Friday, May 1, 2026
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थप्पड़ का प्रतिवाद

  • शैलेश गुप्ता

करना है प्रतिवाद
तुम्हें उस थप्पड़ का भी
जो मिला था ,
अहिल्या को …
चंद्रमा के कुकृत्य के लिए …
पत्थर बनने का ..!

तुम्हें ही करना होगा …
प्रतिवाद ..
उस थप्पड़ का भी
जो मिला था सीता को
श्री राम से ..
अपनी मर्यादा पुरुषोत्तम की
छवि बनाए रखने के लिए …
अग्नि परीक्षा कराने का …
और ..फिर भी …
गर्भ की अवस्था में
वन में परित्याग करने का …!

नहीं भूलना है तुम्हें …
उस थप्पड़ को …भी ..
जो भरी सभा में …
मिला था द्रौपदी को …
पराक्रमी पतियों के द्वारा …
जुए की शर्त निभाने के लिए ….
चीर हरण का ..!

करो प्रतिवाद तुम …
उस हर थप्पड़ की …
जिसका करती हो ,
सामना राह चलते तुम ….
वासना की दृष्टि में …
गली …मुहल्ले …बस अड्डे ..
चौराहों पर …!

तुम्हारी ख़ामोशी …
लोग शराफ़त नहीं …
कमज़ोरी समझते हैं तुम्हारी …!

नहीं लड़ेगा कोई …
तुम्हारे लिए …
सब कहेंगे …
जाने दो …होता है ये …
सहना पड़ता है …!

यही थप्पड़ वाली …
संस्कृति ही तो …
मिली है तुम्हें विरासत में …!

तो कौन करेगा …प्रतिवाद …
यदि तुम स्वयं नहीं करोगी ..! !

करो प्रतिवाद ..तुम …
अपने भविष्य के लिए …
तोड़ कर अपनी ख़ामोशी को ….

हर उस थप्पड़ का ….

जो सामाजिक हो …या …
न्यायिक हो ….
सांस्कृतिक हो ..या …
आर्थिक हो …

सामूहिक हो …या …
परिवारिक हो …!

तुम्हारा प्रतिवाद ही ….
तुम्हारी आधी जीत है …!

 

1999 के महातूफान की तबाही से लेकर फैलिन तक, देश ने तूफानों से टकराना सीख लिया

भारत की पूर्वी तट वाले राज्यों के लिए अगले 24 घंटे बेहद ही अहम होने वाले हैं। बंगाल की खाड़ी से चला ‘अम्फान’ तूफान बुधवार को पश्चिम बंगाल के दीघा और बांग्लादेश के हटिया द्वीप के तट से टकराया। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा को इस तूफान ने सबसे अधिक प्रभावित किया। केंद्र और राज्य की सरकारें पूरी कोशिश में जुटी हैं कि भारी जान-माल के नुकसान से बचा जाए, क्योंकि जिस 1999 के तूफान से इसकी तुलना की जा रही है, वो बेहद ही गहरा जख्म दे गया था। 1999 के तूफान ने ओडिशा में भयंकर तबाही मचाई थी।

बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा ओडिशा हर साल तूफानों से दो-दो हाथ करता रहता है। मगर 1999 के महातूफान ने राज्य की कमर तोड़ कर रख दी थी। ओडिशा में आए इस महातूफान से गांव के गांव बह गए थे और हजारों लोग बेघर हो गए थे। पुल, सड़कें, रेल यातायात के साथ साथ संचार के सभी साधन ठप पड़ गए थे और 10 हजार से अधिक जिंदगियां इस तूफान ने लील ली थीं।
1999 के अक्तूबर महीने में आए विनाशकारी तूफान से 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। जगतसिंहपुर जिले में सबसे ज्यादा जानमाल का नुकसान हुआ था। बंगाल की खाड़ी से उठा तूफान का बवंडर तब 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पारादीप के निकट तट से टकराया था। समुद्र में कई मीटर ऊंची लहरें उठीं जो तटीय इलाके में बसे कई गांवों को लील गईं। लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिल पाया था।
इस तूफान को 20वीं सदी का सबसे भयंकर तूफान माना गया। इस तूफान ने राज्य को हिलाकर रख दिया था। इसके बाद प्रदेश की सरकार ने तूफानों से निपटने के लिए तैयारियों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। तटीय जिलों में संभावित इलाकों में आश्रयस्थल निर्माण से लेकर मौसम संबंधित चेतावनी के लिए डापलर सेंटर की स्थापना तक की गई। इस तूफान के दौरान 250 किलोमीटर प्रति घंटा से भी अधिक रफ्तार से हवा चली थी, जो इस क्षेत्र के लिए रिकॉर्ड था।

