साल 2013 में भयानक प्राकृतिक आपदा झेलने वाला केदारनाथ धाम जल्द ही नए स्वरूप में लोगों के सामने होगा। मंदिर और आसपास के परिसर की मरम्मत का काम तेजी से चल रहा है और माना जा रहा है कि अक्टूबर तक यह नई सेवाओं के साथ पूरी तरह तैयार हो जाएगा। माना जा रहा है कि अक्टूबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ के दौरे पर आ सकते हैं। ऐसे में उनके आने से पहले सभी काम पूरे करने के लिए जोर-शोर से कवायद जारी है।
मुख्य सचिव उत्पल कुमार केदारनाथ की मरम्मत का काम जांचने पहुंचे हैं। धाम में निर्माणाधीन रेप्लिका, रास्तों, पुलों, उद्धव कुंड, भैरव मंदिर और रास्तों आदि का निरीक्षण कर उन्होंने जरूरी निर्देश भी जारी किए हैं।
उन्होंने बताया है कि आने वाले दिनों में यात्रियों की संख्या बढ़ेगी। इसलिए, यात्रियों की सुविधा के लिए सभी काम जल्दी पूरे किए जाएं। यात्रियों की संख्या बढ़ने से राज्य की अर्थव्यवस्था को होने वाले फायदे पर सभी की नजर है।
मुख्य सचिव ने वीआईपी हैलीपेड से मंदिर के रास्ते तक स्थानीय पत्थर बिछाने, मंदिर के बगल में बनाए जा रहे रेप्लिका के मुख्य द्वार पर पारदर्शी शीट लगाने के निर्देश दिए हैं, जिससे लोग आसानी से रेप्लिका को देख सकें।
वहीं, केदारनाथ के लिए दूसरे चरण की हेलिकॉप्टर सेवाएं शुरू हो गई हैं। फिलहाल तीन कंपनियों ने सेवाएं देनी शुरू की हैं। हालांकि, अभी भी केदारनाथ धाम का मौसम पूरी तरह से इसके लिए अनुकूल नहीं हुआ है। पहले चरण में केदारनाथ धाम के लिए 13 कंपनियों ने अपनी सेवाएं दी थी। साल 2013 में बादल फटने और कई दिन की भारी बारिश से आई बाढ़ का असर केदारनाथ धाम और केदार घाटी पर बुरी तरह से पड़ा। हालांकि, मंदिर को खास नुकसान नहीं हुआ लेकिन परिसर में भूस्खलन का मलबा पानी के साथ आ पहुंचा। मंदिर में पानी बुरी तरह से भर गया और आसपास का इलाका बड़े-बड़े पत्थरों से पट गया। कई लोगों की जान मंदिर में फंसे होने के कारण चली गई थी।
नयी दिल्ली : एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले हरीश कुमार एक बार फिर अपनी चाय की दुकान पर पहुंचे गए हैं। उनके घर की आजीविका इस चाय की दुनाक पर ही टिकी है।
न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में हरीश कुमार ने खुलकर बताया कि उनका परिवार बड़ा है और आय का श्रोत कम है। हरीश ने कहा कि मैं चाय की दुकान पर पिता की मदद करता हूं। इसके साथ ही 2 बजे से 6 बजे तक चार घंटे खेल का अभ्यास करता हूं।उन्होंने कहा कि परिवार के बेहतर भविष्य के लिए अच्छी नौकरी करना चाहता हूं।
याद दिला दें कि हाल ही में देश की तरफ से एशियन गेम्स में खेलते हुए हरीश ने कांस्य पदक जीता था। मेडल जीतने के बाद वे जमीन से जुड़े हुए हैं। या यूं कह लीजिए परिवार के लिए सबकुछ करने के लिए तैयार हैं। खेल से खाली होने के बाद एक बार फिर वे अपने पिता के साथ चाय की दुकान पर हाथ बंटा रहे हैं।
नयी दिल्ली : इंटरनेट सर्च इंजन कंपनी गूगल ने गुरुवार को कहा कि वह राजनीतिक विज्ञापनों में “अधिक पारदर्शिता” लाने के उपायों पर काम कर रही है। उसका यह बयान भारत में पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों और अगले वर्ष लोकसभा चुनाव से पहले आया है। प्रौद्योगिकी कंपनियों को उनके सोसल नेटवर्किंग ऐप पर झूठी और फर्जी खबरों को लेकर दुनिया भर में तीखी आलोचानाओं को सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों के लिये राजनीतिक विज्ञापनों के प्रायोजकों की जानकारी अपनी वेबसाइट पर साझा करने को अनिवार्य बनाने का कानून लाने विचार कर रहा है। कंपनियों को विज्ञापनों पर किये गये खर्च और लक्षित समूह के बारे में भी जानकारी देनी होगी।
