आयोजक – शुभादि, – थीम – खुशी के रंग
विधा – नृत्य, फोटोग्राफी, स्वरचित कविता, काव्य संगीत और जो आप चाहें
प्रियदर्शनी/ प्रियदर्शन – पोएला बैशाख, गणगौर, बैसाखी स्पेशल यानी इन तीन राज्यों के परिधान, संस्कृति और हस्तशिल्प को दर्शाने वाला लुक
रंगारंग कार्यक्रम के साथ वीरांगना होली मिलन उत्सव सम्पन्न
टीटागढ़ : वीरांगना होली मिलन उत्सव गीत-संगीत के रंगारंग कार्यक्रमों के साथ मनाया गया। प्रतिभा सिंह, राकेश पांडेय, कुमार सुरजीत, अनिशा मुखर्जी, साईं मोहन ने अपने गीतों से लोगों को नाचने पर मबजूर कर दिया। एक ओर जहां भोजपुरी के पारम्परिक होली गीतों का लुत्फ लोगों ने उठाया वहीं फिल्मीं गीतों ने भी अच्छा समां बांधा। बांग्ला गीतों ने भी श्रोताओं को आकर्षित किया। कार्यक्रम का आयोजन अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन की पश्चिम बंगाल प्रदेश इकाई की ओर से किया गया था। समारोह में प्रदेश अध्यक्ष प्रख्यात गायिका प्रतिभा सिंह ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी उत्सव मनाने की परम्परा भारतीय संस्कृति की संजीवनी शक्ति रही है। हर हाल में जीवन को उत्सवपूर्ण बनाये रखना जरूरी है। यह हम संघर्ष की प्रेरणा देता है। वीरांगना की प्रदेश इकाई की महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष रीता सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, संयुक्त महासचिव ममता सिंह व सुमन सिंह, सचिव पूनम सिंह व किरण सिंह उपस्थित थीं। महानगर की अध्यक्ष मीनू सिंह, महासचिव इंदु सिंह व पदाधिकारी सरोज सिंह, पूनम सिंह, सुनीता सिंह, बालीगंज की अध्यक्ष रीता सिंह, सोदपुर की अध्यक्ष सुनीता सिंह, महासचिव आशा सिंह, पदाधिकारी जयश्री सिंह, सुलेखा सिंह, बबिता सिंह, मंजू सिंह, मंजू सुधीर सिंह, नारी शक्ति वीरांगना की पदाधिकारी शकुंतला साव, अनीता साव, अलीशा मुखर्जी, पुष्पा सेठ, आभा ठाकुर आदि उपस्थित थे। इस अवसर पर वीरांगना के कलेंडर का भी लोकार्पण किया गया।
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, क्या आपने कभी गौर किया है कि हमारे देश में स्त्री- पुरुष अनुपात के आंकड़े समान नहीं है और इस असमानता के पीछे एक लंबी परंपरा तो नहीं कहूंगी लेकिन सजिश जरूर काम कर रही है। और उसी की वजह से, आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी बहुत से पढ़े- लिखे माता -पिता भी यह मानते हैं कि बेटे को जन्म दिए बिना उन्हें इहलोक और परलोक दोनों में मुक्ति नहीं मिल सकती। बेटों को ही जीवन का असली धन मानने वाले पुरुष-सत्तात्मक समाज ने बेटों की चाह में बेटियों के आने का रास्ता हमेशा ही बंद किया। जो समाज स्त्री पुरुष के समान सहयोग ही नहीं सह अस्तित्व पर कायम था और सहज स्वाभाविक रूप से विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा था, उसमें कब और कैसे स्त्रियां अनचाही बन गयीं और उन्हें समाप्त कर देने की दुर्भावना हमारे मन में पनपने लगी, इसका पता ही न चला। निश्चित रूप से यह आदिम युग में नहीं ही हुआ होगा। लेकिन