नयी दिल्ली : केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने घोषणा की कि 10वीं और 12वीं की बची हुई बोर्ड परीक्षाओं का आयोजन देश में पूर्व में नियोजित 3,000 केंद्रों की बजाए 15,000 केंद्रों पर किया जाएगा। कोरोना वायरस लॉकडाउन के मद्देनजर टाली गई परीक्षाओं का आयोजन अब एक जुलाई से 15 जुलाई के बीच होगा। निशंक ने कहा, “देश भर में अब 15,000 परीक्षा केंद्रों पर 10वीं, 12वीं की परीक्षा का आयोजन किया जाएगा। इससे पहले सीबीएसई केवल 3,000 केंद्रों पर परीक्षाएं आयोजित करने वाला था।”
यह फैसला परीक्षा केंद्रों पर सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने और विद्यार्थियों की केंद्रों तक की दूरी कम करने के लिए लिया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पहले ही घोषणा की थी कि विद्यार्थी उन स्कूलों में परीक्षा देंगे जहां वे पंजीकृत हैं न कि किसी बाहरी परीक्षा केंद्र पर। गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के मुताबिक कोविड-19 निरुद्ध क्षेत्रों में कोई परीक्षा केंद्र नहीं होगा।
देश भर में 15,000 परीक्षा केंद्रों पर होगी 10वीं, 12वीं की शेष बोर्ड परीक्षाएं
जीएचसीएल के क्वार्टर फोर के नतीजे घोषित
कोलकाता : केमिकल और टेक्सटाइल कम्पनी जीएचसीएल की चौथी तिमाही के नतीजे घोषित कर दिये हैं। जीएचसीएल के प्रबन्ध निदेशक आर एस जालान ने कहा कि कोविड -19 और लॉकडाउन के कारण कारोबार पर असर पड़ा है। कम्पनी ने सरकार के सभी निर्देशों का पालन किया है और कार्यालयों में वर्क फ्रॉम होम की छूट तथा सभी सुविधाएँ दी गयी हैं। निर्माण इकाईयाँ लम्बे समय़ तक बन्द रहने के कारण उत्पादन तथा विक्रय पर असर पड़ा है। सरकार, अंशधारकों का सहय़ोग मिला है। चालू वित्त वर्ष के क्वार्टर फोर में नेट रेवेन्यू 734 करोड़ रहा जो कि पिछले साल 915 करोड़ रुपये था। ईबीआईडीटीए 241 करोड़ रुपये से घटकर 161 करोड़ रुपये रह गया। नेट प्रॉफिट 119 करोड़ से घटकर 80 करोड़ रह गया है। सालाना नेट रेवेन्यू 3 प्रतिशत कम हो गया औऱ 3385 करोड़ रुपये से घटकर 3272 करोड़ रुपये रह गया है मगर सालाना नेट प्रॉफिट 13 प्रतिशत बढ़कर 407 करोड़ रुपये हो गया है।
कोविड -19 के बाद न्यू नॉर्मल के लिए कोटाक ने जारी किया गीत
कोलकाता : कोविड -19 के बाद एक सुरक्षित जीवन के लिए भारतीय़ों को तैयार करने की दिशा में कोटाक महेन्द्रा बैंक ने एक नयी पहल की है। कोटाक महेन्द्रा ने ‘ओ जज्बाती भारतवासी, मन की लगाम को आज तू कस ले…तेरे चरण कमल काबू में रख ले’ नामक गीत के माध्यम से जोशीले और मजेदार अन्दाज में स्थितियों के अनुसार कदम उठाने की बात की है। यह एक पार्श्व गीत है जो एनिमेटेड है और प्रख्यात संगीतकार व निर्माता राम सम्पत द्वारा सुरबद्ध किया गया है। गीत तीन बार के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गीतकार स्वदानन्द किरकिरे ने लिखा है। वीडियो का प्रारूप कार्टव्हील क्रिएटिल कन्सल्टेंसी का है और एनिमेशन प्लान्टन कलेक्टिव ने डिजाइन किया है। सावधान सिंह और विश्राम सिंह..वीडियो में दो एनिमेटेड किरदार हैं। कोटाक महिन्द्रा समूह के अध्यक्ष तथा मुख्य विपणन (मार्केटिंग) अधिकारी कर्थी मर्शन ने कहा है कि इस उत्साहजनक गीत के माध्यम से लोगों को अनुभवों से सबक सीखकर आगे बढ़ने की बात की गयी है।
कोविड -19 के बाद की स्थिति और सीएसआर पर वेबिनार
