Friday, May 1, 2026
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अब ग्लोबल से अधिक लोकल के लिए आवाज उठे

हम कोरोना काल में जी रहे हैं और यह साल कड़ी परीक्षा का साल साबित हो रहा है। दो महीने के लगातार लॉकडाउन के बाद हम अब अनलॉक होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं मगर इन चन्द महीनों में सब बदल चुका है। हम सब एक नयी शुरुआत करने जा रहे हैं और इस प्रक्रिया में पहले जैसा कुछ भी नहीं रहने वाला है। कम से कम अगले कुछ महीनों तक तो बिल्कुल नहीं। कोरोना काल में जो समय बीता, वह समय आत्मविश्लेषण का समय रहा। मनुष्य पहली बार कैद में था और तमाम अन्य पशु – पक्षी बाहर…साफ आसमान तो शायद बच्चों ने पहली बार ही देखा होगा। इस लॉकडाउन में हमने प्रकृति को कुछ समय के लिए पाया मगर कितने दिनों तक सहेज सकेंगे, ये हम खुद नहीं जानते। मनुष्य बदलने नहीं जा रहा है…कम से कम उसकी हरकतों से तो यही लग रहा है। संगरोध…सैनेटाइजर, मास्क, दस्ताने हमारी जिन्दगी का हिस्सा बनने जा रहे हैं…मगर इन्सान है, वह विवशता का भी आनन्द मनाता है…वह मास्क, दस्तानों, सैनेटाइजर का बाजार विकसित कर रहा है…ये सब अब फैशन स्टेटमेंट बनने वाले हैं। बाजार में जल्दी ही डिजाइनर मास्क आने वाले हैं और आ भी चुके हैं। इसे कहते हैं, आपदा को अवसर बनाना, मनुष्य इसमें माहिर है मगर यह अवसर हमारे गाँवों तक भी पहुँचे तब तो कोई बात हो। दिनों, महीनों तक भूखे पेट जो झुलसाती सड़कों पर पैदल चले हैं, उनके पेट में रोटी पहुँचे, इसका तो इन्तजाम हो। शहरों की अभिजात्य संस्कृति ने सहानुभूति की आड़ में जो क्रूरता छुपायी थी, वह सामने आ गयी..शहर नहीं जानता कि गाँव का अपमान कर के उसने अपनी जड़ें खोद ली हैं। जिन गगनचुम्बी इमारतों को श्रमिकों ने अपने पसीने से खड़ा किये..उन इमारतों के पास दो इंच जमीन भी इनके लिए नहीं थी। जिन होटलों में उन्होंने जिन्दगी भर रोटियाँ बनायीं. उन होटलों के पास इनको खिलाने के लिए एक निवाला भी न निकला…कहते हैं..कि अपमान और उपेक्षा भी शस्त्र हैं जो आपको खड़ा करते हैं जो आपमें जीतने की जिद भरते हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि इन मजदूरों के गृहराज्य में उनके हुनर को पूरी तरजीह मिलेगी और उनके हुनर को ध्यान में रखते हुए सरकारें नीतियाँ बनायेंगे। हमें बेहतर नहीं बल्कि बेहतरीन बनने और बनाने की जरूरत है इसलिए जरूरी है कि अब ग्लोबल से अधिक लोकल के लिए आवाज उठे औऱ यह होगा…उम्मीद यही है।

स्त्री मुस्कुराएगी तभी खिलखिलाएगा परिवार

कहते हैं कि जब बात दूर तक ले जानी हो तो लहजा बदलना पड़ता है और सुनने वाले की शैली अपनानी पड़ती है। बात जब उस पीढ़ी तक ले जानी हो जिसने अपनी सीमा को सर्वस्व मान लिया है तो मेहनत और बढ़ जाती है मगर कायदे से कही गयी बात सोचने पर मजबूर जरूर करती है। आशा पांडेय लिखती हैं, साहित्यकार हैं और इन दिनों लोकभाषा और शैली की मदद से यही कठिन काम कर रही हैं। काकी के रूप में इनकी बातें सोशल मीडिया पर खूब पसन्द की जा रही हैं तो काकी आशा पांडेय से शुभजिता ओजस्विनी ने भी खूब बात की, आप भी सुनिए हमारी बातें –

