Saturday, April 11, 2026
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एनआरसी को लेकर असमवासी अफवाहों में न आयें : प्रो. मुखी

नयी दिल्ली : असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर उपजी आशंकाओं को दूर करते हुये असम के राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी ने इसे एक उपलब्धि करार दिया और इसे, देश में घुसपैठ की समस्या का कारगर समाधान बताया है। एनआरसी से जुड़ी शंकाओं, समाधान और उपयोगिता पर पेश हैं मुखी से ‘भाषा’ के पांच सवाल ….
प्रश्न :  लंबी और जटिल प्रक्रिया के बाद एनआरसी का प्रारूप सामने आया। इस कवायद को कितना कारगर मानते है, तथा सफलता का श्रेय किसे देंगे?
उत्तर : यह न सिर्फ असम बल्कि पूरे देश के लिये ऐतिहासिक उपलब्धि है। इसके लिये मैं बधाई देना चाहूंगा महापंजीयक को, असम सरकार के अधिकारियों और कमचारियों को और माननीय उच्चतम न्यायालय को, जिनके अथक परिश्रम और सावधानी भरे सतत प्रयास से यह अहम कार्य सम्पन्न हुआ।
प्रश्न : असम के लोगों में इसके बारे में क्या प्रतिक्रिया है, क्योंकि दिल्ली सहित देश भर में एनआरसी को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है?
उत्तर : मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि अभी यह एनआरसी का प्रारूप है। इसके आधार पर अभी कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी। राज्य में एक ऐसी भ्रांति चल रही थी कि जिसका नाम प्रारूप में नहीं आया वह विदेशी घोषित हो गया, उनका क्या होगा। ऐसा कुछ भी नहीं है। आज वे कोई विदेशी नहीं हैं। जिन लोगों का नाम छूट गया है, उन्हें अपने दावे को पुष्ट करने का पूरा अधिकार है। इसकी पूरी प्रक्रिया लोगों को बतायी गयी है और इसके लिये दो महीने का समय भी दिया गया है। असम में इसे लेकर सामान्य तौर पर कोई भ्रम नहीं है।
प्रश्न : भ्रम या चिंता उन 40 लाख लोगों के मन में है जिनके नाम एनआरसी के प्रारूप में शामिल नहीं हुये। उन लोगों के लिये आप क्या कहेंगे?
उत्तर : मैं आश्वस्त कर सकता हूं कि हमारे प्रदेश में किसी के लिये चिंता करने की कोई बात नहीं होनी चाहिये। हर किसी का अधिकार सुरक्षित है, क्योंकि भारत सरकार और असम सरकार ये सुनिश्चित कर रही है कि एक भी भारतीय ऐसा नहीं रहेगा जिसका एनआरसी के अंदर नाम न आ जाये। उन्हें हर मौका दिया जायेगा। यदि इस प्रक्रिया के पूरा होने पर भी किसी का नाम एनआरसी में सम्मिलित नही हो पाता तो वह ट्रिब्यूनल में अपील कर सकता है।
प्रश्न : तमाम जनप्रतिनिधियों और प्रतिष्ठित लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं हो पाये, इससे जनसामान्य की चिंता बढ़ना क्या लाजिमी नहीं है?
उत्तर:  मैंने पहले ही कहा कि इतनी व्यापक प्रक्रिया में कुछ नामों का छूटना बड़ी बात नही है। इतना बड़ा काम हुआ है, उसमें कई गलतियां हो सकती हैं, भूल चूक हो सकती है, लेकिन उन सभी को दुरुस्त करने के भी पुख्ता इंतजाम इसमें किये गये हैं। इन्हें सुधारने के लिये पर्याप्त समय दिया गया है। इसीलिये मैंने कहा कि यह प्रारूप मात्र है। जहां तक जनसामान्य की चिंता की बात है तो मैं यह जरूर कहूंगा कि यह जो इतना बड़ा कार्य हुआ है वह असम की जनता के साथ जो एक समझौता हुआ था, उसके तहत हुआ है। मैं असमवासियों को आश्वस्त भी करना चाहता हूं कि एक भी भारतीय ऐसा नहीं रहेगा जिसका नाम इस लिस्ट में न आ जाये।
प्रश्न :  एनआरसी की उपयोगिता और महत्व पर आपकी क्या राय है?
उत्तर : एनआरसी के बारे में मेरी स्पष्ट धारणा बनी है कि यह एक ऐसा महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार हुआ है, जो देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभायेगा। इसकी उपयोगिता को लेकर मेरा यह कहना है कि जिस प्रकार से असम ने अपनी एनआरसी तैयार की है, देश के हित में यह बेहतर होगा कि हर राज्य अपनी एनआरसी तैयार कराये। ताकि देश की सरकार को और राज्य की सरकार को यह पूर्ण जानकारी रहे कि राज्य और देश में कौन विदेशी रह रहे हैं। और जो विदेशी रह रहे हैं उनको भी यह जानकारी हो कि वे बतौर विदेशी रह रहे हैं। इसके निमित्त हर राज्य एनआरसी बनाये और प्रत्येक दस साल के अंतराल पर होने वाली जनगणना के साथ इसे अपडेट भी करे। ऐसा करने से एनआरसी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये लाभप्रद और कारगर उपाय साबित होगा। अगर अन्य राज्य ऐसी पहल करते हैं तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि अन्य राज्यों में यह काम बहुत जल्दी पूरा हो सकेगा क्योंकि असम सरकार के अधिकारियों का अनुभव उनके लिये बेहद उपयोगी संपदा साबित होगा। बल्कि मेरा सुझाव है कि अन्य राज्यों में यह पहल करने पर इसे ‘आधार’ से जोड़ा जाना चाहिये जिससे भारत में विदेशी नागरिकों का एक राज्य से दूसरे राज्य में जाकर बसना भी मुमकिन नहीं हो पायेगा।

