Friday, June 26, 2026
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भारत में आई2प्योर ने लांच किया ‘आई2क्योर’

नयी दिल्ली : वैश्विक महामारी के मद्देनजर आई2प्योर ने आज भारत में आई2क्योर पेश किया है। जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी ने इसमेें मोलेक्यूलर आयोडीन के जैव-रासायनिक गुणों का लाभ लिया है।
आई2क्योर डॉ. जैक केसलर (आई2क्योर के पिता) की दिमाग उपज है और यह एफडीए के नियमों का अनुपालन करता है और आईएसओ 9001ः 2015 और डब्ल्यूएचओ जीएमपी प्रमाणित प्रोडक्ट है। डॉ. जैक केसलर के आविष्कारों के लिए उनके नाम लगभग 26 पेटेंट दर्ज हैं। (इस संख्या में शामिल हैं ऐसे पेटेंट जिनके आवेदन किए गए हैं और जो संयुक्त राज्य अमेरिका के पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय (यूएसपीटीओ) से मान्यता प्राप्त हैं।)
आई2क्योर एक बायो-शील्ड एंटीसेप्टिक लोशन है। उपयोग में आसान यह सिंगल-यूज़ ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीमाइक्रोबियल है जो कोविड-19 के खिलाफ आयोडीन की सुरक्षा प्रदान करता है। अल्कोहल-आधारित सैनिटाइजर से भिन्न आई2क्योर 12-घंटे तक वायरस, बैक्टीरिया और फंगस के खतरों से संपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त आयोडीन त्वचा को पोषण और नमी देता है जबकि अल्कोहल-आधारित प्रेडक्ट त्वचा में सूखापन और दरार पैदा करते हैं।
नयी पेशकश पर डॉ. जैक केसलर (आई 2 क्योर के आविष्कारक) ने कहा, ”आई2क्योर पेश करने का मकसद दुनिया को ऐसा प्रोडक्ट देना है जो कीटाणुओं और रोगाणुओं के खिलाफ केवल छोटी अवधि की सतही सुरक्षा नहीं दे बल्कि इससे बढ़ कर लाभदायक हो। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए हम ने वर्षों के शोध से एक फाॅर्मूला तैयार किया है जो हमें हमारे अदृश्य, सूक्ष्म दुश्मन पर जीत दिलाएगा। आई2क्योर तुरत-फुरत काम आने वाले कीटाणुनाशक से भिन्न आपकी त्वचा की रक्षा के लिए त्वचा के लिए हानिकारक अल्कोहल के बजाय मोलेक्यूलर आयोडीन का उपयोग करता है। आई2क्योर का पेटेंट मोलेक्यूलर आयोडीन फाॅर्मूला वास्तव में त्वचा में समा जाता है और फिर भाप बन कर बाहर आता है जो आपके हाथों की त्वचा को 12 घंटे तक रोगाणुरोधी बना देता है।”
डगलस स्पिट्ज (मुख्य कार्यकारी अधिकारी, आई2क्योर) ने बताया, “हम हमारे अदृश्य, अत्यंत सूक्ष्म दुश्मनों का खात्मा करने का समाधान देने की दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं। कोई2क्योर में हम एक क्रांति चाहते थे। हाथों की सच्ची सुरक्षा का समाधान चाहते थे और हम ने यह कर दिखाया। हम ने सक्रिय तत्व के रूप में मोलेक्यूलर आयोडीन इस्तेमाल कर कीटाणुनाशक का विकास किया। चिकित्सा विज्ञान में आयोडीन की गिनती सबसे पुराने और सबसे प्रभावी रोगाणुरोधी एजेंटों में होती है। इसलिए हम ने आयोडीन के असर को एक कदम बढ़ा कर त्वचा के अंदर फ्री मोलेक्यूलर आयोडीन पहुंचा दिया है। इतना ही नहीं, कोई बैक्टीरिया या वायरस आयोडीन प्रतिरोधी नहीं है इसलिए इससे कोई दवा प्रतिरोधी रोगजनक नहीं पैदा होगा।”
आई2क्योर का सक्रिय एजेंट मोलेक्यूलर आयोडीन है। यह आपकी त्वचा में समाता है, और इसका दाग या गंध नहीं लगता है। इस तरह यह धुल कर या रगड़ कर हटता नहीं है।
आई2क्योर के बारे में
आई2क्योर एक जैव प्रौद्योगिकी कंपनी है जिसके प्रमोटर संयुक्त राज्य अमेरिका और सिंगापुर के विज्ञान और व्यवसाय जगत के प्रमुख लोग हैं। आई2क्योर डॉ. जैक केसलर (आई2 के पिता) की दिमाग उपज है और यह एफडीए के नियमों का अनुपालन करता है और आईएसओ 9001ः 2015 और डब्ल्यूएचओ जीएमपी प्रमाणित प्रोडक्ट है। इसके पीछे विचार दुनिया को ऐसा प्रोडक्ट देने का है जो कीटाणुओं और रोगाणुओं के खिलाफ महज थोड़ी अवधि के लिए और सतही सुरक्षा से बढ़ कर संपूर्ण सुरक्षा दे।
आई2क्योर दुनिया की पहली कम्पनी है जिसने मोलेक्यूलर आयोडीन आधारित ‘बायो शील्ड’ पेश किया है। यह हाथों के अंदर समा कर स्वच्छता देता है इसलिए न केवल असरदार बल्कि सुरक्षित भी है। साथ ही, हमारी त्वचा को पोषण भी देता है।
आई2क्योर मोलेक्यूलर आयोडीन आधारित मेक इन इंडिया ‘बायो शील्ड’ है। इसके उत्पादन केंद्र हरिद्वार, रुड़की और बद्दी (हिमाचल) में हैं

