Monday, June 22, 2026
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श्री शिक्षायतन महाविद्यालय में दो दिवसीय वेब संगोष्ठी

कोलकाता :   श्री शिक्षायतन महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा 6 और 7 अगस्त 2020 को दो दिवसीय राष्ट्रीय ई. संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पहले दिन के कार्यक्रम का विषय रहा रेणु द्वारा रचित कहानी ‘तीसरी कसम’ । डॉ. प्रीति सिंघी ने संचालन करते हुए विषय को प्रस्तावित किया। प्रथम वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डाॅ. सुधा सिंह ने ‘तीसरी कसम में प्रेम की अवधारणा’ के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा करने के क्रम में तीसरी कसम को आलोचकों द्वारा प्लातोनिक प्रेम कहने पर आपत्ति जतायी क्योंकि प्रेम का सम्बन्ध मनोविज्ञान से है और जहाँ यह घटता है, वह समाज है जिससे प्रेम में मनोविज्ञान और समाज दोनों की उपस्थिति रहती है । प्रेम में मनोविज्ञान की विवेचना में उन्होंने बताया कि मनुष्य के अस्तित्व के साथ यानी बच्चे के गर्भ से निकलने के साथ ही अलगाव या एककी भाव का जन्म भी हो जाता है,इसी एकाकीपन के भाव को पार कर लेने का नाम प्रेम है । वे प्रेम को भावनात्मक रूप में स्वत:स्फूर्त मानती हैं जबकि इसके सामाजिक पक्ष को एक सोची समझी गतिविधि कहती हैं ।  डॉ॰ सुधा यह स्पष्ट किया कि रेणु द्वारा कहानी में हिरामन का हीराबाई के अपूर्व सौन्दर्य देखकर उसके अक्षत कौमार्य की परिकल्पना करना एक प्रयास है स्त्री की कौमार्य को देह जी बजाय उसकी अनुभूति,उसके व्यवहार में स्थापित करने का ।यह रेणु का पितृसत्ता के विरूद्ध बगावत ही है ।
दूसरे वक्ता के रूप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रोफेसर डाॅ. आशीष त्रिपाठी ने ‘व्यक्ति कथा समाज गाथा’ पर अपनी बात रखते हुए रेणु द्वारा सांस्कृतिक उपनिवेशन का प्रतिरोध कर सांस्कृतिक वि-उपनिवेशन की बात उठायी और कहा कि रेणु ने यथार्थ के सांस्कृतिक पहलू पर जोर दिया है । तीसरी कसम में हीराबाई और हिरामन की कहानी महुआ घटवारिन की कहानी का आधुनिक रूपांतरण है । महुआ घटवारिन में स्त्री शोषण एवं कोमल प्रेम की कहानी को समझे बिना तीसरी कसम कहानी को नहीं समझा जा सकता है ‌। हिरामन का मन इसलिए महुआ घटवारिन को याद करता है और हीराबाई को कंपनी की औरत न समझ कर उसके दिव्य दैव्य छवि की परिकल्पना करता है । ऐसा नहीं है कि इस कहानी में पुरूष मानसिकता से रेणु परिचित न हों ।जमींदार द्वारा हीराबाई के लिए प्रयुक्त शब्दों में पितृसत्तात्म मानसिकता भी कहानी में बखूबी मिलती है और इसीलिए हीराबाई के लिए हिरामन द्वारा दिए गये संबोधन उसे ज्यादा पसंद है पलटदास के सिया सुकुमारी संबोधन के बनिस्बत । स्त्री के विरुद्ध कहे गये वाक्यों के लिए हिरामन लड़ जाता है । कार्यक्रम के समापान के पड़ाव में प्रश्नोत्तरी सत्र रखा गया और अन्त में विभाग की प्रो. अल्पना नायक ने सभी