Saturday, April 11, 2026
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नोटबंदी के बाद 73,000 कंपनियों के बैंक खाते में जमा हुए 24,000 करोड़ रुपये

नयी दिल्ली : नोटबंदी के बाद देश में ऐसी 73,000 कंपनियों के बैंक खातों में 24,000 करोड़ रुपये की रकम जमा कराई जिनका पंजीकरण अब रद्द किया जा चुका है। सरकारी आंकड़ों से यह जानकारी मिली है। काले धन और अवैध संपत्तियों पर शिकंजा कसने के लिए कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने करीब 2.26 लाख कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया है। ये कंपनियां लंबे समय से कारोबार नहीं कर रही थी। इनमें से कई कंपनियों का इस्तेमाल धन की हेराफेरी के लिए किए जाने का संदेह है।
मंत्रालय द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक, 2.26 लाख कंपनियों का पंजीकरण रद्द किया गया था, जिनमें से 1.68 कंपनियों के बैंक खातों से पता चलता है कि नोटबंदी के बाद उनके खातों में रकम जमा कराई गई थी।
मंत्रालय ने बयान में कहा, “इनमें से 73,000 कंपनियों के खातों में 24,000 करोड़ रुपये जमा हुए थे। विभिन्न बैंकों से कंपनियों की जानकारी जुटाने की प्रक्रिया चल रही है।”  दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि 68 कंपनियों के खिलाफ जांच चल रही है। इनमें 19 कंपनियों की जांच गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) जबकि 49 कंपनियों की जांच रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज कर रहा है।

इन चीजों के इस्तेमाल से बढ़ता है थायरॉइड रोग का खतरा

थायरॉइड की समस्या इस समय बहुत तेजी से बढ़ रही है। पुरुषों से ज्यादा महिलाएं इस रोग का शिकार हो सकती हैं। वैसे तो थायरॉइड रोग अनुवांशिक होता है और माता-पिता द्वारा बच्चों में आता है या शरीर में आयोडिन की कमी से भी ऐसा हो जाता है। मगर कई बार आपके आस-पास मौजूद चीजें थायरॉइड के रोग को बढ़ाने में मदद करती हैं। जी हां! आपके आस-पास मौजूद बहुत सी चीजों में कुछ ऐसे हानिकारक टॉक्सिन्स होते हैं जो थायरॉइड की समस्या को बढ़ाते हैं। आइये आपको बताते हैं उन टॉक्सिन्स के बारे में और वो जहां मौजूद होते हैं उस जगह के बारे में।

परकोलोरेट्स
सीडीसी के अनुसार हम में से लगभग सभी लोगों के शरीर में परकोलोरेट्स पाया जाता है। परकलोरेट्स वह है जो रॉकेट, जेट फ्यूल और कार एयर बैग्स को बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। यह टॉक्सिन हमारे पीने के पानी और खाने में भी पाया जाता है। सीडीसी के अध्ययन के मुताबिक यह टॉक्सिन थायराइड ग्रंथि को प्रभावित कर लो थायराइड के लक्षणों को पैदा करता है।

पीसीबी एस
पोलीक्लोरीनेटेड बाइफिनायल एक औद्योगिक रसायन है जो कि 1970 से बैन है लेकिन फिर भी आज उसके नमूने हमारे वातावरण मिलते हैं। ऐसा देखा गया है कि पीसीबी थायराइड उत्तेजक हार्मोन के स्तर को बढ़ाता है जिससे थायराइड ग्रंथि की क्रियाशीलता कम हो जाती है। इस टॉक्सिन के कारण हमारे लिवर के एंजाइम भी प्रभावित होते हैं।

डॉयक्सिन
पीसीबीएस और डॉयक्सिन को हार्मोन ग्रंथि के लिए रुकावट पैदा करने वाला माना जाता है। इसके अलावा डॉयक्सिन, एजेंट ऑरेंज का प्राइमरी टॉक्सिन घटक है। एजेंट ऑरेंज की के कारण थायराइड संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं।

सोया
सोया के सेवन से थायराइड ग्रंथि की सामान्य क्रियाओं पर खास असर पड़ता है। सोया उत्पादों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग भी थायराइड का कारण हो सकता है। यह उस प्रक्रिया को रोक देता है जिससे आयोडीन थायराइड हार्मोन में बदलता है। शोधों में भी पाया गया है कि जिन नवजात शिशुओ को सोया से बना दूध दिया जाता है उनमें आगे चलकर थायराइड की समस्या हो सकती है।

पेस्टीसाइड्स
पेस्टीसाइड्स के कारण थायराइड की समस्या होने का खतरा बना रहता है। जो लोग अपने रोजमर्रा के कामों में पेस्टीसाइड्स का प्रयोग करते हैं वे अन्य लोगों के मुकाबले थायराइड की समस्या से जल्दी ग्रस्त होते हैं क्योंकि यह थायराइड ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोन के निर्माण पर असर डालता है।

फ्लेम रीटारडैंटस
फ्लेम रिटारडैंटस व पॉलीब्रोमानिटेड डाइ फिनायल ईथर (पीबीडीई एस) यह टॉक्सिन थायराइड ग्रंथि की क्रियाओं में बाधा पहुंचाता है। यह रसायन आपके फर्नीचर के गद्देदार हथ्थों , कंप्यूटर स्क्रीन और टीवी स्क्रीन पर पाए जाते हैं।

प्लास्टिक
यूनिवर्सिटी ऑफ कोपहेगन में किए गए अध्ययन के मुताबिक प्लास्टिक हमारे शरीर के लिए बहुत नुकसानदेह है। प्लास्टिक की बोतल से किसी भी प्रकार का पेय पीने से हमारे शरीर में जहरीले रसायन का प्रवेश हो जाता है। नल के पानी को सुरक्षित बनाने के लिए एक ऐन्टमोनी लेवल सेट किया जाता है जिसके बाद ही पानी को पीने योग्य माना जाता है। शोध के मुताबिक प्लास्टिक की बोतल में जूस या फ्रूट ड्रिंक का ऐन्टमोनी लेवल नल के पानी के मुकाबले 2.5 गुना ज्यादा था जो कि थायराइड ग्रंथि के रोगों को बढ़ा सकता है।

पीएफओए
पीएफओए एक प्रकार का रसायन है जो कि खाना पकाने वाले बर्तनों पर लगाया जाता है, खाना पैक करने वाले कागजों और अन्य चीजों में पाया जाता है। यह थायराइड ग्रंथि की क्रियाओं को प्रभावित करता है जिसकी वजह से थायराइड के लक्षण दिखाई देते हैं।

हैलोजेन
फ्लूयोराइड और क्लोराइड के कारण शरीर में आयोडीन की मात्रा नहीं पहुंच पाती है और थायराइड हार्मोन को सक्रिय रखने वाले टी4 और टी3 से से संपंर्क खत्म हो जाता है। ये हैलोजेन आपके खाने, पानी, दवाओं या वातावरण में मौजूद होते हैं क्योंकि यह दिखने में आयोडीन की तरह होते हैं तो यह आयोडीन के घटको की जगह लेकर शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

भारी धातु
मरकरी, लेड और एल्मुनियिम शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए खतरनाक हो सकते हैं साथ ही यह थायराइड के स्थिति को पैदा करता है। यह पूरी तरह से जहरीला नहीं होता है लेकिन शरीर में इसकी मात्रा का पता ब्लड टेस्ट या यूरीन टेस्ट के जरिए लगाया जा सकता है।

एंटीबैक्टेरियल उत्पाद
ट्राइक्लोजन एक एंटीबैक्टेरियल तत्व है जो साबुन, लोशन और टूथपेस्ट में पाया जाता है। शोधों के मुताबिक इनकी थोड़ी मात्रा शरीर के लिए सुरक्षित है लेकिन ज्यादा मात्रा थायराइड ग्रंथि की क्रियाओं को नुकसान पहुंचाती हैं। यह हार्मोन को डिस्टर्ब करने का काम करते हैं जो शरीर के लिए नुकसानदेह होता है।
(साभार – ओनली माई हेल्थ)

विश्व कप जीतने का सपना पूरा करके क्या महानतम बन सकेंगे मेस्सी ?

