Tuesday, July 7, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 660

उम्र कम है मगर हुनर बहुत है इन दो बहनों में

प्रतिभा हो तो वह निखर ही जाती है। विपरीत परिवेश भी प्रतिभा को कुंद नही कर सकता,इसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिया है उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के जमानियां क्षेत्र स्थित बघरी गाँव की इन बच्चियों निष्ठा एवं प्रतिष्ठा तिवारी ने।इन बच्चियों ने अपनी रचनात्मक कला के द्वारा लोगों को चमत्कृत किया है।


अपनी पढ़ाई के साथ साथ चित्रकला,मेहँदी लगाने की कला,पारम्परिक नृत्य, गायन जैसी विधाओं में पारंगत है।सबसे बड़ी बात बिना किसी प्रशिक्षण के यह इनमें बेहतर प्रदर्शन कर रही है।बस जरूरत है इनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता को निखारने की और उनको बेहतर अवसर प्रदान करने की।यह हमारे भविष्य की पूँजी है।


इन बच्चियों से बातचीत के दौरान आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली प्रतिष्ठा तिवारी ने बताया कि इन सभी कलाओं को बस अभ्यास से सीखा, पिता जी ने हमें प्रोत्साहित करने के साथ ही जरूरत की सामग्री को कोलकाता से सहजता के साथ उपलब्ध कराया क्योकि गाँव मे सब चीजें मिल नही पाती है।

 

बातचीत के क्रम में निष्ठा ने बताया कि हमें गांव में धार्मिक,मांगलिक अनुष्ठान में लोकगीत गाने और नृत्य के लिए लोग बुलाते है।वैवाहिक गीत,सोहर और अन्य आयोजनों पर भी हमें बुलाया जाता है।इसके अलावा मिट्टी से तरह तरह के मूर्ति और अन्य सजावटी वस्तुओं को भी बनाते है।

