टाइम मैग्जीन ने पहली बार वर्ष के प्रतिभाशाली और संभावनाओं से भरे पांच बच्चों का चयन किया है। भारतीय मूल की 15 वर्षीय गीतांजलि राव को ‘किड ऑफ द ईयर’ घोषित किया है। उनका चयन 8 से 16 साल की आयु के पांच हजार अमेरिकी बच्चों के बीच किया गया है। उन्हें पत्रिका के कवर पर जगह मिली है। चार अन्य बच्चे हैं-14 साल के आर्टिस्ट टाइलर गोर्डन, 14 वर्ष की डिजाइनर जोर्डन रीव्स,10 साल की अश्वेत बेलेन वुडवर्ड। वे रंगों के सहारे रंगभेद से लड़ती हैं। 16 साल के इयान मेकेना फूड बैंक बना रहे हैं।
वैज्ञानिक और आविष्कारक गीतांजलि बताती हैं, वे रिसर्च, सृजन, संवाद पर यकीन करती हैं। उन्होंने इतनी कम आयु में दूषित पेयजल, अफीम की लत और इंंटरनेट पर ट्रोलिंग जैसे मसलों का हल खोजने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए युवा आविष्कारकों का ग्रुप तैयार करने के मिशन में भी जुटी हैं।
भारतीय मूल की गीतांजलि राव बनीं टाइम मैग्जीन की ‘किड ऑफ द ईयर’
नहीं रहे आजो बा, 84 साल के रवि पटवर्धन का निधन
मुम्बई : मराठी और हिंदी सिनेमा-टीवी जगत के अभिनेता रवि पटवर्धन का निधन हो गया। वे 84 साल के थे औऱ दिल का दौरा पड़ा था। रवि को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी इसके बाद उन्हें निजी हॉस्पिटल में दाखिल करवाया गया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके पहले मार्च 2020 में भी रवि को दिल का दौरा पड़ा था।
200 से ज्यादा फिल्मों में कर चुके थे काम
1937 में जन्मे रवि लॉकडाउन से पहले मराठी शो अगाबाई सासुबाई में आजो बा के किरदार में देखा गया था। उन्होंने 200 से ज्यादा फिल्मों और 150 से ज्यादा टीवी शो में काम किया। रवि को अंकुश, तेजाब जैसी हिंदी फिल्मों में भी देखा गया था। उनकी शख्सियत के कारण उन्हें गांव के प्रधान, पुलिस कमिश्नर, जज और विलेन के रोल ज्यादा मिलते थे। रवि के परिवार में पत्नी, दो बच्चे, बहू और पोते-पोतियां हैं।
मोदी सरकार ने सरकारी कम्पनियों की हिस्सेदारी बेचकर जुटायी सबसे ज्यादा रकम
नयी दिल्ली : नरेंद्र मोदी की सरकार है और उन्हीं की सरकार में सबसे ज्यादा सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेची गई। मोदी सरकार अब देश की दूसरी सबसे बड़ी फ्यूल रिटेलर कंपनी भारत पेट्रोलियम में 53.3% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है। इसके जरिए सरकार को 40 हजार करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है।
मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी या शेयर बेचकर जितनी रकम जुटाई गई है, उतनी रकम 23 सालों में भी नहीं जुटी। इस पूरी प्रक्रिया को कहते हैं डिसइन्वेस्टमेंट या विनिवेश।
क्या होता है डिसइन्वेस्टमेंट?
इन्वेस्टमेंट या निवेश क्या होता है, जब किसी कंपनी या संस्था में पैसा लगाया जाता है। इसका उल्टा होता है डिस-इन्वेस्टमेंट या विनिवेश, यानी किसी कंपनी या संस्था से अपना पैसा निकालना। जब सरकार किसी सरकारी कंपनी से अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचकर उससे रकम जुटाती है, तो इस प्रक्रिया को कहते हैं डिस-इन्वेस्टमेंट।
अक्सर विनिवेश और निजीकरण को एक ही मान लिया जाता है। लेकिन दोनों में काफी अंतर होता है। निजीकरण में सरकार अपनी 51% से ज्यादा की हिस्सेदारी किसी निजी कंपनी को बेच देती है, जबकि विनिवेश में सिर्फ कुछ हिस्सा ही बेचा जाता है। विनिवेश की प्रक्रिया में सरकार का कंपनी पर मालिकाना हक बना रहता है। लेकिन निजीकरण में सरकार का कोई मालिकाना हक नहीं रह जाता।
हालांकि, कई बार विनिवेश का फायदा भी होता है। कई सरकारी कंपनियां ऐसी होती हैं, जिन पर करोड़ों खर्च होने के बाद भी कोई मुनाफा नहीं होता। इस वजह से सरकार ऐसी कंपनियों से अपनी हिस्सेदारी या शेयर बेच देती है। ताकि सरकार का पैसा न लगे। सरकार का पैसा यानी हमारा और आपका पैसा।
सरकार को विनिवेश की जरूरत क्यों पड़ती है?
होता ये है कि सरकार देश चलाती है और देश चलाने की लिए जरूरत होती है पैसों की। ये पैसा सरकार टैक्स के जरिए वसूलती है, लेकिन इतनी रकम से डेवलपमेंट वर्क नहीं हो पाता। इसके लिए सरकार पैसा जुटाने के लिए सरकारी कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचती और रकम जुटाती है। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब किसी घर में खर्च चलाना मुश्किल होता है, तो लोग घर का सामान बेचते हैं। ऐसा ही सरकार भी करती है।
बीपीसीएल की हिस्सेदारी क्यों बेच रही है सरकार?
अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार बीपीसीएल की हिस्सेदारी क्यों बेच रही है। दरअसल, 2020-21 के लिए सरकार ने विनिवेश के जरिए 2.10 लाख करोड़ रुपए जुटाने का टारगेट रखा था। लेकिन कोरोना की वजह से अभी तक सरकार सिर्फ 6,311 करोड़ रुपए ही जुटा सकी है। बीपीसीएल के जरिए सरकार को 40 हजार करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है।
इसके अलावा पिछले 4 साल से बीपीसीएल का प्रॉफिट कम होता ही जा रहा था। 2018-19 में कंपनी को 7,132 करोड़ रुपए का फायदा हुआ था, जो 2019-20 में घटकर 2,683 करोड़ रुपये हो गया। मई 2014 में केंद्र में पहली बार मोदी सरकार आई। तब से लेकर अब तक मोदी सरकार में 121 कंपनियों की हिस्सेदारी बिक चुकी है। इससे सरकार ने 3.36 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई की है। ये आंकड़ा किसी सरकार में विनिवेश के जरिए जुटाई गई रकम का सबसे ज्यादा हिस्सा है।
1991 में जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब सरकार ने सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर रकम जुटाने के लिए डिस-इन्वेस्टमेंट करने का फैसला लिया था। उसके बाद से अब तक के करीब 30 सालों में सरकार डिसइन्वेस्टमेंट के जरिए 4.89 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा जुटा चुकी है। सबसे ज्यादा रकम मोदी सरकार में ही जुटाई गई है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
रद्द उड़ानों के यात्रियों को टिकट का पैसा लौटाएगी इंडिगो
नयी दिल्ली : भारत ने कोरोना वायरस महामारी के कारण दो महीने के अंतराल के बाद 25 मई को घरेलू यात्री उड़ानों को फिर से शुरू किया गया था। इस दौरान कई उड़ानें रद्द हुई थी और यात्रियों ने टिकट रिफंड के लिए आवाज उठाई। कोरोना काल में विमानन कंपनियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं इसलिए उन्होंने रद्द टिकटों पर ‘क्रेडिट शेल’ बनाया था। अब इंडिगो ने अपनी रद्द उड़ानों के सभी यात्रियों को टिकट का पैसा 31 जनवरी 2021 तक लौटाने की घोषणा की है। ये उड़ानें इस साल कोरोना वायरस के प्रसार पर अंकुश के लिए लगाए गए लॉकडाउन के चलते रद्द हुई थीं। एयरलाइन ने रद्द टिकटों पर ‘क्रेडिट शेल’ बनाया था।
1,000 करोड़ के रिफंड से संबंधित कामकाज पूरा
क्रेडिट शेल का इस्तेमाल उसी यात्री द्वारा भविष्य में यात्रा की बुकिंग के लिए किया जा सकता है। एयरलाइन ने सोमवार को बयान में कहा कि उसने करीब 1,000 करोड़ रुपये के रिफंड से संबंधित कामकाज को पूरा कर लिया है। यह यात्रियों को रिफंड की जाने वाली राशि का करीब 90 फीसदी है।
100 फीसदी क्रेडिट शेल का होगा भुगतान
इंडिगो के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) रोनोजॉय दत्ता ने कहा कि लॉकडाउन की वजह से मार्च के अंत में एयरलाइन का परिचालन पूरी तरह ठप हो गया था। चूंकि हमारे पास नकदी का प्रवाह रुक गया था, इसलिए हम यात्रियों का पैसा लौटा नहीं पा रहे थे। दत्ता ने कहा कि अब परिचालन शुरू होने तथा हवाई यात्रा की मांग में धीरे-धीरे सुधार के बाद हमारी प्राथमिकता रद्द उड़ानों के यात्रियों का पैसा लौटाने की है। दत्ता ने कहा, ‘हम 100 फीसदी क्रेडिट शेल का भुगतान 31 जनवरी 2021 तक कर देंगे।’
31 दिसंबर तक अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर प्रतिबंध
विदेश में फंसे यात्रियों को वापस लाने के लिए वंदे भारत मिशन चलाया गया और कई देशों के साथ एयर बबल करार भी किया गया। कोरोना वायरस महामारी के चलते नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने भारत में शेड्यूल अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक उड़ानों की आवाजाही पर प्रतिबंध 31 दिसंबर तक बढ़ाया है। लेकिन इस दौरान वंदे भारत मिशन के तहत जाने वाली उड़ानें जारी रहेंगी। इससे पहले अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर 30 नवंबर तक प्रतिबंध था। डीजीसीए के आदेश के अनुसार, केवल चयनित उड़ानों को ही संचालन की अनुमति होगी।
हवाई यात्रा में 2024 तक बन पाएगी 2019 जैसी स्थिति
विमानन कंपनियों के वैश्विक संगठन अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात संघ (आईएटीए) के सीईओ एलेक्जेंडर डि जुनियाक ने कहा था कि वैश्विक महामारी कोविड-19 के चलते रेवेन्यू पैसेंजर किलोमीटर (राजस्व यात्री किलोमीटर) अपनी 2019 की स्थिति में साल 2024 तक लौट सकेगा। उन्होंने कहा कि अगर वायरस पर नियंत्रण पाने में या वैक्सीन विकसित करने में हम सफल नहीं हुए तो यह समय सीमा और आगे भी बढ़ सकती है।
दृढ़ संकल्प और परिश्रम से शिखर तक पहुँचे थे मसाला किंग महाशय धर्मपाल गुलाटी
छोटा व्यवसाय शुरू कर उसे शिखर तक पहुँचाने वाले और 98 वर्ष की उम्र में भी अपनी जिंदादिली, अपनी सक्रियता से सबको चौंका देने वाले एमडीएच ग्रुप के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी का गत 3 दिसम्बर को निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के माता चानन देवी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 98 वर्षीय महाशय धर्मपाल गुलाटी बीमारी के चलते पिछले कई दिनों से माता चानन देवी अस्पताल में भर्ती थे। इससे पहले महाशय गुलाटी कोरोना से संक्रमित हो गए थे। हालांकि बाद में वह ठीक हो गए थे। भारत सरकार ने पिछले साल उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
एमडीएच के सभी विज्ञापनों में मॉडलिंग की