वक्ताओं ,श्रोताओं और कार्यक्रम से जुड़े समस्त सदस्यों के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया । दो दिवसीय राष्ट्रीय ई संगोष्ठी के दूसरे दिन का विषय रहा – ‘मानस का हंस’ जिसमें संचालक के रूप में डॉ. रचना पाण्डेय ने पुस्तक के उदाहरण के साथ तुलसीदास के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए अमृतलाल नागर के ‘मानस के हंस’ को पढ़े जाने की महत्ता को बताते हुए संचालन किया। दूसरे दिन के पहले वक्ता लखनऊ विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रोफेसर डॉ.सूर्य प्रकाश दीक्षित ने रामचरित मानस के तुलसी और नागर के मानस के हंस पर विस्तृत चर्चा की इसके साथ ही तत्कालीन परिस्थितियों को उजागर करते हुए यह बताया कि जब रचनाकार रचता है तो कौन कौन से कारक उसे प्रभावित करते हैं। अपनी रचनाओं में हाशिए के लोगों के विरूद्ध असंवेदनशीलता के आरोपों से तुलसी को बरी करने के लिए इस उपन्यास में नागर जी ने तुलसी के धर्मनिरपेक्ष एवं वर्ग निरपेक्ष तथा स्त्री का सम्मान करने वाले की छवि प्रस्तुत की है । दीक्षित जी ने इस उपन्यास को सामाजिक इतिहास के आधार पर लिखी रचना माना है । उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही कि अमृतलाल नागर की रचना मानस के हंस में काम और राम के बीच का द्वन्द्व ही अन्ततः किस प्रकार तुलसी को महान कवि बनाता है। उन्होंने नागर की रचनाओं में किस्सागोई की विशेषता एंव पूरी रचना को सिनेरियो टाईप कहा और यह भी कहा कि नागर के यहाँ संवाद शैली मे रचनाएँ लिखी गयी जिसकी भाषा खड़ी बोली होती हुए भी एक विशेष प्रकार की नागरी भाषा,नागर जी की अपनी भाषा लगती है ।
दूसरे वक्ता सुरेन्द्रनाथ सान्ध्य कॉलेज,कोलकाता के डाॅ प्रेमशंकर त्रिपाठी ने बहुत ही सुन्दर और तथ्य परक ढंग से मानस के हंस की व्याख्या की । उन्होंने राम के प्रति तुलसी की निष्ठा की बात बताई । साथ ही नागर जी मृत्यु का जो आह्वान करते है उसके रहस्य को नागर जी के साथ के अपने संस्मरणों के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मानस के हंस में मोहिनी प्रसंग नारी के प्रति आकर्षण की एक बानगी प्रस्तुत करता है तथा‌ यह बताया कि भक्ति जरूरी है पर अन्धभक्ति की कोई जगह नहीं होनी चाहिए । मनुष्य को हमेशा अपने समाज के प्रति सचेतन होना चाहिए । उन्होनें तुलसी की काम से राम तक की यात्रा को उजागर किया है । प्रेमशंकर त्रिपाठी जी ने यह स्पष्ट किया कि यहाँ तुलसी ने काम, क्रोध, लोभ, मोह इन सारी विकृतियों से लड़ते हुए मानस के हंस को पाया है। महामारी में तुलसी के लोकरक्षक रूप का चित्रण नागर जी द्वारा किए जाने का प्रसंग भी वे उठाते हैं ।इसके बाद डाॅ प्रीति सिन्घी ने प्रश्नोत्तरी सत्र को बहुत अच्छे ढंग से सम्भाला जहाँ लोगों ने बेहद विवेक पूर्ण प्रश्न पूछे । प्रो. सिंधु मेहता ने कार्यक्रम के अन्त में सभी को धन्यवाद देते हुए कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की।