हम लिखते, पढ़ते व बोलते तो रहें, कभी तो फिजां बदलेगी

बेहद विन्रम और स्नेहिल स्वभाव की अनामिका जी का लेखन बेहद मजबूत है। वे स्त्रियों की हर पीड़ा न सिर्फ समझती हैं बल्कि उन्हें पूरी मजबूती के साथ सामने रखती भी हैं। अँग्रेजी उनके कार्यक्षेत्र की भाषा है मगर उन्होंने हिन्दी साहित्य की हर विधा को समृद्ध किया हैं। अनामिका जी को राजभाषा परिषद पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, साहित्यकार सम्मान, केदार सम्मान, परंपरा सम्मान, साहित्य सेतु सम्मान मिल चुके हैं। कवियित्री अनामिका से सुषमा कनुप्रिया ने बातचीत की, पेश हैं प्रमुख अंश –
पिता बहुत ज्यादा प्यार करने वाले व्यक्ति थे
मेरे पिता श्यामनन्दन किशोर जी वरिष्ठ गीतकार और कवि थे। वे हमारी माँ जैसे ही थे। सबके साथ समस्यापूर्ति का खेल खेला करते थे। उनके मन में ऐसा रहता होगा कि सबके मन में कवित्व जगे। किसी के भीतर कोई कवि छुपा हो तो बाहर आ जाए। बहुत ज्यादा प्यार करने वाले व्यक्ति थे वे तो लोग उनको घेरे रहते थे। मोहल्लों में सबको कहानियाँ, कवितायें सुनाते थे। इसी खेल में किसी की अच्छी पँक्ति आ गयी तो उसे एक छोटी सी डायरी दे दिया करते थे। वह बांग्लादेश युद्ध का समय था। ब्लैक आउट हो जाया करता था और बिजली उड़ जाया करती थी। हमको छुपने को कह दिया जाता था तो हम छुप जाते थे। मैं मुजफ्फरपुर में रहती थी जो बांग्लादेश सीमा के पास था। ऐसे में यही प्रिय खेल था। पिता जी कवित्व उद्घाटित करते थे। वे कहते थे कि खुद मन से कविता बनाकर खेलो। किसी ने अच्छी पँक्ति कह दी तो उसका प्रशिक्षण शुरू हो जाया करता था। वे उसे सींचने लगते थे, मुझे तो पूरा ही सींचा।
सच्चे कवि को अपराध करते नहीं देखा
पिता जी का विश्‍वाास था कि जो अच्छी कविता लिखता है, वह जानबूझकर गलत काम नहीं करेगा। ऐसा आदमी दूसरे की आँख में गिर जाये मगर अपनी नजर में वह गिरना नहीं चाहता। लोग कविता समझते नहीं हैं मगर जो कविता लिखता है, गरीब आदमी भी उसे अपना कवि समझता है। वह उसे अपना समझता है। इसी संवेदनशीलता के चलते कवि चाहकर भी अपनी उस छवि से मुक्त नहीं हो सकता। कविता में विश्वास कवि को उसकी छवि में गिरफ्तार करता है। आज तक मैंने किसी सच्चे कवि को अपराध करते नहीं देखा। कविता अगर हृदय से नहीं फूटती तो उसको बतबनौवल होती है।
कविता का शिल्प कौंध वाला है
जीवन में हर कदम पर दुविधा है। दुविधा के क्षण में मन भीतर और बाहर रास्ता तलाशता है। समाधान तलाशते, सोचते अनायास समाधान और सच उद्घाटित होते हैं। कविता का शिल्प कौंध वाला है। सच की समझ कौंध में पैदा होती है, अचानक फ्लैश हो जाता है। जैसे दही मथते -मथते जैसे अचानक मक्खन बाहर आ जाता है। जो फ्लैश में कौंधा, उसे व्यक्ति एक नरेटिव बनाना चाहता है, उसी बहाने कुछ कहना चाहता है। कविता सामने वाले को बुद्धिमान समझती है तो उसे इशारे में समझाती है।
मुखर स्त्री को वे या तो रणचंडी कहते हैं या उसके चरित्र पर सवाल उठा देते हैं।
लोग भी समझकर चलते हैं कि स्त्री को मौन रहना चाहिए। वृहत्तर समस्याओं की अभिव्यक्ति जब स्त्री द्वारा की जाती है तो उन लोगों को भय हो जाता है जो उन पर लगातार कहर ढा रहे होते हैं। कोई उन्हें ध्यान और सम्मान से नहीं पढ़ता और निरुत्साहित किया जाता है। मुखर स्त्री को वे या तो रणचंडी कहते हैं या उसके चरित्र पर सवाल उठा देते हैं। ऐसा स्त्री को निरुत्साहित करने की मंशा से होता है।
सभी स्त्रियों के दुःख -सुख एक जैसे ही होते हैं
हम स्त्रियाँ छोटी -छोटी बातों में खुश हो जाती हैं। पहले हम एक दूसरे का मनोबल बढ़ायें। हमें बड़ों वाला सुख नहीं चाहिए, दुलार चाहिए। यह बचपन वाला भाव बड़े होकर पुरुषों में नहीं रह जाता। स्त्रियों में सहन शक्ति होती है और उनके सुख – दुःख भी एक जैसे होते हैं। उनमें बहनापा और विश्‍वास इसी कारण जल्दी पनपता है। हम स्त्रियों को आपस में जुड़कर रहना चाहिए। अपनी तमाम विशेषताएँ बरकरार रखते हुए हम एक साथ जुड़ें। अगर हम आपस में जुड़कर रहें तो कुछ भी कर सकते हैं।
हम अपने हिस्से का पौधा लगा तो दें
बीज बोते और फेंकते चलना है। कई बार पत्थर पर बीज पड़ जाता है, नहीं उगता मगर फिर भी बीज फेंकते चलना है। कभी तो मिट्टी उर्वर मिलेगी कि वहाँ वह उग जाये। हम लिखते, पढ़ते व बोलते तो रहें। कभी तो फिजां बदलेगी, हम अपने हिस्से का पौधा लगा तो दें।  हर व्यक्ति अनूठा है। सबमें कुछ न कुछ प्यार करने लायक है ही। बुद्धत्व के बीज सबमें हैं, वह फूले – फले, इस चेतना के साथ जो कर रही हैं, वह पूरे मन, पूरे प्यार से करें।

जब तक अपनी जाति और धर्म के नाम पर लड़ते रहेंगे….वह लड़ाते रहेंगे

इन दिनों ईश्वर भी सकते में हैं…समझ नहीं पा रहे हैं कि अब तक तो वे मनुष्यों को बनाते आ रहे हैं….मनुष्य खुद को ईश्वर की सन्तति कहता भी है मगर यह दौर नया है। आजकल के बच्चे अपने माता – पिता के भी तारणहार बने बैठे हैं…वो तय करते हैं कि उनके पिता के लिए वह कैसी जिन्दगी तय करेगा…यहाँ तक कि जाति और धर्म भी तय करेगा। हर कोई बेस्ट हिन्दू या बेस्ट मुसलमान बनने की रेस लगा रहा है। आप गौर से देखिए तो पता चलता है कि इनकी होड़ जरूरी मुद्दे और योजनाएँ तो पीछे छूट चुकी हैं। पक्ष से लेकर विपक्ष तक, सब के सब गोटी फिक्स करने में लगे हैं। गरीबी से लेकर महिलाओं की सुरक्षा और किसानों की आत्महत्या जैसे मुद्दे तो जैसे गायब हैं। हालांकि यह सूची बहुत बड़ी है मगर आपके तारणहार हिन्दुत्व का एजेंडा तय कर चुनावी नैया पार करने में लगे है।