शुरू से लेकर 98 वर्ष की उम्र में भी अपने ब्रांड के सभी विज्ञापनों में खुद मॉडलिंग करने वाले महाशय धरमपाल गुलाटी को ‘दादजी’, ‘मसाला किंग’, ‘किंग ऑफ स्पाइसेज’ और ‘महाशयजी’ के नाम से भी जाना जाता था। मशहूर धरमपाल गुलाटी का जन्म 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले धर्मपाल गुलाटी शुरुआती दिनों में विभिन्न व्यवसायों में हाथ आजमाने के बाद अपने पिता के मसाले के व्यवसाय में शामिल हो गए थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद महाशय धर्मपाल गुलाटी भारत आ गए और अमृतसर में एक शरणार्थी शिविर में कुछ दिन रहे। इसके बाद मन में कुछ बड़े निश्चय लेकर वह दिल्ली आ गए थे। दिल्ली आने के समय 27 सितंबर 1947 को उनके पास केवल 1500 रुपये थे। महाशय धर्मपाल गुलाटी ने एक साक्षात्कार में स्वयं बताया था कि इन 1500 रुपए में से 650 रुपये में उन्होंने एक तांगा खरीदा और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड के बीच चलाया लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने तांगा भाई को दे दिया और करोल बाग की अजमल खां रोड पर ही एक छोटी-सी दुकान लगाकर मसाले बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे मसाले का कारोबार चल निकला और एमडीएच ब्रांड की नींव पड़ गई। महाशय धर्मपाल गुलाटी ने 1959 में आधिकारिक तौर पर एमडीएच कंपनी की स्थापना की थी। शुरुआती संघर्ष के बाद धीरे-धीरे उनका मसालों का व्यवसाय केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में फैल गया। इससे गुलाटी भारतीय मसालों के बड़े वितरक और निर्यातक बन गए।
महाशय धर्मपाल गुलाटी की कंपनी ब्रिटेन, यूरोप, यूएई, कनाडा आदि सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मसालों का निर्यात करती है और भारत की तो यह शीर्ष मसाला कंपनी है ही। अपनी गुणवत्ता के लिए एमडीएच ब्रांड के मसाले खूब मशहूर हैं। महाशियां दी हट्टी’ (एमडीएच) की स्थापना उनके दिवंगत पिता महाशय चुन्नी लाल गुलाटी ने की थी। उद्योग जगत को नई दिशा देने के लिए वर्ष 2019 में भारत सरकार ने महाशय धर्मपाल गुलाटी को देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया था। एमडीएच मसाला के अनुसार, धर्मपाल गुलाटी अपने वेतन की लगभग 90 प्रतिशत राशि दान करते थे। व्यापार के साथ ही महाशय धर्मपाल गुलाटी ने विभिन्न सामाजिक कार्य भी किये। इनमें अस्पताल और स्कूल आदि बनवाना आदि शामिल है।
अयोध्या में 1500 वर्ग फीट में बनेगी धन्नीपुर मस्जिद
अयोध्या : उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक तरफ जहां राम मंदिर निर्माण का काम जोरों पर चल रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर धन्नीपुर गाँव में बनने वाली मस्जिद का खाका भी तैयार हो गया है। जानकारी के मुताबिक, इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट ने मस्जिद का आकार तय कर लिया है।
यह मस्जिद 1400 गज यानी कि 15 हजार स्क्वायर फीट में बनेगी। मस्जिद का डिजाइन इको फ्रेंडली रखा गया है। मस्जिद का आकार वैसा ही होगा, जैसा बाबरी मस्जिद का आखिरी समय में था। नई मस्जिद में एक बार में 2000 हजार लोग नमाज पढ़ सकेंगे।
जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोफेसर ने तैयार करवाई डिजाइन
यह डिजाइन प्रोफेसर एसएम अख्तर के नेतृत्व में तैयार किया गया है। वे जामिया मिलिया इस्लामिया में वास्तुकला विभाग के प्रमुख हैं। मस्जिद निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट ने इस जमीन पर मस्जिद, एक अस्पताल, एक इंडो-इस्लामिक रिसर्च सेंटर और एक सामुदायिक रसोईघर का डिजाइन तैयार किया है।
मस्जिद का आकार वही होगा, जो आखिरी समय में बाबरी का था
इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट के प्रवक्ता अतहर हुसैन ने बताया कि मस्जिद का आकार अंडाकार होगा। मुझे ऐसी जानकारी मिली है। बाबरी मस्जिद जो आखिरी समय मौजूद थी, उसी आकार की यह मस्जिद बनेगी। डिजाइन का ऐलान एक सप्ताह में होगा। डिजाइन में क्या स्पष्ट है, फिलहाल यह पूरा बता पाना मुश्किल है।
इको फ्रेंडली, बिजली की जगह सौर ऊर्जा का होगा इस्तेमाल
मस्जिद पूरी तरह से इको फ्रेंडली होगी। बिजली का इस्तेमाल मस्जिद में नहीं होगा। पूरी तरह से सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होगा। मस्जिद को पुराने स्वरूप से हटकर मॉडर्न लुक दिया गया है। इमारत का आकार अंडाकार रखा गया है, जबकि छत गुंबदनुमा और पारदर्शी होगी। इसकी दो मीनारें आधुनिक शैली में डिजाइन की गई हैं। ये मीनारें बिल्कुल सीधी न होकर हल्की गोलाकार नजर आएंगी।
कोलकाता के पहले म्यूनिसिपल कमिश्नर राय कृष्टो दास पाल बहादुर
कॉलेज स्ट्रीट बाजार यानी वर्ण परिचय के सामने यानी कॉलेज स्ट्रीट – महात्मा गाँधी रेड क्रासिंग पर लोहे के घेरे में एक प्रतिमा स्थापित है। आस – पास बैग की दुकानें हैं और किताबों की भी। आपकी भी नजर पड़ी होगी…बहुत से लोग मानते हैं कि बंगाल में नवजागरण के पुरोधा प्रख्यात समाज सुधारक राजा राममोहन राय की प्रतिमा है। प्रतिमा की वेश भूषा और पगड़ी देखकर एकबारगी लोग ऐसा ही मान लेते हैं तो दूसरी ओर स्थानीय दुकानदार बताते हैं कि यह कोलकाता के प्रथम मेयर की प्रतिमा है…यह भी आधा ही सच है। अक्सर आते – जाते प्रतिमा को देखकर कौतुहल जगता और हमने इस बार अपनी यह जिज्ञासा मिटाने की ठान ली…अगर आपमें से बहुत से लोगों की यह जिज्ञासा है तो हम आपको बताते हैं कि इस प्रतिमा के बारे में।
