Wednesday, June 24, 2026
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एसएससी, बैंकिंग और रेलवे के लिए नहीं देनी होगी अलग-अलग परीक्षा, एक ही टेस्ट से पाएं चयन

नयी दिल्ली: सरकारी नौकरियों के लिए तैयारी कर रहे युवाओं के लिए केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। सरकार ने ‘राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी’ को मंजूरी दे दी है जिसके तहत अब युवाओं को केंद्र की सरकार की नौकरियों के लिए अलग-अलग परीक्षा नहीं देनी होगी बल्कि इसके लिए सामान्य योग्यता परीक्षा ली जाएगी। इससे देश के करोड़ों युवाओं को फायदा मिलेगा। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने गत बुधवार को कहा कि कैबिनेट की बैठक में राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी के गठन का ऐतिहासिक फैसला लिया गया है। आइए जानते हैं सरकार के इस फैसले के क्या मायने हैं और किन्हें इसका फायदा मिलेगा।
क्या है सरकार का फैसला
दरअसल, पहले सरकारी नौकरी के लिए युवाओं को कई परीक्षाएं देनी पड़ती थीं, इसे समाप्त करने के लिए सरकार राष्ट्रीय भर्ती संस्था की स्थापना करेगी। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि राष्ट्रीय भर्ती संस्था कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट (CET) लेगी जिसका करोड़ों युवाओं को फायदा मिलेगा. इस फैसले के बाद रेलवे, बैंकिंग और एसएससी (SSC) की प्राथमिक परीक्षा के लिए अलग-अलग परीक्षा देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इन तीनों के लिए एक एजेंसी बनाई जाएगी। एक ही आवेदन, एक ही शुल्क, एक ही परीक्षा होगी। इस परीक्षा का स्कोर तीन साल के लिए मान्य होगा। अभी तक केवल दो भाषाओं में ही परीक्षा देने की इजाजत थी, लेकिन इसके जरिए परीक्षार्थी 12 भाषाओं में परीक्षा दे सकता है।
तीन संस्थाओं के लिए होगा कॉमन टेस्ट
फिलहाल नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी केवल तीन संस्थाओं (रेलवे, बैंकिंग और SSC) के लिए परीक्षा लेगी, लेकिन भविष्य में सभी केंद्रीय संस्थाओं की परीक्षा यही एजेंसी लेगी। इन तीन संस्थाओं में लगभग ढाई करोड़ विद्यार्थी भाग लेते हैं। सरकार के सचिव सी. चंद्रमौली ने बताया कि केंद्रीय सरकार में लगभग 20 से अधिक भर्ती एजेंसियां ​​हैं, अभी हम केवल तीन एजेंसियों की परीक्षा कॉमन कर रहे हैं, समय के साथ हम सभी भर्ती एजेंसियों के लिए कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट करेंगे।
