों ने अपने यहां कार्यरत पत्रकारों के बारे में दलील दी है कि वे प्रबंधकीय कार्य करने वाले कर्मचारी हैं और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार प्रबंधकीय कार्य करने वाले कर्मचारियों पर वेज बोर्ड लागू नहीं होता है। सवाल यह है कि ऐसे फार्मों-बांडों-कागजों-करारनामों पर साइन-दस्तखत करा लेने का कोई कानूनी-वैधानिक आधार है? कानून की किताबें तो इसे गैरकानूनी, अवैध, गलत बताती हैं। विशेष रूप से द वर्किंग जर्नलिस्ट्स एंड अदर न्यूजपेपर इंप्लाइज (कंडीशन ऑफ सर्विस) एंड मिस्लेनियस प्रोविजंस एक्ट 1955 के चैप्टर चार का अनुच्छेद 16, वर्किंग जर्नलिस्ट्स (कंडीशन ऑफ सर्विस) एंड मिस्लेनियस प्रोविजंस रूल्स 1957 के चैप्टर छह का अनुच्छेद 38 और द पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट 1936 का अनुच्छेद 23 तो यही कहता है। इन कानूनों का निचोड़ यही है कि इनके कोऑर्डिनेशन से हुआ या किया गया कोई भी समझौता अमान्य, निष्प्रभावी, अशक्त, अकृत, शून्य हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का उड़ा रहे मखौल
भारतीय लोकतंत्र की अन्योन्याश्रित चार प्रमुख शक्तियां हैं:- विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया, लेकिन आयोग की सिफारिशें लागू न करने का ताजा प्रसंग अब ये संदेश देने लगा है कि अब तक सिर्फ राजनेता, अफसर और अपराधी ही ऐसा करते रहे हैं, अब मीडिया भी डंके की चोट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक बनाने लगा है। मजीठिया वेज बोर्ड से निर्धारित वेतनमान न देने पर अड़े मीडिया मालिकों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुपालन का फैसला दिया तो उसे अनसुना कर दिया गया। इस समय मीडियाकर्मी अपने हक के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं।
यूनिट बनाकर कम दिखा रहे लाभ
सूत्रों की माने तो अखबार मालिक यूनिट के लाभ को आधार बनाकर सिफारिशें लागू करने की फिराक में हैं। कुछ अखबारों ने ऐसा किया भी है। ये कंपनी को कई यूनिटों में बांटकर लाभ को कम करके दिखा रहे हैं, जबकि यह सरासर गलत है. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार कंपनी एक है तो उसे यूनिट में विभाजित कर लाभ-हानि नहीं दिखाए जा सकते। एक कंपनी के कई अखबार और कई प्रदेशों से प्रकाशन होने पर भी मदर कंपनी का ही लाभ और हानि देखा जाएगा।
प्रताड़ना, तबादला और बर्खास्तगी
मध्यप्रदेश में राजस्थान पत्रिका समूह में काम कर रहे पत्रकार दुर्गेश दत्त (बदला हुआ नाम) ने बताया, ‘पत्रिका प्रबंधन को यकीन था कि उनके खिलाफ कोर्ट में कोई नहीं जाएगा। हालांकि हुआ इसके उलट. सुप्रीम कोर्ट के फैसला लागू नहीं होने पर कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिक के खिलाफ अवमानना की याचिका दायर कर दी। इससे अखबार मालिक आग बबूला हो गए. उन्होंने कर्मचारियों के जबरन तबादला और नौकरी से निकाले जाने की प्रताड़ना शुरू कर दी। भोपाल पत्रिका में दो कर्मचारियों को नौकरी से बाहर कर दिया गया जबकि पांच लोगों के तबादले 1900 किमी दूर तक कर दिया गया। बाकी बचे आठ याचिकाकर्ताओं पर भी नौकरी से बर्खास्तगी और तबादले की तलवार लटकी हुई है।’ उधर, राजस्थान में भी राजस्थान पत्रिका अपने सैकड़ों कर्मचारियों का तबादला दूर-दूर कर रहा है. ये सभी मालिक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खड़े हैं। लगभग यही हालात दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और तमाम बड़े-छोटे हिंदी और भाषाई अखबारों की है।
अखबारों में शोषण की परंपरा
संस्थानों में पत्रकारों का शोषण आज की देन नहीं है. यह काफी समय से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। मजीठिया आयोग की सिफारिशों के बाद ये शोषण और बढ़ा है। यह आयोग पत्रकारों के लिए एक उम्मीद लेकर आया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पत्रकारों को यकीन का था कि मीडिया घराने कम से कम देश की न्यायपालिका को तो ठेंगा नहीं दिखाएंगे। मीडिया मालिकों ने मई 2015 में सिफारिशों के अनुसार वेतन तो नहीं दिया बल्कि उनका शोषण और बढ़ा दिया। उनसे अधिक काम लिया जाने लगा ताकि वे मजीठिया के बारे में सोच भी न पाए और उन्हें हमेशा अपनी नौकरी बचाने की ही चिंता रहे।
हायर की नई कंपनियां
राजस्थान में काम करने वाले पत्रकार अभिमन्यु सागर (बदला हुआ नाम) बताते हैं, ‘जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार प्रिंट मीडिया में पत्रकारों के लिए दिन की नौकरी छह घंटे की और रात में साढ़े पांच घंटे की निर्धारित है लेकिन अखबार में पत्रकारों से दस से 12 घंटे तक काम लिया जाता है और उन्हें ओवरटाइम भी नहीं दिया जाता है। डीए देना बंद कर दिया गया। सैलरी स्लिप नहीं दी जाती है यहां तक कि पेड लीव भी नहीं दी जाती और न ही उनका इनकैश किया जाता है। मजीठिया वेतन आयोग आने के पहले से ही अखबार मालिकों ने एक नई कंपनी हायर कर ली है और अधिकतर कर्मचारियों को उसमें शिफ्ट कर दिया गया, ताकि वे जिंदगी में कभी भी मजीठिया वेतन की मांग नहीं कर सके। अब लोगों को कॉन्ट्रेक्ट पर ही रखा जा रहा है।’
राज्य सरकारों को दिया निर्देश
मजीठिया वेज बोर्ड में 28 अप्रैल 2015 को कंटेम्प्ट पिटीशंस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से मजीठिया वेज बोर्ड लागू होने की जानकारी वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 17 बी के तहत मांगी है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को तीन माह का वक्त दिया था, जो वक्त पूरा हो गया है। कोर्ट ने विशेष लेबर इंस्पेक्टर नियुक्त करने को कहा ताकि देश में मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू होने की सही स्थिति की जानकारी मिल सके। अगस्त में इस मामले में सुनवाई होनी है। इस बीच दिल्ली को छोड़ शायद ही किसी राज्य ने मजीठिया बोर्ड के फैसले पर कोई सकारात्मक काम किया है। दिल्ली सरकार ने राज्य के पत्रकारों को मजीठिया आयोग की सिफारिशें दिलाने की घोषणा की है। मीडिया में ये स्थितियां कुछ वैसी ही हैं जैसी 1989 में बनी थीं। तब भी मीडिया कंपनियां बछावत आयोग की सिफारिशें लागू करने में ना-नुकुर कर रही थीं लेकिन तब राजीव गांधी की सरकार ने सख्ती बरतते हुए उन्हें आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए बाध्य किया लेकिन वर्तमान में ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है।
(साभार : तहलका हिन्दी डॉट कॉम)

गायत्री महाविज्ञान : नारियों को वेद एवं गायत्री का अधिकार

भारतवर्ष में सदा से नारियों का समुचित सम्मान रहा है। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता रहा है। नारियों को बहुधा ‘देवी’ सम्बोधन से सम्बोधित किया जाता रहा है। नाम के पीछे उनकी जन्मजात उपाधि ‘देवी’ प्राय: जुड़ी रहती है। देवताओं और महापुरुषों के साथ उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हुए हैं। सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश, माया- ब्रह्म, सावित्री- सत्यवान् आदि नामों से नारी को पहला और नर को दूसरा स्थान प्राप्त है। पतिव्रत, दया, करुणा, सेवा- सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति- भावना आदि गुणों में नर की अपेक्षा नारी को सभी विचारवानों ने बढ़ा- चढ़ा माना है। वेदों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि वेदों के मन्त्रदृष्टा जिस प्रकार अनेक ऋषि हैं, वैसे ही अनेक ऋषिकाएँ भी हैं। ईश्वरीय ज्ञान वेद महान् आत्मा वाले व्यक्तियों पर प्रकट हुआ है और उनने उन मन्त्रों को प्रकट किया। इस प्रकार जिन पर वेद प्रकट हुए, उन मन्त्रद्रष्टओं को ऋषि कहते हैं। ऋषि केवल पुरुष ही नहीं हुए हैं, वरन् अनेक नारियाँ भी हुई हैं। ईश्वर ने नारियों के अन्त:करण में भी उसी प्रकार वेद- ज्ञान प्रकाशित किया, जैसे कि पुरुषों के अत:करण में; क्योंकि ईश्वर के लिये दोनों ही समान हैं।
ऋग्वेद १०। ८५ में सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिका ‘सूर्या- सावित्री’ है। ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है—‘‘ऋषिर्दर्शनात्। स्तोमान् ददर्शेति (२.११)। ऋषयो मन्त्रद्रष्टर: (२.११ दु. वृ.)।’’ अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है।
ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची बृहद् देवता के दूसरे अध्याय में इस प्रकार है—
घोषा गोधा विश्ववारा, अपालोपनिषन्निषत्।
ब्रह्मजाया जुहूर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति:॥ ८४॥
इन्द्राणी चेन्द्रमाता च सरमा रोमशोर्वशी।
लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शश्वती॥ ८५॥
श्रीर्लाक्षा सार्पराज्ञी वाक्श्रद्धा मेधा च दक्षिणा।
रात्री सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरिता:॥ ८६॥
अर्थात्- घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू), अगस्त्य की भगिनी, अदिति, इन्द्राणी और इन्द्र की माता, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा और नदियाँ, यमी, शश्वती, श्री, लाक्षा, सार्पराज्ञी, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्री और सूर्या- सावित्री आदि सभी ब्रह्मवादिनी हैं।
ऋ ग्वेद के १०- १३४, १०- ३९, ४०, १०- ९१, १०- ९५, १०- १०७, १०- १०९, १०- १५४, १०- १५९, १०- १८९, ५- २८, ८- ९१ आदि सूक्त को की मन्त्रदृष्टा ये ऋषिकाएँ हैं।
ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं। कई नारियाँ तो इस सम्बध में अपने पिता तथा पति का मार्ग दर्शन करती थीं।
‘‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’’ में सोम द्वारा ‘सीता- सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है—
तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त। अथ ह सीता सावित्री।
सोमँ राजानं चकमे। तस्या उ ह त्रीन् वेदान् प्रददौ। -तैत्तिरीय ब्रा०२/३/१०/१,३
इस मन्त्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता- सावित्री को तीन वेद दिये।
मनु की पुत्री ‘इड़ा’ का वर्णन करते हुए तैत्तिरीय ब्रा० १। १। ४। ४ में उसे ‘यज्ञानुकाशिनी’ बताया है। यज्ञानुकाशिनी का अर्थ शायणाचार्य ने ‘यज्ञ तत्त्व प्रकाशन समर्था’ किया है। इड़ा ने अपने पिता को यज्ञ सम्बन्धी सलाह देते हुए कहा—
साऽब्रवीदिडा मनुम्। तथा वा अहं तवाग्निमाधास्यामि। यथा प्र प्रजया पशुभिर्मिथुनैर्जनिष्यसे। प्रत्यस्मिल्लोके स्थास्यसि। अभि सुवर्गं लोकं जेष्यसीति। —तैत्तिरीय ब्रा० १/१/४/६

