नयी दिल्ली : देश में फर्जी खबरें और अफवाहें फैलने के बाद सामने आईं हत्या की घटनाओं के कारण आलोचना झेल रहे व्हॉट्सएप ने बड़ा कदम उठाने का निर्णय किया है। व्हॉट्सएप ने आज संदेश भेजने (फॉरवर्ड) की सीमा को एक बार में पांच चैट के लिये सीमित करने समेत देश में अपनी सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। व्हॉट्सएप ने बयान में कहा कि वह एप पर संदेश भेजने की सीमा को निर्धारित करने के लिये परीक्षण शुरू कर रही है।
इसके अलावा उसने कहा कि वह मीडिया संदेशों के बगल में दिखाई देने पर वाले क्विक फारवर्ड बटन को भी हटायेगा।
व्हॉट्सएप ने ब्लॉग पोस्ट में कहा कि भारत में उसके उपयोगकर्ता अन्य देशों के उपयोगकर्ताओं की तुलना में अधिक संदेश , तस्वीर और वीडियो भेजते हैं। आज हम संदेश भेजने की सीमा को निर्धारित करने के लिये एक परीक्षण शुरू कर रहे हैं। यह व्हॉट्सएप के हर उपयोगकर्ता पर लागू होगा। भारत में … हम संदेश को एक बार में पांच चैट के लिये सीमित करने का भी परीक्षण करेंगे और मीडिया संदेश के बगल में दिखाई देने पर वाले बटन को भी हटाएंगे।
मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर भ्रामक और फर्जी खबरें प्रसारित होने के बाद व्हॉट्सएप को भारत सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा था। सरकार ने इस तरह की खबरों को रोकने के लिये जरूरी कदम उठाने को कहा था।
कल ही सरकार ने व्हॉट्सएप को दूसरा नोटिस भेजकर फर्जी और भ्रामक संदेशों के प्रसार को रोकने के लिए प्रभावी समाधान करने को कहा है। सरकार ने कंपनी को चेतावनी दी है कि अफवाहों के प्रसार में माध्यम बनने वाले भी दोषी माने जाएंगे और मूक दर्शक बने रहने पर उन्हें भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि , कंपनी ने इस नोटिस पर अब तक जवाब नहीं दिया है। व्हॉट्सएप ने ब्लॉग में कहा कि कंपनी का मानना है ये बदलाव उसे एक निजी संदेशवाहक (मैसेजिंग) एप के रूप में बनाये रखने में मदद करेंगे। जिस काम के लिये इसे डिजाइन किया गया था। उसने कहा , ” हमने व्हॉट्सएप को निजी संदेशवाहक के तौर पर बनाया है , जो कि अपने परिवार और दोस्तों के साथ जुड़ने का सरल , सुरक्षित और विश्वसनीय तरीका है। इसलिये हमने नये फीचर्स को जोड़ा है। हम आपकी सुरक्षा और निजता को लेकर पूरी तरह से प्रतिबद्ध है और हम अपने एप को बेहतर बनाए रखने का कार्य जारी रखेंगे।
अफवाहों, फर्जी खबरों को रोकने के लिए संदेश भेजने की सीमा तय करेगी व्हॉट्सएप
बेटियों ने दिखायी राजस्थान के विधायक को शिक्षा की राह
उदयपुर : वह दूसरों को पढ़ने के फायदे बताया करते थे, लेकिन खुद के कम पढ़े होने का एहसास मन को सदा कचोटता था। अपनी बेटियों को पढ़ता देखकर तसल्ली कर लेते थे, लेकिन फिर उन्हीं बेटियों की प्रेरणा से भाजपा के एक विधायक ने बचपन में छूटी अपनी पढ़ाई की डोर को पचपन साल की उम्र में फिर से थाम लिया। राजस्थान के उदयपुर ग्रामीण से भाजपा विधायक फूल सिंह मीणा ने क्षेत्र की बालिकाओं को शिक्षित करने की मुहिम चलाई और फिर अपनी पांच शिक्षित बेटियों के कहने पर खुद भी दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। अब वह स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं।