द पर्सपेक्टिव इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशल साइंस एंड ह्यूमनिटीज़’ का प्रकाशन

कोलकाता : सामाजिक विज्ञान और मानविकी के त्रैमासिक जर्नल ‘द पर्सपेक्टिव इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशल साइंस एंड ह्यूमनिटीज़’ (The Perspective International Journal of Social Science and Humanities-TPIJSSH) का प्रकाशन आरंभ हुआ है। इस द्विभाषी (हिन्दी और अँग्रेजी) ऑनलाइन जर्नल में संरक्षक के रूप में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोरात और भारत सरकार के आदिवासी मामलों की समिति के पूर्व सदस्य प्रो. वर्जिनियस खाखा जुड़े हुए हैं। इस लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण बौद्धिक शुरुआत है। जर्नल के संपादक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के सहायक प्रोफेसर एवं कोलकाता क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ हैं। उप संपादक के रूप में युवा लेखक-अध्येता अनीश कुमार, नीतिशा खलखो एवं रजनीश कुमार अंबेडकर अपना योगदान दे रहे हैं। संपादक मण्डल एवं सलाहकार मण्डल में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक इस जर्नल से जुड़े हुए हैं।

यह जर्नल पूर्व समीक्षित प्रक्रिया पर आधारित है। इसमें शोध पत्र चयन से उस पर पूर्व विभिन्न विषय विशेषज्ञों की राय एवं टिप्पणी ली जाती है। जर्नल के पहले अंक (फरवरी-अप्रैल 2020) में नौ शोध-पत्र और एक समीक्षा आलेख प्रकाशित किए गए हैं। इसमें दलित साहित्य चिंतन से संबंधित दो शोध-पत्र, आदिवासी विमर्श से जुड़े चार शोध पत्र तथा एक शोध पत्र स्त्री प्रश्नों पर केंद्रित है। मीडिया और किसान जीवन से संबंधित शोध पत्र भी इस अंक में शामिल किया गया है । जर्नल ने अपने पहले अंक से ही शोध के अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध दिखता है। जर्नल के संपादक डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ अपने संपादकीय में लिखते हैं- “ हमने अपने सफ़र का पहला क़दम बढ़ा दिया है । यह यात्रा अकादमिक व बौद्धिक ज़मीन को समृद्ध बनाने के संकल्प के साथ शुरू हुई है । वैसे तो इस समय हिंदी-अंग्रेज़ी के अनेक जर्नल प्रकाशित हो रहे हैं, परंतु हम उनके बीच लगातार कुछ नवीनता और बेहतरी के लिए प्रयास करेंगे । चूंकि यह सोशल साइंस और ह्यूमनिटिज का जर्नल है, तो अपनी कोशिश रहेगी कि ज्ञान के इन विविध क्षेत्रों-पक्षों से कुछ उत्कृष्ट शोध आलेख हम यहाँ उपलब्ध करा पाएँ । अभी हम खुद को तैयार करने की प्रक्रिया में हैं इसलिए जर्नल का व्यवस्थित व मजबूत स्वरूप आगामी दिनों में देखने को मिलेगा । लेकिन इस बात के लिए हम जरूर आश्वस्त करना चाहेंगे कि गुणवत्ता के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया जाएगा । शोध के अंतरराष्ट्रीय मानकों का यथासंभव पालन सुनिश्चित कराना हमारी ज़िम्मेदारी रहेगी । इसके लिए शोध पत्रों के चयन की अपनी निष्पक्ष, पारदर्शी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को हम हमेशा कायम रखने की कोशिश करेंगे ।”
सामाजिक विज्ञान और मानविकी के क्षेत्र में यह जर्नल कुछ अलग और गंभीर अकादमिक प्रयास करता हुआ दिखाई देता है। इसके पहले अंक में विदेशों से भी शोध पत्र प्रकाशित किए गए हैं । जर्नल के संपादक डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ का कहना है कि ‘‘हमारा ध्येय सामाजिक विज्ञान और मानविकी के क्षेत्र में गंभीर शोध अध्ययन व लेखन को सामने लाना है। जर्नल भविष्य में महत्वपूर्ण व ज्वलंत विषयों पर विशेषांक भी प्रकाशित करेगा। अधिक जानकारी के लिए जर्नल के वेबसाइट : www.tpijssh.com पर विजिट किया जा सकता है । इस जर्नल को देश-विदेश के विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर index भी किया गया है ।’’ जर्नल का दूसरा अंक (मई-जुलाई 2020) भी प्रकाशित हो गया है। इस जर्नल का अकादमिक व बौद्धिक जगत में काफी स्वागत किया जा रहा है।
– आकांक्षा कुरील, वर्धा

सेवासदन : आज भी बड़ा प्रश्नचिह्न है समाज पर यह कृति

-दीपा गुप्ता
प्रेमचंद जी ने 1916 में “बाजार-ए-हुस्न” लिखा, जिसका उन्होंने एक साल बाद हिन्दी रुपांतरण कर 1917 में “सेवासदन” नाम से प्रकाशित किया। प्रेमचंद कि यह उपन्यास लोगों को सस्ती शिक्षा देने के लिए नही लिखा गया।कुछ लोग को लगता है सेवासदन की मुख्य समस्या वेश्यावृत्ति है,वास्तव मे ऐसा नही है।सेवासदन की मुख्य समस्या नारी की पराधीनता है।
प्रेमचंद जी ने सुमन की समस्या को व्यक्तिगत न बनाकर सामाजिक बनाया है।उन्होंने ने दिखाया है कि कैसे सामाजिक परिस्थितियां ही सुमन को सुमनबाई बनने. को मजबूर करती है।मध्यवर्गीय नारी के जीवन की विभिन्न समस्याओं के साथ धर्माचार्यो, मठाधीशों, धनपतियों, सुधारकों का आंडम्बर ,दहेज प्रथा,अनमेल विवाह, मनुष्य का दोहरा चरित्र…. इत्यादि समस्याओं का भी मार्मिक वर्णन किया गया है।