समय के साथ ओडिशा ने तूफानों से टकराना सीख लिया। इसका पहला उदाहरण था फैलिन तूफान। 12 अक्तूबर 2013 को, 260 किलोमीटर प्रति घंटे की तेजी से फैलिन तूफान ओडिशा के गोपालपुर तट से टकराया था। 1999 के बाद प्रदेश के तट से कई तूफान टकराए मगर 2013 में आए फैलिन तूफान ने लोगों के मन में 1999 की याद ताजा कर दी थी। इसकी तीव्रता 216 किलोमटीर प्रति घंटा दर्ज की गई थी।

हालांकि पहले से बरती गई सावधानी के कारण फैलिन तूफान के समय 44 लोगों की मौत हुई थी। यह तूफान ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तट से टकराया था। इससे निपटने के राज्य सरकार के प्रयासों की चौतरफा प्रशंसा हुई थी। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी तूफान से निपटने को लेकर तारीफों के पुल बांधे थे।
तूफान से निपटने के लिए
ओडिशा सरकार ने ‘जीरो केजुएलटी’ यानी शून्य जनहानि के लक्ष्य के साथ राज्य के 480 किलोमीटर लंबे तट के किनारे कच्चे मकान में रहने वाले 11 लाख से भी अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की योजना बनाई। हर शेल्टर में खाद्य सामग्री, पीने का पानी और अन्य जरूरी सामान रखे गए हैं और 50 स्वयंसेवी तैनात किए गए।

पिछले 21 सालों में ओडिशा के आपदा प्रबंधन और राहत विभाग ने प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए वृहद योजना बनाई जिसमें उन्होंने विश्व बैंक की मदद भी ली। इस दौरान आईआईटी-खड़गपुर की सहायता से 900 के आस-पास तूफान राहत शिविरों का निर्माण किया गया है।

ओडिशा ने 1999 के महातूफान से सबक लेते हुए ये फैसला किया कि आने वाली हर प्राकृतिक आपदा से मुकाबला किया जाए और ये सुनिश्चित भी किया जाए कि इसमें जान और माल की कम से कम क्षति हो। हुदहुद, तितली, फैनी कई तूफान आए, लेकिन ओडिशा ने अपने तैयारियों के दम पर सबको हरा दिया।

एक बार फिर से ओडिशा पर चक्रवात का साया मंडरा रहा है, लेकिन खतरा इस बार सबसे अधिक पश्चिम बंगाल को है। ओडिशा एक बार फिर से एक भंयकर तूफान को मात देने के लिए तैयार है। उसने आपदाओं से लड़कर जीना सीखा लिया है।