55 वर्षीय मीणा ने को बताया कि सेना में कार्यरत पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी के बोझ के चलते उन्होंने मजबूरी में पढ़ाई छोड कर खेती बाडी की और परिवार का पालन पोषण किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 में राजनीति में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ मुहिम के तहत आदिवासी क्षेत्र की बालिकाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया और एससी वर्ग की बालिकाओं को प्रोत्साहित करने के लिये माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में 80 प्रतिशत से अधिक अंक लाने पर विधायक कोष से उदयपुर से जयपुर की हवाई यात्रा करवाने की घोषणा की।
साथ ही उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 में दो छात्राओं के 80 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करने पर उन्हें निशुल्क हवाई यात्रा कराई गई, जबकि 2017 में छह छात्राओं को निशुल्क हवाई यात्रा के साथ साथ मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों से मुलाकात और विधानसभा भवन का भ्रमण करवाया गया।
मीणा का कहना है कि इस योजना के शुरूआती परिणाम बहुत उत्साहवर्द्धक हैं और अब इलाके में लड़कियों की शिक्षा के स्तर में सुधार आने लगा है। अब उन्होंने इस योजना का दायरा एससी वर्ग की बालिकाओं से बढा कर सामान्य वर्ग कर दिया है और घोषणा की है कि इस वर्ष उनके विधानसभा क्षेत्र से किसी भी वर्ग की बालिका यदि 80 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करेगी तो उसे निशुल्क हवाई यात्रा करवाई जायेगी। उन्होंने बताया कि दूसरों को शिक्षा की ओर प्रेरित करते समय उन्हें खुद का शिक्षित न होना बहुत कचोटता था। बचपन में वह सिर्फ सातवीं कक्षा तक पढ़ाई कर पाए थे। उनकी इस दुविधा के बीच उनकी बेटियों ने उन्हें फिर से पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया और वह इस भूले बिसरे रास्ते पर फिर से निकल पड़े। वह बताते हैं कि बेटियों ने वर्ष 2013 में ओपन स्कूल से 10वीं कक्षा के लिये फार्म भरवा दिया, लेकिन विधायक बनने के बाद व्यस्तता के कारण वह 2014 में परीक्षा नहीं दे पाए, बेटियों ने 2015 में फिर से फार्म भर दिया और उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास कर ली। 2016-2017 में वह 12 वीं पास कर गए और अब वह स्नातक स्तर की शिक्षा के पहले वर्ष की परीक्षा दे चुके हैं। बच्चों की तरह उत्साह से भरे मीणा बताते हैं कि अब वह पूरे उत्साह से अपने विधानसभा क्षेत्र में शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिये प्रयास कर रहे हैं और बालिकाओं को शिक्षा के लिये प्रोत्साहित करने के दौरान यह बताना नहीं भूलते कि इस उम्र में वह शिक्षा हासिल करने के अपने सपने को साकार कर रहे हैं। हाल ही में समाजशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान और हिन्दी साहित्य विषयों के साथ बी ए प्रथम वर्ष कला की परीक्षा देने वाले मीणा का मानना है कि अगर जनप्रतिनिधि शिक्षित होगा तभी वह पूरी ईमानदारी से अन्य लोगों को शिक्षित होने के लिये प्रेरित कर सकेगा।
अदाकारा रीता भादुड़ी का निधन
मुम्बई : जानी मानी अदाकारा रीता भादुड़ी का निधन हो गया है। उनकी उम्र 62 वर्ष थी। ‘ हीरो नंबर 1’ और ‘ बेटा ’ जैसी फिल्मों में अपने किरदारों से उन्होंने बॉलीवुड में एक अलग पहचान हासिल की थी। भादुड़ी पिछले दो सप्ताह से जुहू के सुजय अस्पताल में भर्ती थी।
अदाकारा की भतीजी मिनी भादुड़ी ने कहा , ‘‘ उन्हें किडनी की बीमारी थी और उनके कई अंग कमजोर हो गए थे।