इड़ा ने मनु से कहा- तुम्हारी अग्नि का ऐसा आधान करूँगी जिससे तुम्हें पशु, भोग, प्रतिष्ठा और स्वर्ग प्राप्त हो।
प्राचीन समय में स्त्रियाँ गृहस्थाश्रम चलाने वाली थीं और ब्रह्म- परायण भी। वे दोनों ही अपने- अपने कार्यक्षेत्रों में कार्य करती थीं। जो गृहस्थ का संचालन करती थीं, उन्हें ‘सद्योवधू’ कहते थे और जो वेदाध्ययन, ब्रह्म उपासना आदि के पारमार्थिक कार्यों में प्रवृत्त रहती थीं, उन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहते थे। ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू के कार्यक्रम तो अलग- अलग थे, पर उनके मौलिक धर्माधिकारों में कोई अन्तर न था। देखिये—
द्विविधा: स्त्रिया:। ब्रह्मवादिन्य: सद्योवध्वश्च। तत्र ब्रह्मवादिनीनामुपनयनम्, अग्रीन्धनं वेदाध्ययनं स्वगृहे च भिक्षाचर्येति। सद्योवधूनां तूपस्थिते विवाहे कथञ्चिदुपनयनमात्रं कृत्वा विवाह: कार्य:। —हारीत धर्म सूत्र
ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू ये दो स्त्रियाँ होती हैं। इनमें से ब्रह्मवादिनी- यज्ञोपवीत, अग्निहोत्र, वेदाध्ययन तथा स्वगृह में भिक्षा करती हैं। सद्योवधुओं का भी यज्ञोपवीत आवश्यक है। वह विवाहकाल उपस्थित होने पर करा देते हैं।
शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी मैत्रेयी को ब्रह्मवादिनी कहा है—
तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव। —शत०ब्रा० १४/७/३/१

अर्थात् मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी।
ब्रह्मवादिनी का अर्थ बृहदारण्यक उपनिषद् का भाष्य करते हुए श्री शंकराचार्य ने ‘ब्रह्मवादनशील’ किया है। ब्रह्म का अर्थ है- वेद। ब्रह्मवादनशील अर्थात् वेद का प्रवचन करने वाली। यदि ‘ब्रह्म’ का अर्थ ‘ईश्वर’ किया जाए तो भी ब्रह्म की प्राप्ति वेद- ज्ञान के बिना नहीं हो सकती; यानी ब्रह्म को वही जान सकता है जो वेद पढ़ता है।

देखिए—
ना वेदविन्मनुते तं बृहन्तम्। एतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन। —तैत्तिरीयोप०
जिस प्रकार पुरुष ब्रह्मचारी रहकर तप और योग द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते थे, वैसे ही कितनी ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रहकर आत्मनिर्माण एवं परमार्थ का सम्पादन करती थीं। पूर्वकाल में अनेक सुप्रसिद्ध ब्रह्मचारिणि हुई हैं जिनकी प्रतिभा और विद्वत्ता की चारों ओर कीर्ति फैली हुई थी। महाभारत में ऐसी अनेक ब्रह्मचारिणियों का वर्णन आता है।
भारद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि।
श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी॥ —महाभारत शल्य पर्व ४८। २
भारद्वाज की श्रुतावती नामक कन्या थी जो ब्रह्मचारिणि थी। कुमारी के साथ- साथ ब्रह्मचारिणि शब्द लगाने का तात्पर्य यह है कि वह अविवाहित और वेदाध्ययन करने वाली थी।
अत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमार- ब्रह्मचारिणि।
योगयुक्ता दिवं याता, तप: सिद्धा तपस्विनी॥ —महाभारत शल्य पर्व ५४। ६
योग सिद्धि को प्राप्त कुमार अवस्था से ही वेदाध्ययन करने वाली तपस्विनी, सिद्धा नाम की ब्रह्मचारिणि मुक्ति को प्राप्त हुई।
बभूव श्रीमती राजन् शाण्डिल्यस्य महात्मन:।
सुता धृतव्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणि
सा तु तप्त्वा तपो घोरं दुश्चरं स्त्रीजनेन ह।
गता स्वर्गं महाभागा देवब्राह्मणपूजिता॥ —महाभारत शल्य पर्व ५४। ७। ८

महात्मा शाण्डिल्य की पुत्री ‘श्रीमती’ थी, जिसने व्रतों को धारण किया। वेदाध्ययन में निरन्तर प्रवृत्त थी। अत्यन्त कठिन तप करके वह देव ब्राह्मणों से पूजित हुई और स्वर्ग सिधारी।
तेभ्योऽधिगन्तुं निगमान्त विद्यां वाल्मीकि पाश्र्वादिह सञ्चरामि —उत्तर रामचरित अंक २
(आत्रेयी का कथन) उन (अगस्त्यादि ब्रह्मवेत्ताओं) से ब्रह्म विद्या सीखने के लिए वाल्मीकि के पास से आ रही हूँ।
महाभारत शान्ति पर्व अध्याय ३२० में ‘सुलभा’ नामक ब्रह्मवादिनी संन्यासिनी का वर्णन है, जिसने राजा जनक के साथ शास्त्रार्थ किया था। इसी अध्याय के श्लोकों में सुलभा ने अपना परिचय देते हुए कहा—
प्रधानो नाम राजर्षिव्र्यक्तं ते श्रोत्रमागत:।
कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम्
साऽहं तस्मिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे।
विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येकामुनिव्रतम्॥ —महा०शान्ति पर्व ३२०। १८१। १८३

मैं सुप्रसिद्ध क्षत्रिय कुल में उत्पन्न सुलभा हूँ। अपने अनुरूप पति न मिलने से मैंने गुरुओं से शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करके संन्यास ग्रहण किया है।
पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी की विद्वत्ता का वर्णन करते हुए श्री आचार्य आनन्दतीर्थ (माधवाचार्य) जी ने ‘महाभारत निर्णय’ में लिखा है—
वेदाश्चाप्युत्तमस्त्रीभि: कृष्णाद्याभिरिवाखिला:।
अर्थात्- उत्तम स्त्रियों को कृष्णा (द्रौपदी) की तरह वेद पढऩे चाहिए।
तेभ्यो दधार कन्ये द्वे वयुनां धारिणीं स्वधा।
उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ, ज्ञान- विज्ञान —भागवत ४। १। ६४

स्वधा की दो पुत्रियाँ हुईं, जिनके नाम वयुना और धारिणी थे। ये दोनों ही ज्ञान और विज्ञान में पूर्ण पारंगत तथा ब्रह्मवादिनी थीं।
विष्णु पुराण १। १० और १८। १९ तथा मार्कण्डेय पुराण अ० ५२ में इसी प्रकार (ब्रह्मवादिनी, वेद और ब्रह्म का उपदेश करने वाली) महिलाओं का वर्णन है।
सततं मूर्तिमन्तश्च वेदाश्चत्वार एव च।
सन्ति यस्याश्च जिह्वग्रे सा च वेदवती स्मृता॥ —ब्रह्म वै० प्रकृति खण्ड २/१४/६४
उसे चारों वेद कण्ठाग्र थे, इसलिए उसे वेदवती कहा जाता था। इस प्रकार की नैष्ठिक ब्रह्मचारिणि ब्रह्मवादिनी नारियाँ अगणित थीं। इनके अतिरिक्त गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाली कन्याएँ दीर्घकाल तक ब्रह्मचारिणि रहकर वेद- शात्रों का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त विवाह करती थीं। तभी उनकी सन्तान संसार में उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह यशस्वी, पुरुषार्थी और कीर्तिमान होती थी। धर्मग्रन्थ का स्पष्ट आदेश है कि कन्या ब्रह्मचारिणि रहने के उपरान्त विवाह करे।
ब्रह्मचर्येण कन्या ३ युवानं विन्दते पतिम्। —अथर्व० ११/७/१८

अर्थात् कन्या ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान करती हुई उसके द्वारा उपयुक्त पति को प्राप्त होती है।
ब्रह्मचर्य केवल अविवाहित रहने को ही नहीं कहते। ब्रह्मचारी वह है जो संयमपूर्वक वेद की प्राप्ति में निरत रहता है। देखिए—
स्वीकरोक्ति यदा वेद चरेद् वेदव्रतानि च।
ब्रह्मचारी भवेत्तावद् ऊध्र्वं स्नातो भवेत् गृही॥ —दक्षस्मृति १। ७

अर्थात् जब वेद को अर्थ सहित पढ़ता है और उसके लिए व्रतों को ग्रहण करता है, तब ब्रह्मचारी कहलाता है। उसके पश्चात् विद्वान् बनकर गृहस्थ में प्रवेश करता है।

अथर्ववेद में ११। ७। १७ की व्याख्या करते हुए सायणाचार्य ने लिखा है—
‘ब्रह्मचर्येण- ब्रह्म वेद: तदध्ययनार्थमाचर्यम्।’
अर्थात्- ‘ब्रह्म’ का अर्थ है वेद। उस वेद के अध्ययन के लिये जो प्रयत्न किये जाते हैं, वही ब्रह्मचर्य है।
इसी सूक्त के प्रथम मन्त्र की व्याख्या में सायणाचार्य ने लिखा है—
ब्रह्मणि वेदात्मके अध्येतव्ये वा चरितुं शीलमस्य स तथोक्त:।
अर्थात् ब्रह्मचारी वह है जो वेद के अध्ययन में विशेष रूप से संलग्न है।
महर्षि गाग्र्यायणाचार्य ने प्रणववाद में कहा है—
ब्रह्मचारिणां च ब्रह्मचारिणीभि: सह विवाह: प्रशस्यो भवति।
अर्थात् ब्रह्मचारियों का विवाह ब्रह्मचारिणियों से ही होना उचित है, क्योंकि ज्ञान और विद्या आदि की दृष्टि से दोनों के समान रहने पर ही सुखी और सन्तुष्ट रह सकते हैं। महाभारत में भी इस बात की पुष्टि की गयी है।
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम्।
तयोर्मैत्री विवाहश्च न तु पुष्ट विपुष्टयो:॥ —महाभारत आदिपर्व १। १३१। १०

जिनका वित्त एवं ज्ञान समान है, उनसे मित्रता और विवाह उचित है, न्यूनाधिक में नहीं।
ऋग्वेद १। १। ५ का भाष्य करते हुए महर्षि दयानन्द ने लिखा है—
या: कन्या यावच्चतुर्विंशतिवर्षमायुस्तावद् ब्रह्मचर्येण जितेन्द्रिया: तथा सांगोपांगवेदविद्या अधीयते ता: मनुष्य- जाति भवन्ति।
अर्थात्- जो कन्याएँ २४ वर्ष तक ब्रह्मचर्यपूर्वक साङ्गपाङ्ग वेद विद्याओं को पढ़ती हैं, वे मनुष्य जाति को शोभित करती हैं।
ऋग्वेद ५। ६२। ११ के भाष्य में महर्षि ने लिखा है—

ब्रह्मचारिणि प्रसिद्ध- कीर्तिं सत्पुरुषं सुशीलं शुभ- गुण प्रीतिमन्तं पतिं ग्रहीतुमिच्छेत् तथैव ब्रह्मचार्यपि स्वसदृशीमेव ब्रह्मचारिणीं स्त्रियं गृह्णीयात्।
अर्थात्- ब्रह्मचारिणि स्त्री कीर्तिवान्, सुशील, सत्पुरुष, गुणवान्, रूपवान, प्रेमी स्वभाव के पति की इच्छा करे, वैसे ही ब्रह्मचारी भी अपने समान ब्रह्मचारिणि (वेद और ईश्वर की ज्ञाता) स्त्री को ग्रहण करे।

जब विद्याध्ययन करने के लिये कन्याओं को पुरुषों की भाँति सुविधा थी, तभी इस देश की नारियाँ गार्गी और मैत्रेयी की तरह विदुषी होती थीं। याज्ञवल्क्य जैसे ऋषि को एक नारी ने शास्त्रार्थ में विचलित कर दिया था और उन्होंने हैरान होकर उसे धमकी देते हुए कहा था- ‘अधिक प्रश्र मत करो, अन्यथा तुम्हारा अकल्याण होगा।’

इसी प्रकार शंकराचार्य जी को भारती देवी के साथ शास्त्रार्थ करना पड़ा था। उस भारती देवी नामक महिला ने शंकराचार्य जी से ऐसा अद्भुत शास्त्रार्थ किया था कि बड़े- बड़े विद्वान् भी अचम्भित रह गये थे। उनके प्रश्रों का उत्तर देने के लिये शंकराचार्य को निरुत्तर होकर एक मास की मोहलत माँगनी पड़ी थी। शंकर दिग्विजय में भारती देवी के सम्बन्ध में लिखा है—