फेसबुक ने व्यवसायों के लिए शुरू की नयी सेवा, दुकानें होंगी ऑनलाइन

महामारी की मार झेल रहे व्यवसायों और व्यापारियों की मदद के लिए फेसबुक ने ऑनलाइन दुकानों की सेवा शुरू की है। इस नई सुविधा के तहत दुकानदार फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अपनी दूकान बना पाएंगे और उसमें अपने तरीके से चीजों और सामानों की सजा पाएंगे।
फेसबुक के मुताबिक इस नई सुविधा का मुख्य एवं प्रारंभिक मकसद यह सुनिश्चित करना है कि छोटे और मध्यम आकार के व्यवसायों की ऑनलाइन उपस्थिति हो और वे मौजूदा स्थिति में खुद को बरकरार रख पाएं।
कंपनी के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने एक लाइव स्ट्रीमिंग में कहा कि महामारी के इस दौर में अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण शुरू करने के लिए ई-कॉमर्स का विस्तार करना महत्वपूर्ण होगा। उन्होंने कहा, ‘यदि आप अपने स्टोर या रेस्तरां को शारीरिक रूप से नहीं खोल सकते हैं, तो आप अभी भी ऑनलाइन ऑर्डर ले सकते हैं और उन्हें लोगों को भेज सकते हैं।’
फेसबुक ने कहा कि व्यापारी अपनी ऑनलाइन दुकानें बनाने के लिए स्वतंत्र होंगे, इससे भुगतान और अन्य सेवाओं में फेसबुक के लिए महत्वपूर्ण नए व्यवसाय के अवसर पैदा कर सकते हैं। व्यवसाय अपनी दुकानों के लिए विज्ञापन खरीदने में सक्षम होंगे, और जब लोग फेसबुक के चेकआउट विकल्प का उपयोग करेंगे तो उनसे शुल्क लेंगे।

जुकरबर्ग ने कहा कि दुकानें व्यवसायों के फेसबुक पेज और इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर पाई जा सकती हैं, और वे स्टोरीज में भी दिखाई दे सकती हैं या विज्ञापनों में प्रचारित की जा सकती हैं। व्यवसाय के लिए उपलब्ध कराए गए आइटम दुकान के भीतर दिखाई देंगे, और उपयोगकर्ता आइटमों को सहेज सकते हैं या ऑर्डर दे सकते हैं।

व्यवसाय मैसेंजर, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप के माध्यम से ग्राहक सहायता के मुद्दों को संभाल सकते हैं। आखिरकार, कंपनी की योजना है कि आप स्टोर कैटलॉग ब्राउज़ करें और चैट विंडो से सीधे खरीदारी करें। यह लाइव स्ट्रीम से खरीदारी को सक्षम करने की योजना भी बनाता है, जिससे ब्रांड और निर्माता अपनी फेसबुक कैटलॉग से आइटम टैग कर सकें, ताकि वे लाइव वीडियो के निचले भाग में दिखाई दें।

केंद्र सरकार ने गर्भवती महिलाओं एवं दिव्यांगों को दफ्तर नहीं आने की छूट देने के जारी किए निर्देश

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने सभी विभागों को गर्भवती महिलाओं, दिव्यांगों और बीमारी से जूझ रहे लोगों को दफ्तर आने से छूट देने के निर्देश जारी किए हैं। यह जानकारी मंगलवार को केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने दी। लॉकडाउन-4 में पचास फीसद कर्मचारियों के साथ दफ्तर खोलने की अनुमति मिलने के अगले दिन केंद्र सरकार ने यह दिशा निर्देश जारी किया है। मंत्रालय ने बताया कि यह तय किया गया है कि ऐसे सरकारी सेवक जिनका पहले से गंभीर बीमारियों का इलाज चल रहा था, उन्हें जहां तक संभव हो रोस्टर ड्यूटी से छूट दी जाए।केंद्र ने यह भी कहा है कि इसी तरह दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं को भी रोस्टर प्रणाली से छूट दी जाए। मंत्रालय ने सोमवार को डिप्टी सेक्रेटरी के स्तर से नीचे अपने 50 फीसद जूनियर कर्मचारियों को कार्यालय में काम करने के लिए कहा था। केंद्र सरकार ने उपसचिव स्तर से नीचे के अपने 50 फीसद जूनियर कर्मचारियों से कार्यालय आने के निर्देश जारी किए थे। इससे पहले इस श्रेणी के केवल 33 फीसद कर्मचारियों को ही कार्यालय आने को कहा गया था।
रकार की ओर से उपसचिव स्तर से नीचे के अधिकारियों और कर्मचारियों की उपस्थिति के लिए विभागाध्यक्षों को निर्देश जारी किए गए थे। गाइडलाइन के मुताबिक, विभागाध्‍यक्ष एक रोस्टर (ड्यूटी चार्ट) तैयार करके यह सुनिश्चित करेंगे कि 50 फीसद अधिकारी और कर्मचारी एक दिन के अंतराल में कार्यालय आएं। कार्मिक मंत्रालय की ओर से यह भी निर्देश हैं कि जिन 50 फीसद अधिकारियों और कर्मचारियों को एक दिन कार्यालय नहीं आना है वह घर से काम करें और हर वक्‍त टेलीफोन एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर कार्यालय के संपर्क में रहें।

आखिर बद्रीनाथ मंदिर में क्यों नहीं बजाया जाता शंख?

