Monday, June 29, 2026
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छठ पूजा विशेष : कौन हैं छठी मइया

छठी मैया, जिन्हें षष्ठी देवी या देवसेना के नाम से जाना जाता है, छठ पूजा की मुख्य पूजनीय देवी हैं। यह पवित्र पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश में सूर्य देव के साथ-साथ छठी मैया की आराधना के रूप में मनाया जाता है। लोककथा और लोक मान्यताओं के कारण ही छठ पर्व में छठी मैया की पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि इनकी आराधना से आरोग्यता, वैभव और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
सूर्यदेव की बहन और कार्तिकेय की पत्नी? (विभिन्न मान्यताएं)
छठी मैया के संबंध में कई मान्यताएं और लोककथाएं प्रचलित हैं। यह एक लोकमान्यता है। दिलचस्प बात यह है कि यह उन कुछ सौर पर्वों में से एक है जो सूर्योदय के बजाय सूर्यास्त से शुरू होता है।
सूर्य की पत्नी या सहचरी (ऊषा/प्रत्यूषा):
  1. एक प्रमुख लोकमान्यता के अनुसार, छठी मैया को सूर्यदेव की बहन भी माना गया है। चूँकि छठ पूजा सूर्य की उपासना का पर्व है, इसलिए छठी मैया की पूजा साथ में की जाती है।
  2. एक अन्य मान्यता अनुसार देवी छठी मैया/ऊषा को सूर्य की सहचरी कहा जाता है, जो श्रद्धा और पूजा का एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
  3. छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य की उपासना का पर्व है। इस त्योहार में डूबते (प्रत्यूषा) और उगते (ऊषा) सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
  4. कुछ लोककथाओं और स्थानीय मान्यताओं में छठी मैया को सूर्य की बहन या सूर्य की पत्नी/शक्ति के रूप में पूजनीय माना जाता है, इसलिए सूर्य पूजा के साथ ही उनकी पूजा होती है।
2. भगवान कार्तिकेय की पत्नी (देवसेना/षष्ठी देवी):
1. पुराणों में, विशेष रूप से ब्रह्मवैवर्त पुराण में, ‘षष्ठी देवी’ (जिनके नाम पर यह पर्व ‘सूर्य षष्ठी’ या ‘छठ’ कहलाता है) को भगवान कार्तिकेय की पत्नी ‘देवसेना’ के रूप में वर्णित किया गया है। षष्ठी देवी को संतान की रक्षक देवी माना जाता है, और छठ पूजा का एक मुख्य उद्देश्य संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य भी है।
3. एक अन्य मान्यता के अनुसार, उन्हें इंद्र की पुत्री भी कहा जाता है, और इंद्र ने ही उनका विवाह कार्तिकेय से कराया था, जब कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बने थे। महाभारत में देवसेना को प्रजापति दक्ष की पुत्री बताया गया है, जबकि कुछ संस्कृत ग्रंथ उन्हें देवों के राजा इंद्र और उनकी पत्नी शची की पुत्री मानते हैं। स्कंद पुराण के तमिल संस्करण में, उन्हें भगवान विष्णु की पुत्री के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्हें बाद में इंद्र ने गोद लिया था और बाद में इंद्र ने उनकी सगाई कार्तिक से कर दी थी।
कंफ्यूजन:
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जब भगवान ने दुनिया बनाई, तो उन्होंने पुरुष और प्रकृति की द्वैतता भी बनाई। फिर प्रकृति को कई तत्वों में विभाजित किया गया, जिनमें से छठा भाग छठी/षष्ठी है… उन्हें ‘देवसेना कहा जाता है।” हालांकि जबकि छठी मैया को अक्सर सूर्य की सहचरी कहा जाता है, ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवसेना का उल्लेख कार्तिक की पत्नी के रूप में भी मिलता है।
रॉबर्ट एल. ब्राउन, अपनी पुस्तक ‘गणेश: स्टडीज ऑफ एन एशियन गॉड’ में, गणेश खंड से उद्धृत करते हैं कि कामदेव ने कार्तिक को ‘यौन विज्ञान का ज्ञान’ दिया; इसके बाद “ब्रह्मा ने वेदों का पाठ किया और सुंदर, मनमोहक, अच्छे स्वभाव वाली देसेना (जिसे विद्वान षष्ठी कहते थे) का कार्तिक से विवाह किया।”
  • उपर्युक्त मान्यताएं लोककथाओं और कुछ क्षेत्रीय ग्रंथों पर आधारित हैं।
  • स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्मांड पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख बहुत संक्षिप्त में मिलता है।
  • वहीं, उत्तर भारत में, भगवान कार्तिकेय को आमतौर पर ब्रह्मचारी और अविवाहित माना जाता है।
  • पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, छठी मैया, जिन्हें षष्ठी देवी या देवसेना कहा जाता है, भगवान कार्तिकेय की पत्नी हैं।
  • लोक आस्था और पर्व की परंपरा में, वह सूर्य की उपासना से जुड़ी हुई हैं, जहाँ उन्हें सूर्य की बहन या उनकी शक्ति के रूप में भी सम्मान दिया जाता है।
  • दोनों ही मान्यताएँ इस पर्व का हिस्सा हैं, इसलिए ये कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक है।
  • आप छठी मैया को संतान की रक्षक देवी (कार्तिकेय की पत्नी) और सूर्य देव से जुड़ी शक्ति (पर्व का आधार) के रूप में याद रख सकते हैं।
  • (साभार – वेब दुनिया)

