Friday, June 26, 2026
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मिट्टी-गुड़ से अद्वितीय घर बनाते हैं यह आर्किटेक्ट, हजारों को दे चुके हैं प्रशिक्षण

आज देश के अधिकांश शहर तेजी से कंक्रीट के जंगल के रूप में तब्दील होते जा रहे हैं। इससे न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ती जा रही हैं, बल्कि वास्तुकला से संबंधित हमारी पहचान भी धूमिल होती जा रही है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि आज हमारे पाठ्यक्रमों में परंपरागत भारतीय वास्तुकला के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। इसी को देखते हुए तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में रहने वाले आर्किटेक्ट बिजू भास्कर और उनकी पत्नी सिंधू भास्कर ने 2009 में ‘थनल नैचुरल बिल्डिंग अवेयरनेस ग्रुप’ की स्थापना की, इसके तहत वह न सिर्फ प्राकृतिक तरीके से घर बनाते हैं, बल्कि इस व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए हजारों लोगों को प्रशिक्षित भी कर चुके हैं।
भास्कर ने पिछले एक दशक में 60 से अधिक वर्कशॉप किए हैं और जरूरतमंदों के लिए बिना किसी शुल्क के 10 से अधिक संरचनाओं का निर्माण किया है। उन्होंने अब तक जितने भी प्रोजेक्ट किए हैं, सभी के सभी बेहद खास हैं, क्योंकि भास्कर ने उन्हें सीमेंट के एक कतरे का भी इस्तेमाल करने के बजाय मिट्टी, गुड़, हल्दी, नीम, चूना, लकड़ी, पत्थर जैसे स्थानीय पदार्थों से आधुनिक सुविधाओं के अनुकूल बनाया है। उनके कुछ खास प्रोजेक्ट के बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं:
फार्मर्स हाउस – 2017
बिजू भास्कर ने इस घर को केरल के अट्टापारी के किसान जयन के लिए बनाया है। इसके बारे में वह कहते हैं, “जयन की जमीन मुख्य सड़क से काफी दूर है। इसलिए हम निर्माण सामग्रियों को बाहर से नहीं मंगा सकते थे। 1020 वर्ग फीट में बने इस घर को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस, पत्थर, मिट्टी से बनाया गया है। इसके लिए सिर्फ चूना, टेराकोटा टाइल्स को बाहर से मंगाया गया था।
केरल के अट्टापारी में बना जयन का घर
वह आगे बताते हैं, “इस घर में 2 बेडरूम, एक हॉल, किचन और बाथरूम है। इसकी छत दो लेयर में है। बीच वाली छत को बांस से और ऊपरी छत को पुराने टेराकोटा टाइल से बनाया गया है। वहीं, इसकी दीवारों को 6-6 इंच के दो भागों में बनाया गया है, और बीच में बांस दिए गए हैं, जिससे घर में गर्मी का कोई असर नहीं होता है। इसे बनाने में महज 4 लाख रुपए खर्च हुए, जिसे सीमेंट से बनाने में दोगुना खर्च होता।”
कम्युनिटी सीड बैंक – 2018
भास्कर बताते हैं, “इस कम्यूनिटी सीड बैंक को तमिलनाडु के करूर में बनाया गया है। इसे देशी किस्म के बीजों को संरक्षित के लिए बनाया गया है। यह 1400 वर्ग फीट के दायरे में है और इसे बनाने में 20 लाख रुपए खर्च हुए।” इस सामुदायिक केन्द्र की दीवारों को मिट्टी से बनाया गया है, जिसकी मोटाई 1.5 फीट है। इसकी पहली मंजिल को ताड़ के पेड़ों से, जबकि दूसरे छत को टेराकोटा टाइल से बनाया गया है।
तमिलनाडु के करूर में बना सीड बैंक
भास्कर बताते हैं, “यहाँ किसानों के बैठने, बीजों को तोलने और सूखाने के लिए तीन तरफ से बड़े-बड़े बरामदे हैं। किसान बीजों को आसानी से देख सकें, इसके लिए सामने एक कमरा बनाया गया है और बीजों को रोशनी से बचाने के लिए एक कमरा पीछे है। इसके स्तंभों को पत्थर से बनाया गया है, जबकि स्थानीय कारीगरों ने यहाँ काफी नक्काशी का भी काम किया है।”
प्रोजेक्ट अर्थ बैग – 2016
प्रोजेक्ट अर्थ बैग के तहत बिजू भास्कर ने खुद अपने ही घर को बनाया। इसकी खासियत यह है कि इसकी दीवारों को जूट के बोरों में मिट्टी भर कर बनाया गया है, जबकि इसकी छत को चूना और टेराकोटा टाइल को बनाया गया है। साथ ही, यहाँ एक जल संरक्षण प्रणाली को भी विकसित किया गया है।