कोलकाता : कोविड -19 के बाद की स्थिति और सीएसआर (कॉरपोरेट जगत के दायित्व) को लेकर हाल ही में एक वेबिनार आयोजित किया गया। भवानीपुर एडुकेशन सोसायटी कॉलेद द्वारा लॉक डाउन के आर्थिक दुष्प्रभाव को देखते हुए आयोजित इस वेबिनार में इन मुद्दों पर गहन चर्चा की गयी। गौरतलब है कि सीएसआर पर अभी तक इस प्रकार का कोई पारदर्शी मंच नहीं है जिस पर विद्यार्थी पेशेवर लोगों से संवाद तथा सम्पर्क कर सकें। विद्यार्थियों के लिए यह ऐसा विषय है जिससे निपटना मुश्किल है। कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व से सम्बन्धित कई विरोधाभास दूर करने का प्रयास भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने किया। इस वेबिनार में आईसीएसआई (ईआईआरसी) के वाइस चेयरमैन सुधीर बांठिया, आईसीएसआई (ईआईआरसी) के चेयरमैन प्रियदर्शी नायक समेत अन्य अतिथि उपस्थित रहे। अन्य वक्ताओं में सीएस स्नेहा अग्रवाल, सीए प्रीति मोदी, सीए विवेक पटवारी, सीएस मोहित शॉ, शिक्षक संयोजक शामिल रहे। स्वागत भाषण प्रो. दिलीप शाह ने किया औऱ कर्मचारियों की छंटनी, वेतन कटौती औऱ अर्थव्यवस्था में आई मंदी जैसी समस्याओं पर चर्चा की। वेबिनार का आयोजन प्रो. दिलीप शाह, प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी, डॉ. वसुन्धरा मिश्र औऱ दिव्या पी. उडीसी के सान्निध्य में हुआ। जूम मीटिंग में विद्यार्थियों ने प्रश्न भी पूछे। एक्सप्रेशन कलेक्टिव की छात्रा सिद्धि पंचोली ने रिपोर्टिंग की। यह जानकारी डॉ. वसुन्धरा मिश्र ने दी।
विश्वस्तर पर सराहा गया एचआईटीके के पूर्व छात्र का शोध कार्य
कोलकाता : हेरिटेज इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एचआईटीके) के पूर्व छात्र स्वप्नदीप पोद्दार का शोध आलेख विश्वस्तर पर सराहा गया है। स्वप्नदीप एक अनोखे शोध दल का अंग है। इस शोध का नाम सुपर ह्यूमन बायोमेट्रिकल आई विद के हेमिस्फेरिकल नैनोवायर अरे रेटिना और रोबोटिक्स में इसका उपयोग है। हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में यह शोध प्रो. फैन झियॉन्ग के नेतृत्व में हो रहा है। स्वप्नदीप ने वर्ष 2016 में एचआईटीके से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यीनिकेशन इंजीनियरिंग में बी.टेक किया था और इस समय हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में पीएचडी कर रहा है।
प्रकाशित आलेख का लिंक यह रहा
https://www.nature.com/articles/s41586-020-2285-x
टेक्नो इंडिया द्वारा आयोजित सबसे बड़ा वर्चुअल हैकाथॉन
कोविड – 19 के बाद की स्थितियों की तैयारी
कोलकाता : इस समय लॉकडाउन के कारण सभी शिक्षण संस्थानों के लिए कक्षाओं का संचालन एक बड़ी समस्या बन गया है। शिक्षण संस्थानों को न सिर्फ ऑनलाइन कक्षाएँ करवानी पड़ रही हैं बल्कि संरचना में भी बदलाव करना पड़ रहा है। टेक्नो इंडिया ने इस स्थिति में सकारात्मक समाधान खोजने शुरू कर दिये हैं। टेक्नो इंडिया की सस्टेनिबिलिटी डायरेक्टर पॉ़लिन लारावोयेर के सामने भी यह एक बड़ी चुनौती थी। लारावोएय समूह के निदेशक (ग्लोबल ऑपरेशन) मेघदूत रायचौधरी के साथ मिलकर फ्यूचर -प्रूफ वर्चुअल हैकाथॉन 2020 का आयोजन करने का निर्णय लिया। यह हैकाथॉन सबके लिए उपलब्ध होगा यानी इसमें कोई भी भाग ले सकता है। यह 25 मई से 27 मई तक चलेगा। टेक्नो इंडिया समूह के चेयरमैन डॉ. गौतम रायचौधरी के मुताबिक फ्यूचर – प्रूफ हैकाथॉन अपने आप में काफी अलग होने वाला है। इससे मेधावी विद्यार्थियों को दीर्घावधि इन्टर्नशिप. रोजगार और उच्च शिक्षा के अवसर मिल सकते हैं। मेघदूत रायचौधरी के नेतृत्व में टेक्नो इंडिया फ्य़ूचर – प्रूफ लैब्स भी स्थापित कर रहा है जिसके तहत मेधावी विद्यार्थियों की तलाश की जायेगी और उनको तराशना भी समूह का लक्ष्य है। उनको स्थायी रोजगार तथा उद्यम की आजादी मिलेगी। फ्यूजर प्रूफ हैकाथॉन का विजेता फ्यूचर -प्रूफ लैब में प्रवेश पाने वाले पहला व्यक्ति भी बन सकेगा।
आपके व्यापार के लिए कौन सा सोशल मीडिया मंच सही है, इसका चयन आप कैसे कर सकते हैं?