युवाओं के लिए वरदान
वर्तमान में, सरकारी नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों को पात्रता की समान शर्तें निर्धारित किए गए विभिन्नपदों के लिए अलग-अलग भर्ती एजेंसियों द्वारा संचालित अलग-अलग परीक्षाओं में सम्मिलित होना पड़ता है। उन्होंने अलग-अलग परीक्षा शुल्क भी देना पड़ता है। इन परीक्षाओं में भाग लेने के लिए लंबी दूरियां तय करनी पड़ती हैं। अलग-अलग भर्ती परीक्षाएं केवल उम्मीदवारों ही नहीं बल्कि संबंधित भर्ती एजेंसियों पर भी बोझ होती हैं। इन परीक्षाओं में औसतन, अलग से 2.5 करोड़ से 3 करोड़ उम्मीदवार शामिल होते हैं। ‘राष्ट्रीय भर्ती नीति’ लागू होने के बाद ये उम्मीदवार एक सामान्य योग्यता परीक्षा में केवल एक बार शामिल होंगे।
गरीब उम्मीदवारों को बड़ी राहत
वर्तमान में उम्मीदवारों को बहु-एजेंसियों द्वारा संचालित की जा रही विभिन्न परीक्षाओं में भाग लेना होता है। परीक्षा शुल्क के अतिरिक्त उम्मीदवारों को यात्रा, रहने-ठहरने और अन्य पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। ऐसे में एकल परीक्षा से उम्मीदवारों पर वित्तीय बोझ काफी हद तक कम होगा।
महिला उम्मीदवारों को और अधिक लाभ
महिला उम्मीदवारों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली महिला उम्मीदवारों, को अलग-अलग परीक्षाओं में शामिल होने के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें बहुत दूर वाले स्थानों में परिवहन और रुकने की व्यवस्था करनी होती है। इसके अलावा कई बार उन्हें दूरस्थ स्थानों पर स्थित परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने के लिए अपने साथ किसी को ले जाना पड़ता है। इसे देखते हुए सरकार ने प्रत्येक जिले में परीक्षा केंद्र बनाने की तैयारी की है जिससे महिला उम्मीदवारों की बड़ी राहत मिलेगी।
3 वर्षों के लिए वैध होगा स्कोर
उम्मीदवारों द्वारा सीईटी में प्राप्त स्कोर परिणाम घोषित होने की तिथि से 3 वर्षों के लिए वैध होंगे। वैध उपलब्ध अंकों में से सबसे उच्चतम स्कोर को उम्मीदवार का वर्तमान अंक माना जाएगा। उम्मीदवारों द्वारा सीईटी में भाग लेने के लिए अवसरों की संख्या पर कोई सीमा नहीं होगी।
(साभार – जी न्य़ूज)

