Saturday, April 25, 2026
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पहाड़ से लटका यह 500 साल पुराना गाँव

कभी विदेशियों का आना था प्रतिबंधित
नयी दिल्ली : ओमान की पहाड़ी चट्टानों में पिछले पांच सौ वर्षों से अधिक समय से एक दूरदराज बसी जनजाति एकाकी जीवन बिता रही है। मस्कट के बलुआ तटों से 195 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में ओमान का मैदानी इलाका चूना पत्थरों के एक ऊंचे पहाड़ों में तब्दील हो जाता है। 2980 मीटर ऊंचा यह पहाड़ जबाल-अल-अखदार या हरे पहाड़/ग्रीन माउंटेन के रूप में भी जाना जाता है। घुमावदार घाटियों और गहरे खड्डों से भरपूर यह देश का एक सुदूरवर्ती कोना है। सड़क खत्म होते ही आगे बढ़ने का तरीका या तो पैदल या खच्चर से या फिर ऑल टेरेन व्हिकल से रह जाता है। 20 किलोमीटर का टेढ़ा-मेढ़ा लेकिन खड़ी ढलानों वाला रास्ता चढ़ने के बाद एक खड्ड के उस पार पहाड़ी की कगार पर लगभग हवा में लटका हुआ घरों का एक छोटा सा समूह दिखाई देता है। यही अल सोगारा है। एक ऐसा दूरदराज वाला गांव जो पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है और जहां लोग पिछले 500 वर्षों से अधिक समय से रह रहे हैं। हालांकि, ग्रीन माउंटेन को ओमान के एक अद्भुत परिदृश्य का दर्जा दिया जाता है लेकिन कुछ ही यात्री अल सोगारा पहुंच पाते हैं। वर्ष 2005 तक इस पहाड़ी श्रृंखला में विदेशियों का प्रवेश प्रतिबंधित था, क्योंकि ओमान सरकार की इस क्षेत्र में एक सैन्य टुकड़ी थी। इन दिनों इस छोटे से गांव में आने-जाने के लिए आपको अपना वाहन एक पत्थरीले मार्ग के अन्त में छोड़ना होता है और फिर खड्ड के तले से ऊपर उठती हुई चट्टानी सीढ़ियों की 20 मिनट की चढ़ाई करनी पड़ती है। इस क्षेत्र में इस तरह के कई सारे गांव हैं लेकिन अल सोगारा ही ऐसा है जो अब भी बसा हुआ है। मुख्य पहाड़ी शहर सेह कताना से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर बसा अल सोगारा इस क्षेत्र का सबसे एकाकी गांव है और पूरे ओमान में सबसे सुदूरवर्ती बसे हुए प्रदेशों में से है। 14 साल पहले तक अल सोगारा में बिजली या फोन नहीं होते थे और इसकी सबसे पास की सड़क 15 किलोमीटर दूर थी। परम्परागत रूप से सामान की आवाजाही पास के निजवा और बिरकत अल मूज शहरों से खच्चरों द्वारा की जाती थी। लेकिन 2005 में, कुछ जुगाड़ू गांव वालों ने पत्थरीली सड़क तक खड्ड के ऊपर दो गड़ारियां लगाकर घाटी से सड़क तक की केबल सवारी तैयार कर ली जिससे सामान ढोया जा सके।