बद्रीनाथ मंदिर को हिंदू धर्म के पवित्र चार धामों में से एक माना जाता है। इस मंदिर में भगवान विष्णु विराजमान हैं। वैसे आमतौर पर किसी भी मंदिर में पूजा के समय शंख बजाना अनिवार्य होता है, लेकिन यह एक ऐसा मंदिर है, जहां शंख बजाया ही नहीं जाता। दरअसल, इसके पीछे एक पौराणिक और बेहद ही रहस्यमय कहानी छुपी हुई है, जिसके बारे में शायद आप भी हैरान हो जाएंगे। तो चलिए जानते हैं आखिर ऐसा क्या है कि इस मंदिर में कभी शंख नहीं बजाया जाता…
उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित यह एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण सातवीं-नौवीं सदी में होने के प्रमाण मिलते हैं। इसे भारत के सबसे व्यस्त तीर्थस्थानों में से एक माना जाता है, क्योंकि यहां हर साल लाखों लोग भगवान बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आते हैं।
इस मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की एक मीटर (3.3 फीट) लंबी शालिग्राम से निर्मित मूर्ति है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे भगवान शिव के आवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में पास ही स्थित नारद कुंड से निकालकर स्थापित किया था। कहा जाता है कि यह मूर्ति अपने आप धरती पर प्रकट हुई थी।
इस मंदिर में शंख नहीं बजाने के पीछे ऐसी मान्यता है कि एक समय में हिमालय क्षेत्र में दानवों का बड़ा आतंक था। वो इतना उत्पात मचाते थे कि ऋषि मुनि न तो मंदिर में ही भगवान की पूजा अर्चना तक कर पाते थे और न ही अपने आश्रमों में। यहां तक कि वो उन्हें ही अपना निवाला बना लेते थे। राक्षसों के इस उत्पात को देखकर  ऋषि अगस्त्य ने मां भगवती को मदद के लिए पुकारा, जिसके बाद माता कुष्मांडा देवी के रूप में प्रकट हुईं और अपने त्रिशूल और कटार से सारे राक्षसों का विनाश कर दिया।
हालांकि आतापी और वातापी नाम के दो राक्षस मां कुष्मांडा के प्रकोप से बचने के लिए भाग गए। इसमें से आतापी मंदाकिनी नदी में छुप गया जबकि वातापी बद्रीनाथ धाम में जाकर शंख के अंदर घुसकर छुप गया। इसके बाद से ही बद्रीनाथ धाम में शंख बजाना वर्जित हो गया और यह परंपरा आज भी चलती आ रही है।

(साभार – अमर उजाला)

डब्ल्यूएचओ में भारत का कद बढ़ा, स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन बनेंगे कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष

नयी दिल्ली : कोरोना वायरस से लड़ाई में आगे बढ़कर मोर्चा संभाले हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्द्धन अब जल्द ही वैश्विक मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने को तैयार हैं। आगामी 22 मई को वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यकारी बोर्ड का चेयरमैन पद संभालने वाले हैं।
डॉक्टर हर्षवर्द्धन जापान के डॉक्टर हिरोकी नाकातानी की जगह लेंगे, जो अभी 34 सदस्यीय बोर्ड के चेयरमैन हैं। इस वैश्विक मंच पर भारत के प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव पर मंगलवार को विश्व स्वास्थ्य असेंबली के 194 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं।
पिछले साल दक्षिण पूर्व एशिया ग्रुप ने यह फैसला कर लिया था कि इस बार बोर्ड चेयरमैन का चयन भारत की ओर से होगा। अधिकारियों के मुताबिक हर्षवर्द्धन  22 मई को यह पद संभालेंगे। यह पद हर साल बदलता रहता है और पिछले साल यह निर्णय हुआ था कि पहले साल भारत इस बोर्ड का प्रतिनिधित्व करेगा। जानकारी के मुताबिक यह पूर्णकालिक जिम्मेदारी नहीं है और स्वास्थ्य मंत्री को सिर्फ बैठकों में शामिल होना होगा।
बोर्ड की बैठक साल में दो बार होती है और मुख्य बैठक आमतौर पर जनवरी में होती है। जबकि दूसरी बैठक मई में होती है।  कार्यकारी बोर्ड का मुख्य काम स्वास्थ्य असेंबली के फैसलों व पॉलिसी तैयार करने के लिए उचित सलाह देने का होता है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिका की ओर से कोरोना वायरस को लेकर डब्ल्यूएचओ पर चीन से मिलीभगत करने का आरोप लगाया गया है।
इन देशों को मिली जगह
तकनीकी रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर 34 देशों को ही कार्यकारी बोर्ड का सदस्य बनाया जाता है। लेकिन पहली बार इसमें ऐसे देशों को भी शामिल किया गया है, जो इसमें काफी पिछड़े हैं। भारत के अलावा बोर्ड के सदस्यों के रूप में बोट्सवाना, कोलंबिया, घाना, गिनी-बिसाऊ, मेडागास्कर, ओमान, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, रूस और ब्रिटेन को जगह मिली है।
कोविड-19 : डब्ल्यूएचओ की भूमिका की स्वतंत्र जांच को सभी देश तैयार
कोरोना वायरस के खिलाफ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की भूमिका की स्वतंत्र जांच के लिए सभी सदस्य देशों ने हामी भर दी। डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्यों की वार्षिक बैठक में बिना किसी आपत्ति के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। यूरोपीय संघ ने 100 देशों की ओर से यह प्रस्ताव सोमवार को पेश किया था।
प्रस्ताव में कोविड-19 के खिलाफ डब्ल्यूएचओ की प्रतिक्रिया की निष्पक्ष, स्वतंत्र और व्यापक जांच की मांग की गई है। डब्ल्यूएचओ को स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने में देरी के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
ऐसे में स्वतंत्र जांच के तहत यह देखा जाएगा कि आखिर डब्ल्यूएचओ इस महामारी के खिलाफ अपनी रणनीतियों में कहां विफल रहा। प्रस्ताव में महामारी के उपचार के लिए वैक्सीन की पारदर्शी और समय पर पहुंच सुनिश्चित करने को भी कहा गया है।

बिहार की मधेपुरा फैक्टरी ने बनाया 12000 हॉर्सपावर का रेल इंजन

पटना : बिहार की मधेपुरा इलेक्ट्रिक लोको फैक्टरी ने देश का पहला स्वदेशी 12000 हॉर्सपावर का रेल इंजन तैयार किया है। इस इंजन को भारतीय रेलवे ने सोमवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से संचालित किया।

इस इंजन को WAH12 नाम दिया गया है और इसका नंबर 60027 है। दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से दोपहर 02:08 बजे चली ट्रेन डेहरी-ऑन-सोन, गढ़वा रोड होते हुए बैराडीह तक गई। इस ट्रेन में 118 डिब्बे थे।
इसके साथ ही भारत दुनिया का छठवां ऐसा देश बन गया है जिसने इतनी हॉर्सपावर का रेल इंजन खुद तैयार किया है। वहीं, दुनिया में पहली बार उच्च हॉर्सपावर के इंजन के ब्रॉड गेज ट्रैक पर संचालित किया गया है।
ट्विन बो-बो डिजाइन वाले इस रेल इंजन का एक्सल लोड 22.5 टन है जिसे 25 टन तक बढ़ाया जा सकता है। यह इंजन 120 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से सफर कर सकता है। इसकी सहायता से मालगाड़ियों की औसत गति और भार ले जाने की क्षमता बेहतर होगी।