दरअसल, यह प्रतिमा कृष्टदास पाल की है जिनको कृष्ण दास पाल के नाम से भी जाना जाता है। यह अपने समय के प्रख्यात पत्रकार, अच्छे वक्ता, लेखक और राजनेता थे, साथ ही कोलकाता के पहले म्यूनिसिपल कमिश्नर भी। कृष्टो दास पाल का जन्म 1838 में बंगाल के काँसारिपाड़ा में हुआ था। पिता थे ईश्वर चन्द्र पाल जो कोलकाता में एक दुकान में ही काम करते थे। कृष्टो दास की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल से हुई। इसके बाद इन्होंने ओरियेंटल सेमिनरी तथा हिन्दू मेट्रोपॉलिटन कॉलेज से आगे की पढ़ाई की। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही इन्होंने ‘कोलकाता लिटरेरी फ्री डिबेटिंग क्लब’ की स्थापना की। 1856 में डेविड हेयर की स्मृति सभा में इनके लेख ‘दि यंग बंगाल विन्डिक्टेड’ ने सभी को आकर्षित किया।
कृष्णदास की कर्म यात्रा आरम्भ हुई अलीपुर जिला जज कोर्ट में एक अनुवादक के रूप में। 1861 में वे ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन में बतौर सहकारी सचिव जुड़े। यह बंगाल के भू स्वामियों का बोर्ड था। 1879 में इनकी पदोन्नति सचिव के रूप में हुई। कार्य दक्षता के कारण ये सरकारी और सार्वजनिक दोनों ही रूप में काफी लोकप्रिय हुए।
इस बीच 1863 में ‘कृष्टोदास जस्टिस ऑफ द पीस’ निर्वाचित हुए। इसी साल वे कलकत्ता म्यूनिसिपल काउंसिल के कमिश्नर भी मनोनीत हुए। 1872 में वे बंगीय आईन परिषद यानी बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य बने। 1883 में बंगाल टेनेन्सी बिल को लेकर समस्या होने पर उन्होंने भू स्वामियों का ही साथ दिया। लॉर्ड रिपन ने कृष्टोदास को भारतवर्षीय व्यवस्थापक सभा यानी वायसराय लेजिसलेटिव काउंसिल का का सदस्य नियुक्त किया। 1877 में उनको रायबहादुर और 1878 में सीएलई की उपाधि मिली।
विद्यार्थी जीवन से ही कृष्टोदास मॉर्निंग क्रॉनिकल, सिटिजन, फोनिक्स, पैट्रियट प्रभृति, इंग्लिशमैन, हरकारू से जुड़े थे। 1861 में जब काली प्रसाद सिंह ने हिन्दू पैट्रियट को खरीदा तो उन्होंने कृष्टदास को सम्पादक नियुक्त किया और इस दायित्व को उन्होंने आजीवन निभाया। हिन्दू पैट्रियट में रहते हुए कृष्ट दास ने कलकत्ता मन्थली मैगजीन प्रकाशित किया जो 6 माह तक चली। इस काम में शम्भू चन्द्र मुखोपाध्याय उनकी मदद किया करते थे। जब कानपुर में सेन्ट्रल स्टार शुरू हुआ तो ये कोलकाता संवाददाता भी बने।
ब्रिटिश सरकार का अनुगामी होने पर भी कृष्टदास देश में स्वायत्त शासन का महत्व समझते थे। इलबर्ट बिल के प्रबल समर्थक थे और समाचार पत्रों की स्वाधीनता में विश्वास रखते थे। चाय श्रमिकों के पक्ष में उन्होंने विभिन्न पत्रिकाओं में लेख लिखे और इमिग्रेशन बिल को ‘द स्लेव लॉ ऑफ इंडिया’ बताया। उच्च शिक्षा की संकुचित नीतियों का इन्होंने विरोध किया। 24 जुलाई 1884 को इनका निधन हो गया। इनकी मृत्य पर तब लॉर्ड रिपन ने कहा था कि कृष्ट दास पाल ने जो पाया. अपने परिश्रम से पाया, उनकी बौद्धिक क्षमता उच्च कोटि की थी, और इनके निधन से उन्होंने एक सहयोगी खो दिया है।
उस दौर में जिन भारतीयों के काम को हर तरफ से स्वीकृति मिली, उस सूची में एक अन्यतम भारतीय या बंगाली कृष्णदास पाल (1838-184) थे। आज आप जो भव्य प्रतिमा देख रहे हैं, उसका अनावरण लॉर्ड एल्गिन ने 7 मार्च, 1894 को किया था। यह सफेद पत्थर की प्रतिमा इंग्लैंड में नेल्सन मैकलीन द्वारा बनाई गई थी, जो एक ब्रिटिश मूर्तिकार थे। मूर्ति को बनाने में उस समय चौदह हजार रुपये का खर्च आया, जिसमें एक स्कॉटिश ग्रेनाइट पेडस्टल है। पूरा पैसा कृष्णदास के भारतीय और ब्रिटिश प्रशंसकों को दान से आया था। पाल पहले पत्रकार हैं जिनकी प्रतिमा इस तरह सम्मान के साथ स्थापित की गयी।।
(साभार – बांग्लापीडिया तथा एई समय )
बोई पाड़ा को भी है शिक्षण संस्थानों के खुलने का इन्तजार
कोलकाता : कोविड -19 महामारी के कारण जीवन काफी बदल गया है। खासकर लॉकडाउन के बाद व्यवसायियों को काफी धक्का पहुँचा मगर अब लोग चाहते हैं कि सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए अब संस्थान खोले जाएं। सीआईएससीई ने तो बाकायदा मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर स्कूलों को दोबारा अगले साल खोलने की इजाजत माँगी है मगर बंगाल में राज्य सरकार शिक्षण संस्थानों को फिलहाल खोलने के मूड में नहीं है। वैसे स्कूल खुलने या न खुलने का असर सिर्फ विद्यार्थियों, शिक्षकों या अभिभावकों पर नहीं पड़ रहा बल्कि ऐसा एक और वर्ग है जो शिक्षण संस्थानों के खुलने का इन्तजार बेसब्री से कर रहे हैं। नहीं समझे…हम बात कर रहे हैं किताबों के मोहल्ले यानी कॉलेज स्ट्रीट बोई पाड़ा की। इस समय जहाँ यहाँ दुकानदारों के पास किसी से बात करने की फुरसत नहीं रहती मगर अब ये दुकानदार शिक्षण संस्थानों के खुलने के इन्तजार में हैं। लॉकडाउन के कारण किताबों के कारोबार तो असर पड़ा ही था, उस पर से अम्फान के कारण स्थिति काफी बिगड़ गयी है। एशिया के सबसे बड़े पुस्तक बाजार को इन दोनों स्थितियों के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ा। अम्फान के कारण 60 लाख रुपये से अधिक कीमत की पुस्तकें भीगकर नष्ट हो गयीं और व्यवसायी इन भीगी हुई किताबों को बटोरते दिखे।
पब्लिशर्स एंड बुक सेलर्स गिल्ड ने खुद माना कि नुकसान करोड़ों का हुआ है और पुस्तक बाजार की मदद के लिए गिल्ड आगे आया। सोशल मीडिया पर कॉलेज स्ट्रीट बोई पाड़ा को बचाने की मुहिम चली। गिल्ड की ओर से प्रधानमंत्री और सीएम को पत्र लिखा गया और अनुदान भी एकत्रित किया गया मगर पुस्तक विक्रेताओं को बहुत ज्यादा राहत मिली हो, ऐसा लग नहीं रहा। बोई पाड़ा पुस्तक विक्रेताओं के संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी अचिन्त्य दासगुप्ता की मानें तो लॉक डाउन और अम्फान से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई आसान नहीं है। पुस्तक बाजार अभी भी नुकसान में है मगर नये स्टॉल की बात हुई, लोग आ रहे हैं मगर स्कूल – कॉलेज खुलने का इन्तजार अभी भी है।