कोलकाता : पेट की घातक बीमारियों का चलेगा पता लगाएगी पायरो ब्रीद तकनीक

‘पायरो-ब्रीद’ तकनीक में सांसों के सैंपल से ही पेट के रोग की शुरुआती स्तर पर ही पहचान हो जाएगी
कोलकाता : पेट की बीमारियों का पता लगाने के लिए कोलकाता के एसएन बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंसेज के वैज्ञानिकों ने नया तरीका खोजा है। इस तकनीक से डॉक्टर मरीज की छोड़ी हुई सांस के ब्रीदप्रिंट से पता लगा लेंगे कि पेट में सामान्य संक्रमण है, अल्सर है या फिर कैंसर जैसा कोई घातक रोग है। इस तकनीक की खोज करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि इस तकनीक में किसी रोगी के सांसों के सैंपल से ही पेट के रोग की शुरुआती स्तर पर ही पहचान हो जाएगी। इसे ‘पायरो-ब्रीद’ नाम दिया है।

ब्रीदप्रिंट एक तरह से फिंगरप्रिंट की तरह है, जो अनूठा होता है
सेंटर के वैज्ञानिक डॉ. माणिक प्रधान ने बताया कि ‘पायरो-ब्रीद’ एक तरह का गैस एनालाइजर है, जो वापस आ रही सांस में मौजूद गैस व कणों के खास किस्म के ब्रीद-प्रिंट को स्कैन कर सकता है। ब्रीदप्रिंट एक तरह से फिंगरप्रिंट की तरह है, जो हर व्यक्ति का बिल्कुल अनूठा होता है।
एक हजार से अधिक मरीजों पर तकनीक का किया इस्तेमाल
कोलकाता के साल्टलेक स्थित एएमआरआइ अस्पताल में एक हजार से अधिक मरीजों पर इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिसके परिणाम संतोषजनक आए और यह एंडोस्कोपी टेस्ट की तुलना में 96 प्रतिशत सटीक पाया गया है। वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का पेटेंट करा लिया है और इसकी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की प्रक्रिया चल रही है। इसका व्यावसायिक उत्पादन अगले साल तक शुरू हो जाएगा।