सर्वाणि शास्त्राणि षडंग वेदान्, काव्यादिकान् वेत्ति, परञ्च सर्वम्।
तन्नास्ति नोवेत्ति यदत्र बाला, तस्मादभूच्चित्र- पदं जनानाम्॥ —शंकर दिग्विजय ३। १६
भारती देवी सर्वशास्त्र तथा अंगों सहित सभी वेदों और काव्यों को जानती थी। उससे बढक़र श्रेष्ठ और कोई विदुषी स्त्री न थी।
आज जिस प्रकार स्त्रियों के शास्त्राध्ययन पर रोक लगाई जाती है, यदि उस समय ऐसे ही प्रतिबन्ध रहे होते, तो याज्ञवल्क्य और शंकराचार्य से टक्कर लेने वाली स्त्रियाँ किस प्रकार हो सकती थीं? प्राचीनकाल में अध्ययन की सभी नर- नारियों को समान सुविधा थी।
स्त्रियों के द्वारा यज्ञ का ब्रह्मा बनने तथा उपाध्याय एवं आचार्य होने के प्रमाण मौजूद हैं। ऋग्वेद में नारी को सम्बोधन करके कहा गया है कि तू उत्तम आचरण द्वारा ब्रह्मा का पद प्राप्त कर सकती है।

अध: पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादकौ हर।
मा ते कशप्लकौ दृशन् स्त्री ह ब्रह्मा बभूविथ॥ —ऋग्वेद ८। ३३। १९
अर्थात् हे नारी! तुम नीचे देखकर चलो। व्यर्थ में इधर उधर की वस्तुओं को मत देखती रहो। अपने पैरों को सावधानी तथा सभ्यता से रखो। वस्त्र इस प्रकार पहनो कि लज्जा के अंग ढके रहें। इस प्रकार उचित आचरण करती हुई तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने के योग्य बन सकती हो।
अब यह देखना है कि ब्रह्मा का पद कितना उच्च है और उसे किस योग्यता का मनुष्य प्राप्त कर सकता है।

ब्रह्म वाऽऋत्विजाम्भिषक्तम:। —शतपथ ब्रा० १। ७। ४। १९
अर्थात् ब्रह्मा ऋत्विजों की त्रुटियों को दूर करने वाला होने से सब पुरोहितों से ऊँचा है।
तस्माद्यो ब्रह्मिष्ठ:स्यात् तं ब्रह्माणं कुर्वीत। —गोपथ ब्रा० उत्तरार्ध १। ३
अर्थात् जो सबसे अधिक ब्रह्मनिष्ठ (परमेश्वर और ब्रह्म का ज्ञाता) हो, उसे ब्रह्मा बनाना चाहिए।
अथ केन ब्रह्माणं क्रियत इति त्रय्या विद्ययेति ब्रूयात्। —ऐतरेय ब्रा० ५। ३३
ज्ञान, कर्म, उपासना तीनों विद्याओं के प्रतिपादक वेदों के पूर्ण ज्ञान से ही मनुष्य ब्रह्मा बन सकता है।
अथ केन ब्रह्मत्वं इत्यनया, त्रय्या विद्ययेति ह ब्रूयात्। —शतपथ ब्रा० ११। ५। ८। ७

वेदों के पूर्ण ज्ञान (त्रिविध विद्या) से ही मनुष्य ब्रह्मा पद के योग्य बनता है।
व्याकरण शास्त्र के कतिपय स्थलों पर ऐसे उल्लेख हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि वेद का अध्ययन- अध्यापन भी स्त्रियों का कार्यक्षेत्र रहा है। देखिए—
‘इडश्च’ ३। ३। २१ के महाभाष्य में लिखा है—
‘उपेत्याधीयतेऽस्या उपाध्यायी उपाध्याया’
अर्थात् जिनके पास आकर कन्याएँ वेद के एक भाग तथा वेदांगों का अध्ययन करें, वह उपाध्यायी या उपाध्याया कहलाती है।
मनु ने भी उपाध्याय के लक्षण यही बताए हैं—
एकदेशं तु वेदस्य वेदांगान्यपि वा पुन:।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थम् उपाध्याय: स उच्यते॥ —मनु० २। १४१
जो वेद के एक देश या वेदांगों को पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है।
आचार्यादणत्वं। —अष्टाध्यायी ४। १। ४९
इस सूत्र पर सिद्धान्त कौमुदी में कहा गया है—
आचार्यस्य स्त्री आचार्यानी पुंयोग इत्येवं आचार्या स्वयं व्याख्यात्री।
अर्थात् जो स्त्री वेदों का प्रवचन करने वाली हो, उसे आचार्या कहते हैं।
आचार्या के लक्षण मनुजी ने इस प्रकार बतलाए हैं—
उपनीयं तु य: शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विज:।
सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते॥ —मनु २। १४०
जो शिष्य का यज्ञोपवीत संस्कार करके कल्प सहित, रहस्य सहित वेद पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते हैं।
स्वर्गीय महामहोपाध्याय पं० शिवदत्त शर्मा ने सिद्धान्त कौमुदी का सम्पादन करते हुए इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए लिखा है—
‘‘इति वचनेनापि स्त्रीणां वेदाध्ययनाधिकारो ध्वनित:।’’
अर्थात्- इससे स्त्रियों को वेद पढऩे का अधिकार सूचित होता है।
उपर्युक्त प्रमाणों को देखते हुए पाठक यह विचार करें कि ‘स्त्रियों को गायत्री का अधिकार नहीं’ कहना कहाँ तक उचित है?

क्या स्त्रियों को वेद का अधिकार नहीं ?

गायत्री मन्त्र का स्त्रियों को अधिकार है या नहीं? यह कोई स्वतन्त्र प्रश्र नहीं है। अलग से कहीं ऐसा विधि- निषेध नहीं कि स्त्रियाँ गायत्री जपें या न जपें। यह प्रश्न इसलिये उठता है- यह कहा जाता है कि स्त्रियों को वेद का अधिकार नही है। चुकी गायत्री भी वेद मन्त्र है, इसलिये अन्य मन्त्रों की भाँति उसके उच्चारण का भी अधिकार नहीं होना चाहिये।

स्त्रियों को वेदाधिकारी न होने का निषेध वेदों में नहीं है। वेदों में तो ऐसे कितने ही मन्त्र हैं, जो स्त्रियों द्वारा उच्चारण होते हैं। उन मन्त्रों में स्त्री- लिङ्गं की क्रियाएँ हैं, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि स्त्रियों द्वारा ही प्रयोग होने के लिये हैं। देखिये—

उदसौ सूर्यो अगाद् उदयं मामको भग:।
अहं तद्विद् वला पतिमभ्यसाक्षि विषासहि:।
अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचनी,
ममेदनु क्रतुं पति: सेहानाया उपाचरेत्॥
मम पुत्रा: शत्रुहणोऽथो मे दुहिता विराट्
उताहमस्मि संजया पत्यौ मे श्लोक उत्तम:॥ —ऋग्वेद १०। १५९ ।। १- ३
अर्थात्- सूर्योदय के साथ मेरा सौभाग्य बढ़े। मैं पतिदेव को प्राप्त करूँ। विरोधियों को पराजित करने वाली और सहनशील बनूँ। मैं वेद से तेजस्विनी प्रभावशाली वक्ता बनूँ। पतिदेव मेरी इच्छा, ज्ञान व कर्म के अनुकूल कार्य करें। मेरे पुत्र भीतरी व बाहरी शत्रुओं को नष्ट करें। मेरी पुत्री अपने सद्गुणों के कारण प्रकाशवती हो। मैं अपने कार्यों से पतिदेव के उज्ज्वल यश को बढ़ाऊँ।
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुत:॥ —यजुर्वेद ३। ६०
अर्थात्- हम कुमारियाँ उत्तम पतियों को प्राप्त कराने वाले परमात्मा का स्मरण करती हुई यज्ञ करती हैं, जो हमें इस पितृकुल से छुड़ा दे, किन्तु पति कुल से कभी वियोग न कराये।

आशासाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम्।
पत्युरनुव्रता भूत्वा सन्नह्यस्वामृतायकम्॥ —अथर्व० १४। १। ४२
वधू कहती है कि मैं यज्ञादि शुभ अनुष्ठानों के लिए शुभ वस्त्र पहनती हूँ। सौभाग्य, आनन्द, धन तथा सन्तान की कामना करती हुई मैं सदा प्रसन्न रहूँगी।
वेदोऽसि वित्तिरसि वेदसे त्वा वेदो मे विन्द विदेय।
घृतवन्तं कुलायिनं रायस्पोषँ सहस्रिणम् ।।
वेदो वाजं ददातु मे वेदो वीरं ददातु मे। —काठक संहिता ५/४/२३- २४
अर्थात्- आप वेद हैं, सब श्रेष्ठ गुणों और ऐश्वर्यों को प्राप्त कराने वाले ज्ञान- लाभ के लिये आपको भली प्रकार प्राप्त करूँ। वेद मुझे तेजस्वी, कुल को उत्तम बनाने वाला, ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला ज्ञान दें। वेद मुझे वीर, श्रेष्ठ सन्तान दें।
विवाह के समय वर- वधू दोनों सम्मिलित रूप से मन्त्र उच्चारण करते हैं—
समञ्जन्तु विश्वे देवा: समापो हृदयानि नौ।
सं मातरिश्वा सं धाता समुदेष्टरी दधातु नौ॥ —ऋग्वेद १०। ८५। ४७
अर्थात् सब विद्वान् लोग यह जान लें कि हम दोनों के हृदय जल की तरह परस्पर प्रेमपूर्वक मिले रहेंगे। विश्वनियन्ता परमात्मा तथा विदुषी देवियाँ हम दोनों के प्रेम को स्थिर बनाने में सहायता करें।

स्त्री के मुख से वेदमन्त्रों के उच्चारण के लिए असंख्यों प्रमाण भरे पड़े हैं। शतपथ ब्राह्मण १४। १। ४। १६ में, यजुर्वेद के ३७। २० मन्त्र ‘त्वष्टमन्तस्त्वा सपेम’ इस मन्त्र को पत्नी द्वारा उच्चारण करने का विधान है। शतपथ के १। ९। २। २३ में स्त्रियों द्वारा यजुर्वेद के २। २१ मन्त्रों के उच्चारण का आदेश है। तैत्तिरीय संहिता के १। १। १० ‘सुप्रजसस्त्वा वयं’ आदि मन्ज्ञत्रों को स्त्र द्वारा बुलवाने का आदेश है। आश्वलायन गृह्य सूत्र १। १। ९ के ‘पाणिग्रहणादि गृह्य….’ में भी इसी प्रकार यजमान की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी, पुत्र अथवा कन्या को यज्ञ करने का आदेश है। काठक गृह्य सूत्र ३। १। ३० एवं २७। ३ में स्त्रियों के लिए वेदाध्ययन, मन्त्रोच्चारण एवं वैदिक कर्मकाण्ड करने का प्रतिपादन है। लौगाक्षी गृह्म सूत्र की २५वीं कण्डिका में भी ऐसे प्रमाण मौजूद हैं।
पारस्कर गृह्म सूत्र १। ५। १,२ के अनुसार विवाह के समय कन्या लाजाहोम के मन्त्रों को स्वयं पढ़ती हैं। सूर्य दर्शन के समय भी वह यजुर्वेद के ३६। २४ मन्त्र ‘तच्चक्षुर्देवहितं’ को स्वयं ही उच्चारण करती है। विवाह के समय ‘समञ्जन’ करते समय वर- वधू दोनों साथ- साथ ‘अथैनौ समञ्जयत: …..’ इस ऋग्वेद १०। ८५। ४७ के मन्त्र को पढ़ते हैं।