(साभार – भाषा)

आजीविका साबुन 156 महिलाओं के लिए बना ‘आजीविका’ का साधन

रायसेन : ग्रामीण आजीविका मिशन और स्वच्छ भारत अभियान की ‘सारथी’ बन मध्यप्रदेश के रायसेन की ग्रामीण महिलाएं गरीबी और बीमारियों के विरुद्ध अपनी लड़ाई खुद लड़ रही हैं। स्वसहायता समूह से जुड़ी इन सैकड़ों महिलाओं द्वारा बनाया गया साबुन ‘आजीविका’ जिले में स्वच्छता- स्वास्थ्य का ब्रांड बन गया है। चंदन, मोगरा, नीबू, गुलाब और एलोवेरा फ्लेवर के इस साबुन से अब सरकारी स्कूलों के बच्चे भी रोजाना हाथ धोएंगे। आजीविका साबुन 156 महिलाओं के लिए आजीविका का भी साधन बन गया है, जो अपने परिवार को आर्थिक गति देने में जुटी हुई हैं।
प्रशासन ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत अब सरकारी प्राइमरी एवं मिडिल स्कूलों के छात्र-छात्राओं के हाथ धुलाने के लिए जनपद शिक्षा केंद्रों को स्कूलों में आजीविका साबुन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। इससे जहां बच्चों में बीमारियों का अंदेशा कम होगा, वहीं बच्चे स्वच्छता के प्रति प्रारंभिक स्तर पर ही जागरूक होंगे।
राज्य शासन के निर्देश पर जिलेभर के 2,538 शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में जनपद शिक्षा केंद्रों के माध्यम से साबुन उपलब्ध कराए जाएंगे। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम, नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन) द्वारा इन स्वसहायता समूहों का गठन किया गया है। ग्रामीण महिलाएं इनमें बढ़चढ़ कर सहभागिता कर रही हैं।
50 ग्राम वजनी इस साबुन की कीमत 18 रुपए रखी गई है। जिलेभर के सभी शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में प्रति स्कूल दो साबुन प्रतिमाह के हिसाब से तीन माह के लिए 24,040 साबुन भेज दिए गए हैं, जिनकी कीमत करीब साढ़े चार लाख रुपए है। स्कूलों के अलावा यह साबुन फुटकर एवं थोक में भी बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया है।
आजीविका साबुन का इस्तेमाल सरकारी कर्मचारी, जनप्रतिनिधि और आम ग्रामीण भी कर रहे हैं। साबुन निर्माण के लिए सिर्फ एक घंटे के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। एक घंटे में करीब 100 साबुन का निर्माण होता है।
मप्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन, रायसेन के जिम्मेदार अधिकारी डॉ. एसडी खरे कहते हैं, इस साबुन के जरिये जिले में स्वच्छता का संदेश भी दिया जा रहा है। यह साबुन शहरी-ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता -स्वास्थ्य का चर्चित ब्रांड बन गया है।
स्वसहायता समूह से जुड़ीं ग्राम पांडाझिर की विमला तिवारी बताती हैं, गत दो माह में एक हजार साबुन बनाकर लगभग पांच हजार रुपए का मुनाफा हुआ है। स्कूलों में सप्लाई के अलावा हमारे द्वारा गांवों की छोटी-बड़ी दुकानों पर भी साबुन बेचा जा रहा है।
(साभार – दैनिक जागरण पर आनन्द कुशवाह की खबर)