ये रेल इंजन स्टेट ऑफ दि आर्ट आईजीबीटी आधारित, 3 फेज ड्राइव, नौ हजार किलोवाट (12000 हॉर्सपावर) के हैं। इनमें जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) भी दिया गया है, जिसकी सहायता से इन्हें कहीं भी ट्रैक किया जा सकेगा।

यह इंजन मेक इन इंडिया के तहत तैयार किया गया है। 250 एकड़ में बनी मधेपुरा फैक्टरी सबसे बड़ी एकीकृत ग्रीनफील्ड सुविधा है जिसे 120 इंजन की उत्पादन क्षमता के साथ गुणवत्ता और सुरक्षा के उच्चतम मानकों के साथ बनाया गया है।

जड़ी-बूटियों से बने इस हैंडवाश से त्वचा रूखी नहीं होगी, फल-सब्जियां भी धो सकेंगे

पुणे : महाराष्ट्र में शोधार्थियों के एक दल ने पर्यावरण के अनुकूल एक हैंडवाश विकसित किया है। शोधार्थियों का कहना है कि कोरोना वायरस के खतरे से बचने के लिए नैनो पदार्थ आधारित ये हैंडवाश विषरहित है, इसका उपयोग करने से किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नहीं होता है।
इसके साथ ही खाद्य पदार्थों और खिलौनों को धोने के लिए भी पानी आधारित एक संक्रमण रोधी तरल (डिसइन्फेक्टेंट) विकसित किया है। श्री शिव छत्रपति कॉलेज के डॉ. रविंद्र चौधरी के नेतृत्व वाले दल ने इन वस्तुओं को विकसित किया है। इस दल को इलेक्ट्रॉनिक्स प्रद्यौगिकी सामग्री केंद्र (सीएमईटी) के पूर्व महानिदेशक डॉ. दिनेश अमलनेरकर ने भी अपना सहयोग प्रदान किया।
अमलनेरकर ने बताया, “कोरोना वायरस को रोकने के लिए हाथ धोने के महत्व के बारे में तो सभी जानते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के अनुसार व्यक्ति को अल्कोहल युक्त सेनिटाइजर या साबुन से हाथ धोने चाहिए। परंतु इस बात को लेकर संशय है कि साबुन और पानी से हाथ धोने से विषाणुओं का खात्मा होगा या नहीं और बार-बार अल्कोहल युक्त सेनिटाइजर का प्रयोग करने से त्वचा रूखी होने लगती है।
उनका कहना है कि हाथ धोने के लिए हमने पर्यावरण के अनुकूल और जल्दी असर करने वाला एक जीवाणु रोधी तरल विकसित किया है। इसे नैनो-धातु यौगिक और सुगंधित चिकित्सीय जड़ी बूटी के सम्मिश्रण से बनाया गया है और ये बैक्टीरिया, फंगस और विषाणुओं को रोकने में सक्षम है।
अमलनेरकर का कहना है कि अभी जो संक्रमण रोधी तरल उपलब्ध हैं उनसे कच्ची सब्जियां, मांस और फलों को नहीं धोया जा सकता है। डॉ. रविंद्र चौधरी का कहना है कि नैनो पदार्थों द्वारा विकसित तरल विषैला नहीं है, इसलिए इससे जैविक पदार्थ धोए जा सकते हैं।

