कोलकाता : अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन पश्चिम बंगाल की ओर से सोदपुर में जरूरतमंद लोगों को भोजन वितरित किया गया। संगठन की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह, महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष रीता सिंह, संयुक्त महासचिव ममता सिंह, सचिव सुमन सिंह, कोलकाता महानगर की अध्यक्ष मीनू सिंह, महासचिव इंदु सिंह, उपाध्यक्ष ललिता सिंह, सोदपुर की अध्यक्ष सुनीता सिंह एवं पदाधिकारी जयश्री सिंह, शकुंतला साव, अनिता साव, बालीगंज इकाई की पदाधिकारी रीता सिंह, शैला सिंह आदि कार्यक्रम में विशेष तौर पर उपस्थित थीं।
रामकृष्ण मिशन, नयी दिल्ली में राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन
नयी दिल्ली/ कोलकाता : रामकृष्ण मिशन, नयी दिल्ली में राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया गया। इस कार्यक्रम में 100 से अधिक युवाओं ने भाग लिया और ऑनलाइन माध्यमों पर 300 से अधिक लोगों ने देखा। गौरतलब है कि 1984 से भारत सरकार स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाती आ रही है।
इस अवसर पर रामकृष्ण मिशन के लोकप्रिय स्वामी सर्वप्रियानंद ने न्यूयॉर्क से युवाओं को सम्बोधित किया। न्यूयॉर्क में जीवन से सम्बन्धित कई बातों पर किताबें लिखी जा रही हैं, जिनके मूल में स्वामी विवेकानंद ही हैं। कार्यक्रम को सफल बनाने में स्वामी शान्तत्माननंद का मुख्य योगदान रहा और मेंटर डॉ. एस. वी. ईश्वरन थे।
आर्ट ऑफ लीविंग ने लगाया निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर
200 लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण हुआ
हावड़ा : आर्ट ऑफ लीविंग द्वारा नारायणा हेल्थ के मार्गदर्शन में एक निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर रविवार को लगाया गया। शिविर में लगभग 200 लोगों ने स्वास्थ्य परीक्षण करवाया। शिविर में ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप, कद एवं वजन माप के अतिरिक्त मधुमेह, हिमोग्लोबिन परीक्षण तथा ईसीजी समेत अन्य परीक्षणों की व्यवस्था थी।
इसके साथ ही लोगों को निःशुल्क दवायें भी प्रदान की गयीं। यह शिविर आर्ट ऑफ लीविंग के सामाजिक प्रकल्प निदेशक भोलानाथ जेना के नेतृत्व में लगाया गया। यह शिविर स्टार क्लब, लिटिल स्टार क्लब, अंकुर क्रिकेट एसोसिएशन तथा जगन्नाथ सेवा समिति के सहयोग से लगाया गया था।
डॉ. नरेन्द्र कोहली के नये उपन्यास ‘सुभद्रा’ का लोकार्पण
नयी दिल्ली : वाणी प्रकाशन ग्रुप ने हर्षोल्लास के साथ वाणी डिजिटल मंच द्वारा डॉ. नरेन्द्र कोहली कालजयी कथाकार एवं मनीषी व पद्मश्री अलंकृत के 81वें जन्मदिवस पर गत 6 जनवरी, शाम 4 बजे एक ‘अभिनन्दन पर्व‘ का आयोजन किया। इस डिजिटल गोष्ठी में नरेन्द्र कोहली जी के नवीनतम उपन्यास ‘सुभद्रा‘ का लोकार्पण भी किया गया। इस अवसर पर आयोजित विशेष चर्चा में वाणी प्रकाशन ग्रुप के प्रबन्ध निदेशक व वाणी फाउंडेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी, वरिष्ठ लेखक प्रेम जनमेजय तथा वरिष्ठ पत्रकार वर्तिका नन्दा वक्ता के तौर पर उपस्थित थे।