ब्यूनस आयर्स : बचपन में बौनेपन से जूझने के बावजूद फुटबाल के मैदान पर उपलब्धियों के नये शिखरों को छूने वाले लियोनेल मेस्सी ने डेढ़ दशक के सुनहरे कॅरियर में क्लब के लिये कामयाबियों के नये कीर्तिमान बनाये लेकिन अर्जेंटीना के लिये विश्व कप नहीं जीत पाने की कसक उन्हें कचोटती रही है। रूस में उनके पास यह संभवत: आखिरी मौका होगा । रिकार्ड पाँच बार फीफा के सर्वश्रेष्ठ फुटबालर, रिकार्ड पांच बार यूरोपीय गोल्डन शू, बार्सीलोना के साथ नौ ला लिगा खिताब, चार युएफा चैम्पियंस लीग और छह कोपा डेल रे खिताब जीत चुके इस करिश्माई प्लेमेकर के नाम देश और क्लब के लिये कुल 600 गोल दर्ज है। उपलब्धियों से भरे अपने सफर की इतिश्री वह निस्संदेह फीफा विश्व कप के साथ करना चाहेंगे और दुनिया भर में उनके प्रशंसक भी यही दुआ कर रहे होंगे । फुटबाल के इस शहंशाह का जन्म अर्जेंटीना के रोसारियो में 1987 में एक निर्धन परिवार में हुआ था । उनके पिता कारखाने में काम करते थे और मां क्लीनर थी लेकिन फुटबाल में अपनी प्रतिभा की बानगी मेस्सी ने बचपन में ही दे दी थी । बचपन में मेस्सी बौनेपन के शिकार थे और हालत इतनी गंभीर थी कि चिकित्सा की जरूरत थी । इलाज महंगा था तो उनके स्थानीय क्लब ने हाथ खींच लिये लेकिन बार्सीलोना मदद के लिये आगे आया । सितंबर 2000 में 13 बरस का मेस्सी अपने पिता के साथ ट्रायल देने आया तो उसके नाटे कद का मजाक सभी खिलाड़ियों ने उड़ाया । ट्रायल के दौरान दस मिनट का खेल देखने के बाद ही बार्सीलोना ने मेस्सी के साथ करार का फैसला कर लिया । उसके बाद से मेस्सी इसी क्लब के साथ है । यदा कदा उनके दूसरे क्लबों के साथ जुड़ने की अटकलें लगी लेकिन मेस्सी ने बार्सीलोना का दामन नहीं छोड़ा और सफलता की सुनहरी दास्तान लिख डाली ।
करार से मिले पैसों से मेस्सी का इलाज हुआ और कामयाब रहा । मेस्सी , आंद्रियास इनिएस्ता, जावी, सैमुअल इतो और थियरे हेनरी ने बार्सीलोना को अभूतपूर्व सफलतायें दिलाई । क्लब के लिये मिलती सफलताओं के साथ मेस्सी की लोकप्रियता दुनिया भर में बढी और लोग उन्हें माराडोना के समकक्ष या कुछ तो उनसे बेहतर मानने लगे । माराडोना के पास हालांकि विश्व कप था जो आखिरी बार 1986 में अर्जेंटीना ने माराडोना के दम पर ही जीता था । मेस्सी ने 2006, 2010 और 2014 विश्व कप में खराब प्रदर्शन नहीं किया लेकिन उनके अपने बनाये मानदंड इतने ऊंचे थे कि तुलना लाजमी थी । 2006 में 18 बरस का मेस्सी ज्यादातर बेंच पर ही रहा जबकि चार साल बाद वह कोई गोल नहीं कर सका ।दोनों बार जर्मनी ने क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना को हराया । सबसे ज्यादा दर्दनाक हार चार साल पहले ब्राजील में मिली जब खिताब से एक जीत की दूरी पर आकर मेस्सी का सपना जर्मनी ने तोड़ दिया ।
इस बार उनके पास हर उस आलोचक को करारा जवाब देने का मौका है जो यह कहते हैं कि मेस्सी सिर्फ बार्सीलोना का महानायक है, अर्जेंटीना का नहीं । फुटबालप्रेमियों को बखूबी पता है कि किस तरह अकेले दम पर मेस्सी क्वालीफायर दौर में शानदार प्रदर्शन करके अर्जेंटीना को विश्व कप में जगह दिला सका है । क्वालीफिकेशन दौर में आठ मैचों से वह बाहर रहा जिसमें अर्जेंटीना को सात अंक मिले और जो दस मैच वह खेला , उसमें टीम ने 21 अंक बनाये । अर्जेंटीना अगर विश्व कप नहीं जीतता है तो भी इससे मेस्सी की काबिलियत पर ऊंगली नहीं उठाई जा सकेगी लेकिन अगर 1978 और 1986 के बाद टीम फुटबाल का यह सर्वोपरि खिताब जीतने में कामयाब रहती है तो एक चैम्पियन को वैसी विदाई मिलेगी जिसका वह हकदार है ।

(साभार : नया इंडिया )

दुर्गा पूजा समिति चीनी हुलू से सजाएगी पंडाल

कोलकाता : पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े उत्सव से कुछ महीने पहले एक दुर्गा पूजा समिति के सदस्यों ने यहां चीनी महावाणिज्य दूतावास के साथ मिलकर हुलु (शलजम जैसी कोई चीनी सब्जी) और उसके इर्द – गिर्द की कलाकृति को अपने पंडाल का विषय बनाने का फैसला किया है। कोलकाता के महावाणिज्य दूत मा झानवू ने कहा , ‘‘ हुलु , जिसके बारे में माना जाता है कि वह अच्छा शगुन और समृद्धि लाता है , यून्नान प्रांत में बहुत लोकप्रिय है जहां उसकी बड़े पैमाने पर खेती होती है। हमारे यहां उससे एक वाद्ययंत्र भी बनता है जिसे हुलुसी कहा जाता है , यह तुरही जैसा होता है। उन्होंने कहा कि हुलु लोकप्रिय सार्वजनिक स्थलों पर भी लगाया जाता है और साल्ट लेक के बी जे ब्लॉक में हुलु विषय वाले पंडाल में चीनी नक्काशी हो सकती है जिसके बारे में आयोजकों से चर्चा होगी। मा ने कहा कि साल्ट लेक की बी जे ब्लॉक दुर्गा पूजा का वाणिज्य दूतावास आर्थिक खर्च नहीं उठा रहा है लेकिन दूतावास इस पंडाल के मुख्य शिल्पी को मदद करने और आयोजकों को यूनान प्रांत भेजने के लिए मदद करने के लिए प्रायोजक ढूंढने की कोशिश कर रहा है।