15 अक्टूबर से खुलेंगे शिक्षण संस्थान, शिक्षा मंत्रालय ने जारी किए दिशा – निर्देश

नयी दिल्ली : कोरोना वायरस महामारी के बीच जनजीवन सामान्‍य करने की कोशिशें जारी हैं। 21 सितंबर से जहां राज्‍यों को कक्षा 9 से 12 तक के स्‍कूल खोलने की छूट दी गयी थी। तो, 15 अक्‍टूबर से सभी स्‍कूल खोलने की अनुमति दे दी है। हालांकि फिलहाल यह छूट केवल नॉन-कंटेनमेंट जोन में आने वाले इलाकों के लिए दी गयी है। स्‍कूल कब से खोले जाएं, वह तारीख राज्‍य सरकारें तय करेंगी। शिक्षा मंत्रालय ने स्‍कूल और उच्च शिक्षण संस्थानों को खोलने को लेकर गाइडलाइंस जारी कर दी हैं। इसी के आधार पर राज्‍यों को अपनी गाइडलाइंस तय करनी होंगी। स्‍कूल खोलने का स्‍टैंटर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) पहले ही जारी किया जा चुका है। जिसमें कोविड से जुड़ी सावधानियों के बारे में विस्‍तार से बताया गया था। आइए जानते हैं नये दिशा – निर्देशों में क्‍या है।
स्‍कूलों, कोचिंग संस्‍थानों के लिए क्‍या हैं दिशा – निर्देश?
राज्‍य सरकारें स्‍कूल/कोचिंग प्रबन्धन  से बातचीत के बाद इन शर्तों को ध्‍यान में रखते हुए फैसला कर सकती हैं:
ऑनलाइन/डिस्‍टेंस लर्निंग को प्राथमिकता और बढ़ावा दिया जाएगा।
अगर स्‍टूडेंट्स ऑनलाइन क्‍लास करना चाहते हैं तो उन्‍हें इसकी इजाजत दी जाए।
विद्यार्थी केवल अभिभावकों की लिखित अनुमति के बाद ही स्‍कूल/कोचिंग आ सकते हैं। उनपर अटेंडेंस का कोई दबाव न डाला जाए।
स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा के लिए शिक्षा विभाग की एसओपी के आधार पर राज्‍य अपनी SOP तैयार करेंगे।
जो भी स्‍कूल खुलेंगे, उन्‍हें अनिवार्य रूप से राज्‍य के शिक्षा विभागों की एसओपी का पालन करना होगा।
कॉलेज, उच्‍च शिक्षा संस्‍थान खोलने के नियम
कॉलेज और उच्च शिक्षण संस्थान कब खुलेंगे, इस पर फैसला उच्‍च शिक्षा विभाग करेगा। इसके लिए गृह मंत्रालय से भी बात की जाएगी।

शिक्षा मंत्रालय के दिशा – निर्देश इस प्रकार हैं:
ऑनलाइन/डिस्‍टेंस लर्निंग को प्राथमिकता और बढ़ावा।
फिलहाल केवल शोधार्थी और पीजी के वो स्‍टूडेंट्स जिन्‍हे लैब में काम करना पड़ता है, उनके लिए ही संस्‍थान खुलेंगे। इसमें भी केंद्र से सहायता पाने वाले संस्‍थानों में, उसका हेड तय करेगा कि लैब वर्क की जरूरत है या नहीं। राज्‍यों की निजी विश्वविद्यालय तथा संस्थान अपने यहां की स्‍थानीय गाइडलाइंस के हिसाब से खुल सकते हैं।

अमेरिका में एक तिहाई महिलाएं कोविड-19 के तनाव के बीच छोड़ना चाहती हैं नौकरी

अमेरिका में 317 फर्म की 40,000 महिला कर्मचारियों पर किया गया सर्वे

अधिकांश महिलाओं को इस बात की फिक्र लगी रहती है कि घर में बच्चों की देखभाल के चलते कहीं उनकी दफ्तर में प्रदर्शन न प्रभावित हो 

वॉशिंगटन : कोविड -19 ने महिलाओं की जिन्दगी पर बुरा असर डाला है और हालत यह है कि लॉकडाउन, घर और दफ्तर के काम के तनाव से परेशान होकर नौकरी छोड़ देने की इच्छा तक जता दी है। अमेरिका में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है। ये रिपोर्ट मानती है कि अगर भविष्य में कंपनियों की संख्या बढ़ती है तो लिंग विविधता की वजह से कई कंपनियों को काम करने के लिए महिला कर्मचारियों का मिलना मुश्किल हो जाएगा
एक रिपोर्ट के अनुसार, कोविड -19 के कारण लाखों महिलाएं अपने कॅरियर को बदलने या नौकरी छोड़ने पर विचार कर रही हैं। कोरोना काल के चलते पिछले कुछ महीनों से वर्क फ्रॉम होम करते हुए इन्हें दोहरी जिम्मेदारियों को निभाना पड़ रहा है।
एक और ऑफिस के काम का दबाव तो दूसरी ओर घर में बच्चों की देखभाल का जिम्मा भी इन्हीं पर है। ऐसे हालात में अपने पार्टनर या घर के अन्य सदस्यों की तरफ से मदद न मिलने पर वे अपना करिअर छोड़ने पर मजबूर हैं। यह सर्वे महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘लीन इन’ द्वारा किया गया। इसकी स्थापना फेसबुक की सीओओ शेरिल सैंडबर्ग द्वारा 2013 में हुई थी।