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सेवासदन एक सनायिक उपन्यास नहीं है, जिसकी उपादेयता अपने समय और अपने युग के साथ समाप्त हो जाये।इसमे वर्तमान के प्रकाशन की अपूर्व क्षमता है। आज के संदर्भो में इसकी प्रासंगिकता एवं उपयोगियता को नकारा नही जा सकता है।आज जीवन मूल्यों का तेजी से विघटन हो रहा है। ऐसी स्थिति में सेवासदन हमारे सामने एक सार्थक उदाहरण के रुप में प्रस्तुत है।यदी हम इस तत्थ को स्वीकार नही करते तो इसका अर्थ यह होगा कि या तो सेवासदन के साथ हमारी सहानुभूति एक ढोंग है या हम आज भी सेवासदन के युग में ही जी रहे है।सेवासदन में हमारी रुची बनाए रखने में संवेदनात्मक का उतना योग नही जितना उसके नैतिक मुल्यों का है।
प्रेमचंद जी द्वारा सालों पहले लिखा गया यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना की अपने समय।उस समय जिस दहेज प्रथा का शिकार सुमन और उसका परिवार हुआ था उसी भांति आज भी ऐसे कितनी सुमन है हमारे समाज में जो रोज दहेज प्रथा की बलि चढ़ जाती है।’ “आज जैसे यह प्रथा सी बन गयी हो कि लड़का जितना ज्यादा पढ़ि लिखा होगा उतना ही दहेज की रकम भी।” इस उपन्यास जरिए प्रेमचंद जी ने उन शिक्षितों की हकीकत जाहिर कर दी जो विवाह और सतीत्व के नाम पर लेन-देन करते है। जो ऊपर से तो दहेज की कुप्रथा की बुराई करते लेकिन उसे कायम रखने के लिए हमेशा बहाने ढूंढ़ लिया करते है।
कहने के लिए तो आज महिला चांद तक पहुंच गयीं हैं।लड़को से कंधा मिला कर चलती है।देश चला सकती है। वास्तव में आज भी उन्हें खुल जीने का हक नही है।रात अकेले बाहर नही जा सकती है। जैसा कि उपन्यास में हमें देखने को मिलता है।सुमन के घर देर लौटने से गंजाधर कितना तमासा करता है।
आज हम अंतरिक्ष मे बस्ती बनाने का सपना देख रहे पर ढोंगी बाबाओं से आज भी समाज घिरा हुआ है।महंत रामदास जैसे अनेकों बाबा आज भी हमारे समाज मे मजूद है।जो धर्म के आड़ में न जाने क्या क्या करते है।
उपन्यास की वास्तविक समस्या ही यह है- लड़कियों को कुए में ढ़केलने और फिर स्टिंग और पतिव्रता धर्म के गीत गाना।इस समूचे व्यापार में लड़की की इच्छा अनिच्छा का सवाल ही नई उठता है।बलिपशु को तरह जिस खूंटे से भी बांध दी जाए, उसे बँधना पड़ता है।
प्रेमचंद ने विस्तार से दिखलाया है कि इस समाज व्यवस्था में संपत्ति के रक्षक सदाचार की आड़ में वेश्यावृत्ति को प्रश्रय ही नही देते ,वेश्याओ को जन्म भी देते हैं ।और जिस समाज में विवाह का मतलब कन्या विक्रय हो,उससे वेश्यावृत्ति कौन उठा सका है।? सेवासदन एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है जिसका उत्तर आज भी हमारे समाज के पास नही है।

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सेवासदन – मुंशी प्रेमचन्द

 

मिल्क पाउडर बर्फी

शेफ सीमा साव 

सामग्री :  मिल्क पाउडर (दो कटोरी),  दूध ( गाय का या मदरडेयरी ) (एक कटोरी), चीनी – ( एक कटोरी ),  घी – ( 2-3 चम्मच ), सूखे मेवे ( इच्छानुसार)

विधि : सबसे पहले कढाई में घी गरम करेंगे फिर सावधानी से गाय का दूध डालेंगे उसे बराबर चलाते रहेगे, उसके चलाते – चलाते ही उसमे मिल्क पाउडर डालेंगे उसे भी लगातार चलाते रहेगें । फिर चीनी डाल देंगे ,चीनी डालते हुए चलाते रहेंगे जब तक गाढ़ा न हो जाए । उसके बाद एक प्लेट मे पसले हल्का सा घी लगाकर उस पर फैला देंगे । उसके बाद उपर से ड्राइफ्रुट डालेंगे । और एक घंटे के लिए छोड देगे या फ्रिज मे रख सकते हैं । फिर क्या अपने मनपसंद अंदाज का आकार देकर खाईये और खिलाइएं ।