‘सुपर 30’ से 26 विद्यार्थियों ने आई आई टी – जी की परीक्षा में बाजी मारी

पटना : आईआईटी-जेईई मुख्य परीक्षा में पटना के ‘सुपर 30’ के 26 विद्यार्थियों ने इस साल भी परीक्षा में सफलता हासिल की है। आनंद कुमार ने 2002 में इस संस्थान की शुरुआत की थी। इसमें जेईई परीक्षा के लिए गरीब और कमजोर तबके के 30 प्रतिभाशाली छात्रों को शिक्षा दी जाती है।
आनंद ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया, “यह देख कर अच्छा लगा कि दूरदराज के छात्रों ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जहाँ अब तक विकास की हवा भी नहीं पहुंची है और जीवन अभी भी संघर्षमय है।
बहुत साधारण परिवार से आने वाले ओनिरजीत गोस्वामी, सूरज कुमार, यश कुमार और सूर्यकांत दास समेत अन्य ने इस साल संस्थान से जेईई परीक्षा पास की है। ओनिरजीत के पिता कानपुर में एक छोटी सी कंपनी में काम करते हैं। ओनिरजीत ने बताया कि वह हमेशा से ज़िन्दगी में कुछ अच्छा करना चाहता था पर जेईई पास करना सपने से कम नहीं।
झारखंड में गिरिडीह के निवासी सूरज कुमार के अभिभावक कभी स्कूल नहीं गए। उनके पिता भूमिहीन किसान और बेटे के परीक्षा में उतीर्ण होने से वह बहुत खुश हैं। ये सभी विद्यार्थी अपनी इस सफलता का श्रेय अपने गुरु आनंद कुमार को देते हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, पिछले 16 साल में संस्थान के करीब 500 छात्रों ने आईआईटी के लिए परीक्षा में सफलता हासिल की है। प्रशिक्षण प्रक्रिया के दौरान, आनद साल भर, सभी 30 छात्रों को भोजन और आवास प्रदान करते हैं। उनके परिवार के सदस्य भी हर तरह से उनका समर्थन करते हैं। आनंद कुमार अपने अभियान को देश भर में छात्रों तक ले जाना चाहते हैं। आनंद कुमार ने कहा, ‘मैं ‘सुपर 30’ का विस्तार करना चाहता हूं, लेकिन कुछ समस्याएं हैं। देश में इसी तरह की पहल की मांग बढी है और अधिक से अधिक छात्रों तक पहुंचने के लिए कोई तो रास्ता तलाशना होगा। ‘सुपर 30’ एकेडमी जल्द ही स्क्रीनिंग टेस्ट आयोजित करेगी और संस्थान की वेबसाइट पर सूचनाएं डाली जाएँगी।

साहित्य में संवाद से ही नई प्रवृतियों का उदय संभव

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के साहित्य संवाद – 2 कार्यक्रम में विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन की श्रावणी दास ने त्रिलोचन की भाषा पर चर्चा करते हुए कहा कि कवि ने एक-एक शब्द का सतर्क प्रयोग किया है। कलकत्ता विश्वविद्यालय की श्रद्धांजलि सिंह ने शोध-पत्र पढ़ते हुए कहा कि आज के युग में भी स्त्रियों द्वारा अपने व्यक्तित्व निर्माण को सांस्कृतिक अपराध की तरह देखा जाता है। इसलिए जरूरी है कि स्त्रियाँ परिवार की महत्ता को समझते हुए अपने भीतर छिपे व्यक्ति को पहचाने। विद्यासागर विश्वविद्यालय के राहुल शर्मा ने कथाकार दूधनाथ सिंह को केंद्र में रखकर बताया कि 21वीं सदी का मध्यवर्ग विभाजित है और लोग अपने पड़ोसी से भी संबंध नहीं रखते। उनका संकट गहरा होता जा रहा है। कविसप्तक के अंतर्गत शिवप्रकाश दास, सुषमा त्रिपाठी, संजय राय, गीता दुबे, निर्मला तोदी, अभिज्ञात और काली प्रसाद जायसवाल ने कविता पाठ किया। आरंभ में वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा गया कि राजकिशोर ने लगातार 50 सालों तक निरंतर सार्थक और विचारोत्तेजक लेखन किया। उन्होंने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए जीवन-भर मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता की। वे दिल्ली में बस गए थे, पर मूलतः हावड़ा के थे। उनको महेश जायसवाल, अवधेश प्रसाद सिंह, शंभुनाथ, रामनिवास द्विवेदी, दिनेश साव, सुरेश शा आदि ने श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रो संजय जायसवाल ने साहित्य संवाद का संचालन करते हुए कहा कि हम ऐसे आयोजनों से हिंदी की नई बौद्धिक संवाद जारी रखेंगे। इससे ही नई प्रवृतियों का उदय होगा। धन्यवाद ज्ञापन विमलेश त्रिपाठी ने दिया।

प्लास्टिक बना बच्चों का प्रचलित शब्द: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी

नयी दिल्ली :प्लास्टिक को साल का बच्चों का शब्द घोषित किया गया है क्योंकि उनके द्वारा यह शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि बच्चे प्लास्टिक प्रदूषण के खतरों के बारे में अवगत हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने बीबीसी रेडियो 2 के 500 शब्द प्रतियोगिता में आई लघु कहानियां की समीक्षा की।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि प्लास्टिक, ओसियन, इम्मेलाइन पंखुर्स्ट, डोनाल्ड ट्रंप, कोरिया, ग्रीनफिल टॉवर, यूनिकॉर्न, स्लिम और कंप्यूटर गेम फोर्टनाइट शब्दों का ब्रिटिश बच्चों पर काफी असर देखा गया। प्लास्टिक को साल का बच्चों का शब्द इसलिए चुना गया क्योंकि इस बार की प्रतियोगिता में इसका इस्तेमाल काफी हुआ। पिछले साल की तुलना में 100 फीसदी से भी ज्यादा।
उन्होंने अपनी कहानियों में प्लास्टिक का इस्तेमाल समुद्री जीवन को इससे हो रहे नुकसान के बारे में अपनी समझ को भावनात्मक तरीके से व्यक्त किया। साथ ही चित्रकारी में बेहतर ढंग से पेश किया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बच्चों के शब्दकोश की प्रमुख विनीता गुप्ता ने कहा कि बच्चों ने दिखाया कि वे पर्यावरण पर प्लास्टिक के दुष्प्रभाव से अवगत हैं और यह कैसे उनके भविष्य पर असर डालेगा।

सेबी ने आधार जमा कराने की समयावधि बढ़ाई

नयी दिल्ली  : बाजार नियामक सेबी ने पूंजी बाजारों में निवेश करने वालों के लिए अपने आधार की जानकारी जमा कराने की आखिरी तारीख बढ़ा दी है। अब यह तारीख आधार को वित्तीय लेनदेन से जोड़ने को अनिवार्य किए जाने के मामलों में उच्चतम न्यायालय के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी। सेबी ने एक बयान में कहा है कि प्रतिभूति बाजार के लिए केवाईसी प्रक्रिया को पूरा करने हेतु स्थायी खाता संख्या (पैन) की अनिवार्यता जारी रहेगी। आधार 12 अंकों की एक विशिष्ट पहचान संख्या हो देश में हर नागरिक को जारी की जा रही है। भारतीय प्रतिभूति व विनियम बोर्ड (सेबी) ने एक परिपत्र में कहा है कि आधार का ब्यौरा देने की अंतिम तारीख को इस मामले में उच्चतम न्यायालय के ‘ अंतिम फैसले ’ की घोषणा तक बढ़ाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने 13 मार्च को अंतरिम आदेश में मौजूदा बैंक व अन्य वित्तीय खातों को आधार से जोड़ने की अंतिम तारीख मामले में अंतिम फैसला आने तक बढ़ा दी।