अभिनेता शिशिर शर्मा ने फेसबुक पर भादुड़ी के निधन की पुष्टि की। उन्होंने लिखा , ‘‘ बेहद दुख के साथ यह बताना चाहूंगा कि रीता भादुड़ी हमें छोड़कर चली गईं हैं। भादुड़ी आखिरी बार टीवी धारावाहिक ‘‘ निमकी मुखिया ’’ में नजर आई थीं।
एम्स पास किया तो राहुल गांधी ने आशाराम को लिखा खत
भोपाल : संसद में आंख मारने को लेकर भले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मजाक उड़ रहा हो या फिर वो विरोधियों के निशाने पर हों लेकिन इन सबके बीच उनका एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के एक युवक को खत लिखा हैराहुल गांधी ने एमपी के देवास शहर में रहने वाले आशाराम नाम के युवक को खत लिखकर उसे एम्स (AIIMS) एंट्रेंस एग्जाम क्लीयर करने पर बधाई दी है। आपको बता दें कि आशाराम चौधरी के पिता देवास के विजयागंज मंडी में ही पन्नी बीनने का काम करते हैं। इन सब चुनौतियों के बावजूद आशाराम चौधरी ने मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट के लिए जमकर मेहनत की और पहली ही बार में एम्स एंट्रेंस जैसी कठिन परीक्षा पास कर ली।
आशाराम का दाखिला जोधपुर एम्स में हुआ है। एक छोटे से शहर में पन्नी बीनने वाले पिता के बेटे की सफलता की कहानी जब राहुल गांधी तक पहुंची तो उन्होंने आशाराम को खत लिखकर न केवल बधाई दी बल्कि उससे कहा कि वो आगे चलकर और भी बच्चों को मेडिकल पेशा चुनने के लिए प्रेरित करें। राहल गांधी ने अपने खत में लिखा कि प्रिय आशाराम, मैं आपको एम्स एंट्रेंस टेस्ट क्लीयर करने और अच्छी रैंक लाकर एम्स जोधपुर में एडमीशन के लिए बधाई देता हूं। मैं जानता हूं आपके सामने बहुत चुनौतियां थीं, इसके बावजूद आप ना केवल कामयाब हुए बल्कि अच्छी रैंकिंग भी लाए।
राहुल ने लिखा कि ये तुम्हारी निष्ठा और आपके परिश्रम की परीक्षा थी। मुझे ये जानकर बहुत खुशी हुई कि कैसे आपके गांव के डॉक्टर, आपके माता-पिता और एक संस्था ने आर्थिक मदद कर आपको प्रेरित किया। मुझे उम्मीद है कि एक दिन आप दूसरे बच्चों को भी डॉक्टर का पेशा चुनकर भारत के लोगों की सेवा करने के लिए प्रेरित करेंगे. इसके अलावा राहुल गांधी ने खत में महात्मा गांधी का भी जिक्र किया है। राहुल गांधी ने आगे लिखा कि आपको देखकर मुझे महात्मा गांधी की याद आती है जो कहा करते थे ताकत शारीरिक बल से नहीं बल्कि दृढ़ इच्छा शक्ति से आती है।
आशाराम की कहानी – मध्य प्रदेश के देवास नाम के छोटे से शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर विजयागंज मंडी में रहने वाले आशाराम चौधरी का नाम इन दिनों हर किसी की जुबान पर है। दरअसल, कचरा और पन्नी बीनने वाले के बेटे आशाराम ने एम्स एंट्रेंस एग्जाम में ऑल इंडिया 707 रैंक हासिल की है। इस प्रवेश परीक्षा में देशभर से लाखों छात्रों ने भाग लिया था। आशाराम का एम्स जोधपुर में दाखिला हो गया है जहां जल्द ही उनकी क्लास भी शुरू हो जाएगी।
आईआईटी में लड़कियाँ कम, इसे बढ़ाने की जरूरत: राष्ट्रपति
खड़गपुर : राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज कहा कि लड़कियां बोर्ड परीक्षाओं , कालेजों और विश्वविद्यालयों में लड़कों को अक्सर पछाड़ देती हैं लेकिन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में उनकी संख्या ‘‘ दुखद रूप से कम ’’ है और इसे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने आईआईटी खड़गपुर के 64 वें दीक्षांत समारेाह को संबोधित करते हुए कहा कि 2017 में आईआईटी संयुक्त प्रवेश परीक्षा में बैठने वाले अभ्यर्थियों की संख्या एक लाख 60 हजार थी जिसमें से लड़कियां केवल 30 हजार थी। उस वर्ष आईआईटी की स्नातक कक्षाओं में 10878 छात्र भर्ती हुये थे जिसमें केवल 995 लड़कियां थीं।