जैसे- जैसे मनुष्य ने सभ्यता का लिहाफ ओढ़ा, वह और ज्यादा बनैला हो गया। विकास के किस क्रम में लड़कियों को बोझ समझा जाने लगा इसके बारे में हम इतना अनुमान लगा सकते हैं कि विवाह संस्था की स्थापना के कुछ समय बाद लड़कियों के विवाह के लिए ढ़ेरों दहेज की आवश्यकता पड़ने लगी होगी, वह मोड़ सभ्यता की सीढ़ियों को चढ़ते हुए ठीक किस समय आया, इसका अनुमान भर लगाया जा सकता है। हालांकि कई ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि माता- पिता अपनी बेटी की नई गृहस्थी के लिए भेंट स्वरूप कुछ सामान दिया करते थे ताकि वह अपने नये जीवन का आरंभ कर सके लेकिन वह कब जबरिया मांग में बदल गया, इसकी भी महज परिकल्पना ही की जा सकती है।
लड़कियों को बोझ समझने का एक सिरा संपत्ति के विभाजन से भी जुड़ता है। जब मनुष्य के पास व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होती थी तब बेटे और बेटी के बीच में अधिक अंतर नहीं रहा होगा लेकिन जिस स्थिति में विवाह के पश्चात संपत्ति विभाजन का प्रश्न सामने आया होगा तभी बेटियों को पराया धन आदि सिद्ध करने के लिए कई तर्क गढ़े गये होंगे और धर्मशास्त्र आदि लिखे गए होंगे जिसमें कन्या दाय से मुक्त होने के महत्त्व को बढ़ा चढ़ाकर सिद्ध किया गया होगा। उसी समय स्वर्ग नरक आदि की परिकल्पना करते हुए यह सिद्ध करने की कोशिश भी हुई होगी कि पिता की आत्मा को मुक्ति तभी मिलेगी जब उसे बेटा मुखाग्नि देगा और उसका श्राद्ध कर्म करेगा। स्त्रियों को कोमलांगी सिद्ध करते हुए उन स्थानों से दूर रखा गया जहां पार्थिव शरीर का संस्कार किया जाता था, शायद इसीलिए आज के समय में भी समाज के एक बड़े हिस्से में स्त्रियों का शमशान जाना उचित नहीं समझा जाता है। आप कल्पना कीजिए कि सभ्यता के आदिम चरण में जो स्त्रियां श्रमपूर्वक शिकार करती थीं और अपनी रक्षा करने में सक्षम थीं, वे ही सभ्य समाज में रक्षणीया समझी गईं और उनका किसी ना किसी पुरुष के संरक्षण में रहना आवश्यक बना दिया गया। युवावस्था में अपने लिए साथी को चयनित करने का अधिकार भी उसके पास नहीं रहा जो कि कबीलाई संस्कृति में हुआ करता था। हालांकि उस संस्कृति में एक कबीले विशेष के शक्ति संपन्न युवा द्वारा दूसरे कबीले की युवती की हरण भी किया जाता था और प्रतिरोध करने पर उसके कुटुंब जनों की हत्या भी कर दी जाती थी। अपहरण और हत्या के इन्हीं सिलसिलों के कारण संभवतः कबीले के लोग अपनी -अपनी पुत्रियों की रक्षा के लिए तत्पर हो उठे होंगे और इसी क्रम में बेटियों के विवाह आदि को परिवारों के सम्मान के साथ जोड़ दिया गया होगा और उसके लिए वर चुनने या उसे सुपात्र के हाथों सौंपने का अधिकार पिता या परिवार के मुखिया ने अपने पास रखा। जब कन्या दाय एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन गई तभी संभवतः दहेज प्रथा का जन्म हुआ होगा जिसने कालांतर में इतना विकराल रूप ले लिया कि माता- पिता बेटी के विवाह को संपन्न करने के लिए बर्बादी के कगार तक आ गये।