प्र. स्त्री सशक्तीकरण की परिभाषा आपकी नजर में क्या है?
स्त्री सशक्तीकरण की कोई तय परिभाषा हो ही नहीं सकती…ये देश आस्था और विश्वास पे ही जीना जानता है जहां मान्यता है”जैसे देवता वैसा मंत्र”…अपनी बात को सही ढंग से रखना और बिना किसी आंदोलन के सहज भाव से बिना कहे सामने वाले के द्वारा इसे स्वीकारना ही मूल है।
प्र. लोक साहित्य को आज किस तरह से जनता के बीच ले जाया जा सकता है?
हम जिन्होंने 80/90 के दशक में बचपन गुजारा है,हमारे पास अब भी वो थाती बची हुई है कुछ,और सहज उपलब्ध है सोशल नेटवर्किंग, इस माध्यम का सदुपयोग हम कर सकते हैं अपने पुरखों की थाती को संजोने में ,ऐसा मुझे लगता है।
प्र. काकी जी की परिकल्पना आपने कैसे की?
संयुक्त परिवार से हूँ और अक्सर ऐसे परिवार में एक काकी होती हैं जिन्हें सब पता होता है,वो हर बात को बेबाकी से और तर्कसंगत ढंग से समझाना जानती हैं,मेरे पापा की काकी कहने को हम दादी पर सब काकी कहते थे उनके पास भंडार था,हर तरह की कहानी,कहावत,तर्क के साथ सुनाती थी उन कहानियों में सार होता उनमें वेद पुराण भी होते और महिलाओं से जुड़े प्रश्न और उनके उत्तर भी।जो उम्र के इस दौर में जब विश्लेषण करती हूँ तो वो माइक पर की गई चर्चा से ज़ियादा मुफ़ीद और व्यवहारिक लगते हैं मुझे।
प्र. गृहणियों तक अपनी बात किस तरह से पहुँचायी जाए कि वह उससे जुड़ सकें और आप यह किस तरह से करती हैं?
गृहिणी को गृहिणी बनाने से पहले उसके सोच पर ग्रहण लगाना ये शुरू हो जाता है बचपन से जब उन्हें बस ये समझाया जाता है कि तर्क कुछ नहीं होता उसे कुतर्क कहते हैं और स्त्री को बस चार दिवारी में वो करना चाहिए जो होता आया है,मानसिक गुलाम होकर रह गयी हैं औरतें सोचना ही नहीं चाहती शायद सोचने से कष्ट होगा ये भय हो क्योंकि अब पीढ़ियों से यही कम्फर्ट ज़ोन हो गया है,बेटियों को सिखाओ की ससुराल में कैसे रहना है और बेटों को कि रसगुल्ला जैसी दुल्हन लाना है यानी उसे बचपन से समझाना कि बहन के अलावा जो दिखे, एव खाद्य वस्तु है ये कहने वाली भी स्त्री और भोगने वाली भी स्त्री,ये उदहारण आपसब को अटपटा लगे पर जब रसोई को दस,बारह की उम्र से ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बना दिया जाता है तब उम्र के तीसरे या चौथे दशक में वही उदाहण समझाये और समझे भी जाते हैं।
बड़ी बड़ी किताबी बातों और भाषण से कुछ नहीं बदलाव आ सकता जबतक उसे ज़मीनी हक़ीकत का जामा न पहनाया जा सके,एक लड़कीं जिसने बचपन से माँ/दादी को व्रत उपवास में ही देखा हो उसे एक झटके से ये नहीं कहा जा सकता कि ये मानसिक गुलामी है,इसे न करो तो तुम बराबरी की हक़दार होगी।
उसे ये बताना ज़ियादा सहज कि मंगलवार को यदि पति उपवास करे तो आयु बढ़ती है संतान की।वो सवाल करेगी “संतान!बेटे की ना”तब कहना कि क्यों कल को बेटी को असमय कुछ हो गया तो दुख न होगा,सन्तान यानी दोनों।
पुरुष जब सुनगे व्रत रखना है वो शुगर/bp जाने क्या क्या बहाने गढंगे तब उस सखी को बस मुस्कुराते हुए ये कहना “अच्छा तुम्हारी तो उम्र सिर्फ़ उनकी आँखों मे नहीं दिमाग़ में भी ठहरी हुई है न ये सब तो न होगा तुम्हें”…एक चिंगारी सोच की एक बीज विचार के रोप दीजिये बस,आगे का काम वो खुद करेंगी अपने तरीके से बिना नारा लगाए बिना बैनर लिए। छीनना या मांगना नहीं है होते कौन हैं वो हमें देने वाले,बस जो हमारा है उसपर टीके रहना है।
प्र. अपनी जिम्मेदारियों के बीच आप सृजनात्मक कैसे रह पाती हैं?
उस कहावत से चिढ़ है जहाँ ज़िन्दगी यूँही तमाम होने के मलाल में खत्म हो जाती है इसलिए कुछ नया कुछ बेहतर करने की कोशिश करती रहती हूँ।
प्र. क्या सन्देश देना चाहेंगी?
हर इंसान में कोई न कोई नैसर्गिक गुण जरूर होता है उसे निखारने और आगे आने का कार्य खुद करना होता है।
ये सही है स्त्री परिवार में बुनियाद की तरह होती है,इसका अर्थ ये नहीं कि खुद को मनो मिट्टी में दबा लिया जाए,यदि धुरी है नारी तब उसे खुश रहना और जरूरी वो मुस्कुराएगी तभी परिवार खिलखिलायेगा । ख़ुश रहना शुरू कीजिए साथ सब ख़ुश रहेंगे।