कोविंद ने कहा , ‘‘ यह विषय मुझे लगातार परेशान करता है … यह नहीं चल सकता , हमें इन संख्याओं के बारे में कुछ करना चाहिए। ’उन्होंने कहा , ‘‘ जब कोई बोर्ड परीक्षाओं के बारे में सोचता है तो लड़कियां अच्छा परिणाम लाती हैं। वे अक्सर लड़कों को पछ़ाड़ देती हैं। मैं देशभर में जिन कालेजों और विश्वविद्यालयों में जाता हूं , मैं छात्रों के मुकाबले छात्राओं द्वारा ज्यादा पदक जीतने की प्रवृत्ति देखता हूं। (लेकिन आईआईटी में) छात्राओं की संख्या दुखद रूप से कम है। ’’
राष्ट्रपति ने कहा कि आईआईटी खड़गपुर में प्रवेश पाने वाले 11653 छात्रों में से 1925 लड़कियां हैं। देश में उच्चतर शिक्षा और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में महिलाओं की भागीदारी ‘‘ आगामी दशक में उचित एवं स्वीकार्य स्तर तक बढनी चाहिए और यह राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए और आईआईटी समिति को इस दिशा में आगे कदम बढाना चाहिए। ’’
कोविंद ने कहा कि इस लक्ष्य को पूरा किये बिना और लड़कियों तथा युवतियों के लिए कामकाज के अवसर पैदा किये बिना समाज का विकास कभी पूरा नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के एन त्रिपाठी इस समारोह में सम्मानित अतिथि थे।
गोपाल दास नीरज : मौन हुई ‘हिंदी की वीणा’
नयी दिल्ली : कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज शब्दों के ऐसे चितेरे कि उनके व्यक्तित्व को शब्दों में बांधना मुश्किल, वाचिक परंपरा के ऐसे सशक्त हस्ताक्षर कि मंच पर उनकी मौजूदगी लोगों को गीत और कविता सुनने का शऊर सिखा दे, जिंदादिली ऐसी कि शोखियों में फूलों का शबाब घोल दें और मिजाज ऐसा मस्तमौला कि कारवां गुजर जाने के बाद लोग गुबार देखते रहें।उनके जाने से हिंदी साहित्य का एक भरा भरा सा कोना यकायक खाली हो गया। वह अपने चाहने वालों के ऐसे लोकप्रिय और लाड़ले कवि थे जिन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी काव्यानुभूति तथा सरल भाषा से हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया और उनके बाद उभरे बहुत से गीतकारों में जैसे उनके ही शब्दों का अक्स नजर आता है।
गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ का जन्म 4 जनवरी 1924 को इटावा जिले के पुरावली गांव में हुआ। मात्र छह साल की उम्र में पिता ब्रजकिशोर सक्सेना नहीं रहे और उन्हें एटा में उनके फूफा के यहां भेज दिया गया। नीरज ने 1942 में एटा से हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और परिवार की जिम्मेदारी संभालने इटावा वापस चले आए। गोपाल दास रोजी रोटी की तलाश में निकले तो शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर भी नौकरी की। कुछ समय बाद वह भी जाती रही तो छोटे मोटे काम करके जैसे तैसे मां और तीन भाइयों के लिए दो रोटी का जुगाड़ किया।