आज़ादी शम्मोजान की

लेखिका: कृष्णा सोबती

तिरंगों की छाया में शुभ्रवसना नगरी मुस्करा उठी।दीपमालाओं से अंधेरे ख़ामोश आंगनों की सीमाएं भी जगमगा उठीं।आज आज़ादी का त्यौहार था।कोटि-कोटि जन उल्लास में झूमते हुए राजमार्ग पर बिखर गए. घर-बाहर सजे, बाज़ार सजे और सज गईं रूप की वे दुकानें, जहां रूप रोज़-रोज़ इस्तेमाल होकर बासी और श्रीहीन हो जाती हैं।
शम्मोबीवी ने अपनी रूखी-सी कलाई पर पड़ी पीतल और कांच की चूड़ियों को झनकार कर किसी टूटे हुए अलसाए भाव से अंगड़ाई ली।सस्ती-सी रेशमी सलवार पर गहरे गुलाबी रंग की कमीज़ और कमीज़ में लिपटी हुई थकी-टूटी देह और देह के भार से अकड़ी हुए, एक औरत की हड्डियां जैसे चरमरा उठी।दरवाज़े पर लगी रंग-बिरंगी मोतियों की झालर कोठों पर से आती हुई फीकी हवा से ज़रा हिलकर मौन हो गई।कोने पर पड़ी मेज पर नीले से फूलदान में कई दिनों के मुरझाए फूल सलवटों से भरी मैली शय्या को देखकर संकोच में डूब गए. मगर शम्मोबीवी के लिए यह सब कुछ नया नहीं।संकोच में डूबे हुए फूलों पर उसकी नज़र नहीं जाती। उनसे कहीं अधिक वह स्वयं उस गर्त में डूबी है, जहां संकोच अर्थहीन हो जाता है।सालों पुराने इस पानदान में से पान लगाकर चबाते-चबाते उसे यह सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि पान का रस चूस लेने पर पीकदान में थूकने की आदत क्यों बेमतलब नहीं?
और आज शम्मोबीवी जानती है कि आज़ादी का दिन है।जिन कोठों पर बैठकर वह राहगीरों को निमन्त्रण दिया करती है, उन्हीं पर आज तिरंगी झण्डियां लगाई जाएगी। ‘भूरे-भूरे’ उसने आवाज़ लगाई।शम्मोजान की सीढ़ियों पर बैठा भूरा किसी नौजवान छोकरे को हाथ के इशारे से शम्मो के शरीर का नाप बतलाते हुए ऊपर आ पहुंचा और बोला,‘हां, बाई आज झण्डियां लोगी न?’
‘रौशनी भी करनी है भूरे।’
‘ज़रूर, बाई! लीलो, चम्पा, बन्नो सबके कोठे सज चुके हैं।’ और भूरे ने अपनी सुरमा-लगी तीखी आंखों से एक बार शम्मोजान को सिर से पांव तक देखकर उसके गले के नीचे लगे सोने के बटनों पर अपनी नज़र टिका दी।
शम्मोजान ने उस टकटकी को समझते हुए भी उसे अनदेखा करके कहा,‘‘ज़रा जल्दी करना भूरे, फिर लोग आ जाएंगे।’’
भूरे ने अनमने भाव से झण्डियां लगानी शुरू की।पतले-पतले पतंग के काग़ज़ों की-सी आवाज़ शम्मोजान अंदर बैठी सुन रही है. उसके पोले पड़े दांत सुपारी चबाते जा रहे हैं. सामने-वाले कमरे से मुन्नीजान निकल आई और बोली,‘कहो बहन, क्या हो रहा है; आज तो पूरा बाज़ार सजा है।’
हां मुन्नी,‘आज तो शहर-भर में रौशनी है।’
बीच में ही बात काटते हुए मुन्नीजान ने अपने कर्कश और फटे से स्वर में कहा,‘लेकिन यह क्यों हो रहा है, क्यों हो रहा है?’ और यह सवाल करते हुए अपना महीन दुपट्टा मैले-से गावत किए पर फेंक मुन्नीजान चारपाई पर लुढ़क गई। उसके तलवों पर बदरंग-सी मेहंदी लगी थी।
शम्मोजान ने कहा,‘आज आज़ादी का दिन है मुन्नी।’
‘दिन नहीं, रात कहो, रात।’
मुन्नी ने ऐसे चीख कर कहा, मानों कहीं पड़ी हुई दरारों से फूटकर उसकी आवाज़ बाहर निकल आना चाहती हो और वह अपने पपड़ी-जमे होठों को फैलाकर हंस पड़ी।