ताण्ड्य ब्राह्मण ५। ६। ८ में युद्ध में स्त्रियों को वीणा लेकर सामवेद के मन्त्रों का गान करने का आदेश है तथा ५। ६। १५ में स्त्रियों के कलश उठाकर वेद- मन्त्रों का गान करते हुए परिक्रमा करने का विधान है।
ऐतरेय ५। ५। २९ में कुमारी गन्धर्व गृहीता का उपाख्यान है, जिसमें कन्या के यज्ञ एवं वेदाधिकार का स्पष्टीकरण हुआ है।
कात्यायन श्रौत सूत्र १। १। ७, ४। १। २२ तथा २०। ६। १२ आदि में ऐसे स्पष्ट आदेश हैं कि अमुक वेद- मन्त्रों का उच्चारण स्त्री करे। लाट्यायन श्रौत सूत्र में पत्नी द्वारा सस्वर सामवेद के मन्त्रों के गायन का विधान है। शांखायन श्रौत सूत्र के १। १२। १३ में तथा आश्वलायन श्रौत सूत्र १। ११। १ में इसी प्रकार के वेद- मन्त्रोच्चारण के आदेश हैं। मन्त्र ब्राह्मण के १। २। ३ में कन्या द्वारा वेद- मन्त्र के उच्चारण की आज्ञा है। नीचे कुछ मन्त्रों में वधू को वेदपरायण होने के लिये कितना अच्छा आदेश दिया है—

ब्रह्मपरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मन्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वत:।
अनाव्याधां देव पुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके विराज॥ —अथर्व० १४। १। ६४
हे वधू ! तुम्हारे आगे, पीछे, मध्य तथा अन्त में सर्वत्र वेद विषयक ज्ञान रहे। वेद ज्ञान को प्राप्त करके तदनुसार तुम अपना जीवन बनाओ। मंगलमयी, सुखदायिनी एवं स्वस्थ होकर पति के घर में विराजमान और अपने सद्गुणों से प्रकाशवान् हो।
कुलायिनी घृतवती पुरन्धि: स्योने सीद सदने पृथिव्या:। अभित्वा रुद्रा वसवो गृणन्त्विमा। ब्रह्म पीपिहि सौभगायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिहत्वा। —यजुर्वेद १४। २
हे स्त्री! तुम कुलवती घृत आदि पौष्टिक पदार्थों का उचित उपयोग करने वाली, तेजस्विनी, बुद्धिमती, सत्कर्म करने वाली होकर सुखपूर्वक रहो। तुम ऐसी गुणवती और विदुषी बनो कि रुद्र और वसु भी तुम्हारी प्रशंसा करें। सौभाग्य की प्राप्ति के लिये इन वेदमन्त्रों के अमृत का बार- बार भली प्रकार पान करो। विद्वान् तुम्हें शिक्षा देकर इस प्रकार की उच्च स्थिति पर प्रतिष्ठित कराएँ।

यह सर्वविदित है कि यज्ञ, बिना वेदमन्त्रों के नहीं होता और यज्ञ में पति- पत्नी दोनों का सम्मिलित रहना आवश्यक है। रामचन्द्र जी ने सीता जी की अनुपस्थिति में सोने की प्रतिमा रखकर यज्ञ किया था। ब्रह्माजी को भी सावित्री की अनुपस्थिति में द्वितीय पत्नी का वरण करना पड़ा था, क्योंकि यज्ञ की पूर्ति के लिये पत्नी की उपस्थिति आवश्यक है। जब स्त्री यज्ञ करती है, तो उसे वेदाधिकार न होने की बात किस प्रकार कही जा सकती है? देखिये—
अ यज्ञो वा एष योऽपत्नीक:। —तैत्तिरीय सं० २। २। २। ६
अर्थात् बिना पत्नी के यज्ञ नहीं होता है।

अथो अर्धो वा एष आत्मन: यत् पत्नी।
—तैत्तिरीय सं० ३। ३। ३। ५
अर्थात्- पत्नी पति की अर्धांगिनी है, अत: उसके बिना यज्ञ अपूर्ण है।

या दम्पती समनसा सुनुत आ च धावत:।
दिवासो नित्ययोऽऽशिरा। —ऋग्वेद ८। ३१। ५
हे विद्वानो! जो पति- पत्नी एकमन होकर यज्ञ करते हैं और ईश्वर की उपासना करते हैं..।
वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्यवो……
गव्यन्ता द्वाजना स्व१र्यन्ता समूहसि। ….. —ऋग्वेद १। १३१। ३
हे परमात्मन् आपके निमित्त यजमान, पत्नी समेत यज्ञ करते हैं। आप उन लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति कराते हैं, अतएव वे मिलकर यज्ञ करते हैं।
अग्रिहोत्रस्य शुश्रूषा सन्ध्योपासनमेव च।
कार्यं पत्न्या प्रतिदिनं बलिकर्म च नैत्यिकम्॥ —स्मृति रत्न
पत्नी प्रतिदिन अग्रिहोत्र, सन्ध्योपासना, बलिवैश्व आदि नित्यकर्म करे। यदि पुरुष न हो तो अकेली स्त्री को भी यज्ञ का अधिकार है। देखिए—
होमे कर्तार: स्वयंत्वस्यासम्भवे पत्न्यादय:। —— गदाधराचार्य
होम करने में पहले स्वयं यजमान का स्थान है। वह न हो तो पत्नी, पुत्र आदि करें।
पत्नी कुमार: पुत्री च शिष्यो वाऽपि यथाक्रमम्।
पूर्वपूर्वस्य चाभावे विदध्यादुत्तरोत्तर:॥ —प्रयोग रत्न स्मृति
यजमान: प्रधान:स्यात् पत्नी पुत्रश्च कन्यका।
ऋत्विक् शिष्यो गुरुभ्र्राता भागिनेय: सुतापति:॥ —स्मृत्यर्थसार
उपर्युक्त दोनों श्लोकों का भावार्थ यह है कि यजमान हवन के समय किसी कारण से उपस्थित न हो सके तो उसकी पत्नी, पुत्र, कन्या, शिष्य, गुरु, भाई आदि कर लें।

आहुरप्युत्तमस्त्रीणाम् अधिकारं तु वैदिके।
यथोर्वशी यमी चैव शच्याद्याश्च तथाऽपरा:। —— व्योम संहिता
श्रेष्ठ स्त्रियों को वेद का अध्ययन तथा वैदिक कर्मकाण्ड करने का वैसे ही अधिकार है जैसे कि उर्वशी, यमी, शची आदि ऋषिकाओं को प्राप्त था।
अग्रिहोत्रस्य शुश्रूषा सन्ध्योपासनमेव च। —स्मृतिरत्न (कुल्लूक भट्ट)
इस श्लोक में यज्ञोपवीत एवं सन्ध्योपासना का प्रत्यक्ष विधान है।
या स्त्री भत्र्रा वियुक्तापि स्वाचारै: संयुता शुभा।
सा च मन्त्रान् प्रगृह्णातु सभत्र्री तदनुज्ञया॥
—भविष्य पुराण उत्तर पर्व ४। १३। ६३
उत्तम आचरण वाली विधवा स्त्री वेद- मन्त्रों को ग्रहण करे और सधवा स्त्री अपने पति की अनुमति से मन्त्रों को ग्रहण करे।
यथाधिकार: श्रौतेषु योषितां कर्मसु श्रुत:।
एवमेवानुमन्यस्व ब्रह्मणि ब्रह्मवादिनाम्॥ यमस्मृति
जिस प्रकार स्त्रियों को वेद के कर्मों में अधिकार है, वैसे ही ब्रह्मविद्या प्राप्त करने का भी अधिकार है।
कात्यायनी च मैत्रेयी गार्गी वाचक्रवी तथा।
एवमाद्या विदुब्र्रह्म तस्मात् स्त्री ब्रह्मविद् भवेत् ॥
—अस्य वामीय भाष्यम्
जैसे कात्यायनी, मैत्रेयी, वाचक्रवी, गार्गी आदि ब्रह्म (वेद और ईश्वर) को जानने वाली थीं, वैसे ही सब स्त्रियों को ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहिये।
वाल्मीकि रामायण में कौशल्या, कैकेयी, सीता, तारा आदि नारियों द्वारा वेदमन्त्रों का उच्चारण, अग्निहोत्र, सन्ध्योपासन का वर्णन आता है।
सन्ध्याकालमना: श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी।
नदीं चेमां शुभजलां सन्ध्यार्थे वरवर्णिनी॥
—वा० रा० ५। १४ ।। ४९
सायंकाल के समय सीता उत्तम जल वाली नदी के तट पर सन्ध्या करने अवश्य आयेगी।
वैदेही शोकसन्तप्ता हुताशनमुपागमत्।
—वाल्मीकि० सुन्दर ५३। २६
अर्थात्- तब शोक सन्तप्त सीताजी ने हवन किया।
‘तदा सुमन्त्रं मन्त्रज्ञा कैकेयी प्रत्युवाच ह।’
—वा० रा० अयो० १४। ६१
वेदमन्त्रों को जानने वाली कैकेयी ने सुमन्त्र से कहा।
सा क्षौमवसना हृष्ट नित्यं व्रतपरायणा।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमंगला॥ —वा० रा० २। २०। १५
वह रेशमी वस्त्र धारण करने वाली, व्रतपरायण, प्रसन्नमुखी, मंगलकारिणी कौशल्या मन्त्रपूर्वक अग्निहोत्र कर रही थी।
तत: स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी।
अन्त:पुरं सहस्त्रीभि: प्रविष्टि शोकमोहिता॥ —वा० रा० ४। १६। १२
तब मन्त्रों को जानने वाली तारा ने अपने पति बाली की विजय के लिये स्वस्तिवाचन के मन्त्रों का पाठ करके अन्त:पुर में प्रवेश किया।
गायत्री मन्त्र के अधिकार के सम्बन्ध में तो ऋषियों ने और भी स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है। नीचे के दो स्मृति प्रमाण देखिये, जिनमें स्त्रियों को गायत्री की उपासना का विधान किया गया है।

पुरा कल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते।
अध्यापनं च वेदानां सावित्रीवाचनं तथा॥ —यम
प्राचीन समय में स्त्रियों को मौञ्जी बन्धन, वेदों का पढ़ाना तथा गायत्री का उपदेश इष्ट था।
इतने पर भी यदि कोई यह कहे कि स्त्रियों को गायत्री का अधिकार नहीं, तो दुराग्रह या कुसंस्कार ही कहना चाहिये।