न करें बच्चे के लिए बेबी वॉकर का इस्तेमाल

माता पिता अपने बच्चे को ज़मीन पर अपना पहला कदम बढ़ाने में हर प्रकार से मदद करते हैं और कई बार वो बेबी वॉकर का भी इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या वाकई में ये बेबी वॉकर बच्चों के लिए मददगार साबित होते हैं। जो बच्चे नया नया चलना सीख रहे होते हैं अकसर माँ बाप उनकी मदद करने के लिए वॉकर ले आते हैं। इसमें बैठ कर बच्चे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से चले जाते हैं। इसमें प्लास्टिक ट्रे लगी होती है जिसमें खिलौना लगा होता है, यह बच्चों के मनोरंजन के लिए होता है। साथ ही इसमें बच्चे के बैठने के लिए सीट बनी होती है और इसमें पहिये लगे होते हैं।
अगर विशेषज्ञों की राय मानें तो ये वॉकर आपके बच्चे के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं होते। जानकारों के अनुसार बेबी वॉकर में बैठने के बाद बच्चे अपने पैरों पर ज़ोर लगाते हैं। वह भी तब जब वे ठीक से खड़े होने के लिए भी तैयार नहीं होते, जो बच्चे के लिए बिल्कुल सही नहीं होता।
इसमें लगे हुए पहिये बच्चों को न तेज़ी से चलने में मदद करते हैं जिसके कारण उन्हें चोट लगने का खतरा बना रहता है। इसकी रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि कई बार माता पिता के पहुंचने से पहले ही बच्चा सीढ़ियों या फिर किसी अन्य स्थान पर गिर जाता है।
जब बच्चा इस वॉकर में होता है तो उसका नियंत्रण अपने कदमों पर नहीं होता ऐसे में वे तेज़ी से दौड़ते हुए किसी ऐसी चीज़ तक पहुंच सकते हैं जो उनके लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं होता। एक अध्ययन के अनुसार वॉकर्स बच्चों के विकास में किसी भी तरह सहायक नहीं होते, ये केवल एक खतरनाक वस्तु है।
हालांकि बाज़ार में आजकल ऐसे कई वॉकर्स मिलते हैं जिन्हें बच्चे पीछे की ओर से पकड़ कर धक्का मारते हैं और फिर आगे की ओर अपने कदम बढ़ाते हैं। यह ऐसी स्थिति में होता है जब बच्चा स्वयं खड़े होने या फिर चलने के लिए तैयार होता है। अगर आप अपने बच्चे के लिए वॉकर खरीदना चाहते हैं तो फिर ऐसे ही वॉकर का प्रयोग करें क्योंकि यह उनके विकास में भी किसी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं करते।
ध्यान रहे जब भी आपका बच्चा वॉकर के अंदर हो आप ज़रूर उसके आस पास रहे ताकि वह चोटिल न हो। बच्चों का विकास जानकारों के मुताबिक वॉकर के कारण बच्चों की चलने की प्राकृतिक क्षमता बिगड़ जाती है जिसके फलस्वरूप वे देर से चलना सीखते हैं। अगर बच्चा प्राकृतिक रूप से चलना सीखता है तो बेहतर होता है। स्वयं बैठना, पलटना, फैलना आदि से बच्चे की मांसपेशियां मज़बूत होती हैं, साथ ही वह खुद को संतुलित करना सीखता है और आसानी से खड़ा हो जाता है।
वॉकर का प्रयोग करके चलने वाले बच्चों का सही विकास होने में काफी समय लग जाता है क्योंकि वे ज़मीन पर बहुत कम समय बिताते हैं। खुद चलने वाले बच्चों के शरीर में काफी हलचल रहती है जो वॉकर में बैठने वाले बच्चों में नहीं होती।
बच्चों के मनोरंजन और खेलने कूदने के लिए अन्य कई विकल्प हैं। आप चाहे तो बेबी वॉकर की जगह अपने बच्चे के लिए स्टेशनरी मैट ले आएं या फिर किसी प्ले सेंटर में उसे ले जाएं जहां उसका मन तो बहलेगा ही साथ ही वह पूरी तरह से सुरक्षित भी रहेगा। माता पिता होने के नाते आपके बच्चे की सुरक्षा आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बेहतर होगा आप अपने नन्हे शिशु के लिए वॉकर घर न लाएं और उसे स्वयं अपने कदम आगे बढ़ाने दें।

बेबी वॉकर खरीदते समय इन बातों पर ध्यान दें

  • बेबी वॉकर ऐसा चुनें जिसमे बच्चे को कुशलता से खड़े होने को मिले। अगर आप कोई ऐसा बेबी वॉकर खरीदते हैं जो बहुत ही भारी है या ज़मीन से बहुत घर्षण करता है तो इससे बच्चे के साथ दुर्घटना होने की संभावना बढ़ जाती है। इस वजह से हो सकता है की बच्चा आगे से बेबी वॉकर से डरने लगे और दूरी बना ले।
  • बेबी वॉकर ऐसा चुनें जिसका आधार चौड़ा हो ताकि बच्चे को गिरने से बचाया जा सके। इसके अलावा इस तरह से बच्चे उन जगहों पर भी जाने से बचे रहेंगे जहाँ उन्हें नहीं जाना चाहिए।
  • अतिरिक्त सुरक्षा सुविधाओं को ध्यान में रखें जैसे लॉक सिस्टम , सीट बेल्ट जिससे आपके बच्चे की गतिविधि आसान और आरामदायक बनी रहे।
  • सुनिश्चित करें की बेबी वॉकर जिस पदार्थ से बना है वो बच्चे के लिए खतरनाक नहीं है।
  • बनावटी खराबी को ध्यान में रखें और बेबी वॉकर को अच्छे से जाँच लें। उसके किनारे कोमल हों, कपडे की सिलाई ठीक हो , कोई ऐसी चीज़ बहार ना निकली हो जिससे बच्चे को नुकसान पहुंचे आदि।

पाजेब

जैनेन्द्र

बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं।

पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए। एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है।

हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे। बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेब पहनेगी।

मैंने कहा, कैसी पाजेब?

बोली, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनती है।

मैंने कहा, अच्छा-अच्छा।

बोली, मैं तो आज ही मंगा लूंगी।

मैंने कहा, अच्छा भाई आज सही।

उस वक्त तो खैर मुन्नी किसी काम में बहल गई। लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी।

बुआ ने मुन्नी को मिठाई खिलाई और गोद में लिया और कहा कि अच्छा, तो तेरी पाजेब अबके इतवार को जरूर लेती आऊंगी।

इतवार को बुआ आई और पाजेब ले आई। मुन्नी पहनकर खुशी के मारे यहां-से-वहां ठुमकती फिरी। रुकमन के पास गई और कहा-देख रुकमन, मेरी पाजेब। शीला को भी अपनी पाजेब दिखाई। सबने पाजेब पहनी देखकर उसे प्यार किया और तारीफ की। सचमुच वह चांदी कि सफेद दो-तीन लड़ियां-सी टखनों के चारों ओर लिपटकर, चुपचाप बिछी हुई, बहुत ही सुघड़ लगती थी, और बच्ची की खुशी का ठिकाना न था।

और हमारे महाशय आशुतोष, जो मुन्नी के बड़े भाई थे, पहले तो मुन्नी को सजी-बजी देखकर बड़े खुश हुए। वह हाथ पकड़कर अपनी बढ़िया मुन्नी को पाजेब-सहित दिखाने के लिए आस-पास ले गए। मुन्नी की पाजेब का गौरव उन्हें अपना भी मालूम होता था। वह खूब हँसे और ताली पीटी, लेकिन थोड़ी देर बाद वह ठुमकने लगे कि मुन्नी को पाजेब दी, सो हम भी बाईसिकिल लेंगे।

बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबके जन्म-दिन को तुझे बाईसिकिल दिलवाएंगे।

आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे।

बुआ ने कहा, ‘छी-छी, तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियाँ किया करती हैं। और लड़कियाँ रोती हैं। कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं?”

आशुतोष बाबू ने कहा कि तो हम बाईसिकिल जरूर लेंगे जन्म-दिन वाले रोज।

बुआ ने कहा कि हां, यह बात पक्की रही, जन्म-दिन पर तुमको बाईसिकिल मिलेगी।

इस तरह वह इतवार का दिन हंसी-खुशी पूरा हुआ। शाम होने पर बच्चों की बुआ चली गई। पाजेब का शौक घड़ीभर का था। वह फिर उतारकर रख-रखा दी गई; जिससे कहीं खो न जाए। पाजेब वह बारीक और सुबुक काम की थी और खासे दाम लग गए थे।

श्रीमतीजी ने हमसे कहा, क्यों जी, लगती तो अच्छी है, मैं भी अपने लिए बनवा लूं?