शम्मोजान ने सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से उसकी ओर देखा और कहा,‘मुन्नी, कहते हैं, आज लोगों को आज़ादी मिल रही है, जलूस निकल रहे हैं, जलसे हो रहे है।’
मुन्नी ने अपनी कसी और तंग कमीज में से ज़रा लम्बी सांस लेकर कहा,‘क्या कहा, आज़ादी? लोगों को आज मिल रही है आज़ादी! आज़ादी तो हमारे पास है. हम-सा आज़ाद कौन होगा, शम्मोजान?’और हा-हा अट्टहास कर गुलाबी रंग से लिपी-पुती नारी-देह लट्ठे की मैली चादर पर फैल गई।
शम्मोजान कब तक वहां बैठी रही, मुन्नी को कोई ख़बर नहीं।बेख़बर सोची पड़ी मुन्नी के अंग-प्रत्यंग की थकान को शम्मो समझ रही है। अपने अन्दर ढंके परदों को उघाड़कर अगर वह भी देखे, तो एक टूटी आहत छाया उसकी उनींदी आंखों में झलक जाएगी।सालों बीते जब शम्मोजान लाज-शर्म छोड़कर पहली बार इन दीवारों के अन्दर बैठकर मुस्करा दी थी कि अब वह आज़ाद है। जिस आज़ादी को अभी-अभी मुन्नी ने अपनी बेसुरी आवाज़ में याद किया था, वह आज कितनी विकृत और कितनी कुरूप हो चुकी है, यह आज उसे भूला नहीं।
रात काफ़ी हो चुकी. बाहर रौशनी अधिक है, पर बाज़ार मन्दा है।ग्राहक बड़ी-बड़ी इमारतों पर लगी रौशनी देखने में व्यस्त है।कितनी ही बाइयां तिरंगों से सजे अपने कोठों पर खड़ी-खड़ी उन बाहों की प्रतीक्षा कर रही हैं, जो अधिक नहीं, तो आज की रात तो उन्हें बांध सकें. वे जानती है कि यह रोज़-रोज़ का टूटना, जुड़ना और छूटना… वर्षों से बस एक ही काम! अगर किसी दिन उस पर विराम आ गया तो शिथिल हो गए हाथों पैरों में धीमे-धीमे बहता रक्त एकबारगी जम जाएगा।
शम्मोजान देखती है कि मुन्नी आज जिस आज़ादी की बात सोचकर गहरी नींद में सो गई है, उससे उठकर क्या वह फिर अपनी मलिन आंखों को कज़रारा करेगी, क्या वह अपने बालों को मोतियों से संवारकर छज्जे पर जा खड़ी होगी? शम्मो को मुन्नी के लिए इसमें शक है, अपने लिए नहीं. वह तो अभी जग रही है, सोई नहीं है. वह जो कुछ है, अपने आम से भूली हुई नहीं है. लेकिन भूलना क्या, उसे तो याद करने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती. यह ठीक है कि उसे अभी ज़िंदगी काटनी है, अपने को बेचना नहीं, ख़रीदना है, ऐसे दामों में जिन्हें वह क्या, उसके कुल के वे सब देवी-देवता भी न चुका पाएंगे, जिनके द्वार पर उसने नहीं, तो उसके पूर्वजनों ने नाक रगड़कर वह वरदान प्राप्त किया होगा।मगर वह सब कुछ क्यों दुहराए?
मुन्नीजान को उसी बेहोशी में छोड़ शम्मोजान कोठे पर आ खड़ी हुई। उसी समय भूरे ने अपने गलीज-से स्वर में कहा,‘बाहर, चलो, आज अच्छी चीज़ लाया हूं।’
एक लम्बी ‘हूं’ के बाद क्षण-भर विराम लेकर शम्मो ने एक बार अटकी-सी नज़र से आज़ादी के चिरागों को देखा, हवा में खड़खड़ाती उन झण्डियों को देखा और फिर अपने सधे-सधाए क़दम उठाकर कमरे की ओर चल पड़ी।
बाहर झण्डे हवा में लहरा रहे थे, चिराग हल्के-हल्के जल रहे थे, लोग आज़ादी से गले मिल रहे थे और अन्दर शम्मोजान अपनी पुरानी आज़ादी बांट रही थी, जो उसके पास शायद अभी भी बहुत थी… बहुत थी।

