Thursday, April 9, 2026
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निटको ने अपने शोरूम का किया विस्तार

कोलकाता : टाइल्स और फर्श डिजाइन कम्पनी निटको ने शहर में अपने शोरूम का विस्तार किया है। शोरूम का आकार 2 हजार वर्ग फीट की जगह अब 2752 वर्ग फीट होगा। शोरूम में निटको टाइल्स, मार्बल और मोजैक की पूरी रेंज देखने को मिलेगी। निटको का मुम्बई मुख्यालय ग्राहकों को डिजिटल समाधान देगा और साथ ही व्हाट्सऐप सेवा से भी मदद मिलेगी। अगले तीन महीनों में निटको कई राज्यों में अपने कई स्टोर खोलेगा। पिछले कुछ सालों में कम्पनी ने 60 स्टोर खोले हैं और इसके 120 फ्रेंचाइजी हैं। निटको लिमिटेड के एम डी विवेक तलवार के मुताबिक कम्पनी का कारोबार 40 से अधिक देशों में फैला है।

2 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज भारत को बनाएगा वैश्विक निर्माण केन्द्र : एसोचेम

कोलकाता : एसोचेम के महासचिव दीपक सूद ने कहा है कि 1,45,980 करोड़ रुपये के अतिरिक्त परिव्यय के साथ 10 और क्षेत्रों के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना की कैबिनेट की मंजूरी देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए भारत के बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन है ।
सूद ने कहा, ” पहले से ही संचालन में पीएलआई योजना के साथ, वैश्विक विनिर्माण मूल्य श्रृंखला में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रमुख कार्यक्रम के लिए 2 लाख करोड़ रुपये की बड़ी प्रोत्साहन राशि है। इसका प्रभाव ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, खाद्य उत्पादों और दूरसंचार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करेगा, आर्थिक गतिविधियों पर इसका प्रभाव होगा। फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, सौर उपकरण जैसे क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। देगा।
उन्होंने कहा कि कपड़ा, विशेष रूप से तकनीकी वस्त्र जैसे क्षेत्र, कोविद -19 महामारी से लड़ने के लिए पीपीई जैसे महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के अवसर पर बढ़े हैं। पीएलआई के साथ, “भारत ने वैश्विक निवेशकों के लिए अपने वैश्विक विनिर्माण सुविधाओं को स्थापित करने के लिए और भी दरवाजे खोल दिए हैं, यहां तक ​​कि घरेलू फर्मों को भी मजबूती प्रदान की गई है। इन उपायों से आर्थिक सुधार में तेजी आएगी, न केवल बहाल करने से। उपभोक्ता मांग लेकिन निवेश जलवायु ” को भी किनारे कर रहा है।
एसोचैम के महासचिव ने कहा, विशेष इस्पात और सौर मॉड्यूल जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहन से भारत को निवेश के साथ-साथ एक नवीनतम तकनीक प्राप्त करने में मदद मिलेगी। वैश्विक भूस्थैतिक प्रतिमान वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने के लिए भारत का पक्षधर है। श्री सूद ने कहा कि सरकार भारत के लिए इस महान अवसर को हासिल करने के लिए सभी प्रयास कर रही है।

सेंट जेवियर्स यूनिवर्सिटी ने किया मास्क वितरण

कोलकाता : कोरोना महामारी को देखते हुए सेंट जेवियर्स यूनिवर्सिटी ने मास्क वितरण किया। विश्व बांग्ला जंक्शन, काठालबेड़िया गाँव और उससे संलग्न इलाकों में माक्स वितरण किया गया। सेंट जेवियर्स यूनिवर्सिटी के वीसी डॉ. फिलिक्स राज ने बताया कि मास्क वितरण 5 किमी के तक के क्षेत्र में किये गये। यह विद्यार्थियों की कक्षाओं के आगे की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