मैंने कहा कि क्यों न बनावाओं! तुम कौन चार बरस की नहीं हो?

खैर, यह हुआ। पर मैं रात को अपनी मेज पर था कि श्रीमती ने आकर कहा कि तुमने पाजेब तो नहीं देखी?

मैंने आश्चर्य से कहा कि क्या मतलब?

बोली कि देखो, यहाँ मेज-वेज पर तो नहीं है? एक तो है पर दूसरे पैर की मिलती नहीं है। जाने कहां गई?

मैंने कहा कि जाएगी कहाँ? यहीं-कहीं देख लो। मिल जाएगी।

उन्होंने मेरे मेज के कागज उठाने-धरने शुरू किए और आलमारी की किताबें टटोल डालने का भी मनसूबा दिखाया।

मैंने कहा कि यह क्या कर रही हो? यहां वह कहाँ से आएगी?

जवाब में वह मुझी से पूछने लगी कि फिर कहाँ है?

मैंने कहा तुम्हीं ने तो रखी थी। कहाँ रखी थी?

बतलाने लगी कि दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों को अच्छी तरह संभालकर उस नीचे वाले बाक्स में रख दी थीं। अब देखा तो एक है, दूसरी गायब है।

मैंने कहा कि तो चलकर वह इस कमरे में कैसे आ जाएगी? भूल हो गई होगी। एक रखी होगी, एक वहीं-कहीं फर्श पर छूट गई होगी। देखो, मिल जाएगी। कहीं जा नहीं सकती।

इस पर श्रीमती कहा-सुनी करने लगीं कि तुम तो ऐसे ही हो। खुद लापरवाह हो, दोष उल्टे मुझे देते हो। कह तो रही हूँ कि मैंने दोनों संभालकर रखी थीं।

मैंने कहा कि संभालकर रखी थीं, तो फिर यहां-वहां क्यों देख रही थी? जहां रखी थीं वहीं से ले लो न। वहां नहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी।

श्रीमती बोलीं कि मेरा भी यही ख्याल हो रहा है। हो न हो, बंसी नौकर ने निकाली हो। मैंने रखी, तब वह वहां मौजूद था।

मैंने कहा, तो उससे पूछा?

बोलीं, वह तो साफ इंकार कर रहा है।

मैंने कहा, तो फिर?

श्रीमती जोर से बोली, तो फिर मैं क्या बताऊं? तुम्हें तो किसी बात की फिकर है नही। डांटकर कहते क्यों नहीं हो, उस बंसी को बुलाकर? जरूर पाजेब उसी ने ली है।

मैंने कहा कि अच्छा, तो उसे क्या कहना होगा? यह कहूं कि ला भाई पाजेब दे दे!

श्रीमती झल्ला कर बोलीं कि हो चुका सब कुछ तुमसे। तुम्हीं ने तो उस नौकर की जात को शहजोर बना रखा है। डांट न फटकार, नौकर ऐसे सिर न चढ़ेगा तो क्या होगा?

बोलीं कि कह तो रही हूं कि किसी ने उसे बक्स से निकाला ही है। और सोलह में पंद्रह आने यह बंसी है। सुनते हो न, वही है।

मैंने कहा कि मैंने बंसी से पूछा था। उसने नहीं ली मालूम होती।

इस पर श्रीमती ने कहा कि तुम नौकरों को नहीं जानते। वे बड़े छंटे होते हैं। बंसी चोर जरूर है। नहीं तो क्या फरिश्ते लेने आते?

मैंने कहा कि तुमने आशुतोष से भी पूछा?

बोलीं, पूछा था। वह तो खुद ट्रंक और बक्स के नीचे घुस-घुसकर खोज लगाने में मेरी मदद करता रहा है। वह नहीं ले सकता।

मैंने कहा, उसे पतंग का बड़ा शौक है।

बोलीं कि तुम तो उसे बताते-बरजते कुछ हो नहीं। उमर होती जा रही है। वह यों ही रह जाएगा। तुम्हीं हो उसे पतंग की शह देने वाले।

मैंने कहा कि जो कहीं पाजेब ही पड़ी मिल गई हो तो?

बोलीं, नहीं, नहीं! मिलती तो वह बता न देता?

खैर, बातों-बातों में मालूम हुआ कि उस शाम आशुतोष पतंग और डोर का पिन्ना नया लाया है।

श्रीमती ने कहा कि यह तुम्हीं हो जिसने पतंग की उसे इजाजत दी। बस सारे दिन पतंग-पतंग। यह नहीं कि कभी उसे बिठाकर सबक की भी कोई बात पूछो। मैं सोचती हूँ कि एक दिन तोड़-ताड़ दूं उसकी सब डोर और पतंग।

मैंने कहा कि खैर; छोड़ो। कल सवेरे पूछ-ताछ करेंगे।

सवेरे बुलाकर मैंने गंभीरता से उससे पूछा कि क्यों बेटा, एक पाजेब नहीं मिल रही है, तुमने तो नहीं देखी?

वह गुम हो गया। जैसे नाराज हो। उसने सिर हिलाया कि उसने नहीं ली। पर मुंह नहीं खोला।

मैंने कहा कि देखो बेटे, ली हो तो कोई बात नहीं, सच बता देना चाहिए।

उसका मुँह और भी फूल आया। और वह गुम-सुम बैठा रहा।

मेरे मन में उस समय तरह-तरह के सिद्धांत आए। मैंने स्थिर किया कि अपराध के प्रति करुणा ही होनी चाहिए। रोष का अधिकार नहीं है। प्रेम से ही अपराध-वृति को जीता जा सकता है। आतंक से उसे दबाना ठीक नहीं है। बालक का स्वभाव कोमल होता है और सदा ही उससे स्नेह से व्यवहार करन चाहिए, इत्यादि।

मैंने कहा कि बेटा आशुतोष, तुम घबराओ नहीं। सच कहने में घबराना नहीं चाहिए। ली हो तो खुल कर कह दो, बेटा! हम कोई सच कहने की सजा थोड़े ही दे सकते हैं। बल्कि बोलने पर तो इनाम मिला करता है।

आशुतोष तब बैठा सुनता रहा। उसका मुंह सूजा था। वह सामने मेरी आँखों में नहीं देख रहा था। रह-रहकर उसके माथे पर बल पड़ते थे।

“क्यों बेटे, तुमने ली तो नहीं?”

उसने सिर हिलाकर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज में कहा कि मैंने नहीं ली, नहीं ली, नहीं ली। यह कहकर वह रोने को हो आया, पर रोया नहीं। आँखों में आँसू रोक लिए।

उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है।

मैंने कहा, देखो बेटा, डरो नहीं; अच्छा जाओ, ढूंढो; शायद कहीं पड़ी हुई वह पाजेब मिल जाए। मिल जाएगी तो हम तुम्हें इनाम देंगे।

वह चला गया और दूसरे कमरे में जाकर पहले तो एक कोने में खड़ा हो गया। कुछ देर चुपचाप खड़े रहकर वह फिर यहां-वहां पाजेब की तलाश में लग गया।

श्रीमती आकर बोलीं, आशू से तुमने पूछ लिया? क्या ख्याल है?

मैंने कहा कि संदेह तो मुझे होता है। नौकर का तो काम यह है नहीं!

श्रीमती ने कहा, नहीं जी, आशू भला क्यों लेगा?