(साभार – फेमिना)

अमेरिका : 10 लाख से ज्यादा लोगों ने बेरोजगारी बीमा के लिए किया आवेदन!

वॉशिंगटन : कोरोना वायरस के प्रकोप ने शारीरिक और मानसिक क्षति के साथ ही आर्थिक रूप से क्षति पहुँचाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। अमेरिका में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमण के मामले पाये गये हैं। सूत्रों के मुताबिक वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में सामने आया है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण लेबर मार्केट के लगातार नुकसान हो रहा है। अमेरिका में बेरोजगारी बीमा के लिए पहली बार 1.1 मिलियन लोगों ने आवेदन किया है। सूत्रों का कहना है कि इसे देखकर कोरोना के प्रभाव का अंदाजा साफ-साफ लगाया जा सकता है।

अब फेसबुक पर लाइव आया अलीपुर चिड़ियाघर

कोलकाता : कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से महानगर स्थित अलीपुर चिड़ियाघर में दर्शकों की एंट्री लम्बे समय से बंद है लेकिन राज्य सरकार की पहल से अब लोग घर बैठे ही चिड़ियाखान का लाइव आनन्द उठा रहे हैं। गत 16 अगस्त को राज्य के मंत्री राजीव बंद्योपाध्याय ने चिड़ियाघर के लाइव टेलीकास्ट का उद्घाटन किया था। पिछले 4 दिनों से कोलकाता के अलीपुर चिड़ियाखान ने लाइव स्ट्रिमिंग शुरू हो चुकी है। अलीपुर चिड़ियाघर के फेसबुक पेज पर दिन में 2-3 बार लाइव स्ट्रिमिंग की जा रही है। चिड़ियाघर के इस पहल से दर्शक भी काफी खुश हैं। सिर्फ इतना ही नहीं दर्शक कमेंट में अपनी पसंद के जानवरों को भी दिखाने की मांग कर रहे हैं। चिड़ियाघर प्रबंधन द्वारा उठाये जा रहे इस कदम की सभी सराहना कर रहे हैं। इसके साथ ही सभी मंत्री राजीव बंद्योपाध्याय का धन्यवाद ज्ञापन कर रहे हैं। अलीपुर चिड़ियाघर की इस पहल से दर्शक काफी खुश हैं। दर्शक लाइव के दौरान कमेंट कर अपने पसंदीदा जानवर, पक्षी, साँप आदि को देखने की माँग कर रहे हैं, जिसे प्रबंधन की ओर से पूरी करने की कोशिश की जा रही है। चिड़ियाखाना के लाइव पेज पर जाने के लिए https://www.facebook.com/kolkatazoo.alipore.5 लिंक पर क्लिक करें।

2020 के अंत तक कोलकाता को मिलेगी 50 नयी इलेक्ट्रिक बसों की सौगात

कोलकाता : महानगर में वेस्ट बंगाल ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की ओर से इलेक्ट्रिक बसों का सफल परिचालन किया जा रहा है। प्रदूषण रहित ये बसें लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही हैं। डब्ल्यूटीसी  सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार साल 2020 के अंत तक कोलकाता शहर में 50 नयी इलेक्ट्रिक बसों की खेप आने वाली है। वर्तमान समय में डब्ल्यूटीसी द्वारा 80 ई-बसों (E-Buses) का परिचालन किया जा रहा है, जो नयी खेप आने के बाद बढ़कर 130 हो जाएगी। डब्ल्यूटीसी  ने सेवा से जल्द जुड़ने वाली 50 नयी ई बसों के सप्लाई, ऑपरेशन व मेंटेनेन्स के लिए पूरा खाका तैयार कर लिया गया है। इस साल के अंत तक महानगर में आने वाली 50 नयी एसी इलेक्ट्रिक बसों का परिचालन न्यूटाउन, बलाका, शापुरजी डिपो से होगा।

गेवो में दर्ज हुआ कोलकाता की इलेक्ट्रिक बसों का नाम

स्टेकहोल्डर्स के साथ सामंजस्य व कुशल परिचालन के लिए कोलकाता की ई बसों को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धि मिली है। हाल ही में ग्लोबल इलेक्ट्रिक व्हेकल आउटलुक  में कोलकाता की सफल इलेक्ट्रिक बसों को स्थान मिला है। कोलकाता ने विश्व के 3 अन्य शहरों के साथ GEVO में अपना नाम दर्ज करवाया है। Kolkata (India) कोलकाता के अलावा बाकी 3 शहर शंघाई, हेलसिंकी और सैन्टिगो को गेवो में जगह मिली है।

ई बसों के फायदे

इलेक्ट्रिक बसें दिखने में जितने शानदार लगती हैं उनके फायदे उससे कहीं ज्यादा है। ई बस वायु प्रदूषण नहीं होने देतीं। रिपोर्ट की माने तो साल 2030 तक ई बस कार्बन डाई ऑक्साइड के वार्षिक उत्सर्जन को 200,000 टन कम कर देगा।

बस डिपो में सौर ऊर्जा इस्तेमाल करने की तैयारी

डब्ल्यूटीसी अपने बस डिपो को सौर ऊर्जा से लैस करने की तैयारी की जा रही है। इसके साथ हगी डिपो में बैट्री स्टोरेज का भी व्यवहार होगा, जो परिवहन सिस्टम को डिकार्बोनाइजिंग करने में मददगार होगा। कोलकाता में स्थायी हरित गतिशीलता को बढ़ाने के उद्देश्य से उक्त पहल की जा रही है।