गूगल के प्रवक्ता ने पीटीआई-भाषा को बताया, “हम उन उपायों को अतिंम रूप देने में लगे हुये है, जो हमारे प्लेटफॉर्म पर राजनीतिक विज्ञापनों को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद करेंगे। प्रवक्ता ने कहा कि उपायों पर अभी काम चल रहा है। काम पूरा होने के बाद कंपनी राजनीतिक विज्ञापनों से जुड़ी अधिक जानकारियां साझा कर सकेगी। कंपनी चुनावों को साफ सुथरा बनाये रखने के चुनाव आयोग के प्रयासों का समर्थन करेगी।
गूगल, ट्विटर और फेसबुक के प्रतिनिधियों ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान आगामी चुनावों में उनकी भूमिका को लेकर चर्चा हुयी। प्रवक्ता ने चुनाव आयोग के साथ वार्ता से जुड़ी जानकारी नहीं दी है। हालांकि, कहा जा रहा है कि गूगल के साथ-साथ फेसबुक और ट्विटर आगामी चुनावों के दौरान राजनीतिक विज्ञापनों और प्रचार सामग्री की निगरानी करने तथा फर्जी खबरों एवं आपत्तिजनक सामग्री को प्रतिबंधित (ब्लॉक) करने पर सहमत हुयी हैं। साथ ही ये कंपनियां मतदान से 48 घंटे यानी दो दिन पहले इस बात को सुनिश्चित करेंगी कि किसी भी तरह के राजनीतिक विज्ञापन पोस्ट न किए जा सकें। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलगांना में इस वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं जबकि अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होंगे।
संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र की पोस्टल एजेंसी दिवाली के उत्सव पर अगले महीने विशेष डाक टिकटें जारी करेगी। संयुक्त राष्ट्र पोस्टल एडमिनिस्ट्रेशन भारतीय उत्सव मनाने के लिए 19 अक्तूबर को न्यूयॉर्क विशेष कार्यक्रम शीट जारी करेगा।
एजेंसी ने कहा, ‘‘दीपावली आनंदमय और प्रकाश का लोकप्रिय उत्सव है जिसे कई धर्मों के लोग भारत तथा दुनियाभर में मनाते हैं।’ 1.15 डॉलर मूल्य की शीट में दस डाक टिकटें है जिसमें प्रकाश उत्सव की झलक है और सांकेतिक तौर पर ‘दीये’ भी हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने इस घोषणा का स्वागत करते हुए ट्वीट किया, ‘‘अगले महीने आ रही संयुक्त राष्ट्र की डाक टिकटों के रूप में दिवाली का अच्छा तोहफा।’ अमेरिका की डाक सेवा ने अक्तूबर 2016 में दिवाली उत्सव के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया था ।
नयी दिल्ली : अमेजन इंडिया का ऑनलाइन मार्केटप्लेस अब हिन्दी में भी उपलब्ध होगा। कंपनी का लक्ष्य 10 करोड़ खरीदारों को ऑनलाइन लाना है। अभी प्रतिस्पर्धी कंपनियों फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, पेटीएम मॉल और शॉपक्लूज की वेबसाइट और एप सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध है। अमेजन को इस देसी संस्करण से हिन्दीभाषी उपभोक्ताओं को आकर्षित करने में मदद मिलेगी। अमेजन इंडिया के उपाध्यक्ष (श्रेणी प्रबंधन) मनीष तिवारी ने संवाददाताओं से यहां कहा कि इससे देश में खरीदार अमेजन की खरीदारी का हिन्दी में भी लाभ ले सकेंगे। उन्होंने कहा कि उपभोक्ता उत्पाद की जानकारी हिंदी में पढ़ने के साथ ही सौदे एवं छूट खोजना, ऑर्डर करना आदि भी हिन्दी में कर सकेंगे। तिवारी ने कहा, ‘‘हिन्दी में खरीदारी की शुरुआत 10 करोड़ नये उपभोक्ताओं को ऑनलाइन लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। किसी भारतीय भाषा में इस तरह की पहली शुरुआत से करोड़ों हिंदीभाषी अपनी पसंदीदा भाषा में खरीदारी कर सकेंगे।’ उल्लेखनीय है कि 2021 तक देश में हिन्दीभाषी इंटरनेट उपयोक्ताओं की संख्या अंग्रेजी उपयोक्ताओं से बढ़ जाने का अनुमान है। इसके अलावा मराठी एवं बंगाली आदि क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोक्ता भी बढ़ेंगे। यह भारतीय ई-कॉमर्स क्षेत्र की वृद्धि के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