जूट के बोरों से बना बिजू भास्कर का घर
इसके बारे में भास्कर कहते हैं, “इस घर को हमने 1000 जूट के बोरे में रेतीली मिट्टी भर कर बनाया है। मिट्टी में चूना, गन्ने का रस आदि मिलाया गया है। इसे बनाने में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं हुई। शुरूआत में इसकी छत को घास से बनाया गया था, लेकिन बाद में इसे चूना और टेराकोटा टाइल के साथ बनाया गया।”
घर को घुन से बचाने के लिए बैग पर नीम, हल्दी, आदि का छिड़काव किया गया है। एक और खास बात यह है कि घर के सूखने के बाद इसकी मिट्टी में नीम, हल्दी, कैक्टस और एलोवेरा मिलाकर पुताई की गई, ताकि इसे घुन से बचाया जा सके। इसके अलावा, इसकी छत को दो स्तरों में बनाया गया है – पहला चूने से, जबकि दूसरा – टैराकोटा टाइल से। जिसकी वजह से घर में तापमान काफी नियंत्रित रहता है। इस तरह 700 वर्ग फीट में बने इस घर को बनाने में महज 5.50 लाख रुपये खर्च हुए।
विलेज मड किचन – 2019
इसके तहत थनल कैंपस में आने वाले लोगों के लिए एक रसोई घर का निर्माण किया गया। इसमें आर्किटेक्टचर से संबंधित प्रयोग करने की भी जगह है। इस कड़ी में भास्कर कहते हैं, “2018 में हमारे यहाँ बाढ़ आई थी। इसलिए हमने 450 वर्ग फीट में इसकी संरचना को को बांस और सुरखी (जली मिट्टी) से इस तरीके से बनाया है कि भविष्य में बाढ़ आने पर भी सिर्फ मिट्टी ही बहेगी, ढांचा बचा रहेगा। इसमें खाना बनाने के दौरान धुएं से बचने के लिए एक चिमनी भी लगाया गया है, जिससे धुआँ सीधे बाहर निकल जाए। वहीं, हमने यहाँ एक मड ओवेन भी बनाया है, जिसमें रोटी बनाई जा सकती हैं।”
कैसे आया थनल को स्थापित करने का विचार
बिजू भास्कर बेंगलुरु, चेन्नई, कोच्चिन जैसे कई बड़े शहरों में रह चुके हैं। लेकिन, धीरे-धीरे उनका रुझान की वादियों में आकर बस गए। इसके बाद उन्होंने राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के गाँवों का दौरा कर भारतीय वास्तुकला के संबंध में जानकारियों को इकठ्ठा किया। इसके बाद, साल 2009 में उन्होंने भारतीय वास्तुकला पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए थनल, जिसका हिन्दी अर्थ है – परछाई, अध्यात्म की ओर बढ़ने लगा, इसी क्रम में 15 साल पहले वह तिरुवन्नामलाई की स्थापना की। फिलहाल बिजू, थनल के तहत 2 दिनों से लेकर 2 वर्ष का पाठ्यक्रम चलाते हैं और उन्होंने अब तक 1000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण किया है। इसके साथ ही, उन्होंने अपने ज्ञान को अधिकतम लोगों तक पहुँचाने के लिए अपना यूट्यूब चैनल भी लॉन्च किया है।
साभार – द बेटर इंडिया

उम्र महज 15 साल, लेकिन गुल्लक में पैसे जमा कर बना डाले 10 शौचालय

जमशेदपुर : झारखंड के जमशेदपुर में रहने वाली मोन्द्रिता चटर्जी की उम्र महज 15 साल है, लेकिन उन्होंने इतनी छोटी उम्र में कुछ ऐसी पहल की है, जिससे समाज में स्वच्छता संबंधी चिन्ताओं को दूर करने के लिए उम्मीद की एक नई किरण दिखाई देती है। फिलहाल, जमशेदपुर के हिलटॉप स्कूल में 10वीं में पढ़ने वाली मोन्द्रिता, अपने गुल्लक में पैसे जमा कर यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों में 10 शौचालय बनवा चुकी है और उनका लक्ष्य है कि समाज के हर तबके में शौचालय के व्यवहार को बढ़ावा मिले।
दरअसल, बात 2014 की है। मोन्द्रिता उस वक्त चौथी कक्षा में पढ़ती थीं। इसी दौरान, खबरों के जरिए उन्हें पता चला कि स्कूल में शौचालय नहीं होने की वजह से लड़कियाँ स्कूल छोड़ रही हैं। मोन्द्रिता ने द बेटर इंडिया को बताया, “मेरे पापा को खबरों में काफी दिलचस्पी रहती है, उन्हीं के जरिए मुझे पता चला कि ग्रामीण क्षेत्रों में, स्कूलों में शौचालय नहीं होने के कारण लड़कियाँ पढ़ने नहीं आती हैं। इसका मेरे ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा, क्योंकि शौचालय हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बिना शौचालय के अपनी जिंदगी गुजार देते हैं। इसके बाद मैंने ठान लिया कि मुझे इस दिशा में कुछ पहल करना है। ”
मोन्द्रिता ने जमशेदपुर के केन्द्राडीह में बनाया पहला शौचालय
वह आगे बताती हैं, “हमारे घर में पूजा करने के स्थान पर गुल्लक रखा होता है, जिसमें माँ-दादी पैसे जमा करती हैं। इसलिए मेरी भी शुरू से ही गुल्लक रखने की आदत रही। मैं इन पैसे को पर्व-त्योहार में खर्च करती थी, लेकिन मैं 2014 से गुल्लक में माँ-पापा और सगे-संबंधियों से अधिक पैसे माँग जमा करने लगी। इस तरह, 2 वर्षों में 24 हजार रुपए जमा हो गए।” इसके बाद मोन्द्रिता ने अपने माता से कहा कि उनके पास 24 हजार रुपए जमा हो गए हैं और इससे वह कुछ करना चाहती हैं। इसके बाद उन्हें जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति (JNSC) के जरिए केन्द्रहीह गाँव के बारे में पता चला। इस गाँव की आबादी 350 से अधिक थी, लेकिन यहाँ एक भी शौचालय नहीं था, फिर उन्होंने यहाँ शौचालय बनाने का फैसला किया।इसके बारे में वह कहती हैं, “हमने यहाँ लगभग 25 हजार रुपए से दिसंबर 2016 में दो शौचालय बनाए। शौचालय बनाने के बाद, हम अपने माँ-पापा के साथ हर वीकेंड यहाँ आते थे, ताकि पता चले कि लोग इसे इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं। हम लड़कियों को शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित भी करते थे।”
मोन्द्रिता ने झारखंड के पोटका में बनाया अपना 10वाँ शौचालय
बता दें कि गत वर्ष 150वीं गाँधी जयंती के मौके पर, मोन्द्रिता ने झारखंड क पोटका में अपने 10वें शौचालय का निर्माण किया। इससे पहले वह हलुदवानी और गरुड़वासा में भी शौचालय बनवा चुकी हैं। लेकिन, इसमें सबसे खास है गरुड़वासा के मानविकास स्कूल में बना शौचालय।
क्या खास है इस शौचालय में
मानविकास स्कूल में इस शौचालय को 2018 में बनाया गया था। इसमें तीन रूम हैं, लेकिन इस शौचालय को परंपरागत तकनीक के बजाय 7000 बेकार प्लास्टिक के बोतलों से बनाया गया है। इन बोतलों में मिट्टी भरे गए हैं, ताकि इसपर भीषण गर्मी का भी कोई असर न हो। इस शौचालय को बनाने में 1.8 लाख रुपये खर्च हुए और जब शौचालय बनकर तैयार हुआ, तो झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास भी इसे देखने आए। भविष्य में मोन्द्रिता का इरादा पर्यावरण हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे और शौचालयों को बनाने का है।
अभिभावकों को नहीं था कुछ पता
मोन्द्रिता के पिता डॉ. अमिताभ चटर्जी बताते हैं, “हमें 2016 में जब पता चला कि हमारी बेटी कुछ ऐसे कार्यों के लिए पैसे जमा कर रही है, तो हम अचंभित थे। मोन्द्रिता के इरादा जमा पैसों को स्वच्छता अभियान के लिए डोनेट करने का था, लेकिन हमने शौचालय बनाने का सुझाव दिया। इसमें जिला प्रशासन की पूरी मदद मिली।” वह बताते हैं, “हम ऐसे जगहों पर ही शौचालय बनाते हैं, जहाँ इसकी सख्त जरूरत है। साथ ही, हम यहाँ पानी की उपलब्धता भी सुनिश्चित करते हैं, क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि पानी के अभाव में शौचालय व्यवहार में नहीं आता है। इस तरह एक शौचालय बनाने में लगभग एक लाख रुपए खर्च होते हैं। इस रकम को पूरा करने के लिए अब, मैं और मेरी शिक्षक पत्नी अपनी सैलरी का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी के लिए जमा करते हैं, ताकि हम मोन्द्रिता के सपने को पूरा कर सकें।”