लब्बोलुआब यह है कि परिवार के सम्मान का सवाल और दहेज के मसलों ने क्रमशः पुत्रियों को पिता और परिवार के लिए बोझ में परिवर्तित कर दिया और सभ्यता के विकास में वह अमानवीय समय भी आया जब बेटियों से मुक्ति की कामना ही नहीं की जाने लगी बल्कि उनसे मुक्ति पाने के लिए जन्म के तुरंत बाद उनकी हत्या भी की जाने लगी। बाद में तकनीकी विकास और मनुष्य की अर्थ लिप्सा के कारण बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाने लगा जिसका सिलसिला अब भी निरंतर जारी है। और इस सिलसिले ने ही समाज में स्त्री- पुरुष अनुपात को बिगाड़ दिया है। बहुत से प्रांत ऐसे हैं जहां बेटों के विवाह के लिए लड़कियां नहीं मिलती और देश के दूसरे हिस्सों से जहां यह अनुपात अब भी सही है, से लड़कियों को खरीद कर लाया जाता है। लेकिन इस गलत अनुपात को सही करने की चिंता शायद अब भी हमें नहीं है। आज भी अधिकांश दंपति पुत्र-रत्न की प्राप्ति की कामना करते हैं क्योंकि बेटी तो पराया धन ही मानी जाती है और संपत्ति का वारिस तो बेटा ही हो सकता है तथा माता-पिता की अंत्येष्टि का अधिकार भी उसी के पास सुरक्षित हैं। इन्हीं मान्यताओं के कारण बेटियों की मां को संतानवती होने के बावजूद बांझ कह कर पुकारा जाता है और किसी तथाकथित शुभ कार्य में उसे शामिल करने से यथासंभव परहेज किया जाता है। और इसी संकीर्ण सोच के कारण समाज के कुछ तथाकथित सभ्य लोग बेटों की चाह में बेटियों को कोख में ही मार देते हैं तो कुछ बेटे की प्रतीक्षा में बेटियों की लाइन लगा देते हैं। मैत्रेयी पुष्पा की कहानी “तुम किसकी हो बिन्नी” में इस कटु यथार्थ को मार्मिकता से उकेरा गया है।
सखियों, इस तरह के दृश्य आज भी अगर आम हैं तो हमें थोड़ा ठहर कर सोचने की आवश्यकता है कि आखिर कब तक हम इन संकीर्ण रूढ़ियों का शिकार होकर बेटियों का तिरस्कार करते रहेंगे या फिर उनकी बलि चढ़ाते रहेंगे। विकास के बड़े -बड़े दावों के बावजूद हम मानसिक रूप से पिछड़ेपन के शिकार हैं जिससे मुक्त हुए बिना ना समाज का समग्र विकास संभव हो पाएगा ना ही देश का। बेटियों को बचाने और पढ़ाने के नारे लगाने और पोस्टर चिपकाने भर से स्थितियां नहीं बदलेंगी। स्थितियों को बदलने के लिए हमें अपने मानस को बदलना होगा। आप स्वयं भी इस बारे में सोचिए और दूसरों को भी जागरूक कीजिए।
आज, विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी लेकिन तब तक आप इस मुद्दे पर सोचिए जरूर और औरों को भी सोचने के लिए कहिए।
कोलकाता : यूरोस्कूल ने हाल ही में एक प्रसिद्ध क्रिकेटर जोंटी रोड्स के साथ मिलकर एक कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य समग्र शिक्षा के महत्व को बढ़ावा देना था जो शिक्षाविदों के साथ-साथ खेल और पाठ्येतर गतिविधियों पर समान ध्यान सुनिश्चित करता है। इस सत्र की शुरुआत बंगलौर के यूरोस्कूल व्हाइटफ़ील्ड की प्रिंसिपल श्रुति अरुण ने की, जिन्होंने जॉन्टी का स्वागत किया। इस एक घंटे की आभासी फिटनेस कार्यशाला में जोंटी ने विभिन्न व्यक्तिगत उपाख्यानों और कई शारीरिक अभ्यासों को साझा किया, जबकि हमेशा उन्हें एक मज़ेदार गतिविधि के रूप