नयी दिल्ली : यात्रियों को सस्ते दामों में चाय-नाश्ता उपलब्ध कराने के लिए एयरपोर्ट पर अलग से स्टॉल खोले जाएंगे। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) के मुताबिक, यह सुविधा सरकार द्वारा संचालित एयरपोर्ट पर ही मिलेगी। इन एयरपोर्ट पर सस्ती दरों पर पेय पदार्थ और पानी के स्टॉल शुरू हो चुके हैं। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु समेत ऐसे एयरपोर्ट पर यह सुविधा नहीं मिलेगी, जिनका संचालन प्राइवेट कंपनियों के जिम्मे है।
एएआई को यात्रियों से एयरपोर्ट पर खाने-पीने के सामान पर ज्यादा वसूली की शिकायतें मिलती रहीं हैं। संसद में भी कुछ सांसदों द्वारा यह मुद्दा उठाया जा चुका है। इसी साल मार्च में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने चेन्नई एयरपोर्ट पर चाय की ज्यादा कीमत वसूलने को लेकर ट्वीट भी किया था। 90 एयरपोर्ट पर मिलेगी यह सुविधा : एएआई ने बताया कि यह सुविधा देश के 90 एयरपोर्ट पर मिलेगी। मौजूदा समय में विमान यात्रा केवल वर्ग विशेष के लिए ही नहीं रह गई है। खासकर सरकार की उड़ान योजना के बाद। आज मध्यम वर्ग भी हवाई यात्रा का इस्तेमाल करने लगा है। ऐसे यात्रियों के लिए यह सुविधा काफी अहम होगी।
भारत में पिछले तीन-चार सालों से हवाई यात्रियों की संख्या में प्रति साल 20-25 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जुलाई में 1 करोड़ 16 लाख यात्रियों ने घरेलू उड़ानों से यात्रा की। जुलाई 2017 के तुलना में यह 21% ज्यादा है।
नयी दिल्ली : आधार को गवर्न करने वाली सवोच्च संस्था यूडीएआई ने साफ कर दिया है कि आधार नहीं होने के नाम पर कोई भी स्कूल किसी भी बच्चे को दाखिला देने से इनकार नहीं कर सकता है। संस्था ने साफ किया कि अगर इस आधार पर किसी बच्चे को दाखिला देने से इनकार किया जाता है तो यह गैर कानूनी है। माना जा रहा है कि यूडीएआई का यह कदम उन अभिभावकों और छात्रों के लिए एक बड़ी राहत है, जिन्हें आधार नहीं होने के चलते स्कूल दाखिला देने से इनकार करते आ रहे हैं। यूडीएआई ने कहा कि ऐसे बच्चों को जब तक आधार नहीं बन जाता तब तक उन्हें अन्य वैकल्पिक दस्तावेजों के जरिए जरूरी सुविधाएं दी जाएं।
साथ ही यूडीएआई ने स्कूलों से आह्वान किया है कि वो आधार पंजीरकण और अपडेशन के लिए अपने परिसर में कैंप लगाने में लोकल बैंक, पोस्ट ऑफिस, स्टेड एजुकेशन डिपार्टमेंट यानि राज्य शिक्षा विभाग तथा जिला प्रशासन का सहयोग करें।
सभी राज्यों के मुख्य सचिवों के लिए जारी सर्कुलर में यूडीएआई ने कहा कि उसे पता चला है कि आधार नहीं होने के चलते बहुत से स्कूल बच्चों को एडमीशन देने से इनकार कर रहे हैं। आप इस बात को सुनिश्चित करें कि किसी भी बच्चों को आधार की गैर-मौजूदगी के नाम पर दाखिला देने से कोई भी स्कूल इनकार नहीं करे।
इस तरह का इनकार पूरी तरह से गैर कानूनी है। कानून के तहत किसी को भी ऐसा करने की इजाजत नहीं है। आधार को जारी करने वाली संस्था ने कहा है कि आधार नहीं होने के नाम पर किसी भी बच्चे को दाखिले समेत अन्य जरूरी सुविधाओं से महरूम नहीं किया जा सकता है।
सामग्री: 1 नारियल कद्दूकस किया हुआ, 1 कटोरी शक्कर, 1 टीस्पून इलायची पाउडर, 1 कप दूध, 2 कटोरी गेहूं का आटा, आधा कटोरी रवा, स्वादानुसार नमक, तेल अथवा घी तलने के लिए विधि: कड़ाही में नारियल, शक्कर और दूध मिक्स करके धीमी आंच पर पकाएं। जब मिश्रण सूख जाए, तो गैस बंद करके इसमें इलायची पाउडर मिलाएं। इसे बहुत ज़्यादा न सुखाएं। गेहूं के आटे में रवा (सूजी), तेल या घी का मोयन डालकर सख़्त आटा गूंध लें। 2 घंटे इसे अलग रख दें। फिर अच्छी तरह गूंधकर इसकी पूरी बनाएं। इसमें तैयार मिश्रण भरकर मोदक का आकार दें। दूसरी कड़ाही में तेल गरम करके मोदक तल लें।
केसर मोदक
सामग्री: मसला हुआ 250 ग्राम मावा, पिसी हुई 100 ग्राम शक्कर , आधा टीस्पून इलायची पाउडर, थोड़ा-सा केसर, थोड़े-से बारीक़ कटे हुए सूखे मेवे (बादाम, काजू और पिस्ता) विधि: कड़ाही में खोआ डालकर धीमी आंच पर भून लें। एकसार होने तक आंच से उतार लें। सारी सामग्री डालकर अच्छी तरह मिक्स करें। थोड़ा-सा मिश्रण चिकनाई लगे मोदक के साँचे में डालकर मोदक बनाएं।
“तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली।
चलो बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली॥”
तीन मेंढ़क एक के ऊपर एक बैठे थे। ऊपर वाले ने कहा, ‘जौक शौक’, बीच वाल बोला, ‘गम सम’,सब के नीचे वाला पुकारा, ‘गए हम’। सो हिंदुस्तान की प्रजा की दशा यही है ‘गए हम’। पहले भी जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आकर बसे थे राजा और ब्राह्मणों के जिम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलावें और अब भी ये लोग चाहें तो हिंदुस्तान प्रतिदिन क्या प्रतिछिन बढ़े। पर इन्हीं लोगों को निकम्मेपन ने घेर रखा है। ‘बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः समर दूषिताः’ हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जबकि इनके पुरुखों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठ कर बाँस की नालियों से जो तारा, ग्रह आदि बेध कर के उनकी गति लिखी है वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुपए की लागत से विलायत में जो दूरबीन बनी है उनसे उन ग्रहों को वेध करने में भी ठीक वही गति आती है और अब आज इस काल में हम लोगों की अंग्रेजी विद्या के और जनता की उन्नति से लाखों पुस्तकें और हजारों यंत्र तैयार हैं जब हम लोग निरी चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी बन रहे हैं। यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन, अंग्रेज, फरांसीस आदि तुरकी-ताजी सब सरपट्ट दौड़े जाते हैं। सब के जी में यही है कि पाला हमी पहले छू लें। उस समय हिंदू का टियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं। इनको औरों को जाने दीजिए जापानी टट्टुओं को हाँफते हुए दौड़ते देख कर के भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जाएगा फिर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सकेगा। लूट की इस बरसात में भी जिस के सिर पर कम्बख्ती का छाता और आँखों में मूर्खता की पट्टी बँधी रहे उन पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए।
मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज कुछ कहो कि हिंदुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है। भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ भागवत में एक श्लोक है – “नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं मयाsनुकूलेन तपः स्वतेरितं पुमान भवाब्धि न तरेत स आत्महा।” भगवान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जन्म ही दुर्लभ है सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और उस पर मेरी अनुकूलता। इतना सामान पाकर भी मनुष्य इस संसार सागर के पार न जाए उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए, वही दशा इस समय हिंदुस्तान की है। अंग्रेजों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पा कर भी हम लोग जो इस समय उन्नति न करें तो हमारे केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है। सास और अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंग महल में जाकर भी बहुत दिनों से प्राण से प्यारे परदेसी पति से मिल कर छाती ठंडी करने की इच्छा भी उसका लाज से मुँह भी न देखे और बोले भी न तो उसका अभाग्य ही है। वह तो कल परदेस चला जाएगा। वैसे ही अंग्रेजों के राज्य में भी जो हम मेंढ़क, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम ही रहें तो फिर हमारी कमबख्त कमबख्ती फिर कमबख्ती ही है। बहुत लोग यह कहेंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती, बाबा, हम क्या उन्नति