पटना : डाक विभाग अब 0.5 से 15 वॉट तक का एलईडी बल्ब उपलब्ध कराएगा। साथ ही ट्यूब लाइट भी डाकघर से लोग खरीद सकेंगे। इसकी कीमत बाजार से कम होगी। एलईडी बल्ब डाक विभाग पहले से ही उपलब्ध करा रहा है। हालांकि, विभाग अब तक सिर्फ नौ वॉट के एलईडी बल्ब की ही आपूर्ति करता था। अब इसका दायरा बढ़ाया गया है। बल्ब के साथ ही 10 और 20 वॉट की ट्यूबलाइट भी डाक विभाग उपलब्ध कराएगा। इसके लिए सी एंड एस इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड और डाक विभाग के बीच समझौता प्रस्तावित है।
डाक विभाग की ओर से एक और पहल की गई है। विभाग अब जमीन का नक्शा भी लोगों के घर तक पहुंचाएगा। इसके लिए डाक विभाग का बिहार परिमंडल बिहार सरकार के भू अभिलेख एवं परिमाप विभाग से एक समझौता करने जा रहा है। इसके बाद जमीन का नक्शा लोगों के घर तक पहुंचने लगेगा। बता दें कि जमीन का नक्शा पाने के लिए लोग परेशान रहते हैं। अधिकांश लोगों के पास अपनी ही जमीन का नक्शा नहीं हैै।
डाक विभाग की ओर से बीते साल 15 दिसंबर को डाकघरों में जनसेवा केंद्र की शुरुआत की गई थी। फिलहाल बिहार में कुल 334 डाकघरों में जनसेवा केंद्र काम कर रहे हैं। इसके तहत कुल 110 तरह की सेवाएं लोगों को दी जाती हैं। अधिकृत सूत्रों ने कहा है कि अब बिहार के सभी डाकघरों में जनसेवा केंद्र खोलने की योजना तैयार की गई है। शीघ्र इस दिशा में कार्य में तेजी लाई गई है। नई सुविधा से लोग डाकघरों में कम पैसे से एलईडी बल्ब और ट्यूब लाइट खरीद सकते हैं। बताते चलें कि डाक विभाग पहले से ही एलईडी बल्ब उपलब्ध करा रहा है। हालांकि, विभाग अब तक सिर्फ नौ वॉट के एलईडी बल्ब की ही आपूर्ति करता था। अब इसका दायरा बढ़ाया गया है।
लंदन : ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने बुधवार को यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ ब्रेक्जिट व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए। उससे पहले संसद सदस्यों ने इससे संबंधित प्रस्ताव के समर्थन में भारी मतदान किया। प्रस्ताव को 73 के मुकाबले 521 मतों से मंजूरी मिली।
जॉनसन ने कहा, जिस संधि पर मैंने अभी हस्ताक्षर किए हैं, यह समापन नहीं है, बल्कि नई शुरुआत है और मेरे ख्याल से ब्रिटेन और ईयू में हमारे दोस्तों और साझेदारों के बीच शानदार रिश्तों की शुरूआत होगी।
यूरोपीय परिषद अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस दस्तावेज पर बुधवार सुबह हस्ताक्षर किए जिसके बाद दस्तावेज को रॉयल एयर फोर्स (आरएएफ) के विमान से लंदन लाया गया।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग होने के तहत हुए मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) को संसदीय मंजूरी दिलाने के लिए क्रिसमस की छुट्टियों के बाद बुधवार को संसद का सत्र बुलाया था, ताकि अगले साल एक जनवरी को ईयू से भविष्य में होने वाले संबंधों के लिए प्रभावी हो रहा कानून संसदीय मंजूरी के साथ सभी बाधाएं पार कर जाए।
ब्रेक्जिट के लिए 31 दिसंबर तक की समय सीमा से महज कुछ समय पहले बनी सहमति के बाद 80 पन्नों का विधेयक संसद में पेश किया गया। इस पर पहले हाउस ऑफ कॉमन्स में सांसदों ने चर्चा की और उसके बाद विधेयक पर हाउस ऑफ लार्ड में चर्चा हुई।
जॉनसन ने सांसदों से ‘ऐतिहासिक विधेयक’ का समर्थन करने का आह्वान किया था। उन्होंने कहा कि यह ब्रिटेन की यूरोपीय पड़ोसियों के साथ दरार नहीं बल्कि समाधान है। दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक को ब्रिटेन की रानी के पास भेजा जाएगा ताकि उनकी मंजूरी मिल सके।