मंदिरों के चक्कर लगाये जा रहे हैं तो हनुमान की जाति तय की जा रही है। दलित, वंचित के बाद अब उनको ब्राह्मण बनाया जा रहा है। अगले साल के चुनाव तक हवा में कितना जहर घोला जाएगा…आप बस इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते और यह कौन सा रूप लेने जा रहा है। यह हो रहा है जनता के नाम पर जिसे सही मायने में नेता कुछ भी नहीं समझते। हम बँटे हुए हैं और वह हमें बाँटे जा रह हैं और हम बँटते जा रहे हैं वरना क्या यह सम्भव था कि सोशल मीडिया मॉब  लीचिंग का कारण बन पाता है    म जब तक अपनी जाति और धर्म के नाम पर लड़ते रहेंगे….वह लड़ाते रहेंगे। यह हमको कय करना है कि हम क्या चाहते हैं…और कैसी दुनिया देकर देकर जाना चाहते हैं.,एक बार सोचिएगा जरूर।

हर साल 26 नवंबर को मनाया जाता है संविधान दिवस

देश में हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाता है। इस दिन को संविधान निर्माता डॉं.भीमराव अंबेडकर को याद किया जाता है। यूजीसी ने भी देश के सभी विश्वविद्यालयों को आदेश दिया कि वे 26 नवंबर को ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाएं।
दुनिया का सबसे बड़ा संविधान
भारत के संविधान निर्माता के रूप में डॉ. भीमराव अम्बेडकर को जाना जाता है। इन्होंने भारतीय संविधान के रूप में दुनिया का सबसे बड़ा संविधानस तैयार किया है। यह दुनिया के सभी संविधानों को परखने के बाद बनाया गया। इसे विश्व का सबसे बड़ा संविधान माना जाता है, जिसमें 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां और 94 संशोधन शामिल हैं। यह हस्तलिखित संविधान है जिसमें 48 आर्टिकल हैं। इसे तैयार करने में 2 साल 11 महीने और 17 दिन का वक्त लगा था।
26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा की तरफ से इसे अपनाया गया और 26 नवंबर 1950 को इसे लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू किया गया। यह वजह है कि 26 नवंबर को संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इसके लिए 29 अगस्त 1947 को भारत के संविधान का मसौदा तैयार करनेवाली समिति की स्थापना की गई थी और इसके अध्यक्ष के तौर पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की नियुक्ति हुई थी। संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति हिंदी और अंग्रेजी दोनों में ही हस्तलिखित और कॉलीग्राफ्ड थी। इसमें किसी भी तरह की टाइपिंग या प्रिंट का इस्तेमाल नहीं किया गया था। संविधान सभा के 284 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को दस्तावेज पर हस्ताक्षप किए । दो दिन बाद इसे लागू किया गया था।

विश्व चैंपियनशिप में सर्वाधिक स्वर्ण जीतने वाली दुनिया की पहली महिला बनीं मैरीकॉम