करें। तुम्हारा पेट भरा है तुम को दून की सूझती है। उसने एक हाथ से अपना पेट भरा दूसरे हाथ से उन्नति के काँटों को साफ किया। क्या इंग्लैंड में किसान, खेत वाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते, किंतु वे लोग जहाँ खेत जोतते-बाते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी कौन नई कल व मसाला बनावें जिससे इस खेत में आगे से दून अनाज उपजे। विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला। यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी। वहाँ के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध छाँटते हैं। सिद्धांत यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाए। उसके बदले यहाँ के लोगों को जितना निकम्मापन हो उतना ही बड़ा अमीर समझा जाता है। आलस्य यहाँ इतनी बढ़ गई कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला –
“अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
दास मलूका कहि गए सबके दाता राम॥”
चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करने वालों की ही चारों ओर बढ़ती है। रोजगार कहीं कुछ भी नहीं है अमीरों, मुसाहिबी, दल्लालों या अमीरों के नौजवान लड़कों को खराब करना या किसी की जमा मार लेना इनके सिवा बतलाइए और कौन रोजगार है जिससे कुछ रुपया मिले। चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुई है किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र कुटुंबी इस तरह अपनी इज्जत को बचाता फिरता है जैसे लाजवंती बहू फटें कपड़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है। वही दशा हिंदुस्तान की है। मुर्दम-शुमारी का रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन-दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन-दिन कमती होता जाता है। सो अब बिना ऐसा उपाय किए काम नहीं चलेगा कि रुपया भी बढ़े और वह रुपया बिना बुद्धि के न बढ़ेगा। भाइयों, राजा-महाराजों का मुँह मत देखो। मत यह आशा रखो कि पंडित जी कथा में ऐसा उपाय बतलाएँगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े। तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो, कब तक अपने को जंगली, हूस, मूर्ख, बोदे, डरपोक पुकरवाओगे। दौड़ो इस घुड़दौड़ में, जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है। ‘फिर कब-कब राम जनकपुर एहै’ अब की जो पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहुँचोगे। जब पृथ्वीराज को कैद कर के गोर ले गए तो शहाबुद्दीन के भाई गयासुद्दीन से किसी ने कहा कि वह शब्दबेधी बाण बहुत अच्छा मारता है। एक दिन सभी नियत हुई और सात लोहे के तावे बाण से फोड़ने को रखे गए। पृथ्वीराज को लोगों ने पहिले से ही अंधा कर दिया था। संकेत यह हुआ कि जब गयासुद्दीन ‘हूँ’ करे तब वह तावे पर बाण मारे। चंद कवि भी उसके साथ कैदी था। यह सामान देख कर उसने यह दोहा पढ़ा –
“अब की चढ़ी कमान को जाने फिर कब चढ़े।
जिन चूके चहुआज इक्के मारय इक्क सर।”
उसका संकेत समझ कर जब गयासुद्दीन ने ‘हूँ’ किया तो पृथ्वीराज ने उसी को बाण मार दिया। वही बात अब है। ‘अब की चढ़ी’ इस समय में सरकार का राज्य पाकर और उन्नति का इतना सामान पाकर भी तुम लोग अपने को न सुधारों तो तुम्हीं रहो और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो। धर्म में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोजगार में, शिष्टाचार में, चाल चलन में, शरीर में,बल में, समाज में, युवा में, वृद्ध में, स्त्री में, पुरुष में, अमीर में, गरीब में, भारतवर्ष की सब आस्था, सब जाति,सब देश में उन्नति करो। सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटक हों। चाहे तुम्हें लोग निकम्मा कहें या नंगा कहें, कृस्तान कहें या भ्रष्ट कहें तुम केवल अपने देश की