नयी दिल्ली : खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवाईआईसी ) ने अपना ई-कॉमर्स पोर्टल लॉन्च किया है। इस पोर्टल को eKhadiIndia.com नाम दिया गया है। इस पोर्टल पर अपैरल से लेकर होम डेकोर से जुड़े 500 से अधिक कैटेगरी में 50 हजार से ज्यादा उत्पाद उपलब्ध हैं। केवाईआईसी के चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना का कहना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेजी लाने और आत्मनिर्भर बनने के लिए यह अपने प्रकार का पहला सरकारी ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म है। सक्सेना ने कहा कि पिछले कुछ सालों में खादी एवं ग्रामोद्योग इंडस्ट्रीज के उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है। अकेले 2018-19 में खादी एवं ग्रामोद्योग इंडस्ट्री के उत्पादों की बिक्री में 25% का उछाल रहा है। केवाईआईसी के अध्यक्ष ने बताया कि इस ई-कॉमर्स वेबसाइट का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक खादी इंडिया उत्पादों को नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध कराना है। पोर्टल ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करने के साथ लोगों के घरों तक उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करेगा। इस पोर्टल पर अपैरल, किराने का सामान, कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट, होम डेकोर प्रोडक्ट, हेल्थ एंड वैलनेस प्रोडक्ट, गिफ्ट जैसे हजारों उत्पाद उपलब्ध हैं। प्राकृतिक और स्थानीय उत्पादों के प्रति नई पीढ़ी की बढ़ती रुचि को ध्यान में रखते हुए केवाईआईसी भारत के लोकप्रिय ब्रांड खादी के ई-कॉमर्स पोर्टल के माध्यम से इस पीढ़ी तक पहुंचने के लिए पूरी तरह से तैयार है। यह पोर्टल उन युवाओं के लिए भी एक बेहतरीन सुविधा है, जो बाजार जाकर खरीदारी करने के बजाय ऑनलाइन शॉपिंग करना ज्यादा पसंद करते हैं। केवाईआईसी का कहना है कि यह ई-कॉमर्स पोर्टल वेबसाइट और मोबाइल ऐप दोनों रूप में उपलब्ध हैं। यहां डिजिटल तरीके से भुगतान किया जा सकता है। ग्राहकों के लिए सुविधा केंद्र और रिफंड पॉलिसी की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। इस पोर्टल पर ग्राहकों के लिए असली खादी ट्रेड मार्क वाले उत्पाद उपलब्ध होंगे।
कोलकाता : 2021 का नई आशा के साथ अभिनंदन करते हुए सात दिवसीय हिंदी मेला का भारतीय भाषा परिषद में समापन हुआ। हिंदी मेला का यह 26वां वर्ष था। ऑनलाइन पर कार्यक्रम की वजह से इस बार सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन का अभियान राष्ट्रीय स्तर पर चला है। इसमें श्रीलंका, मारीशस, नीदरलैंड के विद्वान भी जुड़े। दो हजार से अधिक युवाओं तथा विद्यार्थियों ने ऑनलाइन पर विभिन्न सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भाग लिया।
समापन समारोह में माधव शुक्ल नाट्य सम्मान से पुरस्कृत पटना के रंगकर्मी अनीस शुक्ल ने कहा कि माधव शुक्ल ने कलकत्ता में हिंदी नाटक की शुरुआत की थी। इस पुरस्कार से मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। हमें नाटक की परंपरा को मिटने नहीं देना है। इस साल का युगल किशोर सुकुल पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करनेवाले रावेल पुष्प ने कहा कि मैंने खोजी पत्रकारिता में काम करके उपेक्षित घटनाओं को सामने लाने की कोशिश की है। डॉ. राजेश मिश्र और अनिता राय ने अभिनंदन पत्र पढ़ा।
इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार और भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने ऑनलाइन माध्यम पर शुभकामना संदेश देते हुए कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सांस्कृतिक जागरण का जो आह्वान किया था हिंदी मेला उसका निर्वाह कर रहा है। यह युवाओं और विद्यार्थियों का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच बन गया है। मिशन के अध्यक्ष डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि हम एक जीवन और रचना-विरोधी समय में हैं। हिंदी मेला संकट के दौर में जीवन और रचनात्मकता के पक्ष में है और मानवता का संदेश है। इसने नई पीढ़ी के लिए संभावनाओं का द्वार खोला है।