नयी दिल्ली : भारतीय महिला बॉक्सर मैरीकॉम ने वो कर दिखाया जो इससे पहले दुनिया की किसी भी महिला मुक्केबाज ने नहीं किया था। 35 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने देश में अपने दर्शकों के सामने जब छठी बार महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशन का खिताब जीता तो पूरी दुनिया आवाक रह गई। फाइनल में अपने से 13 वर्ष की छोटी उम्र की बॉक्सर को हराकर उन्होंने ये उपलब्धि अपने नाम की। वाकई उम्र के इस पड़ाव पर मैरीकॉम आज भी देश के लिए जैसा प्रदर्शन कर रही हैं वो काबिलेतारीफ है।
मैरीकॉम ने रचा इतिहास
मैरीकॉम ने अपने छठे खिताब से पहले लगातार पांच बार विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीता था। उनके इस सफर की शुरुआत वर्ष 2002 में हुई थी। इस वर्ष पहली बार उन्होंने 45 किलोग्राम भारवर्ग में इस खिताब को अपने नाम किया था। इसके बाद वर्ष 2005, 2006 और 2008 में उन्होंने 48 किलोग्राम भारवर्ग में विश्व चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया। पांचवीं बार उन्होंने वर्ष 2010 में ब्रिजटाउन में 48 किलोग्राम भारवर्ग में इस खिताब को जीता। विश्व चैंपियनशिप का खिताब आखिरी बार जीतने के आठ वर्ष के बाद उन्होंने एक बार फिर से बॉक्सिंग रिंग में अपना वही जलवा दिखाया जिसके लिए वो जानी जाती हैं। अब मैरीकॉम विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाली दुनिया की पहली महिला बॉक्सर बन गईं हैं। मैरीकॉम एकमात्र ऐसी भारतीय महिला मुक्केबाज हैं जिन्होंने ओलंपिक गेम्स के इतिहास में भारत के लिए व्यक्तिगत पदक जीता था। उन्होंने ये कमाल वर्ष 2012 लंदन ओलंपिक में किया था। लंदन में उन्होंने 51 किलोग्राम फ्लाइवेट प्रतियोगिता में भारत के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश को गौरव का सबसे बड़ा पल दिया।
मैरीकॉम ने अपने देश के लिए दुनिया के हर बड़े खेल आयोजन में पदक जीता है। एशियन गेम्स की बात करें तो उन्होंने वर्ष 2014 में इंचोन में 51 किलोग्राम फ्लाइवेट प्रतियोगिता में भारत के लिए गोल्ड जीता था। वहीं इससे पहले यानी 2010 एशियन गेम्स में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया था। वर्ष 2018 में यानी इस वर्ष गोल्डकोस्ट में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में मैरीकॉम ने 48 किलोग्राम लाइटवेट प्रतियोगिता में फिर से देश के लिए गोल्ड मेडल जीता। एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी वो गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।
राज्यसभा की मेंबर बनीं मैरीकॉम
मैरीकॉम को भारत में मिलने वाले सभी बड़े खेल सम्मानों से नवाजा जा चुका है। वर्ष 2008 में राजीव गांधी खेलरत्न, 2006 में पद्मश्री, 2003 में अर्जुन अवॉर्ड और वर्ष 2013 में वो पद्मभूषण से सम्मानित की जा चुकी हैं। वर्ष 2016 में उन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने राज्यसभा का सदस्य चुना था। वर्ष 2017 में उन्हें खेल मंत्रालय की तरफ से अखिल कुमार के साथ बॉक्सिंग का नेशनल आबजर्वर बनाया था। मणिपुर के एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली मैरीकॉम ने अपने जीवन में जो कामयाबी हासिल की है वो एक मिसाल है। जीवन में कई कठिनाईयों का सामना करते हुए मैरीकॉम ने असंभव को संभव कर दिया।
कई परेशानियों से जूझीं थीं मैरीकॉम
मैरीकॉम के इतने सफल होने का सफर आसान नहीं था। एक बेहद गरीब परिवार में जन्म लेने वाली इस लड़की के लिए बॉक्सर बनने का ख्वाब देखना ही सबसे बड़ा अपराध था। यानी पहली परेशानी अपने घर की ही थी लेकिन उन्होंने किसी तरह से इस परेशानी से पार पाया और आखिरकार उनके पिता ने उनकी प्रतिभा का लोहा माना। उनके मन में बॉक्सिंग का आकर्षण 1999 में उस समय आया जब उन्होंने खुमान लम्पक स्पो‌र्ट्स कॉम्प्लेक्स में कुछ लड़कियों को बॉक्सिंग रिंग में लड़कों के साथ बॉक्सिंग के दांव-पेंच आजमाते देखा। इसके बाद ही उन्होंने बॉक्सिंग करने की ठानी। बाद में उनकी शादी हुई। उनके तीन बच्चे भी हैं लेकिन बच्चों के जन्म के बाद उनका फिर से बॉक्सिंग रिंग में आना और फिर से उसी लय को हासिल करना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। मैरीकॉम ने इस चुनौती को भी पार किया और विश्व चैंपियन बनीं। मैरीकॉम की सफलता में उनके पति का बड़ा योगदान रहा है जो हर कदम पर उनका साथ निभाते रहे।
मैरीकॉम पर बन चुकी है फिल्म
मैरीकॉम के जीवन पर इसी नाम से एक फिल्म भी बन चुकी है जिसमें उनका किरदार बॉलीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने निभाया था। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया था और ये कमाल की हिट फिल्म साबित हुई थी। इस फिल्म को ओमंग कुमार ने डायरेक्ट किया था।

मुम्बई हमला / 17 जवानों की शहादत पर पुलिस में इतना गुस्सा था कि कसाब को मार डालते: पूर्व आईपीएस