कोरोना काल के भगवान

उत्कर्ष जायसवाल 

शिक्षण संस्थान – पूर्वान्चल विद्यामंदिर

शुभजिता क्लासरूम – पाठ – राम-लक्ष्मण -परशुराम संवाद

शिक्षिका – नीलम सिंह, वाराणसी

कक्षा -10

पाठ्यपुस्तक – एन. सी. ई. आर. टी  हिंदी पाठ्यक्रम क्षितिज कोर्स ‘अ’

लॉकडाउन और मेरे अनुभव

निखिता पांडेय

‘लॉकडाउन’ कभी नहीं सोचा था किसी ने की मनुष्य के जीवन पर कभी भी तालाबंदी हो सकती है।मगर यह भी संभव हुआ और इस कदर हावी हुआ कि आज दो माह से हम मनुष्य जाति अपने घरों में बंद हैं और पता नहीं कि यह लॉकडाउन कब खत्म हो?इसकी शुरुआत कोरोना महामारी के कारण हुई और यह देश-विदेश में फैलकर यह समस्या सर्वव्यापी हो गई है।इस समस्या के दौर में आर्थिक क्षति काफी हो रही है और देश की अर्थव्यवस्था भी डगमगा गई है क्योंकि कर्म संस्थान, शिक्षण संस्थान सभी बन्द हैं।लोगों को ‘वर्क फ्रॉम होम’अर्थात घर से ही काम करना पड़ रहा है और बहुत से गैर-सरकारी कर्म संस्थानों से कर्मचारियों को निकाला जा रहा है।बहुत ही भयावह और दुखद स्थिति हो गयी है।मेरी तृतीय वर्ष की फाईनल परीक्षा स्थगित हो गयी और इस बीच मानसिक तनाव होना स्वाभाविक है।परंतु इस तनाव से उबरने के लिए जीवन को पहले जैसे जी रही थी,वैसे ही इसमें भी जी सकूँ, उसमें कुछ परिवर्तन किये हैं।जैसे पहले योग करने का समय न रहता था,अब हर सुबह योग करती हूं, जिससे सकारात्मकता हर दिन बढ़ती रहे।फिर दूरदर्शन पर रामायण,महाभारत और उपनिषद गंगा जैसे पौराणिक धारावाहिक को वापस से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ,उसे देखकर मन में जीवन जीने का उद्देश्य,पारिवारिक रिश्ते-नातों को समझने की एक नयी सीख मिली।फिर वापस अपनी पढ़ाई नित जैसे करती थी,वैसे ही अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हूं।परिवार के बीच समय बिताने का सुखद पल मिला,उसे जीती हूं-कभी लूडो,चेस और कैरम बोर्ड के खेल खेलकर।बाहर के बच्चों को गलियों में खेलते हुए देखती हूं,कभी-कभी मैं भी खेलती हूँ।25 मार्च से अब तक लगभग सात कविताएं,एक कहानी और एक निबंध लिख चुकी हूं।क्योंकि मुझे कविताएं,कहानी तथा उपन्यास पढ़ना बहुत पसंद है और लिखते रहना मेरी आदत है।हर दिन कुछ-न-कुछ लिखती हूँ।इसी तरह समय कट रहा है।इसके अलावा चित्रकारी कर रही और उपयोग की वस्तुएं बना रही हूं।कुछ दिन पहले कुछ ज़रूरतमंदों को राहत सामग्री प्रदान की।मन में बहुत संतोष हुआ।इसी बीच ‘अम्फान’ नामक तूफ़ान आया,बहुत क्षति।बिजली और पानी हमारे इलाके में 95 घंटे के बाद मिली।अभी भी बहुत में समस्या निहित है।इन दो माहों के समय का विस्तार मैं इसी रुप में कर पाई।यह मेरे लॉकडाउन का अनुभव था,जितना हो सके सकारात्मक बने रहें और सच्ची खबरों से जुड़े रहें।सभी घर पर रहें, स्वस्थ रहें और बाहर जाना पड़े तो सामाजिक दूरी और मास्क का प्रयोग अवश्य करें।