रास्ते आसान हो जाते हैं. जब कोई राह बताने वाला हो…और यह तभी होगा जब कोई ऐसा मंच अथवा माध्यम हो…जब परामर्श सही जगह पर और सही समय पर पहुँचे। शुभजिता का प्रयास हमेशा से ही ऐसी सकारात्मकता को आगे ले जाना रहा है तो हमने की है इस स्तम्भ की शुरुआत विशेषज्ञ परामर्श..। इसके तहत अलग – अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों के परामर्श आपके लिए लाने का प्रयास रहेगा। शुभ सृजन सम्पर्क में पंजीकरण करवाने वाले विशेषज्ञों को आप तक पहुँचाया जायेगा और हमारा प्रयास इससे भी आगे होगा। व्यवसाय के प्रसार के लिए एक ठोस रणनीति जरूरी है औऱ जरूरी है सही तरीके से उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से व्यवसाय का प्रचार। यह हर तरीके के पेशेवर क्षेत्र में कारगर है, किसी भी स्टार्टअप, व्यवसाय या संस्थान के सिए जरूरी है। तुरिया कम्युनिकेशन एलएलपी की सह संस्थापक, संध्या सुतोदिया बता रही हैं ऐसे ही अवसर के बारे में।अगर आपके पास कोई प्रश्न हों, अपने प्रश्न आप हमारे सोशल मीडिया पेज पर भी भेज सकते हैं या शुभजिता को टैग करके अपनी बात कह सकते हैं –
लेखिका तुरिया कम्युनिकेशन एलएलपी की सह संस्थापक हैं
सम्पर्क- फोन: +91 89815-92855 / 9748964480
ई मेल : sandhya@ turiyacommunications.com [email protected]
वैदिक साहित्य और हम
हमारी परम्परा…हमारे प्राचीन साहित्य में छिपी है..वह साहित्य, जिसे हम पुरातन समझते हैं और जिसे पीछे छोड़ आये हैं। हम सब जानते हैं कि संस्कृत देवभाषा है मगर संस्कृत को आज की भाषा बनाने की जरूरत है….विज्ञान और तकनीक से जोड़ने की जरूरत है औऱ हिन्दी को भी इसकी ही जरूरत है। हुआ यह कि इसे हमने सिर्फ ‘धार्मिक भाषा ‘समझकर छोड़ दिया जबकि इसमें हमारी जीवनशैली, इतिहास, समाज, उपलब्धि सब समाहित है। जब कोई भाषा किसी एक वर्ग की सम्पत्ति समझकर छोड़ दी जाती है तो जनता से वह दूर हो जाती है…और उसके बाद होती है उस भाषा के साहित्य और उसकी मूल चेतना से छेड़छाड़। गलत को सही बताने के लिए बहुत कुछ जोड़ दिया जाता है और बहुत कुछ सुनियोजित तरीके से छोड़ दिया जाता है जबकि परम्परा को तार्किक तरीके से देखा जाए और सही बातों को चुनकर रूढ़ियों को छोड़ा जाए तो यही भाषा और उस भाषा का साहित्य हमारी राह को आसान कर सकता है। अच्छी बात यह है कि संस्कृत साहित्य को सरल हिन्दी में समझाने के लिए कई संस्थान काम कर रहे हैं। वैदिक साहित्य को लेकर भी काम हो रहा है मगर चयन का आधार बगैर तर्क के नहीं हो सकता क्योंकि विश्वास का आधार अगर तर्क नहीं होगा तो संशय और भटकाव बने रहेंगे। हम वही लें जो आज के युग के अनुरूप हो…और वह खोजें जो कहीं छिपा या छिपाया गया है। यही कारण है कि शुभजिता उसी प्राचीन धरोहर को आपके सामने रखने जा रही है…वैदिक और संस्कृत साहित्य और इससे सम्बन्धित जानकारी। ऋषिका परम्परा…और ऐसा ही तथ्य हम आपके लिए खोजकर लाएँगे…हमारे केन्द्र में स्त्रियाँ रहेंगी क्योंकि बात उन पर भी होगी। पहली कड़ी में जानिए वेद औऱ वैदिक साहित्य के बारे में –
याज्ञवल्क्य स्मृति में ज्ञान के चौदह सूत्रों का उल्लेख है। वे हैं – वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद), वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष), पुराण, न्याय, मीमांस और धर्मशास्त्र।
पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्रांग मिश्रिता:। वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥
– याज्ञवल्क्य स्मृति
मुण्डकोपनिषद् में एक बहुत ही रोचकरूप में विद्या को दो प्रकारों में विभाजित किया है – परा और अपरा।