ई कॉमर्स बाजार में उतरा ओके क्रेडिट, शुरू किया ओके शॉप

एक नया अभियान शुरू किया # चन्देरीकीदिवाली ~
चन्देरी शिल्प से जुड़े कारीगरों को मिलेगा प्रोत्साहन
कोलकाता : ओके क्रेडिट ने ई कॉमर्स बाजार में दस्तक दे दी है और ‘ओके शॉप – आपकी ऑनलाइन शॉप’ शुरू किया है। इसके साथ ही कम्पनी हस्तशिल्प को प्रोत्साहित कर रही है और मध्य प्रदेश के चन्देरी शिल्प को आगे बढ़ाने के लिए आगे बढ़ रही है जो कोविड -19 के कारण काफी प्रभावित हुए हैं। ओकेशॉप सभी छोटे व्यापारियों को दो सरल चरणों में अपनी ऑनलाइन उपस्थिति स्थापित करने की अनुमति देकर व्यापार करने में आसानी प्रदान करता है। यह व्हाट्सएप पर छवियों, विवरण और मूल्य निर्धारण, सुरक्षित ऑनलाइन भुगतान और उत्पादों के आसान साझाकरण विकल्प के साथ उत्पाद कैटलॉग बनाने में मदद करता है। विक्रेता अपनी स्टॉक उपलब्धता के अनुसार कैटलॉग से जोड़ या हटा भी सकते हैं। यह स्थानीय विक्रेताओं को एक डिजिटल व्यवसाय चलाने में सक्षम बनाता है। यह वास्तव में मेड इन इंडिया ऐप है।
आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को आगे ले जाते हुए ‘वोकल फॉर लोकल’ के लिए काम कर रहा है। इस अभियान के साथ ओके शॉप 3000 से अधिक करघों से जुड़ेगा और 6 हजार कारीगरों को इससे सहायता मिलेगी। यह अवसर अब बुनकरों को अपनी बिक्री बढ़ाने और भारत के साथ अपने उत्पादों की उच्च दृश्यता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने के साथ-साथ अपने संभावित उपभोक्ताओं तक सीधे पहुंचने में सक्षम करेगा। इससे जुड़ा कोई आयोग नहीं है, इसलिए बुनकर उपभोक्ताओं को समाप्त करने के लिए अपने उत्पादों को मुफ्त में बेच सकते हैं।
ओके क्रेडिट ने बुनकरों को अपने उत्पादों को जोड़ने के लिए और ग्राहकों को सीधे खरीदने के लिए एक विशेष वेबसाइट भी लॉन्च की है: http://chanderi.okshop.in/
चंदेरी समाज ने सरकार और स्थानीय प्राधिकरणों का भी बड़ा समर्थन देखा है, और शुरुआती 100% मुक्त वाई-फाई समुदाय में से एक है, जो बुनकरों को नवाचार करने और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में योगदान देने के लिए अगले कदम उठाने के लिए प्रेरित और सक्षम बनाता है। । डिजिटल सशक्तिकरण का नेतृत्व करने के लिए और इस तरह के छोटे भारतीय व्यवसायों को विकसित करने के लिए ओकेशॉप के माध्यम से ओ’क्रेडिट शीर्ष पर है।
अभियान को लेकर ओके क्रेडिट के सह संस्थापक और सीईओ हर्ष पोखरना ने कहा, ‘ओके शॉप छोटे व्यवसायियों को डिजिटल रूप से सशक्त करने के लिए एक मंच प्रदान करता है, और इस वर्ष दिवाली अभियान छोटे व्यापारियों को इस चुनौतीपूर्ण स्थिति के दौरान विस्तारित निःस्वार्थ समर्थन के लिए आभार और सराहना दर्शाता है; हमें उम्मीद है कि हम चंदेरी समाज में एक बदलाव लाने में सक्षम हैं। ”