कार्यक्रम की शुरुआत में वाणी प्रकाशन ग्रुप के प्रबन्ध निदेशक व वाणी फाउंडेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी ने डॉ. नरेन्द्र कोहली जी का अभिनन्दन करते हुये उनका परिचय एक ऐसे साहित्यकार के रूप में दिया जिनका लेखन ‘बन्दिशों’ से दूर है। उन्होनें बताया कि कोहली जी सन 1988 से वाणी प्रकाशन ग्रुप से प्रकाशित होते आए है। यह लेखक प्रकाशक सम्बन्ध में गरिमा, मधुरता और विश्वास की नई ऊँचाई है।
वरिष्ठ पत्रकार वर्तिका नन्दा के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ. कोहली ने कहा, “कई बार ऐसा भी होता है कि जिन पात्रों को हम रच रहे होते हैं वे हमारे आस-पास ही होते हैं। जैसे कृष्ण की बातें और घटनाएँ जो हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि मैं हूँ। सारे चरित्रों के साथ रहना पड़ता है और यह मेरे स्वभाव में है।”
डॉ. नरेन्द्र कोहली भारतीय लेखकों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। हिन्दी साहित्य में उनकी पहचान अप्रतिम कथा-लेखक व व्यंग्यकार के रूप में है जिन्होंने मिथकीय पात्रों को एक नवीन ध्वनि व चिन्तन प्रदान किया है।
उनका रचना-कर्म कालजयी, राष्ट्र-भाव और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण है। अपनी अद्भुत व मानीखेज़ रचनाशीलता द्वारा वे साहित्यिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्रों की गुत्थियों को सुलझाते हुए आधुनिक समाज की समस्याओं एवं उनके समाधान को अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में समाज के समक्ष रख अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
इस विशेष चर्चा में डॉ. नरेन्द्र कोहली के लेखकीय जीवन की शुरुआत पर बात करते हए वरिष्ठ लेखक प्रेम जनमेजय ने कहा कि उनकी पहली कहानी वर्ष 1960 में प्रकाशित हई थी और उनकी लेखकीय आयु लगभग 61 वर्ष है। वे वाणी प्रकाशन ग्रुप से वर्ष 1988 से जुड़े हुए हैं और अब तक विभिन्न विधाओं में उनकी 92 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। वे एक युग प्रवर्तक साहित्यकार हैं। कोहली जी ने साहित्य की सभी प्रमुख विधाओं (उपन्यास, व्यंग्य, नाटक, कहानी) एवं गौण विधाओं (संस्मरण, निबन्ध, पत्रा आदि) और आलोचनात्मक साहित्य में अपनी लेखनी चलाई। हिन्दी साहित्य में ‘महाकाव्यात्मक उपन्यास’ की विधा को प्रारम्भ करने का श्रेय नरेन्द्र कोहली को ही जाता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्रों की गुत्थियों को सुलझाते हुए उनके माध्यम से आधुनिक समाज की समस्याओं एवं उनके समाधान को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना नरेन्द्र कोहली की अन्यतम विशेषता है। नरेन्द्र कोहली सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-शैली एवं दर्शन का सम्यक् परिचय करवाया है।
कवयित्री राय प्रवीण : जिन्होंने अकबर को दिखाया आईना

ऐ सखी सुन 12