(साभार – नयी आवाज डॉट कॉम)

जल्द जून का संशोधित बिजली बिल भेजेगी सीईएससी, जुलाई का बिल आएगा…

कोलकाता : महानगर में बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनी कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉरपोरेशन (सीईएससी) की ओर से जल्द अपने उपभोक्ताओँ को जून महीने का संशोधित बिल भेजा जाएगा। सीईएससी के एक वरिष्ठ अधिकारी की ओर से इसकी जानकारी मिली है। उन्होंने कहा कि जुलाई महीने में लॉकडाउन खुलने के बाद सीईएससी की ओर से उपभोक्ताओं के मीटर की रीडिंग की गयी थी लेकिन अभी उन्हें जुलाई का बिल नहीं भेजा जाएगा। गौरतलब है कि लॉकडाउन के बाद जब सीईएससी की ओर से उपभोक्ताओं को बिजली का बिल भेजा गया तो उपभोक्ताओं ने कंपनी पर ज्यादा बिल भेजने का आरोप लगाया था। यहाँ तक कि राज्य के बिजली मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय के घर भी ज्यादा बिजली बिल भेजा गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने सीईएससी को सख्त हिदायत दी थी, जिसके बाद कंपनी ने उपभोक्ताओं को राहत दी थी। सीईएससी के अधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी उपभोक्ताओं को बताया जा रहा था कि कंपनी जून का बिल जल्द साझा करेगी। पता चला है कि जिन लोगों ने जून के बिल का भुगतान कर दिया है उनका बिल अमाउंट अलग होने पर उसे अगले बिल के साथ एडजस्ट कर दिया जाएगा। वहीं जुलाई महीने का बिल कंपनी जून के बिल के आने के 27-30 दिनों के बाद भेजेगी। ताकि उपभोक्ताओं को भुगतान करने में परेशानी का सामना न करना पड़े।

(साभार – नयी आवाज डॉट कॉम)

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भारतीय भाषा साहित्य – आश्चर्य छवि

लेखक – सुकुमार राय, 

बांग्ला से अनुवाद –   शुभस्वप्ना मुखोपाध्याय

जापान में एक बार किकिस्तुम नाम का एक किसान रहता था। बहुत गरीब किसान, और जितना गरीब , उतना ही मूर्ख भी था। वह दुनिया की कोई खबर नहीं जानता था; वह केवल खेती के बारे में, गाँव के लोगों के बारे में और गाँव के पुराने ‘बन्जे’ (पुजारी) की अच्छी सलाह के बारे में जानता था। किसान की पत्नी, उसका नाम लिलित्सि है। लिलित्सी एक अच्छी गृहिणी थी । घर के अंदर के सभी फर्नीचर को साफ और सुन्दर से सजाकर रखती, और इतना लजीज खाना से बनाती थी कि किसान की उसकी पत्नी के लिए तारीफ भी कम पड़ जाती थी। किकित्समम बस कहता था, “मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूं, मैंने बहुत कुछ देखा और सुना है, लेकिन मैंने कभी ऐसा कुछ नहीं देखा।” लिलित्सी सुनते ही खुश हो जाती थी।