मनुष्य की समझ बड़ी विचित्र है। उसमें कभी- कभी ऐसी बातें भी घुस जाती हैं, जो सर्वथा अनुचित एवं अनावश्यक होती हैं। प्राचीन काल में नारी जाति का समुचित सम्मान रहा, पर एक समय ऐसा भी आया जब स्त्री जाति को सामूहिक रूप से हेय, पतित, त्याज्य, पातकी, अनधिकारी व घृणित ठहराया। उस विचारधारा ने नारी के मनुष्योचित अधिकारों पर आक्रमण किया और पुरुष की श्रेष्ठता एवं सुविधा को पोषण देने के लिए उस पर अनेक प्रतिबन्ध लगाकर शक्तिहीन, साहसहीन, विद्याहीन बनाकर उसे इतना लुंज- पुञ्ज कर दिया कि बेचारी को समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकना तो दूर, आत्मरक्षा के लिए भी दूसरों का मोहताज होना पड़ा। आज भारतीय नारी पालतू पशु- पक्षियों जैसी स्थिति में पहुँच गयी है। इसका कारण वह उलटी समझ ही है, जो मध्यकाल के सामन्तशाही अहंकार के साथ उत्पन्न हुई थी। प्राचीन काल में भारतीय नारी सभी क्षेत्रों में पुरुषों के समकक्ष थी। रथ के दोनों पहिये ठीक होने से समाज की गाड़ी उत्तमता से चल रही थी; पर अब एक पहिया क्षत- विक्षत हो जाने से दूसरा पहिया भी लडख़ड़ा गया। अयोग्य नारी समाज का भार नर को ढोना पड़ रहा है। इस अव्यवस्था ने हमारे देश और जाति को कितनी क्षति पहुँचाई है, उसकी कल्पना करना भी कष्टसाध्य है। मध्यकालीन अन्धकार युग की कितनी ही बुराइयों को सुधारने के लिए विवेकशील और दूरदर्शी महापुरुष प्रयत्नशील हैं, यह प्रसन्नता की बात है। विज्ञ पुरुष अनुभव करने लगे हैं कि मध्यकालीन संकीर्णता की लौहशृंखला से नारी को न खोला गया, तो हमारा राष्ट्र प्राचीन गौरव को प्राप्त नहीं कर सकता। पूर्वकाल में नारी जिस स्वस्थ स्थिति में थी, उस स्थिति में पुन: पहुँचने से हमारा आधा अंग विकसित हो सकेगा और तभी हमारा सर्वांगीण विकास हो सकेगा। इन शुभ प्रयत्नों में मध्यकालीन कुसंस्कारों की रूढ़ियों का अन्धानुकरण करने को ही धर्म समझ बैठने वाली विचारधारा अब भी रोड़े अटकाने से नहीं चूकती।
ईश्वर- भक्ति, गायत्री की उपासना तक के बारे में यह कहा जाता है कि स्त्रियों को अधिकार नहीं। इसके लिए कई पुस्तकों के श्लोक भी प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनमें यह कहा है कि स्त्रियाँ वेद- मन्त्रों को न पढ़ें, न सुनें, क्योंकि गायत्री भी वेद मन्त्र है, इसलिए स्त्रियाँ उसे न अपनाएँ। दरअसल, एक काल भारतवर्ष में ऐसा बीता है, जब नारी को निकृष्ट कोटि के जीव की तरह समझा गया है। यूरोप में तो उस समय यह मान्यता थी कि घास- पात की तरह स्त्रियों में भी आत्मा नहीं होती। यहाँ भी उनसे मिलती- जुलती ही मान्यता ली गई थी। कहा जाता था कि—
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थिति:। —मनु० ९/१८
अर्थात्- स्त्रियाँ निरिन्द्रिय (इन्द्रिय रहित), मन्त्ररहिता, असत्य स्वरूपिणी हैं।
अध्ययन रहितया स्त्रिया तदनुष्ठानमशक्यत्वात् तस्मात् पुंस एवोपस्थानादिकम्।
स्त्री अध्ययन रहित होने के कारण यज्ञ में मन्त्रोच्चार नहीं कर सकती, इसलिये केवल पुरुष मन्त्र पाठ करें।
स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम्। अर्थ- स्त्री और शूद्र वेद न पढ़ें।
न वै कन्या न युवति:। अर्थ- न कन्या पढ़े, न स्त्री पढ़े।
वरन् उसमें तो सर्वत्र नारी की महानता का वर्णन है और उसे भी पुरुष जैसे ही धार्मिक अधिकार प्राप्त हैं। यह प्रतिबन्ध तो कुछ काल तक कुछ व्यक्तियों की एक सनक के प्रमाण मात्र हैं। ऐसे लोगों ने धर्मग्रन्थों में जहाँ- तहाँ अनर्गल श्लोक ठूँसकर अपनी सनक को ऋषि प्रणीत सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। मनु ने नारी जाति की महानता को मुक्तकण्ठ से स्वीकार करते हुए लिखा है-
प्रजनार्थं महाभागा: पूजार्हा गृहदीप्तय:।
स्त्रिय: श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन॥ मनु० ९। २६
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषारतिरुत्तमा।
दाराधीनस्तथा स्वर्ग: पितृणामात्मनश्च ह॥ -मनु० ९। २८
यत्र नाय्र्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:॥ -मनु० ३। ५६
अर्थात्- स्त्रियाँ पूजा के योग्य हैं, महाभाग हैं, घर की दीप्ति हैं; कल्याणकारिणी हैं। धर्म कार्यों की सहायिका हैं। स्त्रियों के अधीन ही स्वर्ग है। जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ उनका तिरस्कार होता है, वहाँ सब क्रियायें निकल हो जाती हैं।
जिन मनु भगवान की श्रद्धा नारी जाति के प्रति इतनी उच्चकोटि की थी, उन्हीं के ग्रन्थ में यत्र- तत्र स्त्रियों की भरपेट निन्दा और उनकी धार्मिक सुविधा का निषेध है। मनु जैसे महापुरुष ऐसी परस्पर विरोधी बात नहीं लिख सकते। निश्चय ही उनके ग्रन्थों में पीछे वाले लोगों ने मिलावट की है। इस मिलावट के प्रमाण भी मिलते हैं। देखिये-

मान्या कापि मनुस्मृतिस्तदुचिता व्याख्यापि मेधातिथे:।
सा लुप्तैव विधेर्वशात्क्वचिदपि प्राप्यं न तत्पुस्तकम्॥
क्षोणीन्द्रो मदन: सहारणसुतो देशान्तरादाहृतै:।
जीर्णोद्धारमचीकरत् तत इतस्तत्पुस्तकैर्लिख्यते॥
-मेधातिथिरचित मनुभाष्य सहित मनुस्मृतेरुपोद्घात:
अर्थात्- प्राचीन काल में कोई प्रामाणिक मनुस्मृति थी और उसकी मेधातिथि ने उचित व्याख्या की थी। दुर्भाग्यवश वह पुस्तक लुप्त हो गयी। तब राजा मदन ने इधर- उधर की पुस्तकों से उसका जीर्णोद्धार कराया।
केवल मनुस्मृति तक यह घोटाला सम्मिलित नहीं है, वरन् अन्य ग्रन्थों में भी ऐसी ही मिलावटें की गयी हैं और अपनी मनमानी को शास्त्र विरुद्ध होते हुए भी ‘‘शास्त्र वचन’’ सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है।
दैत्या: सर्वे विप्रकुलेषु भूत्वा, कृते युगे भारते षट्सहस्र्याम्।
निष्कास्य कांश्चिन्नवनिर्मितानां निवेशनं तत्र कुर्वन्ति नित्यम् ॥
-गरुड़ पुराण उ० खं० ब्रह्म का० १। ६९
राक्षस लोग कलियुग में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर महाभारत के छ: हजार श्लोकों में से अनेक श्लोकों को निकाल देंगे और उनके स्थान पर नये कृत्रिम श्लोक गढक़र प्रक्षेप कर देंगे।’
यही बात माधवाचार्य ने इस प्रकार कही है-
क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्तिक्वचिदन्तरितानपि।
कुर्यु: क्वचिच्च व्यत्यासं प्रमादात् क्वचिदन्यथा॥
अनुत्पन्ना: अपि ग्रन्था व्याकुला इति सर्वश:।
स्वार्थी लोग कहीं ग्रन्थों के वचनों को प्रक्षिप्त कर देते हैं, कहीं निकाल देते हैं, कहीं जान- बूझकर, कहीं प्रमाद से उन्हें बदल देते हैं। इस प्रकार प्राचीन ग्रन्थ बड़े अस्त- व्यस्त हो गये हैं। जिन दिनों यह मिलावट की जा रही थी, उन दिनों भी विचारवान विद्वानों ने इस गड़बड़ी का डटकर विरोध किया था। महर्षि हारीत ने इन स्त्री- द्वेषी ऊल- जलूल उक्तियों का घोर विरोध करते हुए कहा था-
न शूद्रसमा: स्त्रिय:। नहि शूद्र योनौ ब्राह्मणक्षत्रियवैश्या जायन्ते, तस्माच्छन्दसा स्त्रिय: संस्कार्या:॥ -हारीत
स्त्रियाँ शूद्रों के समान नहीं हो सकतीं। शूद्र- योनि से भला ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य की उत्पत्ति किस प्रकार हो सकती है? इसलिए स्त्रियों को वेद द्वारा संस्कृत (संस्कारित) करना चाहिये।
नर और नारी एक ही रथ के दो पहिये हैं, एक ही शरीर की दो भुजायें हैं, एक ही मुख के दो नेत्र हैं। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। दोनों अर्ध अगों के मिलन से एक पूर्ण अंग बनता है। मानव प्राणी के अविच्छिन्न दो भागों में इस प्रकार की असमानता, द्विधा, नीच- ऊँच की भावना पैदा करना भारतीय परम्परा के सर्वथा विपरीत है। भारतीय धर्म में सदा नर- नारी को एक और अविच्छिन्न अंग माना है-

यथैवात्मा तथा पुत्र: पुत्रेण दुहिता समा। -मनु० ९। १३०
आत्मा के समान ही सन्तान है। जैसा पुत्र वैसी ही कन्या, दोनों समान हैं।
एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह।
विप्रा: प्राहुस्तथा चैतद्यो भत्र्ता सा स्मृतांगना॥ -मनु० ९। ४५
पुरुष अकेला नहीं होता, किन्तु स्वयं पत्नी और सन्तान मिलकर पुरुष बनता है।
अथो अद्र्धो वा एष आत्मन: यत् पत्नी।
अर्थात् पत्नी पुरुष का आधा अंग है।

ऐसी दशा में यह उचित नहीं कि नारी को प्रभु की वाणी वेदज्ञान से वंचित रखा जाए। अन्य मन्त्रों की तरह गायत्री का भी उसे पूरा अधिकार है। ईश्वर की हम नारी के रूप में, गायत्री के रूप में उपासना करें और फिर नारी जाति को ही घृणित, पतित, अश्पृस्या, अनधिकारिणी ठहराएँ, यह कहाँ तक उचित है, इस पर हमें स्वयं ही विचार करना चाहिये।

स्त्रियों को वेदाधिकार से वंचित रखने तथा उन्हें उसकी अनधिकारिणी मानने से उसके सम्बन्ध में स्वभावत: एक प्रकार की हीन भावना पैदा हो जाती है, जिसका दूरवर्ती घातक परिणाम हमारे सामाजिक तथा राष्ट्रीय विकास पर पड़ता है। यों तो वर्तमान समय में अधिकांश पुरुष भी वेदों से अपरिचित हैं और उनके सम्बन्ध में ऊटपटांग बातें करते रहते हैं। पर किसी समुदाय को सिद्धान्त रूप से अनधिकारी घोषित कर देने पर परिणाम हानिकारक ही निकलता है। इसलिये वितण्डावादियों के कथनों का ख्याल न करके हमको स्त्रियों के प्रति किये गये अन्याय का अवश्य ही निराकरण करना चाहिये।
वेद- ज्ञान सबके लिये है, नर- नारी सभी के लिये है। ईश्वर अपनी सन्तान को जो सन्देश देता है, उसे सुनने पर प्रतिबन्ध लगाना, ईश्वर के प्रति द्रोह करना है। वेद भगवान स्वयं कहते हैं-

समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन: सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि॥ -ऋग्वेद १०। १९१। ३
अर्थात्- हे समस्त नारियो! तुम्हारे लिये ये मन्त्र समान रूप से दिये गये हैं तथा तुम्हारा परस्पर विचार भी समान रूप से हो। तुम्हारी सभायें सबके लिये समान रूप से खुली हुई हों, तुम्हारा मन और चित्त समान मिला हुआ हो, मैं तुम्हें समान रूप से मत्रों का उपदेश करता हूँ और समान रूप से ग्रहण करने योग्य पदार्थ देता हूँ।