वहीं एक अन्य पुस्तक विक्रेता तपन पालित ने कहा कि अब स्कूल – कॉलेज खुले तब ही स्थिति सामान्य हो सकती है। राज्य सरकार ने आर्थिक सहायता तो दी है मगर अभी भी हालात सही नहीं हैं। पुस्तक विक्रेताओं को बोई पाड़ा के गुलजार होने का इन्तजार है और यही इन्तजार हमें भी है और उम्मीद है कि यह इन्तजार जल्द खत्म होगा।
कॉलेज स्ट्रीट बोईपाड़ा : कभी बरगद तले सजती थी दुकानें, घर -घर किताबें बेचते थे फेरीवाले
कोलकाता को शिक्षा और संस्कृति का गढ़ माना जाता है और कई लोग तो इसे देश की बौद्धिक राजधानी भी कहते हैं मगर क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा था जब यहाँ किताबें आम जनता के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं और किताबों की कमी से परेशान होकर पादरी रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने हताश होकर 1857 में वे लिखा था ,’कोलकाता में किताब की दुकान नहीं है, हैं तो सिर्फ फेरीवाले। वे सिर पर बोझ लेकर मोहल्लों में फिरते हैं।’ हालांकि बोझ लिए फिरने वाले फेरीवाले तो शहर में अब भी हैं मगर अब कोलकाता में किताबें मिलती हैं और एक जगह तो ऐसी है जहाँ नजर उठाकर जिधर भी देखिए…सिर्फ किताबें हैं…नयी – पुरानी किताबें। ये वही हैं जिन्होंने दीन बन्धु नाटक का अनुवाद करने के जुर्म में माइकल मधुसूदन दत्त को सजा दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। हालाँकि यूरोप में किताबों का मुद्रण यानी छपाई शुरू तो हुई मगर किताबें इतनी महँगी थी कि आम आदमी के लिए खरीदकर पढ़ पाना सम्भव नहीं था, उनके लिए थीं सस्ते कागज पर छपी हुई कुछ किताबें। इनको चैप बुक कहा जाता था और चैपरॉय नाम से लड़के कुछ पेनी के बदले मोहल्लों में घूम – घूमकर किताबें बेचते थे।

तब कोलकाता के लाल दीघी के पास सेंट एन्ड्रूज नाम से किताबें वितरित करने के लिए दुकान थी। लन्दन से जहाज पर किताबें आतीं तब अंग्रेज इसी दुकान से किताबें खरीदते थे। 1778 में बांग्ला की पहली किताब ‘हलहेडेर व्याकरण’ जब छपी तो इसी दुकान से बेची गयी थी। इधर, प्रशासनिक कार्यों के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए स्थानीय भाषा सीखना जरूरी था तो श्रीरामपुर छापाखाने से भी इनके लिए बांग्ला में किताबें छापी जाने लगीं। फोर्ट विलियम कॉलेज में स्वाभाविक रूप से पुस्तकालय स्थापित किया गया। अब समस्या हुई कि खुले बाजार में ये किताबें उपलब्ध नहीं थीं इसलिए किताबें चोरी होने लगीं और उनकी कालाबाजारी भी शुरू हो गयी। काले बाजार में ये किताबें दस गुना अधिक कीमतों पर बिक रही थीं। ऐसी स्थिति में कॉलेज काउंसिल के अधिकारियों ने तय किया कि वे खुद पुस्तकें प्रकाशित करके वाजिब कीमतों पर आम जनता को उपलब्ध करवाएंगे और बस यही से शुरू हुआ एक नया व्यवसाय – किताबों का व्यवसाय।

कोलकाता के पहले पुस्तक विक्रेता के रूप में गंगाकिशोर भट्टाचार्य का नाम सामने आता था। हालांकि शुरुआत उन्होंने पुस्तक विक्रेता के रूप में की थी मगर इसके बाद उन्होंने प्रेस कर्मी, लेखक, प्रकाशक, पत्रकार, और पुस्तक विक्रेता के रूप में योगदान किया। यूरोपीय तरीके से पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में उतरने वाले वे प्रथम भारतीय थे। श्रीरामपुर प्रेस में कम्पोजिटर के रूप में उन्होंने काम शुरू किया था। इसके बाद 1816 में कोलकाता में प्रथम बांग्ला सचित्र ग्रन्थ ‘अन्नदामंगल’ उन्होंने प्रकाशित किया। उन्होंने पुस्तक सिर्फ प्रकाशित नहीं की बल्कि घर – घर में लोगों को समझाकर पुस्तक बेची भी और उनकी मार्केटिंग रणनीति भी असाधारण थी।
1817 में स्थापित हुई स्कूल बुक सोसायटी और इन्होंने हिन्दू कॉलेज के पास ही विद्यार्थियों के लिए किताबों की दुकान खोली। विद्यार्थी ही नहीं, आम लोग भी यहाँ से किताबें खरीदते थे। लगभग इसी समय में शोभाबाजार राजबाड़ी के विश्वनाथ देव ने अलग तरीके से सस्ती किताबें प्रकाशित करनी शुरू की और बटतला बई के सृष्टा यही हैं। शोभाबाजार – चितपुर इलाके में एक विशाल वट वृक्ष को केन्द्र कर इस नाम की उत्पत्ति हुई। बहुत से लोग कहते हैं कि इसी वट वृक्ष के नीचे जॉब चारनाक काफी समय गुजारा करते थे। इस वट वृक्ष और उसके आस -पास के इलाके में मुद्रण और प्रकाशन उद्योग पनप रहा था जो मुख्य रूप से साधारण और अर्द्धशिक्षित पाठकों की जरूरतें पूरी करने के लिए था। यहाँ पर हिन्दू और मुसलमान, दोनों ही व्यवसायी थे। हालांकि मुस्लिम व्यवसायियों ने कलिंगा बाजार यानी आज के न्यू मार्केट में दुकानें खोली थीं यानी सामने दुकान और पीछे प्रेस। इसके अतिरिक्त लल्लू लाल नामक एक प्रकाशक का भी नाम सामने आता है, पर उनके बारे में जानकारी नहीं मिलती। हालांकि हिन्दी की दृष्टि से देखा जाए तो ये उस दौर के लेखक लल्लू लाल भी हो सकते हैं..जो फोर्ट विलियम कॉलेज से ही जुड़े थे।

सब कुछ इसी प्रकार चलता अगर 1847 में खुद ईश्वर चन्द्र विद्यासागर इस व्यवसाय में नहीं उतरते। उस साल 600 रुपये में अर्महस्ट स्ट्रीट इलाके में उन्होंने संस्कृत यंत्रालय नामक लकड़ी का छापाखाना खरीदा। विद्यासागर ने आरपुलि लेन में एक किताब की दुकान खोल ली और नाम रखा संस्कृत प्रेस डिपॉजिटरी। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। आज के कॉलेज स्ट्रीट में गम्भीरता पूर्वक शुरू किया गया व्यवसाय यही था। ‘डिपॉजिटरी’ नाम होने के कारण विद्यासागर द्वारा रचित पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य लोगों की भी पुस्तकें छापी जाती थीं औऱ उनकी दुकान पर दूसरे लेखक अपनी किताबें बिक्री के लिए रखते भी थे। किताब बिकने पर कमिशन काटकर रुपये दिए जाते थे। आज भी कॉलेज स्ट्रीट का व्यवसाय विद्यासागर की दिखायी राह पर चल रहा है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का नाम सही समय पर सही कार्य प्रणाली समझाने के लिए उल्लेखनीय है औऱ तत्कालीन समय में इसी वजह से विख्यात थी ‘विद्यासागरेर बईएर दोकान’ । सस्ती पुस्तकों के विक्रेता के रूप में उन्होंने एक आदर्श स्थापित किया।