समापन समारोह में उपस्थित यूको बैंक के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अतुल कुमार गोयल ने कहा कि कोरोना संकट के समय साहस से हिंदी मेला का आयोजन करना और इसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देना एक बड़ी घटना है। उन्होंने नव वर्ष की शुभकामनाएँ देते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार में बैंक की भूमिका का उल्लेख किया। महाप्रबंधक श्री नरेश कुमार ने कहा कि हिंदी मेला कोलकाता का एक प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव है जिसमें नई पीढ़ी को प्रोत्साहन मिलता है। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के संयुक्त महासचिव प्रो.संजय जायसवाल ने कहा कि कोरोना संकट के दौर में हिंदी मेला का आयोजन हमारे संस्कृतिक कर्मियों की दक्षता और हिंदी के प्रति समर्पण के कारण संभव हुआ। समापन समारोह में विद्यार्थियों और युवाओं ने हिंदी कविता पर आधारित भाव नृत्य, काव्य आवृत्ति तथा काव्य संगीत प्रस्तुत किया। श्री रामनिवास द्विवेदी ने कहा कि इस बार हिंदी मेला के सङ्गल आयोजन ने साबित कर दिया कि यह देश को समर्पित एक अनंत सांस्कृतिक अभियान है।
क्या आप जानते हैं कि मध्य कोलकाता की एक गहमा – गहमी से भरी सड़क की जगह कभी नहर बहती थी और कुछ दूर के बाद आदि गंगा में समाहित होती थी और यह इलाका सुनसान था। आज जिस बऊबाजार फिरंगी काली मंदिर के दर्शन करने दूर – दूर से लोग आते हैं, वह अपने मूल रूप में दरअसल एक शिव मंदिर है और यह 500 वर्ष से अधिक पुराना है।
जी हाँ, कोलकाता सेंट्रल मेट्रो स्टेशन के निकट माँ फिरंगी काली मंदिर की पहचान एक पुर्तगीज से जुड़ी है और वह व्यक्ति ऐसा जिसने अलग धर्म से होने के बावजूद हिन्दू धर्म को गहनता से समझा…माँ काली का ऐसा भक्त कि उसकी भक्ति रूढ़िवादी समाज को खटकने लगी और कवि ऐसा कि कवियों पर को टक्कर दे डाली। हम बात कर रहे हैं हेंसमेन एन्थनी यानी एन्थनी फिरंगी की। इस मंदिर का नाम इनसे ही जुड़ा है जो मूल रूप से फरासडांगा यानी आज के चन्दननगर में रहते थे। कहते हैं कि इसी मंदिर प्रांगण में माँ काली की भक्ति में कई गीत उन्होंने रचे।
उत्तम कुमार ने एंथनी फिरंगी की भूमिका निभायी थी
यही वहीं फिरंगी हैं जिन पर जातिश्वर नामक फिल्म बनी जिसने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। हाल ही में अभिनेता प्रसेनजीत मंदिर में आए भी थे। इसके पहले 60 के दशक में भी इन पर फिल्म बनी जिसमें उत्तम कुमार ने मुख्य भूमिका निभायीय़ किवदंती है कि मां काली ने उनको यहां पर प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया था। आपको यह जानकर भी आश्चर्य है कि श्री सिद्धेश्वरी काली मंदिर के नाम से प्रख्यात धार्मिक स्थल में पहले शिव की पूजा होती थी। दरअसल, यह मूल रूप में शिव मंदिर ही है और मां काली की छोटी प्रतिमा बहुत बाद में स्थापित हुई। मंदिर के पुरोहित सपन कुमार भट्टाचार्य के अनुसार शिव मंदिर एक अति प्राचीन वृक्ष के सामने था और यहां नहर बहती थी और थोड़ी दूर आगे जाकर आदि गंगा में समाहित हो जाया करती थी। यह वृक्ष शिवलिंग जितना ही पुराना है। वृक्ष की डाल को गौर से देखने पर लगता है कि यहां भगवान शिव की आकृति है। मंदिर के निकट एंथनी फिरंगी के मामा का घर था और वे यहां से आया – जाया करते थे। सौदामिनी देवी नामक हिंदू विधवा महिला से विवाह करने वाले फिरंगी मां काली से काफी प्रभावित थे और इस मंदिर में गाया भी करते थे। कहते हैं कि एंथनी फिरंगी ने दुर्गापूजा के आयोजन की भी तैयारी की थी मगर यह बात तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को इतनी नागवार गुजरी कि पूजा को तो नष्ट किया ही और फिल्म में जो दिखाया गया है, सच कितना है क्या है..पता नहीं पर कहते हैं कि सौदामिनी देवी को भी फिरंगी से विवाह करने के अपराध में जला दिया गया था…पर इस बात की पुष्टि हम नहीं कर सकते क्योंकि कई जगहों पर यह भी लिखा मिलता है कि एंथनी फिरंगी और सौदामिनी ने सामान्य जीवन जीया…मगर विरोध तो झेलना पड़ा होगा और कठिनाई भी हुई होगी…इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता मगर इतिहास तो इतिहास है, हम आज की बात करते हैं।
कहते हैं कि शिवलिंग और माँ की प्रतिमा के पीछे खड़ा पेड़ 500 साल पुराने हैं