आस्था और विश्वास के साथ मनाएं आलोक पर्व दीपावली

सुनीता सुराना, युग्म ऐस्ट्रो कन्सल्टेंसी

दीपावली हमारा सबसे प्राचीन धार्मिक पर्व है। यह पर्व प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। यह पर्व ‘प्रकाश-पर्व’ के रूप में मनाया जाता है। यह बात और है कि आज का युग दिखावे का युग हो गया है और महंगी लाइट और साज सज्जा को ही हम दीवाली मानते हैं। हकीकत यह है कि दीवाली पर्व के साथ अनेक धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मुख्यतया: यह पर्व लंकापति रावण पर विजय हासिल करके और अपना चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अपने घर आयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब श्रीराम अपनी पत्नी सीता व छोटे भाई लक्ष्मण सहित आयोध्या में वापिस लौटे थे तो नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर खुशियां मनाईं थीं। इसी पौराणिक मान्यतानुसार प्रतिवर्ष घर-घर घी के दीये जलाए जाते हैं और खुशियां मनाई जाती हैं।

दीपावली पर्व से कई अन्य मान्यताएं, धारणाएं एवं घटनाएं भी जुड़ी हुई हैं। कठोपनिषद् में यम-नचिकेता का प्रसंग आता है। इस प्रसंगानुसार नचिकेता जन्म-मरण का रहस्य यमराज से जानने के बाद यमलोक से वापिस मृत्युलोक में लौटे थे। एक धारणा के अनुसार नचिकेता के मृत्यु पर अमरता के विजय का ज्ञान लेकर लौटने की खुशी में भू-लोकवासियों ने घी के दीप जलाए थे। यही आर्यवर्त की पहली दीपावली भी मानी जाती है।

इसी दिन श्री लक्ष्मी जी का समुन्द्र-मन्थन से आविर्भाव हुआ था। इस पौराणिक प्रसंगानुसार ऋषि दुर्वासा द्वारा देवराज इन्द्र को दिए गए शाप के कारण श्री लक्ष्मी जी को समुद्र में समाना पड़ा था। लक्ष्मी जी के बिना देवगण बलहीन व श्रीहीन हो गए। इस परिस्थिति का फायदा उठाकर असुर सुरों पर हावी हो गए। देवगणों की याचना पर भगवान विष्णु ने योजनाबद्ध ढ़ंग से सुरों व असुरों के हाथों समुद्र-मन्थन करवाया। समुन्द्र-मन्थन से अमृत सहित चौदह रत्नों में श्री लक्ष्मी जी भी निकलीं, जिसे श्री विष्णु भगवान ने ग्रहण किया। श्री लक्ष्मी जी के पुनार्विभाव से देवगणों में बल व श्री का संचार हुआ और उन्होंने पुन: असुरों पर विजय प्राप्त की। लक्ष्मी जी के इसी पुनार्विभाव की खुशी में समस्त लोकों में दीप प्रज्जवलित करके खुशियां मनाईं गई। इसी मान्यतानुसार प्रतिवर्ष दीपावली को श्री लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार समृद्धि की देवी श्री लक्ष्मी जी की पूजा सर्वप्रथम नारायण ने स्वर्ग में की।
इसके बाद श्री लक्ष्मी जी की पूजा दूसरी बार ब्रह्मा जी ने,
तीसरी बार शिव जी ने, चौथी बार समुन्द्र मन्थन के समय विष्णु जी ने, पांचवी बार मनु ने और छठी बार नागों ने की थी।

दीपावली पर्व के सन्दर्भ मे भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा एक प्रसंग भी प्रचलित है। इस प्रसंग के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण इसी दिन बाल्यावस्था मे पहली बार गाय चराने के लिए वन में गए थे। संयोगवश इसी दिन श्रीकृष्ण ने इस मृत्युलोक से प्रस्थान किया था। एक अन्य प्रसंगानुसार इसी दिन श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक नीच असुर का वध करके उसके द्वारा बंदी बनाई गई देव, मानव और गन्धर्वों की सोलह हजार कन्याओं को मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में लोगों ने दीप जलाए थे, जो बाद मे एक परंपरा में परिवर्तित हो गई।
मेरा आप सभी से अनुरोध है कि हमें यह पर्व पौराणिक तरीकों से ही मनाया जाना चाहिए ना कि दिखावे के साथ।