नयी दिल्ली : 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए हमले के आज 10 साल पूरे हो गए। लेकिन 26/11 का दर्द अब भी सालता है। हमले में 166 से ज्यादा लोग मारे गए थे। पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों से लोहा लेते हुए 17 सुरक्षाकर्मी भी शहीद हो गए थे। इन्हीं में शामिल थे- मुंबई एटीएस चीफ हेमंत करकरे, एसीपी अशोक कामटे और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर।
यह संयोग ही था कि तीनों के साथ काम कर चुकीं आईपीएस ऑफिसर मीरा बोरवांकर की अगुवाई में एक मात्र जिंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब को हमले के 6 साल बाद फांसी दी गई। हमले के 10 बरस पर साहस और शहादत की कहानी मीरा की ही कलम से…
उस रोज मैं दिल्ली में थी। भतीजी की शादी की भारी थकान के बाद गहरी नींद में सो रही थी। तभी भाई ने झकझोर कर जगाया। पूछा- क्या आप हेमंत करकरे को जानती हैं? मेरा जवाब था- हां…हां। भाई ने कहा- ‘वे नहीं रहे।’ मेरे लिए ये अविश्वसनीय था। एक शाम पहले खबर मिली थी कि मुंबई के कोलाबा में दो गुटों के बीच भिड़ंत हुई है और अब हेमंत की खबर। मैं छुट्टी कैंसल कर पुणे के सीआईडी हेडक्वार्टर पहुंची। पर मेरे वहां पहुंचने तक अंतिम संस्कार ही बाकी रह गया था।

हेमंत को मैं 20 साल से जानती थी। वे पहले कॉर्पोरेट सेक्टर में जॉब करते थे, फिर लोगों की सेवा की खातिर पुलिस जॉइन की। यही वजह थी कि हेमंत काफी व्यवस्थित किस्म के थे। लोगों तक पहुंचने, उनकी मदद करने के अलावा हेमंत की कम्युनिकेशन स्किल भी गजब की थी। जब मैं मुंबई क्राइम ब्रांच की जॉइंट कमिश्नर थी, तो एक रोज हेमंत मेरे चैंबर में आए। बताया कि वे एक बार फिर महाराष्ट्र पुलिस को रिपोर्ट करेंगे, ताकि एटीएस को लीड कर सकें। उनकी बात सुनकर मैं हैरान थी। तब वे बड़े असाइनमेंट के लिए विदेश में तैनात थे। लेकिन अब मैं जान गई थी कि हेमंत को ये अच्छे से पता रहता है कि उन्हें क्या करना है। हेमंत देश के लिए शहीद हुए। अब बात अशोक कामटे की। मेरे चार्ज संभालने से पहले अशोक सतारा पुलिस चीफ थे। मैंने उनके बारे में सुना था कि वे युवा और डायनेमिक ऑफिसर हैं। अवैध शराब और जुए के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहे हैं। शोलापुर में तो उनकी हीरो की छवि थी। इसकी वजह थी कि गलत काम पर बड़े से बड़े नेता को भी नहीं बख्शते थे। मुझे याद है कि एक बार अशोक ने मुझे थाणे एसपी के तौर पर डिनर पर बुलाया। करीब एक घंटे तक तो वे मुझे अपने निजी हथियारों का कलेक्शन ही दिखाते रहे। डिनर भी देर से कर पाए। ये उनके जुनून की बानगी थी। विजय सालस्कर; जिनके साथ मैंने 3 साल मुंबई क्राइम ब्रांच में काम किया। विजय की 2 पहचान थीं- हमेशा अच्छे से ड्रेस-अप होना और सबसे प्यार से बात। उन्हें देखकर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था कि वे मुंबई के सबसे जांबाज ऑफिसर हैं। विजय के इन्फॉर्मेशन सोर्स कमाल के थे और वे इन सोर्स को लेकर काफी संवेदनशील भी रहते थे। विजय और उनकी टीम में भी गजब की बॉन्डिंग और आपसी सम्मान था। मुंबई हमले में हमने इन तीनों को खो दिया। हमारे पुलिसकर्मी इतने गुस्से में थे कि वे कसाब को मार डालना चाहते थे। पर सबने समझदारी से काम लिया, क्योंकि कसाब के जरिए हमें पाकिस्तान की कई और साजिशों का पता चलना था। जो चला भी। मेरे लिए कसाब आतंकवाद के खिलाफ हमारी कमतर तैयारियों का प्रतीक था। खैर, जिस अंत का वो हकदार था, वो उसे मिला। जय हिंद।’
‘फांसी की प्रक्रिया पूरी टीम को निचोड़ देती है’
लोग मुझसे पूछते हैं कि कसाब की फांसी के वक्त मेरे दिलो-दिमाग में क्या चल रहा था? लोगों को लगता होगा कि उस वक्त तो मैं बहुत गौरवान्वित रही होंगी। ऐसा कुछ नहीं था। उन्हें कैसे समझाऊं कि किसी को फांसी पर चढ़ाया जाना एक बेहद जटिल कानूनी प्रक्रिया होती है। ये आपको और आपकी टीम को पूरी तरह निचोड़कर रख देती है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