स्थानीय बाशिंदों को ऐसा वक्त याद नहीं आता जब अल सोगारा में 45 से अधिक की आबादी रही हो। स्कूल न होने के कारण पुरानी पीढ़ियों ने घर पर ही लिखना-पढ़ना सीखा। लेकिन, 1970 के दशक से बच्चे 14 किलोमीटर दूर स्थित शहर सैक के स्कूल में जाने लगे। वहां जाने के लिए उन्हें गांव की संकरी सीढ़ी से उतरकर पहाड़ के दूसरी ओर तक पैदल जाना होता था जहां से एक कार उन्हें स्कूल तक छोड़ती थी। अल सोगारा में अपना पूरा जीवन बिताने वाले छात्र मोहम्मद नासेर अलशरीकी कहते हैं, ‘हम यहां रहते हैं और हमें इस जगह से लगाव है. लोग भिन्न होते हैं लेकिन उन्हें मातृभूमि से हमेशा प्यार होता है।’ आज इस पहाड़ी बसेरे में अलशरीकी जनजाति के पांच परिवार रहते हैं। ये पूरा समूह जॉर्डन से 1000 वर्ष पहले यहां आया और समूचे ओमान में बस गया। यहीं पर जन्मे और पले-बढ़े सलेम अलशरीकी बताते हैं कि अल सोगारा में इस वक्त केवल 25 गांव वाले हैं, गांव छोटा है इसलिए रहने वाले कम हैं। सलेम और दूसरे बाशिंदों के मुताबिक ये सभी गांव वाले अल सोगारा में 500 साल से अधिक समय से पहले आए अपने एक पूर्वज की देन हैं। इतनी पीढ़ियों के बाद भी अलशरीकी समुदाय ने प्राचीन पद्धति से घर बनाने की कला बरकरार रखी है जिसमें या तो चट्टान और चिकनी मिट्टी इस्तेमाल होती थी या फिर चट्टान को काटकर ही बसेरे बनाए जाते थे। सलेम बताते हैं, ‘हमारे पूर्वजों ने यहां आकर बाहर से भीतर की ओर दीवारें बनाई और पहाड़ों में ही रहे। अंदर से हमारे घर गुफाओं की तरह हैं। यदि दीवारें न हों तो आपको पहाड़ में एक गुफा ही दिखेगी।’ समुद्र तट से 2700 मीटर ऊपर बसा अल सोगारा ओमान के उन कुछ स्थानों में से है, जहां नियमित रूप से बर्फबारी होती है। इस बारे में मोहम्मद नासेर अलशरीकी बताते हैं, ‘यहां बहुत भीषण ठंड पड़ती है। हम चूना पत्थरों और चिकनी मिट्टी से अपने घर बनाते हैं जिससे ग्रीन माउंटेन पर पड़ने वाली ठंडक से बचा जा सके और गर्मियों में भी राहत रहे।’गांव वालों के अनुसार, उनके पूर्वजों ने वहां के सीमित संसाधनों का प्रयोग कर पहाड़ी पर टंगे उनके आवास तैयार किए जिसमें पत्थरों को पीसकर पानी में मिलाया गया और चिकनी मिट्टी की दीवारें बनाई गईं या फिर चूना पत्थरों को काटकर चट्टानों में ही कमरे तैयार किए गए। गांव वाले न केवल पहाड़ काटकर अपना घर बनाते हैं बल्कि इन्हीं घरों में अपने पशुओं के झुंडों को भी रखते हैं। कई सदियों से अल सोगारा के परिवार इन गुफाओं के मुहाने पर बाड़ लगाते हैं जिससे जंगली जानवरों से अपने पशुओं की सुरक्षा की जा सके।