दिवाली पर जगमाती रोशनी की तरह जगमगायें आप

दिवाली की बहुत जोरों-शोरों के साथ तैयारी होती है। दिवाली के दिन क्या पहनें, ये सवाल बहुत से लोगों के मन में आता है जिसके लिए पहले से ही तैयारियां और शॉपिंग में जाना भी शुरू कर देते हैं। लेकिन कोरोना काल की वजह से यदि आप भीड़भाड़ वाली जगह जाने से बचना चाहते हैं और अपनी शॉपिंग नहीं कर पा रहे हैं तो फिक्र करने की जरूरत नहीं है। हम आपको कुछ ऐसे फैशन टिप्स बता रहे हैं जिन्हें अपनाकर आप अपने वार्डरोब में रखी पुरानी ड्रेसेस के साथ थोड़ा-सा एक्सपेरिमेंट करके दिवाली का एक बेहतरीन फ्यूजन लुक क्रिएट कर सकते हैं। तो चलिए जानते हैं आपके काम की टिप्स।
प्लाजो आजकल अधिकतर महिलाओं की पहली पसंद बनी हुआ है। अगर आपके पास कोई सिल्क या सेमी गिल्टर शर्ट है तो आप इसे किसी प्लाजो के साथ टीमअप करके पहन सकती हैं। ये आपको स्टाइलिश लुक देगा। आजकल आपने अधिकतर बॉलीवुड डीवा को रफल टॉप के साथ साड़ी कैरी करते हुए देखा ही होगा। यह लुक आप भी रिक्रिएट कर सकती हैं। आप रफल टॉप के साथ साड़ी कैरी कर सकती हैं।

इन दिनों पटियाला सलवार के ऊपर शार्ट कुर्ती पहनने का फैशन काफी चल रहा हैं। फेस्टिवल माहोल में पूरी तरह ढलने के लिए आप इस सलवार कुर्ती के ऊपर मोतियों की माला और अन्य गहने भी पहन सकती हैं। इस सलवार कुर्ती पर चार चाँद लगाने के लिए एक ट्रेंडी दुपट्टा डालना ना भूले। दिवाली एक ब्राईट फेस्टिवल हैं इसलिए इस दिन ब्राईट कलर की सलवार कुर्ती पहनना सही रहेगा। आप चाहे तो नारंगी, हरा, नीला, गुलाबी जैसे रंगों का चुनाव कर सकती हैं। यदि आपको लम्बे और लहराते हुए कपड़े पहनना पसंद हैं तो आप अनारकली सूट आजमा सकती हैं। जब आप दिवाली के लिए अनारकली सूट खरीदने जाए तो कोशिश करे कि आप कढ़ाई (एम्ब्राईडी) वाले सूट ही ख़रीदे। यह ख़ास डिजाइन वाले सूट त्योहारों पर बहुत जचते हैं और आपको एक बोल्ड व रॉयल लुक देते हैं। इस सूट के ऊपर डिजाइनर गहने पहनना ना भूले और दीये जलाते समय इनको न पहनें। इस दिन आप हरा, नारंगी, नीला कलर का लहंगा ट्रॉय कर सकती हैं। लहंगा सिंपल या मीडियम वर्क वाला होना चाहिए। इसके ऊपर ज्यादा गहने ना पहनें। इस त्योहार के सीजन में अलग अंदाज में नजर आने के लिए आप गले के लंबे हार के साथ एक कम लंबाई वाला हार और परंपरागत कड़े के साथ कफ्स या चौड़ा ब्रेसलेट पहन सकती हैं।
आप ब्रेसलेट के साथ प्रयोग कर सकती हैं।आप स्नेक चेन ब्रेसलेट, बैंगल या लेदर ब्रेसलेट पहन सकती हैं। ये भारतीय और पश्चिमी परिधान दोनों के साथ खूब जमते हैं।
इस प्रकार बनी रहेगी चेहरे की चमक 
दिवाली में पटाखों से होने वाले प्रदूषण से स्वास्थ्य पर खराब असर तो पड़ता ही है साथ ही इससे चेहरे का ग्लो भी कम हो जाता है। वहीं दिवाली के समय हम अपने खाने पर भी नियंत्रण नहीं रख पाते। मीठे के साथ ही मसालेदार, तीखा, चटपटा खाना हमारी डाइट में शामिल हो जाता है। इससे चेहरे पर पिंपल हो जाते है। इन सब समस्याओं से बचाव के लिए विटामिन ई युक्त क्रीम का प्रयोग करें।
रोजाना 8-10 ग्लास पानी जरूर पीयें। इससे चेहरे की चमक बरकरार रहती है।
मीठे पर नियंत्रण रखें। ज्यादा मीठा और तला खाना खाने से वजन बढ़ने का डर तो रहता ही है, साथ ही त्वचा में एलर्जी होने का भी खतरा रहता है।