दीन दशा को देखो और उनकी बात मत सुनो। अपमान पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः स्वकार्य साधयेत धीमान कार्यध्वंसो हि मूर्खता। जो लोग अपने को देश-हितैषी मानते हों वह अपने सुख को होम करके, अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो। देखा-देखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा। अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो। कोई धर्म की आड़ में, कोई सुख की आड़ में छिपे हैं। उन चोरों को वहाँ-वहाँ से पकड़ कर लाओ। उनको बाँध-बाँध कर कैद करो। हम इससे बढ़कर क्या कहें कि जैसे तुम्हारे घर में कोई पुरुष व्याभिचार करने आवे तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शक्ति होगी उसका सत्यानाश करोगे उसी तरह इस समय जो-जो बातें तुम्हारे उन्नति पथ की काँटा हों उनकी जड़ खोद कर फेंक दो। कुछ मत डरो। जब तक सौ, दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जाएँगे , दरिद्र न हो जाएँगे , कैद न होंगे वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोई देश न सुधरेगा।
साभार ट्विटर
अब यह प्रश्न होगा कि भई हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है। किस को अच्छा समझे। क्या लें क्या छोड़ें तो कुछ बातें जो इस शीघ्रता से मेरे ध्यान में आती हैं उनको मैं कहता हूँ सुनो –
सब सुन्नियों का मूल धर्म है। इससे सबसे पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है। देखो अंग्रेजों की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली है इससे उनकी दिन-दिन कैसी उन्नति हुई है। उनको जाने दो अपने ही यहाँ देखो। तुम्हारे धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति समाजगठन वैद्यक आदि भरे हुए हैं। दो-एक मिसाल सुनो तुम्हारा बलिया के मेला का यहीं स्थान क्यों चुना गया है जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते। दस-दस, पाँच-पाँच कोस से ले लोग एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें। एक दूसरे का दुःख-सुख जानें। गृहस्थी के काम की वह चीजें जो गाँव में नहीं मिलतीं यहाँ से ले जाएँ। एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिसमें महिने में दो-एक उपवास से शरीर शुद्ध हो जाए। गंगाजी नहाने जाते हैं तो पहले पानी सिर पर चढ़ा कर तब पैर पर डालने का विधान क्यों है? जिससे तलुए से गरमी सिर पर चढ़कर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने सालभर में एक बार तो सफाई हो जाए। होली इसी हेतु है कि बसंत की बिगड़ी हवा स्थान-स्थान पर अग्नि जलने से स्वच्छ हो जाए। यही तिहवार ही तुम्हारी म्युनिसिपालिटी है। ऐसे ही सब पर्व, सब तीर्थ, व्रत आदि में कोई हीकमत है। उन लोगों ने धर्मनीति और समाजनीति को दूध पानी की भाँति मिला दिया है। खराबी जो बीच में हुई वह यह है कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मानने लिखे थे। इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धर्म मान लिया। भाइयों, वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरणकमल का भजन है। ये सब तो समाज धर्म है। जो देश काल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं। दूसरी खराबी यह हुई कि उन्हीं महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों ने अपने बाप-दादों का मतलब न समझकर बहुत से नए-नए धर्म बना कर शास्त्रों में धर दिए बस सभी तिथि व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए। सो इन बातों को अब एक बार आँख खोल कर देख और समझ लीजिए कि फलानी बात उन बुद्धिमान ऋषियों ने क्यों बनाई और उनमें देश और काल के अनुकूल और उपकारी हों उनका ग्रहण कीजिए। बहुत-सी बातें जो समाज विरुद्ध मानी जाती हैं किंतु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है