द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ 4॥
तत्रापरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः
शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति ।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ 5॥
– मुण्डकोपनिषद्
ज्ञान अपरा विद्या के अन्तर्गत आता है। वेद शास्त्र हैं और वेदांग वैदिक-सहायक विज्ञान हैं जो ध्वन्यात्मक/स्वर विज्ञान से सम्बन्धित है। वैदिक शास्त्र चार भागों मे विभाजित हैं- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद। प्रत्येक शाखा के लिए विशेष वैदिक व्याकरण का नियम हैं जिन्हें प्रातिशाख्य कहते हैं और उच्चारण से सम्बन्धित नियमों को शिक्षा के रूप में जानते हैं। मीमांसा सूत्र वैदिक पाठ की व्याख्या के लिए नियमों का वर्णन करता हैं, न्याय और वैशेषिक सूत्र (तर्क ,अस्तित्वता एवं ज्ञान मीमांसीय विषय सम्बन्धित), पुराण वेदों के संदेशों और शिक्षाओं का वर्णन करते है, धर्म सूत्र सार्वभौमिक सद्भाव के लिए आचार संहिता का वर्णन करता है।
वेद माननीय सभ्यता के अभिन्न ज्ञान -विज्ञान, परम्परा और संस्कृति का स्रोत है। यह प्राचीनकाल से विद्यमान लौकिक ज्ञान के आसुत ज्ञान का मौखिक संकलन है। इनका परिचय न केवल शास्त्र से है अपितु भारतीय संस्कृति और मानव सभ्यता के प्रमुख स्रोत के रूप में भी जाना जाता है।
1. ‘वेद’ शब्द का अर्थ
‘वेद’ शब्दका अर्थ ‘ज्ञान’ है। यह शब्द संस्कृत के मूल ‘विद्’ धातु से घञ् प्रत्यय करने पर निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है ‘जानना’। यह किसी एक विशेष साहित्यिक कार्य का उल्लेख नहीं करता है, अपितु साहित्य के एक विशाल कोष को दर्शाता है, जो अनेकानेक शताब्दियों में अभिवृत हुआ और जिसे मौखिक रूप से एक पीढी से दूसरे पीढ़ी को हस्तान्तरित किया गया। वेद को ‘श्रुति’ कहते हैं अर्थात् ‘श्रवण’ करना होता है जहाँ कालोपरान्त प्रकट ऋषि रचित स्मृति वेदो का पुनः स्मरण करते हैं। यह मुख्य रूप से मौखिक-कर्ण विधि का उल्लेख करता है जो इसके लिए प्रयोग किया जाता था (और है)।
भारतीय पारम्परिक विचारों के अनुसार ‘वेद’ को प्रकट ग्रन्थ, स्व-साक्ष्य और आत्म प्रमाणित माना जाता है। यह किसी भी मानव द्वारा रचित नहीं है। वैदिक मन्त्र (सूक्त) या छन्द (मन्त्र) केवल ऋषियों (ऋषियों) द्वारा देखे और बोले गए हैं। ये द्रष्टा (ऋषि) न तो मंत्रों के लेखक हैं और न ही वे मंत्रों की विषय-वस्तु के लिए उत्तरदायी हैं। वेद के सबसे प्राचीन व्याख्याकार यास्क हैं जिन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि इन दृष्टाओं का पात्र केवल ज्ञान प्राप्ति मात्र ही है अथवा इनको ज्ञान अनुभूत हुआ। तत्पश्चात् मौखिक रूप से इस अनुभूत ज्ञान को वंशजों को सौंप दिया। महान वैदिक टीकाकार सायण ने वेद की एक परिभाषा दी है
‘इष्टप्राप्ति- अनिष्ट-परिहारयोः यो लौकिकम्-उपायं यो ग्रन्थो वेदयति स वेदः’
इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट का परिहार जिस ग्रन्थ के माध्यम से होता है वह वेद है। यह परिभाषा वेद के उद्देश्य को प्रस्तुत करती है। एक अन्य परिभाषा, ऋषि आपस्तम्भ के अनुसारवेद मंत्रों और ब्राम्हणों का सम्मिलित रूप है।
मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्॥