कुछ समय बाद नीरज को दिल्ली के सप्लाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी मिली तो कुछ राहत हो गई। नौकरी के दौरान पढ़ने लिखने का सिलसिला चलता रहा और इसी दौरान कलकत्ता में एक कवि सम्मेलन में शामिल होने का मौका मिला। उनके गीतों की खूश्बू अब फैलने लगी थी और इसी के चलते ब्रिटिश शासन में सरकारी कार्यक्रमों का प्रचार प्रसार करने वाले एक महकमे में नौकरी पा गए। नीरज को जब यह लगने लगा था कि जिंदगी पटरी पर लौट रही है तभी उनके लिखे एक गीत के कारण उन्हें नौकरी गंवानी पड़ी और वह कानपुर वापस लौट आए। बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में पाँच वर्ष तक टाइपिस्ट की नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएँ देकर उन्होंने 1949 में इण्टरमीडिएट, 1951 में बीए और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिन्दी साहित्य से एमए किया।
1955 में उन्होंने मेरठ कॉलेज में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये । कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को फिल्मी दुनिया ने गीतकार के रूप में ‘नई उमर की नई फसल’ के गीत लिखने का न्यौता दिया और वह खुशी खुशी अपने सपनों में रंग भरने के लिए बम्बई रवाना हो गए। उनका लिखा एक गीत ‘कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे’ जैसे उनके नाम का पर्याय बन गया और जीवनपर्यंत देश विदेश का ऐसा कोई कवि सम्मेलन नहीं था, जिसमें उनके चाहने वालों ने उनसे वह गीत सुनाने की फरमाइश न की हो।
उनके गीतों की चमक ऐसी बिखरी कि लगातार तीन बरस तक उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवार्ड मिला। 60 और 70 के दशक में उन्होंने फिल्मी दुनिया के गीतों को नये मायने दिए और फिर बंबई से मन ऊब गया तो 1973 में अलीगढ़ वापस चले आए। बाद में बहुत इसरार पर फिल्मों के लिए कुछ गीत लिखे । गोपालदास नीरज के व्यक्तित्व और उनकी लेखनी के जादू को युवा कवि कुमार विश्वास कुछ इन शब्दों में ब्यां करते हैं, ‘‘जैसे किसी सात्विक उलाहने के कारण स्वर्ग से धरा पर उतरा कोई यक्ष हो। यूनानी गठन का बेहद आकर्षक गठा हुआ किंतु लावण्यपूर्ण चेहरा, पनीली आंखें, गुलाबी अधर, सुडौल गर्दन, छह फुटा डील डौल, सरगम को कंठ में स्थायी विश्राम देने वाला मंद-स्वर, ये सब अगर भाषा के खांचे में डालकर सम्मोहन की चांदनी में भू पर उतरें तो जैसे नीरज जी कहलाएं।’’
किशोरों की याद्दाश्त बिगाड़ सकता है स्मार्टफोन से निकलने वाला विकिरण: अध्ययन
लंदन : मोबाइल फोन से निकलने वाले विकिरण के संपर्क में लंबे समय तक रहने पर किशोरों के मस्तिष्क के कुछ हिस्सों के याद्दाश्त संबंधी कामकाज पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।‘ इन्वायरनमेंट हेल्थ पर्सपेक्टिव्स ’ में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में यह जानकारी दी गयी है। अध्ययन में स्विट्जरलैंड के करीब 700 किशोरों को शामिल किया गया।
स्विस ट्रॉपिकल एंड पब्लिक हेल्थ इंस्टीट्यूट (स्विस टीपीएच) के वैज्ञानिकों ने संचार के बिना तार वाले उपकरणों के रेडियोफ्रीक्वेंसी विद्युतचुंबकीय क्षेत्र (आरएफ – ईएमएफ) में किशारों के रहने और उनकी याद्दाश्त के बीच संबंधों पर गौर किया। अध्ययन में पाया गया मोबाइल फोन के इस्तेमाल से साल भर में आरएफ – ईएमएफ के संपर्क से किशोरों की याद्दाश्त पर नकारात्मक अ सर पड़ सकता है। इससे 2015 में प्रकाशित हुए पूर्व के अध्ययनों की भी पुष्टि होती है।
82 साल के बुजुर्ग ने भेड़ चराते-चराते खोद डाले 14 तालाब