कुष्ठ रोग को तलाक का आधार नहीं बनाने को कैबिनेट ने किया बिल मंजूर

नयी दिल्ली : केंद्रीय कैबिनेट ने एक नया बिल पारित किया है। इसके तहत कुष्ठ रोग को तलाक लेने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। पर्सनल लॉज (संशोधन) बिल, 2018 के तहत ईसाइयों के तलाक अधिनियम, मुस्लिम विवाह अलगाव अधिनियम, हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम और हिंदू गोद लेने और गुजारा भत्ता अधिनियम में संशोधन करके तलाक के लिए कुष्ठ रोग को आधार बनाने को प्रतिबंधित किया जाएगा।
कानून मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अब तक इन कानूनों में तलाक लेने के लिए कुष्ठ रोग को आधार बनाने का प्रावधान था। चूंकि जब यह कानून बने थे तब तक कुष्ठ रोग एक लाइलाज बीमारी थी। चूंकि अब कुष्ठ रोग कई तरह की दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो सकता है, इसलिए किसी भी कानून के तहत कुष्ठ रोगी से अलगाव का प्रावधान किसी भी तरह से उचित नहीं है।
उल्लेखनीय है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव में दस्तखत कर रखे हैं जिसमें कुष्ठ रोग के पीड़ित से किसी भी स्तर पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र व राज्य सरकारों से कहा था कि कुष्ठ रोग से प्रभावित पीड़ितों का पुनर्वास किया जाए।

काँवड़ शिविर में सेवा कार्य को आगे आया मुस्लिम समुदाय

मेरठ : मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना …यह लाइन ऐसे लोगों के लिए सबक है जो वोट की खातिर आमजन को आपस में लड़ाते हैं और उन्हें मजहब के नाम पर आपस में बांटते हैं। मेरठ-बुलंदशहर हाईवे पर लगे कांवड़ शिविर में शिवभक्तों की सेवा में लीन नजर आए मुस्लिम वर्ग के लोग क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
वहीं पश्चिम उत्तर प्रदेश का माहौल शिवमय हो रहा है। चौधरी चरण सिंह कांवड़ पटरी मार्ग पर शिव भक्तों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। शिव भक्त दिन और रात में अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं। उधर, पिछले तीन दिनों में हरिद्वार से डेढ़ करोड़ से अधिक शिव भक्त गंगाजल उठाकर अपनी यात्रा शुरू कर चुके हैं। उत्तराखंड के मंगलौर से मुरादनगर तक करीब 107 किलोमीटर लंबे कांवड़ पटरी मार्ग पर केसरिया सैलाब उमड़ रहा है। 28 जुलाई से विधिवत शुरू हुई कांवड़ यात्रा के पहले तीन दिनों में काफी कम संख्या में शिव भक्त कांवड़ मार्ग पर नजर आए। लेकिन एक अगस्त से कांवड़ पटरी मार्ग पर राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई शहरों के कांवड़िये बड़ी संख्या में गंगाजल लेकर लौटना शुरू हो गए हैं।