1881 में कोलुटोला में स्थापित हुआ बंगवासी कार्यालय। यह मुख्य रूप से सस्ती धार्मिक पुस्तकें ही बेचता था मगर इसने टेडेर राजस्थान, मेडोस टेलरेर ठगीर आत्मजीवनी जैसी किताबों को फिर से मुद्रित किया था। इस दौरान कोलूटोला में हितवादी कार्यालय स्थापित हुआ जिसने कई उल्लेखनीय किताबें छापीं। इन किताबों में ‘बत्तीस सिंहासन’ आर त्रैलोक्यनाथ की ‘कंकावती’ भी शामिल थी।

पहले 50 -60 सालों में तो फेरीवालों के जरिए ही घर – घर जाकर ही किताबें बेची जाती थीं। वट वृक्ष के नीचे बैठने वाले पुस्तक व्यवसायी तो इन पर ही निर्भर थे। घरों के भीतर महिलाओं के लिए आती थी बई – मालिनी यानी किताबें बेचने वाली। तब पैसे देकर किताबों का विज्ञापन नहीं होता था बल्कि किताबें इतनी कम होती थीं कि नयी किताबें आने पर अखबारों में खबर छपती थी। समाचार दर्पण के पन्ने देखने पर ऐसी किताबों के छपने की खबर दिखती है। लिखने के लिए तब आज की तरह रॉयल्टी नहीं थी बस कुछ रुपये अग्रिम देकर प्रकाशक पांडुलिपि खरीद लिया करते थे। जिनके पास यह सुविधा नहीं थी, वे संरक्षकों पर निर्भर थे। माइकल की शर्मिष्ठा या एकई कि बले सभ्यता पाइकपाड़ा के राजा के दिये रुपये से छपी थी।

कॉलेज स्ट्रीट में किताबों की पहली दुकान गुरुदास चट्टोपाध्याय ने खोली। पहले वे हिन्दू हॉस्टल की सीढ़ियों पर ‘मेटेरिया मेडिका’ बेचा करते थे। बाद में कॉलेज स्ट्रीट में इन्होंने अपनी दुकान स्थापित की और ‘बंगाल मेडिकल लाइब्रेरी’ नाम देकर डॉक्टरी की पुस्तकें बेचना शुरू किया। 1885 में गुरुदास बाबू अपनी दुकान और प्रकाशन व्यवसाय को कॉर्नवालिस स्ट्रीट ले आये। 19वीं सदी में उस दौरान के कॉलेज स्ट्रीट में किताबों की कई दुकानों का नाम मिलता है, इनमें शामिल हैं ‘बी बनर्जी एंड कम्पनी’, ‘दासगुप्त एंड कम्पनी’, ‘सोमप्रकाश डिपॉजिटरी’ और इनके साथ आशुतोष देव का नाम भी आता है जो ए.टी. देव के नाम से विख्यात हैं। 1860 में अभिधान के व्यवसाय यानी डिक्शनरी व्यवसाय में इनका नाम था और अन्त में इनको एकमात्र टक्कर सुबल चन्द्र मित्र संकलित अभिधान से मिली थी। इसी समय योगेश बंद्योपाध्याय ने कैनिंग लाइब्रेरी के नाम से कहानियाँ और उपन्यास छापना शुरू कर दिया। नये लेखक तारकनाथ गंगोपाध्याय ने दोस्तों के साथ शर्त लगाकर ‘स्वर्णलता’ (1873) लिख ली थी मगर इसे छापने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था, तब योगेश बाबू ने साहस दिखाया और पुस्तक काफी लोकप्रिय हुई औऱ कॉलेज स्ट्रीट का पुस्तक व्यवसाय जम गया। इस बीच अलबर्ट हॉल तोड़कर नयी इमारत बनी, आज वह इमारत कॉफी हाउस के नाम से मशहूर है।

नयी इमारत के नीचे जितने कमरे थे, सभी पुस्तक व्यवसायियों ने किराये पर ले लिए। सबसे पहले आया चटर्जी एंड कम्पनी। इसके बाद उसके पास बना विवेकानन्द्र स्ट्रीट का कमला बुक डिपो। आयी ‘सेन राय एंड कम्पनी’, यू. एन. धर और सेन ब्रदर्स। बस इसी तरह दुकानें खड़ी हो गयीं, आस – पास की गलियों में भी सजने लगें और 40 के दशक में समूचा कॉलेज स्ट्रीट किताबों का मोहल्ला बन गया। तो ऐसे विकसित हुआ कॉलेज स्ट्रीट में पुस्तक व्यवसाय।
आज कॉलेज स्ट्रीट इलाके में हजारों स्टॉल हैं और न जाने कितने परिवारों की रोजी – रोटी है, एशिया का सबसे बड़ा पुस्तक बाजार है, कोलकाता का आकर्षण है और हृदय भी। यही कारण है कि हर परिस्थिति में लोग बोई पाड़ा के साथ खड़े होते हैं। यही एकता कोविड -19 के समय दिखी जब बोई -पाड़ा बिखर रहा था, लॉकडाउन में कारोबार ठप पड़ा था और इस पर अम्फान ने तबाही मचायी तब समूचा कोलकाता बोई – पाड़ा की मदद के लिए आ गया। आस – पास शिक्षण संस्थानों और संगठनों की बहुलता के कारण बोई पाड़ा की रौनक हमेशा बनी रहती है और लॉकडाउन के बाद स्कूल – कॉलेज खुलने के इन्तजार में हैं बोई – पाड़ा के व्यवसायी।
कांग्रेस के संस्थापकों में से एक भारत के पहले जन प्रतिनिधि महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह
कोलकाता के बीबीडीबाग इलाके में टेलिफोन भवन के पास एक प्रतिमा है। हालांकि सफेद पत्थरों से बनी यह भव्य प्रतिमा संरक्षण में तो है मगर इसके आस – पास इसके बारे में बताने के लिए कोई बोर्ड नहीं है…अगर आप इस प्रतिमा को नहीं पहचान सके तो हम बताते हैं आपको..यह प्रतिमा बिहार के भव्य दरभंगा राज के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर की है।
राजाओं को लेकर एक नकारात्मक छवि बना दी गयी है और नतीजा यह है कि जिन राजाओं ने कुछ अच्छे काम किये हैं, हम उनको भी नहीं जानना चाहते। बिहार या हिन्दी भाषी प्रदेशों में अपने इतिहास को लेकर उदासीनता है और वे बिहार से अधिक महत्व अपने जिले को देते हैं। शायद यही कारण है कि अपने इतिहास को वे गम्भीरता से नहीं लेते। बहरहाल हम आपको बताते हैं…लक्ष्मीश्वर सिंह बहादुर के बारे में।
महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह – 1880-1898 तक इनका शासन रहा। ये काफी उदार, लोक-हितैषी, विद्या एवं कलाओं के प्रेमी एवं प्रश्रय दाता थे। रामेश्वर सिंह इनके अनुज थे। उनके परोपकारी कार्यों, प्रशासनिक क्षमताओं और उनकी संपत्ति (दरभंगा राज) के प्रबंधन की बहुत सराहना की गई है और उनकी संपत्ति का विकास हुआ। बंगाल विधानपरिषद के सदस्य रहे.