अगले महीने से सात से आठ प्रतिशत महंगे होंगे टीवी, घरेलू उपकरण

नयी दिल्ली : टीवी और घरेलू उपकरण अगले महीने से महंगे हो सकते हैं। टिकाऊ उपभोक्ता सामान कंपनियां त्योहारी सीजन के बाद अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने पर विचार कर रही हैं। त्योहारी बिक्री के मद्देनजर कपनियों ने बढ़ी लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने के बजाये खुद अस्थायी रूप से वहन किया। डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट और सीमा शुल्क में बढ़ोतरी से इन उत्पादों की लागत बढ़ी है।
पैनासोनिक इंडिया अपने उत्पादों के दाम में 7 प्रतिशत तक की वृद्धि करने के लिये तैयार है जबकि कुछ अन्य कंपनियां पहले ही कीमतों में वृद्धि कर चुकी है। पैनैसोनिक इंडिया के अध्यक्ष और मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) मनीष शर्मा ने बताया, “पिछले कुछ महीने में रुपये में गिरावट आई है, जिसका असर लागत पर पड़ा है। हमने ग्राहकों के लिये बढ़ी लागत मूल्य का बोझ झेलने की काफी कोशिश की लेकिन बाजार की स्थिति को देखते हुये हमें अगले महीने से दाम में 5 से 7 प्रतिशत की वृद्धि करनी होगी।”
हायर इंडिया के अध्यक्ष एरिक ब्रगैंजा ने कहा, “हमने यह सुनिश्चित किया है कि भारत में त्योहारी सीजन के बाद कीमतों में वृद्धि प्रभावी होगी क्योंकि त्योहारी सीजन में बड़े पैमाने पर लोग टिकाऊ उपभोग की वस्तुएं खरीदते हैं।”
भारत में त्योहारी सीजन ओणम से शुरू होता है और दशहरा के बाद दीपावली के साथ खत्म होता है। इस दौरान उद्योग की कुल बिक्री में से एक-तिहाई त्योहारी सीजन के दौरान ही हासिल होती है।
हालांकि, सोनी जैसी कंपनियों की फिलहाल मूल्य में संशोधन करने की कोई योजना नहीं है। सोनी इंडिया के एक प्रवक्ता ने कहा, “हमारी अभी अपने टीवी के मूल्य में संशोधन करने की कोई योजना नहीं है।

 स्वर्ण मंदिर  : जहाँ सर झुकाते हैं सभी धर्मों के लोग

पंजाब के अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर भी प्रमुख गुरुद्वारों में से एक है। बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं। सिख धर्म के लोगों के साथ ही अन्य धर्म के लोग भी यहां पूरी आस्था के साथ सिर झुकाते हैं। पुराने समय में स्वर्ण मंदिर कई बार नष्ट किया गया, लेकिन इसे भक्तों ने फिर से बना लिया। मंदिर को कब-कब नष्ट किया गया और कब-कब बनाया गया, ये जानकारी में देखी जा सकती है। 19वीं शताब्दी में अफगान हमलावरों ने इस मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। इसके बाद महाराजा रणजीत सिंह ने इसे दोबारा बनवाया और सोने की परत से सजाया था। गुरुनानक जयंती के अवसर पर जानिए सिख धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक स्वर्ण मंदिर से जुड़ी कुछ खास बातें…
स्‍वर्ण मंदिर को श्री हरमंदिर साहिब या श्री दरबार साहिब भी कहा जाता है। इस मंदिर पर स्‍वर्ण की परत के कारण इसे स्वर्ण मंदिर कहा जाता है। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले लोग मंदिर के सामने सिर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सी‍ढ़ि‍यों से मुख्य मंदिर तक पहुंचते हैं।
यहां की सीढ़ि‍यों के साथ-साथ स्वर्ण मंदिर से जुड़ी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है।
मान्यता है कि इस गुरुद्वारे का नक्शा करीब 400 साल पहले गुरु अर्जुन देव ने तैयार किया था। यह गुरुद्वारा वास्तु शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है। मंदिर में की गई नक्काशी और सुंदरता सभी का मन मोह लेती है। गुरुद्वारे में चारों दिशाओं में दरवाजे हैं।
यहां हमेशा लंगर का प्रसाद ग्रहण करने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है। लंगर की पूरी व्यवस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समि‍ति‍ की ओर से की जाती है। हर रोज यहां करीब 40 हजार लोग लंगर का प्रसाद ग्रहण करते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए श्री गुरु रामदास सराय में ठहरने की व्यवस्था भी है।
यहां आने वाले सभी श्रद्धालुजन सरोवर में स्नान करने के बाद ही गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाते हैं। यह प्राचीन परंपरा है। स्वर्ण मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। यह गुरुद्वारा एक बड़े सरोवर के मध्य स्थित है। गुरुद्वारे का बाहरी हिस्से पर सोने की परत है, इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर या गोल्डन टेंपल के नाम से जाना जाता है।