यह सर्वे अमेरिका में 317 फर्म की 40,000 महिला कर्मचारियों पर किया गया। इसमें ये पाया गया कि एक तिहाई महिलाएं काम के तनाव की वजह से जॉब छोड़ना चाहती हैं, वहीं अधिकांश महिलाओं को इस बात की फिक्र लगी रहती है कि घर में बच्चों की देखभाल के चलते कहीं उनकी ऑफिशियल परफॉर्मेंस प्रभावित न हो जाए। इस सर्वे के नतीजे यह भी बताते हैं कि महिलाओं के बजाय पुरुषों पर बच्चों की जिम्मेदारी कम होती है। इस वजह से उनका जॉब घर की जिम्मेदारियों के चलते प्रभावित नहीं होता है।
ये रिपोर्ट मानती है कि अगर भविष्य में कंपनियों की संख्या बढ़ती है तो लिंग विविधता की वजह से कई कंपनियों को काम करने के लिए महिला कर्मचारियों का मिलना मुश्किल हो जाएगा। पिछले छह सालों के दौरान अगर कार्यस्थल पर महिलाओं के परफॉर्मेंस की बात की जाए तो उन्होंने मैनेजमेंट के हर स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया है। लेकिन महिलाओं द्वारा पिछले कई सालों के दौरान अपने काम के प्रति गंभीरता को इस साल की महामारी ने कम कर दिया।
इसकी वजह उन पर पड़ने वाली दोहरी जिम्मेदारी है। महामारी के दौरान घर में रहते हुए उन्हें बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस में शामिल होना पड़ता है। इसके अलावा घर के कामों का असर ऑफिस के कामों को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में अगर वे नौकरी छोड़ने के बारे में सोचती हैं तो आर्थिक असुरक्षा की भावना के चलते उनके लिए ये फैसला लेना भी मुश्किल है। एक कंपनी की वाइस प्रेसीडेंट और दो बच्चों की मां से जब महामारी के दौरान अपनी ऑफिशियल परफॉर्मेंस के बारे में बात की गई तो वह कहने लगी – ”मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं हर मोर्चे पर असफल हो रही हूं। ऑफिशियल वर्क की वजह से मेरे पास बच्चों को देने के लिए पर्याप्त समय नहीं है, वहीं बच्चों की देखभाल करते हुए मैं ऑफिस का काम समय पर नहीं कर पा रही हूं”।
(साभार – दैनिक भास्कर)

16 अक्टूबर से फ्लिपकार्ट बिग बिलियन डे सेल

नयी दिल्ली : फ्लिपकार्ट ने अपनी बिग बिलियन डे सेल की घोषणा कर दी है। यह सेल 16 अक्टूबर को शुरू होकर 21 अक्टूबर तक चलेगी। अगर आप नया स्मार्टफोन खरीदने की सोच रहे हैं तो यह आपके लिए एक मौका हो सकता है। इस सेल में आपको कई स्मार्टफोन पर शानदार डिस्काउंट और आकर्षक डील्स का लाभ उठाया जा सकता है। कंपनी की वेबसाइट पर सेल की डेट के साथ ऑफर्स व स्मार्टफोन पर मिलने वाली डील्स का खुलासा कर दिया है।
फ्लिपकार्ट बिग बिलियन डे सेल में आपको कई शानदार ऑफर्स का लाभ मिलेगा। इस सेल के तहत एसबीआई क्रेडिट कार्ड पर भी 10 प्रतिशत तक का डिस्काउंट प्राप्त होगा। इसके अलावा सेल में नो कोस्ट ईएमआई विकल्प भी दिया जा रहा है। यानि अब अपने पसंदीदा स्मार्टफोन को नो कोस्ट ईएमआई पर खरीद सकते हें। नो कोस्ट ईएमआई की सुविधा बजाज फिनसर्व कार्ड पर भी उपलब्ध है। इतना ही नहीं पेटीएम वॉलेट और पेटीएम यूपीआई से भुगतान करने पर कैशबैक की भी सुविधा प्राप्त होगी।
फ्लिपकार्ट बिग बिलियन डे सेल में बेस्ट डील्स में मिलने वाले स्मार्टफोन की बात करें तो इस सेल में आप पीओसीओ एम 2 प्रो को 12,999 रुपये में खरीद सकते हैं जबकि इसकी मूल कीमत 16,999 रुपये है। वहीं अगर आप इन्फिनिक्स हॉट 9 प्रो को खरीदने की प्लानिंग कर रहे हैं तो इस सेल में आपको यह स्मार्टफोन 9,499 रुपये में मिल जाएगा। वहीं रियल मी सी 12 C12 के 3GB + 32GB स्टोरेज मॉडल को 10,999 रुपये के बजाय 7,999 रुपये में खरीद सकते हैं।