अलशकीरी जनजाति की तरह क्षेत्र के अन्य लोगों में भी पशुओं का अर्थ समृद्धि से है। जिस व्यक्ति के पास जितनी ज्यादा बकरियां, भेड़ें और खच्चर हों, वह उतना ही सम्पन्न माना जाता है। मोहम्मद नासेर बताते हैं कि पशुपालन के साथ वे खेती भी करते हैं और अनार, खजूर, नाशपाती, आड़ू, अखरोट, संतरे, अंजीर, लहसुन, प्याज और अन्य सब्जियां उगाते हैं। ओमान और अरब क्षेत्र के अन्य देशों के लोगों की तरह ही अल सोगारा जनजाति भी आवभगत का एक परंपरागत तरीका अपनाती है, जिसमें गांव वाले घर आए मेहमानों को पूरे तीन दिन तक खिलाने-पिलाने के बाद ही घर में रूकने का कारण पूछते हैं।ओमान के दूरदराज के क्षेत्रों में जिंदगी चलाए रखने के लिए प्राचीन बसेरों ने सिंचाई की एक ऐसी कुशल प्रणाली विकसित की जिसे ‘अफ्लाज’ कहा जाता है। इसमें पानी को गुरूत्वाकर्षण शक्ति की मदद से भूमिगत स्रोतों से उठाकर सिंचाई की जाती है। 500 ईस्वी से प्रयोग में लाई जाने वाली इन नहरों की कभी इतनी अहमियत थी कि इनकी रक्षा के लिए जगह-जगह बुर्ज बनाए गए। अल सोगारा सहित आज पूरे ओमान में इस तरह की लगभग 3000 नहरें हैं जहां भूमिगत सोते से ‘अफ्लाज’ के जरिए पानी उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन, जलवायु परिवर्तन के कारण 20 से 50 किलोमीटर लंबे कई सिंचाई मार्गों में अब पहले जैसा प्रवाह नहीं रहा। ग्रीन माउंटेन भी अब धूल का बलुआ पत्थर हो चला है।मोहम्मद नासेर ने समझाया कि ये नहरें सैकड़ों साल पहले यहां रहने वाले परिवारों ने बनवाई थीं। हर परिवार दूसरे से एक नहर साझा करता था और अपने हिस्से का पानी इस्तेमाल करता था। यह हिस्सा नहर बनाने में किए गए श्रमदान पर निर्भर करता था, लेकिन अब पानी कम होने के साथ-साथ हमारी फसल भी कम हो रही है। हाल के दिनों में अल सोगारा में उपलब्ध काम की कमी की वजह से यहां के बहुत सारे निवासी काम खोजने मस्कट और निजवा चले गए हैं। इससे इस सुदूर बसी चट्टानी दुनिया का भविष्य ही खतरे में पड़ गया है। बेशक कुछ गांव वाले कभी हरे-भरे रहे इन पहाड़ों से अब दूर चले गए हों, लेकिन यहां बचे हुए लोग प्रतिदिन सुबह उठकर बकरियों को चारा देने, अपने खजूर के पेड़ों से खजूर तोड़ने और पानी लाने के लिए ‘अफ्लाज’ तक जाने जैसे रोजमर्रा के काम अब भी कर रहे हैं। मोहम्मद नासेर की मानें तो, ‘भविष्य हमेशा वर्तमान पर निर्भर करता है यदि हम इस स्थान का ध्यान रखेंगे तो हमारी अगली पीढ़ी या हमारे नाती-पोते भी यही करेंगे। लेकिन यदि हम इन घरों की देखभाल नहीं करेंगे तो ये अगले 15 वर्षों में नष्ट हो जाएंगे।’