उनको मत चलाइए। जैसा जहाज का सफर, विधवा-विवाह आदि। लड़कों की छोटेपन ही में शादी करके उनका बल,बीरज, आयुष्य सब मत घटाइए। आप उनके माँ-बाप हैं या शत्रु हैं। वीर्य उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए। नोन, तेल लकड़ी की फिक्र करने की बुद्धि सीख लेने दीजिए तब उनका पैर काठ में डालिए। कुलीन प्रथा,बहु विवाह आदि को दूर कीजिए। लड़कियों को भी पढ़ाइए किंतु इस चाल में नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल-धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें। वैष्णव, शास्त्र इत्यादि नाना प्रकार के लोग आपस में बैर छोड़ दें यह समय इन झगड़ों का नहीं। हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए जाति में कोई चाहे ऊँचा हो, चाहे नीचा हो सबका आदर कीजिए। जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए,छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए। सब लोग आपस में मिलिए। मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिंदुस्तान में बस कर वे लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें। ठीक भाइयों की भाँति हिंदुओं से बरताव करें। ऐसी बात जो हिंदुओं का जी दुखाने वाली हो न करें। घर में आग लगे सब जिठानी, द्यौरानी को आपस का डाह छोड़ कर एकसाथ वह आग बुझानी चाहिए। जो बात हिंदुओं का नहीं मयस्सर है वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त है। उनके जाति नहीं, खाने-पीने में चौका-चूल्हा नहीं, विलायत जाने में रोक-टोक नहीं, फिर भी बड़े ही सोच की बात है कि मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी। अभी तक बहुतों को यही ज्ञात है कि दिल्ली,लखनऊ की बादशाहत कायम है। यारो, वे दिन गए। अब आलस, हठधरमी यह सब छोड़ो। चलो हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो एक-एक-दो होंगे। पुरानी बातें दूर करो। मीर हसन और इंदरसभा पढ़ा कर छोटेपन ही से लड़कों का सत्यानाश मत करो। होश संभाला नहीं कि पढ़ी पारसी, चुस्त कपड़ा पहनना और गजल गुनगुनाए –
“शौक तिल्फी से मुझे गुल की जो दीदार का था।
न किया हमने गुलिस्ताँ का सबक याद कभी॥”
भला सोचो कि इस हालत में बड़े होने पर वे लड़के क्यों न बिगड़ेंगे। अपने लड़कों को ऐसी किताबें छूने भी मत दो। अच्छी से अच्छी उनको तालीम दो। पैंशन और वजीफे या नौकरी का भरोसा छोड़ो। लड़कों को रोजगार सिखलाओ। विलायत भेजो। छोटेपन से मेहनत करने की आदत दिलाओ। सौ-सौ महलों के लाड़-प्यार, दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ।
भाई हिंदुओं, तुम भी मतमतांतरों का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जप करो। जो हिंदुस्तान में रहे चाहे किसी जाति, किसी रंग का क्यों न हो वह हिंदू है। हिंदू की सहायता करो। बंगाली, मरट्ठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमानों सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिससे तुम्हारे यहाँ बढ़े तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहे वह करो। देखा जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली है वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंग्लैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती है। दीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है। जरा अपने ही को देखो। तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बनी है। जिस लकलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंग्लैंड का है। फरांसीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तुम्हारे सामने जल रही है। यह तो वही मसल हुई एक बेफिकरे मंगती का कपड़ा पहिन कर किसी महफिल में गए। कपड़े को पहिचान कर एक ने कहा – अजी अंगा तो फलाने का हे, दूसरा बोला अजी टोपी भी फलाने की है तो उन्होंने हँस कर जवाब दिया कि घर की तो मूछें ही मूछें हैं। हाय अफसोस तुम ऐसे हो गए कि अपने निज की काम के वस्तु भी नहीं बना सकते। भइयों अब तो नींद से जागो। अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो। वैसे ही खेल खेलो। वैसा बातचीत करो। परदेसी वस्तु और परदेसी भाषा का भरोसा मत रखो अपने में अपनी भाषा में उन्नति करो।