पीरियड (मासिक धर्म) में छठ पूजा कैसे करें

पीरियड्स के दौरान छठ पूजा करना एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक सवाल है, और इसके बारे में अलग-अलग विचार हो सकते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि पीरियड्स के दौरान पूजा या धार्मिक अनुष्ठान नहीं करने चाहिए, क्योंकि इसे शारीरिक और मानसिक दृष्टिकोण से अस्थिर माना जाता है। जबकि कुछ लोग इसे सामान्य तौर पर करते हैं, बशर्ते वे साफ-सफाई का ध्यान रखें और अपनी स्थिति का ध्यान रखें। छठ पूजा एक अत्यंत पवित्र और कठिन व्रत है, जिसमें शुद्धता और स्वच्छता का विशेष महत्व होता है। मासिक धर्म/ पीरियड्स के दौरान छठ पूजा करने के संबंध में कई मान्यताएं और नियम हैं। आइए यहां जानते हैं…
1. व्रत जारी रखना
• अधिकांश पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अगर छठ पूजा के दौरान मासिक धर्म शुरू हो जाए, तो भी व्रत को नहीं छोड़ना चाहिए। चूंकि यह व्रत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला पारंपरिक व्रत माना जाता है, इसलिए इसे बीच में नहीं तोड़ना चाहिए।
• महिलाएं व्रत जारी रख सकती हैं, लेकिन उन्हें कुछ विशेष नियमों का पालन करना होता है।
2. पूजा और अर्घ्य के नियम
• पूजा सामग्री को स्पर्श न करना: मासिक धर्म के दौरान व्रत रखने वाली महिला को पूजा की किसी भी सामग्री (जैसे प्रसाद, अर्घ्य की टोकरी आदि) को सीधे छूने से बचना चाहिए।
• सहयोगी का चुनाव: इस स्थिति में, पूजा के कार्यों- जैसे प्रसाद बनाना, पूजा की सामग्री घाट तक ले जाना, अर्घ्य की तैयारी करना) के लिए परिवार के किसी अन्य सदस्य (पति, घर की अन्य महिला, या कोई सहयोगी को चुना जा सकता है। सहयोगी को भी शुद्धता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखना होता है।
• अर्घ्य देना: व्रती महिला स्वयं अर्घ्य देने के बजाय, सहयोगी के माध्यम से अर्घ्य दिलवा सकती हैं। महिला घाट पर परिवार के साथ जा सकती हैं, हाथ जोड़कर प्रार्थना कर सकती हैं, लेकिन विशेषकर मासिक धर्म के पहले 1-4 दिनों में सूर्य देव को सीधे अर्घ्य नहीं देना चाहिए।
• पांचवा दिन: कुछ मान्यताओं के अनुसार, यदि मासिक धर्म का पांचवा दिन हो, तो स्नान करके और बाल धोकर प्रसाद बनाने और भोग लगाने का कार्य सहयोगी ही कर सकती हैं।
3. स्वास्थ्य और सुविधा
• छठ व्रत शारीरिक रूप से बहुत कठिन होता है (36 घंटे का निर्जला उपवास)। यदि मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक कमजोरी, चक्कर आना या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं महसूस हों, तो शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत करें।
• डॉक्टरों की सलाह है कि इस दौरान निर्जला उपवास जैसी कठोरता से बचें, खासकर यदि स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो। यदि आप शारीरिक रूप से सक्षम न हों, तो मन और हृदय से भक्ति करें और केवल व्रत के नियमों, जैसे सात्विक भोजन और साफ-सफाई का पालन करें।
निष्कर्ष:
• व्रत न तोड़ें, लेकिन पूजा की सामग्री को न छूएं।
• अर्घ्य और प्रसाद के लिए परिवार में किसी सहयोगी की सहायता लें।
• घाट पर जाकर प्रार्थना कर सकती हैं, लेकिन मासिक धर्म के शुरूआती दिनों में सीधे अर्घ्य देने से बचें
• सबसे महत्वपूर्ण है मन में सच्ची श्रद्धा और भक्ति बनाए रखना।

(साभार – वेबदुनिया)

10 साल में प्रदूषण से 38 लाख मौतें, छोटे शहरों में भी हवा जहरीली

नयी दिल्ली । भारत में सांस लेना अब जानलेवा होता जा रहा है। स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से 2019 के बीच वायु प्रदूषण ने देश में 38 लाख लोगों की जान ली, जबकि छोटे और औद्योगिक शहर अब नए प्रदूषण हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहे हैं। इस बात का उल्लेख दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की पुस्तक सांसों का आपातकाल करते हुए चेतावनी दी गई है कि यह संकट अब महानगरों से निकलकर पूरे भारत की हवा को विषाक्त कर चुका है। कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट की रिसर्च बताती है कि 2009 से 2019 के दशक में भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें कुल मृत्यु दर का 25 प्रतिशत हैं। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सख्त मानक (5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) को आधार बनाया जाए तो यह संख्या अनुमानित रूप से 1.66 करोड़ मौतों तक जा सकती है। कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट का अध्ययन भारत के 655 जिलों में किया गया था, जिसमें सभी क्षेत्रों में पीएम 2.5 का स्तर मानक से ऊपर पाया गया। अध्ययन में कहा गया है कि भारत की पूरी आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहां पीएम 2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के मानकों से कहीं अधिक है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पीएम 2.5 के कण बेहद सूक्ष्म होते हैं, यहां तक कि बाल की मोटाई के मुकाबले 30 गुना पतले जो सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और रक्त प्रवाह तक पहुंच जाते हैं। हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि पर मौतों में 8.6% इजाफा दर्ज किया गया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार असम-मेघालय सीमा पर स्थित छोटा औद्योगिक नगर बर्नीहाट अब देश का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। यहां का सालाना पीएम 2.5 स्तर 133.4 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। दिल्ली स्थित क्लाइमेट-टेक स्टार्टअप रेस्पिरर लिविंग साइंसेज के चार वर्षीय अध्ययन (2021 – 2024) में पाया गया कि देश के 11 बड़े शहरों में पीएम 10 स्तर राष्ट्रीय सुरक्षा मानक 60 माइक्रोग्राम से कई गुना ज्यादा बना रहा। दिल्ली के आनंद विहार में यह स्तर 313.8 माइक्रोग्राम, जबकि पटना में 237.7 माइक्रोग्राम तक पहुंचा। रेस्पिरर के सीईओ रोनक सुतारिया ने कहा, अब यह समस्या केवल सर्दियों की नहीं रही। हम पूरे साल जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं। प्रदूषण घटाने में कोई स्थायी सुधार नहीं दिखता।