लॉकडाउन के बाद जब जाना हो दफ्तर

लॉकडाउन 4.0 में कुछ रियायतें दी गई हैं, जैसे कुछ दफ्तर खुल गए हैं और जरूरी यात्राएं की जा सकती हैं। परंतु इस समय विशेष ध्यान रखने की जरूरत है, क्योंकि कोरोना वायरस के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इस समय आप भी अगर ऑफिस जाने लगे हैं या आपको जरूरी यात्रा करनी पड़ रही है तो आपको भी कुछ सावधानी बरतने की आवश्यकता है। इस दौरान आपको भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय, गृह मंत्रालय से लेकर अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी सीडीसी और विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से सुझाए गए निर्देशों और सावधानियां बरतनी जरूरी है।
ऑफिस में लंच टाइम में रखें ध्यान
आप लंच करते समय मास्क नहीं पहन सकते हैं इसलिए आपको लंच करते समय विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।  अममून हमारी आदत होती है ऑफिस के सहयोगी के साथ लंच करने की, पर इस समय ऐसा करना बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है।
लंच करते समय शारीरिक दूरी का पूरा ध्यान रखें।
इस समय एक साथ लंच के लिए कैफेटेरिया में न जाएं।
कैफेटेरिया में भीड़ न लगाएं।
अपना टिफिन किसी के साथ भी साझा न करें।
 भोजन से नहीं फैलता कोरोना वायरस
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भोजन और पानी से संक्रमण फैलने से जुड़े मामलें अभी तक नहीं मिले हैं। परंतु ये संभव है कि कोरोना वायरस बाजार से खरीदकर लाए भोजन सामग्री की सतह पर मौजूद हो। ऐसा होने पर संक्रमण होने का खतरा हो सकता है।
पैकेटबंद सामग्री खरीदें तो…
आप बाजार से जो भी पैकेटबंद सामग्री लेकर आते हैं उसे पहले अच्छे से साफ कर लें। इसके बाद अपने हाथ साफ करके धोना न भूलें। अगर पैकेटबंद सामग्री की सतह पर वायरस होगा तो ऐसा करने से वो हट जाएगा।
यात्रा के दौरान बाहर का भोजन न करें
अगर आप इस समय यात्रा कर रहे हैं तो बाहर का भोजन न करें। घर से भोजन बना कर ले जाएं और साफ- स्वच्छ जगह में ही भोजन करें। भोजन करने से पहले हाथ जरूर धो लें। ऐसी जगह पर भोजन करें जहां ज्यादा भीड़ न हो।
घर में भोजन बनाते वक्त रखें ये ध्यान
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि घर में उचित तापमान पर भोजन पकाना चाहिए। ऐसा करने से खाद्य सामग्री की सतह पर अगर वायरस मौजूद होगा तो वो पूरी तरह नष्ट हो जाएगा।
सावधानी बहुत जरूरी
घर से ऑफिस को टिफिन ले जाने, लंच करने तक टिफिन की सतह कई ऐसे स्थानों के संपर्क में आ सकती है, जहां पर ये वायरस मौजूद हो। इसलिए आपको बाहर भोजन करते समय विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
भोजन करने से पहले इन बातों का रखना होगा ध्यान
सफाई का ध्यान रखें: जहां पर आप भोजन कर रहे हैं उस स्थान को पहले साफ कर लें। भोजन करने से पहले अपने टिफिन की सतह को भी साफ कर लें और उसके तुरंत बाद हाथ धोने के बाद ही भोजन करें।
भोज्य सामग्री को अलग- अलग रखें: कच्चा और पकाकर खाने वाले भोज्य पदार्थों को अलग- अलग दिफिन में ही रखें।
भोजन को गर्म करें: घर में पके हुए खाने को ही ऑफिस या यात्रा पर ले जाएं। अगर ऑफिस में माइक्रोवेब है तो भोजन को गर्म कर लें।
ऑफिस में वॉशरूम जाते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें
वॉशरूम में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
इस समय बेहतर होगा कि अपने पास एक हैंड सैनिटाइजर रखा जाए और उसी का प्रयोग किया जाए।

(साभार – अमर उजाला)