रौनक कम हुई है मगर हिम्मत नहीं टूटी बड़ाबाजार के व्यवसायियों की

आज दिवाली है और दिवाली पर शहर की रौनक का कोई जवाब नहीं होता। कोरोना के कारण बाजार की चमक पर असर पड़ा है. यह सच है मगर शहर अपनी रौनक से महामारी पर जीवन की जीत का सिक्का जमा रहा है। कोलकाता में दिवाली पर बड़ाबाजार इलाके में दुकानें सज उठती हैं, नजारा ऐसा होता है कि इलाके की गलियों में तिल रखने की भी जगह नहीं मिलती मगर इस बार ऐसा नहीं है। अलबत्ता कोरोना के कारण व्यवसायी सजग हैं और जब आप बड़ाबाजार के कॉटन स्ट्रीट इलाके में दिवाली बाजार की हलचल देखने जाते हैं तो इस बात का पता तब चलता है जब आप स्टॉलों पर नो मास्क, नो सेल की नोटिस देखते हैं। मोलभाव पहले की तरह चल रहे होते हैं, थोड़ी नोंक – झोक…यही तो लॉकडाउन के दिनों में याद आती रही है। गलियों से गुजरते हुए मिठाई की खुशबू, तोरण, रंग – बिरंगे दीये, स्टीकर…जब दिखते हैं…तो कदम बस ठहर जाते हैं। धनतेरस की धमक बर्तनों की दुकानों पर मौजूद दिखी।


रवीन्द्र सरणी पर 100 साल से अधिक पुरानी बर्तनों की दुकान बैजनाथ प्रसाद महावीर प्रसाद स्थित है, वक्त के साथ अब यहाँ पर स्टील, पीतल और कांसे के बर्तन, बाल्टी, टिफिन बॉक्स से लेकर घरेलू उपकरण तक मिलते हैं। यहाँ के प्रतिनिधि किशन केसरवानी कहते हैं कि कोरोना का असर तो पड़ा है मगर बाजार पहले की तुलना में 10 – 15 प्रतिशत सुधर रहा है। जाहिर है कि कोरोना का असर खरीददारी पर पड़ा है…खरीददारी हो भी रही है बस बर्तनों के मामले में अब बजट पर जोर दिया जा रहा है।
रवीन्द्र सरणी से हम आगे बांसतल्ला की ओर चले तो गली में दिनेश सोनकर की सजी – धजी दुकान मिली और खासियत यह है कि आप यहाँ एक ही दुकान से दिवाली और पूजा का सारा सामान खरीदते हैं। लक्ष्मी – गणेश की मूर्ति, तोरण, रंगोली, पूजा सामग्री, मोमबत्ती, यहाँ पर सब उपलब्ध है। सोनकर बिक्री से खुश नजर नहीं आये…जाहिर है कि कोरोना की मार से जब बिक्री ठप हो जाए तो व्यवसायी खुश रहे भी तो कैसे।