 

शुभजिता युवा सृजन चुनौती – संस्कृत

प्रतिभागी – शुभांगी उपाध्याय

संस्कृत श्लोक – श्रीमद्भगभतगीता

-कर्मयोग

घरेलू हिंसा बनती है हर साल 10 हजार से अधिक महिलाओं की मौत का कारण

आ गया ‘लॉकडाउनऑनडोमेस्टिकवायलेंस’ का बांग्ला संस्करण
अक्षरा सेन्टर ने डेविड एंड गोलिथ फिल्म और स्वयं के साथ बनाया है
कोलकाता : लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है। इस परिस्थिति को देखते हुए ‘लॉकडाउनऑनडोमेस्टिकवायलेंस’ नामक जागरूकता वीडियो हिन्दी में बनाया गया था। अब इसका बांग्ला संस्करण भी आ गया है जिसे अक्षरा सेन्टर ने डेविड एंड गोलिथ फिल्म और स्वयं के साथ बनाया है। इस वीडियो में ऋचा शर्मा, अपर्णा सेन, उषा उत्थुप, परमब्रत चटर्जी, विक्रम घोष, कोन्कना सेन शर्मा, आदिल हुसैन तथा जया सील ने काम किया है। इन हस्तियों ने घरेलू हिंसा पर चुप न रहने और राज्य महिला आयोग की हेल्पलाइन के जरिए शिकायत करने की सलाह दी है। अक्षरा सेन्टर ने डेविड एंड गोलिथ फिल्म और ‘स्वयं’, स्पेशल सेल फॉर विमेन एंड चिल्ड्रेन के साथ महाराष्ट्र सरकार के सहयोग से कई हस्तियों को लेकर हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी में घरेलू हिंसा के खिलाफ यह जागरूकतामूलक वीडियो बनाया है। गत 19 अप्रैल को महाराष्ट्र सरकार ने ट्विटर पर यह वीडियो जारी किया था जिसे 5.5 मीलियन लोगों ने देखा। डेविड एंड गोलिथ फिल्म के चेयरमैन लाल भाटिया तथा निदेशक इमरान जाकी तथा ऋचा शर्मा ने इस अभियान की तारीफ की। अक्षरा सेंटर की सह निदेशक नन्दिता शाह ने कहा कि घरेलू हिंसा न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में बढ़ रही है और ‘लॉकडाउनऑनडोमेस्टिकवायलेंस’ को लेकर वह खुश हैं। तथा ‘स्वयं’ की निदेशक अनुराधा कपूर ने कहा कि घरेलू हिंसा के कारण हर साल 10 हजार महिलाएँ आत्महत्या करने पर मजबूर होती हैं या उनकी हत्या कर दी जाती है। लॉकडाउन ने घर को भी महिलाओं के लिए असुरक्षित बना दिया है और यह पहल राज्य महिला आयोग की हेल्पलाइन साझा करने के लिए है। राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन लीना गंगोपाध्याय ने कहा कि यह वीडियो समय की जरूरत है।