में रखने और किसी विशेष खेल की ओर बच्चे की ओर नहीं धकेलने पर जोर दिया। उन्होंने बच्चों के बीच खेल या अन्य पाठ्येतर गतिविधियों में उभरती रुचि की पहचान करने के टिप्स भी साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे उनके माता-पिता, जो शिक्षक थे, ने हमेशा उन्हें विभिन्न शारीरिक गतिविधियों के रूप में आनंद लेने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने यह भी साझा किया कि हॉकी और तैराकी जैसे विभिन्न खेलों को खेलना और उनके द्वारा सीखे गए जीवन के सबक ने उन्हें एक अच्छे क्षेत्ररक्षक बनने में मदद की। इस वेबिनार के दौरान, जॉन्टी ने बच्चों के लिए आयु-उपयुक्त अभ्यास से संबंधित कई वीडियो साझा किए। ये वीडियो विशेष रूप से विभिन्न आयु समूहों के लिए आयु-विशिष्ट अभ्यासों के साथ क्यूरेट किए गए थे: टॉडलर्स, प्री-प्राइमरी, प्राइमरी और मिडिल-टू-हाई स्कूल। उन्होंने फ़्लिप्ड कैच, क्रॉसओवर कैच जैसे अभ्यासों के महत्व पर जोर दिया जो हाथ की आँख के समन्वय में सुधार के लिए आदर्श हैं। चोट से बचने के लिए, उन्होंने स्वस्थ रहने के लिए बच्चों की दिनचर्या में कोर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और योग व्यायाम को शामिल करने पर जोर दिया।
बच्चों के लिए जॉन्टी रॉड्स के कुछ परामर्श
गरिमा के साथ जीतना, विपक्षी टीम को सम्मान देना बहुत जरूरी है
शारीरिक गतिविधियों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाये
सर्वश्रेष्ठ होने से जरूरी है निरन्तर सक्रिय रहना
वह क्षेत्र चुने जिसके प्रति आपमें आग्रह हो
मजबूत होने का मतलब शारीरिक रूप से ही ताकतवर होना नहीं है
योग को जीवन का नियमित हिस्सा बनायें
और कुछ हैं अभिभावकों के लिए
बच्चों को जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करें
बच्चों को असफल होने की छूट दें तभी बच्चा सफलता की ओर प्रेरित होगा
अनुशासन महत्वपूर्ण है मगर सन्तुलन भी जरूरी है
बच्चों के लिए खेल चुनते समय उम्र का ध्यान रखें
बच्चों के समग्र सन्तुलित विकास पर ध्यान दें
जरूरत पड़े तो माता – पिता अपनी जीवन शैली बदलें और बच्चों के लिए उदाहरण बनें
बच्चों को पोषक आहार दें, भले ही यह दवा की तरह हो
बच्चों पर दबाव न डालें
स्कूल ऐसा चुने जो समग्र विकास को प्रोत्साहन देता हो
व्यायाम (4 – 6 साल के बच्चे) – दौड़ना, कूदना, कैच एंड थ्रो, कई गेंदों का उपयोग एक साथ अदल -बदल कर करना (एक हाथ से दूसरे हाथ की गेंद बदलना), लेमन एंड स्पून गेम, स्किटल्स, स्टॉक एंड टावर गेम
7 साल की उम्र से किशोरावस्था तक – गेंद कैच करना, एक या दो हाथ से कैच पकड़ना, दीवार पर गेंद मारना, फुटवर्क (फुटबॉल, हॉकी जैसे खेल, जिसमें पैरों का उपयोग अधिक हो), परछाई को देखकर गेंद पकड़ना, (इस उम्र में किसी विशेष खेल पर पकड़ बनने लगती है), एक हाथ से गेंद पकड़ें, दूसरे हाथ से फेकें. फ्लिप कैच, क्रॉस ओवर कैच, दो हाथ से 2 गेंदों के साथ फ्लिप कैच पकड़ना, 2 गेंदों के साथ क्रॉस ओवर कैच