कहा जाता है कि एंथनी फिरंगी ने जातिगत व धर्मगत बंधनों के कारण मां काली की प्रतिमा श्रीमंत डोम के माध्यम से स्थापित की। मंदिर की देखरेख का जिम्मा 1882 में हुगली जिले के पोलबा इलाके के मूल निवासी शशिभूषण बंद्योपाध्याय ने उठाया और इसके सदस्यों के नाम मंदिर की फर्श पर अंकित हैं। शशिभूषण बंद्योपाध्याय के वंशज सोमनाथ बंद्योपाध्याय आज मंदिर का संरक्षण कर रहा है। यहां फल, मिष्ठान चढ़ाने और हवन करने की परंपरा है। भट्टाचार्य के मुताबिक यहां पर पंचमंदिर वेदी पहले से ही स्थापित है। शशिभूषण की पत्नी यहां पर भगवान शिव की पूजा करने आती थीं कहा जाता है कि यहां स्थित शिवलिंग 521 साल पुराना है। भगवान शिव के बाद यहां मां शीतला, मां मनसा और मां काली की छोटी प्रतिमा थी। 1947 में मंदिर में मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की गयी और 4 फरवरी 1987 को कंक्रीट से निर्मित मां काली की प्रतिमा स्थापित हुई। मंदिर में वह शिवलिंग आज भी है और साथ ही है माँ दुर्गा, शीतला, मनसा, नारायण. गणेश और हनुमान की प्रतिमाएं हैं।
कहते हैं कि एंथनी कृष्ण और ईष्ट में फर्क नहीं देखते थे और इस मंदिर में किसी प्रकार का जाति बंधन नहीं है और चीनी समुदाय के लोगों द्वारा पूजी जाने के कारण यहां की मां काली को चीना काली भी कहा जाता है। फ़िरंगी कालीबाड़ी की स्थापना की सही तारीख ज्ञात नहीं है। मंदिर की सामने की दीवार पर पट्टिका में लिखा है, “ओम श्री श्री सिद्धेश्वरी कालीमाता ठकुरानी / स्थापित 905, फ़िरंगी काली मंदिर”। अनुमान है कि मंदिर 905 बंगाब्द में बनाया गया था।
सभी सखियों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। नव वर्ष 2021 आप सबके जीवन में नयी ऊर्जा का संचार करे और आप सब नये बदलाव की खुशनुमा बयार के साथ महक उठें, यही कामना है। सखियों, पिछले हफ्ते मैंने आपको ताज बेगम की कहानी सुनाई थी। आज, मैं आपको मध्ययुगीन कवयित्री शेख की कथा सुनाने जा रही हूँ। हमारे समाज में किसी भी महिला की पहचान इस रूप में होती है कि वह किस की बेटी, बहन, पत्नी या माँ है। अगर उसका कुल गोत्र बहुत नामचीन न हो तो उसकी एक पहचान यह भी होती है कि वह किस की प्रेमिका है। हालांकि इस पहचान को अक्सर एक कुटिल अथवा व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ संकेतों में चिह्नित किया जाता है। लेकिन फिर भी कभी कभी इतिहास में किसी किसी महिला का परिचय इस रूप में भी उल्लिखित होता है जैसे सुजान घनानंद की प्रेमिका थीं और शेख कवि आलम की। चूंकि इतिहास लेखन की जिम्मेदारी पुरूषों के मजबूत कंधों पर रही इसीलिए यही कहा गया कि शेख आलम की प्रेमिका थीं, किसी ने यह नहीं लिखा कि आलम शेख के प्रेमी थे जो कालांतर में उनके पति और उनके पुत्र जहान के पिता बने। यह भी कहा जाता है कि आलम जाति से कुलीन ब्राह्मण थे जो शेख के प्रेम में धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बन गये थे।
खैर, इस बहस को यहीं विराम देते हुए मैं आपको बताना चाहूंगी कि शेख प्रसिद्ध कवि आलम की समकालीन थीं। उनका समय सन् 1694 मान जाता है। वह धर्म से मुसलमान, पेशे से रंगरेजिन तथा मन से कृष्णभक्त कवयित्री थीं। उनके बारे में कथा प्रचलित है कि एक बार सुप्रसिद्ध कवि आलम एक दोहे की रचना कर रहे थे जिसकी पहली पंक्ति तो उन्होंने लिख ली थी लेकिन दूसरी पंक्ति उन्हें सूझ नहीं रही थी। उन्होंने उस आधी पंक्ति को एक कागज पर.लिखकर अपनी पगड़ी की छोर में बाँध लिया, इस विचार के साथ कि इसे बाद में पूरा अवश्य करेंगे। जब रंगरेजिन शेख को उन्होंने अपनी पगड़ी धोने और रंगने के लिए दी तो उस कागज को निकालना भूल गए। शेख ने पगड़ी तो रंगी ही, उस दोहे को भी पूरा कर दिया, जो इस प्रकार है-
“कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन
कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धर दीनी”