मालवीय जी द्वारा निर्णय

स्त्रियों को वेद- मत्रों का अधिकार है या नहीं? इस प्रश्न को लेकर काशी के पण्डितों में पर्याप्त विवाद हो चुका है। हिन्दू विश्वविद्यालय काशी में कुमारी कल्याणी नामक छात्रा वेद कक्षा में प्रविष्ट होना चाहती थी, पर प्रचलित मान्यता के आधार पर विश्वविद्यालय ने उसे दाखिल करने से इन्कार कर दिया। अधिकारियों का कथन था कि शास्त्रों में स्त्रियों को वेद- मन्त्रों का अधिकार नहीं दिया गया है। इस विषय को लेकर पत्र- पत्रिकाओं में बहुत दिन विवाद चला। वेदाधिकार के समर्थन में ‘‘सार्वदेशिक’’ पत्र ने कई लेख छापे और विरोध में काशी के ‘‘सिद्धान्त’’ पत्र में कई लेख प्रकाशित हुए। आर्य समाज की ओर से एक डेपुटेशन हिन्दू विश्वविद्यालय के अधिकारियों से मिला। देश भर में इस प्रश्न को लेकर काफी चर्चा हुई। अन्त में विश्वविद्यालय ने महामना मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में इस प्रश्न पर विचार करने के लिये एक कमेटी नियुक्त की, जिसमें अनेक धार्मिक विद्वान् सम्मिलित किये गये। कमेटी ने इस सम्बन्ध में शास्त्रों का गम्भीर विवेचन करके यह निष्कर्ष निकाला कि स्त्रियों को भी पुरुषों की भाँति वेदाधिकार है। इस निर्णय की घोषणा २२ अगस्त सन् १९४६ को सनातन धर्म के प्राण समझे जाने वाले महामना मालवीय जी ने की। तदनुसार कुमारी कल्याणी देवी को हिन्दू विश्वविद्यालय की वेद कक्षा में दाखिल कर लिया गया और शास्त्रीय आधार पर निर्णय किया कि- विद्यालय में स्त्रियों के वेदाध्ययन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं रहेगा। स्त्रियाँ भी पुरुषों की भाँति वेद पढ़ सकेंगी। पं० मदनमोहन मालवीय सनातन धर्म के प्राण थे। उनकी शास्त्रज्ञता, विद्वत्ता, दूरदर्शिता एवं धार्मिक दृढ़ता असन्दिग्ध थी। ऐसे महापण्डित ने अन्य अनेकों प्रामाणिक विद्वानों के परामर्श से स्वीकार किया है। वेदों में बीसियों स्त्री- ऋषिकाओं का उल्लेख मन्त्र रचयिता के रूप में लिखा मिलता है। पर ऐसे लोग उधर दृष्टिपात न करके मध्यकाल के ऋषियों के नाम पर स्वार्थी लोगों द्वारा लिखी पुस्तकों के आधार पर समाज सुधार के पुनीत कार्य में व्यर्थ ही टाँग अड़ाया करते हैं। ऐसे व्यक्तियों की उपेक्षा करके वर्तमान युग के ऋषि मालवीय जी की सम्मति का अनुसरण करना ही समाज- सेवकों का कर्तव्य है ।। स्रियाँ अनाधिकारिणी नहीं है। हिन्दूधर्म वैज्ञानिक धर्म है, विश्व धर्म है। इसमें ऐसी विचारधारा के लिये कोई स्थान नहीं है, जो स्त्रियों को धर्म, ईश्वर, वेद विद्या आदि के उत्तम मार्ग से रोककर उन्हें अवनत अवस्था में पड़ी रहने के लिए विवश करे। प्राणीमात्र पर अनन्त दया एवं करुणा रखने वाले ऋषि- मुनि ऐसे निष्ठुर नहीं हो सकते, जो ईश्वरीय ज्ञान वेद से स्त्रियों को वंचित रखकर उन्हें आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने से रोकें। हिन्दूधर्म अत्यधिक उदार है, विशेषत: स्त्रियों के लिए तो उसमें बहुत ही आदर, श्रद्धा एवं उच्च स्थान है। ऐसी दशा में यह कैसे हो सकता है कि गायत्री उपासना जैसे उत्तम कार्य के लिए उन्हें अयोग्य घोषित किया जाए?

जहाँ तक दस- पाँच ऐसे श्लोक मिलते हैं, जो स्त्रियों को वेद- शास्त्र पढ़ने से रोकते हैं, पण्डित समाज में उन पर विशेष ध्यान दिया गया है। प्रारम्भ में बहुत समय तक हमारी भी ऐसी ही मान्यता रही कि स्त्रियाँ वेद न पढ़ें। परन्तु जैसे- जैसे शास्त्रीय खोज में अधिक गहरा प्रवेश करने का अवसर मिला, वैसे- वैसे पता चला कि प्रतिबन्धित श्लोक मध्यकालीन सामन्तवादी मान्यता के प्रतिनिधि हैं। उसी समय में इस प्रकार के श्लोक बनाकर ग्रन्थों में मिला दिये गये हैं। सत्य सनातन वेदोक्त भारतीय धर्म की वास्तविक विचारधारा स्त्रियों पर कोई बन्धन नहीं लगाती। उसमें पुरुषों की भाँति ही स्त्रियों को भी ईश्वर- उपासना एवं वेद- शास्त्रों का आश्रय लेकर आत्मलाभ करने की पूरी- पूरी सुविधा है।

विचारवान व्यक्तियों को अपने आप से एकान्त में बैठकर यह प्रश्र करना चाहिए— (१) यदि स्त्रियों को गायत्री या वेदमन्त्रों का अधिकार नहीं, तो प्राचीनकाल में स्त्रियाँ वेदों की मन्त्रद्रष्ट्री- ऋषिकाएँ क्यों हुईं? (२) यदि वेद की वे अधिकारिणी नहीं तो यज्ञ आदि धार्मिक कृत्यों तथा षोडश संस्कारों में उन्हें सम्मिलित क्यों किया जाता है? (३) विवाह आदि अवसरों पर स्त्रियों के मुख से वेदमन्त्रों का उच्चारण क्यों कराया जाता है? (४) बिना वेदमन्त्रों के नित्य सन्ध्या और हवन स्त्रियाँ कैसे कर सकती हैं? (५) यदि स्त्रियाँ अनधिकारिणी थीं तो अनसूया, अहल्या, अरुन्धती, मदालसा आदि अगणित स्त्रियाँ वेदशास्त्रों में पारंगत कैसे थीं? (६) ज्ञान, धर्म और उपासना के स्वाभाविक अधिकारों से नागरिकों को वंचित करना क्या अन्याय एवं पक्षपात नहीं है? (७) क्या नारी को आध्यात्मिक दृष्टि से अयोग्य ठहराकर उनसे उत्पन्न होने वाली सन्तान धार्मिक हो सकती है? (८) जब स्त्री, पुरुष की अर्धांगिनी है तो आधा अंग अधिकारी और आधा अनधिकारी किस प्रकार रहा? आत्मा न स्त्री है, न पुरुष। वह विशुद्ध ब्रह्म ज्योति की चिनगारी है। आत्मिक प्रकाश प्राप्त करने के लिए जैसे पुरुष को किसी गुरु या पथ- प्रदर्शक की आवश्यकता होती है, वैसे ही स्त्री को भी होती है। तात्पर्य यह है कि साधना क्षेत्र में पुरुष- स्त्री का भेद नहीं। साधक ‘आत्मा’ है, उन्हें अपने को पुरुष- स्त्री न समझ कर आत्मा समझना चाहिए। साधना क्षेत्र में सभी आत्माएँ समान हैं। लिंग भेद के कारण कोई अयोग्यता उन पर नहीं थोपी जानी चाहिए।
महिलाओं के वेद- शास्त्र अपनाने एवं गायत्री साधना करने के असंख्य प्रमाण धर्मग्रन्थों में भरे पड़े हैं। उनकी ओर से आँखें बन्द करके किन्हीं दो- चार प्रक्षिप्त श्लोकों को लेकर बैठना और उन्हीं के आधार पर स्त्रियों को अनधिकारिणी ठहराना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। धर्म की ओर एक तो वैसे ही किसी की प्रवृत्ति नहीं है, फिर किसी को उत्साह, सुविधा हो तो उसे अनधिकारी घोषित करके ज्ञान और उपासना का रास्ता बन्द कर देना कोई विवेकशीलता नहीं है।
हमने भली प्रकार खोज विचार, मनन और अन्वेषण करके यह पूरी तरह विश्वास कर लिया है कि स्त्रियों को पुरुषों की भाँति ही गायत्री का अधिकार है। वे भी पुरुषों की भाँति ही माता की गोदी में चढऩे की, उसका आँचल पकडऩे की, उसका पय:पान करने की पूर्ण अधिकारिणी हैं। उन्हें सब प्रकार का संकोच छोडक़र प्रसन्नतापूर्वक गायत्री की उपासना करनी चाहिए। इससे उनके भव- बन्धन कटेंगे, जन्म- मरण की फाँसी से छूटेंगी, जीवन- मुक्ति और स्वर्गीय शान्ति की अधिकारिणी बनेंगी, साथ ही अपने पुण्य प्रताप से अपने परिजनों के स्वास्थ्य, सौभाग्य, वैभव एवं सुख- शान्ति की दिन- दिन वृद्धि करने में महत्त्वपूर्ण सहयोग दे सकेंगी। गायत्री को अपनाने वाली देवियाँ सच्चे अर्थों में देवी बनती हैं। उनके दिव्य गुणों का प्रकाश होता है, तदनुसार वे सर्वत्र उसी आदर को प्राप्त करती हैं जो उनका ईश्वर प्रदत्त जन्मजात अधिकार है।
नोट : यह आलेख हमें इंटरनेट पर सर्च करते हुए प्राप्त हुआ है। हमारा प्रयास यही है कि परम्परा में जो समानता के बीच है, उसे सामने लाया जाए और गायत्री परिवार का यह आलेख हमें मिला जो हम संशोधित रूप में अपराजिता की विचारधारा के अनुकूल संशोधित करके दे रहे हैं। हम आभारी हैं इस लेख के लेखक के जिन्होंने कम से कम इस पर प्रकाश डाला, वैसे समय के अनुरूप काफी बदलाव हुए हैं। अपराजिता में विचारधारा के इस अन्तर को ध्यान में रखा गया है मगर हम मूल लेख भी पढ़वाना चाहते हैं जिसका लिंक हम आपको दे रहे हैं। आप पूरा आलेख इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।

http://literature.awgp.org/book/Super_Science_of_Gayatri/v HYPERLINK “http://literature.awgp.org/book/Super_Science_of_Gayatri/v9.14” HYPERLINK “http://literature.awgp.org/book/Super_Science_of_Gayatri/v9.14″9.14

पत्रकारों का सूरत ए हाल,,,,कल भी बेहाल, आज भी बदहाल

सुषमा कनुप्रिया
अब 15 साल हो रहे हैं और जब मैं पत्रकारिता में आयी थी तो लड़कियाँ न के बराबर थीं। हालाँकि यह स्थिति अँग्रेजी और बांग्ला के अखबारों के साथ नहीं थी। पत्रकारों की परिभाषा में ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का दबदबा था। लोग हमारे हाथों में कलम नहीं बल्कि कैमरे और बूम तलाशा करते थे। हमसे अक्सर पूछा जाने वाला पहला सवाल ही होता कि हम किस चैनल से जुड़े हैं और जैसे ही मैं बताती कि मैं चैनल में नहीं बल्कि अखबार में काम करती थी तो सबके चेहरे लटक जाया करते थे। पत्रकार, वह भी महिला पत्रकार और वह भी हिन्दी अखबार की पत्रकार…स्थिति तो विचित्र ही थी। तब महिलाओं की उपस्थिति को सहजता से नहीं लिया जाता था मगर स्थिति तो सबके लिए ही एक जैसी थी मगर मेरे लिए समस्या दोहरे स्तर पर थी। वैसे ही जैसे हिन्दी मीडिया में काम कर रही अन्य लड़कियों के लिए होती थी मगर अब स्वीकृति बढ़ जाने से स्थिति थोड़ी बेहतर हुई थी।
मुझे याद है कि जब मैंने अपने दोस्तों और परिचितों को बताया था कि मुझे अखबार में नौकरी मिली है तो मुझे सावधान और सजग करने वाले लोग अधिक थे। उनका मानना था कि मीडिया में अच्छे लोग काम नहीं करते और लड़कियाँ तो बिलकुल नहीं क्योंकि पत्रकारों का सामना हर तरह के लोगों से होता है। मैं तब बहुत दब्बू टाइप हुआ करती थी क्योंकि पत्रकारिता में आने के पहले मेरी मंजिल कॉलेज से घर ही थी। हमारे घर में खासकर मेरे घर में लड़कियों के नौकरी करने की परम्परा नहीं थी और शिक्षण को आदर्श कार्य माना जाता था क्योंकि वहाँ सुरक्षा और तय ढर्रा था मगर मैंने जो क्षेत्र चुना या यूँ कहूँ कि जिस क्षेत्र ने मुझे चुना, वहाँ समय की तो सीमा ही नहीं थी। 2004 के बाद कोलकाता के हिन्दी मीडिया संस्थानों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी।