इसके अलावा, मोन्द्रिता अपने माता-पिता के साथ गाँवों का नियमित दौरा भी करती हैं, और ग्रामीणों द्वारा शौचालय के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए उनका काउंसिलिंग भी करती हैं, जैसे – शौचालय का इस्तेमाल क्यों जरूरी है, इसकी साफ-सफाई कैसे करें, आदि। अमिताभ के अनुसार, मोन्द्रिता के इस पहल से कम से कम 900 लड़कियों समेत दो हजार लोगों को फायदा हुआ है। कुछ तो ऐसे उदाहरण भी देखने को मिले हैं कि बच्चे अपने घरों में शौचालय को बनाने के लिए अपने माता-पिता से दवाब बना रहे हैं।
इस विषय में केन्द्रहीह की रहने वाली 26 वर्षीय दुर्गा बताती हैं, “पहले यहाँ कोई शौचालय नहीं था। इस वजह से हमें शौचालय के लिए शाम का इंतजार करना पड़ता था। लेकिन, गाँव में मोन्द्रिता द्वारा शौचालय बनाने के बाद यहाँ इसके इस्तेमाल को बढ़ावा मिला। साथ ही, शौचालय के पास ही एक मंदिर है, जिससे यहाँ पूजा करने के लिए आने के बाद भी कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन पहले कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था।”
‘शौचालय चटर्जी’ कहते थे लोग
अमिताभ बताते हैं कि मोन्द्रिता के शौचालय बनाने की मुहिम को लेकर लोग उन्हें ‘शौचालय चटर्जी’ कहते थे, लेकिन मोन्द्रिता ने हार नहीं मानी और वह दिनोंदिन निखरती गयी। मोन्द्रिता ने शौचालय के जरिए स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए जो मुहिम छेड़ी है, उसे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास और राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू से लेकर उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के द्वारा भी सराहा जा चुका है।
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी सराह चुके हैं मोन्द्रिता के कार्यों को
इसके अलावा, मोन्द्रिता को 2018 में एसोचैम लीडरशिप अवॉर्ड मिलने के साथ ही, उन्हें पूर्वी सिंहभूम जिला में स्वच्छता अभियान के लिए ब्रांड एम्बेसडर भी चुना गया है। मोन्द्रिता कहती है, “आज लड़कियों के लिए शौचालय जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है माहवारी के दौरान स्वच्छता का ध्यान रखना। मैं भविष्य में इसी दिशा में कोई ठोस शुरू करना चाहती हूँ। साथ ही, मेरी ग्रामीण क्षेत्रों में, खेती कार्यों में जैविक उर्वरकों को भी बढ़ावा देने की योजना है।”
साभार – द बेटर इंडिया