..जब आनंद महिंद्रा ने बनवाया ‘जख्मी जूतों का हॉस्पिटल’

नयी दिल्ली : एजेंसी महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने जख्मी जूतों के डॉक्टर नरसी राम के लिए ‘जख्मी जूतों का हॉस्पिटल’ तैयार करवा दिया है। यह सब कैसे हुआ, इसका किस्सा खासा दिलचस्प है। असल में हरियाणा के जींद में पटियाला चौक पर एक शख्स नरसी राम की जूते सुधारने की दुकान है। राम ने अपनी दुकान का नाम ‘जख्मी जूतों का हस्पताल’ रखा है। उसने इसमें अपने को डॉक्टर नरसी राम लिखा और जूते सुधारने से लेकर लंच तक का समय बताया।
किसी ने नरसी राम का फोटो उद्योगपति आनंद महिंद्रा को व्‍हाट्सअप पर भेज दिया। फिर क्या था महिंद्रा इस शख्स के मुरीद हो गए और उन्होंने ट्विटर पर इसकी फोटो ट्वीट करते हुए लिखा कि ‘इस आदमी को आईआईएम में मार्केटिंग सिखाना चाहिए।’ महिंद्रा ने लोगों से इस शख्स को खोजने की अपील की। उन्होंने कहा कि वो उसके छोटे से स्टार्टअप में निवेश करना चाहते हैं। इसके बाद इस शख्स को ढूंढ लिया गया। महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी ने उसे फूल और मोमेंटो दिया और कंपनी के टैक्ट्रर पर बिठाकर सारे शहर में घुमाया।
यूनिक कियोस्क अब महिंद्रा ने फिर से ट्वीट कर कहा, ‘जख्मी जूतों का हॉस्पिटल’ तैयार हो चुका है। उन्होंने कहा कि उनकी टीम ने नरसी राम से संपर्क करके उसके स्टार्टअप में निवेश करने का न्योता दिया है। नरसी राम ने उनसे अपने लिए अच्छा सा कियोस्क मांगा।
आनंद महिंद्रा के मुंबई स्थित डिजाइन स्टूडियो ने एक बेहतरीन ‘कियोस्क’ नरसी राम के लिए तैयार किया है। इसे जल्द ही नरसी राम को भेजा जाएगा। इस कियोस्क में दो बेंच लगी है। ऊपर ‘जख्मी जूतों का हस्पताल’ लिखा है। ये वैंटिलेटेड और वाटरप्रूफ कियोस्क है। इसमें जूते रखने और टांगने की सुविधा भी दी गई है। बहुत कम लागत में बने इस कियोस्क का डिजाइन यूनिक है।

ट्रोलिंग के बाद रैंप पर चलीं हनान हामिद, सीएम ने कहा- सरकार की बेटी

तिरुअनंतपुरम : कॉलेज के बाद मछली बेच कर अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाने वाली अंडरग्रेजुएट स्‍टूडेंट हनान हामिद ने केरल के मुख्‍यमंत्री से मुलाकात कर सुरक्षा की मांग की। इसके बाद सीएम पिनाराई विजयन ने हनान को सुरक्षा और समर्थन देने का वादा किया है। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग के बाद हनान ने राज्‍य में आयोजित फैशन शो में भी हिस्‍सा लिया और रैंप पर चलीं। दरअसल, कॉलेज के यूनिफार्म में मछली बेचती हनान की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। कुछ लोगों ने जहां सहानुभूति जताई वहीं कुछ ने जमकर ट्रोल किया। इसके बाद ही हनान ने सरकार से सुरक्षा की मांग को लेकर गुहार लगाई और मुख्‍यमंत्री से बुधवार को मुलाकात की।