दरभंगा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के संस्थापकों में से एक थे। राज दरभंगा ब्रिटिश राज के साथ अपनी निकटता बनाए रखने के बावजूद पार्टी के प्रमुख दानदाताओं में से एक थे। ब्रिटिश शासन के दौरान, कांग्रेस इलाहाबाद में अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित करना चाहते थे, लेकिन उन्हें इस उद्देश्य के लिए सरकार द्वारा किसी भी सार्वजनिक स्थान का उपयोग करने की अनुमति से इनकार कर दिया गया था। दरभंगा के महाराजा ने एक क्षेत्र खरीदा और काँग्रेस को वहाँ अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित करने की अनुमति दी। 1892ई. के कांग्रेस का वार्षिक सम्मेलन 28 दिसंबर को लोथर कैसल के मैदान में आयोजित किया गया था, जिसे तत्कालीन महाराजा ने खरीदा था। महाराजा द्वारा इस क्षेत्र को ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा पार्टी को ठिकाने लगाने से रोकने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किसी भी प्रयास को विफल करने के लिए पट्टे पर दिया गया था।
तत्कालीन वायसराय किसी भी कीमत पर दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह को स्टेट काउंसिल के चुनाव (1893) में हराना चाहते थे। पहले तो लक्ष्मीश्वर सिंह के खिलाफ पटना क्षेत्र से एक मुस्लिम वकील को चुनाव के मैदान में खडा कर दिया। जब उससे भी बात नहीं बनी तो वायसराय के लोग लक्ष्मीश्वर सिंह को आम लोगों के प्रतिनिधि के बदले एक महाराजा के रूप में प्रचारित कर रहे थे। इस बात को लेकर दरभंगा महाराज ने वासराय को सबक सिखाने का फैसला किया।
लक्ष्मीश्वर सिंह को रुलिंग किंग का दर्जा नहीं मिला था। उन्हें महाराजाधिराज की उपाधि नहीं मिल सकी। उन्हें दो बार मौका मिला इस उपाधि को पाने का, लेकिन पहली बार उन्हें मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के पोते जुबैरुद्दीन गोरगन को पनाह देने और राज्य अतिथि का दर्जा देने के कारण यह उपाधि नहीं दी गई, तो दूसरी बार कांग्रेस के लिए जमीन मुहैया कराने के कारण उन्हें इस उपाधि से वंचित रहना पडा।
दूसरी बार जब उन्हें यह उपधि नहि मिली तो उन्होंने इस उपाधि की मांग छोड दी और खुद को जनप्रतिनिधि के तौर पर स्थापित कर लिया। जनता के मुद्दे उठाने लगे। तत्कालीन वायसराय इस कारण इतने परेशान हो गये कि इन्हें सदन में आने से रोकने के लिए हर प्रयास शुरु कर दिया।
वायसराय के लोगों ने जब लक्ष्मीश्वर सिंह को महाराजा कह कर चुनावी मैदान में हराने की कोशिश की, तो उन्होंने कलकत्ता में ऐसा रोड शो किया कि वायसराय भी भौंचक रह गये। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह वो चुनाव भारी मतों से जीत कर भारत के पहले जनप्रतिनिधि बने, लेकिन यह दुखद रहा कि 1898 में लक्ष्मीश्वर सिंह का निधन हो गया और दरभंगा के अगले राजा रामेश्वर सिंह को महाराजाधिराज की उपाधि मिली।
एस एम घोष (1896 में उद्धृत) के अनुसार महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह एक अच्छे सितार वादक थें। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर ने स्कूल, डिस्पेंसरी और अन्य सुविधाओं का निर्माण किया और उन्हें जनता के लाभ के लिए अपने स्वयं के धन से बनाए रखा। दरभंगा में औषधालय की कीमत £ 3400 थी, जो उस समय बहुत बड़ी राशि थी।
दरभंगा राज महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर ने दरभंगा में सभी नदियों पर बनाए गए लोहे के पुलों का निर्माण शुरू किया।
महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने 146 साल पहले शुरू की निजी ट्रेन। दरअसल, 1874 में दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने तिरहुत रेलवे की शुरूआत की थी. उस वक्त उत्तर बिहार में भीषण अकाल पड़ा था. तब राहत कार्य के लिए समस्तीपुर के बाजितपुर से दरभंगा तक के लिए पहली ट्रेन मालगाड़ी चली थी.रेलवे का जाल बिछाने में महाराज का बड़ा योगदान
महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने ही उत्तर बिहार में रेल लाइन बिछाने के लिए अपनी कंपनी बनाई और अंग्रेजों के साथ एक समझौता किया. इसके लिए अपनी जमीन तक उन्होंने तत्कालीन रेलवे कंपनी को मुफ्त में दे दी और एक हज़ार मज़दूरों ने रिकॉर्ड समय में मोकामा से लेकर दरभंगा तक की रेल लाइन बिछाई. उत्तर बिहार और नेपाल सीमा तक रेलवे का जाल बिछाने में महाराज का बड़ा योगदान है. उनकी कंपनी तिरहुत रेलवे ने 1875 से लेकर 1912 तक बिहार में कई रेल लाइनों की शुरुआत की इनमें प्रमुख दरभंगा-सीतामढ़ी, सकरी-जयनगर, समस्तीपुर-खगड़िया, समस्तीपुर-दलसिंहसराय, समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर, मुजफ्फरपुर-मोतिहारी, मोतिहारी-बेतिया, हाजीपुर-बछवाड़ा, नरकटियागंज-बगहा लाइनें प्रमुख हैं इसके अलावे भी विभिन्न जगहों से अनेक ट्रेने चलाई गई.