40 सालों में पहली बार भारत में कम हुआ कार्बन उत्सर्जन

नयी दिल्ली : वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान देश में कार्बन उत्सर्जन में पहली बार कमी दर्ज की गई है लेकिन इसके लिए सिर्फ लॉकडाउन जिम्मेदार नहीं है। अक्षय ऊर्जा में तेजी, कोरोना वायरस की वजह से रुकी कारोबारी गतिविधियां और आर्थिक सुस्ती के कारण भारत में 40 साल में पहली बार कार्बन उत्सर्जन घटा है।
मार्च 2020 के मुकाबले पिछले वित्त वर्ष के दौरान कार्बन उत्सर्जन में एक फीसद की कमी देखी गई है। एक तरफ कोरोना ने पूरी दुनिया में अपने कहर से लाखों लोगों को संक्रमित कर दिया है लेकिन वहीं दूसरी ओर दुनियाभर के वैज्ञानिक कोरोना की वजह से हुए अच्छे पहलुओं पर भी गौर कर रहे हैं।
शोधकर्ताओं की माने तो कोरोना वायरस को रोकने के लिए दुनिया में जो लॉकडाउन लगाया था उससे पर्यावरण पर काफी अच्छा असर पड़ा है। कहीं नदियां खुद से साफ हो गई हैं तो ओजोन परत भी खुद से रिपेयर हो गई है। वहीं कार्बन उत्सर्जन का काम होना भी एक सकारात्मक खबर है।
अक्षय ऊर्जा से घटी पारंपरिक ईंधन की मांग
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लॉकडाउन से पहले ही बिजली की खपत कम हो गई थी। अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ने से पारंपरिक ईंधन की मांग कम हो गई थी और इसके बाद 25 मार्च से देशभर में लॉकडाउन लगने से कार्बन उत्सर्जन में एक फीसद की कमी देखी गई जो 40 सालों में पहली बार हुआ है।

मार्च 2020 में 15 फीसदी घटा कार्बन उत्सर्जन
शोध के मुताबिक साल 2020 के मार्च में भारत का कार्बन उत्सर्जन 15 फीसदी तक कम हुआ। बिजली की मांग में कमी से कोयला आधारित जनरेटर प्रभावित हुए हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इसकी वजह से भी कार्बन उत्सर्जन कम हुआ होगा। मार्च में कोयले से बिजली उत्पादन 15 प्रतिशत और अप्रैल के पहले तीन सप्ताह में 31 प्रतिशत कम हुआ है।

लॉकडाउन से पहले ही घट गई थी मांग
कार्बन ब्रीफ की रिपोर्ट के अनुसार कोयले की मांग लॉकडाउन से पहले ही कम हो गई थी। मार्च 2020 में कोयले की बिक्री दो फीसद घट गई थी। ये आंकड़ा अपने आप में बहुत ज्यादा है लेकिन बीते दशक में हर साल कोयले से बिजली उत्पादन में 7.5 फीसदी सालाना बढ़ोतरी हुई थी।

मार्च में 18 फीसद घटी तेल की खपत
भारत में 2019 की शुरुआत से ही ईंधन की खपत घटने लगी थी। बीते साल के मुकाबले मार्च में तेल की खपत में 18 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है। इस बीच अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बिजली की आपूर्ति बढ़ी है, जो लॉकडाउन के दौरान स्थिर रही है।

लॉकडाउन हटने के बाद बढ़ेगा उत्सर्जन
बिजली की मांग कम होने से कोयले से बिजली उत्पादन पर असर पड़ना तय था। सौर ऊर्जा उपकरण से प्रति यूनिट बिजली उत्पादन का खर्च काफी कम आता है। यही कारण है कि सौर ऊर्जा को इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड में प्राथमिकता दी जाती है। तेल, गैस या कोयले से चलने वाले थर्मल पावर प्लांट के लिए ईंधन खरीदना जरूरी है।

आगामी दिनों में फिर बढ़ेगी थर्मल पावर की खपत !
ऐसा कहा जा रहा है कि कोयले और तेल की खपत में कमी हमेशा नहीं रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन के आंशिक और पूरी तरह से खत्म होने के बाद देश अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से चलाएंगे जिससे थर्मल पावर की खपत बढ़ेगी यानि कि कार्बन उत्सर्जन भी फिर से बढ़ सकता है। हालांकि अमेरिका ने पर्यावरण नियमों में ढील देनी शुरू भी कर दी है। ऐसे में डर है कि बाकी देश भी इस तरह की ढील देना शुरू ना कर दें। कार्बन ब्रीफ के विश्लेषक मानते हैं कि भारत सरकार शायद यह कदम ना उठाए।

क्या कहते हैं वैश्विक आंकड़े?
इंटरनेशनल एनर्जी आईए ने पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन में आठ फीसद की ऐतिहासिक गिरावट का अनुमान लगाया है। रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में साल 2020 की पहली तिमाही में कार्बन एमिशन में पांच फीसद की गिरावट आंकी गई है।