कुछ बड़े संस्थानों को छोड़ दें तो अधिकतर छोटे अखबार एक या दो दड़बेनुमा कमरों में चलते थे, आज भी चलते हैं। मीडिया संस्थानों को तब भी महिलाओं को निर्णायक पदों पर देखने में ऐतराज था, आज भी है। महिला पत्रकारों का अधिकतर समय संशय में गुजरता है और उनका अधिकतर डेजिग्नेशन अधिकतर मामलों में वरिष्ठ संवाददाता तक सीमित रहता है। जो संस्थान महिलाओं को कथित तौर पर प्रमुखता देते रहे हैं, वहाँ भी सुविधाओं के नाम पर शोषण अधिक है। आप अपनी रीढ़ की हड्डी तोड़कर उनके हवाले कर दें तो चीफ रिपोर्टर क्या ब्यूरो चीफ भी बनाये जा सकते हैं और ऐसा करने वाले लोग हैं जिनमें लड़कियाँ भी शामिल हैं। जिनको पत्रकारिता का सही अर्थ तक नहीं पता और वह अपने आकाओं के लिए काम निकालने का माध्यम भर हैं। वे सम्पादकों के निजी व्यवसाय सहयोगियों में अपनी स्वेच्छा से तब्दील हो चुकी हैं मगर आज मान्यता और तथाकथित पदोन्नति की सीमा पार करने वाले लोग वहीं हैं और ऐसी लड़कियाँ हैं। सवाल यह है कि इससे पत्रकारिता का क्या भला हुआ और लड़कियाँ कहाँ तक मानसिक और वैचारिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकी हैं? अगर ये आकलन करें तो आप सिर पीटने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते। मैंने आरम्भिक दिनों में पत्रकारिता की उड़ान देखी है तो स्याह अँधेरे भी देखे हैं। बड़े से बड़े पत्रकारों को चीफ रिपोर्टर से सम्पादक बने महानुभवों को थर – थर काँपते देखा है। इन सम्पादकों को अखबार के मालिकों के सामने हाथ जोड़ते, भागते और मातहतों पर हाथ उठाकर शेखी बघारते देखा है। सम्पादक साम, दाम, दंड भेद की नीति से पत्रकारों को लड़वाते, वरिष्ठ पत्रकारों की बेइज्जती कनिष्ठ पत्रकारों से करवाते देखा है। आज ऐसे सम्पादक सर्वेसर्वा हैं तो हिन्दी पत्रकारिता की उम्मीद ही खुद को धोखा देने की तरह है।
प्रगति के नाम पर 2 दर्जन से अधिक मीडियाकर्मियों को इसी शहर में रातों – रात बाहर का रास्ता दिखाया गया मगर एक भी आवाज नहीं उठी। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उनकी उम्र हो चुकी है तो सवाल यह है कि हमारी नीतियों में क्या वरिष्ठ नागरिकों के लिए जगह सिर्फ कागजों पर है? आपने पूरी व्यवस्था को बदलने के लिए उन तमाम लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जो आपके संस्थान की नींव की ईंट थे। आपने उनको प्रशिक्षण क्यों नहीं दिलवाया? क्या सीखना वरिष्ठों के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। सवाल यह है कि कितने मीडिया संस्थान पत्रकारों की कार्य कुशलता बढ़ाने के लिए किसी कार्यशाला अथवा सेमिनार आयोजित करते हैं…इस शहर के हिन्दी मीडिया संस्थानों में तो एक भी नहीं है। मैंने एक घटना तो यहाँ तक सुनी कि एक पूर्व कर्मी ने जब संस्थान में जाना चाहा तो उसे धक्के मारकर निकलवाया। कुछ स्वनामधन्य अखबारों ने तो पूर्व सम्पादकों के सन्दूक भी खुलवाकर देखे हैं…ऐसा मैं नहीं कहती। जगजाहिर कहानी है और पत्रकारिता के उत्कर्ष की बातें करते हैं तो यह क्या विडम्बना नहीं है?
जिलों की खबरें आती हैं, गलतियों से भरपूर होती हैं और जब उनसे मैंने ध्यान देने को कहा तो पता चला कि इन स्ट्रिंगरों को नाम मात्र की राशि मिलती है तो उनका दो -टूक उत्तर भी होता है कि जितना मिलेगा, उसी के हिसाब से काम करेंगे। आपने पत्रकारों को बुनियादी सुविधायें तक नहीं दीं तो आप उनसे उम्मीद ही नहीं कर सकते कि वह कुछ बेहतर और खोजपरक खबरें करें। जिला संवाददाताओं की स्थिति तो और भी खराब है। नाममात्र के पैसे और वह भी जब समय पर न मिलें तो उसके पास दूसरा विकल्प तलाशने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता। ऐसे पत्रकार ही दूसरे व्यवसाय भी करते हैं और दलाली तथा फिरौती भी। आप उनको कुछ कह नहीं सकते हैं क्योंकि आपने उनको समुचित सुविधायें नहीं दी हैं।
पत्रकारिता में सम्पादक आज सर्वेसर्वा नहीं है। विज्ञापन के अनुकूल नीतियाँ बनानी पड़ती हैं। पत्रकार होना संवाददाता, सब एडिटर भर नहीं है बल्कि परदे के पीछे आपके संस्थान को चमकाने के लिए जो लोग काम कर रहे हैं, वह भी आपकी दुनिया और पत्रकारिता का हिस्सा हैं। । मान्यता सिर्फ संवाददाताओं को मिलती है जो कि अधिक से अधिक 60 प्रतिशत हो भी तो मान्यता प्राप्त पत्रकार अधिकतम प्रतिशत 30 प्रतिशत भर हैं तो फिर ये जो 70 प्रतिशत हिस्सा है,..उनके हिस्से क्या आया। इनमें गैर मान्यता प्राप्त संवाददाता, सब एडिटरछायाचित्रकार, पेजीनेटर, वीडियो एडिटर, सर्कुलेशन से लेकर विज्ञापन तक के लोग शामिल हैं..ये सब हाशिये पर क्यों हैं…?
पत्रकारों से मारपीट, बदसलूकी व हत्या
सरकार केन्द्र की हो या राज्य की, उसका उद्देश्य पत्रकारों से काम निकालना होता है और इसके बाद पक्ष हो या विपक्ष, हर जगह मीडिया को पीटा जाता है। बंगाल में ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हो चुकी हैं। त्रिपुरा के एक निजी चैनल में काम करने वाले पत्रकार शांतनु भौमिक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ के शोध के अनुसार देश में साल 1992 से अब तक 91 पत्रकारों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। विडंबना यह है कि सिर्फ 4 प्रतिशत मामलों में ही इंसाफ मिला। 96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को किया गया माफ 96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को माफी मिल गई। 23 मामलों में हत्या के पीछे छिपा मंसूबा नहीं पता चला। सिर्फ 38 मामलों में मोटिव स्पष्ट हो पाया। जिनकी मौत का कारण स्पष्ट हुआ उनमें कई को इंसाफ नहीं मिला। कुछ को मिला तो आधा अधूरा। सबसे ज्यादा हत्या राजनीतिक कारणों से हुई हत्या सबसे ज्यादा 47 प्रतिशत पत्रकारों की मौत राजनीति क्षेत्रों को कवर करने के दौरान हुई है। उसे बाद भ्रष्टाचार को उजागर करने वाल 37 प्रतिशत पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया। 21 प्रतिशत अपराध, 21 प्रतिशत बिजनेस व 21 प्रतिशत संस्कृति संबंधित क्षेत्रों को कवर करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया गया। वहीं मानवाधिकार को लेकर 18 प्रतिशत पत्रकारों की मौते हुईं। आपको बता दें कि जिन पत्रकारों की हत्या हुई वह एक साथ दो तीन क्षेत्रों को देखते थे, इसलिए आंकड़ा 100 प्रतिशत से ऊपर है। महिलाओं को तो यौन उत्पीड़न से गुजरना पड़ता है और बड़ी -बड़ी हस्तियाँ भी ऐसा करने में पीछे नहीं हैं।


प्रिंट पत्रकारों को सबसे ज्यादा बनाया गया निशाना
लगभग 88 प्रतिशत पत्रकारों ऐसे पत्रकारों को निशान बनाया गया जो प्रिंट मीडिया में काम करते थे। 12 प्रतिशत टीवी पत्रकारों की हत्या की गाई। वहीं 8 प्रतिशत रेडियो व इंटरनेट पत्रकारिता करने वालों का निशाना बनाया गया। हत्या का शक राजनीतिक दलों पर सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्या के बाद जांच में पाया गया कि 36 फीसदी पत्रकारों कि हत्या में राजनीतिक दलों के हाथ होने की आशंका जताई गई। 28 फीसदी हत्याओं में किसी आपराधिक समूह पर शक किया गया। स्थानीय लोगों के शामिल होने की आशंका 12 फीसदी हत्याओं में हुई। वहीं 12 फीसदी हत्याओं में किसी सरकारी अधिकारी व पैरामिलिट्री पर शक किया गया। पत्रकारों की हत्या के मामले में भारत दुनिया में 14वें स्थान पर पूरी दुनिया में ऐसे कई देश है जहां पर पत्रकारों की मौत के बाद उन्हें इंसाफ नहीं मिला। भारत ऐसे देशों की सूची में 14वीं स्थान पर है। इन देशों की सूची में सबसे ऊपर सोमानिया और इराक है। इसके अलावा पाक, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका जैसे देश भी शामिल है। इन सभी देशों के 83 फीसदी मामले अब भी अनसुलझे हें 96 फीसदी मामलों में स्थानीय पत्रकारों को निशाना बनाया गया था। प्रत्येक दस में से चार पत्रकारों को बंदी बनाया गया या पहले धमकियां मिली थी। (सन्दर्भ – साभार समाचार फॉर मीडिया)

शांतनु भौमिक को भी मार डाला गया

भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा ख़तरे की ज़द में रहते हैं क्योंकि वे कम चर्चित होते हैं। साल 2017 में बेंगलुरु में एक पत्रकार गौरी लंकेश को उनके घर के बाहर ही गोली मार दी गई। इसी तरह त्रिपुरा में एक क्राइम रिपोर्टर सुदीप दत्ता भौमिक की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद कई अख़बारों ने इसके विरोध में अपने संपादकीय हिस्से को खाली छोड़ दिया था। कितनी सरकारें, संस्थाएं और लोगों मीडिया को बचाने के लिए सड़क पर उतरे, यह एक सवाल है क्योंकि चौथा खम्भा बचेगा ही नहीं तो बाकी तीन खम्भों की हिफाजत कैसे होगी?
इतिहास भी अधूरा और उपेक्षित
हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया का इतिहास दरअसल सम्पादकों और उनके अखबारों का इतिहास है। सवाय है कि क्या युगल किशोर सुकुल ने अकेले अखबार निकाला होगा जो कि सम्भव ही नहीं है तो बाकी लोग कहाँ गये? कृष्ण बिहारी मिश्र की पुस्तक सम्पादकों पर बात करती है, संवाददाताओं, छायाकारों, पृष्ठ सज्जाकारों और प्रिटिंग के इतिहास पर खास खोज नहीं हुई। हिन्दी का पहला अखबार जहाँ निकला, आज आमड़तल्ला गली में वह मकान गुम है। बहुत से पत्रकार गरीबी में मरे और आज भी जी रहे हैं। पहला पेजिनेटर, पहली महिला पत्रकार, छायाकार, सब मौन हैं। क्या मीडिया संस्थानों में इन पर शोध नहीं होना चाहिए?
दुनिया में पत्रकारों की स्वतन्त्रता हाशिये पर
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में इरिट्रिया सबसे निचली पायदान पर है। तानाशाही शासन वाले इस पूर्व अफ्रीकी देश के खस्ताहाल की खबरें बाहर नहीं निकलतीं। कई पत्रकारों को मजबूरन देश छोड़ना पड़ा है। इरिट्रिया के बारे में निष्पक्ष जानकारी पाने के लिए पेरिस से चलने वाले रेडियो एरीना को एकलौता स्रोत माना जाता है।
तानाशाह के इशारे पर – पूरी दुनिया की नजर से छिपे हुए उत्तरी कोरिया में भी प्रेस की आजादी नहीं पाई जाती। शासक किम जोंग उन की मशीनरी मीडिया में प्रकाशित सामग्री पर पैनी नजर रखती है। लोगों को केवल सरकारी टीवी और रेडियो चैनल मिलते हैं और जो लोग अपनी राय जाहिर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें अक्सर राजनैतिक कैदी बना दिया जाता है।
तुर्कमेनिस्तान पर नजर – केवल एक अखबार है और इस अखबार के संपादकीय भी छपने से पहले जांचे जाते हैं। हाल ही में आए एक नए कानून से लोगों को कुछ विदेशी मीडिया संस्थानों की खबरें तक पहुंच मिली है। इंटरनेट और तमाम वेबसाइटों पर सरकार की नजर होती है।
आलोचकों का सफाया – विएतनाम में स्वतंत्र पत्रकारिता का कोई अस्तित्व ही नहीं है. सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पत्रकारों को बताती हैं कि क्या प्रकाशित होगा। (भारतीय वामपंथी गौर से जरूर पढ़ें जो कि भारत में लोकतंत्र की दुहाई देते हैं)। कई मीडिया संस्थानों के पत्रकार, संपादक, प्रकाशिक खुद ही पार्टी के सदस्य हैं। अब ब्लॉगरों पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है। पार्टी के विरुद्ध लिखने पर जेल में डाल दिया जाता है.।
चीन में नहीं आजादी – रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि चीन दुनिया में पत्रकारों और ब्लॉगरों के लिए सबसे बड़ी जेल है। किसी भी न्यूज कवरेज के पसंद ना आने पर शासन संबंधित पक्ष के विरुद्ध कड़े कदम उठाता है। विदेशी पत्रकारों पर भी भारी दबाव है और कई बार उन्हें इंटरव्यू देने वाले चीनी लोगों को भी जेल में बंद कर दिया जाता है।
सीरिया में सुलगते हालात — सीरिया में अब तक ऐसे कई पत्रकारों को मौत की सजा दी जा चुकी है, जो असद शासन के खिलाफ हुई बगावत के समय सक्रिय थे। रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स ने सीरिया को कई सालों से प्रेस की आजादी का शत्रु घोषित किया हुआ है। वहां असद शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाला अल-नुसरा फ्रंट और आईएस ने बदले की कार्रवाई में सीरिया के सरकारी मीडिया संस्थान के रिपोर्टरों पर हमले किए और कईयों को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतारा।