बिहार को मखाना के लिए मशहूर बनाने में जुटे ‘मखाना मैन’ सत्यजीत

पूर्णिया : बिहार के पूर्णिया जिला में रहने वाले साकेत, हर सुबह जब अपनी 2 एकड़ जमीन पर लगे फसलों को देखते हैं, तो उनका दिन उत्साह से भर जाता है। साकेत ने इस जमीन को कुछ साल पहले ही मखाने की खेती के लिए खरीदा था। मखाना को कमल बीज या फॉक्स नट के नाम से भी जाना जाता है। इसमें कई पोषक तत्व होते हैं। साकेत के अधिकांश किसान साथी गेहूँ और धान की खेती करते हैं, लेकिन उन्होंने मखाना की खेती करने का फैसला किया। इससे साकेत को न सिर्फ अपने परिवार को कर्ज से उबारने में मदद मिली, बल्कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में भी मदद मिली।
साकेत ने द बेटर इंडिया को बताया, “मखाना से पहले मैं सिर्फ गेहूँ और अन्य फसलों की खेती करता था। मेरे पास अपनी जमीन नहीं थी, इसलिए शुरूआत में मुझे दूसरे की जमीन पर खेती करनी पड़ी। लेकिन, मखाना से होने वाली कमाई से मुझे काफी मदद मिली और कुछ ही वर्षों में मैंने न सिर्फ 2 एकड़ जमीन खरीद ली, बल्कि इससे मुझे अपने परिवार और बच्चों की बेहतर देखभाल करने में मदद मिली।”साकेत मखाना के बीज को बेच कर सालाना 3.5 लाख रूपये कमाते हैं और फिर बचे हुए बीजों को कुछ दिनों के बाद 30% अधिक मूल्य पर बेचते हैं। इस तरह हर साल उन्हें 4.5 लाख रूपए की कमाई होती है। साकेत, महज बिहार के 8 जिलों के 12,000 किसानों में से एक हैं, जिन्होंने शक्ति सुधा इंडस्ट्रीज के संस्थापक सत्यजीत कुमार सिंह से मखाना की खेती सीखी। सत्यजीत को ‘मखाना मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है।
आज जब देश-विदेश में मखाना लोकप्रिय है, अकेले बिहार में 90 फीसदी मखाना का उत्पादन होता है। सत्यजीत दावा करते हैं कि उनकी कंपनी शक्ति सुधा इस उत्पादन में कम से कम 50 प्रतिशत का योगदान करती है। इसके साथ ही, जिस गति से वह आगे बढ़ रहे हैं, उनका विश्वास है कि अगले 2-3 वर्षों में वह दुनिया के कुल मखाना उत्पादन में 70 से 75 फीसदी योगदान देने में सफल होंगे।
मखाना मैन की कहानी
मूल रूप से बिहार के जमुई जिले के रहने वाले सत्यजीत एक खेती-किसानी करने वाले परिवार से वास्ता रखते हैं। वह शुरू से ही कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिसका समाज पर एक सकारात्मक प्रभाव हो। इसलिए पटना विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने दो बार यूपीएससी की परीक्षा दी। उन्होंने अपने दूसरे प्रयास में इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता हासिल की, लेकिन काफी विचार करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि वह इसके लिए नहीं बने हैं।
इसके बारे में वह कहते हैं, “काफी सोचने के बाद, मुझे अहसास हुआ कि यह कुछ ऐसा नहीं था, जिसमें मैं अपना सौ फीसदी दे सकूँ। इसलिए मैंने सिविल सेवा के बजाय कारोबार में हाथ आजमाने का फैसला किया।”व्यावसायिक क्षेत्र में अपनी पैठ जमाने के बाद, एक हवाई यात्रा ने उन्हें मखाने की खेती की तरफ मोड़ दिया। उस घटना के बारे में सत्यजीत कहते हैं, “मैं फ्लाइट से बेंगलुरू से पटना आ रहा था। इसी दौरान मुझे राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान बोर्ड, पटना के तत्कालीन निदेशक डॉ. जनार्दन मिले। वह मखाने की सतत खेती पर शोध कर रहे थे और बातों-बातों में उन्होंने मुझे मखाने के फायदे के बारे में बताया और मैंने इसमें आगे बढ़ने का मन बनाया।”अगले दो से तीन वर्षों तक उन्होंने डॉ. जनार्दन के साथ रहकर मखाने की खेती की समस्याओं और तकनीकों को गहन रूप से समझा और इस दौरान उन्होंने राज्य के कई जिलों और गाँवों का दौरा किया।
वह बताते हैं, “उस वक्त इसके उत्पादन पर कुछ खास रिसोर्स मैपिंग उपलब्ध नहीं था। कुछ समुदायों ने 1000 से 1,500 टन मखाने की खेती की। इससे किसानों को मुनाफा नहीं हो रहा था, इस वजह से वह इससे दूर भागने लगे। इसलिए 2005 से 2015 तक, सरकारी एजेंसियों, विश्व बैंक और नाबार्ड के साथ मिलकर हमने बैकवर्ड इंटीग्रेशन के मॉडल को विकसित किया। इससे तहत हमारा उद्देश्य कम से कम प्रयासों के जरिए बड़े पैमाने पर मखाने की खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षित करना और उन्हें एक बेहतर बाजार उपलब्ध कराना था, ताकि उन्हें अधिकतम लाभ हो।”
शक्ति सुधा के प्रयासों से, स्थानीय बाजारों में मखाने का दाम 40 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 400 रुपये प्रति किलो हो गया। फलस्वरूप, जो पहल महज 400 किसानों के साथ शुरू हुआ था, आज उससे 12,000 से अधिक किसान जुड़ चुके हैं। मखाना किसान साकेत कहते हैं, “पहले मखाना का बाजार काफी हद तक क्रेडिट-बेस्ड लेन-देन पर आधारित था। लेकिन, शक्ति सुधा के आने के बाद, किसानों को अपनी उपज के लिए नकद भुगतान मिलने लगा।”