यह परिभाषा ‘वेद’ के रूप का वर्णन करती है क्योंकि इसे मुख्य रूप से इन दो विशिष्ट भागों में विभाजित किया जा सकता है- मंत्र और ब्राह्मण। जिसके अनुसार, मंत्र भाग वेद का मुख्य भाग है और वेद के मंत्रहीन भाग ब्राम्हण भाग के अन्तर्गत आता है। यहां यह जानना रोचक है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वेद की कई प्राचीन परिभाषाएं, इसके महत्त्व, रूप या सामग्री को दर्शाती हैं। आम तौर पर ’वेद’ शब्द बोलना उच्चतम, पवित्र, शाश्वत और दिव्य ज्ञान के साथ-साथ उस ज्ञान को ग्रहण करने वाले ग्रंथों को दर्शाता है।
2. वेद का महत्त्व
वेद का महत्व बहुआयामी है
1. वेद उपलब्ध ग्रंथों में सबसे प्राचीन, सर्वप्रथम एवं सर्वस्वीकृत गन्थ है।
2. संस्कृत भाषा में गद्य और कविता के रूप में वेद को सर्वोपरि ज्ञान माना गया है। ऐसा प्रतीत होता हैकि इसका आधिपत्य कई युगोंसे निर्विवाद रहा है, और यह धार्मिक दार्शनिक या सामाजिक रीतियों के विवादों का अन्तिम निर्णायक है। ‘आस्तिक’ शब्द का उपयोग भारतीय दर्शन की उन प्रणालियों के लिए किया जाता है, जिनका वेद के अधिकार पर विश्वास है और ‘नास्तिक’ शब्दका उपयोग भारतीय दर्शन की उन प्रणालियों के लिए किया जाता है, जिनका वेद के अधिकार पर विश्वास नहीं है।
3. हिन्दुओं के धर्म एवं संस्कृति का मूल आधार वेद है। वर्तमान में भी उनकी पूजा आराधना विधि ,संस्कार एवं दृष्टिकोण वेद से प्रभावित है।
4. वेद में उच्चतम आध्यात्मिक ज्ञान (परा विद्या) के साथ-साथ दुनिया का ज्ञान (अपरा विद्या) भी शामिल है। अतः दर्शन के अतिरिक्त हमे इसमें विज्ञान,चिकित्सा, राजनीति विज्ञान, मनोविज्ञान, कृषि, काव्य, कला, संगीत इत्यादि अन्य विभिन्न विषयों का वर्णन हमें प्राप्त होता है।
5. वेद अपनी पवित्रता और निर्मलता में अद्वितीय है। वेद का पाठ सहस्रों वर्षों के पश्चात् भी किसी भी परिवर्तन या प्रक्षेप के बिना अपने शुद्ध और मूल रूप में संरक्षित है। वेद सच्चे ज्ञान का एकमात्र विशुद्ध अन्तर्धन है। इतना ही नहीं यूनेस्को ने भी इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का भाग घोषित किया है।
6. वैदिक भाषा शैली सूक्ष्म एवं संक्षिप्त अभिव्यक्ति की अवधारणा है। प्रायः इसमें गहरे गूढ़ अर्थ मिलते हैं जो रहस्यमयी सत्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं| वैदिक द्रष्टाओं के तात्कालिक उत्तराधिकारियों से लेकर हमारे समय तक के ज्ञानियों का एक मात्र गहन अध्ययन वेद में गुप्त सर्वोत्तम सत्य का रहस्योद्घाटन रहा है। यही कारण है कि कई टीकाएँ और संदर्भ-पुस्तकें वेद और वैदिक अवधारणाओं को समझने के लिए प्राचीन और आधुनिक विद्वानों द्वारा लिखी गई हैं। यह विशाल संदर्भ सामग्री वैदिक ग्रंथों के प्रमुखत्त्व को पुनः रेखांकित करता है।
3. वेद का संरक्षण (वेद पाठ)
वेद के प्राचीनता के पश्चात् भी इसका वास्तविक रूप वर्तमान तक विशुद्ध एवं संरक्षित है। यहां तक कि एक प्रसिद्ध यूरोपीय विद्वान मैक्स मूलर ने भी माना है, “वेदों का पाठ हमें इतनी सटीकता और सावधानी के साथ सौंपा गया है कि शब्दों में यद्यपि ही कोई परिवर्तन हो, या पूरे वेदों में कोई अनिश्चित पहलू हो”।
इसका श्रेय वैदिक दृष्टाओं (ऋषियों) को जाता है, जिन्होंने अपने समस्त ज्ञान के द्वारा वेद के पाठ की रक्षा और संरक्षण के साधनों को विकसित किया। वैदिक मंत्रों में उच्चारणविधि (स्वर) होते हैं जो शब्द के मूल रूप को संरक्षित करते हैं-
मंत्रो को कण्ठस्थ करने हेतु निम्नलिखित तीन प्रकृति पाठ होते हैं:
1. संहिता-पाठ – जिस में मंत्र अपने वास्तविक रूप में रहता है।
2. पदपाठ- जिस में मंत्र के प्रत्येक शब्द का अलग से उच्चारण होता है।
3. क्रमपाठ- जिस में मंत्र के दो शब्दों को संयुक्तरूप से उच्चारण किया जाता है जैसे क-ख, ख-ग
वेद को कण्ठस्थ करने हेतु निम्नलिखित आठ विकृति पाठ हैं-
