Monday, June 29, 2026
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भारत में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू

पहली खुराक लगभग दो लाख कोरोना योद्धाओं को

नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शनिवार को कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ शुरू किए गए दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान के तहत गत शनिवार को भारत में अग्रिम पंक्ति के लगभग दो लाख स्वास्थ्यकर्मियों और सफाईकर्मियों को टीके की पहली खुराक दी गई। इसके साथ ही दुनियाभर में 10 महीनों में लाखों जिंदगियों और रोजगार को लील लेने वाली इस महामारी के भारत में खात्मे की उम्मीद जगी है। भारत में करीब एक करोड़ लोगों के संक्रमित होने और 1,52,093 लोगों की मौत के बाद देश ने ‘कोविशील्ड’ और ‘कोवैक्सीन’ टीके के साथ महामारी को मात देने के लिए पहला कदम उठाया है और देशभर के स्वास्थ्य केंद्रों पर टीकाकरण किया गया। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि भारत में टीकाकरण के पहले दिन 3,352 केंद्रों पर 1,91,181 स्वास्थ्यकर्मियों और सफाईकर्मियों को टीके की पहली खुराक दी गयी।
स्वास्थ्यकर्मियों के साथ-साथ एम्स दिल्ली के निदेशक रणदीप गुलेरिया, नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल, भाजपा सांसद महेश शर्मा और पश्चिम बंगाल के मंत्री निर्मल माजी उन लोगों में शामिल हैं जिन्हें टीके की पहली खुराक दी गयी। पॉल कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए चिकित्सा उपकरण एवं प्रबंधन को लेकर गठित अधिकार समूह के प्रमुख भी हैं।

 

पीएम ने स्टार्ट-अप के लिए की 1,000 करोड़ रुपये शुरुआती कोष की घोषणा

नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को 1,000 करोड़ रुपये के ‘स्टार्ट-अप इंडिया सीड फंड’ शुरू किये जाने की घोषणा की। इस कोष की शुरुआत देश में नये उद्यमियों और स्टार्ट-अप को प्रोत्साहन देने के लिये की गई है।
मोदी ने ‘‘प्रारम्भ: स्टार्ट-अप भारत अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’ को संबोधित करते हुये विश्वास व्यक्त किया कि स्टार्ट-अप की वृद्धि से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और उस क्षेत्र के लोगों के जीवन में सुधार लाने में मदद मिलेगी।
प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘नये उद्यमियों को शुरुआती पूंजी उपलब्ध कराने के लिये देश 1,000 करोड़ रुपये के ‘स्टार्ट-अप इंडिया सीड फंड’ की शुरुआत कर रहा है। इससे नये उद्यमों की शुरुआत करने और उनकी वृद्धि को प्रोत्साहन देने में मदद मिलेगी।’’
यह सम्मेलन देश में स्टार्ट-अप इंडिया अभियान के पांच साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया। प्रधानमंत्री ने 2016 में इसी दिन इस अभियान की शुरुआत की थी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार स्टार्ट-अप के लिये इक्विटी पूंजी जुटाने में मदद के वास्ते फंड ऑफ फंड योजना को भी अमल में ला रही है। आने वाले दिनों में सरकार स्टार्ट-अप को ऋण पूंजी जुटाने में भी मदद करने वाली है।
मोदी ने कहा कि भारत आज स्टार्ट-अप के मामले में दुनिया का तीसरा बड़ा देश बन गया है। भारत ने इस दौरान कई उभरते उद्यमियों को आगे बढ़ने में मदद की गई। नवोन्मेषी प्रौद्योगिकी के साथ ये उद्यमी आगे बढ़े और बड़ी कंपनी बन सके।
उन्होंने कहा कि भारत में स्टार्ट-अप केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि नये उभरते 40 प्रतिशत स्टार्ट-अप देश के दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों से सामने आ रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि 2014 में केवल चार स्टार्ट-अप ही यूनिकॉर्न क्लब में शामिल थे लेकिन आज 30 से अधिक भारतीय स्टार्ट-अप यूनिकॉर्न क्लब के सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि 2020 में ही 11 भारतीय स्टार्ट-अप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हुये हैं। इसके साथ ही भारत स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी वाला तीसरा बड़ा देश बन गया है। देश में इस समय 41,000 से अधिक स्टार्ट-अप काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ज्यादातर स्टार्ट-अप ऐसे भी है जिनमें महिलायें मुख्य भूमिका में हैं। देश में 2020 में कोरोना महामारी के दौरान कई स्टार्ट-अप शुरू हुये हैं। स्टार्ट-अप ने एक ही परिपाटी पर चलते रहने की सोच को बदला है। उन्होंने हर क्षेत्र में विविधता लाने की पहल की है।

प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर बिमस्टेक (बे आफ बंगाल इनिशिएटिव ऑफ मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक को-ऑपरेशन) देशों के स्टार्ट-अप से उनकी उपलब्धियों को सुना। देश के अंदर से जहां चेन्नई, एर्नाकुलम, भोपाल, गाजियाबाद, सोनीपत और दिल्ली के नये उद्यमियों ने उन्हें अपने कारोबार के बारे में बताया, वहीं मोदी ने बांग्लादेश, भूटान, म्यामां, नेपाल और थाइलैंड के स्टार्ट-अप उद्यमियों की उपलब्धियों के बारे में भी सुना और उन्हें सराहा।

गरिमा वर्मा अमेरिका की आगामी प्रथम महिला के कार्यालय में डिजिटल निदेशक के तौर पर नामित