जब आप बांसतल्ला से आगे निकलते हैं तो बड़ाबाजार का वह इलाका नजर आता है..जहाँ एक साथ कई दुकानें लगती हैं। दिवाली के तीन दिन पहले से ही यहाँ पर बड़े वाहनों का प्रवेश निषेध हो जाता है…। दूर – दूर तक सजे – धजे स्टॉल दिखते हैं और खरीददारों की भीड़। बड़ाबाजार छोड़कर कहीं और बस जाने वाले भी दिवाली की खरीददारी के लिए बड़ाबाजार का ही रुख करते हैं….दुकानें तो अब भी हैं मगर सख्त ताकीद के साथ ही मास्क न पहनने वालों से कोई सौदा नहीं होगा। सुरक्षा के लिए पुलिस कर्मी भी हैं और इनकी पैनी नजर हर चीज पर है।

हैरत की बात यह है कि लोग उन चीजों को लेकर भी मोलभाव करते दिखे जिसे वे शॉपिंग मॉल से मनमानी कीमत पर खरीदते हैं। ख्याल अपना – अपना हो सकता है मगर क्या मनमानी न सही, कीमतें जब वाजिब हों तो क्या मोलभाव जरूरी है? ये तो निर्णय आपका है मगर लक्ष्य तो हम सबका एक ही है…आत्मनिर्भर भारत..तो बैठे क्यों हैं…और किसी त्योहार का ही इन्तजार क्यों…आम दिनों में भी स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन दीजिए…वोकल फॉर लोकल बनिए…खरीददारी…स्थानीय लोगों से ही करिए।