सीएम के साथ ही विपक्ष के नेता रमेश चेन्नीथला से भी उन्होंने मुलाकात की और उन लोगों के प्रति मदद के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने बताया, ‘सीएम का कहना है कि मैं सरकार की बेटी हूं, इसलिए सरकार सारी सुरक्षा देगी।’ उन्होंने चेन्नीथला को उनकी शिक्षा मुफ्त कराने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने हनान के लिए घर बनवाने का वादा भी किया है।
हनान ने बताया कि मुख्‍यमंत्री ने उन्हें सरकार की बेटी कहा है और अब सरकार उन्हें सुरक्षा देगी। बता दें कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहीं हनान की कहानी को कई लोगों ने झूठा भी बताया, लेकिन सरकार उनके समर्थन में खड़ी है। उल्‍लेखनीय है कि कल ही ओणम बकरीद खादी एक्‍सपो के लिए हनान ने रैंप वॉक भी किया है। केरल खादी बोर्ड की वाइस-चेयरपर्सन शोभना जॉर्ज ने हनान को आमंत्रित किया था। हनान ने खादी के कपड़े पहन रैंपवॉक किया।

मध्यप्रदेश के कड़कनाथ चिकन को मिला जीआई तमगा

इंदौर : देश की जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री ने मध्यप्रदेश के झाबुआ की पारंपरिक प्रजाति के कड़कनाथ मुर्गे को लेकर सूबे के दावे पर मंजूरी की मुहर लगा दी है। करीब साढ़े छह साल की लम्बी जद्दोजहद के बाद झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम भौगोलिक पहचान (जीआई) का चिन्ह पंजीकृत किया गया है।

इस निशान के लिये सहकारी सोसायटी कृषक भारती कोऑपरेटिव लिमिटेड (कृभको) के स्थापित संगठन ग्रामीण विकास ट्रस्ट के झाबुआ स्थित केंद्र ने आवेदन किया था।

जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक “मांस उत्पाद तथा पोल्ट्री एवं पोल्ट्री मीट की श्रेणी ” में किये गये इस आवेदन को 30 जुलाई को मंजूर कर लिया गया है। यानी झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम जीआई तमगा पंजीकृत हो गया है । यह जीआई पंजीयन सात फरवरी 2022 तक वैध रहेगा।

ग्रामीण विकास ट्रस्ट के क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधक महेंद्र सिंह राठौर ने “पीटीआई-भाषा” से इसकी तसदीक की । उन्होंने बताया, “हमारी अर्जी पर झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम जीआई चिन्ह का पंजीयन हो गया है । हमें इसकी औपचारिक सूचना मिल चुकी है।”

जानकारों ने बताया कि जीआई पंजीयन का चिन्ह विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले ऐसे उत्पादों को प्रदान किया जाता है जो अनूठी खासियत रखते हैं। जीआई चिन्ह के कारण कड़कनाथ चिकन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबारी पहचान भी हासिल होगी जिससे इसके निर्यात के रास्ते खुल सकते हैं। इस चिन्ह के कारण झाबुआ के कड़कनाथ चिकन के ग्राहकों को इस मांस की गुणवत्ता का भरोसा मिलेगा, जबकि इस मांस के उत्पादकों को नक्कालों के खिलाफ पुख्ता कानूनी संरक्षण हासिल होगा।

झाबुआ मूल के कड़कनाथ मुर्गे को स्थानीय जुबान में “कालामासी” कहा जाता है। इसकी त्वचा और पंखों से लेकर मांस तक का रंग काला होता है। कड़कनाथ के मांस में दूसरी प्रजातियों के चिकन के मुकाबले चर्बी और कोलेस्ट्रॉल काफी कम होता है। झाबुआवंशी मुर्गे के गोश्त में प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। कड़कनाथ चिकन की मांग इसलिये भी बढ़ती जा रही है, क्योंकि इसमें अलग स्वाद के साथ औषधीय गुण भी होते हैं । कड़कनाथ प्रजाति के जीवित पक्षी, इसके अंडे और इसका मांस दूसरी कुक्कुट प्रजातियों के मुकाबले काफी महंगी दरों पर बिकता है।