नए साल में हाईटेक होंगी 13.77 लाख आंगनबाड़ियां

 पहले चरण में 50 हजार केंद्रों की बदलेगी तस्वीर
नयी दिल्ली : सरकार ने देशभर में 13.77 लाख आंगनबाड़ियों को हाईटेक बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। पहले चरण में पायलट प्रोजेक्ट के तहत 50 हजार आंगनबाड़ियों को कंप्यूटर व अन्य आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय आंगनबाड़ियों की निगरानी के लिए एक तंत्र विकसित करने पर भी काम कर रहा है।
सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय का लक्ष्य तहत 6 साल तक 16.54 करोड़ बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अच्छी शिक्षा, पोषणायुक्त भोजन और स्वस्थ वातावरण मुहैया कराना है। हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में बताया था कि देश में 1,59,568 आंगनबाड़ियों में पीने तक का पानी उपलब्ध नहीं है। वहीं 3,63,940 में शौचालय नहीं हैं, जबकि सरकार के पोषण अभियान का दारोमदार इन्हीं केंद्रों पर निर्भर है। अब सरकार ने अगले चार साल में आंगनबाड़ियों के कायाकल्प की योजना पर फरवरी से काम शुरू करने का तैयारी पूरी कर ली है।

पापा की दुकान पर अखबार पढ़कर की तैयारी, अब बनी जज

देहरादून : स्कूल से लौटने के बाद पापा का हाथ बंटाने के लिए उपाधि दुकान पर जाती थी। यहाँ वह समाचार पत्रों का अध्ययन करती थीं। उनसे नोट्स बनाती थी, जिससे जनरल नॉलेज मजबूत हुईं। यूकेपीएससी के पीसीएस-जे रिजल्ट में उपाधि ने बाजी मारी तो पूरे परिवार की खुशी का ठिकाना न रहा। उपाधि का कहना है कि वह सच को हमेशा जीतते देखना चाहती हैं।
उपाधि सिंघल के पिता सूर्य प्रकाश सिंघल आईएसबीटी पर पत्र-पत्रिकाओं की बुक शॉप चलाते हैं। उनकी मां इंदु सिंघल गृहिणी हैं। उपाधि ने एमकेपी इंटर कॉलेज से 10वीं और 12वीं पास की। इसके बाद एमकेपी पीजी कॉलेज से बीए किया। इसके बाद डीएवी पीजी कॉलेज से एमए इकोनोमिक्स और एलएलबी पास किया। उनकी पढ़ने की लगन बढ़ती ही गई। लिहाजा, गढ़वाल विवि के एसआरटी कैंपस से एलएलएम किया। इसके बाद इसी साल जून में उन्होंने लॉ में यूजीसी नेट परीक्षा पास की। उनका सपना जज बनने का था। लिहाजा, इसकी तैयारी में जुट गईं। उपाधि ने पहले ही प्रयास में पीसीएस-जे परीक्षा पास कर ली। उनकी इस कामयाबी पर पूरे परिवार में खुशी की लहर है। उनकी एक छोटी बहन श्रद्धा सिंघल और छोटा भाई निपुण सिंघल भी इस कामयाबी से बेहद खुश हैं।

5 वर्षों में दोगुनी हुई पीएचडी करने वालों की संख्या, मानदेय भी बढ़ा

नयी दिल्ली : मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में देश के युवाओं में शोध के प्रति रुझान दोगुना तेजी से बढ़ रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार सत्र 2018-19 में करीब 41 हजार छात्रों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई है।
पिछले पांच साल में हुई इस बढ़ोतरी का श्रेय काफी हद तक सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को भी जाता है। साल 2014 के बाद से सरकार लगातार शोध को बढ़ावा देने के लिए जुटी हुई है। पिछले बजट में सरकार ने इसे बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर का शोध प्रतिष्ठान खोलने की घोषणा की थी। हालांकि अभी तक यह खुला नहीं है, पर इस पर काम जारी है। इसके अलावा शोधकर्ताओं के मानदेय में भी बढ़ोतरी की गई, इसे भी एक बड़ी पहल माना जा रहा है। बता दें कि पहले जेआरएफ यानी जूनियर रिसर्च फेलोशिप का मानदेय 28 हजार था, अब इसे बढ़ाकर 31 हजार रुपये कर दिया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक शोध को लेकर यह रुझान हालांकि पूरे देश में एक बराबर नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार असम, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पिछले पांच वर्षों में शोध (पीएचडी) के मामले बढ़े हैं। जबकि दिल्ली, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में इनमें कमी सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक देश में साल 2014-15 में जहां कुल 21 हजार छात्रों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई है, वहीं साल 2018-19 में यह संख्या बढ़कर करीब 41 हजार हो गया है। संसद में पेश की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक पीएचडी के मामले में यह बढ़ोतरी अचानक नहीं हुई है।

जहां साल 2014-15 में देशभर में कुल 21 हजार छात्रों को पीएचडी की उपाधि दी गई, वहीं 2015-16 में यह 24 हजार हुई, 2016-17 में करीब 28 हजार, 2017-18 में करीब 34 हजार और अब 2018-19 में करीब 41 हजार छात्रों को पीएचडी उपाधि दी गई है।