दशकों तक पुरुषों के वेश में खेतों में काम किया..भाई का परिवार सम्भाला..ऐसी हैं कमला

मुजफ्फरनगर :   वो जिन खेतों में काम कर रवो हीं थी वो उनके भाई की संपत्ति हैं, कमला कहती हैं- मेरे खेत और ये कहते-कहते उनकी जबान रुक जाती है, फिर कहती हैं, अब तो ये भाई के बच्चों के खेत हैं

सफेद कुर्ता पाजामा, सर पर बंधा सफेद साफा, कंधे पर रखा फावड़ा। कमला को कोई दूर से क्या, पास से भी देखे तो धोखा खा जाए कि कोई पुरुष खेत में काम कर रहा है। दिल्ली से करीब 120 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर के मीरापुर दलपत गांव की रहने वाली 63 साल की कमला ने अपनी जिंदगी के चार दशक मर्द बनकर खेतों में काम करते हुए गुजार दिए। एक महिला के लिए मर्द बनकर काम करना आसान नहीं था। लेकिन, जिंदगी के सामने ऐसे मुश्किल हालात थे कि उन्होंने घूंघट उतारकर सर के बाल काट लिए और पगड़ी बांध ली।

किसान परिवार में पैदा हुई कमला होश संभालते ही खेतों में काम करने लगी थीं। शादी हुई तो 17 महीने बाद ही पति की दुखद मौत हो गई। बाद में देवर के साथ उन्हें ‘बिठा दिया’ गया। इस रिश्ते से उन्हें एक बेटी हुई लेकिन, ये रिश्ता ज्यादा नहीं चल सका और वो अपने भाइयों के घर लौट आईं। कमला के छोटे भाई को कैंसर हो गया। दम तोड़न से पहले उन्होंने कमला से वादा लिया कि वो उनके बच्चों को पालेंगी और पत्नी का ध्यान रखेंगी।

कमला कहती हैं, भाई के दोनों बच्चे छोटे थे। कोई सहारा नहीं था। मैंने उनकी जिम्मेदारी संभाल ली और खेती का काम अपने हाथ में ले लिया। लेकिन, महिला के लिए अकेले खेत में जाकर काम करना आसान नहीं था। लोगों की नजरों से बचने के लिए मैंने मर्द का रूप धर लिया। बाल काटे और पगड़ी बांध ली।

भारत के खेतों में महिलाएं सदियों से काम करती रहीं हैं। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस समाज में आज भी मर्दवादी नजरिया हावी है। महिलाएं खेतों पर काम करने जाती तो हैं लेकिन, अकेले नहीं, बल्कि समूहों में या परिवार के दूसरे लोगों के साथ।लेकिन, कमला के अकेले कंधों पर जमीन जोतने-बोने और फसल की देखभाल करने की जिम्मेदारी थी। रात-बेरात खेतों को पानी देने के लिए जाना पड़ता था। मर्दवादी समाज की नजर और तानों से बचने के लिए वो मर्द ही बन गईं। कमला कहती हैं, ‘मैं बेधड़क खेतों में काम करती थी। फसल को पानी देना होता था तो रात को आती थी, सुबह तक काम करके जाती थी। कभी डर महसूस नहीं हुआ। मर्दों की पोशाक ने मुझे सबकी नजरों से बचा लिया।

