कोलकाता : सांस्कृतिक पुर्निर्माण की ओर से कोरोना काल में हिंदी कविता विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक प्रो. शंभुनाथ ने कहा कि कोरोना ने हमें बिल्कुल एक नई दुनिया में ला दिया है। यह समय अनिश्चिता, संदेह और भय का समय है। अब हमें इन घटनाओं और इस समय के सच के साथ ही जीना होगा। हिंदी कविता ने हमें कोरोना संकट और बंधनों से पार ले जाने का कार्य किया है। हिंदी कविता की प्रतिबद्धता जनसरोकारों के साथ है। कोरोना काल में उपजे अकेलेपन में कविता और टेक्नोलॉजी ने हमें जोड़कर रखा है। प्रो. इतु सिंह ने कहा कि कोरोना काल पर कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि हम जिस धारा में बह रहे हों उस समय उस पर अधिकार पूर्वक कुछ भी कहना संभव नहीं है। बावजूद इसके मैं कोरोना काल में रचित हिंदी कविता को लेकर आश्वस्त हूं। इस काल की कविता में प्रकृति और जीवन को लेकर गंभीर चिंतन दिखता है। डॉ. अवधेश प्रसाद सिंह ने कहा कि कोरोना काल में मनुष्यता पर आए संकट को हिंदी कविता ने बड़ी ईमानदारी और संवेदना के साथ व्यक्त किया है। कवि मृत्यंजय कोरोना काल को एक संभावना काल के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में हिंदी कविता समृद्ध हुई है। प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि कोरोना काल को हिंदी कविता में संकट के समय सृजन का काल कह सकते हैं। इस समय की कविता में कोरोना की भयावहता और व्यवस्था के प्रति आक्रोश के स्वर के साथ प्रवासी मजदूरों की पीड़ा को बेबाकी के साथ व्यक्त किया गया है। इस अवसर पर कर्नाटक, झारखंड, उत्तर प्रदेश के अलावा आसनसोल, मिदनापुर, खड़गपुर, कोलकाता आदि जगहों से भारी बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए प्रो. मधु सिंह ने कहा कि कोरोना काल में हिंदी कविता ने काव्य धर्म का निर्वाह किया है। कार्यक्रम का संयोजन प्रो. राहुल गौड़ एवं धन्यवाद ज्ञापन संस्था के महासचिव डॉ राजेश मिश्र ने दिया।
साहित्यिक चोरी के आरोपों में गुलाबो – सिताबो को क्लीन चिट
स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन जूही चतुर्वेदी के हक में दिया फैसला
कोलकाता : अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘गुलाबो -सिताबो’ प्रदर्शित होने से पहले ही विवादों में है। निर्देशक सुजीत सरकार और निर्माता रॉनी लाहिड़ी के प्रोडक्शन हाउस राइजिंग सन फिल्म्स के बैनर तले निर्मित इस फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा है। आरोपों का जवाब निर्देशक औऱ निर्माता ने दिया है। गौरतलब है कि दिवंगत लेखक राजीव अग्रवाल के बेटे अकीरा अग्रवाल ने इस साहित्यिक चोरी के आरोप लगाये हैं। राजीव अग्रवाल के बेटे अकीरा के अनुसार उनके पिता ने यह कहानी द स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन (एसडब्ल्यूए) द्वारा आयोजित सिनेस्तान इंडियाज स्टोरीटेलर स्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट में जमा की थी। एसडब्ल्यूए स्क्रीन राइटरों और गीतकारों की ट्रेड यूनियन है और इसके प्रमुख अंजुम राजाबली हैं। ज्यूरी में जूही अन्य 2 निर्णायकों के साथ थीं। इसमें 8 पटकथाएँ चुननी थीं और 24 अक्टूबर 2018 को सभी निर्णायकों के पास शॉर्ट लिस्टेड प्रविष्टियाँ आईं और प्रोडक्शन हाउस के अनुसार इसमें अकीरा की कहानी शामिल नहीं थी। 2017 में जूही ने अमिताभ बच्चन को इस वृद्ध के बारे में बताया। अमिताभ को यह विचार पसन्द आया और विषय वस्तु का पंजीकरण मई 2018 में करवाया गया। जूही को संदिग्ध नकल की गयी पटकथा नहीं मिली। इस बात की पुष्टि अंजुम राजाबली और एसडब्ल्यूए ने की है और गत 29 मई को स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन ने जूही के पक्ष में फैसला दिया। वहीं जूही के मुताबिक गुलाबो – सिताबो उनका मौलिक काम है औऱ 2017 में उन्होंने निर्देशक तथा अमिताभ बच्चन के साथ यह विचार साझा किया था। विवादास्पद पटकथा तक उनकी पहुँच सिनेस्तान की प्रतियोगिता के ज्यूरी के रूप में भी नहीं थी और सिनेस्तान ने यह बात स्वीकार की है। जूही के मुताबिक यह विवाद लोकप्रियता पाने का जरिया है।
दादी की ऐनक

खिड़की पर बैठी दादी की ऐनक पूछने लगी
दिखाई नहीं देते अब उस खिड़की के पड़ोसी
कहाँ गए वे दूर से हाथ हिलाते
खिड़की से खिड़की तक पसरा था घर दादी का
मन खुशियों से भर जाता
हर खिड़की खुली रहती
दादी आज नरम पुए बनाए हैं
दो आपके भी
अरे तेरे हाथ में जादू है
तारीफ तो कोई आपसे सीखे
बेटे बहू तो विदेश में हैं
तुम हंसती खिलखिलाती सी मेरी अपनी तो हो
पड़ोसी तो अपने होते हैं
मेरी बहू निश्चिंत है
जो बात तुझमें है किसी में नहीं
मुझमें भी नहीं
खिड़की से आम का पेड़ और वह अमरूद
वह भी तो मेरे साथी हैं
सब काम में व्यस्त हो गए
आज तुम्हारी खिड़की पर कपड़े भी नहीं थे
तुलसी के पौधे पर दीपक न था
पर्दा लगा था
कोई दिखा नहीं
डर लगने लगा था
कोरोना की आहट ने सबके घरों को खटखटा दिया है
लोग भूखे प्यासे अपने घरों की ओर भाग रहे हैं
रोटियां रेल लाइन पर बिखरी पड़ी थी
मजदूरों की लाशों से होकर
बड़ी बड़ी गाड़ियों में बड़े बड़े लोग
उम्मीद और आशाओं को कुचलते हुए निकल रहे हैं
कहीं तुम डर तो नहीं गई
मेहनती और साहसी औरत
खिड़की खोल दे
रोशनी और संगीत को आने दे
तुझसे पहले मेरा नंबर है
देख मेरा इंसुलिन भी नहीं मिला
पुऐ में चीनी भी नहीं थी
खिड़की से मेरा जीवन टिका है
ओह कहीं संक्रमण से ग्रसित तो नहीं
अलग थलग दूर कहीं पटक तो नहीं दिया
घर बंद हो गया
खिड़की भी बंद हो गई
कुहासा ही कुहासा
ऐनक का शीशा कहीं से दरक चुका था
दादी बेसुध बेसुरे बोल बोलती
बंद खिड़की भी बहुत कुछ बोलने लगी