वैज्ञानिकों ने उस जींस को खोजा जिससे कैंसर कोशिकाएं जीवित रहती हैं

कैंसर की नई दवा बनाने की दिशा में वैज्ञानिक एक कदम और आगे बढ़ गए हैं। ब्रिटेन और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने पहली बार 25 प्रकार के कैंसर की जेनेटिक मैपिंग कर उनके परिणामों का मूल्यांकन किया है। जीन एडिटिंग तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कैंसर कोशिकाओं को जीवित रहने के लिए शरीर में मौजूद कौन से जींस की जरूरत होती है।
इससे अब ये उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में कैंसर की आधुनिक दवा तैयार होगी जिससे उस जीन्स को खत्म किया जा सकेगा जिससे कैंसर कोशिकाएं फैलती हैं। दवा से दर्जनों तरह के कैंसर में जींस को टारगेट कर उसे खत्म किया जा सकता है। शोध में अलग-अलग तरह के कैंसर से पीड़ित 25 मरीजों से 725 कैंसर कोशिकाओं की लाइन तैयार की गई। इसके बाद शोध संस्थानों ने इसका अध्ययन किया। परिणाम का मिलान किया तो दोनों एक समान थे। वैज्ञानिकों ने इसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए कैंसर कोशिकाओं की सबसे बड़ी जेनेटिक स्क्रीनिंग बताई है जिसे सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। शोध ब्रिटेन के वेलकम सांगेर इंस्टीट्यूट, मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, के वैज्ञानिकों ने किया है जो हाल ही नेचर कम्युनिकेशन जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
दवा बनाने में आसानी होगी
एमआईटी के ब्रोड इंस्टीट्यूट के प्रो. अवियाद तेशेरनियाक का कहना है कि इस तरह का ये पहला शोध है। कैंसर पर शोध करने वालों के लिए अहम है। हमने दो अलग-अलग अध्ययन में ये पाया है और इसमें किसी भी तरह का मतभेद नहीं है। भविष्य में इससे कैंसर को जड़ से खत्म करने के लिए दवा तैयार हो सकेगी। वेलकम सांगेर इंस्टीट्यूट के डॉ. फ्रांसेस्को ओरिया का कहना है कि इस शोध के बाद कैंसर के इलाज में हम और एक पीढ़ी आगे निकलेंगे।
हृदय रोग के बाद कैंसर मौत की बड़ी वजह
भारत में हृदय रोग के बाद कैंसर से मौत दूसरी बड़ी वजह है। कैंसर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 75 साल की उम्र से पहले 9.81 फीसदी पुरुषों और 9.42 फीसदी महिलाओं में कैंसर होने का खतरा रहता है। 75 साल की उम्र से पहले 7.34 फीसदी पुरुषों और 6.82 फीसदी महिलाओं की मौत कैंसर जैसी बीमारी से होने की संभावना रहती है।

मशहूर अभिनेता श्रीराम लागू का निधन

पुणे : मशहूर अभिनेता डॉ. श्रीराम लागू का वृद्धावस्था से संबंधित बीमारियों के चलते मंगलवार शाम पुणे स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह 92 वर्ष के थे। उनके परिवार के सूत्रों ने यह जानकारी दी। नाटककार सतीश अलेकर ने बताया, ‘‘मैंने उनके दामाद से बात की। वृद्धावस्था संबंधित बीमारियों के कारण उनका निधन हुआ।’’ प्रशिक्षित ईएनटी सर्जन लागू ने विजय तेंदुलकर, विजय मेहता और अरविंद देशपांडे के साथ आजादी के बाद वाले काल में महाराष्ट्र में रंगमंच को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी।