नयी दिल्ली गाय के गोबर के इस्तेमाल को लेकर भले ही लोग कुछ भी सोचें लेकिन प्रधानमंत्री के संदेश लोकल फॉर वोकल के तहत शुरू किए गए गोबर से बने पेंट को देशभर में काफी पसंद किया जा रहा है। इस पेंट से लोग अपने सपनों के घर को रंग रहे हैं। खादी ग्रामोद्योग के साथ मिलकर जयपुर के एक इंस्टीट्यूट में तैयार किया गया यह पेंट तेजी से बिक रहा है। खादी ग्रामोद्योग आयोग के वरिष्ठ अधिकारी की ओर से बताया गया है कि इसकी बिक्री काफी बेहतर है। महज 12 दिन के अंदर गोबर से बना साढ़े तीन हजार लीटर पेंट अभी तक बिक चुका है। यह भी तब है जबकि पेंट की बिक्री सिर्फ दिल्ली और जयपुर के दो स्टोर से ही की गयी थी। हालांकि अब खादी ग्रामोद्योग ने इसकी ऑनलाइन बिक्री (Online Sale) भी शुरू कर दी है जिसके बाद से देशभर में कहीं से भी लोग इसे ऑर्डर कर सकते हैं। गोबर से बने इस पेंट के ट्रायल और टेस्टिंग के दौरान भी यह पेंट तीन हजार लीटर बिक चुका है. इसके परीक्षण का काम अभी भी चल रहा है। किसी भी कंपनी का पेंट बनता है तो उसमें एक वॉलेटाइल ऑर्गनिक कंपाउंड (VOC) होता है. वीओसी में कुछ हानिकारक तत्व होते हैं जो पेंटिंग के दौरान भाप बनकर बाहर निकलते हैं। इससे पेंट करने वाले को आंखों में जलन शुरू हो जाती है. टेस्टिंग और इसकी अंतिम रिपोर्ट में देखा गया कि गोबर से बने इस पेंट में वीओसी की मात्रा न के बराबर है जिसकी वजह से इससे कोई परेशानी नहीं होती।इस पेंट को ऑर्डर करने वाले लोगों के फीडबैक में भी यह सामने आया है कि यह एक पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद है जिसकी वजह से लोग इसे बहुत ज्यादा पसंद कर रहे हैं। ग्रामोद्योग की ओर से बताया गया कि इसे गाय से मिलने वाले रोजगार के लिए शुरू किया गया है। हालांकि इसके उपयोगी होने के कारण यह लोगों को भा रहा है.
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी करा चुके हैं पेंट
इस पेंट को 12 जनवरी को एमएसएमई देख रहे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने लांच किया था. इतना ही नहीं इस पेंट को लांच करने से पहले नितिन गडकरी ने भी इसका इस्तेमाल अपने आवास की दीवारों पर किया है। वहीं खादी ग्रामोद्योग की कई इमारतों में इसको पेंट किया गया है। इसे बनाने का काम खासतौर पर गौशालाओं में शुरू किया गया है। इससे महीने का 4500 रुपये करीब गोबर से मिलने का अनुमान है। गाय के गोबर से बने पेंट के कई फायदे हैंय़ यह एंटी बैक्टीरियल है, एंटी फंगस है. सस्ता है. इसमें भारी धातुएं नहीं हैं।
चीन में शांक्सी प्रांत की राजधानी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अपने शहर शियान में पकी मिट्टी यानी टेराकोटा से बने 8,000 सैनिक 2000 साल से अपने राजा की कब्र की सुरक्षा कर रहे हैं। पढ़ने में थोड़ा अजीब लगेगा, पर यह सच है। इसे पूरी दुनिया में टेराकोटा आर्मी के नाम से जाना जाता है। शांक्सी जाने वालों के लिए यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।