वाशिंगटन : अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन की पत्नी जिल बाइडन ने भारतीय मूल की गरिमा वर्मा को अपने कार्यालय में डिजिटल निदेशक और माइकल लारोसा को प्रेस सचिव के तौर पर नामित किया है। बाइडन की टीम ने यह जानकारी दी।
बाइडन के 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने के बाद जिल बाइडन अमेरिका की प्रथम महिला होंगी। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने भी प्रथम महिला के कार्यालय में अतिरिक्त सदस्यों की घोषणा की और ‘ज्वाइनिंग फोर्सेस’ पहल के नए कार्यकारी निदेशक के तौर पर रोरी ब्रोसियस को नामित किया।
टीम ने बताया कि गरिमा ओहायो और कैलिफोर्निया के सेंट्रल वैली में पली बढ़ी हैं और उनका जन्म भारत में हुआ है । गरिमा बाइडन-हैरिस के चुनाव प्रचार अभियान का भी हिस्सा थीं। इससे पूर्व वह मनोरंजन जगत का हिस्सा रह चुकी हैं। वह पारामाउंट पिक्चर्स में मार्केटिंग फिल्म्स और वाल्ट डिज्नी कंपनी के एबीसी नेटवर्क में टेलीविजन कार्यक्रमों के लिए काम कर चुकी हैं। उन्होंने मीडिया एजेंसी होरिजन मीडिया के साथ भी काम किया है।
वर्मा कई छोटे-मोटे कारोबार और गैर-लाभकारी संस्थाओं के लिए मार्केटिंग, डिजाइन और डिजिटल में स्वतंत्र कंसल्टेंट के तौर पर सेवा दे चुकी हैं। टीम ने बताया कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान चुनाव प्रचार से जुड़े और अब बाइडन-हैरिस टीम का हिस्सा बने लारोसा डॉ. जिल बाइडन के प्रेस सचिव और मुख्य प्रवक्ता थे। लारोसा नैंसी पेलोसी के कार्यालय में हाउस डेमोक्रेटिक पॉलिसी कम्युनिकेशंस कमेटी के लिए संचार निदेशक थे।
जिन अन्य लोगों को नामित किया गया है उनमें गिना ली, वनेसा लायन और जॉर्डन मोंटोया के नाम शामिल हैं। जिल बाइडन ने कहा, ‘‘अपनी विवधतापूर्ण पृष्ठभूमि के साथ ये समर्पित और कुशल लोक सेवक एक ऐसे प्रशासन के निर्माण में प्रतिबद्ध होंगे जो अमेरिका के लोगों के विकास में सहयोग करेगा।’’ बाइडन की टीम ने कहा कि ये कुशल एवं अनुभवी लोग डॉ. जिल बाइडन के साथ काम करेंगे और उनके कार्यालय के कामकाज में अहम भूमिका निभाएंगे।

भारत की पहली एयर टैक्सी हरियाणा में शुरू

नयी दिल्ली : देश की टैक्सी सर्विस को एक नई उड़ान देते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने केंद्र सरकार की उड़ान योजना के तहत एयर टैक्सी सर्विस को शुरू कर दिया है। बता दें, यह टैक्सी सर्विस शुरुआती दौर में चंडीगढ़ से हिसार का रास्ता तय करेगी। जिसके बाद दूसरे चरण में हिसार से देहरादून के लिए भी हवाई सेवाएं शुरू की जाएंगी। वहीं इसके तीसरे चरण में दो और मार्गों को जोड़ा जाएगा।
सीएम ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि “देश में पहली बार एयर टैक्सी के रूप में एक छोटे विमान का इस्तेमाल किया जा रहा है। दूसरे चरण में हिसार से देहरादून के लिए सेवाएं 18 जनवरी को शुरू की जाएंगी। तीसरे चरण में चंडीगढ़ से देहरादून और हिसार से धर्मशाला तक के दो अन्य मार्गों को 23 जनवरी को जोड़ा जाएगा। वहीं कंपनी शिमला, कुल्लू और अधिक हरियाणा मार्ग पर इसका विस्तार करने की योजना बना रही है।
खट्टर ने आगे कहा कि “एक निजी कंपनी द्वारा चलाए जाने वाले ये एयर टैक्सियां ​​चार सीटर होंगी और इनकी गति सीमा 250 किमी प्रति घंटा होगी। इस एयर टैक्सी की शुरुआत के लिए राज्य के साथ-साथ देश के बाकी हिस्सों को भी बधाई देता हूं। इन हवाई टैक्सियों में किराया भी बहुत ज्यादा महंगा नहीं है। किराए का आंकलन करें मतो वॉल्वो बस में एक व्यक्ति का किराया 700 रुपये है। वहीं इस एयर टैक्सी में एक यात्री को 1,755 रुपये खर्च करने होंगे। हालांकि इससे समय की खासी बचत होगी।”

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स बने अमेरिका के सबसे बड़े किसान

दो लाख 42 हजार एकड़ जमीन खरीदी

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स अमेरिका के सबसे बड़े किसान बन गए हैं। उन्होंने देश के 18 राज्यों में दो लाख 42 हजार एकड़ जमीन खरीदी है। इसमें से ज्यादातर खेती करने योग्य भूमि है। मीडिया रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
दुनिया के चौथे सबसे अमीर शख्स बिल गेट्स अमेरिका के ऐसे पहले व्यक्ति बन गए हैं, जिनके पास इतनी जमीन है। रिपोर्ट के मुताबिक इस जमीन पर स्मार्ट सिटी का निर्माण कराया जाएगा। इसके साथ बिल गेट्स की योजना बड़े पैमान पर फसल उगाने की है। गेट्स के पास कुल 2,68,984 एकड़ जमीन पर मिलकियत हो गई है। खरीदी गई जमीन पर बिल गेट्स क्या करेंगे उसके बारे में नहीं बताया गया है।
वहीं, मीडिया रिपोर्ट की मानें तो बिल गेट्स ने एरिजोना में स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए जमीनें खरीदी हैं। उनका सपना है कि वह एक बेहतरीन स्मार्ट सिटी बनाएं। 2008 में बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने घोषणा की थी कि उनका फाउंडेशन अफ्रीका और दुनिया के अन्य विकासशील देशों के दोटे किसानों को कृषि क्षेत्र में मदद करेंगे।
कृषि क्षेत्र में आने से देश को होगा फायदा
65 वर्षीय बिल गेट्स ने अमेरिका के लुसियाना में 69 हजार एकड़, अर्कंसस में करीब 48 हजार एकड़, एरिजोना में 25 हजार एकड़ खेती योग्य जमीन खरीदी है। जानकारों का कहना है कि बिल गेट्स अगर कृषि के क्षेत्र में आते हैं तो इससे अमेरिका में सस्टनेबल फार्मिंग को काफी मदद मिलेगी।