पूरा वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं

सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन ने हुगली में की जरूरतमंदों की मदद

कोलकाता : कोलकाता की सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्था सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से तीसरे चरण में हुगली जिले के रिसडा में ग्वालपाड़ा ,वेलिंगटन जूटमिल और एस एन रोड अंचल में 40 जरूरतमंद परिवारों के बीच राहत सामग्री वितरित किया गया ।कोरोना महामारी और अम्फन चक्रवात के कारण उपस्थित स्थिति से निपटने के लिए संस्था के सदस्यों ने लोगों से आग्रह किया कि वे लॉकडाउन का पालन करते हुए सोशल डिस्टेंसिंग रखें ।यह समय डरने का नहीं बल्कि समझदारी के साथ लड़ने का है ।रिसडा में राहत सामग्री बांटने का काम संस्था के सदस्य रामाशंकर सिंह, प्रकाश त्रिपाठी, पंकज सिंह, पंकज पांडे, दीपक ठाकुर,शम्भू सिंह,आर गुस्ताख एवं राकेश यादव ने किया।

ईद : शेयरचैट पर 40 लाख से ज्यादा वॉट्सऐप शेयर और प्लैटफॉर्म पर 30 करोड़ व्यूज़ मिले

कोलकाता : भारत में निर्मित सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म शेयरचैट इस साल ईद पर बड़ी तादाद में प्रयोक्ताओं की सक्रियता का गवाह बना। हिंदी, पंजाबी, तमिल, मलयालम, तेलुगू, कन्नड़, उर्दू, गुजराती, मराठी, बंगाली, ओड़िया और असमी भाषाओं 10 लाख से ज्यादा यूजीसी कॉन्टेंट की रचना हुई।
विभिन्न भाषा बोलने वाले प्रयोक्ताओं ने 10 लाख से ज्यादा विविधतापूर्ण कॉन्टेंट पोस्ट प्लैटफॉर्म पर भेजीं, जिन्हें 40 से अधिक बार शेयर किया गया और शेयरचैट प्लैटफॉर्म पर 30 करोड़ से ज्यादा व्यूज़ प्राप्त हुए। अन्य कॉन्टेंट के बीच ईद की शुभकामना देने वाले कॉन्टेंट शीर्ष पर रहे जिनमें लोगों ने चांदनी रात वाले शुभकामना के वीडियो, इमेज, टैक्स्ट पोस्ट तथा ईद की मुबारकबाद वाले वीडियो इमेज पोस्टर अपने प्रियजनों के साथ साझा किए। प्रयोक्ताओं ने घर में बनी सेवईयों समेत स्वादिष्ट व्यंजनों की रेसिपी और तस्वीरें भी साझा कीं। इस खास दिन का जश्न मनाने के लिए बहुत से प्रयोक्ताओं ने ईद की मुबारकबाद वाले वीडियो संदेश व बॉलीवुड गाने भी शेयर किए। इस पाक मौके पर प्रयोक्ताओं ने अपनी सेल्फी साझा की और वीडियो एवं इमेज पोस्ट कर के सोशल डिस्टेंसिंग संदेश भी शेयर किए।
ईद संबंधी यूजीसी कॉन्टेंट पोस्ट करने के मामले में मलयालम भाषा सबसे ऊपर रही- 75000 यूजीसी पोस्ट और 12 लाख से ज्यादा वॉट्सऐप शेयर। मलयालम भाषा के कॉन्टेंट को 15 करोड़ से अधिक व्यूज़ प्राप्त हुए (कुल व्यूज़ का 50 प्रतिशत)।
इसके बाद बांग्ला और हिन्दी का नंबर रहा। बांग्ला में 30,000 और हिंदी में 22000 यूजीसी पोस्ट किए गए। बंगाली को 3 लाख से अधिक वॉट्सऐप शेयर और 3 करोड़ व्यूज़ मिले। हिंदी को 4 लाख से ज्यादा वॉट्सऐप शेयर और 2 करोड़ 20 लाख से अधिक व्यूज़ प्राप्त हुए।