सुषमा ने की लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा, सेहत को बताया कारण

इन्दौर/नयी दिल्ली :  भाजपा की प्रखर वक्ता और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया है। मंगलवार को की गयी इस घोषणा के लिए उन्होंने अपने स्वास्थ्य का हवाला दिया है।
स्वराज ने कहा, “वैसे तो मेरी चुनावी उम्मीदवारी तय करने का अधिकार मेरी पार्टी को है लेकिन स्वास्थ्य कारणों से मैंने अपना मन बना लिया है कि मैं अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ूंगी।’सुषमा, 2009 से ही लोकसभा में मध्यप्रदेश के विदिशा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
भाजपा की 66 वर्षीय नेता ने कहा, “विदिशा से वर्ष 2009 में लोकसभा सदस्य चुने जाने के बाद मैं सदन की नेता प्रतिपक्ष और इसके पश्चात विदेश मंत्री के अहम पदों पर आसीन होने के बावजूद आठ साल तक अपनी संसदीय सीट के आठों विधानसभा क्षेत्रों में हर महीने नियमित तौर पर जाती थी। लेकिन दिसंबर 2016 में गुर्दा प्रतिरोपण के बाद मुझे डॉक्टरों ने धूल से बचने की हिदायत दी है। इस कारण मैं पिछले एक साल से चुनावी सभाओं में भी भाग नहीं ले पा रही हूं।ससउन्होंने कहा, “मैं स्वास्थ्य कारणों से खुले स्थानों पर आयोजित कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो सकती हूँ। मैं बंद सभागारों में ही कार्यक्रम कर सकती हूं। मैंने अपने नेतृत्व से भी कहा है कि अपने स्वास्थ्य को देखते हुए मुझे धूल से बचना है।”
स्वराज ने कहा, “मैं विदेश तो जा सकती हूँ। लेकिन धूल से बचने की डॉक्टरी हिदायत के कारण विदिशा नहीं जा सकी, क्योंकि कुछेक कस्बों को छोड़कर मेरा पूरा संसदीय क्षेत्र देहाती है।”
पिछले कुछ समय में विदिशा क्षेत्र में स्वराज के नहीं पहुंचने पर नाराज लोगों ने लोकसभा सांसद को “गुमशुदा” बताते हुए पोस्टर लगाये थे। इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “अगर मेरे विरोधी मेरे स्वास्थ्य के प्रति इस कदर संवेदनहीन होकर ऐसे पोस्टर लगाते हैं, तो मुझे इस पर कुछ नहीं कहना।”
उन्होंने कहा, “‘मेरा रिकॉर्ड मध्यप्रदेश की ऐसी लोकसभा सांसद का रहा है, जिसने अपने क्षेत्र का सबसे ज्यादा दौरा किया है। पिछले दो साल के दौरान मैं भले ही अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा नहीं कर सकी हूं। लेकिन मैंने विदिशावासियों से किये गये सारे वादे दिल्ली में बैठकर पूरे किये हैं।”
स्वराज ने कहा, “बुधनी-इंदौर रेललाइन को मंजूरी दिलाने का वायदा भी मैंने आगामी चुनावों से पहले पूरा कर दिया है।” स्वराज हिन्दी की प्रखर वक्ता हैं और एक सांसद एवं मंत्री के रूप में उन्होंने संसद एवं विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रभावी भाषण हिन्दी में दिए हैं। वह अंग्रेजी में उसी सहजता के साथ भाषण देती हैं किंतु वह प्राय: हिन्दी में ही बोलना पसंद करती हैं। भाजपा नेता के नाम देश में सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनने का भी रिकार्ड है। वह हरियाणा सरकार में 1977 में महज 25 वर्ष की आयु में कैबिनेट मंत्री बनी थीं। उन्हें दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव भी हासिल है। स्वराज के पहले इन्दिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए यह दायित्व निभाया था। स्वराज तीन बार राज्यसभा सदस्य और अपने गृह राज्य हरियाणा की विधानसभा में दो बार सदस्य रह चुकी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्होंने सूचना प्रसारण मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्री सहित विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी कैबिनेट मंत्री के रूप में संभाली थी।
उन्होंने 1999 में बेल्लारी लोकसभा चुनाव कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विरूद्ध लड़ा था। हालांकि वह यह चुनाव सोनिया गांधी के हाथों हार गयी थीं। सुषमा को भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का करीबी माना जाता है। सुषमा लोकसभा में 2009-14 के बीच नेता प्रतिपक्ष थीं।