कार्यस्थलों में समलैंगिक यौन उत्पीड़न की शिकायतें भी होंगी स्वीकार : कलकत्ता हाईकोर्ट

कोलकाता : कलकत्ता हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि अब से कार्यस्थलों में समलैंगिक यौन उत्पीड़न की शिकायतों को भी स्वीकार किया जाएगा। अगर कोई महिला अन्य महिला सहकर्मी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत लेकर आती है तो उसे स्वीकार कर लिया जाएगा। इसी तरह एक पुरूष दूसरे पुरूष सहकर्मी के खिलाफ ऐसी शिकायत दर्ज करा सकता है।
एक मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं में काफी बहस हुई। दोनों तरफ की दलीलों पर गौर करने के बाद हाईकोर्ट ने यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट के अनुसार 2013 अधिनियम की धारा नौ में समलैंगिकता के आरोपों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है इसलिए एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत की जा सकती है।
भले ही शिकायत करने वाले एक ही लिंग के कयों न हों। जहां समान लिंग वालों में विवाह को वैध बनाने की बात की जाती है, वहां यौन-उत्पीड़न भी स्वीकार्य होगा। गौरतलब है कि कार्यालयों में इस तरह के भी कई मामले सामने आ रहे हैं। इसे लेकर स्पष्ट निर्देश नहीं होने के कारण शिकायतें दर्ज नहीं की जाती थीं।

पूर्व रेलवे के सात प्रमुख स्टेशनों पर जल्द ही फिर से शुरू होगी ई-कैटरिंग सेवाएं

कोलकाता : कोविड-19 के प्रसार को रोकने के उपाय के रूप में भारतीय रेलवे ने फरवरी के अंत में देशव्यापी लॉकडाउन के समय ही ई-कैटरिंग सेवाओं को निलंबित कर दिया था। अब यात्रियों की बढ़ती मांग को देखते हुए रेलवे बोर्ड ने आइआरसीटीसी को चुनिंदा स्टेशनों पर फिर से ई कैटरिंग सेवा शुरू करने की अनुमति दे दी है। इसके मद्देनजर लंबे अंतराल के बाद पूर्व रेलवे के प्रमुख स्टेशनों पर जल्द ही फिर से ई-कैटरिंग सेवाएं शुरू की जाएगी। रविवार को पूर्व रेलवे की ओर से जारी एक बयान में यह जानकारी दी गई।
दरअसल, अनलॉक के बाद लंबी दूरी की ट्रेनों और विशेष ट्रेनों के फिर से शुरू होने के साथ आइआरसीटीसी की ई-कैटरिंग सेवाओं को फिर से बहाल करने के लिए यात्रियों की ओर से लगातार मांग की जा रही थी, क्योंकि ट्रेनों व स्टेशनों पर गर्म, स्वस्थ और स्वास्थ्यकर भोजन की आपूर्ति के लिए आइआरसीटीसी की सेवाएं बहुत लोकप्रिय है। यात्रियों की लगातार मांग को देखते हुए आइआरसीटीसी ने रेलवे बोर्ड को चुनिंदा स्टेशनों पर ई-कैटरिंग सेवाओं की फिर से बहाली के लिए अनुरोध पत्र लिखा था। तदनुसार, रेलवे बोर्ड ने आइआरसीटीसी को चयनित रेलवे स्टेशनों पर ई-कैटरिंग सेवाओं को फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी है।
हालांकि आइआरसीटीसी व उसके अधिकृत वेंडरों को केंद्र और राज्य सरकारों एवं अधिकृत एजेंसियों द्वारा जारी किए गए स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रोटोकॉल से संबंधित सभी दिशा निर्देशों का पालन करना होगा। बयान में बताया गया कि पूर्व रेलवे के क्षेत्राधिकार में ई-कैटरिंग सेवाएं सात रेलवे स्टेशनों पर शुरू की जाएंगी। ये हावड़ा, सियालदह, कोलकाता, दुर्गापुर, आसनसोल, मालदा और भागलपुर स्टेशन हैं।
वहीं, मालदा डिवीजन, हावड़ा डिवीजन और जमालपुर के अलावा बर्धमान और बोलपुर में आने वाले दिनों में ई-कैटरिंग सेवाओं के दायरे में और अधिक स्टेशनों को जोड़ने की भी योजना है। गौरतलब है कि‌ ई-कैटरिंग सेवाओं का मूल उद्देश्य विभिन्न शहरों के रेलवे स्टेशनों पर मौजूद रेस्तरां और फूड प्लाजा में उचित दर पर विभिन्न प्रकार के भोजन प्रदान करना है।
ई-कैटरिंग के तहत भारतीय रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आइआरसीटीसी) द्वारा बड़ी संख्या में खाद्य एग्रीगेटरों द्वारा सेवाएं प्रदान की जाती हैं। इसके अलावा , ई-कैटरिंग सेवाओं में फास्ट फूड यूनिट और फूड प्लाजा चुनिंदा स्टेशनों पर उपलब्ध हैं। यात्री अपनी बर्थ संख्या का विवरण देकर ई-कैटरिंग सुविधा का लाभ उठा सकते हैं और ई-कैटरिंग के माध्यम से या तो अग्रिम भुगतान करके या डिलीवरी के बाद भुगतान करके इसका लाभ उठा सकते हैं। ‌ई-खानपान को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए पूर्व रेलवे आइआरसीटीसी को सभी प्रकार का सहयोग व समर्थन दे रहा है।