वयोवृद्ध फिल्म छायाकार रामचंद्र बाबू का निधन

कोझिकोड : प्रख्यात फिल्म छायाकार रामचंद्र बाबू का शनिवार को यहां एक अस्पताल में निधन हो गया। पारिवारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी। वह 72 वर्ष के थे। बाबू करीब 125 फिल्मों से जुड़े रहे थे। वह मलयालम फिल्म उद्योग के प्रौद्योगिकी विकास का हिस्सा थे और जब फिल्में श्वेत-श्याम से रंगीन में तब्दील हो रही थीं तब वह कैमरे के पीछे अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। बाबू को सर्वश्रेष्ठ छायाकार के लिए चार बार केरल राज्य फिल्म पुरस्कार मिला। उल्लेखनीय है कि बाबू ने मलयालम के अलावा तमिल, तेलुगु, हिंदी, अरबी और अंग्रेजी भाषा की फिल्मों के लिए काम किया। वह मशहूर फिल्म छायाकार रवि के चंद्रन के भाई थे।

क्यूबा को मिला 40 साल बाद पहला प्रधानमंत्री

हवाना : क्यूबा में चार दशकों से अधिक समय बाद पहली बार प्रधानमंत्री ने कार्यभार संभाल लिया है। लंबे समय तक पर्यटन मंत्री रहे मैनुअल मार्रेरो ने फिदेल कास्त्रो के बाद प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला है। सरकार के प्रमुख के तौर पर मार्रेरो (56) की नियुक्ति रेवोल्यूशनरी ओल्ड गार्ड से पीढ़िगत बदलाव और विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है जिसका मकसद कम्युनिस्ट पार्टी के शासन की रक्षा करना है।
राष्ट्रपति मिग्वेल डियाज कैनल ने शनिवार को कहा, ‘‘क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक ब्यूरो ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।’’ इसके फौरन बाद कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने मार्रेरो से हाथ मिलाया। मार्रेरो क्रांतिकारी नायक फिदेल कास्त्रो के प्रशासन में 2004 से अब तक पर्यटन मंत्री रहे। फिदेल के भाई राउल और राष्ट्रपति डियाज कैनल के शासन में भी वह इस पद पर बने रहे।

बिहार की लोककथाओं को समेटती नयी किताब

पटना : आज के समय में जब बच्चे अधिकतर स्मार्टफोन और गेमिंग कंसोल में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में नयी पीढ़ी के बच्चों में कहानी कहने की परंपरा को जीवंत बनाये रखने की कोशिश करती एक नयी किताब ग्रामीण बिहार से दिलचस्प कालजयी लोककथाओं का संग्रह समेटे है।
‘द ग्रेटेस्ट फोक टेल्स ऑफ बिहार’ में 37 कहानियों का संग्रह है, जिनका आधार ग्रामीण जीवन है। इसमें लोक भाषा में रोचक किस्सों और आज के समय में टीवी सामग्री के कारण विलुप्त होती संस्कृति एवं बिहार के इतिहास को समाहित किया गया है।
किताब का प्रकाशन रूपा प्रकाशन ने किया है और इसे लिखा है पत्रकार लेखक नलिन वर्मा ने। वर्मा ने इस किताब में सदियों से चली आ रही लोककथाओं को शामिल कर इसे मौखिक कथाओं का एक संग्रह बनाया है। वर्मा ने इससे पहले राजद प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसिना : मेरी राजनीतिक यात्रा’ का सह-लेखन किया था।
उन्होंने कहा, ‘‘अपनी नयी किताब के जरिए मैंने हमारी समृद्ध परंपराओं और लोककथाओं के ज्ञान को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है जो दुर्भाग्य से तकनीक पसंद नयी पीढ़ी नहीं जानती।’’