वो कहती हैं, ‘खेत में काम कर रही एक अकेली औरत के साथ कुछ भी हो सकता था, औरत अकेली हो तो हर आंख उस पर ठहरती है। लेकिन खेत में काम कर रहे अकेले मर्द पर किसी का ध्यान नहीं जाता। कमला ने मर्द बनकर लगभग चार दशकों तक खेतों में काम किया। उन्होंने उम्र के छह दशक पार करने के बाद भी न अपना ये रूप छोड़ा है और ना ही काम करना। कमला कहती हैं कि उन्हें भाग्य ने एक के बाद एक झटके दिए, लेकिन वो कभी डगमगाई और डरीं नहीं।

वो अपने पति की मौत, ससुराल में हुए शोषण को अब याद करना नहीं चाहतीं। इस बारे में सवाल करते ही उनके आंखें पथरा जाती हैं। वो कहती हैं, मैं अब उन सब बातों को याद करना नहीं चाहती। ना ही उसका कोई फायदा है।

कमला ने अपनी पूरी जिंदगी खेतों में काम करते बिता दी। वो कहती हैं, मैं हमेशा काम में लगी रहती थी। दिन में एक वक्त खाकर काम किया। सारा दिन ईख छोलती थी। भाभी से कह देती थी कि खाना देने मत आना, घर आकर ही खाऊंगी। इन खेतों ने हमारा परिवार पाला है। कमला ने सिर्फ खेत में ही काम नहीं किया, बल्कि वो गन्ना डालने मिल भी जाती थीं और मंडी भी। वो कहती हैं, ‘मैं मर्दों के बीच अकेली औरत होती थी। लेकिन लोग पहचान ही नहीं पाते थे कि मैं औरत हूं।’

कमला के इस बात की खुशी है कि उनके एक भतीजे का घर बस गया है और दूसरे की भी जल्द शादी होने वाली है। वो कहती हैं, ‘मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो गया। भाई से जो वादा किया था, निभा दिया।’ हमेशा संघर्ष करती रहीं कमला को उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचने के बाद भी सुकून नहीं है। वो जिन खेतों में काम कर रहीं थी, वो उनके भाई की संपत्ति हैं। खेतों की ओर देखते हुए बात कर रही कमला कहती हैं, ‘मेरे खेत…और ये कहते-कहते उनकी जबान रुक जाती है, खुद को संभालते हुए वो कहती हैं, अब तो ये भाई के बच्चों के खेत हैं।

मुजफ्फरनगर के मीरापुर दलपत गांव की रहने वाली 63 साल की कमला पिछले चार दशकों से अपने खेतों में मर्द बनकर काम कर रही हैं। भारत में पारंपरिक तौर पर पिता की संपत्ति, जमीन-जायदाद भाइयों के हिस्से आती है और बहनों के हिस्से आती है ससुराल, जहां वो बाकी जिंदगी रहती हैं। लेकिन, भारत का कानून बेटियों को भी संपत्ति पर बराबर का हक देता है। कमला ने कभी अपना ये हक लेने के बारे में सोचा तक नहीं है। अब जब उनका शरीर ढल रहा है, उन्हें अपनी आगे की जिंदगी की चिंता हैं। वो कहती हैं, ‘मैं अपने लिए एक कमरा तक नहीं बना सकी। अपना सिर छुपाने के लिए मेरे पास अपनी कोई जगह नहीं है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मुझे घर दिलाने की कोशिश की थी। लेकिन, वो काम भी कोरोना में अटक गया है। बात करते-करते कमला के चेहरे के भाव कई बार बदलते हैं। उनके चेहरे पर भाई के परिवार को पालने का सुकून दिखाई देता है तो अकेलेपन का अफसोस भी और बुढ़ापे को लेकर चिंता भी।

(साभार – दैनिक भास्कर)