झाबुआ की गैर सरकारी संस्था ने आठ फरवरी 2012 को कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस को लेकर जीआई प्रमाणपत्र की अर्जी दी थी। लम्बी जद्दोजहद के बाद इस अर्जी पर अंतिम फैसला हो पाता, इससे पहले ही एक निजी कम्पनी यह दावा करते करते हुए जीआई तमगे की जंग में कूद गयी थी कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में मुर्गे की इस प्रजाति को अनोखे ढंग से पालकर संरक्षित किया जा रहा है।

हालांकि, जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री ने झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस को लेकर मध्यप्रदेश का दावा मार्च में शुरूआती तौर पर मंजूर कर लिया था और अपनी भौगोलिक उपदर्शन पत्रिका में इस बारे में विज्ञापन भी प्रकाशित किया था। इसके बाद पड़ोसी छत्तीसगढ़ ने इस प्रजाति के लजीज मांस को लेकर जीआई प्रमाणपत्र हासिल करने की जंग में कदम पीछे खींच लिये थे।

भारत के पास 2018-19 में होगा बिजली अधिशेष : केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण

नयी दिल्ली : केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण (सीईए) के अनुसार चालू वित्त वर्ष में देश में व्यस्ततम समय के इतर बिजली की उपलब्धता 4.6% अधिक और व्यस्त समय में 2.5% अधिक रहने का अनुमान है। इस प्रकार चालू वित्त वर्ष में भारत एक बिजली अधिशेष वाला राज्य होगा।
पिछले साल सीईए ने अपनी भार और उत्पादन में संतूलन संबंधी रपट (एलजीबीआर) में अनुमान जताया था कि 2017-18 में भारत एक बिजली अधिशेष वाला राज्य होगा। लेकिन इस दौरान पूरे देश में अधिक व्यस्त समय बिजली की आपूर्ति में 2.1% की कमी और बाकी समय में 0.7% की कमी देखी गई।
चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में अधिक मांग के समय बिजली आपूर्ति में कमी 0.7% जबकि सामान्य समय में कमी 0.6% रही ।
वित्त वर्ष 2018-19 की एलजीबीआर के मुताबिक बिजली आपूर्ति की अखिल भारतीय स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है कि खपत की दृष्टि से सबसे व्यस्त अवधि में बिजली का अधिशेष 2.5% और सामान्य समय में अधिशेष 4.6% रहेगा। इस प्रकार इस वित्त वर्ष में भारत एक बिजली अधिशेष राज्य रहेगा। बिजली विशेषज्ञों के अनुसार, ‘‘भारत एक बिजली अधिशेष राज्य है क्योंकि इसकी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 3,44,000 मेगावाट है जबकि उसकी बिजली की अधिकतम मांग 1,70,000 मेगावाट तक ही है।
बिजली आपूर्ति में कमी की मुख्य वजह वितरण कंपनियों द्वारा बिजली खरीद कम करना है। इसकी दो वजह हैं या तो उनके पास बिजली खरीदने के पैसे नहीं है या वह बिजली बिलों की कम वसूली से डरे रहते हैं।’’
इसके अलावा बिजली आपूर्ति में कमी की एक और वजह सूदूर और पहाड़ी क्षेत्रों में बिजली की पहुंच और वितरण कम होना है। रपट के अनुसार पश्चिमी, उत्तरी और पूर्वोत्तर इलाकों में बिजली अधिशेष का प्रतिशत क्रमश: 1.9%, 14.8% और 22.9% रहेगा। हालांकि पूर्वी और दक्षिणी इलाकों को क्रमश: 4.2% और 0.7% बिजली आपूर्ति में कमी का सामना करना पड़ेगा।