एक दिन, एक शहरी आदमी गाँव देखने आया; उसके साथ उसकी छोटी लड़की थी, और लड़की के पास एक छोटा दर्पण था। गली से नीचे जाते समय लड़की के हाथ से आईना कब गिर गया, कोई नहीं देखा था। जब किकित्सुम खेत से घर लौट रहा था, तो उसने सड़क के किनारे घास के ऊपर एक चमकीली वस्तु को देखा। उसने ऊपर उठाया तो देखा, कोई एक चपटे आकार की अजीब चीज है ! उसने कभी दर्पण में अपनी शक्ल नहीं देखी थी , इसलिए उसने सोचा ” यह कौन है रे बाबा! आरसी का चारों ओर से निरीक्षण करते समय , उसने अचानक आरसी के अंदर खुद की छाया देखी। उसने इसे देखकर इतना चौंक गया कि दर्पण उसके हाथ से गिर रहा था। फिर, बहुत सोच-विचार के बाद, उन्होंने फैसला किया ” यह मेरे पिता की तस्वीर है, शायद देवताओं ने खुशी-खुशी मुझे भेजा है ।” उनके पिता का देहान्त हुए काफी समय हो गया है, लेकिन उसने फिर भी सोचा, हाँ, वे ऐसे ही दिखते थे। फिर कितने आश्चर्य की बात ! तस्वीर में उस व्यक्ति के गले में वैसा ही ताबीज लटक रहा था, जैसा ताबीज उसके गले में था , जो वह हमेशा अपने गले में पहना था अब उसे यकीन हो गया कि यह उसके पिता की तस्वीर थी।

तब किकत्सुम ने दर्पण को एक कागज में लपेटकर घर ले आया। जब वह घर आया, तो उसने सोचा, वह तस्वीर कहाँ रखी जाए ? अगर उसकी पत्नी को छोड़ दिया जाए, तो वह पड़ोस की लड़कियों को कहानियाँ सुना सकती है और तब गाँव में हर कोई आकर तस्वीर को देखना चाहेगा। गाँव के बेवकूफ उस तस्वीर की गरिमा को नहीं समझेंगे, वे केवल ‘तमाशा’ देखने आएंगे! ऐसा नहीं होगा क्योंकि कोई बच्चा यह नहीं सह सकता कि कोई भी आकर उसके पिता की तस्वीर को गंदे हाथों छूएँ। यह तस्वीर किसी को नहीं दिखाई जाएगी, लिलित्सी को भी इसके बारे में नहीं बताया जाएगा।

किकत्सुम घर आया और आरसी को एक पुरानी फूलदान में छिपा दिया। लेकिन उसका मन बिल्कुल भी शांत नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद वह एक बार जाँचता है कि क्या वह सचमुच कोई तस्वीर है। अगले दिन, जब वह खेत में काम कर रहा था, उसने अचानक सोचा, ‘क्या आपके पास तस्वीर है?’ तुरंत वह अपना काम छोड़कर देखने के लिए दौड़ता हुआ आया। यह देखकर कि वह शांति से बाहर जाएगा, लिलित्सी तब कमरे में आई। लिलित्सी ने कहा, “क्या बिल्ली आई है? आप दोपहर को वापस आए? क्या आप बीमार हैं?” किकित्सुम ने सदमे में कहा, “नहीं, नहीं, मैं अचानक आपको देखना चाहता था, इसलिए मैं घर आया।” लिलित्सी को यह सुनकर बहुत खुशी हुई। फिर एक दिन किकत्सुम गुप्त रूप से चित्र देखने आया और उसे फिर से उसकी पत्नी ने पकड़ लिया। उस दिन भी उन्होंने कहा था, “आपका वह खूबसूरत-सा चेहरा कई बार देखने का मन करता है है, इसलिए मैं इसे एक बार देखने के लिए दौड़ता हुआ आया।” उस दिन, हालांकि, लिलिट्सी ने थोड़ा परेशान महसूस किया। उसने सोचा, ‘जहां, इतने लंबे समय तक काम करने के बाद, वह मुझे देखने कभी नहीं आया, आजकल ऐसा क्यों हो रहा है?’

फिर एक दिन किकित्सुम तस्वीर देखने आया। उस दिन लिलित्सी ने ध्यान नहीं दिया – उसने चुपचाप बाड़ में खाई के माध्यम से देखा – किकितम ने फूलदान से कुछ देखा, फिर बहुत खुशी से उसे साफ करके वापस रख दिया। जैसे ही किकित्सुम ने छोड़ा, लिलित्सी ने दौड़कर कागज़ से लिपटी हुई आरसी को बाहर निकाली। फिर उसने अंदर देखा तो एक बहुत ही सुंदर लड़की की तस्वीर देखी!