गाड़ियों की किश्त नहीं चुकाई, डिफॉल्टर हुए तो गाड़ी उठा सकता है फाइनेंसर : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले कहा है कि कर्ज की किस्तें पूरी होने तक वाहन का मालिक फाइनेंसर ही रहेगा। किस्तों में डिफॉल्ट होने पर यह फाइनेंसर वाहन का कब्जा ले भी सकता है। इसमें कोई अपराध नहीं है।
जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने यह व्यवस्था देते हुए फाइनेंसर की अपील स्वीकार कर ली और उस पर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा लगाया गया जुर्माना रद्द कर दिया। उपभोक्ता अदालतों ने खरीददार से वाहन बिना उचित नोटिस के उठाने पर तथा उसे किस्ते देने का समय न देने पर दो लाख 23 हजार रुपये का हर्जाना अदा करने का आदेश दिया था।
पीठ ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है खरीददार डिफॉल्ट पर था। उसने खुद माना है कि वह सात किश्तें ही चुका पाया था। वहीं फाइनेंसर ने गाड़ी को एक साल बाद यानी 12 महीने के बाद कब्जे में लिया। यह सही है कि फाइनेंसर परचेजर एग्रीमेंट में वाहन जब्त करने से पहले नोटिस देने का प्रावधान था। फाइनेंसर इसी प्रावधान को तोड़ने का दोषी है इसलिए पर 15,000 रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया जाता है।
अम्बेडकर नगर के रहने वाले राजेश तिवारी ने वर्ष 2003 में महिंद्रा मार्शल गाड़ी फाइनेंस करवाई थी। इसके लिए उसने एक लाख रुपये का भुगतान किया और लगभग शेष तीन किश्त के रुपये फाइनेंस करवाए। उसकी 12531 रुपये की मासिक किस्तें बनाई गई। तिवारी ने सात किश्तें दीं, लेकिन उसके बाद वह किस्त नहीं दे पाया। कंपनी ने पांच माह इंतजार कर उसकी गाड़ी उठवा ली। भुगतान नहीं करने पर कंपनी ने गाड़ी बेच दी।
इसके खिलाफ तिवारी ने जिला उपभोक्ता अदालत में उपभोक्ता संरक्षण कानून, 1986 की धारा 12 के तहत केस दर्ज किया। अदालत ने कंपनी को दोषी पाया और उस पर दो लाख रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगा दिया। यूपी राज्य आयोग ने भी इसे सही माना और जिला उपभोक्ता अदालत के आदेश की पुष्टि कर दी। इसके बाद कंपनी राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में गई। वहां से भी उसे कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट अपील में की गयी।

सुरीले तरीके से गाँवों में विज्ञान की मशाल जला रही हैं सारिका

होशंगाबाद :  मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम संभाग के सुदूर आदिवासी अंचल में जहां इंटरनेट, मोबाइल व कंप्यूटर नहीं हैं, वहां शिक्षि‍का सारिका घारू गीत गाकर विज्ञान की अलख जगा रही हैं। आधुनिक संसाधनों से वंचित विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति जागृत करने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सांडिया पिपरिया की शिक्षक सारिका ने यह नवाचार किया है। इंटरनेट की पहुंच से दूर इन गांवों में कोरोना संक्रमण के चलते विद्यार्थियों को शिक्षा खासकर विज्ञान जैसे जटिल विषय की शिक्षा देना मुश्किल काम था, लेकिन सारिका ने विज्ञान के गीत गाकर इसे आसान बना दिया। ये गीत विद्यार्थियों को पसंद भी आ रहे हैं।
बनाया गीतों का पाठ्यक्रम आधारित वीडियो एल्बम
सारिका ने स्वयं की आवाज में ‘गुनगुनाए विज्ञान, बढ़ाए ज्ञान’ नाम से 25 विज्ञान गीतों का पाठयक्रम आधारित वीडियो एल्बम बनाया है। केंद्रीय विज्ञान सचिव आशुतोष शर्मा ने हाल ही में इन गीतों का आनलाइन विमोचन किया। एक गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं-
धातु में होती है चमक, अधातु में नहीं।
धातु ऊष्मा की सुचालक, अधातु तो नहीं।
धातु को ठोको तो बनती है चादर, अधातु से नहीं।
सोना, चांदी, तांबा, जस्ता धातु है।
कागज, रस्सी, कपड़ा हैं अधातु।
सारिका ने स्वयं के खर्च से वाहन, चटाई, स्टूल, होर्डिग्स, माइक आदि की व्यवस्था की है। वे प्रतिदिन अंचल के किसी गांव में दो से तीन घंटे गीतों, पोस्टर व व्याख्यान के माध्यम से विद्यार्थियों को पढ़ाती हैं। इसमें विज्ञान के नए-नए आविष्कार, उपयोगिता और रोजगार की सम्भावना से अवगत कराती हैं।
सारिका ने इसे टोला (बहुत कम आबादी वाले गांव ) टीचिंग नाम दिया है। इसकी शुरआत किए करीब दो हफ्ते हुए हैं। हर दिन एक या दो टोले में जाकर पांच से 25 विद्यार्थियों को सुरक्षित शारीरिक दूरी का पालन करवाते हुए पढ़ा रही हैं।