कामवाली ने दरवाजे की चाबी खोली
उसके हाथ से इंसुलिन का इंजेक्शन गिर पड़ा
ये खिड़की भी बंद है
ऑनलाइन कवि सम्मेलन के साइड इफेक्ट: हास्य-व्यंग्य

दबी – दबी ही सही भारतीयों में आस थी कि प्रथम लॉक डाउन खत्म होते ही देश के साथ साथ घर के दरवाजे पर जड़ा लॉक भी खुल जाएगा। ऐसी ‘आस बंधन’ की जद में कोरोना का चाइनीस होना था। हमने सोचा था चाइनीज माल की तरह कोरोना भी चंद दिनों में निपट ही लेगा। लेकिन नहीं ।यह चंद दिनों वाला माल नहीं। यह चांद वाला माल निकला ।
चीनी माल के विषय में जो कहावत है कि ‘चले तो चांद तक, न तो शाम तक’! उसके कारण हमने कोरोना को ‘शाम तक’ समझा, लेकिन यह जुल्मी तो ‘चांद तक’ जाने को ललक रहा! हम भारतीय पहली बार चाइनीज माल के चांद तक जाने से परेशान और दुखी है। सबसे बड़ा दुख और सन्नाटा साहित्य के मंच पर पसरा। कवि, साहित्यकार, बुद्धिजीवियों उर्फ ‘मंच के लाडलो ‘ में लॉक डाउन के कुछ वक्त तक तो निराशा खुड़की, लेकिन जल्द ही वे आशा की अलख जगा उठे। यह अलख – ऑनलाइन लाइव होकर स्वयं के अलाइव होने का प्रमाण देना रहा। यानी लंबे वक्त से मुंह में जमी दही बिलनी शुरू हुई। इसे ग्रामीण परिवेश में ‘थूक बिलोना’ भी कहते हैं। और देखते-देखते लंबे भाषण,गीत, कविता की लंबी चौड़ी दुकानें ज़ूम, फेसबुक लाईव एप पर सजकर जलवे बिखेरने लगे। कविसम्मेलन से अतृप्त आत्माएं महाकविसम्मेलन करवाने लगी। महाकवि सम्मेलन हो और महाकवयित्रियां कैसे न निमंत्रित हों! सो हुई! काव्य पाठ भी हुआ । ऐसे ही एक ऑनलाइन काव्य पाठ के बाद जो कवि के ‘जी’ में हुआ उसे कवि ने बेलौस अपनी कवयित्री के नाम पत्र लिखा जिसका मसौदा कुछ यूं था –
हे नव किस्म के सौंदर्य से युक्त प्राण प्रिय! मेरा प्रेम भरा नमस्कार स्वीकार करो! हालांकि भविष्य में यह प्रेम बरकरार रहेगा इसमें तनिक संदेह है! प्रिय ! आज कितने दिनों बाद तुम्हें देखा था। मैं लैपटॉप के इस पार था और तुम उस पार थी, बावजूद में डर गया था। क्या तुम वही हो जो मंच पर इठलाती,बलखाती हुई साड़ी का पल्लू लहराती मेरी कविता की प्रेरणा हुआ करती थी?.. प्रेरणा तो तुम अब भी रहोगी! लेकिन यह संदेह है कि कहीं मेरी कविता का श्रंगार रस भयानक रस में तब्दील ना हो जाए! सच कहूं! मुझे कभी लगा ही नहीं कि 21वीं सदी में ऐसा कोई वक्त आएगा जब ब्यूटी पार्लर बंद हो जाएंगे और मेरी प्रेरणा का सौंदर्य इस कदर खुलकर बाहर आएगा?
तुम्हारे लाल होठों पर नारंगी लिपस्टिक के सीमांत मुझे राजपूती शान की याद दिला गए। मुझे कहने में गुरेज नहीं कि तुम्हारे अपरलिप्स और राजपूती मूछें एक दूसरे से स्पर्धा करती दिखीं! मुझे मालूम है तुम माथे बड़ी बिंदी लगाती थी। आज भी लगाई थी लेकिन आज तुम्हारी बढ़ी हुई आइब्रो की लंबाई और चौड़ाई बिंदी पर इस कदर हावी थी मानो आकाश में विचरती घमंडी काली घटा सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए ध्रुव तारे को आज ही निपटाकर दम लेगी।।