डूबतो सुरुज के जे पूजे इहे बाटे हमर बिहार

– सुषमा त्रिपाठी
बिहार के आत्मा बसेला छठ महापर्व में और हम हईं बिहारी। हमनी के इंहा मैं न चलेला, हम चलेला। गौर करे वाला बात ई ह कि हम शब्द बिहार में अहंकार के परिचय ना देवला बल्कि समूह, घर – परिवार अउरी समाज के परिचय देवेला। जहवां -जहवां बिहारी गइले…आपन समाज आपन करेजा में रखले…दुनिया के नजर में..अउरी अपने ही देस में हमनी के मजदूर कहल जाता। एगो भाषा के लेके कहियों पर आपन भाषा बोलवाए खातिर लोग आपन अहंकार में गरीब बिहारी के पीट के अपना के बड़का सेर बुझता…मगर भासा परेम के चीज ह….थोपे के न। कवनो भाषा अपना साहित्य से बढ़ेले, ओकरा प्रति जागरूकता से बढ़ेले, दूसरा के महत्व समझ के विनम्र होके साथ चलला से बढ़ेले। हम मान तनी कि भोजपुरी में अश्लील गीत से बदनाम करे वाला कलाकार बाड़े अउरी ओकरा से हमनी के माथा लाज से गड़ जाला लेकिन भोजपुरी खाली ओतने त न ह। छठ के मौका बा…बोल दीं कि शारदा सिन्हा के गीत सुन के कि राउर अंखियन से लोर न आ जाला। आज पूरा संसार में जइसे भोजपुरी लोग सुनतरे, ओइसहीं छठ पूजा भी होखता…हमनी के कवनो भासा बा संस्कृति के अपमान न करेलींजा, उ बात अलग बा कि रउरा सबके नजर में बाप – दादा के जमाने से राउर अर्थव्यवस्था के रीढ़ रहे वाला बिहारी बहिरागत अउरी वोट बैंक ही रह गइल। कभी छठ पूजा में देखब…जे सुरूज देव….भर संसार के उजियार करेलन…हमनीं के ओनकर पूजा करेलींजा। परकति देवी के छठां अंश हईं छठी मइया…हमनी के ओनकर पूजा करेलीं जा। हमनी के बिहारी हईं…साल भर परदेस में खट लेब जा लेकिन बरिस में एक बार त घरे जाहिं के बा…छठ के बहाने परिवार से मिलल हो जाला, माई-बाबू के देख ले लीं जा…इ चार दिन के चैन भी बहुत जगहा खटकेला।
छठ पूजा परिवार के एक राखे के मंगलकामना के पूजा ह..कवनो ऊंच -नीच न। लोक साहित्य पढ़ब त जानब कि छठी मइया सुरुज देव के बहिन हईं। जब जीवन देवे वाला जल के साधन मानके हमनीं के ओनका से गोहार लगाइलें त परिवार के आगे बढ़ाए के आसीरबाद मिलेला। हमनीं के इहां मइया स्त्री अउरी ममता के प्रतीक हई। परिवार के सही मतलब तब बूझब रउरा, जब छठ के गीत गहराई से सुनब। छठ के गीत में कुल अउरी परिवार के बात बा, मजबूत सम्बन्ध – आपसी सहयोग के बात बा। परिवार के मतलब अहजा पति-पत्नी अउर बच्चा भर न ह बल्कि एकरा के आगे बढ़के बा। पूरा परिवार छठ के तैयारी में शामिल होला। आज के एकल परिवार में जब आगे -पीछे केहु नइखे। बच्चन से बूझे अउर बतिवाले वाला केहू नइखे…तब इहे परिवार खड़ा होला। छठ ए परिवार के भावना के मजबूत करेके नाम ह..अवसर ह…जहाँ बच्चन से लेकर जवान अउरी बुढ़वन तक, सब के सब छठी माई के पूजा में आपन-आपन भूमिका निभावेला। अइसन कवनो बाध्यता नइखे कि खाली महिला ही इ बरत करिहें, मरद लोग भी करेला। परसादी बनाए में, घाट सजाए में, पूजा के सामान जुटाए में सबके भूमिका रहेला। गेहूं सुखाते – सुखाते बतरस में कब दुःख सूख गइल पते न चलेला। इ समाज रेगिस्तान में चलेला…छठ नीहन परब..एकरा में पोखर नीहन बा..जे पियास बुझावेला…टूटत करेजा के सम्भार लेला। दादा-दादी, नाना-नानी, भाई- बहिन, भउजी, चाचा -चाची, मउसा- मउसी, मामा-मामी, फुआ -फूफा, बच्चा सबके लेके परिवार बनेला…। समस्या कहवां नइखे लेकिन…उ समस्या में राह देखावे खातिर सबसे पहिले इहे लोग खड़ा होएला। बच्चन के हमनी के इहां अकेले न छोड़ल जाला। बड़का बाबूजी,चाचा, मामा कब बाप बन जाएले..पतो न चलेला। फूआ-चाची,मउसी, मामी कब महतारी नीहन अंकवारी में सब ताप हर लेली, बुझियो न पाइब…एहे परिवार ह…इहे परिवार ह। जब नइकी दुलहिन बियाह कइके ससुरारी आवेली…तब इहे परिवार ओनका साथ रहेला..ननद कब भउजाई खातिर अपने परिवार के सामने खड़ा हो जाएली…पता न चलेला। काहे कि ए घर में ननद ही बहिन के जगहा पर बाड़ी । दुलहिन भी जब बरत करेली तब समूचा कुल-परिवार के आपन आराधना में शामिल करेली -लिहिएं अरग हे मईया/ दिहीं आशीष हजार । पहिले पहिल हम कईनी/छठी मईया व्रत तोहर । करिहा क्षमा छठी मईया/ भूल-चूक गलती हमार ।