वह आगे कहते हैं, “शक्ति सुधा ने बाजार को पूरी तरह से किसानों के हित में बदल दिया, पहले मखाना उत्पादक बिचौलियों से त्रस्त थे। क्योंकि, वह कई महीनों के बाद किसानों को उपज की कीमत अदा करते थे। लेकिन, शक्ति सुधा ने इसके विपरीत, हमें तत्काल उच्च दर का भुगतान किया। इससे बड़े पैमाने पर किसानों ने मखाना की खेती शुरू कर दी और शक्ति सुधा को अपने उत्पाद बेचने लगे। इससे अन्य थोक और खुदरा खरीददारों पर मूल्य बढ़ाने का दवाब बढ़ा। मखाने की खेती करना काफी मुश्किल है। अंततः वर्षों के बाद हमें अपने मेहनत की उचित कीमत मिल रही है।”
सत्यजीत कहते हैं कि यह हमारे शोध कार्यों का नतीजा है कि शक्ति सुधा इस बदलाव को लाने में सक्षम हुई। इससे मखाना को सिर्फ स्नैक्स के बजाय एक सुपरफूड के रूप में बाजार में लाने में मदद मिली है। गत 19 वर्षों के दौरान मखाना बिहार के किसानों के लिए एक नकदी फसल के रूप में विकसित हुआ है। शायद यह इसी का नतीजा है कि जहाँ पहले सिर्फ 1,500 हेक्टेयर जमीन पर मखाने की खेती होती थी अब 16,000 हेक्टेयर पर होती है। सत्यजीत का अंदाजा है कि अगले वर्ष तक बिहार में 25,000 हेक्टेयर जमीन पर मखाने की खेती होगी। वह कहते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर मखाने की खेती तभी संभव हुई, जब किसानों ने धान और गेहूँ जैसे पारंपरिक फसलों के बजाय मखाने की खेती पर विश्वास जताया। सत्यजीत कहते हैं, “परंपरागत रूप से मखाने की खेती बड़ी झीलों या तालाबों में होती थी। कुछ गहन शोधों के आधार पर हमने इसे धान और अन्य फसलों के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले जमीन के अनुकूल बनाया, खासकर उन क्षेत्रों के लिए जहाँ जल-जमाव और बाढ़ की स्थिति रहती है। मखाना के पौधे के लिए 1.5 से 2 फीट गहरी पानी की जरूरत होती है। इसलिए हमने खेतों को इसी के अनुसार तैयार किया। इनसे न केवल किसानों को मखाना की खेती अपनाने में मदद मिली, बल्कि तेजी से विस्तार भी हुआ। आज करीब 80 प्रतिशत मखाने की खेती ऐसी ही जमीन पर होती है, जबकि 20 प्रतिशत तालाबों में उगाया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार करने के लिए बना रहे हैं योजना
बिहार में मखाना की खेती तेजी से बढ़ रही है और इस साल शक्ति सुधा ने अपना खुद का ब्रांड बनाने और अपने उत्पादों की मार्केटिंग पूरी दुनिया में करने का फैसला किया है। सत्यजीत का सपना मखाने को दुनिया भर में कैलिफ़ोर्निया आलमंड की तरह लोकप्रिय बनाना है।
इसी के तहत कंपनी ने मखाने से बने कई उत्पादों को बाजार में लाया है। फिलहाल, बाजार में शक्ति सुधा के पॉपकॉर्न मखाना स्नैक्स , कुकीज हो, रेडी टू मेड मिठाई, जैसे 28 उत्पाद हैं। ये उत्पाद ऑफलाइन और ऑनलाइन, दोनों उपलब्ध हैं। सत्यजीत कहते हैं, “हमने जुलाई में अपना ऑनलाइन सेगमेंट लॉन्च किया है और पहले ही महीने में 3.25 लाख रुपये का कारोबार हुआ। इसमें 33% रिपीट ऑर्डर हैं। वहीं, जनवरी में पटना में रिटेल को लॉन्च किया गया था, जिससे एक महीने में 7-8 लाख रुपये की कमाई हुई। इसके अलावा, हमने अमेरिका और कनाडा में भी 2 टन मखाने को निर्यात किया। हम इसे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि 2024 तक, हमारा कारोबार 50 करोड़ रुपए से बढ़कर 1000 करोड़ रुपये हो जाएगा।”
सत्यजीत चाहते हैं कि भविष्य में मखाना का बाजार और भी बढ़े। वह कहते हैं, “हमारा विचार है कि मखाना, प्रीमियम और सस्ते, दोनों किस्मों में उपलब्ध हो। हमारा पूरा ध्यान बाजार में सबसे बढ़िया मखाना उपलब्ध कराना है। यहाँ तक कि हमारे उत्पादों की पैकेजिंग भी पारदर्शी है, ताकि ग्राहक इसकी गुणवत्ता को सुनिश्चित कर सकें। हमारी गुणवत्ता हमारा गर्व है और हम अपने ग्राहकों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।”
शक्ति सुधा, फिलहाल देश के 15 राज्यों और 50 शहरों में अपने कारोबार को बढ़ाने की योजना बना रही है और उनका मानना है कि कई पोषक तत्वों से परिपूर्ण मखाना, पूरी दुनिया में बिहार की छवि को हमेशा के लिए बदल सकती है।
इस लेकर सत्यजीत कहते हैं, “मुझे देश में बिहार की नकारात्मक छवि और रूढ़ियों को लेकर काफी दुख होता था। बिहार कई मायनों में सक्षम है, लेकिन लोग इस पर ध्यान नहीं देते है। मैं यहाँ उद्यमशीलता की भावना को बढ़ावा देकर एक बदलाव को लाने की कोशिश कर रहा हूँ। सिविल सेवा क्षेत्र में नौकरी कर रहे मेरे दोस्त मुझे “मखाना मैन ऑफ इंडिया” कहते हैं, जो मुझे पसंद है, क्योंकि मुझे एक ऐसे उत्पाद से जुड़ने की खुशी है, जिससे न केवल लोगों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, बल्कि हजारों परिवारों को भी सक्षम बना रहा है। उन्हें गरीबी के दलदल से बाहर निकाल रहा है। मैं अपने सपनों को जी रहा हूँ।”