(साभार – दैनिक जागरण)

देश को मिली दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग ‘अटल सुरंग’

रोहतांग : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत शनिवार को हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में 10 हजार फीट की ऊंचाई पर निर्मित ‘अटल सुरंग’ का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक अटल सुरंग दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग है। इसकी लंबाई 9.02 किलोमीटर है जो मनाली को लाहौल-स्पीति घाटी से जोड़ेगी। इससे पहले यह घाटी भारी बर्फबारी के कारण लगभग छह महीने तक संपर्क से कटी रहती थी। इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर सहित सहित कई अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण यह सुरंग हिमालय की पीर पंजाल श्रृंखला में औसत समुद्र तल से 10,000 फीट की ऊंचाई पर अति-आधुनिक विशिष्टताओं के साथ बनाई गई है।
इस सुरंग से मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर कम हो जाएगी और यात्रा का समय भी चार से पांच घंटे कम हो जाएगा। अटल सुरंग को अधिकतम 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति के साथ प्रतिदिन 3000 कारों और 1500 ट्रकों के यातायात घनत्‍व के लिए डिजाइन किया गया है।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने रोहतांग दर्रे के नीचे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस सुरंग का निर्माण कराने का निर्णय किया था और सुरंग के दक्षिणी पोर्टल पर संपर्क मार्ग की आधारशिला 26 मई 2002 को रखी गई थी। मोदी सरकार ने दिसम्बर 2019 में पूर्व प्रधानमंत्री के सम्मान में सुरंग का नाम अटल सुरंग रखने का निर्णय किया था।

नहीं मालूम मैंने जन्म क्यों लिया

वसुन्धरा मिश्र

मुझे नहीं मालूम मैने जन्म क्यों लिया
मुझे नहीं मालूम स्त्री जन्म क्यों लिया
मुझसे ही पुरुष ने जन्म क्यों लिया
मैं प्रकृति की कामना ही क्यों बनी
आकाश की विराट बांहों में भी सुरक्षित नहीं
पुरुष स्त्री की सहयात्री क्यों नहीं बनी
उस रेत की धरती में न जाने कितनों को दबाया गया
कितनों की श्वास को दबोचा गया
चीखना चिल्लाना भी मना था
मुंह को कपड़े से बंद कर दिया
कैसे-कहूं भावनाओं के कुचलने का कोई प्रमाण न मिला
आंसुओं की कोई नदी नहीं मिली
दबी-कुचली चीख का कोई गीत न मिला
सब कुछ सहने के निशान किसी मोहनजोदडो़ की खुदाई में नहीं मिले
कोई कुछ कहता है कोई कुछ
दस मुंह बीस बातें
मेरा अस्तित्व मिटा, मेरी पहचान गई
कुछ बच गया था पर वह मेरी अस्मिता का फैला हुआ खून था
मुझे नहीं मालूम जीवित होकर भी कौन-सा पहाड़ बनाना है
सदियों से वस्तु बनी
सृष्टि की सबसे सुंदर कृति बनी
दुर्गा तो लगता है एक ही बनी थी
दूसरी-तीसरी हम जैसी थीं
मुझे नहीं मालूम कि मैं कैसे बनी
पुरुष की स्त्री लगता है मर चुकी है
स्त्री सिर्फ पृथ्वी पर भटक रही है
कभी मरती है तो कभी पुरुष के भीतर के शैतानों को जगाती है
वह खूंखार पशु की तरह नोच खसोट कर फेंक दिया करता है
मुझे नहीं पता वह दूसरी-तीसरी की तलाश क्यों करता रहता है
मुझे नहीं मालूम – -मुझे सच में नहीं मालूम मुझे नहीं मालूम