छठी मैया से संतान, स्वास्थ्य और परिवार की समृद्धि के कामना कइल जाला। प्रार्थना कवनो व्यक्ति विशेष खातिर ही न होवेला। परदेस जाकर काम करे वाला बबुआ खातिर महतारी पूजा करेलीं कि कइसहूं छठ पर बबुआ घरे आवस। छठ के गीत में बेटी के अउरी ओकर कल्याण के कामना कइल जाला — हम तोहसे पूछी बरतिया ए बरतिया से केकरा लागी, हम तोहसे पूछी बरतिया ए बरतिया से केकरा लागी ।। के करेलू छठ बरतिया से केकरा लागी, के करेलू छठ बरतिया से केकरा लागी ।। हमरो जे बेटी तोहन बेटिया से उनके लागी, हमरो जे बेटी तोहन बेटिया से उनके लागी ।। से करेली छठ बरतिया से उनके लागी, से करेली छठ बरतिया से उनके लागी ।।
खाली बेटी न बल्कि पढ़ल-लिखल दामाद भी बरती के चाहीं। -‘रुनकी-झुनकी बेटी मांगिला, पढ़ल पंडितवा दामाद…हो छठी मईया, तोहर महिमा अपरमपार’।
छठ के गीतों में देवर के चर्चा बा -कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय बहंगी लचकत जाय होई ना देवर जी कहरिया, बहंगी घाटे पहुंचाय बहंगी घाटे पहुंचाय ऊंहवे जे बारि छठि मैया बहंगी के उनके के जाय बहंगी उनका के जाय। शारदा सिन्हा के हई गीत सुनीं -हमरो सुन लीं पुकार/ससुरा में अईनी कईनी बरतिया/हिवआ जुड़ाई दीहिं पिया के पीरीतिया/अचल सुहाग दीह मईया, कईनी बरत तोहार/गोदिया भराई दीहीं धियवा अऊर पुतवा/अंचरा में भरी दीहीं ममता दुलरवा/ सूपवा चढ़ाईब छठी मैया, देहब अरघ तोहार/ सास-ससुर के रोगवा मिटईह/उनकर कयवा के कंचन बनईह/कंचन बनईह लऊके अन्हार छठी मईया/कर दीहिं घर ऊजियार/देवरा-ननदिया के दीहीं वरदनवा/परजन पुजन पुराई सपनवा
छठ खातिर कवनो पंडित -पुरोहित न चाहीं। परिवार से लेके आस- पड़ोस, गांव -जवार, सब परिवार हो जाला। घाट पर अनजान भी परिवार हो जाला। छठ सामूहिक, आपन बना लेवे के परब ह। बिहार के मैथिली में एगो गीत बा – ‘डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै, उग हो सुरुज देव/ अरघ केर बेर, हो पुजन केर बेर। मालिन बेटी फूल नेने ठाढ़ छै, उग हो सुरुज देव।।’ गीतों में पेड़-पौधे, फूल-पत्ती की विस्तार से चर्चा बा, ओनकर महातम के चर्चा बा। मसलन- ‘कोन जल पटेब मालिन, बेली-चमेली/ मालिन कोन जल पटेब अड़हुल फूल।।’ अइजा परम्परा बा, प्रकृति बा, सरजनहार बाड़े। अब त दुःख – पीड़ा मिटाए के गोहार बा – दिन-रात खटी-खटी पैसा कमाइला, सब कमाई करजा में जाय; हे छठी मइया बिहारे में दे दीं रोजगार।
दुःख के बीच अगर जीयल सीखे के बा त बिहार आईं। कम में गुजार करके कइसे कमर्ठ होके संतोष से सुख से जीयल जाला, इ सीखे के बा त कवनो परदेसी बिहारी के पास जाईं। सब तरह के बेइज्जती के बीच कइसे श्रमदान से लेके …सीमा पर सैनिक जीवनदान करेलन…इ देखे खातिर बिहार आईं। बिहार के नाम पर मजाक आसान ह। राम जी के भी सीता मइया खातिर बिहार के मिथिला में ही आइके पड़ल रहे। बाल्मीकि…लिखलेह तबे रउरा राम जी के जानतनी। बाकी अउरी का कहीं…काहे कि कृतज्ञता बिहार के रोम-रोम में बसल बा -डूबतो सुरुज के जे पूजे इहे बाटे हमर बिहार इहे बाटे हमर बिहार।