इस दोहे को पढ़कर आलम कवि बहुत प्रसन्न हुए और कहा जाता है कि उन्होंने शेख को पगड़ी की रंगाई की मजदूरी के साथ एक हजार रूपए इनाम में दिए। इसके बाद स्वाभाविक रूप से उन्हें शेख से प्रेम हो गया और उन्होंने उनसे ब्याह करके उन्हें अपनी जीवनसंगिनी ही नहीं काव्य संगिनी भी बना लिया। अर्थात आलम और शेख मिलकर कविता करने लगे। बहुत सी कविताएँ आलम शेख के नाम से उपलब्ध हैं जो इस बात की पुष्टि करती हैं। शेख का अलग से कोई ग्रंथ नहीं मिलता है लेकिन उनके बहुत से स्फुट पद जरूर मिलते हैं जिनमें प्रेम, भक्ति और शृंगार का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है। वियोग शृंगार का एक मार्मिक उदाहरण प्रस्तुत है जिसे पढ़ते हुए सूरदास के वियोग शृंगार के पदों की स्मृति बरबस मन में कौंध जाती है-
“जब से गुपाल मधुबन को सिधारे भाई
मधुबन भयो मधु दानव विषम सौं
शेख कहै सारिका सिखंड खंजरीठ सुक
कमल कलेस कीन्हीं कालिंदी कदम सौं।”
शेख की ब्रजभाषा अत्यंत शुद्ध और परिमार्जित थी। अलंकारों का सहज प्रयोग उनकी विशेषता थी जिससे उनके पद सहज ही सौन्दर्य बोध संपन्न होने के साथ ह्दयग्राही भी हो उठते थे। उनकी रचनाएँ अपने कथ्य, भाषा और शिल्प में मध्यकाल के बड़े कवियों को अनायास ही टक्कर दे सकती हैं। भक्तिरस में डूबकर उन्होंने कई देवताओं की स्तुति में पदों की रचना की है। गंगा का अत्यंत ह्दयहारी वर्णन प्रस्तुत पद में हुआ है –
“नीके नाहाईं धोईं धुरि पैटो नेकु वैठो आनी
धुरि जटि गई धूरि जटि लौ भवन में
पैन्हि पैठ्यो अंबर सो निकस्यौ दिगंबर ह्वै
दृग देखो भाल में अचंभो लाग्यो मन में।”
शेख की एक विशेषता यह थी कि वह बहुत हाजिरजवाब थीं। कहा जाता है कि एक बार औरंगजेब का बेटा आलम के घर के सामने से निकल रहा था, शेख को देख उसने पूछा, “क्या आप ही आलम की स्त्री हैं ?” तब शेख ने जवाब दिया, “जी हां, जहांपनाह, जहान की माँ मैं ही हूँ ।” जहान उनके बेटे का नाम था जिसका अर्थ है, संसार अथवा विश्व, अर्थात वह आलम की पत्नी मात्र नहीं जहान अर्थात विश्व की माँ भी थीं। कहा जाता है कि यह जवाब सुनकर वह बहुत शर्मिन्दा हुआ और फिर कभी उसने इस तरह की गुस्ताखी नहीं की। यह भी माना जाता है कि शेख की बुद्धिमत्ता और हाजिरजवाबी का उस पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसी के विशेष अनुरोध पर शेख के पति आलम को औरंगजेब का दरबारी कवि बनाया गया था।
आज की कहानी यहीं खत्म करती हूँ, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नई कहानी के साथ।
1850 में स्थापित हुआ था चेतला में स्थित यह स्कूल संस्थापक कैलाश दास बढ़ई थे, जीवन की आधी कमाई इस विद्यालय को दी
नवजागरण के दौरान बहुत से शिक्षण संस्थान खुले और इनके पीछे उस समय के कई बड़े समाज सुधारकों का योगदान रहा। यह वह समय था जब हमारा समाज जाति – पात, ऊँच – नीच के बन्धनों में जकड़ा था। किसी गरीब परिवार के पिछड़े बच्चों के लिए ऐसे शिक्षण संस्थानों के दरवाजे अब भी नहीं खुले थे मगर शिक्षा पर सबका हक है, ये बात आम जनता समझने लगी थी। शिक्षित होने और एक अच्छा जीवन जीने की चाह तड़प बन उठी थी और तब 18वीं सदी में एक अशिक्षित बढ़ई कैलाश दास ने वह किया जो आज भी हमारे सामने मिसाल बनकर खड़ा है।
इतिहास के पन्नों में इनका नाम नहीं मिलता या यूँ कहें कि खो गया है मगर 1850 में जरूरतमंद बच्चों को शिक्षित करने की जो तड़प थी…उसके कारण इन्होंने एक शिक्षण संस्थान खोला जो आज चेतला सेन्ट्रल रोड में कैलाश विद्या मंदिर के रूप में हमारे सामने खड़ा है। वे कलकत्ता कोर्ट में काम किया करते थे। उन्होंने अपनी आधी कमाई इस स्कूल को दे दी। 11 कट्ठा जमीन दी, शिक्षकों का खर्च भी खुद उठाया और तब जाकर बना यह विद्यालय..कल्पना की जा सकती है कि यह सब उनके लिए कितना कठिन रहा होगा।
कोरोना के कारण फिलहाल बच्चे यहाँ नहीं हैं