बाल विवाह को तोड़ा, जीती कानूनी लड़ाई, अब अपनी पसन्द से की शादी

पानीपत : वह अठखेलियां करने की उम्र में ही दुल्हन बन गई। समाज की कुरीति और उसके चाचा की शादी की चाहत में परिवार ने आठ वर्ष की उम्र में ही उसे बालिका वधू बना दिया था। समझदार हुई तो जीवन बर्बाद करने वाले फरमान को मानने से साफ इन्कार कर दिया। अब लवुश को जीवन साथी चुन लिया। यह संघर्ष भरी जीवन गाथा बीकॉम की छात्रा शशि की है। उसे धमकी भी मिली। परिवार और समाज का तिरस्कार भी झेलना पड़ा। अदालत का दरवाजा खटखटाया और जीत गई। अतिरिक्त जिला व सत्र अदालत ने गत 16 जुलाई को उसके पक्ष में फैसला सुनाया। केस जीतने के बाद सोमवार को करनाल के गांव गंजू गढ़ी निवासी लवुश से सात फेरे लेकर वैवाहिक जीवन की तरफ कदम बढ़ा दिए। करनाल के बरसत गांव निवासी बलकार सिंह ने, जो अब पानीपत में रहते हैं, बेटी शशि का विवाह आठ वर्ष की आयु में आटा-साटा कुप्रथा के तहत उप्र के सहारनपुर के ढोला माजरा गांव के मन्नू से कर दिया। इसके बदले में मन्नू की बहन का विवाह लड़की के चाचा से हुआ। इस प्रथा के तहत जिस कुनबे से बहू लाई जाती है, उस कुनबे को अपने कुनबे की बेटी देनी होती है। 2017 में शशि जब कक्षा 12 में पहुंची तो पिता बलकार पर बेटी को विदा करने का दबाव पड़ा। बेटी से जिक्र किया तो उसने इन्कार कर दिया। उसने मन्नू को दिव्यांग, बेरोजगार और आयु अधिक बताते हुए ससुराल जाने से मना कर दिया। पौत्री के निर्णय से गुस्साए दादा ने जातीय परंपरा को ठेस लगती देख बलकार को जायदाद से बेदखल कर दिया। मार्च 2017 में पिता के साथ जाकर महिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी के यहां शिकायत दी। मई 2017 में कोर्ट में शादी खत्म करने के लिए केस दायर किया। 16 जुलाई 2018 को कोर्ट ने बाल विवाह मानते हुए, आठ साल की उम्र में मन्नू के साथ हुई शशि की शादी को रद कर दिया। इसके बाद बलकार ने अपनी बेटी का रिश्ता करनाल के गांव गंजू गढ़ी लवुश से कर दिया।
मन्नू अपनी बहन को घर ले गया
कानूनी लड़ाई के दौरान मन्नू और उसके परिजनों ने शशि और उसके पिता बलकार पर कई तरह से दबाव डाले। मन्नू अपनी बहन (शशि की चाची) को भी यह कहकर अपने साथ ले गया कि अपनी बेटी दोगे तभी वह अपनी बहन को भेजेगा। बिरादरी की पंचायत बुलाकर भी खूब दबाव डाला गया। जिस लड़के लवुश से अब शादी हुई है, उसके अपहरण तक की धमकी दी गई थी।
कॉलेज में सेमिनार से मिली सीख
शशि ने बताया कि ये तो पता था कि मेरी शादी हो चुकी है। इससे ज्यादा कुछ ज्ञान नहीं था। 11वीं में पढ़ाई के दौरान कॉलेज में बाल विवाह कुप्रथा पर एक सेमिनार हुआ था। उसमें पता चला कि कानूनी मदद से बाल विवाह को तोड़ा जा सकता है।बाल विवाह का कलंक माथे से मिट गया। दामाद लवुश करनाल बस स्टैंड पर पानी बेचने का काम करता है। बेटी के ससुराल पक्ष को पूरा प्रकरण पता था फिर भी उन्होंने हमारा साथ दिया। सभी माता-पिता से एक ही प्रार्थना है कि समाज में चली आ रही कुप्रथा और आर्थिक तंगी का बहाना बनाकर बेटियों का विवाह कम उम्र में न करें।