प्रिय! बिना फेशियल तुम्हारे मुख रूपी चंद्रमा पर पड़ी झुर्रियां मुझे चरखा कातती बुढ़िया का सूत नहीं बल्कि रेगिस्तान में चलते किसी विषधर जैसी लग रही थी, जिसकी फुंकार मुझ समेत मेरे लैपटॉप तक ने महसूसी। एक जमाने में तुम्हारी घनेरी अलक समेत पलक की जो कालिमा मेरे जीवन के अंधकार को हरने के लिए थी, आज वह झक्क सफेद होकर सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है मनवाने में तत्पर दिखीं, जो मैं मानना नहीं चाहता। इतना ही नहीं, वैक्सिंग के अभाव में तुम्हारे कपोल पर उग आए काले रोएं मुझे रुलाने के लिए काफी थे।सुनो! खांडव वन को इंद्रप्रस्थ बनते तो सुना था लेकिन यहां तो इंद्रप्रस्थ ही खांडव वन में तब्दील हो रहा है। तुम ही बताओ प्रिय! तुम्हारे सौंदर्य की यह तब्दीली कैसे न मुझे गृहस्थ जीवन से मोहभंग और वानप्रस्थ जीवन से मोह कराए। हे प्रिय! पार्लर अभाव तेरी नारी की दोनों मात्राओं को राहु बनकर ग्रस रहा है। तू धीरे धीरे नर रूप में परिवर्तित हो रही है! तुम्हारे जिस अद्भुत सौंदर्य से मैं अभिभूत था उसका प्रतिरूप भूत बन कर मेरी ढिबरी टाइट कर रहा है! तुमसे गुजारिश है कि तुम मेरा काल बनकर आए इस रूप परिवर्तन को संयमित होने को कहो! अन्यथा प्रिय से अप्रिय होने में मात्र ‘अ’ स्वर भर की दूरी ही है।
तुम्हारा तुमसे ही डरा हुआ कवि!😜
मैं भारत हूँ
– बब्बन
(1)
गाँधी, गौतम, नानक , महावीर,
रसखान, रहीम, टैगोर, कबीर।
सूर ,तुलसी, गालिब, मीर।
विद्यापति, हजारिका और नजीर।
कहीं सन्त समागम, कहीं फकीर।
अनेक कला समन्वयों का देश हूँ मैं,
मानवता, सत्य अहिंसा का अविरल,
प्रवाहमान संदेश हूँ मैं।
उपर से शान्त सरोवर सा,
अन्दर अन्दर महाभारत हूँ,
मै भारत हूँ ।
(2)
मेरा जो वर्तमान रुप है,
इसमें छाँव कम , ज्यादे धूप है।
करने को तो एक हूँ,
किम्बदन्तियों में अनेक हूँ।
दूर से सबको पसन्द हूँ,
कहीं खुला तो कहीं बन्द हूँ।
कहीं गद्य तो कहीं छन्द हूँ।
मुझमें कितनी एकता है,
यह खुद मुझे भी नहीं पता है।
कहाँ तल्लीन हूँ, कहाँ विरत हूँ।
मैं भारत हूँ।
(3)
जातिवाद, क्षेत्रवाद, सम्प्रदायवाद में,
पग-पग पर बँटा हुआ हूँ।
धनी, गरीब, पूँजीपति, मध्यवर्ग, निम्नवर्ग,
मजदूर आदि कौमों मे पटा हुआ हूँ।
आरक्षण समर्थक व विरोधियों की लाइन से,
दो भागों में कटा हुआ हूँ।
कहीं कम्युनिस्ट देश, कहीं बुद्धिस्ट देश से,
विश्व नक्शे पर सटा हुआ हूँ।
सीमा पर सैन्य शक्ति से रक्षित,
पर अन्दर कमजोर निहायत हूँ।
कूटनीति बाजों के लिए महारत हूँ।
मैं भारत हूँ ।
(4)
संविधान में, धर्मनिरपेक्ष,
सम्पन्न सम्पूर्ण प्रभुत्व हूँ.
समाजवादी गणराज्य, बन्धुत्व हूँ।
ग्लोब पर अंकित आकृति त्रिभुजाकार हूँ।
सत्ता का अट्ठाहास, मजदूरों का चित्कार हूँ.