[बलिया में ददरी के मेले के समय अार्य देशोपकारिणी सभा में दिया गया भाषण]
1 दक्षिण भारत के तिरूतनी नाम के एक गांव में 1888 को प्रकांड विद्वान और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। वे बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. की उपाधि ली और सन् 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हो गए। इसके बाद वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ. राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शनशास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गई।
2 शिकागो विश्वविद्यालय ने डॉ. राधाकृष्णन को तुलनात्मक धर्मशास्त्र पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया। वे भारतीय दर्शन शास्त्र परिषद् के अध्यक्ष भी रहे। कई भारतीय विश्वविद्यालयों की भांति कोलंबो एवं लंदन विश्वविद्यालय ने भी अपनी-अपनी मानद उपाधियों से उन्हें सम्मानित किया।
3 विभिन्न महत्वपूर्ण उपाधियों पर रहते हुए भी उनका सदैव अपने विद्यार्थियों और संपर्क में आए लोगों में राष्ट्रीय चेतना बढ़ाने की ओर रहता था।
4 डॉ. राधाकृष्णन अपने राष्ट्रप्रेम के लिए विख्यात थे, फिर भी अंग्रेजी सरकार ने उन्हें सर की उपाधि से सम्मानित किया क्योंकि वे छल कपट से कोसों दूर थे। अहंकार तो उनमें नाम मात्र भी न था।
5 भारत की स्वतंत्रता के बाद भी डॉ. राधाकृष्णन ने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे पेरिस में यूनेस्को नामक संस्था की कार्यसमिति के अध्यक्ष भी बनाए गए। यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंग है और पूरे संसार के लोगों की भलाई के लिए अनेक कार्य करती है।
6 सन् 1949 से सन् 1952 तक डॉ. राधाकृष्णन रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत पद पर रहे। भारत रूस की मित्रता बढ़ाने में उनका भारी योगदान रहा था।
7 सन् 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाए गए। इस महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया। 13 मई, 1962 को डॉ. राधाकृष्णन भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने। सन् 1967 तक राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने देश की अमूल्य सेवा की।
8 डॉ. राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद और लेखक थे। वे जीवनभर अपने आपको शिक्षक मानते रहे। उन्होंने अपना जन्मदिवस शिक्षकों के लिए समर्पित किया। इसलिए 5 सितंबर सारे भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कुछ विचार
1. यहां पूजा भगवान की नहीं बल्कि उनकी होती है जो भगवान के नाम पर बोलने का दावा करते हैं।
2. अपने पड़ोसी को उतना प्यार करो जितना खुद को करते हो, क्योंकि तुम ही अपने पड़ोसी हो।
3. शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे।
4. पुस्तकें वह माध्यम हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकें।
5. शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अतः विश्व को एक ही ईकाई मानकर शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए।
6. शांति राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकती बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है।
7. शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए, जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ लड़ सके।