 

मशहूर अभिनेता सतीश शाह का निधन

मुम्बई। मशहूर हास्य अभिनेता सतीश शाह का शनिवार को निधन हो गया है। फिल्मकार अशोक पंडित ने इस बात की जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की। सतीश शाह ने करीब 4 दशकों तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम किया। इस दौरान उन्होंने कई हिट फिल्मों और टीवी सीरियल्स में अपनी अदाकारी से लोगों का दिल जीता। उनकी अदाकारी इतनी रियल होती थी कि उनके साथ काम करने वाले एक्टर शूटिंग करने की बजाय हंस-हंसकर लोटपोट हो जाया करते थे। ऐसा ही एक वाकया फिल्म ‘मैं हूं ना’ की शूटिंग के दौरान हुआ। दरअसल, एक सीन को फिल्माते समय उनकी एक्टिंग और कमाल की कॉमिक टाइमिंग देख शाहरुख खान की हंसी छूट गई थी, लेकिन सतीश शाह ने उसे शॉट खराब करने की कोशिश समझा और डायरेक्टर फराह खान से फिल्म छोड़ने की बात कह दी। मामला बिगड़ते देख शाहरुख खान आगे आए और उन्होंने सतीश शाह की गलतफहमी दूर की। यह किस्सा खुद उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में शेयर किया था। सतीश शाह ने बताया था कि फिल्म ‘मैं हूं ना’ के डायरेक्टर फराह खान ने उन्हें दो किरदार ऑफर किए थे। पहला था कॉलेज के प्रिंसिपल का और दूसरा था एक थूकने वाले प्रोफेसर का।
यह किरदार लेक्चर या बात करते समय थूक फेंकता था। सतीश को लगा कि ये रोल उनकी कॉमिक स्टाइल से मैच करेगा और वाकई ये उनके करियर का एक यादगार हिस्सा बन गया।
‘मैं हूं ना’ की शूटिंग शुरू हुई। सतीश ने मिरर के सामने उस लहजे में बोलने की प्रैक्टिस की, लेकिन सेट पर पहुंचे तो हालात उलट गए। पहले ही टेक में सतीश ने जब डायलॉग बोला, “क्लास, अटेंशन!” और ‘थूकने’ का ऐक्ट किया तो साथी कलाकार शाहरुख खान, सुष्मिता सेन समेत वहां मौजूद सभी लोग हंस पड़े।
सतीश को लगा कि उनसे शॉट गलत हो गया, लेकिन फराह खान ने कट न कहकर कहा- ‘परफेक्ट! फिर से।” दूसरे टेक में फिर वही—हंसी का दौर।
8 टेक तक ऐसे ही चलता रहा, कभी शाहरुख की आंखों में आंसू आ जाते, कभी सुष्मिता कंधे हिला-हिलाकर हंसतीं। यह देख सतीश का चेहरा लाल हो गया। वे इतने परेशान हो गए कि मन बना लिया कि अब वह यह फिल्म छोड़ देंगे, सब उनका मजाक उड़ा रहे हैं।
सतीश गुस्से में फराह खान के पास गए और बोले, “ये क्या हो रहा है? अगर ऐसे ही चलेगा तो मैं जा रहा हूं।” तभी शाहरुख ने बीच में कूदकर कहा, “सर, रुकिए! समस्या ये है कि आपकी एक्टिंग इतनी रियल है कि हम अपनी हंसी रोक नहीं पा रहे, लेकिन सीन तो पूरा करना है।”
फिर टीम ने इसे शूट करने का आइडिया निकाला। सतीश शाह के शॉट्स अलग से फिल्माए गए और बाकी कलाकारों के अलग। आखिरी में जब एडिटिंग हुई, तो सीन परफेक्ट लग रहा था। जब फिल्म रिलीज हुई, तो दर्शक ठहाकों से लोट-पोट हो गए। सतीश शाह के इस किरदार की आज भी लोग नकल करते दिखाई देते हैं।

जिन्दगी का स्वाद बता गये अबकी बार मोदी सरकार का नारा देने वाले पीयूष पांडे

मुम्बई । विज्ञापन जगत की सादगी भरी भाषा को आम जनमानस तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध एड गुरु पीयूष पांडे अब हमारे बीच नहीं रहे। 24 अक्तूबर को 70 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। चार दशकों से अधिक समय तक उन्होंने भारतीय विज्ञापन उद्योग को नई दिशा दी। उनके बनाए विज्ञापनों के साथ एक पूरी पीढ़ी बड़ी हुई। चाहे वह कैडबरी का भावनाओं से भरा विज्ञापन हो, फेविकोल का मजबूत जोड़ दिखाने वाला दृश्य या लूना मोपेड की यादें ताजा करने वाली झलक, हर एक रचना ने दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी। दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद पीयूष पांडे ने पेशेवर जीवन की शुरुआत एक चाय कंपनी में बतौर टी टेस्टर की थी, जहां उनके मित्र और क्रिकेटर अरुण लाल पहले से कार्यरत थे। वर्ष 1982 में उन्होंने ओगिल्वी नामक विज्ञापन एजेंसी में ग्राहक सेवा कार्यकारी के रूप में कदम रखा। रचनात्मकता और भाषा पर असाधारण पकड़ के दम पर वे धीरे-धीरे ऊंचाइयां छूते गए और अंततः कंपनी के मुख्य रचनात्मक अधिकारी और कार्यकारी अध्यक्ष बने। राजस्थान के जयपुर में जन्मे पीयूष पांडे ऐसे परिवार से थे जहां साहित्य जीवन का हिस्सा था। उनके माता-पिता दोनों ही हिंदी साहित्य के शिक्षक थे। घर का यही साहित्यिक वातावरण और शुद्ध हिंदी का अभ्यास उनके भीतर भाषा के प्रति गहरी समझ लेकर आया। बाद के वर्षों में यही भाषा उनके विज्ञापनों की आत्मा बनी।  उनकी लेखनी जितनी प्रभावशाली थी, उनकी आवाज भी उतनी ही सशक्त थी। उनकी बहन, जानी-मानी गायिका इला अरुण, जयपुर में विविध भारती के लिए रेडियो जिंगल्स बनाया करती थीं, जिनमें पीयूष अपनी आवाज दिया करते थे और उस वक्त उन्हें इसके बदले मात्र 50 रुपये मिलते थे। जब भारतीय विज्ञापन पश्चिमी शैली की नकल में उलझे हुए थे, तब पीयूष पांडे ने स्थानीयता और आम आदमी की भाषा को केंद्र में रखा। उन्होंने छोटे शहरों की संवेदनाओं, आम जन के हास्य और सरलता को विज्ञापनों में पिरोया। उनके बनाए कई विज्ञापन लोगों की जबान पर चढ़ गए, जैसे-