मूल लेख – (अनन्या बरुआ )
साभार – द बेटर इंडिया

शुभजिता सौन्दर्य – ब्यूटी विद ब्रेन एंड हार्ट

सुन्दरता क्या होती है.,…हम इसे शारीरिक आकर्षण से बांधते हैं…तो कई बार कह देते हैं कि मन ही सुन्दर हो तो वही असली सुन्दरता है पर बुद्धि का क्या…मेधा और हुनर का क्या…हमारी दृष्टि में सौन्दर्य एक समन्वय है…शरीर, मन और बुद्धि के सौन्दर्य का संगम…मतलब एक पूरा पैकेज…कम्प्लीट पैकेज… ब्यूटी…नॉट ओनली विद ब्रेन…बल्कि ब्यूटी विद ब्रेन एंड हार्ट…तभी तो आप होंगे प्रिय औऱ होगी दर्शन की इच्छा…प्रियदर्शिनी..। हमारा उद्देश्य है कि हम भारतीय हस्तशिल्प, कला, संस्कृति को सामने लाएं हम हर बार इसी के आधार पर आपको थीम देंगे।

मापदंड – शुभजिता सौन्दर्य का मापदंड यह नहीं है कि आप की लम्बाई कितनी ज्यादा है…आपका वजन कितना कम या अधिक है….आपकी कद – काठी कैसी है…हमारा मापदंड है कि कितने प्रेजेंटेबल हैं…खुद को लेकर आपमें कितना आत्मविश्वास है। आप जैसे हैं…वैसे ही कितने आत्मविश्वास के साथ खुद को सामने रखते हैं।

हमें आपके चश्मे से कोई दिक्कत नहीं है…हम यह जानना चाहते हैं कि आपके सोच का चश्मा कितना बड़ा है…आपके सपने कितने बड़े हैं..आप रूढ़ियों और जर्जरताओं को कहाँ तक तोड़ पा रहे हैं….और बतौर नागरिक अपने कर्तव्यों और अधिकारों को लेकर कितने सजग हैं और बतौर नागरिक आपके सपने क्या हैं…और जिम्मेदारियाँ कैसे निभा रहे हैं। आप अपने देश के हस्तशिल्प, कला, संस्कृति को अपने जीवन में कहाँ तक उतार सके हैं औऱ जिनको जरूरत है, आप उनकी मदद कैसे कर रहे हैं।

तो क्या आपको लगता है कि आप में है वह बात कि आप बन सकती हैं प्रियदर्शनी या श्रीमती प्रियदर्शनी…या फिर आप बन सकते हैं प्रियदर्शन या श्रीमान प्रियदर्शन…

वर्ग – प्रियदर्शनी (18 -25). श्रीमती प्रियदर्शिनी (25 वर्ष से ऊपर)
पुरुषों के लिए – प्रियदर्शन (18 -25), श्रीमान प्रियदर्शन (25 वर्ष से ऊपर)
राज्यों की परम्परागत कला का आपके परिधानों में नजर आना आवश्यक है…)

अगर हाँ…. तो अपनी तस्वीर भेजिए औऱ बताइए
अपना नाम,
उम्र,
जीवन का उद्देश्य,
अपनी समस्याओं से लड़ने का तरीका
समाज को सुन्दर बनाने के लिए आपने क्या किया है
आप क्यों सोचते हैं कि आप ही हैं इस उपाधि की/के हकदार?

तस्वीर – दो फुल (आदमकद) और एक क्लोज अप

प्रवेश शुल्क – 200 रुपये

तस्वीर औऱ जानकारी शुभजिता में पंजीकरण के बाद अपलोड की जा सकती है

विजेता को मिलेगा – शुभजिता  और शुभजिता यू ट्यूब चैनल में फीचर होने का मौका…
(प्रियदर्शन – प्रियदर्शिनी)
एक प्रोफाइल फोटो शूट
सभी प्रतिभागियों को मिलेगा ग्रूमिंग कार्यशाला में भाग लेने का मौका
ग्रूमर होंगी – शगुफ्ता हनाफी

निर्णायक और ग्रूमिंग सत्र में विशेषज्ञ

 शगुफ्ता हनाफी एक पी आर प्रोफेशनल हैं। हमारी आयोजन सहयोगाी संस्था शी – शगुफ्ता हनाफी इवेन्ट्स की संस्थापक और लॉन्चर्ज पी आर एंड इवेन्ट्स की सह संस्थापक हैं। बतौर सामाजिक कार्यकर्ता पिछले 15 साल से महिलाओं और बच्चों के लिए लगातार काम करती आ रही हैं। शगुफ्ता बेस्ट फ्रेंड्ज सोसायटी की सचिव और जुनौद एडुकेशन फाउंडेशन की सह  संस्थापक हैं।

 

क्या सच में थे रावण के दस सिर?

शारदीय नवरात्रि के समापन के बाद दशमी तिथि को दशहरा मनाया जाता है। इस बार दशहरा 25 अक्तूबर को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध करके लंका पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए इस दिन को विजयदशमी भी कहते हैं। रावण बहुत ही ज्ञानी प्रकांड पंडित था। रावण ही इस समग्र संसार में ऐसा था, जिसमें त्रिकाल दर्शन की क्षमता थी। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। किंतु उसके अहं के कारण उसकी मृत्यु हुआ। भगवान राम ने रावण का वध करके रामराज्य की स्थापना की। जिसके उपलक्ष्य में दशहरा मनाते हैं, इस समय रावण दहन किया जाता है हर जगह रावण के पुतले में हमेशा दस सिर बनाए जाते हैं। इन्हीं दस सिरो के कारण ही उसे दशानन कहा जाता है। चलिए जानते हैं कि क्या सचमुच रावण दस सिरों वाला था।

रावण के दस सिर होने के बारे में विद्वानों का कहना है रावण बहुत शक्तिशाली होने के साथ मायावी भी था, जिसके कारण वह अपने दस सिर होने का भ्रम पैदा कर सकता था। इसलिए विद्वानों का मानना है कि रावण के दस सिर नहीं थे वे केवल मायावी भ्रम से बनाए गए दस सिर थे। कुछ विद्वानों के मतानुसार रावण छह दर्शन और चारों वेदो का ज्ञाता था, जिसके कारण उसे दसकंठी भी कहा जाता था। जिसके कारण उसे प्रचलन के अनुसार दशानन कहा जाने लगा। जैन शास्त्रों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि रावण अपने गले में दस मढियां धारण करता था। जिसमें उसके सिर के दस प्रतिबिंब बनते थे ,जिसके कारण किसी को भी दस सिर होने का भ्रम हो जाता था।