5 हजार रुपये किलो बिकता है इस किसान का बनाया हुआ गुड़

सहारनपुर : हैरान हो जाना स्वाभाविक है, जब पता चले कि एक किसान का गुड़ पांच हजार रुपये किलो भी बिकता है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का एक गांव है मुबारकपुर। यहीं के किसान संजय सैनी दस एकड़ में न केवल जैविक विधि से गन्ने की खेती कर रहे हैं, वरन रसायनमुक्त गन्ने को चीनी मिल में बेचने की जगह अपने कोल्हू पर 77 प्रकार का गुड़ भी बना रहे हैं। इनकी कीमत 80 रुपये से लेकर पांच हजार रुपये प्रति किलो तक है। गुड़ की ऐसी आसमानी कीमत सुनकर हर कोई हैरान हो जाता है। सबकी हैरानी दूर करते हुए संजय दावा करते हैं कि पांच हजार रुपये प्रति किलो वाला गुड़ च्यवनप्राश से भी ज्यादा खूबियों से समृद्ध है। च्यवनप्राश बनाने में जितने प्रकार की सामग्री (जड़ी-बूटी आदि) लगती हैं, इस गुड़ में उससे भी ज्यादा सामग्री मिलाई जाती है। संजय को अपना गुड़ बेचने कहीं जाना नहीं पड़ता, उनका पूरा गुड़ घर से ही बिक जाता है, इस गुड़ के खरीदार पूरे देश में हैं।
गुड़ को लेकर अब खासे चर्चित हो चले संजय सैनी देश भर में लगने वाली कृषि प्रदर्शनियों में जाते हैं और विभिन्न जड़ी-बूटियों से बने 77 प्रकार के गुड़ लोगों के सामने रखते हैं। संजय बताते हैं, उनका गुड़ सामान्य नहीं है। यह जैविक गन्ने से तैयार होता है, इसमें विभिन्न दुर्लभ जड़ी-बूटियां मिली हैं, यह कई प्रकार के रोगों में कारगर है। ऐसे में जड़ी-बूटियों की कीमत के अनुसार ही गुड़ की कीमत भी निर्धारित होती है। पांच हजार रुपये प्रति किलो वाले गुड़ में स्वर्ण भस्म के अतिरिक्त 80 प्रकार की जड़ी-बूटियां मिलाई जाती हैं। पांच हजार रुपये किलो वाले गुड़ की मांग अभी पांच सौ किलो प्रतिवर्ष है।
गन्ना मिलों पर बकाए को लेकर परेशान रहने वाले किसानों के लिए संजय सैनी ने एक रास्ता खोला है। संजय बताते हैं कि वर्ष 2000 में उन्होंने जैविक गन्ने की खेती की ओर रुख किया। फसल अच्छी हुई तो उसे मिल में बेचने की जगह स्वयं के कोल्हू पर ही जैविक गुड़ बनाने का सिलसिला शुरू कर दिया। गुड़ बनाते समय गन्ने के रस को साफ करने के लिए भी किसी केमिकल का प्रयोग करने की जगह सरसों के तेल, दूध और अरंडी के तेल का प्रयोग शुरू किया।
धीरे-धीरे उनके जैविक गुड़ के कद्रदान बढ़ते गए। सराहना मिली तो हौसला भी बढ़ा, परिणाम अब सामने है। आज उनके कोल्हू पर आसपास के 10 लोगों को रोजगार भी मिला हुआ है। संजय सैनी ने जड़ी-बूटियों से संबंधित कई पुस्तकों का अध्ययन किया था। जैविक गुड़ बनाने में उनका यह ज्ञान काम आया। किस गुड़ में किस सामग्री और जड़ी-बूटी को कितनी मात्र में डालना है, यह अनुपात उन्हें पठन-पाठन और अपने अनुभव से मिला।
केमिकल का प्रयोग किए बिना गुड़ को लंबे समय तक फफूंद से बचाना आसान नहीं था। संजय ने प्रयोग किया और दूब, एलोवेरा व तुलसी के रस से गुड़ पर कोटिंग कर उसे लंबे समय तक फफूंद से बचाने में कामयाबी पाई। संजय बताते हैं कि बिहार और बंगाल में हींग जैसा स्वाद देने वाले गुड़ की अधिक मांग रहती है, तो वहां के लिए वैसा ही गुड़ बनाते हैं। पित्त रोकने के लिए अजवायन, सौंफ और धनिया मिश्रित गुड़ खूब पसंद किया जा रहा है। वात के लिए मेथी व काले जीरे का गुड़ रामबाण है।
कफ को रोकने के लिए सोंठ, काली मिर्च और दालचीनी के मिश्रण से गुड़ तैयार किया जाता है। वहीं, मधुमेह के मरीजों के लिए अश्वगंधा, मेथी, अजवायन और लेमनग्रास मिश्रित गुड़ की खूब मांग है। संजय बताते हैं, यह मधुमेह रोकने में बेहद कारगर है। बुजुर्गो के लिए सतावर और सफेद मूसली मिला गुड़ बेहद लाभकारी है।
गुड़ के बाद संजय अब गन्ने के रस की कुल्फी और गन्ना जलेबी बनाने की तैयारी में हैं। संजय सैनी किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करते हैं, उन्हें प्रशिक्षण भी देते हैं। आज इनके द्वारा प्रेरित देश भर के 650 किसानों का समूह जैविक खेती पर काम कर रहे हैं।
(साभार – दैनिक जागरण)

केवल गायिका नहीं कवयित्री भी थीं रूपमती

प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन 13

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, इतिहास के पन्नों पर अनगिनत प्रेम कहानियाँ अंकित हैं जिनकी सुगंध से देश की हवाएँ आज भी सुवासित हैं। इनमें से कुछ कहानियों को अपनी मंजिल मिलीं तो कुछ आधी -अधूरी भले ही रहीं लेकिन उन्हें शोहरत खूब मिली। ऐसी ही एक कथा है, रानी रूपवती या रूपमती और मालवा के अंतिम स्वाधीन सम्राट बाजबहादुर की प्रेमकथा और इसकी गवाही देता है मांडू का किला।