1. जटा पाठ
2. माला पाठ
3. शिखा पाठ
4. रेखा पाठ
5. ध्वज पाठ
6. दण्ड पाठ
7. रथ पाठ
8. घन पाठ
इन में घन पाठ सब से कठिन और सब से बडा है।
दूसरे चरण में ‘अनुक्रमाणि’ नामक ग्रंथ उत्पन्न हुए जिस में ऋषि, देवता, छंद के नाम का उल्लेख वेदों के प्रत्येक मंत्र के संदर्भ में किया गया। छन्दानुबन्ध से मंत्रो का संरक्षण होता है। ए. ए. मैकडोनेल ने अपने ‘हिस्ट्री ऑफ़ संस्कृत लिटरेचर’ में सही ढंग से यह बताया है- उस दूरस्थ समय से, इस तरह का देखभाल दिया गया कि वेदों के पाठ में कोई बदलाव नहीं हुआ है जो ऐतिहासिक रूप से अतुलनीय है।
4. वेद का अनन्त काल (अपौरूषेयता)
वेद किसी भी मनुष्य द्वारा रचित नहीं है, यह अपौरूषेय है। मीमांसा में कहा गया है कि अपौरूषेयं वाक्यं वेदः। वेद के ज्ञान को ऋषियों ने अंतश्चक्षुओं के द्वारा साक्षात् किया है, ऋषयोः मन्त्र द्रष्टारः। महान् प्रकाशकों की अन्य सभी रचनाएँ पौरुषेय की श्रेणी में आते हैं और इसीलिए उन्हें उनके सम्बन्धित नामों से जाना जाता है। ऋग्वेद में वेद को शाश्वत और अपौरुषेय के रूप में वर्णित किया गया है।
‘वाचा विरूपा नित्यता’ (ऋग्वेद 8.76.6)
इसी प्रकार उपनिषद् कहता है कि वेद उस ‘परम ब्रह्म’ के अवसान (नि:शवास) की समान ही है। वे परब्रह्म के बहिस्वास है, अतः वेद भी परब्रह्म के समान ही शाश्वत है।
वेदों की अपौरुषेयता एवं वाक् के विभिन्न स्तर_प्रो॰ हृदयरंजन शर्मा (MP3)
वैदिक भाषा का काल_प्रो॰ गयाचरण त्रिपाठी (MP3)
5. वेदों की काल गणना
अब किसी को संदेह नहीं है कि ऋग्वेद मानव का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ है, लेकिन ऋग्वेद या वेद की काल गणना निर्धारित करना सबसे कठिन कार्य है। इस पहलू की कई समस्याएं हैं, जैसे-
1. शिलालेख, मुद्रा आदि के रूप में कोई बाह्य प्रमाण की अनुपलब्धता।
2. वैदिक ग्रंथों में तिथियों का उल्लेख नहीं है।
3. अपौरूषेयता का सिद्धांत वेद को शाश्वत मानता है।
4. वेदों में उपलब्ध वैदिक खगोलीय गणनाएं बहुत स्पष्ट नहीं हैं।
5. भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों का दृष्टिकोण इस विषय पर भिन्न है।
वेद की काल गणना के प्रश्न पर, एकमात्र स्रोत जो बना हुआ है, वह साहित्यिक साक्ष्य है, जिस पर तथा कथित साहित्यिक या भाषा आधारित सिद्धांत हैं। अन्य सिद्धांत कुछ मान्यताओं पर आधारित हैं जिन्हें अभी तक निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका है। मैक्स मूलर ने अपनी पुस्तक ‘फिजिकल रिलिजन’ (P.18) में कहा है, ” चाहे वैदिक मंत्र 1000 या 1500 या 2000 या 3000 ईसा पूर्व में रचे गए हों, प्रत्येक पर कोई शक्ति कभी भी ठीक नहीं हो सकती”, निश्चित रूप से वैदिक ज्ञान काल गणना एवं समय से परे है अतः शाश्वत एवं सार्वभौमिक है। जब हम वेदों की काल गणना की बात करते हैं, तो हमारा उदेद्श्य मुख्यतः वैदिक ग्रंथों की व्यवस्था और रचना की अवधि निर्धारित करना है। एशिया माइनर में पाए गए बोगज़्कोइ शिलालेख (1400 ई.पू.) में चार वैदिक देवताओं का उल्लेख है, इसलिए हम 1400 ईसा पूर्व वैदिक युग की नवीनतम सीमा पर विचार कर सकते हैं। परन्तु वेदों की काल गणना के बारे में अंतिम शब्द कहा जाना अभी शेष है।
इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण विचार समस्या की जटिलता को दिखाने के लिए एक तालिका में संक्षेप रूपसे प्रस्तुत किए गए हैं:
विद्वान् का नाम काल गणना का आधार वेद की काल गणना
1. स्वामी दयानन्द सरस्वती वेद मंत्र सृष्टि की शुरुआत से
2. दीनानाथ शास्त्री एस्ट्रोनॉमी 3 लाख साल पहले