  • “कुछ खास है” (कैडबरी)
  • “मजबूत जोड़” (फेविकोल)
  • “हर घर कुछ कहता है” (एशियन पेंट्स)
  • “दो बूंद जिंदगी की” (पोलियो जागरूकता अभियान)

सिर्फ विज्ञापन ही नहीं, फिल्मों में भी पीयूष पांडे ने अपनी छाप छोड़ी। वर्ष 2013 में रिलीज हुई सुजीत सरकार की फिल्म “मद्रास कैफे” में उन्होंने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म 80 के दशक के अंत में श्रीलंका के गृहयुद्ध और राजीव गांधी की हत्या की पृष्ठभूमि पर आधारित थी।  इसके अलावा, उन्होंने अपने भाई प्रसून पांडे के साथ मिलकर “भोपाल एक्सप्रेस” की पटकथा भी लिखी थी। महेश मथाई निर्देशित यह फिल्म 1984 की भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित थी, जिसमें नसीरुद्दीन शाह, के.के. मेनन, जीनत अमान, विजय राज और नेत्रा रघुरामन जैसे कलाकारों ने यादगार अभिनय किया।

किसान ने रोजाना 10 रुपये बचाए, दीपावली पर बेटी को दिलाई स्कूटी

रायपुर । छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के केसरापाठ गांव के छोटे किसान और अंडा-चना की दुकान चलाने वाले बजरंग राम भगत ने अपनी मेहनत और बचत से इस दीपावली पर अपने परिवार को खुशी से भर दिया। उनकी यह सादगी और समर्पण की कहानी अब सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही है।दरअसल, बजरंग राम भगत ने पिछले छह से सात महीनों तक हर दिन 10 रुपए बचाकर रकम इकट्ठा की। जब सिक्कों में लगभग 40 हजार रुपए जमा हो गए, तो उन्होंने इसमें 60 हजार रुपए नकद जोड़कर दीपावली के दिन अपनी बेटी चम्पा भगत के साथ शहर के देवनारायण होंडा शोरूम पहुंचकर होंडा एक्टिवा स्कूटी (98 हजार 700 ऑन रोड) खरीदी। चम्पा ने बताया कि पिताजी रोज 10 रुपए बचाते थे ताकि घर के लिए कुछ बड़ा खरीद सकें। हमने मिलकर सोचा कि स्कूटी लेने से 18 किलोमीटर दूर शहर से सामान लाने-ले जाने में आसानी होगी और परिवार के सभी सदस्य इसका उपयोग कर सकेंगे।शोरूम मालिक आनंद गुप्ता ने बताया कि बजरंग राम की ईमानदार मेहनत और लगन देखकर स्टाफ ने पूरे सम्मान के साथ सिक्के गिने और उन्हें स्कूटी की चाबी सौंपी। कंपनी की स्कीम के तहत उन्हें लॉटरी स्क्रैच में मिक्सर ग्राइंडर भी उपहार में मिला। बजरंग राम ने कहा कि मुझे कर्ज लेना पसंद नहीं। मैं जो कमाता हूं, उसी में बचत करता हूं। यही सोचकर मैंने नकद में स्कूटी खरीदी। यह हमारे परिवार के लिए दीपावली का सबसे बड़ा तोहफा है। चम्पा ने बताया कि उनके परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना, किसान सम्मान निधि और महतारी वंदन योजना का लाभ मिला है। घर में पहले से बुआ द्वारा दी गई एक मोटरसाइकिल थी, लेकिन स्कूटी से उसकी पढ़ाई और घर-परिवार के कामकाज में अब काफी सुविधा होगी।