कहा जाता है कि रानी रूपमती नर्मदा में स्नान किए बिना अन्न जल ग्रहण नहीं करती थीं और राजा बाजबहादुर उनसे इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने मांडू में 3500 फीट की ऊंचाई पर रानी रूपमती के लिए एक किले का निर्माण करवाया जिसे रानी रूपमती का किला भी कहा जाता है। इस किले से नर्मदा नदी दिखाई देती थी। रानी रूपमती के महल तक पहुँचने से पहले राजा बाज बहादुर के महल को पार करना होता था और बाज बहादुर ने यह व्यवस्था रानी की सुरक्षा के लिए की थी।

रूपमती की पृष्ठभूमि को लेकर बहुत सी कहानियाँ मशहूर हैं, जिनमें से एक के अनुसार वह गरीब किसान की बेटी तो अन्य के अनुसार गणिका की पुत्री थी। रूपमती केवल अनिंद्य सुंदरी ही नहीं थीं बल्कि गीत संगीत की कला में भी निष्णात थीं। संगीत पारखी बाजबहादुर ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपनी जीवन संगिनि बना लिया। लेकिन इस प्रेमकथा की उम्र ज्यादी लंबी नहीं रही क्योंकि रूपमती और बाजबहादुर के प्रेम को शत्रुओं की नजर लग गई। कहते हैं कि रूपमती के रूप की चमक और गीतों की खनक दिल्ली दरबार तक भी पहुँच गई और अकबर के सेनानायक अहमद खाँ के नेतृत्व में मुगल सेना मालवा पर चढ़ आईं।

जब सेना सारंगपुर तक पहुँची तब बाजबहादुर को इसकी सूचना मिली। एक कहानी के अनुसार सन्‌ 1561 ई. में सारंगपुर के युद्ध में पराजित होकर बाजबहादुर भाग निकला तो दूसरी के अनुसार अहमद खाँ द्वारा कैद कर लिया गया। कहा जाता है कि बाजबहादुर की गिरफ्तारी की सूचना पाकर रूपमती ने हीरा चाटकर अपने प्राण दे दिए। एक कहानी यह है कि अहमद खां ने गमजदा रानी को बंदी बनाकर उन्हें अपनी बेगम बनने का प्रस्ताव दिया लेकिन उन्होंने यह दोहा लिखकर, सतीत्व रक्षा के लिए आत्महत्या कर ली-

“रूपवती दुखिया भई, बिना बहादुर बाज।

सो अब जियरा जरत है, यहाँ नहीं कछु काज ।।

मांडू का महल

 यह खबर पाकर अकबर को बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने बाजबहादुर को मुक्त कर दिया। कहते हैं कि रूपमती की मजार पर सिर पटक कर बाजबहादुर ने भी प्राण त्याग दाए। कहा जाता है कि 1568 में सारंगपुर के पास एक अकबर द्वारा एक मकबरे का निर्माण कराया गया। बाज बहादुर के मकबरे पर अकबर ने ‘आशिक-ए-सादिक’ और रूपमती की समाधि पर ‘शहीदे-ए-वफा’ लिखवाया।

रूपमती की गायन प्रतिभा की चर्चा उस दौर में हर ओर थी और बहुत से लेखकों ने अपनी किताबों में इसका जिक्र किया  है।  मुंशी कर्म अली ने “तवारीखे मालवा” में लिखा है कि दीपक राग गाने के बाद‌ जब तानसेन उसकी ज्वाला से पीड़ित था तो रूपमती ने मल्हार राग गाकर उसे शांत किया था। रूपमती केवल गायिका नहीं कवयित्री भी थीं।

हालांकि उनके द्वारा रचित कवाताएँ समय के साथ इतिहास के गलियारे में विलुप्त हो गई हैं लेकिन जनता के बीच उनकी स्मृति अब भी जीवित हैं। रूपमती द्वारा रचित अनेक गीत और पद्य जनसाधारण के बीच मशहूर हैं तथा अब तक मालवा के कई भागों में लोकगीतों के रूप में गाए जाते हैं। सैरुलमुताखिरीन ने भी रूपवती की बेजोड़ गायकी और हिंदी जबान में लिखे मजमून की सराहना की है। उनके गीत प्रेम और समर्पण के भावों से लबरेज़ हैं जिनमें भारतीय नारी की आत्मा कूजती है। सखियों, एक उदाहरण देखिए –

“और धन जोड़त है री मेरे तो धन प्यारे को प्रीत पूँजी।

कहूँ तिरिया की न लगे दृष्टि अपने कर रखूँगी कूँजी।

दिन – दिन बढ़े सवायो डेवढ़ो घटे न एको गूँजी।

बाज बहादुर के सनेह ऊपर निछावर करूँगी धन और जी।”

सखियों, यह प्रेम कहानी अपने आप में असाधारण और अविस्मरणीय है और कहने वाले कहते हैं कि मांडू के किले  पर अब भी बाज बहादुर और रूपवती की मधुर स्वर लहरियाँ गूंजती हैं। प्रेम और समर्पण के साथ शस्त्र और संगीत के साये में पली इस कहानी ने जाति और धर्म की बेड़ियों का अतिक्रमण कर इतिहास ही नहीं जनता के बीच भी अपनी मिसाल कायम की। इस कथा पर कई उपन्यासों की रचना हुई है और फिल्म भी बनी है। हीर- रांझा , लैला- मजनू , शीरीं- फरहाद की तरह रूपवती और.बाजबहादुर की कथा को तो जनमानस ने याद रखा लेकिन रूपवती की काव्य प्रतिभा का मूल्यांकन सही ढंग से नहीं हो पाया। ऐसी न जाने कितनी प्रतिभाओं को समय की धूल ने ढँक लिया है, जिसे पोंछना आवश्यक है। आज के लिए विदा , सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नई कहानी के साथ।

 

 

रामकृष्ण मिशन के अथक प्रयास का साक्षी है स्वामी विवेकानंद के पैतृक आवास का पुनरुद्धार कार्य