3. अविनाश चंद्र दास जियोलॉजी 25000 ईसा पूर्व
4. बालगंगाधर तिलक एस्ट्रोनॉमी 6000 ईसा पूर्व
5. आर जी भण्डारकर वैदिक मंत्र 6000 ईसा पूर्व
6. शंकर बालकृष्ण दीक्षित एस्ट्रोनॉमी 3500 ईसा पूर्व
7. एच जैकोबी एस्ट्रोनॉमी 4500 ईसा पूर्व
8. एम विंटरनित्ज बोगज़कोइ 2500 ईसा पूर्व
9. एफ मैक्समूलर बुद्धिस्ट लिट्रेचर 1200 ईसा पूर्व
6. वैदिक साहित्य का वर्गीकरण
मुख्य रूप से वैदिक साहित्य (अपरा विद्या) को दो श्रेणियों में रखा गया है:
वेद
वेदांग
‘वेद’ चार वेदों को प्रदर्शित करने वाला एक सामूहिक शब्द है –
ऋग्वेद
यजुर्वेद
सामवेद
अथर्ववेद
इन चार विभिन्न वेदों के कारण, प्रायः वेद को बहुवचन में कहते हैं। चार वेदों में साहित्यिक कार्यों के चार विभिन्न वर्ग शामिल हैं। इनमें से प्रत्येक वर्ग के लिए अधिक या कम संख्या में विभिन्न कार्य हैं, जिनमें से कुछ को उनके वास्तविक रूप में संरक्षित किया गया है, लेकिन कई समय में विलुप्त हो गए हैं। ये चार वर्ग हैं:
संहिता
ब्राह्मण
अरण्यक
उपनिषद्
अरण्यकों और उपनिषदों को ब्राह्मण ग्रन्थों के अन्तर्गत माना जाता है अन्यथा ये भिन्न नहीं है।
वेद का गूढ रहस्य अर्थ ग्रहण हेतु वेदांगो में छः ज्ञान धाराएं सम्मिलित हैं –
शिक्षा
कल्प
व्याकरण
निरुक्त
छन्द
ज्योतिष
इसके अतिरिक्त, प्रत्येक वेद के उपवेद भी है जो वैदिक ज्ञान के स्रोत हैं-
ऋग्वेद > आयुर्वेद
यजुर्वेद > धनुर्वेद
सामवेद > गान्धर्ववेद
अथर्ववेद > अर्थशास्त्र
वेद मुख्य रूप से यज्ञ (आराधना पद्धति) करने के लिए है। जैसा उद्धृत किया गया है
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ता कालानुपूर्व्याभिहिताश्च यज्ञाः I
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञम् II
-वेदांग ज्योतिष
यज्ञों को दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है-
हविर्यज्ञ और सोम यज्ञ
विशेष रूप से विज्ञान, गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, वास्तुकला, न्याय प्रणाली, धातुकर्म, पारस्परिक भाषा शास्त्र,पर्यावरण अध्ययन, विमान-विद्या, ज्योतिष, अनुष्ठान आदि के क्षेत्र में आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान की दृष्टि से वैदिक ज्ञान को समझने के उद्देश्य से एक प्रयास किया गया है।
शुभजिता क्लासरूम – हिन्दी व्याकरण
पाठ – स्वर एवं व्यंजन ध्वनियाँ
शिक्षिका – डॉ. वसुन्धरा मिश्र
इग्नू, एम एच डी 7
अंधकार से जूझना है

न जाने कब से मनुष्य के अंतरतर से ‘दीन रट’ निकलती रही : मैं अंधकार से घिर गया हूँ, मुझे प्रकाश की ओर ले चलो – ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय।’ परंतु यह पुकार शायद सुनी नहीं गई – ‘होत न श्याम सहाय।’ प्रकाश और अंधकार की आँखमिचौनी चलती ही रही, चलती ही रहेगी। यह तो विधि विधान है। कौन टाल सकता है इसे।
लेकिन मनुष्य के अंतर्यामी निष्क्रिय नहीं है। वे थकते नहीं, रुकते नहीं, झुकते नहीं। वे अधीर भी नहीं होते। वैज्ञानिक का विश्वास है कि अनंत रूपों में विकसित होते-होते वे मनुष्य के विवेक रूप में प्रत्यक्ष हुए है। करोड़ों वर्ष लगे हैं इस रूप में प्रकट होने में। उन्होंने धीरज नहीं छोड़ा। स्पर्शेन्द्रिय से स्वादेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रिय की ओर और फिर चक्षुरिन्द्रिय और श्रोत्रियेन्द्रिय की ओर अपने आपको अभिव्यक्त करते हुए मन और बुद्धि के रूप में आविर्भूत हुए हैं। और भी न जाने किन रूपों में अग्रसर हों। वैज्ञानिक को ‘अंतर्यामी’ शब्द पसंद नहीं है। कदाचित वह प्राणशक्ति कहना पसंद करे। नाम का क्या झगड़ा है?