मैं कुछ बोला नहीं। मेरा मन जाने कैसे गंभीर प्रेम के भाव से आशुतोष के प्रति उमड़ रहा था। मुझे ऐसा मालूम होता था कि ठीक इस समय आशुतोष को हमें अपनी सहानुभूति से वंचित नहीं करना चाहिए। बल्कि कुछ अतिरिक्त स्नेह इस समय बालक को मिलना चाहिए। मुझे यह एक भारी दुर्घटना मालूम होती थी। मालूम होता था कि अगर आशुतोष ने चोरी की है तो उसका इतना दोष नहीं है; बल्कि यह हमारे ऊपर बड़ा भारी इल्जाम है। बच्चे में चोरी की आदत भयावह हो सकती है, लेकिन बच्चे के लिए वैसी लाचारी उपस्थित हो आई, यह और भी कहीं भयावह है। यह हमारी आलोचना है। हम उस चोरी से बरी नहीं हो सकते।

मैंने बुलाकर कहा, “अच्छा सुनो। देखो, मेरी तरफ देखो, यह बताओ कि पाजेब तुमने छुन्नू को दी है न?”

वह कुछ देर कुछ नहीं बोला। उसके चेहरे पर रंग आया और गया। मैं एक-एक छाया ताड़ना चाहता था।

मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि डरने की कोई बात नहीं। हाँ, हाँ, बोलो डरो नहीं। ठीक बताओ, बेटे ! कैसा हमारा सच्चा बेटा है!

मानो बड़ी कठिनाई के बाद उसने अपना सिर हिलाया।

मैंने बहुत खुश होकर कहा कि दी है न छुन्नू को ?

उसने सिर हिला दिया।

अत्यंत सांत्वना के स्वर में स्नेहपूर्वक मैंने कहा कि मुंह से बोलो। छुन्नू को दी है?

उसने कहा, “हाँ-आँ।”

मैंने अत्यंत हर्ष के साथ दोनों बाँहों में लेकर उसे उठा लिया। कहा कि ऐसे ही बोल दिया करते हैं अच्छे लड़के। आशू हमारा राजा बेटा है। गर्व के भाव से उसे गोद में लिए-लिए मैं उसकी माँ की तरफ गया। उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है। पाजेब उसने छुन्नू को दी है।

सुनकर माँ उसकी बहुत खुश हो आईं। उन्होंने उसे चूमा। बहुत शाबाशी दी ओर उसकी बलैयां लेने लगी !

आशुतोष भी मुस्करा आया, अगरचे एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहीं हुई थी।

उसके बाद अलग ले जाकर मैंने बड़े प्रेम से पूछा कि पाजेब छुन्नू के पास है न? जाओ, माँग ला सकते हो उससे?

आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रहा। मैंने कहा कि जाओ बेटे! ले आओ।

उसने जवाब में मुंह नहीं खोला।

मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा ?

मैंने कहा कि तो जिसको उसने दी होगी उसका नाम बता देगा। सुनकर वह चुप हो गया। मेरे बार-बार कहने पर वह यही कहता रहा कि पाजेब छुन्नू के पास न हुई तो वह देगा कहाँ से ?

अंत में हारकर मैंने कहा कि वह कहीं तो होगी। अच्छा, तुमने कहाँ से उठाई थी ?

“पड़ी मिली थी ।”

“और फिर नीचे जाकर वह तुमने छुन्नू को दिखाई ?”

“हाँ !”

“फिर उसी ने कहा कि इसे बेचेंगे !”

“हाँ !”

“कहाँ बेचने को कहा ?”

“कहा मिठाई लाएंगे ?”

“नहीं, पतंग लाएंगे ?”

“हाँ!”

“सो पाजेब छुन्नू के पास रह गई ?”

“हाँ !”

“तो उसी के पास होनी चाहिए न ! या पतंग वाले के पास होगी ! जाओ, बेटा, उससे ले आओ। कहना, हमारे बाबूजी तुम्हें इनाम देंगे।

वह जाना नहीं चाहता था। उसने फिर कहा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो कहाँ से देगा !

मुझे उसकी जिद बुरी मालूम हुई। मैंने कहा कि तो कहीं तुमने उसे गाड़ दिया है? क्या किया है? बोलते क्यों नहीं?

वह मेरी ओर देखता रहा, और कुछ नहीं बोला।

मैंने कहा, कुछ कहते क्यों नहीं?

वह गुम-सुम रह गया। और नहीं बोला।

मैंने डपटकर कहा कि जाओ, जहाँ हो वही से पाजेब लेकर आओ।

जब वह अपनी जगह से नहीं उठा और नहीं गया तो मैंने उसे कान पकड़कर उठाया। कहा कि सुनते हो ? जाओ, पाजेब लेकर आओ। नहीं तो घर में तुम्हारा काम नहीं है।

उस तरह उठाया जाकर वह उठ गया और कमरे से बाहर निकल गया । निकलकर बरामदे के एक कोने में रूठा मुंह बनाकर खड़ा रह गया ।

मुझे बड़ा क्षोभ हो रहा था। यह लड़का सच बोलकर अब किस बात से घबरा रहा है, यह मैं कुछ समझ न सका। मैंने बाहर आकर धीरे से कहा कि जाओ भाई, जाकर छुन्नू से कहते क्यों नहीं हो?

पहले तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो बार-बार कहने लगा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?

मैंने कहा कि जितने में उसने बेची होगी वह दाम दे देंगे। समझे न जाओ, तुम कहो तो।

छुन्नू की माँ तो कह रही है कि उसका लड़का ऐसा काम नहीं कर सकता। उसने पाजेब नहीं देखी।

जिस पर आशुतोष की माँ ने कहा कि नहीं तुम्हारा छुन्नू झूठ बोलता है। क्यों रे आशुतोष, तैने दी थी न?

आशुतोष ने धीरे से कहा, हाँ, दी थी।

दूसरे ओर से छुन्नू बढ़कर आया और हाथ फटकारकर बोला कि मुझे नहीं दी। क्यों रे, मुझे कब दी थी ?

आशुतोष ने जिद बांधकर कहा कि दी तो थी। कह दो, नहीं दी थी ?

नतीजा यह हुआ कि छुन्नू की माँ ने छुन्नू को खूब पीटा और खुद भी रोने लगी। कहती जाती कि हाय रे, अब हम चोर हो गए। कुलच्छनी औलाद जाने कब मिटेगी ?

बात दूर तक फैल चली। पड़ोस की स्त्रियों में पवन पड़ने लगी। और श्रीमती ने घर लौटकर कहा कि छुन्नू और उसकी माँ दोनों एक-से हैं। मैंने कहा कि तुमने तेजा-तेजी क्यों कर डाली? ऐसी कोई बात भला सुलझती है !

बोली कि हाँ, मैं तेज बोलती हूँ। अब जाओ ना, तुम्हीं उनके पास से पाजेब निकालकर लाते क्यों नहीं ? तब जानूँ, जब पाजेब निकलवा दो।

मैंने कहा कि पाजेब से बढ़कर शांति है । और अशांति से तो पाजेब मिल नहीं जाएगी।

श्रीमती बुदबुदाती हुई नाराज होकर मेरे सामने से चली गईं ।

थोड़ी देर बाद छुन्नू की माँ हमारे घर आई । श्रीमती उन्हें लाई थी। अब उनके बीच गर्मी नहीं थी, उन्होंने मेरे सामने आकर कहा कि छुन्नू तो पाजेब के लिए इनकार करता है। वह पाजेब कितने की थी, मैं उसके दाम भर सकती हूँ।

मैंने कहा, “यह आप क्या कहती है! बच्चे बच्चे हैं। आपने छुन्नू से सहूलियत से पूछा भी !”

उन्होंने उसी समय छुन्नू को बुलाकर मेरे सामने कर दिया। कहा कि क्यों रे, बता क्यों नहीं देता जो तैने पाजेब देखी हो ?

छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इनकार किया। और बताया कि पाजेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वालों को दे आया है। मैंने खूब देखी थी, वह चाँदी की थी।

“तुम्हें ठीक मालूम है ?”