कोविद- 19 में युवाओं की चुनौतियों पर भवानीपुर कॉलेज और आईसीएआई की पैनल वार्ता

कोलकाता : भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज और द इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सहभागिता से ऑनलाइन पैनल वार्ता का आयोजन किया गया जिसमें प्रतिष्ठित सीए, सीएस और कॉर्पोरेट उद्योग जगत के विशिष्ट लोगों ने अपने मूल्यवान विचारों से विद्यार्थियों को अवगत कराया। “कोविद 19 के दौर में युवाओं के लिए अवसर और डर” विषय को केंद्र में रखते हुए रोजगार के अवसर, उद्योगों की स्थिति, बड़े बड़े फर्मों, बैंकिंग सेक्टर की स्थिति, आने वाली आर्थिक मंदी से किस प्रकार निपटना होगा, कॉर्पोरेट और जमीनी स्तर पर हो रही बाधाओं, संरचनात्मक संसाधनों की कमी और उद्योग करने में कानूनी कठिनाइयां आदि विभिन्न पहलुओं पर पैनल वार्ता में वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। विशिष्ट अतिथियों में सीएम ए बलविंदर सिंह, अध्यक्ष डॉ. डी. पी. नंदी (वरिष्ठ डायरेक्टर कॉस्ट एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट)प्रमुख वक्ताओं में सीएस अशोक पारीक (डायरेक्टर श्रेयी ग्रुप), नीहार वासा (पीडब्ल्यूसी), शौभिक राय (फेडरल बैंक), प्रो. दिलीप शाह(डीन भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज) रहे।भर्ती को लेकर कोविद 19 के समय लॉक डाउन से आर्थिक मंदी की भयावह स्थितियां बन गयी हैं जिससे सभी उद्योग धंधों में डर का वातावरण व्याप्त है। भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में कर्मचारियों की छंटनी और बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। आने वाली पीढ़ी को नये सिरे से उद्योगों को विकसित करने के लिए सोचना होगा।
बी.कॉम के 153 विद्यार्थियों ने इस वेबिनार में भाग लिया। वर्तमान समय में” घर से ऑफिस कार्य प्रणाली” पर चर्चा की गयी जो आनेवाले समय में पदाभिलाषियों के लिए महत्त्वपूर्ण चुनौती है। वक्ताओं ने कहा कि अब स्नातक स्तर से ही अब व्यवसाय और कार्यों के लिए सोचने का समय है। अपने कौशल और व्यावहारिक यानी प्रैक्टिकल ज्ञान पर बल देने की आवश्यकता है। वर्तमान में उपयोगी सीखने के प्लेटफार्म पर अपने व्यक्तित्व और कम्युनिकेशन कौशल के द्वारा अवसर तलाशना होगा। ज्यादा से ज्यादा ज्ञान के तत्वों को अर्जन करने पर जोर देना होगा। समय की माँग के अनुसार आज के युवाओं को नये सिरे से विभिन्न क्षेत्रों में प्रबन्धन यानी मैनेजमेंट की शिक्षा देने के लिए भवानीपुर कॉलेज ने नयी पहल की है और इस महामारी के विकट स्थिति में हर संभव प्रयास कर विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया।
वेबिनार के संचालक सीएस मोहित शॉ ने सभी प्रमुख वक्ताओं के विचारों को संक्षेप में बताते हुए कोविद से आए संकट से उबरने के विषय में बताया। प्रो. दिलीप शाह ने विद्यार्थियों को उत्पादकता और योजनाओं के अनुसार कॅरियर बनाने की सलाह दी। सीए विवेक पटवारी ने वेबिनार की सफलता के लिए द इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया और भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों और डीन ऑफिस के इस आयोजन पर धन्यवाद ज्ञापित किया। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।