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

स्वामी विवेकानन्द का घर हमेशा से उत्सुकता और कौतुहल का विषय रहा है। विवेकानन्द रोड आना – जाना तो हमेशा से होता रहा मगर घर कभी खोज नहीं सकी…यह इच्छा मन में दबी रही। आज स्वामी विवेकानन्द की जन्मस्थली को लेकर जो पड़ताल आपके सामने है, वह इसी जिज्ञासा का परिणाम और एक इच्छापूर्ति की सन्तुष्टि है। हम लिख सकते हैं, बता सकते हैं मगर अनुभूति का जो रोमांच है….वह तो यहाँ आकर ही मिलेगा इसलिए आप दुनिया के किसी भी कोने में यह आलेख पढ़ रहे हों…हमारी पड़ताल देख रहे हों…वह यहाँ आकर इस अद्भुत स्मृति को अवश्य देखें। रामकृष्ण मिशन की तत्परता, समर्पण, परिश्रम ने स्वामी जी का खोयी स्मृति को जीवन्त बनाकर पूरी मानव जाति का उपकार किया है। यह सब एक पुनरुद्धार कार्य का सुफल है जिसका बीड़ा रामकृष्ण मिशन ने उठाया…बगैर उसे जाने यह गाथा अधूरी है तो देखते हैं…समर्पण और निष्ठा के इतिहास की एक झलक –

आज यह स्वामी जी का घर रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानन्द का पैतृक आवास एवं सांस्कृतिक केन्द्र कहलाता है लेकिन यह यात्रा इतनी आसान भी नहीं थी और यहाँ जो संग्रहालय है…वह आपको इतिहास के अनोखे पन्ने तक ले जाता है। इस घर का जीर्णोद्धार हुआ और नये सिरे से सजाया गया…तब उद्घाटन हुआ 26 सितम्बर 2004 को। स्वामी जी के पैतृक आवास को लेकर बांग्ला में कोई पुस्तक नहीं थी मगर अब बांग्ला में एक पुस्तक उपलब्ध है। पुस्तक स्वामी एकरूपानंद द्वारा लिखी गयी है और पुस्तक का नाम है ‘रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद पैतृक आवास ओ सांस्कृतिक केन्द्रेर इतिवृत’।

दशकों के परिश्रम और निष्ठा की कहानी है यह पुनरुद्धार कार्य

रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी प्रेमानंद की इच्छा थी कि स्वामी विवेकानंद के पैतृक आवास का उपयोग हो। इस पर स्वामी ओम्कारेश्वरानंद ने स्वामी प्रेमानंद के कथन का उल्लेख किया है। स्वामी प्रेमानंद लिखते हैं, ‘मेरी इच्छा है कि स्वामी जी का पैतृक आवास खरीदा जाये और वहाँ पर एक विशाल शिव मंदिर बने जिसमें एक प्रार्थना सभागार और एक पुस्तकालय हो। श्री ठाकुर और स्वामी जी के नाम पर रोज प्रार्थना हो, भक्ति गीत, ध्यान हो, शास्त्रों को पढ़ा जाये, नियमित व्याख्यान हों, व्यायामशाला हो। जो युवा बेलूर मठ नहीं आ सकते, वे यहाँ आ सकें…अगर कोलकाता में ऐसे भवन की स्थापना हो तो यह उनके लिए अच्छा होगा। स्वामी जी की शिक्षा का प्रसार युवाओं में हो सकेगा तो यह देश को भी लाभ पहुँचा सकेगा।’

पर क्या यह सब इतना आसान था? हालांकि स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली को समुचित स्मारक के रूप में स्थापित करने की इच्छा संन्यासी और भक्त दशकों से महसूस कर रहे थे लेकिन 1963 तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका था। स्वामी विवेकानंद के जन्म शताब्दी वर्ष 1963 के पूर्व 1962 में तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार ने स्वामी जी की जन्म स्थली पर एक स्मारक स्थापित करने का निर्णय लिया। तब राज्य सरकार ने रामकृष्ण मिशन से इस बारे में पूछा कि क्या मिशन की रुचि इस कार्य में है, साथ ही मिशन से सरकार ने एक निश्चित प्रस्ताव देने को भी कहा। रामकृष्ण मिशन की शताब्दी कमेटी ने प्रस्ताव तैयार कर सरकार को सौंपा। राज्य सरकार ने प्रस्ताव को स्वीकार किया और 1963 में भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिसूचना जारी की। इस तरह की अधिसूचना 1973 और 1974 में भी जारी की गयी। तब तक मूल भवन ध्वस्त हो चला था, यहाँ पर 54 परिवार और छोटे व्यावसायिक केन्द्रों का भी कब्जा था। किरायेदारों ने अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला 30 साल तक चला।

अधिग्रहण के पूर्व ऐसी हो गयी थी यह विरासत

आखिरकार 1993 में स्वामी विवेकानंद के विश्व धर्म सम्मेलन में दिये गये वक्तव्य के शताब्दी वर्ष में रामकृष्ण मिशन ने किरायेदारों के साथ सीधे बातचीत से समस्या सुलझाने का निर्णय हाईकोर्ट की सहमति से लिया। तय हुआ कि रामकृष्ण मिशन किरायेदारों को वैकल्पिक आवास मुहैया करवायेगा और राज्य सरकार पूरी इमारत के साथ उससे लगी जमीन को अधिग्रहीत कर रामकृष्ण मिशन को सौंप देगी। तब तक स्वामी जी का पैतृक घर ध्वंसावशेष में तब्दील हो चुका था। ध्वस्त स्थापत्य, शेड्स और कचरे को साफ करना एक दुष्कर कार्य था। सबसे पहले यहाँ रह रहे 143 परिवारों और छोटे व्यवसायियों को कहीं और बसाना था। रामकृष्ण मिशन ने कलकत्ता इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट से जमीन खरीदी और 6 तल्ले की इमारत बनवायी जिसमें 28 फ्लैट थे। यह काफी नहीं था इसलिए मिशन ने सरकार और निजी एजेन्सियों से और अधिक फ्लैट्स और भवन खरीदे जिसमें 6 करोड़ रुपये का खर्च आया । इस काम में 7 साल लग गये। जब यह काम पूरा हुआ तो राज्य सरकार ने स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास और उससे संलग्न भूमि का अधिग्रहण किया और 26 मई 1999 को रामकृष्ण मिशन को सौंप दिया।