26 दिसम्बर से आरम्भ होगा 25वाँ हिन्दी मेला

अहिंसा, भाईचारा और स्त्री का आत्मसम्मान है मुख्य संदेश

कोलकाता :  सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा हिंदी मेला 26  दिसम्बर से आरम्भ होगा। हिन्दी मेले  का यह 25वां साल है, रजत जयंती वर्ष। कोलकाता में यह हिन्दी की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान बन चुका है। इसका आयोजन सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा राजाबाजार के फेडरेशन हाल में होता आ रहा है। देश के दूसरे नगरों में हिन्दी मेला बड़ी आशा से देखा जाता है। यह चिंता व्यक्त होती है कि हिन्दीभाषियों में कलाओं और साहित्य के प्रति रुचि कैसे जाग्रत की जाए। सस्ती फिल्मों और पॉप गानों से जो सांस्कृतिक प्रदूषण फैला है, उसका जवाब है हिन्दी मेला। इसमें आधुनिक कविताओं के आधार पर गायन, आवृत्ति, नृत्य आदि के आयोजन होते हैं। इसके अलावा नाटक, लोक गीत, हिंदी क्विज आदि की प्रतियोगिताएँ होती हैं। इनमें सैकड़ों युवा और विद्यार्थी भाग लेते हैं। हिन्दी मेला ने  हिन्दी  भाषियों में सांस्कृतिक आत्मविश्‍वास बढ़ाया है।
हिन्दी मेला के 25वें साल में युवा प्रतिभागियों के लिए 1 लाख रुपये के पुरस्कार और स्मृति चिह्न हैं। यह कार्यक्रम सात दिन 26 दिसंबर 2019 से 1 जनवरी 2020 तक चलेगा। यह नए वर्ष का नए तरह से अभिनंदन करेगा। लखनऊ से जानेमाने ग़ज़ल गायक हरिओम का प्रदर्शन शनिवार 28 दिसंबर को होगा। पटना की ‘हिरावल’ की टीम रविवार को छायावादी संगीत प्रस्तुत करेगी। यह रवींद्र संगीत की तरह छायावादी संगीत को लोकप्रिय बनाने की कोशिश है। इसी दिन कबीर के पदों पर आधारित नृत्य बनारस की प्रसिद्ध नृत्यांगना प्रशस्ति तिवारी प्रस्तुत करेंगी।
हिन्दी मेला की इस बार केंद्रीय थीम ‘छायावाद के सौ साल’ है। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के संयुक्त महासचिव प्रो.संजय जायसवाल ने बताया कि धर्मांधता, यौन-उत्पीड़न और हिंसा के माहौल में छायावाद पर चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसने धार्मिक भाईचारे, अहिंसा, स्त्री-आत्म सम्मान और मानवतावाद का संदेश दिया था। देश के विभिन्न नगरों से आकर विद्वान प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के कृतित्व पर विशेष रूप से चर्चा करेंगे। प्रो.संजय जायसवाल का कहना है कि कोलकाता, हावड़ा, उत्तर 24 परगना, हुगली, मिदनापुर और बर्दवान से ही नहीं इस बार उत्तर बंगाल से भी कई युवा प्रतिभागी आ रहे हैं। हिन्दी मेला युवाओं का उच्च संस्कृति के लिए अभियान है। देश में शांति, सौहार्द और मानव-अधिकारों की स्थापना हिन्दी मेला का लक्ष्य है। 25 सालों से लगातार चलता आया हिन्दी मेला इस बार गांधी के सत्य और अहिंसा का संदेश पहुँचाना चाहता है, क्योंकि देश अभूतपूर्व संकट में है। छायावाद गांधी के आदर्शों की ही साहित्यिक प्रतिध्वनि रहा है। हिन्दी मेला के आयोजित प्रेस कांफ्रेंस को डॉ.शंभुनाथ, रामनिवास द्विवेदी, मृत्युंजय, राजेश मिश्र और सुशील पांडेय ने भी संबोधित किया।
25वें मेले में दिए जाने वाले पुरस्कारों की घोषणा
हिन्दी  मेले में इस बार 2019 का नाटक के लिए माधव शुक्ल नाट्य सम्मान ‘रंगशिल्पी’ के सुशील कांति को, प्रो.कल्याणमल लोढ़ा शिक्षक सम्मान भोगेंद्र झा को तथा युगल किशोर सुकुल पत्रकारिता सम्मान अजय विद्यार्थी को प्रदान किया जाएगा।