चित्र साभार

भारत भी पीछे – इस देश में आपातकाल लग चुका है तो सेंशरशिप का कोपभाजन अखबारों को भी बनना पड़ा था। आए दिन हत्यायें आम बात हैं। लोकतांत्रिक और बहुजातीय देश होने के बावजूद भारत प्रेस फ्रीडम की सूची में शामिल 180 देशों में 136वें नंबर पर है. उसके आस पास के देशों में होंडुरास, वेनेज्वेला और चाड जैसे देश हैं।

बात अब मजीठिया पर
उच्चतम न्यायालय ने पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के वेतन पुनर्निर्धारण के लिए गठित मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को शुक्रवार को बरकरार रखते हुए कर्मचारियों को परिवर्तित वेतन देने का निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि कर्मचारियों को परिवर्तित वेतन 11 नवंबर, 2001 से मिलना चाहिए। सरकार ने इसी तारीख को बोर्ड की सिफारिशें अधिसूचित की थीं। न्यायालय ने कहा कि कर्मचारियों को नया वेतन अप्रैल, 2014 से मिलेगा और नियोक्ता को 1 साल के भीतर 4 किस्तों में बकाया राशि का भुगतान करना होगा। न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिफारिशों को वैध ठहराते हैं। न्यायाधीशों ने कहा कि बोर्ड ने अपनी सिफारिशें देने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया था और उसके तथा उसके गठन के बारे में लगाए गए आरोप सही नहीं हैं। न्यायालय ने बोर्ड के गठन की वैधानिकता और इसकी सिफारिशों को चुनौती देने वाली विभिन्न समाचार-पत्रों के प्रबंधकों की याचिकाएं खारिज कर दीं। न्यायालय ने कहा कि अतिरिक्त वेतन (वेरिएबल पे) के बारे में बोर्ड की सिफारिशें भी उसके अधिकार क्षेत्र में थीं। न्यायालय ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि वेतन संरचना अनुचित है। न्यायालय ने इस साल जनवरी में समाचार-पत्रों की याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद कहा था कि निर्णय बाद में सुनाया जाएगा। श्रम मंत्रालय ने समाचार पत्र उद्योग की आपत्तियों के बावजूद 2007 में मजीठिया वेतन बोर्ड का गठन किया था और इसके बाद जनवरी, 2008 से कर्मचारियों को मूल वेतन का 30 फीसदी तदर्थता के आधार पर अंतरिम राहत देने की घोषणा की गई थी। भारी वित्तीय बोझ के बावजूद समाचार-पत्र उद्योग ने इसे लागू किया था। वेतन बोर्ड ने 31 दिसंबर, 2010 को अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी थीं जिन्हें केंद्र ने कुछ संशोधनों के साथ 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचित किया था। ये खबर तमाम बड़े अखबारों और मीडिया संस्थानों ने दबायी और समाचार कहीं नहीं दिखा। मान्यता प्राप्त या गैर मान्यता प्राप्त, सब पत्रकारों की स्थिति एक ही है….मनाइए पत्रकारिता दिवस….।
(सन्दर्भ – साभार समाचार फॉर मीडिया, डी डब्ल्यू, वेबदुनिया)

पुराना किला में प्रदर्शित की जाएगी हड़प्पा, मोहनजोदड़ो युग की कलाकृतियां

नयी दिल्ली : दिल्ली के ऐतिहासिक पुराना किला में दी सेन्ट्रल ऐन्टिक्वटी क्लेक्शन (सीएसी) प्रखंड को एक आधुनिक गैलरी में बदला जा रहा है जिसमें पहली बार हड़प्पा , मोहनजोदाड़ो , तक्षशिला और चन्हूदड़ो की कलाकृतियों और मिट्टी के बर्तनों को प्रदर्शनी में रखा जाएगा। एक सरकारी बयान में बताया गया कि मध्य एशिया और भारतीय स्थल जैसे कि कालीबंगन , हस्तिनापुर , अरिकामेडु , तमलुक जैसे भारतीय स्थलों की कलाकृतियां भी यहां कला प्रदर्शनी में रखी जाएंगी। बयान में बताया गया है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) यहां संरक्षण और उन्नयन का काम कर रहा है। दो लाख से अधिक कलाकृतियों और बर्तनों को सीएसी की प्रदर्शनी में प्रस्तुत किया जाएगा। बयान में बताया गया है कि पुराना किला के आसपास खाई वाले क्षेत्र को फिर से ठीक करने के लिए आवश्यक विकास कार्य शुरू किया गया है और जल्द ही इसे पूरा कर लिया जाएगा।

निपाह वायरस, लक्षण और बचाव

केरल में चमगादड़ से फैलने वाले खतरनाक निपाह वायरस ने आतंक मचा रखा है। अब तक करीब एक दर्जन लोग इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं। कर्नाटक, ओडिशा और हिमाचल प्रदेश में भी इसके फैलने की खबरों से हड़कंप मच गया है। वहीं इसने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की भी चिंता बढ़ा दी है। मंत्रालय की ओर से एक एडवाइजरी जारी कर सभी राज्यों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
वहीं, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने एक कमेटी बनाई है जो बीमारी की तह तक जाने में जुटी है। वैसे यह एक तरह का दिमागी बुखार है, जिसकी चपेट में आकर लोगों की जान जा रही है। यह संक्रमित इंसान से स्‍वस्‍थ मनुष्‍य तक बड़ी आसानी से फैल सकता है। बताया जा रहा है कि निपाह वायरस संक्रमित चमगादड़ों, संक्रमित सुअर या संक्रमित व्‍यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है।
क्‍या है निपाह वायरस – विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक निपाह एक ऐसा वायरस है जो चमगादड़ों से इंसानों में फैलता है। यह जानवरों और इंसानों दोनों में गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है। इस वायरस का मुख्‍य स्रोत फल खाने वाले चमगादड़ (फ्रूट बैट) हैं। इन्हें फ्लाइंग फॉक्स के नाम से भी जाना जाता है।

लक्षण – निपाह वायरस के लक्षण दिमागी बुखार की तरह ही हैं। बीमारी की शुरुआत सांस लेने में दिक्‍कत, चक्कर आना, तेज सिरदर्द और फिर बुखार से होती है है। इसके बाद बुखार दिमाग तक पहुंच जाता है, जिससे मरीज की मौत भी हो सकती है।

इलाज – हालांकि, अब तक इस भयानक निपाह वायरस का कोई वैक्‍सीन नहीं बन पाया है। बचाव ही इसका एकमात्र इलाज है। इससे संक्रमित रोगी की उचित देखभाल और डॉक्‍टरों की कड़ी निगरानी में रखा जाना चाहिए।

निपाह वायरस के कैसे बचें?

1. चमगादड़ों की लार या पेशाब के संपर्क में न आएं
2. खासकर पेड़ से गिरे फलों को खाने से बचें
3. संक्रमित इंसानों और पशुओं खासकर सुअरों के संपर्क में न आएं
4. निपाह वायरस के अधिक प्रभाव वाले इलाकों में जाने से बचें
5. इस्तेमाल में नहीं लाए जा रहे कुओं में पर जानें से बचें
6 केरल सहित उसके पड़ोसी राज्यों से आने वाले फल जैसे केला, आम व खजूर खाने से परहेज करें
7. फलों को पोटाश वाले पानी में धोकर खाएं
8. निपाह वायरस के लक्षण पाए जाने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं

मुस्लिम युवक को बचाने के लिए भीड़ से भिड़ा सिख इन्स्पेक्टर

नैनीताल : भीड़ से एक मुस्लिम शख्स की जान बचाने वाले उत्तराखंड पुलिस के इंस्पेक्टर गगनदीप सिंह का कहना है कि मैं तो केवल अपनी ड्यूटी कर रहा था। रामनगर पुलिस स्टेशन में बतौर सब इंस्पेक्टर तैनात गगन सोशल मीडिया पर हीरो बने हुए हैं। उधम सिंह नगर के रहने वाले 28 पुलिस अधिकारी ने बताया कि जब भीड़ ने उस जोड़े पर हमला किया तो वे गिरजा मंदिर के पास नदी के किनारे बैठे थे। गिरजा मंदिर नैनीताल जिले में रामनगर शहर से करीब 15 किमोमीटर दूर है। उन्होंने बताया, ‘यह घटना 22 मई दोपहर करीब 12 बजे की है, जब गंगा दशहरा मनाने के लिए काफी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पर इकट्ठा हो रहे थे। मैं मंदिर परिसर में ड्यूटी पर था, तभी मैंने लोगों का शोर सुना और देखा कि भीड़ 24 वर्षीय मुस्लिम युवक इरफान को मंदिर की तरफ ला रही है। उन्होंने नदी के किनारे उसके साथ मारपीट भी की थी। नदी का किनारा मंदिर से करीब 50 मीटर नीचे है।’ सिंह ने बताया कि मुझे उस युवक की जान को खतरा लगा और मैं तुरंत भीड़ की तरफ बढ़ा। उन्होंने बताया, ‘मैंने मेरे शरीर का इस्तेमाल उस युवक लिए ढाल के तौर पर किया और मैं गुस्साई भीड़ से उसे दूर ले जाने की कोशिश कर रहा था।’

सिंह ने बताया कि उसी वक्त मैंने महिला इंस्पेक्टर से लड़की को मंदिर परिसर के दूसरी तरफ से दूर ले जाने के लिए कहा। हम लोग उस जोड़े को पुलिस स्टेशन ले आए, ताकि वे लोग दोबारा उन पर हमला ना कर पाएं। सिंह ने बताया, ‘हमने उनसे पूछताछ की। दोनों बालिग थे। लड़के की उम्र करीब 24 साल थी और वहीं लड़की 18 साल से ऊपर थी। कुछ समय बाद जब हम सुनिश्चित हो गए तो हम लोग ने उन्हें सुरक्षा देते हुए दूर छोड़ आए।’
पुलिस विभाग द्वारा उनकी बहादुरी के लिए 2500 रुपए का इनाम दिए जाने पर सिंह ने कहा, ‘मैं केवल मेरी ड्यूटी कर रहा था। मैं उस गुस्साई भीड़ को इसकी मंजूरी नहीं दे सकता था कि वह उस शख्स को नुकसान पहुंचाए।’