बात 1974 की है, जब 29 मार्च को शांक्सी के किसान कुआं खोद रहे थे। तभी उन्हें इस आर्मी के बारे में पता चला। इसके बाद डेढ़ किमी के दायरे में खुदाई करवाई गई। तब एक फुटबॉल के ग्राउंड के बराबर के हॉल में 11 कतारों में खड़े 8,000 सैनिक जमीन से बाहर निकले। इन सैनिकों की कई खासियतें हैं। हर सैनिक की ऊंचाई अलग-अलग है। उन्हें अलग-अलग भूमिका दी गई है और यह उनके चेहरे और पहनावे से भी साफ दिखता है। जिस तरह मिस्र में शासक की मौत होने पर पिरामिड बनाए जाते थे, उसी तरह चीन में शासक की कब्र की रक्षा के लिए सैनिक तैनात किए जाते थे। 210-209 ईसा पूर्व में चीन के राजा किन शी हुआंग की मौत के बाद पकी मिट्टी से यह सैनिक बनाए गए थे। उद्देश्य था कि ये सैनिक मौत के बाद भी राजा की सुरक्षा करेंगे। इस सेना के आदमकद पुतलों के सिर, हाथ-पैर और धड़ अलग-अलग बनाए गए और फिर उन्हें जोड़ा गया। जोड़ने से पहले आग में तपाते थे। यह पुतले इतने सजीव हैं कि देखने पर लगेगा कि अभी जी उठेंगे।
कब्र के सामने एक हॉल था, जिसमें यह सैनिक खड़े थे। सैनिकों के साथ उनके घोड़े, दफ्तर और अन्य लोगों के रहने के घर भी थे। सेना का साजो-सामान तांबे, टिन और अलग-अलग धातुओं का है। यह भी बताया जाता है कि इन सैनिकों के कई मूल हथियारों को उनके बनाने के कुछ ही दिन बाद लूट लिया गया था। 23 फुट गहरे चार गड्ढों में यह सेना खड़ी है। 230 मीटर लंबे और करीब 62 मीटर चौड़े पहले गड्ढे में 6000 पुतले हैं। 11 गलियारे हैं जो 3-3 मीटर चौड़े हैं। लकड़ी से बनी इनकी छत को बारिश से बचाने के लिए मिट्टी की परतों को विशेष उपाय के साथ चढ़ाया गया है। अन्य गड्ढों में घुड़सवार और युद्ध में काम आने वाली गाड़ियां हैं।
आईआईटी खड़गपुर और आईआईएम अहमदाबाद से विनायक ने की है पढ़ाई
शहरी आबादी से दूर जंगल में 24 किमी अंदर काली रातड़ी गांव है। यहां बने 10 कच्चे घरों में से एक सामूहिक प्रार्थना से गूंज रहा है। इस घर के आंगन में बैठे 60 बच्चे यह प्रार्थना कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण विवेकानंद सेवा कुटीर नाम का यह विद्यालय ‘परिवार’ कहलाता है और यह परिवार मप्र में ऐसे 254 स्कूल चला रहा है, जिनमें बिजली और पानी जैसी मूल सुविधाओं से वंचित 25 हजार आदिवासी, बेसहारा बच्चे पढ़ रहे हैं। इन बच्चों को बगैर किसी शुल्क के पढ़ाने के साथ दो वक्त का पौष्टिक भोजन खिलाया जाता है। उन्हें साफ-सुथरे कपड़े दिए जाते हैं।
साफ-सफाई से रहना भी सिखाया जाता है। फिलहाल नर्सरी से आठवीं तक की पढ़ाई कराई जा रही है। जल्द ही 12वीं और उसके बाद की पढ़ाई की सुविधा शुरू करने की तैयारी है। आईआईटी खड़गपुर और आईआईएम अहमदाबाद से पढ़े विनायक ने 2003 में कोलकाता से 3 बच्चों के साथ सेवा कुटीर की शुरुआत की थी। वे बताते हैं- यह लड़ाई सिर्फ अशिक्षा, कुपोषण व असमानता के खिलाफ है। मेरी शुरुआती पढ़ाई मप्र में हुई है। पिता यहां आईएएस रहे हैं। उनके साथ यहां की जमीनी हकीकत को देखा है।