यह स्कूल कई उतार – चढ़ाव देख चुका है औऱ कई कठिनाइयों से गुजर चुका है…और एक वक्त तो ऐसा आया जब ऐसा लगा कि यह शिक्षण संस्थान अपना अस्तित्व खो बैठेगा। वह कहते हैं कि जब आप किसी नेक इरादे से कोई काम करते हैं तो खुद ईश्वर आपकी रक्षा करता है और आपके सपने को सम्भालता और सहेजता है और किसी को आपकी सहायता के लिए भेज देता है। कैलाश दास ने इस स्कूल की स्थापना एक बेहद ऊँचे उद्देश्य के साथ की थी इसलिए जब उनका सपना अस्तित्व खोने की कगार पर आया तो जैसे ईश्वर ने उस सपने को सहेजने का जिम्मा उठाया और यहीं से शुरू होती है एक ऐसे स्कूल की कहानी, जिसे एक बढ़ई ने बनाया और शिक्षक ने जीवनदान देकर सँवारा..2000 में प्रधान शिक्षक के रूप में स्कूल की बागडोर सम्भालने वाले ये शिक्षक हैं विश्वजीत मित्र।
विश्वजीत मित्र सिर्फ कैलाश विद्या मंदिर के प्रधान शिक्षक ही नहीं बल्कि माध्यमिक शिक्षक और शिक्षा कर्मी के महासचिव भी हैं। इस शिक्षक संगठन ने इस साल 50 वर्ष पूरे किये और विश्वजीत मित्र एक बार फिर महासचिव चुने गये। कहने की जरूरत नहीं है कि इनको एक साथ दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ी है। एक तरफ शिक्षकों और शिक्षाकर्मियों के अधिकार की लड़ाई तो दूसरा संघर्ष अपने स्कूल को बचाने का….। तब पास – फेल हटाने के साथ अंग्रेजी हटा देने के कारण अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों का प्रसार होने लगा। इस कारण से बांग्ला माध्यम स्कूलों में विद्यार्थी कम होने लगे।
1976 में चेतला ब्वॉयज स्कूल को उच्च माध्यमिक बनाया गया जबकि कैलाश विद्या मंदिर माध्यमिक ही रह गया। शिक्षकों की नियुक्ति भी ठप हो गयी इसलिए छात्र और भी कम होने लगे। 1999 में उच्च माध्यमिक का दर्जा मिला तब भी विद्यार्थी कम थे।
पुस्तकालय में 1 हजार से अधिक किताबें हैं
कारण यह था कि जब विश्वजीत मित्र ने जिम्मेदारी सम्भाली तो विद्यार्थियों की संख्या इतनी कम हो गयी थी कि स्कूल शिक्षा विभाग कैलाश विद्या मंदिर का विलय चेतला ब्वॉयज स्कूल में करने की तैयारी करने जा रहा था।
ऐसी स्थिति में प्रधान शिक्षक विश्वजीत मित्र ने स्कूल को को एड बनाने का निर्णय लिया मगर उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद का कहना था कि लड़कों का एक स्कूल पास होने के कारण कैलाश विद्या मंदिर को कोएड नहीं किया जा सकता क्योंकि चेतला ब्वॉयज स्कूल पास ही था।
तब इस इलाके में हिन्दीभाषी लड़कियों के लिए स्कूल की कमी एक समस्या थी। उनको बड़ाबाजार आना पड़ता था। बहुत से अभिभावकों के कहने पर मित्र ने उनको मास पिटिशन का सुझाव दिया। मुहिम रंग लायी और स्कूल को एड हुआ। लड़कियों के साथ अन्य बोर्ड के विद्यार्थी भी आने लगे। मगर अब विद्यार्थी बहुत अधिक थे और स्कूल की बुनियादी संरचना को उन्नत करने की जरूरत थी। ऐसी स्थिति में लड़कियों के लिए उच्च माध्यमिक स्तर की पढ़ाई की व्यवस्था की गयी।
2008 में आएला के कारण स्कूल के भवन को क्षति पहुँची तो सभी शिक्षकों ने इस विशाल स्कूल प्रांगण में जरूरतमंद बच्चों के लिए पूरी तरह निःशुल्क छात्रावास स्थापित करने की पहल की। कुछ समय के लिए खर्च विश्वजीत मित्र ने खुद उठाया। बाद में सर्व शिक्षा मिशन ने जिम्मेदारी ली और आज जरूरतमंद बच्चे निःशुल्क रहते हैं। तब कार्तिक मान्ना ने इस मुहिम में बहुत मदद की। सिस्टर सिरिल से लेकर राज्य सरकार से सहायता मिली। इस छात्रावास में 100 गरीब विद्यार्थी रह रहे हैं।
2012 में सर्व शिक्षा मिशन के सहयोग से जरूरतमंद बच्चों के लिए नगरीय आवासीय ईकाई बनी और इसका उद्घाटन तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने इसका उद्घाटन किया। विश्वजीत मित्र ने अमेरिकन सेंटर के साथ काम किया तो शैक्षणिक सुविधाओं को लेकर यहाँ से मदद मिली। अमेरिकन सेंटर से मदद मिली और स्कूल में कार्य़शालाएं हुईं। हर शनिवार को स्कूल की गतिविधियों में गीत, जादू, चित्रांकन, नाटक, आवृत्ति के साथ फुटबॉल का प्रशिक्षण भी शामिल हो गया। स्कूल ने फुटबॉल अकादमी स्थापित की जिसे शिक्षकों का सहयोग मिला। स्कूल यू एस आई ई एस के साथ विगत 4-5 सालों से कई गतिविधियाँ संचालित कर रहा है।