मांड्या : कर्नाटक के मांड्या निवासी केरे कामेगौड़ा ने ऐसा काम करके दिखाया है, जो सबके लिए उदाहरण बन गया है। दरअसल, 82 वर्षीय कामेगौड़ा ने अपने हाथों से कुल 14 छोटे तालाब बना डाले हैं। चामराजनगर जिले में स्थित मंदिरों में दर्शन करने जानेवाले लोग जब बेंगलुरु-महावल्ली-कोल्लेगल रोड से गुजरते हैं तो रास्ते में उनको रास्ते में लोगों से कामेगौड़ा के बारे में सुनने को मिलता है। कामेगौड़ा का घर डासनाडोड्डी में है और आज भी उनका परिवार झोपड़ियों में ही रहता है। अकसर कामेगौड़ा अपने घर की बजाय कुंदिनीबेट्टा गांव के आसपास भेड़ चराते और पर्यावरण की चिंका करते पाए जाते हैं। कामेगौड़ा जानवर चराने के दौरान या तो पेड़ लगाते हैं या फिर गड्ढे खोदते हैं।
40 साल का सफर, बनाए 14 तालाब – अब तक कुल 14 गड्ढे/तालाब बना चुके कामेगौड़ा ने 2017 सिर्फ छह तालाब ही बनाए थे लेकिन पिछले एक साल में उनके काम में तेजी आई और आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा हो गया। एक स्थानीय निवासी कामेगौड़ा के बारे में बताते हैं, ‘कामेगौड़ा को उनके काम के लिए कई सारे इनाम और पैसे भफी मिले लेकिन उन्होंने पैसों का इस्तेमाल खुद के लिए न करके तालाब बनाने के लिए किया। उन्होंने इन पैसों से औजार खरीदे और मजदूर लगाकर तालाब बनवाए। उन्होंने पहाड़ी पर जानेवालों के लिए एक रास्ता भी बनवाया। उनके बच्चे आज भी झोपड़ी में रहते हैं और जानवर चराते हैं।’
पहाड़ी पर भेड़ चराते-चराते तालाब खोदना शुरू किया – 40 साल पहले यह काम शुरू करनेवाले कामेगौड़ा बताते हैं, ‘मैं पहाड़ियों पर जब जानवर चराने जाता था तो उनके लिए कहीं पर भी पानी नहीं मिलता था और जानवर प्यासे रह जाते थे। इसी के चलते ऊंचाई पर जानवर नहीं मिलते थे। यह देखकर मैंने गड्ढे बनाने शुरू कर दिए। जबतक जानवर चरते रहते मैं लकड़ी की मदद से गड्ढे खोदता था।’ गौरतलब है कि कामेगौड़ा को पहली बार खुदाई करते समय कुछ फीट खोदने के बाद ही पानी मिल गया था।
औजार खरीदने के लिए बेच दी थीं भेड़ – कामेगौड़ा आगे बताते हैं, ‘शुरुआत में मैं लकड़ी से गड्डे खोदता था, जोकि काफी कठिन काम था। मैंने कुछ औजार खरीदने का फैसला किया, इसके लिए मुझे कुछ भेड़ें बेचनी भी पड़ीं। पहले गड्ढे को झील में बदलने के बाद मुझे लगा कि इससे जानवरों को काफी मदद मिलता है। यह देखकर मैंने अपना काम जारी रखने का फैसला किया।’
82 की उम्र के बावजूद रोज चढ़ते हैं पहाड़ – इस प्रकार बिना पढ़े-लिखे और बिना किसी तकनीकी कौशल के भी कामेगौड़ा ने पानी के बहाव और अन्य चीजों के बारे में अपनी समझ विकसित की और लोगों को भी अपने काम से प्रभावित किया। वह आगे कहते हैं, ‘अभी तक मैं अकेले ही काम कर रहा था लेकिन पिछले साल मुझे किचा सुदीप ने इनाम के रूप में कुछ पैसे दिए। उन पैसों से मैंने पहाड़ी के लिए एक सड़क बनाई। इससे सभी तालाबों को सही आकार देने में मदद मिली। इस साल मैंने पहाड़ी पर 2,000 से ज्यादा बरगद के पेड़ लगाए हैं।’
82 साल के कामेगौड़ा आज भी हैं एकदम फिट – कामेगौड़ा ने पढ़ाई नहीं की है लेकिन उन्होंने तालाबों का नाम पौराणिक कथाओं के नाम पर रखा है। वह बताते हैं कि उन्होंने पहले तालाबा का नाम गोकर्ण और झीलों को जोड़ने वाली सड़क का नाम राम और लक्ष्मण के नाम पर रखा है। 82 साल के हो चुके कामेगौड़ा आज भी पूरी तरह स्वस्थ हैं। वह रोज पहाड़ी पर चढ़ते हैं और उतरते हैं। वह बताते हैं, ‘हाल ही में मेरी एक आंख का ऑपरेशन हुआ, इसमें मैसूर के एक सामाजिक कार्यकर्ता जयराम पाटिल ने मेरी मदद की। उन्होंने दूसरी आंख का इलाज कराने का वादा किया है।’ कामेगौड़ा के बेटे कृष्णा बताते हैं, ‘पिताजी सिर्फ रात में घर आते हैं, दिनभर वह पहाड़ी पर अपने पेड़ों और तालाबों की देखभाल करते हैं। मैंने भी उनके काम को अपना बना लिया है। वह इनाम में मिलने वाले सारे पैसे इसी काम में लगाते हैं, परिवार को भी उन्होंने इनाम का एक पैसा नहीं दिया।’ उनका इलाज कराने वाले जयराम पाटिल बताते हैं कि कामेगौड़ा अपनी कमाई के पैसे भी पेड़ों और तालाब के लिए खर्च कर देते हैं।