सौजन्य – शिव संगी किचेन

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101 रक्षा उपकरणों के आयात पर रोक, स्वदेशी को बढ़ावा

नयी दिल्ली :  रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने की एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए रविवार को ऐलान किया कि 101 हथियारों व सैन्य उपकरणों के आयात पर रोक लगाई जाएगी। इनमें हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर, मालवाहक विमान, पारंपरिक पनडुब्बियां और क्रूज मिसाइल भी शामिल हैं। यह रोक 2020 से 2024 के बीच चरणबद्ध तरीके से लगाई जाएगी। रक्षा मंत्री ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि रक्षा मंत्रालय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ आह्वान को आगे बढ़ाते हुए बड़े कदम उठाने को तैयार है। उन्होंने अनुमान जताया कि अगले 5 से 7 साल में घरेलू रक्षा उद्योग को करीब 4 लाख करोड़ रुपये के अनुबंध मिलेंगे। उन्हाेंने कहा कि एक अन्य महत्वपूर्ण कदम के तहत रक्षा मंत्रालय ने 2020-21 के पूंजीगत खरीद बजट को घरेलू व विदेशी पूंजीगत खरीद में विभक्त किया है। चालू वित्त वर्ष में घरेलू खरीद के लिए करीब 52 हजार करोड़ रुपये का अलग बजट बनाया गया है।

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अधिकारियों के अनुसार, 101 वस्तुओं की सूची में टोएड आर्टिलरी बंदूकें, सतह से हवा में मार करने वाली कम दूरी की मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें, अपतटीय गश्ती जहाज, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, अगली पीढ़ी के मिसाइल पोत, फ्लोटिंग डॉक, पनडुब्बी रोधी रॉकेट लाॅन्चर और कम दूरी के समुद्री टोही विमान शामिल हैं। बुनियादी प्रशिक्षण विमान, हल्के रॉकेट लाॅन्चर, मल्टी बैरल रॉकेट लाॅन्चर, मिसाइल डेस्ट्रॉयर, जहाजों के लिए सोनार प्रणाली, रॉकेट, दृश्यता की सीमा से परे हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें अस्त्र-एमके 1, हल्की मशीनगन व आर्टिलरी गोला बारूद (155 एमएम) और जहाजों पर लगने वाली मध्यम श्रेणी की बंदूकें भी सूची में शामिल हैं।

राजनाथ ने कहा, ‘यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। सूची की घोषणा के पीछे का उद्देश्य सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं के बारे में भारतीय रक्षा उद्योग को अवगत कराना है, ताकि वे स्वदेशीकरण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।’ रक्षा मंत्री ने कहा कि मंत्रालय ने तीनों सेनाओं, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों, आयुध कारखाना बोर्ड और निजी उद्योगों सहित सभी संबंधित पक्षों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद यह सूची तैयार की है।

69 वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध इसी साल

एक सरकारी दस्तावेज के अनुसार, 69 वस्तुओं पर आयात प्रतिबंध दिसंबर 2020 से लागू होगा, जबकि अन्य 11 वस्तुओं पर प्रतिबंध दिसंबर 2021 से लागू होगा। दिसंबर 2022 से आयात प्रतिबंधों के लिए 4 वस्तुओं की एक अलग सूची की पहचान की गयी है, जबकि 8 वस्तुओं के दो अलग-अलग खंडों पर प्रतिबंध दिसंबर 2023 और दिसंबर 2024 से लागू होगा। लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइलों पर आयात प्रतिबंध दिसंबर 2025 से लागू होगा।

इसके बाद बातें स्पष्ट भी कीं

इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि एलसीए एमके-1ए, पिनाक रॉकेट सिस्टम, आकाश मिसाइल सिस्टम जैसी प्रणाली रक्षा बलों की जरूरतों के मुताबिक विकसित की जाती हैं। ऐसी प्रणाली अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी उपलब्ध हैं।
मंत्रालय ने कहा, ऐसी हथियार प्रणालियों के नाम को इस सूची में शामिल किया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सेना इस तरह की समान गुणवत्ता वाली प्रणालियों की सामग्री की खरीद के लिए आगे कोई पहल नहीं करे।