2017 में प्रख्यात विद्वान डेविड सनशाइन हैम्बरगर ने इस स्कूल में 10 माह तक पढ़ाया। स्कूल की सह शिक्षिका शर्मिला सेनगुप्ता शैक्षणिक विनिमय कार्यक्रम फुलब्राइट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत 42 दिन के लिए स्कूल की तरफ से वर्जिनिया पढ़ाने के लिए गयीं। 2017 से सेनगुप्ता के मार्गदर्शन में इन्टेक के सहयोग से इस स्कूल में बच्चों ने शॉर्ट फिल्म का निर्माण शुरू किया और अब तक 3 फिल्में बना चुके हैं। फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे कई देशों से शिक्षक आकर पढ़ा चुके हैं।
यह शिक्षण संस्थान जरूरतमंद बच्चों के लिए ही है क्योंकि 95 प्रतिशत अभिभावक रोज कमाकर खाने वाले ही हैं। सन् 2000 में जिस स्कूल में 100 से भी कम विद्यार्थी थे. आज वहाँ 650 विद्यार्थी हैं। कोरोना के दौरान यहाँ पर ऑडियो – विजुअल सेमिनार हुआ। स्कूल में लगातार गतिविधियाँ होती रहती हैं। यहाँ हाल ही में बेहद खूबसूरत पुस्तकालय बनाया गया है जिसमें 1 हजार से अधिक किताबें हैं।
कैलाश विद्या मंदिर एक मिसाल है कि अगर इरादे नेक और मजबूत हों तो कुछ भी असम्भव नहीं होता…जरूरत बस कदम उठाने की है।
नया साल आ गया मगर गुजरे हुए साल के प्रति नाराजगी कम नहीं हो रही है। कोविड -19 ने सब कुछ अस्त – व्यस्त कर दिया और नये साल का जश्न भी तो ठीक से नहीं मन पाया। लोग दुआ कर रहे हैं कि ऐसा साल फिर न आये। यहाँ तक कि नये साल पर भेजे जाने वाले शुभकामना सन्देशों में भी 2020 को गालियाँ ही पड़ रही हैं…लेकिन सोचिए तो क्या वाकई कोई तारीख किसी बात की जिम्मेदार है…इन्सान की फितरत अजीब है…वह अपनी गलतियों का ठीकरा फोड़ने के लिए कोई न कोई कंधा तलाश ही लेता है। कोविड -19 का जिम्मेदार वक्त तो था नहीं….हमारी और आपकी गलतियाँ थीं। प्रकृति का दोहन समय नहीं कर रहा था…कोई कैलेंडर नदियों में कचरा नहीं डाल रहा था…कोई तारीख जंगल नहीं काट रही थी तो जो हुआ, वह तो होना ही था.. 2020 में नहीं होता तो 10 या 20 साल बाद होता मगर होता तो जरूर….। अब इस लिहाज से सोचिए तो क्या प्रकृति ने यह महामारी देकर हमको सोचने पर क्या मजबूर नहीं किया..।
यह सही है कि महामारी ने विनाश किया….मगर हमें एक बार मनुष्य बनने का मौका भी दिया है। भागती – दौड़ती जिन्दगी की रफ्तार पर जब रोक लगी तो चैन की साँस आपने भी ली है। जिनके चेहरे देखने को तरस जाया करते थे, वह चेहरे आपने देखे। आत्मनिर्भरता की ओर सबका ध्यान गया, स्थानीय बाजार और उत्पादों का महत्व समझ में आया। ये समझ में आया कि जिनको हम कुछ नहीं समझते,,,उनके बगैर जिन्दगी कितनी मुश्किल है। इस लॉकडाउन ने चेहरों से जब नकाब उतारे तो जो मोहभंग हुआ, उसने कदमों और इच्छा शक्ति को मजबूत किया….आप अब समझ सकते हैं कि कौन आपके साथ है और कौन नहीं…ईश्वर को धन्यवाद कहिए क्योंकि ये सृष्टि मनुष्य की नहीं, उसकी है…और वह बेहतर जानता है कि अपनी सृष्टि का ख्याल कैसे रखेगा…तभी तो उसने इन्सानों को बंद किया…जिससे प्रकृति खुलकर साँस ले सके, तभी तो विलुप्त प्राणी भी अचानक आ गये…सड़कों पर मोर दिखे और खिड़की से बर्फीली चोटियाँ। नदियाँ थोड़ी साफ हुईं और वायुमण्डल के छेद थोड़े कम हुए…याद कीजिए क्योंकि तारीखें कभी गुनाह नहीं करती, जुर्म इन्सान करता है वक्त नहीं। नये साल पर थोड़ी सी समझ और विस्तार पाए। इन शुभकामनाओं के साथ नये साल की खूब बधाई।
कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा आयोजित 26वें हिंदी मेले के छठें दिन रेणु जन्मशती के अवसर पर ‘सांस्कृतिक महामारी और रेणु’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें देश-विदेश के मूर्धन्य साहित्यकारों ने हिस्सा लिया। यह संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित हुई। प्रथम सत्र की अध्यक्षता आलोचक रविभूषण ने किया।संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन प्रो. अल्पना नायक ने किया। अध्यक्षीय भाषण देते हुए रविभूषण ने कहा कि रेणु ने मानवीय संस्कृति को पहचाना और नेचर को कल्चर से जोड़ा। आज नीड कल्चर की जगह डिजायर कल्चर विकसित हो रही है। पूँजी की संस्कृति ने संस्कृति की पूँजी को निगल लिया है। भारत यायावर ने कहा कि रेणु ने स्वयं महामारी की समस्या का सामना किया। रेणु के साहित्य में सिर्फ आँखों देखा ही नहीं बल्कि भविष्य की संभावनाएं भी हैं। रेणु ने कालबद्ध रचनाएं लिखते हुए काल से बाहर जाने की कोशिश भी की। प्रो.