रावण के दस सिर होने का उल्लेख रामचरित्र मानस में मिलता है, जिसमें श्री राम क्रमशः एक-एक दिन रावण का सिर काटते जाते हैं। लेकिन राम जी अपने बाण से रावण के जिस सिर को काटते हैं उस जगह पुनः नया सिर आ जाता था। इस तरह से माना जा सकता है कि रावण के दस सिर असुरी माया के द्वारा बनाए गए थे।

 

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ऐ सखी सुन – कोरोना काल में सबसे ज्यादा परेशान तो महिलाएँ ही हुईं

गीता दूबे

ऐ सखी सुन , समय बहुत खराब है और मौसम भी। आधे लोग बीमार हैं तो आधे बेईमान। अब बेईमानी भी तो एक तरह की बीमारी ही है और सखी यकीन मानो करोना से कुछ कम खतरनाक नहीं है, यह बीमारी। करोना के लिए तो फिर भी वैक्सीन की खोज चल रही है और अगले साल की तिमाही न सही छमाही तक तो न सही बाजार में पर खास -खास  लोगों के दरबार में तो पहुंच ही जाएगी। लेकिन बेईमानी का वैक्सीन भला कब बनेगा। जाने कब से हमारे राजनेता और बुद्धिजीवी इस लाइलाज़ बीमारी का इलाज ढूंढने में जी जान से लगे हुए हैं लेकिन इसका हाल तो यह है कि “दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की।”

सुन सखी, अब यह सवाल तो तुम्हारे मन में जरूर आ रहा होगा कि इन दोनों विपदाओं से तो सारी दुनिया ही परेशान हैं वह स्त्री हो या पुरूष, तो मैं यह बात खास तौर पर सखियों अर्थात स्त्रियों को ही संबोधित करके क्यों कह रही हूं। तो सखी बात यह है कि आप लोग यह बात पूरी तरह से नहीं जानते कि करोना हो या बेईमानी, दोनों से सब से ज्यादा परेशान है, आधी आबादी। समझ में नहीं आया ना, तो सुनिए। पहले करोना की ही बात करें, फिलहाल सबसे ज्यादा उत्पात तो इसी ने मचा रखा है।

करोना काल में जो लॉकडाउन हुआ उसमें सबसे ज्यादा तकलीफ़ महिलाओं को हुई। बात अगर घरेलू महिलाओं की करें तो पहले घर के काम काज और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के बाद उन्हें थोड़ा सा वक्त अपने लिए भी मिल जाता था जिसमें वे अपने विभिन्न शौक पूरे कर सकती थीं, सहेलियों से गपिया सकती थीं ,सोशल मीडिया पर मुक्त विचरण कर सकती थीं या फिर ‘दूर के दर्शन’ करतीं अथवा दोपहर की नींद ही पूरी कर सकती थीं। लेकिन करोना के फलस्वरूप हुए इस लॉकडाउन ने उनका यह  स्पेस या  निजी कोना भी उनसे छीन लिया। एक तो घरेलू सहायिका की अनुपस्थिति में पूरे घर को संभालना दूजे चौबीसों घंटे घर पर बने रहने वाले पति और बच्चों की फरमाइशें ही नहीं पूरी करना बल्कि उनके अवसाद या चिड़चिड़ेपन को‌ भी झेलना। घर पर‌ रहकर पढ़ाई और दफ्तर का काम पूरी मुस्तैदी से संभालने वालों से सहयोग तो क्या ही मिलना था बल्कि उनकी वक्त -बेवक्त की फरमाइशों के लिए भी तैयार रहना जरूरी था। न जाने कितनी महिलाएँ इस दोहरी मार में अपना सुख चैन बिसार बैठीं। और बची खुची कसर पूरी कर दी बढ़ती हुई घरेलू हिंसा की घटनाओं ने। जी बिल्कुल, आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन में घरेलू हिंसा की घटनाओं में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है। आर्थिक पक्ष‌ और नौकरी से जुड़ी हुई तमाम चिंताओं ने पतियों का रक्तचाप बढ़ा दिया तो पतियों ने अपनी हताशा का विषाक्त कचरा अपनी पत्नियों पर उड़ेल दिया। हद तो तब हुई जब खेल भी खतरनाक बन गया ‌और उसकी परिणति भी हिंसा में हुई। एक छोटी सी घटना इस तथ्य को गहराई से व्याख्यायित करने के लिए काफी होगी। एक अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, करोना काल में मन बहलाने और समय काटने के लिए पति-पत्नी लूडो खेल रहे थे और संयोग से पत्नी खेल- खेल में पति परमेश्वर से जीत गई। तो अपनी हार से झल्लाए -बौखलाए पति देवता ने पत्नी की जीत का उपहार, उसके  गालों पर तमाचा जड़ कर दिया। पत्नी की इतनी हिमाकत कि खेल में ही सही पति से बाजी मारी ले जाए। तो अब भुगतो परिणाम। यह छोटी सी घटना यह सिद्ध कर देती है कि तमाम बड़े बड़े अखबारी दावों के बावजूद स्त्रियों की स्थिति बहुत ज्यादा नहीं बदली है।