दीपावली पर देश में हुई 6.05 लाख करोड़ की रिकॉर्ड बिक्री

नयी दिल्ली । कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने अपनी रिसर्च शाखा ‘कैट रिसर्च एंड ट्रेड डेवलपमेंट सोसाइटी’ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के आधार पर देशभर के 60 प्रमुख वितरण केंद्रों, जिनमें सभी राज्यों की राजधानियां एवं टियर-2 और टियर-3 शहर शामिल हैं, पर आधारित ‘विस्तृत दीपावली त्योहार बिक्री 2025’ पर रिसर्च रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष दीपावली पर देशभर में कुल बिक्री 6.05 लाख करोड़ रुपये तक पहुंची है। इसमें 5.40 लाख करोड़ रुपये का वस्तु व्यापार और 65 हजार करोड़ रुपये का सेवा व्यापार शामिल है। ये अब तक का देश के व्यापार इतिहास का सबसे बड़ा त्योहारी कारोबार है। दिल्ली के चांदनी चौक के सांसद एवं कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने बताया कि रिपोर्ट यह दर्शाती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीएसटी दरों में राहत और स्वदेशी अपनाने के ‘मजबूत ब्रांड एंबेसडर’ के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने व्यापारियों और उपभोक्ताओं दोनों को अभूतपूर्व रूप से प्रेरित किया है। प्रधानमंत्री मोदी का ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘स्वदेशी दीपावली’ का आह्वान जनता के बीच गहराई से गूंजा। 87% उपभोक्ताओं ने भारतीय वस्तुओं को विदेशी वस्तुओं के मुकाबले प्राथमिकता दी, जिससे चीनी उत्पादों की मांग में तेज गिरावट दर्ज की गई। व्यापारियों ने बताया कि भारतीय निर्मित वस्तुओं की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में 25% बढ़ी है। खंडेलवाल के अनुसार, दीपावली 2025 के आंकड़े पिछले वर्ष (₹4.25 लाख करोड़) की तुलना में 25% की वृद्धि दर्शाते हैं। मुख्य रूप से गैर-कॉरपोरेट एवं पारंपरिक बाजारों ने कुल व्यापार में 85% योगदान दिया, जो भारतीय खुदरा बाजारों और छोटे व्यापारियों की शानदार वापसी को रेखांकित करता है। कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया ने बताया कि दीपावली की बिक्री में किराना एवं एफएमसीजी 12%, सोना–चाँदी 10%, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इलेक्ट्रिकल्स 8%, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स 7%, रेडीमेड परिधान 7%, गिफ्ट आइटम 7%, होम डेकोर 5%, फर्निशिंग एवं फर्नीचर 5%, मिठाई एवं नमकीन 5%, वस्त्र 4%, पूजन सामग्री 3%, फल एवं मेवे 3%, बेकरी एवं कन्फेक्शनरी 3%, फुटवियर 2%, तथा अन्य विविध वस्तुएं 19% शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सेवा क्षेत्र में भी भारी वृद्धि दर्ज हुई और इसमें ₹65,000 करोड़ का व्यापार हुआ। पैकेजिंग, हॉस्पिटैलिटी, टैक्सी सेवाएं, ट्रैवल, इवेंट मैनेजमेंट, टेंट एवं सजावट, मैनपावर और डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में भी अभूतपूर्व गतिविधि रही, जिससे त्योहारी अर्थव्यवस्था के दायरे का विस्तार हुआ। खंडेलवाल ने कहा, जीएसटी दरों का तर्कसंगठन, उपभोक्ता मांग को बढ़ावा देने में बेहद प्रभावी सिद्ध हुआ है। सर्वे में शामिल 72% व्यापारियों ने माना कि उनके अधिक बिक्री का सीधा कारण जीएसटी दरों में कटौती रही है। उपभोक्ताओं ने भी मूल्य स्थिरता से संतुष्टि व्यक्त की, जिससे त्योहारी खर्च में निरंतरता बनी रही। दोनों नेताओं ने कहा कि व्यापारी और उपभोक्ता भावना पिछले एक दशक के उच्चतम स्तर पर हैं।ट्रेडर कॉन्फिडेंस इंडेक्स (टीसीआई): 8.6/10 तथा कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स (सीसीआई): 8.4/10 के स्तर पर है। उनका मानना है कि उपभोग में यह वृद्धि दीर्घकालिक रूप से स्थायी है, जो नियंत्रित मुद्रास्फीति, बढ़ती आय, और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर विश्वास से प्रेरित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह उत्साहपूर्ण स्थिति सर्दियों, विवाह सीजन और जनवरी के मध्य से शुरू होने वाले अगले त्योहारी दौर तक जारी रहेगी। रोजगार एवं आर्थिक प्रभाव पर बोलते हुए खंडेलवाल ने बताया कि गैर-कारपोरेट एवं गैर-कृषि क्षेत्र, जिसमें 9 करोड़ छोटे व्यापारी और लाखों विनिर्माण इकाइयाँ शामिल हैं, आज भी भारत की आर्थिक वृद्धि का प्रमुख इंजन हैं। दिवाली 2025 के व्यापार से 50 लाख अस्थायी रोजगार सृजित हुए हैं। ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों ने कुल व्यापार में 28% योगदान दिया, जो महानगरों से परे आर्थिक सशक्तिकरण का प्रमाण है।
खंडेलवाल ने कहा कि रिपोर्ट के आधार पर सरकार को कई सुझाव दिए गए हैं, जिसमें छोटे व्यापारियों एवं निर्माताओं के लिए जीएसटी प्रक्रियाओं को सरल किया जाए। क्रेडिट तक पहुंच आसान की जाए। टियर 2 एवं टियर 3 शहरों में लॉजिस्टिक्स एवं वेयरहाउसिंग हब विकसित किए जाएँ। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देकर बाजारों का डिजिटलीकरण किया जाए। इसके लिए बैंक कमीशन को समाप्त किया जाए। शहरी बाजारों में यातायात, पार्किंग और अतिक्रमण प्रबंधन को सुदृढ़ किया जाए। ‘स्वदेशी’ अभियान को सरकार और व्यापार जगत के संयुक्त प्रयास से निरंतर प्रोत्साहित किया जाए।