साथ ही ऐसे उपकरणों या हथियारों की खरीद पर प्रतिबंध लगाना है जो समान गुण वाली जरूरतों को पूरा करते हैं, लेकिन अक्सर अलग-अलग नामों के तहत इनका करार किया जाता रहा है।

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30% खिलाड़ियों ने कहा कि वे ट्रोल हुईं सोशल मीडिया पर

53% ने माना कि उन्हें क्लब-गवर्निंग बाॅडी से फंड नहीं मिलता

21.9% ने कहा कि उन्हें 100 फीसदी फंडिंग होती है।

यह सर्वे 39 खेलों की 1068 खिलाड़ियों के बीच हुआ, जिसमें से 537 ने जवाब दिए। 160 खिलाड़ियों ने कहा कि वे कभी ना कभी ट्रोलिंग का शिकार हुई हैं। यह पिछले सर्वे की तुलना में तीन गुना ज्यादा है।

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पुरुष खिलाड़ियों के समान सपोर्ट नहीं मिलता लेकिन 22% ने माना पुरुषों के बराबर 100% फंडिंग मिलती है

  • 53.3% ने कहा कि उन्हें क्लब या गवर्निंग बाॅडी से फंड नहीं मिलता है। 21.9% ने कहा कि उन्हें 100 फीसदी फंडिंग होती है।
  • 48.5% ने माना कि उन्हें गवर्निंग बाॅडी से पुरुषों के समान सपोर्ट नहीं मिलता। 45.3% ने कहा समान व्यवहार होता है।
  • 84% को लगता है कि उन्हें प्रतिभा के अनुसार पर्याप्त भुगतान नहीं किया जाता और न ही उस हिसाब से प्राइज मनी दी जाती है।
  • 36% महिलाओं ने कहा कि मां बनने के बाद कमबैक करने के लिए उन्हें क्लब या एसोसिएशन से सपोर्ट नहीं मिलेगा।

खिलाड़ियों ने मीडिया कवरेज पर सवाल उठाए

  • 85% ने माना मीडिया महिला स्पोर्ट्स को प्रमोट नहीं करता।
  • 93% ने कहा कि 5 साल में महिला स्पोर्ट्स के 5 कवरेज में सुधार नहीं हुआ है।
  • 86% ने माना कि मीडिया पुरुष-महिला स्पोर्ट्स की अलग-अलग कवरेज रिपोर्ट करता है।

35% खिलाड़ी देरी से फैमिली स्टार्ट करती हैं

  • 60% को लगता है कि पीरियड्स के कारण प्रदर्शन प्रभावित होता है। पीरियड्स के कारण उन्होंने प्रैक्टिस और टूर्नामेंट छोड़ दिए।
  • 40% महिला खिलाड़ी कोच से पीरियड्स को लेकर चर्चा करने में कंफर्टेबल महसूस नहीं करतीं।

65% ने खेल में सेक्सिज्म अनुभव किया है लेकिन सिर्फ 10% ने रिपोर्ट किया

  • 20% को खेल में रेसिज्म का सामना करना पड़ा जबकि 77% को कभी नहीं।
  • 78% अपनी बॉडी इमेज को लेकर कॉन्शियस हैं, 20% काे ऐसा नहीं लगता।
  • 21% को लगता है कि कोरोना के बाद उन्हें खेल छोड़ना पड़ सकता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

बाजार में आए मास्क और पीपीई किट पहने कान्हा

कोलकाता :  कोरोना वायरस महामारी के बीच कृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियां भी जोरों पर हैं। हर साल की तरह इस बार भी जन्माष्टमी पर बाजार सज कर तैयार है लेकिन कोरोना का असर कान्हा की मूर्तियों पर भी दिखाई देने लगा है। बाल गोपाल की मूर्तियां कहीं पीपीई किट और कोरोना कैप पहने हुईं हैं तो कहीं मास्क, सर्जिकल कैप और फेस शील्ड के साथ कान्हा पूरी तरह तैयार दिख रहे हैं। गोपाल जी की मूर्तियों पर कपड़ों के अलावा अलग से लगे सुरक्षा के यह सारे इंतजाम लोगों को खूब आकर्षित कर रहे हैं। कान्हा की मूर्ति लेने आए भक्तों का कहना है कि कोरोना से बचाव के लिए संदेश देने का इससे अच्छा और कोई माध्यम नहीं हो सकता। वहीं, दुकानदार गणेश पटेल बताते हैं कि लोगों जागरूक करने के लिए उन्होंने भगवान कृष्ण की मूर्ति को पीपीई किट, मास्क, सर्जिकल कैप, फेस शील्ड और कोरोना कैप से सजाया है. इसका उद्देश्य लोगों तक एक संदेश पहुंचाना है।