अब बात करें  कामकाजी महिलाओं की तो उन्हें इस बीमारी ने‌ बुरी तरह शारीरिक मानसिक रूप से त्रस्त किया है। “वर्क फार्म होम” और वर्क फॉर होम” के दो चक्की के पाटों में वह पिसकर रह गई। आर्थिक मंदी के इस दौर में नौकरी बचानी है तो घर पर रहते हुए भी अपना काम पूरे समर्पण के साथ करना है और घर तो हर स्त्री की पहली प्राथमिकता होती ही है, उसे भला कैसे बिखरने दे। इस तरह घर और बाहर में संतुलन साधने की कोशिश में वह खुद अपना शारीरिक मानसिक संतुलन खोने की कगार पर आ गई है।

तो सखी, अब तो यह समझ में आ ही गया होगा कि इस दौर में सबसे ज्यादा तकलीफ़ औरतों ने झेली, वह हाशिए के इस पार हों या उस पार की।

अब बात करें बेईमानी की तो औरत के साथ हमेशा से बेईमानी ही हुई है। पहले तो देश के बहुत से हिस्सों में उन्हें जन्म लेते ही मार दिया जाता था, कभी नमक चटाकर तो कभी खाट के पाए के नीचे दबाकर और अगर वे किसी तरह बच गईं तो हर पल सामाजिक पारिवारिक अंकुश के नीचे सहम- सहम कर सांस लेने को बाध्य हुईं या की गईं। फिर जरा भी अपनी परिधि का उल्लंघन किया तो सम्मान रक्षा के लिए क्रूरतापूर्ण ढंग से कत्ल कर दी गईं। लेकिन विज्ञान और तकनीक की उन्नति ने तो उनसे उनके जन्म लेने का अधिकार ही छीन लिया। जैसे ही पता लगता है कि माँ की कोख में पलने वाली संतान लड़की है वैसे ही उसकी साँसें हमेशा के लिए रोक दी जाती हैं।

इसके बावजूद अगर वह मरने से बच जाती है और धरती पर आने के बाद तो कदम -कदम पर उनके साथ बेईमानी होती है। बेटे के लिए अलग नियम और बेटी के लिए अलग। इस दोहरी नीति से त्रस्त होने के बावजूद अगर लड़- भिड़कर वह अपने दम पर एक मकाम हासिल कर भी लेती है तो समाज यहाँ भी उसकी सफलता पर तंज कसने से बाज नहीं आता कि उसने वह जगह अपनी योग्यता के बल पर नहीं देह के बल पर हासिल की है।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” का जाप करनेवाला हमारा समाज नारियों को सम्मान तो दूर की चीज है समान स्थान या आसन देने में कितनी ईमानदारी बरतता है इसे जानने के लिए दैनिक अखबारों की सुर्खियाँ ही काफी होंगी। नारी के प्रति होनेवाली बेईमानी की कथा लिखने बैठूं तो सारे जहां की स्याही भी कम पड़ेगी। कुछ बातें आप सब भी जानती हैं और कुछ जान जाएंगी। अतः आज की बात यहीं खत्म करती हूँ, सखी। आप सबको सावधान करने और कुछ नयी पुरानी बातें बताने के लिए फिर आऊंगी। फिलहाल, विदा लेती हूँ, सखी।

आप सब की सखी

गीता दूबे

 

रेडिंग्टन आई फोन 12 प्रो और आई फोन 12 अब स्टोर्स में

कोलकाता : रेडिंग्टन अब आई फोन 12 प्रो और आई फोन 12 उपलब्ध करवाएगा। नये डिजाइन वाला यह फोन नयी कैमरा प्रणाली वाला होगा और इसमें स्मार्टफोन की सबसे तेज मानी जाने वाली चिप ए 14 लगी होगी। फोन सारे भारत के 3500 रिटेल स्टोर्स में उपलब्ध होगा। रेडिंग्टन ने एचडीएफसी बैंक से हाथ मिलाया है और आईफोन की सभी नयी रेंज पर कैश बैक ऑफर दे रहा है। आई फोन 12 पर ग्राहकों को 6 हजार रुपये का कैशबैक मिलेगा जबकि आईफोन 12 प्रो पर 5000 रुपये का कैश बैक होगा। सामाजिक दूरी को ध्यान में रखते हुए प्री -बुक करवाने वाले ग्राहकों को नये आई फोन के चयन के लिए स्टोर में खास तौर पर टाइम स्लॉट मिलेगा। उनके लिए फोन घर पहुँचाने की भी व्यवस्था है। विस्तृत जानकारी www.indiaistore.com से प्राप्त की जा सकेगी।

 

पूजा परिक्रमा : मोहम्मद अली पार्क के पूजा मंडप में माँ कर रहीं कोरोनासुर का वध

कोलकाता : कोरोना का प्रभाव पूजा मंडपों पर साफ नजर आ रहा है। मध्य कोलकाता की प्रख्यात मोहम्मद अली पार्क की दुर्गापूजा में माँ दुर्गा इस बार कोरोनासुर का वध करती दिख रही हैं। मोहम्मद अली पार्क की पूजा का यह 52वाँ वर्ष है और इसका उद्घघाटन दक्षिणेश्वर रामकृष्ण आद्यापीठ के महासचिव ब्रह्मचारी मुराल भाई ने किया था। मोहम्मद अली पार्क दुर्गा पूजा के महासचिव सुरेन्द्र कुमार शर्मा के मुताबिक महामारी के दौरान सभी माँ दुर्गा को आशा भरी नजरों से देख रहे हैं कि वे महिषासुर की तरह कोरोनासुर का भी वध करेंगी।

कलाकार कुश बेरा ने जून माह में अपने बच्चों के साथ यह काम शुरू किया था। 12 फीट लम्बी यह प्रतिमा पूरी तरह मिट्टी से बनायी और सजायी गयी है। पिछली बार मोहम्मद अली पार्क के पूजा मंडप में मुरुगन मंदिर की प्रतिकृति दिखी थी। पूजा पिछले साल की तरह सेन्ट्रल एवेन्यू फायर स्टेशन में आयोजित की गयी है। मण्डप एक मंदिर की प्रतिकृति है।

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