कहते हैं कि स्वामी जी सप्तर्षियों में से एक थे। चित्र में जो शिशु है, वह ठाकुर रामकृष्ण परमहंस हैं और संन्यासी कोई और नहीं स्वामी विवेकानंद है…इसका उल्लेख भी है

इसके अतिरिक्त संन्यासियों के आवास, प्रस्तावित ग्रामीण एवं बस्ती उन्नयन कार्य, कार पार्किंग के लिए मिशन ने स्वतन्त्र रूप से 3, गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट का उत्तरी किनारे पर भी भूमि खरीदी। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जल के टैंक, एक इलेक्ट्रिक मीटर कक्ष, जेनरेटर कक्ष, और रामकृष्ण मंच नामक एक ओपन एयर ऑडिटोरियम के लिए भी जमीन खरीदी गयी। रामकृष्ण मिशन ने स्वामी जी के पैतृक आवास की मूल संरचना में कोई बदलाव नहीं किया और भवन के मूल स्थापत्य को बहाल रखते हुए फिर से संरक्षित किया। जून 1999 से वास्तविक रूप में पुनरुद्धार कार्य आरम्भ हुआ।
हाई कोर्ट के आर्काइव से भवन का मूल नक्शा खोजकर निकाला गया। तकनीकी अध्यन किया गया और बाद में जोड़े गये अतिरिक्त भवनों की पहचान की गयी। इससे मूल भवन को चिन्हित करने में आसानी हुई। सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि ठाकुरदालान को खोज निकाला गया जो इस जीर्ण – शीर्ण तीन मंजिले भवन के पीछे छुपा था जिसे कब्जादारों ने जोड़ा था। ईंटों पर से ईंट हटाकर ठाकुरदालान को खोज निकाला गया। इसका मिलना और पुनरुद्धार होना ही वास्तव में एक चमत्कार ही है।

इसी कक्ष में हुआ था स्वामी जी का जन्म,अब यह मंदिर है

यह कार्य आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया तथा डेवलपमेंट कन्सल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड की मदद से किया गया। इस निर्माण कार्य के लिए वही सामग्री इस्तेमाल की गयी जो 18 शताब्दी के भवन निर्माण कार्य में उपयोग में लायी जाती थी इसलिए पुनरुद्धार के बाद संरक्षित भवन हेरिटेज भवन कहलाता है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, दानदाताओं और भक्तों ने इस कार्य के लिए आर्थिक सहयोग दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, कोलकाता के पूर्व मेयर सुब्रत मुखर्जी, स्थानीय सांसद तथा विधायक समेत स्थानीय संस्थाएं सहायता के लिए आगे आयीं।
10 मार्च 2001 को मिशन के तत्कालीन उपाध्यक्ष स्वामी गहनानंदजी महाराज ने प्रस्तावित रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद स्मारक तथा सांस्कृतिक केन्द्र का शिलान्यास किया। 26 सितम्बर 2004 में तत्कालीन मिशन महासचिव स्वामी स्मरणानंद जी महाराज ने इस हेरिटेज भवन संलग्न नव स्थापित संन्यासी आवास का उद्घाटन किया इसी दिन यह ऐतिहासिक भवन आम जनता के लिए खोला गया। 1 अक्टूबर 2004 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी. जे. कलाम ने सांस्कृतिक केन्द्र का उद्घाटन किया। 1 जनवरी को मिशन के तत्कालीन अध्यक्ष आत्मास्थानानंद जी महाराज ने 12.6 फीट की स्वामी विवेकानंद की कांस्य प्रतिमा का उद्घाटन किया।

अब एक झलक अतीत की तरफ, ये है दत्त परिवार का इतिहास

इस शिवलिंग की पूजा भुवनेश्वरी देवी करती थीं औऱ इनकी आराधना से ही स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ इसी कारण से वे उनको बचपन में वीरेश्वर भी कहती थीं

स्वामी विवेकानन्द के मँझले भाई महेन्द्रनाथ दत्त के अनुसार दत्त परिवार की जमीन्दारी आमलाछाड़ा नामक किसी स्थान पर थी। इसके बाद दत्त परिवार बर्दवान के कालना महकमे के डेरियाटोना (डेरेटोना) गाँव में रहने लगा। दत्त परिवार की जमीन्दारी से जुड़ा होने के कारण गाँव का नाम हुआ दत्त डेरियाटोना। मुगल शासकों के समय से ही लम्बे अरसे दत्त परिवार ने सुखपूर्वक निवास किया। इसके बाद अंग्रेजों के समय रामनिधि दत्त अपने पुत्र रामजीवन और पौत्र रामसुन्दर दत्त को लेकर गोविन्दपुर आए। आज आप जिस जीपीओ को देखते हैं, वहीं इन्होंने निवास (बांग्ला में बसतबाटी) बनाया। 1776 में नवाब सिराजुद्दौला ने ईस्ट इंडिया कम्पनी का दुर्ग ध्वस्त किया। बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने दत्त परिवार से यह जगह छोड़ने को कहा क्योंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी यहाँ नया दुर्ग बनाना चाहती थी। दत्त परिवार को पुनर्वास दिया गया उत्तर कोलकाता के सूतानाटी अन्तर्गत आने वाले सिमुलिया (शिमला या सिमला) अंचल के मधु राय लेन। तब यह इलाका जंगल हुआ करता था जिसे साफ करने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 14 रुपये दिये। इस तरह दत्त परिवार शिमला स्ट्रीट यानी आज के विवेकानंद रोड में वास करने लगा। रामनिधि और रामजीवन ऊँचे पद पर थे। समय के साथ परिवार और समृद्धि, दोनों में वृद्धि हुई, घर अनुपयोगी होने लगा। तब 300 साल पहले स्वामी विवेकानन्द के परदादा राममोहन दत्त ने 3, गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट पर यह भव्य भवन बनवाया।  12 जनवरी 1863 में स्वामी विवेकानन्द का जन्म इसी घर में हुआ और यहीं उनका बचपन गुजरा।