पुरुषों की तरह महिलाओं को भी मंदिर में जाने का हक : सुप्रीम कोर्ट
नयी दिल्ली : केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आज कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि देश में प्राइवेट मंदिर का कोई सिद्धांत नहीं है। मंदिर निजी नहीं बल्कि सार्वजनिक संपत्ति है, जिसमें कोई भी जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि पुरुषों की तरह महिलाओं को भी मंदिर में जाने का हक है।
बता दें कि सबरीमाला के प्रसिद्ध भगवान अयप्पा मंदिर में 10 वर्ष से 50 वर्ष तक के उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। दरअसल, महिलाओं के उस समूह को मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है जिन्हें माहवारी होती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान अयप्पा एक ‘नास्तिक ब्रह्मचारी’ थे और इस कारण रजस्वला महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित है। मंदिर प्रबंधक के इस फैसले का सामाजिक संगठन और महिलाएं पुरजोर विरोध कर रही हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी उन महिलाओं के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी जो मंदिर में पूजा करने की इच्छुक तो हैं लेकिन उन्हें प्रवेश करने से रोक दिया जाता है।
लाल किले में मिला छुपा हुआ भूमिगत कक्ष
नयी दिल्ली : भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के कर्मी को लाल किले में छुपे हुआ भूमिगत कक्ष मिला है। कहा जा रहा है कि शायद इस कक्ष का इस्तेमाल गोला बारूद रखने के लिए किया जाता होगा। जब लाहौरी गेट जो कि लाल किले का मुख्य द्वार है की सफाई की जा रही थी तभी यह कक्ष मिला।
एएसआई अधिकारी ने पहचान न बताने की शर्त पर कहा कि तहखाना पूरी तरह से मिट्टी से भरा हुआ था। इसमें विस्फोटक और अग्नेय शस्त्र जैसी कोई चीज नहीं मिली है। अधिकारी ने यह भी बताया कि कक्ष (1658-1707) मुगल काल के दौरान औरंगजेब या फिर ब्रिटिश सेना ने बनाया होगा। यह कक्ष लाखौरी ईंटों से बनाया गया है और अंडाकार गुंबददार डिब्बे की आकृति में बनाया गया है। इसकी लंबाई 6 मीटर, चौड़ाई 2 मीटर और ऊंचाई 3 मीटर है। यह कक्ष पैडस्टल से कुछ दूरी पर स्थित है, जहां 15 अगस्त को झंडा लहराया जाता है।
अधिकारी ने बताया कि यह धरती के टीले के नीचे दबा हुआ था और विभाग में कोई भी अभी तक इसके अस्तित्व के बारे में नहीं जानता था। सफाई के बाद एएसआई ने इसे इसके मूल आकार में ढाल दिया है। इस कक्ष का इस्तेमाल गोला बारूद रखने के लिए किया जाता था क्योंकि उस समय (मुगल और ब्रिटिश काल) उन्हें मिट्टी के नीचे दबाकर रखा जाता है। यह तब एक आम प्रथा थी। क्योंकि मिट्टी एक इंसुलेटर के रूप में काम करती है। अधिकारी ने बताया कि कक्ष में कोई गोला बारूद नहीं मिला। वह केवल मिट्टी से भरा था। इससे पहले एएसआई को लाल किला परिसर में विस्फोटक और कारतूस भी मिल चुके हैं।