फिर वह आग बबूला हो उठी । वह गुस्से में चिल्लाने लगी, “इसीलिए रोज रोज घर आता है।” छिः कितनी कुरूप लड़की है! हठी चेहरा, रूखी नाक, आंसू भरी आंखें, मेरे ही जैसे बाल बंधे! चेहरे पर क्या जलन दिख रही है! लिलित्सी की आंखों में आंसू आ गए और वह रोते हुए जमीन पर लेट गई। फिर उसने अपनी आँखें पोंछीं और एक बार फिर आरसी की तरफ देखा और कहा, “किसी लड़की का रोने वाला चेहरा भी किसी को पसंद आता है जो कि देखो!” उसने फिर दर्पण को अपने पास छिपा लिया।

शाम को, किकेत्सुम घर आया और उसने देखा कि लिलित्सी अपने चेहरे को ढँके फर्श पर बैठी है। वह व्यस्त था और कहा, “क्या हुआ?” लिलिटत्सी ने कहा, “रूको ठहरो, तुम्हें स्नेह दिखाने की ज़रूरत नहीं है – अपने साधु की तस्वीर खींचो। उसका ध्यान रखो, उसका ख्याल रखो, उसे अपने सिर पर रखो।” तब किकेत्सुम ने गंभीरता से कहा, “आप मेरी तस्वीर को अनदेखा कर रहे हैं – आप जानते हैं कि यह मेरे पिता की तस्वीर है?” लिलित्सी ने गुस्से में कहा, “हाँ, आपके पिता की तस्वीर! मैं एक छोटी लड़की हूँ, बस एक बात बताइए! क्या आपके पिता एक खुशमिजाज लड़की की तरह दिखते हैं? क्या उन्होंने हमारी तरह ही गाँठ बाँधी है?” किकेत्सुम कहता है “आप मुझे देखे बिना क्यों नाराज़ हैं? एक बार अच्छे से देखो ।” इस पर किकेत्सुम ने खुद को फिर से देखा, आरसी में उसी का चेहरा था।

फिर दोनों के बीच भयानक झगड़ा शुरू हो गया। किकित्सुम कहता है कि यह उसके पिता की तस्वीर है, लिलित्सी का कहना है कि यह एक ईर्ष्यालु लड़की की तस्वीर है। ऐसा एक तर्क चल रहा है, ऐसे समय में गाँव का बूढ़ा आदमी, ‘बंजी ठाकुर ’, यह देखने आया था कि जब उनकी इतनी ज़ोर की आवाज़ सुनाई दे तो क्या बात थी! उनको देखकर दोनों ने उनका अभिवादन किया और उनसे शिकायत की। किकित्सुम ने कहा, “देखिए, यह मेरे पिता की एक तस्वीर है, मुझे उस दिन सड़क पर मिले, और वह कहती हैं कि यह एक लड़की की तस्वीर है।” लिलित्सी ने कहा, “आप देख रहे हैं कि क्या गलत है! वह एक उदास लड़की की तस्वीर लाया है, और अब मुझे, वह, उसको अपने पिता बता रहे हैं!” तब ‘बंजी ठाकुर ने कहा, “मुझे देखने दो।” उन्होंने आरसी को पांच मिनट तक गंभीरता से देखा। फिर उसने दर्पण को झुकाया और कहा, “आप लोगों ने गलत समझा है। यह एक बहुत प्राचीन महापुरुष की तस्वीर है। मैं देख सकता हूं कि वह एक आदमी नहीं है।” इस तस्वीर को इस तरह नहीं रखा जाना चाहिए, एक बड़ा मंदिर बनाना चाहिए, उसमें एक पत्थर की वेदी बनाई जानी चाहिए, उसमें एक चित्र गैलरी रखी जानी चाहिए और फूलों तथा धूप से सम्मानित किया जाना चाहिए। ”

यह कहने के बाद, ‘बंजी’ ठाकुर ने आरसी का साथ छोड़ दिया। और किकित्सुम और लिलित्सी झगड़ा भूल गए और खुशी से खाना खाने बैठ गए।

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