प्रधान कार्यालय

शिमुलिया का वह मकान
शिमुलिया में कुल 4 बीघा जमीन दत्त परिवार की थी। इसमें से डेढ़ बीघा जमीन पर मूल निवास स्थान बना, शेष ढाई बीघा जमीन पर थी पुष्करिणी (तालाब), अस्तबल, फूल – फलों से लदा बागान और कर्मचारियों के लिए रहने की जगह। यह पुष्करिणी या तालाब आज के विवेकानंद रोड और विधान सरणी का संयोग स्थल हुआ करती थी। 2 नम्बर गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट में 4 कट्ठा जमीन पर राममोहन दत्त का विशाल अस्तबल था। आज इस जगह पर रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास तथा सांस्कृतिक केन्द्र का प्रधान कार्यालय और स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस है। मूल इमारत बाहरी महल और अन्दरमहल, दो भागों में विभक्त थी। श्रद्धालुओं और आम जनता के लिए कक्ष विन्यास किया गया है जिससे स्वामी जी के जीवन की घटनाओं को सुगमता से समझाया जा सके।
मूल भवन में प्रथम दो कमरे किसके थे, यह जाना नहीं जा सका है। सम्भवतः यह बैठकखाना था। दूसरे कमरे में स्वामी जी के परिवार की वंशावली है।
मकान की एक झलक
बाहिर महल में था ठाकुर दालान, स्वामी जी के पिता विश्वनाथ दत्त का कमरा, नरेन्द्र नाथ का अध्ययन अथवा बुद्ध दर्शन कक्ष, भूपेन्द्रनाथ, महेन्द्रनाथ के कक्ष, स्वामी जी का परिधान कक्ष और संगीत चर्चा का घर। दीवारें बड़ी – बड़ी तस्वीरों से सजी रहती थीं।
वहीं अन्दरमहल स्त्रियों के लिए था। स्वामी जी की माँ भुवनेश्वरी देवी का कमरा, बड़ी बहन स्वर्णमयी का कमरा, शिव मंदिर, स्वामी जी का जन्मस्थान, ध्यान कक्ष, ठाकुर भंडार, दादी श्यामा सुन्दरी देवी का कक्ष। ठाकुरदालान पश्चिममुखी था और उसके सामने था बड़ा प्रांगण। कई बैठकखाने थे। हावड़ा के सलकिया में राममोहन दत्त की 2 उद्यान बाटी थीं और खिदिरपुर में भी कुछ सम्पत्ति थी। महेन्द्र दत्त लिखते हैं कि तब नरेन को खोजते हुए रामकृष्ण परमहंस अक्सर यहाँ आया करते थे मगर भीतर कभी प्रवेश नहीं करते थे और नन्हे भूपेन को गोद में लेकर दुलार करते।
आज का भवन

आज यह भवन रामकृष्ण मिशन के परिश्रम से सुसज्जित है। आप यहाँ पर विवेकानंद के जीवन से जुड़ी घटनाओं का चित्रण झाँकियों में देख सकते हैं। स्वामी जी का जन्म जिस कक्ष में हुआ था, वह आज विवेकानन्द मंदिर है। पिता विश्वनाथ दत्त की लिखावट, स्वामी जी द्वारा प्रयुक्त वाद्य यंत्र से लेकर खेल के सामान, उनके परिधान..सब सुरक्षित हैं। वह शिवलिंग हैं…जिसकी आराधना करके माता भुवनेश्वरी देवी को पुत्र नरेन मिला था। बहुत कम लोग जानते हैं कि बचपन में इसी कारण से माता नरेन को वीरेश्वर भी बुलाया करती थीं। दीवारों पर बड़ी – बड़ी तस्वीरें और उपरोक्त सभी कक्ष हैं। जब आप सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हैं तो एक विशाल चित्र ध्यान खींचता है। चित्र में सप्तऋषि हैं और सामने बैठे ऋषि के कान में एक शिशु कुछ कह रहा है। स्वामी सारदानन्द जी महाराज ने लीला प्रसंग में लिखा है कि बाद में स्वयं ठाकुर ने उन सबको बताया था कि यह शिशु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस हैं और यह ऋषि कोई और नहीं बल्कि स्वयं स्वामी विवेकानंद हैं। शिशु इनको कह रहा है कि वे धरती पर जा रहे हैं और ऋषि भी पीछे से आएं। इस घटना को लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। नरेन्द्र के जन्म के पहले ठाकुर भाव समाधि में एक दिन यही दृश्य देखा था और नरेन को देखकर वे समझ गये थे…यही नरेन्द्र के प्रति उनके आकर्षण का कारण भी था।
शिकॉगो धर्म सम्मेलन को लेकर थ्री डी फिल्म प्रदर्शित की जाती है और इस घर का पुनरोद्धार किस तरह किया गया…उसे लेकर भी एक वीडियो प्रदर्शित किया जाता है। मुख्य द्वार पर स्वामी जी की विशाल कांस्य प्रतिमा है और इसके सामने है प्रधान कार्यालय तथा पुस्तक विक्रय केन्द्र। इसके साथ ही है साधु व कर्मियों का निवास, निवेदिता भवन। निवेदिता भवन में चिकित्सा सेवाएं दी जाती हैं। कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र भी है। इस समय 850 सीटों वाले वातानुकूलित सभागार का निर्माण कार्य चल रहा है जिसका स्वप्न स्वामी प्रेमानंद ने देखा था, आज मिशन उसे साकार कर रहा है और यह मानव जाति पर ऐसा उपकार है जिसे इतिहास हमेशा याद रखेगा।

स्त्रोत साभार – रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंदेर पैतृक आवास ओ सांस्कृतिक केन्द्रेर इतिवृत (पुस्तक)

स्त्रोत साभार – रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास तथा सांस्कृतिक केन्द्र की वेबसाइट