अपने को दर्पण मे देखता हुआ,
समकालीन साहित्यकार हूँ।
बुद्ध की मानवता विश्वपटल पर प्रक्षेपित,
गांधी की सत्य अहिंसा से मुख लेपित,
एक मुखौटा सदारत हूँ ।
मैं भारत हूँ।
(5)
मेरी ब्यथा कोई नहीं सुनता,
आजकल सत्ता का चौसर हूँ।
कुत्सित मँसूबे पूरा करने के लिए,
राजनीतिक दलों का अवसर हूँ।
130 करोड़ तथाकथित सन्तानों का सम्बोधन हूँ।
जनता के लिए युधिष्ठिर, सत्ता के लिए दुर्योधन हूँ।
अपनी सीमा पर दुश्मन देशों से,
डरा हुआ हूँ।
आधे भूखे नंगे संतानों के,
चित्कार से ब्यथित हूँ,
समझ नहीं आता, जिन्दा हूँ,
या मरा हुआ हूँ।
संत्रास से भरा हुआ मेरा इतिहास,
जबतक हर पेट को रोटी नहीं,
आत्मनिर्भर कहना मेरा उपहास।
भले, मानवीय मूल्यों का विरासत हूँ।
पूँजीवाद-सत्ता गठजोड़ का तिजारत हूँ।
मैं भारत हूँ।
प्रयागराज/इलाहाबाद
सम्पर्क – 8887750731
भाकर बड़ी

सामग्री : सूजी, मैदा, बेसन, नमक, अजवायन (सभी सामग्रियाँ आवश्यकतानुासार बराबर मात्रा में)
विधि : सबसे पहले हम सुजी ,मैदा ओर बेसन को लेकर कर अच्छी तरह मिला लें। उस में नमक अजवायन लाल मिर्च डालें। थोड़ा सा रिफाइंड तेल डालें और अच्छी तरह से गूँथ लें। एक बड़ी लोई बनाकर उसे रोटी की तरह बेल लें। इस पर कसा हुआ नारियल भर लें। फिर उसका रोल बना लें और छोटी -छोटी लोई काट लें। कड़ाही में रिफाइंड डालें और इसे गर्म होनें दें। तेल गर्म होने पर रोल को उसमें डालें और सुनहरा होने तक तलें। तल जाने पर इसे बाहर निकालें औऱ तेल निकल जाने के बाद सॉस के साथ परोसें।
कबीर पंथ को जानिए
धनिया उगाकर किसान ने गिनीज बुक में बनायी जगह
देहरादून : अल्मोडा जिले के जैविक किसान गोपाल उप्रेती ने 2.16 मीटर लंबा धनिए का जैविक पौधा उगाकर अपना नाम गिनीज बुक आफ ववर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज करा लिया है। उन्होंने गिनीज बुक के पिछले रिकार्ड 1.8 मीटर लंबे धनिए को चुनौती दी थी। उप्रेती ने बताया कि जैविक धनिए की फसल उन्होंने रानीखेत के बिल्लेख क्षेत्र में बिना पॉलीहाउस के उगाई। अल्मोडा के मुख्य उद्यान अधिकारी टीएन पांडे तथा उत्तराखंड आर्गेनिक बोर्ड के रानीखेत के इंचार्ज डा देवेंद्र नेगी द्वारा भी पौधों की लंबाई रिकार्ड की गयी।
उप्रेती ने बताया कि उनके खेत में सेब, आडू, खुमानी, प्लम के साथ ही तरह—तरह की सब्जियां भी उगायी जाती हैं। उन्होंने इस साल अप्रैल माह में गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड के पिछले रिकार्ड को चुनौती दी थी। अल्मोडा के मुख्य उद्यान अधिकारी पांडे ने बताया कि गोपाल उप्रेती ने अपनी मेहनत से यह सफलता पायी है जो अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा का काम करेगी।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी न्यास के नाम से जाना जाएगा अब कोलकाता बंदरगाह न्यास
नयी दिल्ली : सरकार ने बुधवार को कोलकाता बंदरगाह न्यास का नाम बदलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी न्यास करने को मंजूरी दे दी। आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गयी। प्रधानमंत्री ने कोलकाता बंदरगाह की 150वीं जयंती के उद्घाटन समारोह के अवसर पर 12 जनवरी 2020 को कोलकाता बंदरगाह का नाम बदलकर जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर करने की घोषणा की थी।