विनायक बताते हैं कि 2016 में एमपी में सेवा कुटीर का विस्तार किया। फिलहाल 8 जिलों देवास, श्योपुर, मंडला, सीहोर, छिंदवाड़ा, खंडवा, विदिशा और डिंडोरी में सेवा कुटीर चला रहे हैं। रेसीडेंशियल एजुकेशन सेंटर भी बना रहे हैं, जहां ये बच्चे रह भी सकेंगे। फिलहाल पश्चिम बंगाल में परिवार का सबसे बड़ा नि:शुल्क आवासीय शिक्षण संस्थान है, जिसमें दो हजार से अधिक बच्चे हैं। 2023 तक 500 सेंटर शुरू करने का लक्ष्य है, जिनमें 50 हजार बच्चे पढ़ सकेंगे। सेवा कुटीर के एक सेंटर का खर्च करीब 12.5 लाख रु. है। प्रदेश में 254 सेंटर हैं। इन्हें चलाने के लिए संस्था बड़ी कंपनियों के सीएसआर फंड और एकल दानदाताओं पर निर्भर है। हाल ही में 5 रेसीडेंशियल सेंटर्स के निर्माण की फंडिंग सचिन तेंदुलकर ने की है।
5 गांवों में चल रहे कुटीरों की देखभाल कर रहे सिद्धार्थ परमार बताते हैं कि ये सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में भी जाते हैं। सरकारी स्कूलों में 200-300 बच्चों पर एक शिक्षक होता है। साधन भी नहीं होते। इन्हीं कमियों को सेवा कुटीर पूरी करता है। स्कूल के पहले सुबह 3 घंटे और स्कूल के बाद शाम को 3 घंटे ये बच्चे कुटीर में बिताते हैं। हम कोई भवन अलग से नहीं बनाते, बल्कि गांव का ही कोई ऐसा घर चुन लेते हैं, जहां थोड़ी जगह हो और बच्चे बैठ सकें। (साभार – दैनिक भास्कर)
‘फ्रॉम द इनसाइड-द इनर सोल ऑफ ए यंग पोएट’ से मिला सम्मान
अमेरिका के एरिजोना में रहने वाली दस साल की थानवी की कविताओं पर आधारित एक किताब पब्लिश हुई है। थानवी करीमनगर डेरी एडवाइजर वी हनुमंथा की पोती हैं। वे अपने पैरेंट्स के साथ एरिजोना में रहती हैं। वे पांचवीं कक्षा की विद्यार्थी हैं। उनके पिता महेंद्र इंटेल में हार्डवेयर इंजीनियर और मां दीपिका सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। उनकी किताब का नाम ‘फ्रॉम द इनसाइड-द इनर सोल ऑफ ए यंग पोएट’ है। इस किताब के पब्लिश होने के बाद वे अमेरिका की सबसे कम उम्र की लेखक बन गई हैं। उनकी लिखी किताब 15 मार्च को प्रकाशित हुई। इसे अमेजन ने 5 में से 4.9 रेटिंग दी है। थानवी ने इस किताब में अपनों को खोने के बाद गुस्सा, दुख, अकेलापन और निराशा को बयां किया है। अपनी किताब के माध्यम से थानवी ने प्रकृति के प्रति प्रेम को दर्शाया है, वहीं खुशी और रिश्तों को भी बयां किया है। थानवी को हैरी पॉटर सीरिज पढ़ना अच्छा लगता है। उसने बताया कि राइटिंग के प्रति उनके पैशन ने ही उन्हें लेखक बनाया।
कडापा : महामारी के बीच एक ओर जहां कई डॉक्टरों ने मोटी फीस लेकर अपनी जेब भरी, वहीं आंध्रप्रदेश के कडापा की डॉक्टर नूरी परवीन ने इंसानियत की मिसाल कायम की है। अपने क्लीनिक में मरीजों को देखने की उनकी फीस 10 रुपये है। वहीं अस्पताल में भर्ती मरीज के लिए बेड का खर्च 50 रुपये प्रतिदिन है। नूरी परवीन विजयवाड़ा के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंने कडापा के फातिमा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस से एमबीबीएस किया है। नूरी ने बताया कि मैंने गरीबों की मदद करने के लिए ही कडापा की गरीब बस्ती में अपना क्लीनिक खोला। उन्होंने अपने मम्मी-पापा को ये भी नहीं बताया कि वे विजयवाड़ा नहीं आएंगी और यहीं रहकर