बेटी की याद में क्‍लर्क पिता ने भरी 45 लड़कियों की फीस

बंगलुरू : कर्नाटक के एक स्‍कूल में एक पिता ने ऐसा कुछ किया, जिसकी चर्चा हर जगह हो रही है। कर्नाटक के एक गांव के एमपीएसएस गर्वमेंट हाईस्‍कूल के क्‍लर्क बसवराज ने 45 गरीब लड़कियों की स्कूल फीस भरी, जिसकी लिए उनकी तारीफ हो रही है। ऐसा उन्होंने अपनी बेटी की याद में किया, जिसकी मौत हो चुकी है। ऐसा करके उन लड़कियों के वह भगवान स्‍वरूप हो गए हैं। बसवराज ने कहा कि इस साल से मैं उन गरीब लड़कियों की फीस भरूंगा जो स्कूल में पढ़ाई करती हैं।
बता दें कि बसवराज कर्नाटक के कलबुर्गी शहर के मक्‍तामपुर में रहते हैं। उनकी बेटी धनेश्‍वरी की बीमार होने के कारण मौत हो गयी थी, जिसके बाद बसवराज ने कुछ नेक काम करने का सोचा और 45 गरीब लड़कियों की फीस भरी। उन्होंने गरीब बच्चियों की जिंदगी में उजाला करने का सोचा। इससे सरकारी स्‍कूल की लड़कियां काफी खुश हैं।
फातिमा नाम की लड़की ने कहा कि ‘हम गरीब परिवार से हैं। हम स्कूल फीस देने में असमर्थ हैं। बसवराज सर ने बेटी की याद में ये नेक काम किया। मैं उम्‍मीद करती हूं कि बसवराज की बेटी स्‍वर्ग में पिता के इस कार्य से गर्व महसूस कर रही होगी। भगवान उनकी बेटी की आत्मा को शांति दे।’ लोग बासवराज की तारीफ कर रहे हैं। ट्विटर पर एक यूजर ने लिखा है कि ‘क्या कोई अमीर आदमी ऐसा कर सकता है? सिर्फ गरीब आदमी ही लोगों की दिक्कतों को समझ सकता है। अमीर आदमी सिर्फ पैसों की बरबादी और शादी-पार्टी में पैसा खर्च करते हैं।’

भारतीय मूल के गणितज्ञ अक्षय वेंकटेश को मिला ‘फिल्ड्स मेडल’ पुरस्कार

नयी दिल्ली : मशहूर भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई गणितज्ञ अक्षय वेंकटेश सहित चार विजेताओं को गणित के विशिष्ट फिल्ड्स मेडल से सम्मानित किया गया है। गणित के क्षेत्र में इसे नोबेल पुरस्कार के समान माना जाता है। 36 वर्षीय वेंकटेश को यह मेडल गणित विषय में विशिष्ट योगदान के लिए दिया गया है।
वेंकटेश के अलावा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इरानी-कुर्द मूल के प्रोफेसर कौचर बिरकर, बॉन विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले जर्मनी के पीटर स्कूल्ज और ईटीएच ज्यूरिख में इतालवी गणितज्ञ एलिसो फिगेली को मेडल से सम्मानित किया गया है। प्रत्येक विजेता को 15,000 कनाडाई डॉलर का नकद पुरस्कार भी दिया गया है।
बता दें कि विशिष्ट फिल्ड्स मेडल चार साल में एक बार दिया जाता है। ये मेडल 40 साल से कम उम्र के सबसे उदीयमान गणितज्ञ को दिया जाता है। हर बार कम से कम दो और विशेषत: चार लोगों को पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।
गौरतलब है कि अक्षय वेंकटेश का जन्म नयी दिल्ली में हुआ था। वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं। जब वह दो साल के थे तब उनके माता-पिता ऑस्ट्रेलिया चले गए थे। वेंकटेश बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। उन्होंने उच्च विद्यालय में प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं भौतिकी और गणित ओलंपियाड्स में भाग लिया था और 11 व 12 वर्ष की आयु में दो विषयों में पदक जीते थे। उन्होंने उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में हाई स्कूल समाप्त किया और 16 साल की उम्र में, 1997 में गणित में प्रथम श्रेणी में अपना ग्रेजुएशन किया। केवल 20 साल उम्र में ही उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर ली।
वेंकटेश ने संख्या सिद्धांत, अंकगणितीय ज्यामिति, टोपोलॉजी, ऑटोमोर्फिक रूपों और एर्गोडिक सिद्धांत में उच्चतम स्तर पर काम किया है। उनके शोध को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें ओस्ट्रोस्की पुरस्कार, इंफोसिस पुरस्कार, सलेम पुरस्कार और शास्त्र रामानुजन पुरस्कार शामिल हैं।