विज्ञप्ति के मुताबिक कोलकाता बंदरगाह न्यास के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी ने 25 फरवरी 2020 को अपनी बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर विधिवेत्ता, शिक्षक, विचारक और जन साधारण के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बहुआयामी प्रतिभा के धनी के रूप में ध्यान में रखकर कोलकाता बंदरगाह को नया नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी करने की मंजूरी दे दी थी।
कोलकाता बंदरगाह एक प्रमुख बंदरगाह होने के साथ-साथ नदी के किनारे स्थित देश का पहला बंदरगाह है। 1870 के अधिनियम-पांच के अनुसार कलकत्ता बंदरगाह के सुधार के लिए आयुक्तों की नियुक्ति पर 17 अक्टूबर 1870 को इसे एक न्यासट द्वारा संचालित किया गया।
कोलकाता बंदरगाह ने अपनी यात्रा के 150 वर्ष तय किए हैं। यह व्यापार, वाणिज्य और आर्थिक विकास के लिए भारत का मुख्य द्वार है। यह आजादी के लिए भारत के संघर्ष, प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध तथा देश में, विशेषकर पूर्वी भारत में हो रहे सामाजिक-आर्थिक बदलाव का गवाह भी रहा है।
आमतौर से भारत में प्रमुख बंदरगाहों के नाम शहर अथवा उस कस्बे के नाम पर हैं जहां वे स्थित हैं। हांलाकि विशेष मामलों में अथवा जाने-माने नेताओं के योगदान को श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ बंदरगाहों महान राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर नया नाम दिया गया। न्हावा शेवा बंदरगाह को सरकार ने 1988 में जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह न्यासट नाम दिया। तूतीकोरन बंदरगाह न्यासट का नाम बदलकर वर्ष 2011 में वी.ओ. चिदम्बरनार बंदरगाह न्यासट कर किया गया और एन्नौर बंदरगाह लिमिटेड को जाने माने स्वाधीनता सेनानी और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री के.कामराजार के सम्मान में कामराजार बंदरगाह लिमिटेड नाम दे दिया गया। हाल में 2017 में कांडला बंदरगाह का नाम बदलकर दीनदयाल बंदरगाह कर दिया गया। इसके अलावा अनेक हवाई अड्डों के नाम भी भारत के महान नेताओं के नाम पर रखे गए हैं।
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार : मंत्रालय ने समयसीमा 22 जून तक बढाई, स्वयं नामांकन की अनुमति
नयी दिल्ली : खेल मंत्रालय ने राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के लिये आवेदन जमा करने की तारीख 22 जून तक बढा दी है । इसके साथ ही कोरोना वायरस महामारी के कारण लागू लॉकडाउन में प्रस्तावक मिलने में होने वाली कठिनाइयों के मद्देनजर खिलाड़ियों को स्वयं के नामांकन की अनुमति भी दे दी है । नामांकन प्रक्रिया पूरी करने का बुधवार को आखिरी दिन था लेकिन समय सीमा बढा दी गई। इसके साथ ही प्रक्रिया में भी रियायत दी गयी है । मंत्रालय के एक सर्कुलर में कहा गया ,‘‘ हमने पुरस्कार योजना में अधिकारियों या व्यक्तियों की अनुशंसा पर भेजे गए आवेदन ही जमा करने का नियम खत्म कर दिया है । फार्म में इस हिस्से को खाली छोड़ा जा सकता है ।’’
मंत्रालय ने महामारी के कारण इस साल सिर्फ ईमेल से आवेदन मंगवाये थे ।खेल पुरस्कार आवेदन के नियमों के तहत वे ही आवेदन मान्य होते हैं जिनके लिये राष्ट्रीय महासंघ, खेल बोर्ड या पूर्व पुरस्कार विजेताओं ने अनुशंसा की हो । अब रियायत के बाद वे खिलाड़ी भी आवेदन कर सकेंगे जिनके नाम राष्ट्रीय खेल महासंघ ने नहीं भेजे हैं और उन्हें पूर्व विजेताओं से समर्थन भी हासिल नहीं है । हर साल महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन पर 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर ये पुरस्कार दिये जाते हैं ।