गरीबों की सेवा करेंगी। लेकिन जब बाद में उन्हें पता चला तो अपनी बेटी के इस फैसले से वे बेहद खुश हुए और उसे दुआएं दी। नूरी परवीन एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहां उनके मम्मी -पापा ने तीन अनाथ बच्चों को गोद लेकर उनकी परवरिश की। इन बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्चा भी उन्होंने ही उठाया। नूरी को प्यार से लोग कडापा की मदर टेरेसा कहते हैं। कडापा में नूरी ने अपना क्लीनिक 7 फरवरी 2020 को खोला था। लेकिन महामारी का असर बढ़ने पर लोगों के कहने पर उन्होंने ये क्लीनिक बंद कर दिया। अभी क्लीनिक बंद किए हुए तीन-चार दिन ही हुए थे कि उन्हें खुद एक डॉक्टर होने का फर्ज याद आया। इस तरह उन्होंने अपना क्लीनिक एक बार फिर खोला जो अब 24 घंटे मरीजों के लिए खुला रहता है। इतना ही नहीं उन्होंने अपने स्वर्गीय दादा की याद में नूर चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की है। इसके तहत वे लोगों को आत्महत्या और दहेज प्रथा के खिलाफ जागरूक करने के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाती हैं।
नयी दिल्ली : केंद्रीय विद्यालय संगठन ने सभी केंद्रीय विद्यालय में नामांकन प्रक्रिया आरम्भ हो गयी है । इच्छुक अभिभावक एक अप्रैल से कक्षा एक के लिए नामांकन फॉर्म भर सकते हैं। कक्षा एक के लिए ऑनलाइन फार्म ही भरे जायेंगे। ऑनलाइन फार्म के लिए केवीएस ने एप भी जारी किया है। अभिभावक एप को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं। ज्ञात हो कि कोरोना संक्रमण के कारण इस बार केंद्रीय विद्यालय में नामांकन देरी से होगा। अब तक मार्च में नामांकन प्रक्रिया पूरी कर ली जाती थीय़ कक्षा एक के लिए kvsonlineadmission.kvs.gov.in पर जाकर आवेदन करना होगा। केवीएस द्वारा हर कक्षा के लिए अलग-अलग फॉर्म जारी किए गए हैं। फार्म की संख्या देखकर ही नामांकन फार्म भरना होगा। बोर्ड रिजल्ट के बाद निकलेगा 11वीं के लिए आवेदन
केवीएस की मानें तो 10वीं बोर्ड रिजल्ट आने के दस दिन के अंदर 11वीं में नामांकन की तिथि जारी होगी। केंद्रीय विद्यालय के छात्र और छात्रा का पंजीकरण पहले होगा। गैर केवी वाले छात्रों को तभी मौका मिलेगा जब संबंधित केवी में जगह खाली रहेगी। 11वीं में प्रवेश की अंतिम तिथि दसवीं रिजल्ट जारी होने के 30 दिनों के अंदर ही रहेगा। नामांकन के लिए निर्धारित
कक्षा एक के लिए पंजीकरण (ऑनलाइन) शुरू – एक अप्रैल
कक्षा एक के लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि – 19 अप्रैल
प्रथम लिस्ट – 23 अप्रैल को जारी
द्वितीय लिस्ट – 30 अप्रैल को जारी
तृतीय लिस्ट – पांच मई को जारी
शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत नामांकन को आवेदन – 15 मई से 20 मई
कक्षा दो तथा अन्य कक्षाओं का पंजीकरण (ऑफलाइन) – आठ अप्रैल से 15 अप्रैल तक
कक्षा दो तथा आगे की कक्षाओं के लिए सूची जारी – 19 अप्रैल को
कक्षा दो तथा आगे की कक्षाओं के लिए प्रवेश – 20 से 27 अप्रैल
कक्षा तीन से नौवीं तक प्रवेश की अंतिम तिथि – 31 मई