भले ही आज राजशाही नहीं है, लेकिन दरभंगा महाराज की संपत्ति से चलने वाले इस अस्पताल में प्रतिदिन दर्जनों मरीजों का मुफ्त में इलाज कर दवा देने की व्यवस्था जारी है। याद रहे कि 12 बीघे में फैले इस अस्पताल की स्थापना 1878 में महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने द राज हॉस्पीटल एंड द लेडी डेफरीन फिमेल नाम से गरीबों के लिए की। गरीबों की सेवा के लिए खोला गया दो सौ बेड का यह अस्पताल तत्कालीन बंगाल राज्य का दूसरा सबसे बड़ा चिकित्सालय था। जहां आफगानिस्तान, नेपाल आदि कई देशों से मरीज मुफ्त में इलाज कराने आते थे। डॉ. भवनाथ झा, डॉ. अमूल्या चटर्जी, डॉ. मटरा, डॉ. गोयल, डॉ. होल्द जैसे देश-विदेश के कई नामचीन चिकित्सकों ने यहां योगदान दिया है।
बहु विवाह पर रोक लगाने के लिए इन्होंने अपने कार्यकाल में दंड का प्रावधान किया। गौ रक्षा संघ के संस्थापक बने। अंग्रेजी शिक्षा व एलोपैथी चिकित्सा को बढावा दिया। इनके कार्यकाल में ही अंग्रेजी स्कूल व मेडिकल डिसपेंसरी की स्थापना हुई। भारत में जैविक क्रांति के अगुआ रहे और जर्सी गाय की नस्ल इनके कार्यकाल की सबसे बडी देन है। तिरहुत स्टेट रेलवे की स्थापना कर इन्होंने तिरहुत में विकास की एक नयी लकीर खींच दी। तिरहुत सरकार लक्ष्मीश्वर सिंह ने ही तिरहुत में औद्योगिक क्रांति का सबसे पहले सपना देखा। दरभंगा सूत कारखाने की स्थापना और नील की खेती खत्म करने का सैद्धांतिक फैसला उनके विकास मॉडल को रेखांकित करता है। इंपिरियल कॉउंसिल के पहले भारतीय सदस्य रहे तिरहुत सरकार लक्ष्मीश्वर सिंह बहादुर साह जफर के बडे पोते को राजनीतिक संरक्षण देकर राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन को जिंदा रखने का एलान किया। अफ्रीका में गांधी को मदद करनेवाले पहले भारतीय बने। कांग्रेस के पालनहार बन कर उसकी नींव मजबूत की। पूणा सार्वजनिक सभा के संरक्षक बने। रूलिंग किंग का दर्जा नहीं मिलने के बावजूद कोलकाता में गवर्नर से सलामी लेनेवाले तिरहुत सरकार हिंदू-मुस्लिम एकता के भी प्रतीक माने जाते हैं।
बहुविवाह पर लगाम लगाकर भी सामाजिक आंदोलन के ब्रांड नहीं बन पाये तिरहुत सरकार
बहुविवाह पर लगाम लगाने के बावजूद राजा राम मोहन राय की तरह महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह सामाजिक सुधार के लिए याद नहीं किये गये। जबकि खुद राजा राम मोहन राय ने अपने एक भाषण में तिरहुत सरकार के समाज सुधार को प्रेरणादायक बताया है। इस बात को बिहार के सामाजिक आंदोलनों पर काम करनेवालों ने कभी उल्लेखित नहीं किया, भारतीय परिदृश्य में वो रेखांकित ही नहीं हुए। कारण जो कुछ भी हो, लेकिन तिरहुत में बहुविवाह के खत्मे के लिए इन्होंने न केवल सामाजिक जागरुकता फैलाया, बल्कि दुल्हा, पंजीकार और परोहितों पर दंड का भी प्रावधान किया। दस्तावेज के अनुसार 19वीं शताब्दी तक तिरहुत में एक व्यक्ति 35 से 45 शादियां करते थे। पहली पत्नी तो ससुराल आती थी, लेकिन बाकी पूरी जिंदगी मायके में ही गुजार देती थी। इसे बिकौआ विवाह कहा जाता है, जिसमें गरीब अपनी बेटी का बिवाह कुलीन(एलीट) परिवार के व्यक्तियों से कराने के लिए बिक जाता था। इस घिनौनी प्रथा का सबसे दुखद पक्ष यह था कि एक कुलीन व्यक्ति की मौत पर कई महिलाएं विधवा हो जाती थी। 1876 में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ने इस प्रथा काे बंद करने का प्रयास शुरु किया। सबसे पहले उन्होंने इस संबंध में सर्वे कराने का फैसला किया। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार उस वर्ष 54 ऐसे कूलीन व्यक्ति की मौत हुई जिनके कारण कुल 665 महिलाएं विधवा हुई। कोइलख गांव में एक 50 वर्षीय कूलीन व्यक्ति की मौत से 35 महिलाएं विधवा हुई, जबकि रामनगर में एक 40 वर्षीय कूलीन व्यक्ति की मौत से 14 महिलाएं विधवा हुई, महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह इन आंकडों को देखकर तत्काल अपने चाचा गुणेश्वर सिंह व गोपेश्वर सिंह के साथ मंत्रणा की और बिकौआ विवाह पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। साथ ही इसे सामाजिक आंदोलन बनाने के लिए 1000 रुपये का फंड भी आवंटित किया। सौराठ सभा में एक निगरानी ब्यूरो की स्थापना की गयी और ऐसे लोगों पर दंडात्मक कार्रवाई शुरु हुई। 1878 में सौराठ सभा में कुल 2289 विवाह का निबंधन हुआ। इनमें 107 विवाह पंजीयन बिकौआ बिवाह माना गया। 96 लोगों (पंजीकार, दूल्हा, पुरोहित) को सजा सुनाई गयी, जिनसे कुल 298 रुपये का दंड वसूला गया। 10 युवाओं को रिहा किया गया, जबकि 26 दूल्हे को महाराजा कोर्ट में भेज दिया गया। 23 नवंबर 1878 को तिरहुत में पहली बार बिकौआ विवाह करने के कारण किसी व्यक्ति को कारावास हुआ। क्या आप इसे सामाजिक आंदोलन नहीं कहेंगे।
साभार – विकिपीडिया, मैथिली ब्राह्मण महासभा, दैनिक जागरण, मुज्जफरपुर, एबीपी लाइव, बीबीसी हिन्दी
और इंटरनेट तथा फेसबुक पर उपलब्ध ई समाद की सम्पादक कुमुद सिंह के कई आलेख