“हाँ, वह मुझसे कह रहा था कि तू भी चल। पतंग लाएंगे।”

“पाजेब कितनी बड़ी थी? बताओ तो ।”

छुन्नू ने उसका आकार बताया, जो ठीक ही था।

मैंने उसकी माँ की तरफ देखकर कहा देखिए न पहले यही कहता था कि मैंने पाजेब देखी तक नहीं। अब कहता है कि देखी है ।

माँ ने मेरे सामने छुन्नू को खींचकर तभी धम्म-धम्म पीटना शुरू कर दिया। कहा कि क्यों रे, झूठ बोलता है ? तेरी चमड़ी न उधेड़ी तो मैं नहीं।

मैंने बीच-बचाव करके छुन्नू को बचाया। वह शहीद की भांति पिटता रहा था। रोया बिल्कुल नहीं और एक कोने में खड़े आशुतोष को जाने किस भाव से देख रहा था।

खैर, मैंने सबको छुट्टी दी। कहा, जाओ बेटा छुन्नू खेलो। उसकी माँ को कहा, आप उसे मारिएगा नहीं। और पाजेब कोई ऐसी बड़ी चीज़ नहीं है।

छुन्नू चला गया। तब, उसकी माँ ने पूछा कि आप उसे कसूरवर समझतें हैं ?

मैंने कहा कि मालूम तो होता है कि उसे कुछ पता है। और वह मामले में शामिल है।

इस पर छुन्नू की माँ ने पास बैठी हुई मेरी पत्नी से कहा, “चलो बहनजी, मैं तुम्हें अपना सारा घर दिखाए देती हूँ। एक-एक चीज देख लो। होगी पाजेब तो जाएगी कहाँ ?”

मैंने कहा, “छोड़िए भी। बेबात को बात बढ़ाने से क्या फायदा ।” सो ज्यों-त्यों मैंने उन्हें दिलासा दिया। नहीं तो वह छुन्नू को पीट-पाट हाल-बेहाल कर डालने का प्रण ही उठाए ले रही थी। कुलच्छनी, आज उसी धरती में नहीं गाड़ दिया तो, मेरा नाम नहीं ।

खैर, जिस-तिस भांति बखेड़ा टाला। मैं इस झंझट में दफ्तर भी समय पर नहीं जा सका। जाते वक्त श्रीमती को कह गया कि देखो, आशुतोष को धमकाना मत। प्यार से सारी बातें पूछना। धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और हाथ कुछ नहीं आता। समझी न ?

शाम को दफ्तर से लौटा तो श्रीमती से सूचना दी कि आशुतोष ने सब बतला दिया है। ग्यारह आने पैसे में वह पाजेब पतंग वाले को दे दी है। पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं। पाँच आने जो दिए वह छुन्नू के पास हैं। इस तरह रत्ती-रत्ती बात उसने कह दी है ।

कहने लगी कि मैंने बड़े प्यार से पूछ-पूछकर यह सब उसके पेट में से निकाला है। दो-तीन घंटे में मगज़ मारती रही। हाय राम, बच्चे का भी क्या जी होता है।

मैं सुनकर खुश हुआ। मैंने कहा कि चलो अच्छा है, अब पाँच आने भेजकर पाजेब मँगवा लेंगे। लेकिन यह पतंग वाला भी कितना बदमाश है, बच्चों के हाथ से ऐसी चीज़ें लेता है। उसे पुलिस में दे देना चाहिए । उचक्का कहीं का !

फिर मैंने पूछा कि आशुतोष कहाँ है?

उन्होंने बताया कि बाहर ही कहीं खेल-खाल रहा होगा।

मैंने कहा कि बंसी, जाकर उसे बुला तो लाओ।

बंसी गया और उसने आकर कहा कि वे अभी आते हैं।

“क्या कर रहा है ?”

“छुन्नू के साथ गिल्ली डंडा खेल रहे हैं ।”

थोड़ी देर में आशुतोष आया । तब मैंने उसे गोद में लेकर प्यार किया । आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया और गोद में लेने पर भी वह कोई विशेष प्रसन्न नहीं मालूम नहीं हुआ।

उसकी माँ ने खुश होकर कहा कि आशुतोष ने सब बातें अपने आप पूरी-पूरी बता दी हैं। हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है ।

आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा। लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता था।

मैंने कहा कि आओ चलो । अब क्या बात है। क्यों हज़रत, तुमको पाँच ही आने तो मिले हैं न ? हम से पाँच आने माँग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब से ऐसा मत करना, बेटे !

कमरे में जाकर मैंने उससे फिर पूछताछ की, “क्यों बेटा, पतंग वाले ने पाँच आने तुम्हें दिए न ?”

“हाँ”!

“और वह छुन्नू के पास हैं न!”

“हाँ!”

“अभी तो उसके पास होंगे न !”

“नहीं”

“खर्च कर दिए !”

“नहीं”

“नहीं खर्च किए?”

“हाँ”

“खर्च किए, कि नहीं खर्च किए ?”

उस ओर से प्रश्न करने वह मेरी ओर देखता रहा, उत्तर नहीं दिया।

“बताओं खर्च कर दिए कि अभी हैं ?”

जवाब में उसने एक बार ‘हाँ’ कहा तो दूसरी बात ‘नहीं’ कहा।

मैंने कहा, तो यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें नहीं मालूम है ?

“हाँ।”

“बेटा, मालूम है न ?”

“हाँ।”

पतंग वाले से पैसे छुन्नू ने लिए हैं न?

“हाँ”

“तुमने क्यों नहीं लिए ?”

वह चुप।

“इकन्नियां कितनी थी, बोलो ?”

“दो।”

“बाकी पैसे थे ?”

“हाँ”

“दुअन्नी थी!”

“हाँ ।”

मुझे क्रोध आने लगा। डपटकर कहा कि सच क्यों नहीं बोलते जी ? सच बताओ कितनी इकन्नियां थी और कितना क्या था ।”

वह गुम-सुम खड़ा रहा, कुछ नहीं बोला।

“बोलते क्यों नहीं ?”

वह नहीं बोला।

“सुनते हो ! बोला-नहीं तो—”

आशुतोष डर गया। और कुछ नहीं बोला।

“सुनते नहीं, मैं क्या कह रहा हूँ?”

इस बार भी वह नहीं बोला तो मैंने कान पकड़कर उसके कान खींच लिए। वह बिना आँसू लाए गुम-सुम खड़ा रहा।

“अब भी नहीं बोलोगे ?”

वह डर के मारे पीला हो आया। लेकिन बोल नहीं सका। मैंने जोर से बुलाया “बंसी यहाँ आओ, इनको ले जाकर कोठरी में बंद कर दो ।”

बंसी नौकर उसे उठाकर ले गया और कोठरी में मूंद दिया।

दस मिनट बाद फिर उसे पास बुलवाया। उसका मुँह सूजा हुआ था। बिना कुछ बोले उसके ओंठ हिल रहे थे। कोठरी में बंद होकर भी वह रोया नहीं।

मैंने कहा, “क्यों रे, अब तो अकल आई ?”

वह सुनता हुआ गुम-सुम खड़ा रहा।

“अच्छा, पतंग वाला कौन सा है ? दाई तरफ का चौराहे वाला ?”

उसने कुछ ओठों में ही बड़बड़ा दिया। जिसे मैं कुछ समझ न सका ।

“वह चौराहे वाला ? बोलो—”

“हाँ।”

“देखो, अपने चाचा के साथ चले जाओ। बता देना कि कौन सा है। फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे। समझते हो न ?”