गोपेश्वर सिंह ने कहा कि रेणु आलोचनात्मक लेखक हैं, जो पहले खुद की आलोचना करते हैं। वर्तमान दौर रेणु की तुलना से हजार गुणा अपसंस्कृति का दौर है।प्रो. हितेंद्र पटेल ने कहा कि रेणु का साहित्य सांस्कृतिक विपन्नता के दौर में ज्यादा प्रासंगिक है।आज हमें रेणु के साहित्य में दर्ज ऐतिहासिक महत्व को समझने की जरूरत है।प्रो. जवरीमल्ल पारख ने कहा कि रेणु की राजनीतिक दृष्टि गहरी और प्रखर थी ।आज की महामारी का संबंध राजनीतिक है,परंतु अधिकांश इस सत्य को रेणु की तरह उद्घाटित नहीं करते। विषय का प्रवर्तन प्रो. प्रीति सिंघी ने किया। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि रेणु आजादी के आस-पास के लेखक है। हमारे दौर की सांस्कृतिक महामारी यही है कि हम सभी एक भयानक आत्म विस्मृति के शिकार हैं। हमें इस आत्म विस्मृति से बाहर निकलने के लिए अपना रुख ‘सम्पूर्ण संस्कृति की तलाश’ में गाँवों की संस्कृति की ओर करना होगा।मारीशस से जुड़े प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने कहा कि रेणु एक सांस्कृतिक भगीरथ थे, जिसकी धारा को निरंतरता प्रदान करने के लिए हमें आगे आना होगा।रेणु की वैचारिक प्रतिबद्धता मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी है।भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शम्भुनाथ ने कहा कि हमें सांस्कृतिक महामारी से लड़ने के लिए एकबद्ध होना होगा। पूरा देश बहुलतावादी सांस्कृतिक महामारी का शिकार है। नीदरलैंड से जुड़ी प्रो.पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि इस पृथ्वी का गौरव गाँव है। हमें कवि, लेखक आदि विशेषणों से ऊपर उठकर कार्यकर्ता की भूमिका में आना होगा। प्रथम सत्र का संचालन विनोद यादव ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पूजा गुप्ता ने दिया। दूसरे सत्र का सफल संचालन प्रो.गुलनाज़ बेग़म तथा धन्यवाद ज्ञापन राहुल शर्मा ने दिया। वाद-विवाद प्रतियोगिता वर्ग ‘अ’ का शिखर सम्मान जय प्रकाश यादव, सेंट ल्युक्स डे स्कूल, प्रथम स्थान अनुराग गौतम, सरकारी वेंकट उच्च माध्यमिक एक्ससिलेंस स्कूल, सतना, द्वितीय स्थान श्रुति प्रसाद, सेंट ल्युक्स डे स्कूल, तृतीय स्थान छवि, मॉडर्न चाइल्ड पब्लिक स्कूल, दिल्ली को मिला तथा वर्ग ‘क’ का शिखर सम्मान राजेश सिंह, कलकत्ता विश्वविद्यालय, प्रथम स्थान षैजू के, कोच्चीन विश्वविद्यालय, केरल, द्वितीय स्थान बिक्रम साव, कलकत्ता विश्वविद्यालय और तृतीय स्थान ऋषभ द्विवेदी, हिन्दू कॉलेज, दिल्ली को मिला।रचनात्मक लेखन का शिखर सम्मान मधु सिंह,विद्यासागर विश्वविद्यालय, प्रथम स्थान स्वाती सौरभ,भोजपुर, द्वितीय आशीष वर्मा ,हैदराबाद विश्वविद्यालय, तृतीय सूर्यदेव रॉय,इग्नू तथा विशेष पुरस्कार पोलीरानी राऊत,वृंदा मिश्र,सुप्रिया श्रीवास्तव, गायत्री वाल्मीकि ,अर्चित डोकानिया को मिला।
कोलकाता : रूपा एंड कम्पनी के फ्लैगशिप ईबीओ, रूपा कम्फर्ट स्टोर ने पहली वर्षगाँठ मनायी। इस अवसर पर रूपा की ओर से कोरोना महामारी के दौरान समाज के लिए योगदान करने वालों को सम्मानित किया गया। लेकटाउन में स्थित इस स्टोर में आयोजित एक कार्यक्रम में राज्य के मंत्री सुजीत बोस, लेक टाउन पुलिस स्टेशन के आई सी नन्द दुलाल घोष, लेकटाउन अधिवासी वृन्द क्लब के सचिव गौतम गुहा, बांगुड़ एवेन्यू संसद के अध्यक्ष बैजनाथ मित्तल के अतिरिक्त पुलिस अधिकारियों, अम्बुलेंस चालकों, सफाईकर्मी तथा चिकित्सकों को सम्मानित किया गया। रूपा ने कोलकाता, हुगली, हावड़ा, उ.24 परगना, पूर्णिया, गया, मुज्जफरपुर, सीकर, जोधपुर, और नवलगढ़ में रूपा कम्फर्ट जोन खोला है। यहाँ पर रूपा फ्रंटलाइन, फुटलाइन, समेत रूपा के अन्य उत्पाद उपलब्ध हैं। लेक टाउन फ्लैगशिप स्टोर की पहली वर्षगाँठ के इस मौके पर रूपा एंड कम्पनी लिमिटेड के प्रबन्ध निदेशक के. बी. अग्रवाल भी उपस्थित थे।