जीव का काम पुराकाल में स्पर्श से चल जाता था, बाद में उसने घ्राणशक्ति पाई। वह दूर-दूर की चीजों का अंदाजा लगाने लगा। पहले स्पर्श से भिन्न सब कुछ अंधकार था। अंतर्यामी रुके नहीं। घ्राण का जगत, फिर स्वाद का जगत, फिर रूप का जगत, फिर शब्द शब्द का संसार। एक पर एक नए जगत उद्घाटित होते गए। अंधकार से प्रकाश, और भी, और भी। यहीं तक क्या अंत हैं? कौन बताएगा? कातर पुकार अब भी जारी है – ‘तसमो मा ज्योतिर्गमय’। न जाने कितने ज्योतिलोक उद्घाटित होने वाले हैं।
कहते हैं, और ठीक ही कहते होंगे, कि मनुष्य से भिन्न अवर सृष्टि में भी इंद्रियगृहीत बिंब किसी-न-किसी रूप में रहते हैं, पर वहाँ दो बातों की कमी है। इन बिंबों को विविक्त करने की शक्ति और विविक्तीकृत बिंबों को अपनी इच्छा से – संकल्प पूर्वक – नए सिरे से नए प्रसार-विस्तार या परम्युटेशन कॉम्बिनेशन की प्रक्रिया द्वारा नई अर्थात् प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं से भिन्न सारी चीज बनाने की क्षमता। शब्द के बिंबों के विविक्तीकरण का परिणाम भाषा, काव्य और संगीत हैं, रूप बिंबों के विविक्तीकरण के फल रंग, उच्चावचता, ह्रस्व-दीर्घ वर्त्तुल आदि बिंब और फिर संकल्पशक्ति द्वारा विनियुक्त होने पर चित्र, मूर्ति, वास्तु, वस्त्र, अलंकरण, साज-सज्जा आदि। इसी तरह और भी इंद्रियगृहीत बिंबों का विवित्तीकरण, और संकल्प संयोजन से मानव सृष्ट सहस्रो नई चीजें। यह कोई मामूली बात नहीं है। अभ्यास के कारण इनका महत्व भुला दिया जाता है। पर भुलाना चाहिए नहीं। मनुष्य कुछ भुलक्कड़ हो गया है। लेकिन यह बहुत बड़ा दोष भी नहीं है। न भूले तो जीना ही दूभर हो जाए। मगर ऐसी बातों का भूलना जरूर बुरा है, जो उसे जीने की शक्ति देती हैं, सीधे खड़ा होने की प्रेरणा देती हैं।
किस दिन एक शुभ मुहूर्त में मनुष्य ने मिट्टी के दीये, रुई की बाती, चकमक की चिनगारी और बीजों से निकलनेवाले स्रोत का संयोग देखा। अंधकार को जीता जा सकता है। दिया जलाया जा सकता है। घने अंधकार में डूबी धरती को आंशिक रूप में आलोकित किया जा सकता है। अंधकार से जूझने के संकल्प की जीत हुई। तब से मनुष्य ने इस दिशा में बड़ी प्रगति की है, पर वह आदिम प्रयास क्या भूलने की चीज है? वह मनुष्य की दीर्घकालीन कातर प्रार्थना का उज्ज्वल फल था।
दीवाली याद दिला जाती है उस ज्ञानलोक के अभिनव अंकुर की, जिसने मनुष्य की कातर प्रार्थना को दृढ़ संकल्प का रूप दिया था – अंधकार से जूझना है, विघ्न-बाधाओं की उपेक्षा करके, संकटों का सामना करके।
इधर कुछ दिनों से शिथिल स्वर सुनाई देने लगे हैं। लोग कहते सुने जाते हैं -अंधकार महाबलवान है, उससे जूझने का संकल्प मूढ़ आदर्श मात्र है। सोचता हूँ, यह क्या संकल्प शक्ति का पराभव है? क्या मनुष्यता की अवमानना है? दीवाली आकर कह जाती है, अंधकार से जूझने का संकल्प ही सही यथार्थ है। मृगमरीचिका में मत भटको। अंधकार के सैकड़ों परत हैं। उससे जूझना ही मनुष्य का मनुष्यत्व है। जूझने का संकल्प ही महादेवता है। उसी को प्रत्यक्ष करने की क्रिया को लक्ष्मी की पूजा कहते हैं।