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जानिए गिरधर के कुछ नामों का रहस्य

कोलकाता : 11 और 12 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। 11 को शैव और 12 को वैष्णव जन्माष्टमी मनाएंगे। भगवान कृष्ण के कई नाम हैं। लेकिन, कुछ नाम ऐसे हैं, जिनके पीछे कुछ कहानी, किस्से या कोई अलग ही महत्व है। ऐसे नामों के अलग से जाप का भी विधान शास्त्रों में बताया गया है। श्रीमद् भागवत, पद्मपुराण, कूर्म पुराण, गर्ग संहिता और ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान कृष्ण के नामों की महिमा बताई गई है।
अलग-अलग ग्रंथों में नामों की अलग व्याख्या भी है। जैसे, भागवत में कृष्ण शब्द की व्याख्या काले रंग से है, लेकिन साथ ही कृष्ण शब्द को मोक्ष देने वाला भी कहा गया है। महाभारत में दो कृष्ण हैं, एक भगवान कृष्ण, दूसरे महाभारत के रचनाकार कृष्ण द्वैपायन व्यास यानी वेद व्यास। वेद व्यास काले थे और द्वीप पर जन्मे थे। सो, उनका नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा, एक वेद को चार भागों में बांटने के कारण उनका नाम वेद व्यास पड़ा।ऐसे ही भगवान कृष्ण के कई नाम उपलब्धियों और उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं के कारण पड़े।
मुरारी
महर्षि कश्यप और दिति का एक राक्षस पुत्र था। उसका नाम था मुरा। मुरा ने अपने बल से स्वर्ग पर विजय पा ली। देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। तब इंद्र ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की। भगवान कृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा ने युद्ध में मुरा का वध कर दिया। मुरा दैत्य के अरि यानी शत्रु होने के कारण भगवान का एक नाम मुरारी पड़ गया।

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मधुसूदन
मधु नाम के दैत्य का वध करने से भगवान का एक नाम मधुसूदन पड़ा। इस राक्षस के कारण भी देवता और मनुष्य काफी परेशान थे। भागवत में मधु नाम के दो से तीन राक्षसों का जिक्र मिलता है, जो अलग-अलग काल में हुए हैं। इनमें से एक का वध कृष्ण ने किया था।
केशव
ये नाम भगवान के सुंदर केशों के कारण है। भागवत और गर्ग संहिता में भगवान के रूप का वर्णन मिलता है। गोपियां, सखियां और बृजवासी कई जगह भगवान कृष्ण को केशव के नाम से संबोधित करते हैं।
गोवर्धनधारी-गिरधारी
इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने और फिर इंद्र के बृज मंडल पर भारी बारिश करने पर लोगों को बचाने के लिए अपने सीधे हाथ की सबसे छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाने के कारण पड़ गया। भगवान को दोनों नाम प्रिय है। वृंदावन में गिरधारी, गिरिराजधारी नाम भगवान के लिए काफी प्रयोग किया जाता है।
माधव
इस नाम के पीछे दो कहानियां हैं। एक तो वसंत ऋतु के देवता या ऋतुओं में वसंत के समान श्रेष्ठ होने के कारण कृष्ण का नाम माधव पड़ा है, क्योंकि वसंत का एक नाम मधु भी है। दूसरी कहानी, त्रेतायुग के राक्षस मधु से जुड़ी है, जो मथुरा का राजा था। इसी मधु का बड़ा पुत्र यादवराज था, जिसके वंश में बाद में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। मधु के वंश में जन्म लेने के कारण भी इन्हें माधव कहते हैं।
मुरलीधर-वंशीधर
बांसुरी धारण करने के कारण नंदबाबा ने कृष्ण को ये नाम दिया था। नंदबाबा ने नन्हें कृष्ण को उपहार में बांसुरी दी थी। जो हमेशा उनकी पहचान रही। कृष्ण के व्यक्तित्व से बांसुरी इस तरह जुड़ी है कि उसके बिना कृष्ण की छवि की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
अच्युत
कृष्ण अपने व्यक्तित्व में अटल और अडिग हैं। उनकी छवि एक ऐसे देवता की है जो अविचल भक्ति प्रदान करते हैं। वे ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो कई रूपों में एक साथ पूजे जाते हैं। पुत्र, मित्र, भाई, भगवान, पति, पुरूष, योद्धा, सलाहकार और गुरु सहित कई तरह से लोग कृष्ण की पूजा करते हैं। अपने हर रूप में वे अटल-अडिग हैं। इसीलिए उन्हें अच्युत कहा गया है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