ऐ सखी सुन – एक दीपावली ऐसी हो जो मानव मुक्ति का प्रकाश बिखराए

गीता दूबे

भाग -4 

सभी सखियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ। दीपक की तरह जगमगाइए और दीपावली मनाइए। हर भारतीय त्यौहार की तरह यह त्यौहार भी बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में घर परिवार की खुशहाली के लिए मनाया जाता है। हालांकि है तो यह देवी पूजा का त्यौहार लेकिन इस देवी को प्रसन्न करने के लिए अपने घर को साफ सुथरा रखना, सजाना और संवारना पड़ता है जिसके लिए देवी की छोटी बहनें या पुत्रियां अतिरिक्त मेहनत करती हैं। याद कीजिए वह जमाना जब घर मिट्टी के हुआ करते थे। तब फर्श पर पोंछा नहीं लगाया जाता था बल्कि उसे लीपना पड़ता था। गोबर, मिट्टी और पानी को मिलाकर एक घोल बनाया जाता था और उस घोल को कपड़े (पोतनहर) की सहायता से जमीन पर फैलाते हुए फर्श को चिकनाया जाता था। मिट्टी की दीवारे भी वैसे ही लीपी जाती थीं। बहुधा यह काम घर की औरतें ही करती थीं। तब से आज तक भारतीय समाज और घरों में क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुका है। तमाम तरह के फिनाइल और जमीन की सतह को कीटाणु मुक्त करनेवाले रसायनिक घोल बाजार में उपलब्ध हैं लेकिन एक बात अब भी नहीं बदली वह है, महिलाओं की भूमिका। जब भी हम टेलिविजन पर इन सफाई घोलों का विज्ञापन देखते हैं तो उस विज्ञापन में महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य होती है जैसे यह जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ महिलाओं की ही हो। वैसे विज्ञापन किसी भी वस्तु का क्यों ना हो महिलाओं और वह भी खूबसूरत और आकर्षक महिलाओं की उपस्थिति मानो अनिवार्य सी होती है। खैर बात करें दीपावली जैसे त्यौहार की जिसमें गृहलक्ष्मी पर न केवल घर को सजाने संवारने की जिम्मेदारी होती है बल्कि ढेरों पकवान बनाकर सबकी जिह्वा को संतृप्त करने का काम भी करना पड़ता है। और इन तमाम कमर तोड़ू कामों के उपरांत स्वयं भी सज संवर कर त्यौहार की खुशियों का हिस्सा होना पड़ता है। प्रश्न यह है कि होली हो या दीपावली, त्यौहार को आनंददायक बनाने एवं सबके चेहरे पर मुस्कान खिलाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ महिलाओं की ही क्यों होती है। हालांकि कहने को जमाना बदल रहा है, हम आधुनिकता की परिधि को लांघ कर उत्तर आधुनिकता की ओर न जाने कब बढ़ गये लेकिन शायद यह आधुनिकता ऊपरी ताम झाम और साहित्य तक ही सुरक्षित रह गई हैं। अपनी मानसिक बुनावट में हम अब भी मध्ययुगीन ही हैं। तभी तो इस तथाकथित उत्तर आधुनिक दौर में भी स्त्री और‌ पुरूष के लिए अलग- अलग नियम कायदे हैं। अवसर कोई भी हो , स्त्रियों की जिम्मेदारियों का भार हमेशा पुरूषों से कुछ ज्यादा ही होता है। त्याग तपस्या की घुट्टी पिलाकर और मर्यादा का पाठ पढ़ाकर उनके इर्द-गिर्द जिम्मेदारियों की एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी जाती है जिसके अंदर वह कितना भी क्यों ना कसमसा लें लेकिन उसे लांघने की हिम्मत नहीं कर पातीं क्योंकि वे उसका परिणाम जानती हैं। पौराणिक इतिहास के अध्यायों ने उन्हें सिखा दिया है कि लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण करनेवाली स्त्री को कहीं ठौर ठिकाना नहीं मिलता है। अगर जनक की दुहिता और दशरथ की पुत्रवधू सीता को न केवल अग्निपरीक्षा देनी पड़ी बल्कि गर्भावस्था में भी निष्कासन की पीड़ा तक झेलनी पड़ी तो साधारण नारी की बिसात ही क्या। याद कीजिए राम के वनवास काट कर अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है लेकिन सीता जो राम के हर दुख सुख में साथ रहीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने सुख की अपेक्षा दुख ही अधिक देखा और इस दुख ने उन्हें राजरानी से विषाद की मूर्ति में परिवर्तित कर दिया। सीता का वनवास तो कभी समाप्त ही नहीं हुआ। वह तो अस्थायी राजरानी बनीं जिन्होंने अपने पति अयोध्या के राजा राम अथवा मर्यादापुरुषोत्तम राम की तथाकथित मर्यादा का  भार आजीवन ढोया। आज राम की अयोध्या दीपावली के लिए दुल्हन सी सज रही है लेकिन उस राम के बगल में सीता का स्थान अभी तक रिक्त हैं। न जाने सीता की अयोध्या वापसी कब होगी। लोक कवि तुलसीदास ने लिखा है-

“सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी ।।” 

हालांकि राम के साथ सीता हर मंदिर में खड़ी दिखाई देती हैं लेकिन राम के जीवन में वह अपने निष्कासन के उपरांत दोबारा कभी नहीं लौटी, यह रामकथा का सामान्य पाठक भी जानता है, शायद इसीलिए लोक गीतों की सीता अपना विषाद और आक्रोश इस तरह व्यक्त करती हैं-

“सवना भादौना क रतिया, मैं गरुए गरभ से रे

गुरु ऊई रामा घर से निकारें, लौटि नहीं चितवहि रे?