याद रहेंगे अंग्रेजों के जमाने के जेलर असरानी

-84 साल की उम्र में निधन
मुम्बई । बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और निर्देशक असरानी का सोमवार शाम निधन हो गया। 84 वर्षीय असरानी का निधन मुंबई के आरोग्य निधि अस्पताल में हुआ। सांताक्रूज के शास्त्री नगर श्मशान घाट पर परिवार और करीबी दोस्तों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। यह खबर पूरे फिल्म उद्योग के लिए गहरा सदमा लेकर आई। असरानी ने निधन से कुछ ही घंटे पहले अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर दिवाली 2025 की शुभकामनाएं शेयर की थीं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने मौत से कुछ समय पहले अपनी पत्नी मंजू असरानी से कहा था कि उनकी मृत्यु पर कोई शोर-शराबा न किया जाए। इसी कारण परिवार ने बिना किसी औपचारिक घोषणा के चुपचाप उनका अंतिम संस्कार कर दिया। असरानी का फिल्मी सफर 1960 के दशक में शुरू हुआ था और उन्होंने अपने करियर में 350 से अधिक फिल्मों में काम किया। कॉमेडी और गंभीर दोनों ही भूमिकाओं में असरानी ने अपनी अलग छाप छोड़ी। 1970 के दशक में वे बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय चरित्र अभिनेताओं में गिने जाते थे। उन्होंने ‘मेरे अपने’, ‘कोशिश’, ‘बावर्ची’, ‘परिचय’, ‘अभिमान’, ‘चुपके-चुपके’, ‘छोटी सी बात’, और ‘रफू चक्कर’ जैसी यादगार फिल्मों में शानदार प्रदर्शन किया। उनकी ‘शोले’ में निभाई गई सनकी जेलर की भूमिका आज भी दर्शकों की यादों में ताजा है। इसके अलावा वे बाद के वर्षों में ‘भूल भुलैया’, ‘धमाल’, ‘ऑल द बेस्ट’, ‘वेलकम’, ‘आर… राजकुमार’ और ‘बंटी और बबली 2’ जैसी हिट फिल्मों में भी नजर आए। 1 जनवरी 1941 को जयपुर के एक सिंधी हिंदू परिवार में जन्मे असरानी ने अभिनय की शुरुआत थिएटर से की थी। उन्होंने 1960 से 1962 तक ललित कला भवन, ठक्कर से अभिनय की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे मुंबई आ गए, जहां उनकी मुलाकात किशोर साहू और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे फिल्मकारों से हुई। उनके सुझाव पर असरानी ने प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली और फिल्मों में कदम रखा। हिंदी फिल्मों के अलावा असरानी ने गुजराती सिनेमा में भी अपना योगदान दिया। वे न केवल एक बेहतरीन अभिनेता थे, बल्कि निर्देशन के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई।

दीपावली के साथ सादगी से भरा हो सौंदर्य

दीपावली का त्यौहार रंग, रोशनी और रॉयल लुक्स का संगम होता है, लेकिन अगर आप इस बार कुछ हल्का, सटल और क्लासी पहनना चाहती हैं, तो मिनिमल लुक आपके लिए परफेक्ट ऑप्शन है। मिनिमलिस्टिक फैशन का मतलब है, कम में भी ज्यादा निखरना। इसमें ओवरड्रेसिंग या हैवी ज्वेलरी की जरूरत नहीं होती, बल्कि सिंपल आउटफिट्स, न्यूट्रल मेकअप और हल्की एक्सेसरीज से आप बेहद ग्रेसफुल दिख सकती हैं।
मिनिमल लुक त्योहारों पर आजकल बहुत पसंद किया जा रहा है। अगर आप भी दिवाली पर हल्के लेकिन खूबसूरत अंदाज में तैयार होना चाहती हैं, तो नीचे बताए गए टिप्स को जरूर फॉलो करें। ये न सिर्फ आपको स्टाइलिश बनाएंगे बल्कि आपकी पर्सनालिटी को भी नया आयाम देंगे।
मिनिमल लुक के लिए सबसे जरूरी है रंगों का चयन। पेस्टल शेड्स जैसे बेबी पिंक, मिंट ग्रीन, लाइट लैवेंडर, या व्हाइट आपको क्लासी और शांति भरा लुक देंगे। ये रंग बहुत आकर्षक लगते हैं और त्योहार के मौके पर एलिगेंस बनाए रखते हैं।
भारी एंब्रॉयडरी की जगह चिकनकारी कुर्ता, हैंडब्लॉक प्रिंटेड सूट या साटन/सिल्क की प्लेन साड़ी चुनें। कपड़ा भले ही सादा हो, लेकिन अगर फिटिंग और स्टाइल सही हो, तो आप बिना ओवरड्रेस हुए भी बेहद स्टाइलिश दिखेंगी। ज्यादा हैवी कपड़े आपके मिनिमल लुक को खराब कर सकते हैं।
मिनिमल लुक के लिए भारी नेकलेस या फुल सेट की जगह सिर्फ एक स्टेटमेंट ईयररिंग या छोटा सा पेंडेंट काफी है। मोती, मीनाकारी या स्टोन ज्वेलरी इसमें बेस्ट रहती है। आप चाहें तो हल्का गोल्ड का सेट भी कैरी कर सकती हैं। बस ये ज्यादा ओवर न हो।
दिवाली पूजा के लिए मेकअप में लाइट फाउंडेशन, न्यूड लिपस्टिक, थोड़ा हाईलाइटर और काजल लगाकर ग्लोइंग और नेचुरल लुक पाएं। इस तरह का लुक चेहरे पर ताजगी और आत्मविश्वास लाता है।