पहली बार द्वारिका से पुरी तक सूने मंदिरों में मनेगा जन्मोत्सव

ऑनलाइन या चैनलों पर ही हो सकेंगे दर्शन
नयी दिल्ली : 11-12 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। पंचांग भेद के कारण इस बार दो दिन तक जन्माष्टमी मनाई जाएगी। इतिहास में ये पहला मौका है जब भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव सभी जगह मंदिरों में बिना भक्तों के मनाया जाएगा। मंदिरों में सिर्फ पुजारियों की मौजूदगी में सारी परंपराएं पूरी की जाएंगी।
इस बार मंदिरों की बजाय भक्त ऑनलाइन या चैनल पर लाइव प्रसारण के जरिए भगवान का जन्मोत्सव देख पाएंगे। मथुरा में 3 दिन के लिए मंदिरों में भक्तों के प्रवेश पर रोक लग गई है। द्वारिका में खाली मंदिर में ही जन्माष्टमी मनेगी।
द्वारिका के जगत मंदिर के पुजारी प्रणवभाई के मुताबिक मंदिर में पूरे विधि-विधान से जन्मोत्सव मनाया जाएगा। शासन की गाइडलाइन के मुताबिक लोगों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलेगा। हर साल यहां जन्माष्टमी पर लगभग दो से ढाई लाख लोग मौजूद होते हैं। स्थानीय लोगों को मंदिर में प्रवेश देने के बारे में विचार करना चाहिए।
मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मोत्सव बहुत प्रसिद्ध है। हर साल यहां 5 लाख से ज्यादा लोग इकट्ठा होते हैं। बांके बिहारी मंदिर पर भक्तों का जमावड़ा पूरे दो दिन रहता है। इस साल पूरे मथुरा में तीन दिन तक बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक है। मंदिरों में भीड़ जमा न करने के निर्देश जारी हो चुके हैं। मथुरा की सीमाओं पर भी सुरक्षाबल तैनात हैं।
चार धामों में से एक जगन्नाथ पुरी में 11 को जन्मोत्सव मनाया जाएगा। पं. श्याम महापात्रा के मुताबिक ओडिशा में भगवान सूर्य की स्थिति को देखते हुए त्योहारों का निर्णय होता है। यहां 11 अगस्त को जन्मोत्सव मनेगा, 12 को नंदोत्सव मनाया जाएगा। मंदिर में फिलहाल बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर के स्टॉफ और पुजारियों की मौजूदगी में ही उत्सव होगा।
इस्कॉन बेंगलुरु के 15 मंदिरों में दो दिन ऑनलाइन उत्सव
इस्कॉन बेंगलुरु अपने सभी 15 मंदिरों को एक साथ ऑनलाइन जोड़कर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएगा। अमेरिका के 3 मंदिर, रशिया, यूके, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों के मंदिर इस बार यू-ट्यूब और ऑफिशियल वेबसाइट के जरिए जुड़ेंगे। इसके साथ ही फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल प्लेटफॉर्म्स पर भी ये प्रोग्राम दो दिन लाइव किया जाएगा।
इस दौरान ये सारे प्लेटफॉर्म्स लाइव टीवी की तरह काम करेंगे। इस्कॉन बेंगलुरु के साथ 5 देशों के 15 कृष्ण मंदिर दो दिन के लिए कनेक्ट होंगे। दो दिन तक अलग-अलग प्रोग्राम होंगे। इस्कॉन की योजना कार्यक्रम को अपने एक करोड़ से ज्यादा भक्तों तक पहुंचाने की है।
11 को शैव, 12 को वैष्णव मंदिरों में उत्सव
शैव प्रमुख शहरों जैसे काशी, उज्जैन, हरिद्वार आदि में 11 अगस्त को और वैष्णव प्रमुख शहरों जैसे द्वारिका-मथुरा आदि में 12 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। दक्षिण भारत के कृष्ण मंदिरों में भी 12 को उत्सव मनाया जाएगा। ओडिशा में 11 अगस्त को जन्माष्टमी होगी।