*****  *****   ******

गुरु फाटै जो धरती समाबे, अजोध्या नहीं जाबै रे

गुरु फेर हियें चली औबे, राम नहीं देखबै रे”

 तो सखियों जब सीता जैसी रानी की ऐसी स्थिति हो सकती है तो सामान्य स्त्री अपने साधारण से जीवन में न जाने कितने दुख, दर्द संताप झेलने को विवश होती है। यह दीपावली उन तमाम स्त्रियों को समर्पित है जो सीता की तरह दर्द तो झेलती हैं लेकिन उनकी व्यथा कथा अलिखित ही रह जाती है। दीयों की झिलमिलाहट और उसकी रोशनी की पृष्ठभूमि में उन तमाम स्त्रियों का दर्द संचित रहता है जो समाज निर्मित तथाकथित मूल्यों, यथा- समर्पण, त्याग और तपस्या के बल पर गृहालक्ष्मी के पद पर न केवल आसीन होती हैं बल्कि उस पर निरंतर बने रहने का दंड भी झेलती हैं। यह यंत्रणादायक गौरवमई परंपरा कभी ना कभी अवश्य अंतिम साँस लेगी, इस कामना के साथ दीपावली मनाएँ। एक ऐसी दीपावली जो मानव मुक्ति का प्रकाश बिखराए और उस प्रकाश में असूर्यम्श्या नारियाँ भी आलोकित हो मुक्ति की साँस ले सकें। तो फिलहाल विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

ग्लोबल मेंहदी ब्राइडल कॉन्टेस्ट

मेंहदी लगाने का शौक है तो आप इस प्रतियोगिता में हाथ आजमा सकती हैं। अंतिम तिथि 7 दिसम्बर 2020 है

दिवाली की शुरुआत और धन्वन्तरी के आगमन का दिन है धनतेरस

सुनीता सुराना, युग्म एस्ट्रो कन्सल्टेंसी

धनतेरस के दिन से ही भगवान गणेश, मां लक्ष्मी और कुबेर की पूजा शुरू हो जाती है। कुबेर को चांदी अत्याधिक प्रिय है। इसलिए धनतेरस के दिन चांदी के सिक्के खरीदने का भी विधान है। धनतेरस पर बर्तन खरीदना काफी शुभ माना जाता है।
हिंदू धर्म में धनतेरस को विशेष महत्व दिया जाता है। धनतेरस के दिन से ही भगवान भगवान गणेश , मां लक्ष्मी और कुबेर की पूजा शुरू हो जाती है और यह पूजा दीवाली तक चलती है। मान्यताओं के अनुसार धनतेरस के दिन नई चीजें घर में लाने से घर में मां लक्ष्मी और कुबेर का वास होता है और घर में कभी भी पैसों की कमीं नहीं होती ।

धनतेरस के दिन सोना, चांदी, पीतल और धातुओं के बर्तन आदि खरीदने से उन्नति के सभी रास्ते अपने आप खुल जाते हैं। धनवंतरी जिस समय समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे । उस समय उनके हाथ में पीतल का अमृत कलश था । इसलिए इस दिन पीतल के बर्तन भी खरीदे जाते हैं। धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
धनतेरस से ही दीपोत्सव का आरंभ होता है।
जैन साहित्य प्राचीनत में धनतेरस को ‘धन्य तेरस’ या ‘ध्यान तेरस’ भी कहते हैं। जैन मान्यता के अनुसार भगवान महावीर इस दिन ध्यान के लिए चले गए थे और तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुए दिवाली के दिन निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हुए। तब से धनतेरस का दिन जैन आगम में धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध है।

धनतेरस के दिन झाडू खरीदने को भी काफी शुभ माना जाता है। मान जाता है कि इस दिन झाडू खरीदने और सफाई करने से सभी नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। इस दिन घर के प्रत्येक कोने में सफाई की जाती है जिससे माँ लक्ष्मी और कुबेर की कृपा सदैव बनी रहे और भगवान गणेश रिद्धि-सिद्धि के साथ घर मे प्रवेश करें