यह कहकर मैंने अपने भाई को बुलवाया। सब बात समझाकर कहा, “देखो, पाँच आने के पैसे ले जाओ। पहले तुम दूर रहना। आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाजेब माँगेगा। अव्वल तो यह पाजेब लौटा ही देगा। नहीं तो उसे डांटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द कर दूंगा। बच्चों से माल ठगता है ? समझे ? नरमी की जरूरत नहीं हैं।”

“और आशुतोष, अब जाओ। अपने चाचा के साथ जाओ।” वह अपनी जगह पर खड़ा था। सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाई नहीं दिया।

“नहीं जाओगे!”

उसने सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा।

मैंने तब उसे समझाकर कहा कि “भैया घर की चीज है, दाम लगे हैं। भला पाँच आने में रुपयों का माल किसी के हाथ खो दोगे ! जाओ, चाचा के संग जाओ। तुम्हें कुछ नहीं कहना होगा। हाँ, पैसे दे देना और अपनी चीज वापस माँग लेना। दे तो दे, नहीं दे तो नहीं दे । तुम्हारा इससे कोई सरोकार नहीं। सच है न, बेटे ! अब जाओ।”

पर वह जाने को तैयार ही नहीं दिखा। मुझे लड़के की गुस्ताखी पर बड़ा बुरा मालूम हुआ। बोला, “इसमें बात क्या है? इसमें मुश्किल कहाँ है? समझाकर बात कर रहे है सो समझता ही नहीं, सुनता ही नहीं।”

मैंने कहा कि, “क्यों रे नहीं जाएगा?”

उसने फिर सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा।

मैंने प्रकाश, अपने छोटे भाई को बुलाया। कहा, “प्रकाश, इसे पकड़कर ले जाओ।”

प्रकाश ने उसे पकड़ा और आशुतोष अपने हाथ-पैरों से उसका प्रतिकार करने लगा। वह साथ जाना नहीं चाहता था।

मैंने अपने ऊपर बहुत जब्र करके फिर आशुतोष को पुचकारा, कि जाओ भाई! डरो नहीं। अपनी चीज घर में आएगी। इतनी-सी बात समझते नहीं। प्रकाश इसे गोद में उठाकर ले जाओ और जो चीज माँगे उसे बाजार में दिला देना। जाओ भाई आशुतोष !

पर उसका मुंह फूला हुआ था। जैसे-तैसे बहुत समझाने पर वह प्रकाश के साथ चला। ऐसे चला मानो पैर उठाना उसे भारी हो रहा हो। आठ बरस का यह लड़का होने को आया फिर भी देखो न कि किसी भी बात की उसमें समझ नहीं हैं। मुझे जो गुस्सा आया कि क्या बतलाऊं! लेकिन यह याद करके कि गुस्से से बच्चे संभलने की जगह बिगड़ते हैं, मैं अपने को दबाता चला गया। खैर, वह गया तो मैंने चैन की सांस ली।

लेकिन देखता क्या हूँ कि कुछ देर में प्रकाश लौट आया है।

मैंने पूछा, “क्यों?”

बोला कि आशुतोष भाग आया है।

मैंने कहा कि “अब वह कहाँ है?”

“वह रूठा खड़ा है, घर में नहीं आता।”

“जाओ, पकड़कर तो लाओ।”

वह पकड़ा हुआ आया। मैंने कहा, “क्यों रे, तू शरारत से बाज नहीं आएगा? बोल, जाएगा कि नहीं?”

वह नहीं बोला तो मैंने कसकर उसके दो चांटे दिए। थप्पड़ लगते ही वह एक दम चीखा, पर फौरन चुप हो गया। वह वैसे ही मेरे सामने खड़ा रहा।

मैंने उसे देखकर मारे गुस्से से कहा कि ले जाओ इसे मेरे सामने से। जाकर कोठरी में बंद कर दो। दुष्ट!

इस बार वह आध-एक घंटे बंद रहा। मुझे ख्याल आया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूँ, लेकिन जैसे कोई दूसरा रास्ता न दिखता था। मार-पीटकर मन को ठिकाना देने की आदत पड़ कई थी, और कुछ अभ्यास न था।

खैर, मैंने इस बीच प्रकाश को कहा कि तुम दोनों पतंग वाले के पास जाओ।

मालूम करना कि किसने पाजेब ली है। होशियारी से मालूम करना। मालूम होने पर सख्ती करना। मुरव्वत की जरूरत नहीं। समझे।

प्रकाश गया और लौटने पर बताया कि उसके पास पाजेब नहीं है।

सुनकर मैं झल्ला आया, कहा कि तुमसे कुछ काम नहीं हो सकता। जरा सी बात नहीं हुई, तुमसे क्या उम्मीद रखी जाए?

वह अपनी सफाई देने लगा। मैंने कहा, “बस, तुम जाओ।”

प्रकाश मेरा बहुत लिहाज मानता था। वह मुंह डालकर चला गया। कोठरी खुलवाने पर आशुतोष को फर्श पर सोता पाया। उसके चेहरे पर अब भी आँसू नहीं थे। सच पूछो तो मुझे उस समय बालक पर करुणा हुई । लेकिन आदमी में एक ही साथ जाने क्या-क्या विरोधी भाव उठते हैं !

मैंने उसे जगाया। वह हड़बड़ाकर उठा। मैंने कहा, “कहो, क्या हालत है?”

थोड़ी देर तक वह समझा ही नहीं। फिर शायद पिछला सिलसिला याद आया।

झट उसके चेहरे पर वहीं जिद, अकड़ ओर प्रतिरोध के भाव दिखाई देने लगे।

मैंने कहा कि या तो राजी-राजी चले जाओ नहीं तो इस कोठरी में फिर बंद किए देते हैं।

आशुतोष पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा हो, ऐसा मालूम नहीं हुआ।

खैर, उसे पकड़कर लाया और समझाने लगा। मैंने निकालकर उसे एक रुपया दिया और कहा, “बेटा, इसे पतंग वाले को दे देना और पाजेब माँग लेना कोई घबराने की बात नहीं। तुम समझदार लड़के हो।”

उसने कहा कि जो पाजेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?

“इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पाँच आने में पाजेब दी है। न हो तो छुन्नू को भी साथ ले लेना। समझे?”

वह चुप हो गया। आखिर समझाने पर जाने को तैयार हुआ। मैंने प्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा। उसका मुँह भारी देखकर डांटने वाला ही था कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी।

बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रखकर पूछा कि कहाँ जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूँ।

आशुतोष का चेहरा रूठा ही रहा। मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत, जाने दो।

आशुतोष रुकने को उद्यत था। वह चलने में आनाकानी दिखाने लगा। बुआ ने पूछा, “क्या बात है?”

मैंने कहा, “कोई बात नहीं, जाने दो न उसे।”

पर आशुतोष मचलने पर आ गया था। मैंने डांटकर कहा, “प्रकाश, इसे ले क्यों नहीं जाते हो?”

बुआ ने कहा कि बात क्या है? क्या बात है?

मैंने पुकारा, “बंसी, तू भी साथ जा। बीच से लौटने न पाए।” सो मेरे आदेश पर दोनों आशुतोष को जबरदस्ती उठाकर सामने से ले गए। बुआ ने कहा, “क्यों उसे सता रहे हो?”

मैंने कहा कि कुछ नहीं, जरा यों ही-

फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा। राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती, मुहल्ले में भी राजनीति होती है। यह भार स्त्रियों पर टिकता है। कहाँ क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा स्त्रियों को लेकर रंग फैलाती है। इसी प्रकार कुछ बातें हुईं, फिर छोटा-सा बक्सा सरका कर बोली, इनमें वह कागज है जो तुमने माँगें थे। और यहाँ-

यह कहकर उन्होंने अपने बास्कट की जेब में हाथ डालकर पाजेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हों। मैं भयभीत भाव से कह उठा कि यह क्या?

बोली कि उस रोज भूल से यह एक पाजेब मेरे साथ चली गई थी।

– जैनेन्द्र