सभी सखियों को नमस्कार। उम्मीद है कि आप सब अपनी जिंदगी में भली भांति व्यतीत कर रही होंगी और अन्य सखियों की उन्नति के लिए भी प्रयासरत होंगी। सखियों, मैं अपनी विस्मृत सखियों को याद करते हुए आज आपको “राय प्रवीण” की कहानी सुनाऊंगी। उनके बारे में बहुत से किस्से प्रसिद्ध हैं जिनमें उन्हें एक खूबसूरत राज नर्तकी, गायिका और कवयित्री के रूप में चित्रित किया गया है तो कुछ में गणिका भी बताया गया है। उनकी कविताओं में भी उनके नाम के साथ “पातुर” शब्द जुड़ा मिलता है। राज दरबार में बहुत सी स्त्रियाँ राजा के मनबहलाव के लिए होती थीं लेकिन उनमें से कविता कम ही करती थीं और वह भी ऐसी कविता और कवयित्री जिससे महान अकबर भी प्रभावित हो जाए, बिरली ही थीं।। साथ ही ऐसी दरबारी गायिकाएँ भी कम ही होती थीं जो अपने राजा के प्रति इतनी एकनिष्ठ होती थीं कि बड़े से बड़े पद और प्रलोभन को ठुकरा सकती दें, अन्यथा राजा रजवाड़े तो रूपसी गायिकाओं और नर्तकियों को तो अपनी सत्ता के बलबूते जोर जबरदस्ती अपने दरबार की ज़ीनत बन जाने को विवश कर देते थे। 16वीं शताब्दी में ओरछा (मध्यप्रदेश) के राजा मधुकर शाह के पुत्र युवराज इन्द्रजीत जो बाद में कछुआ के राजा बने, के दरबार की रौनक थीं, राय प्रवीण। एक ऐसी रौनक जो महाकवि केशव दास की शिष्या थीं और कहा जाता है कि उन्हें काव्य शास्त्र की शिक्षा देने के लिए ही केशव दास ने “कविप्रिया” और “रसिकप्रिया” की रचना की थी। उनकी कला और प्रतिभा से वह इतने प्रभावित थे कि उनकी तुलना वीणापाणि सरस्वती से करते हैं-
“नाचति गावति पढ़ति सब, सबै बजावत बीन।
तिनमें करती कवित्त इक, रायप्रवीन प्रवीन।।
राय प्रवीन कि सारदा, रुचि-रुचि राजत अंग।
वीणा पुस्तक धारिणी, राजहंस सुत संग।।”

कोकिल कंठी पुनिया के गीत सुनकर और उससे प्रभावित होकर राजकुमार इन्द्रजीत ने राज संरक्षण में उसकी शिक्षा की व्यवस्था की जिससे पुनिया की प्रतिभा और भी निखर उठी और कालांतर में वह राय प्रवीण के नाम से ख्यात हुई। वह कवयित्री और कलाकार ही नहीं थीं बल्कि अत्यंत बुद्धिमति एवं वाक्पटु भी थीं। कहा जाता है कि प्रवीण की ख्याति से प्रभावित होकर बादशाह अकबर ने उन्हें अपने दरबार में आमंत्रित किया लेकिन प्रवीण तो इन्द्रजीत के प्रति पूर्णतया समर्पित थीं, उन्हें छोड़कर भला कैसे जातीं। अपनी दुविधा उन्होंने राजा इन्द्रजीत के सामने रख दी कि कोई ऐसा रास्ता निकालें कि राज्य की रक्षा भी हो जाए और प्रवीण का पातिव्रत्य भी बचा रहे-
“आयो हौं बूझन मंत्र तुम्हें निज भवन हों सिगरी मत गोई।
देह तजौं कि तजौं कुलकानि हिये न लजौं लजिहैं सब कोई।।
सर्वार्थ और परमारथ को पर चित्त पियारि कहो तुम सोई।
जामें रहे प्रभु की प्रभुता अरु मोर पतिब्रत भंग न होई।।”
राजा ने अपनी प्रेयसी की सम्मान रक्षा के लिए उसे बादशाह के दरबार में भेजने से इंकार कर दिया तो बादशाह ने उसे पकड़ मंगाया और राजा पर जुर्माना भी ठोंक दिया। इस स्थिति को प्रवीण ने बड़े कौशल से संभालते हुए बादशाह अकबर से नहीं साह अकबर (अकबर इसी नाम से कविताएँ लिखा करता था और यह एक कवि की दूसरे कवि से की गई प्रार्थना थी) से विनती की –
“अंग अंग नहीं कछु संभु सु, केहरि लिंक गयन्दहि घेरे।
भौंह कमान नहीं मृग लोचन, खंजन क्यों न चुगे तिल नेरे।।
हैं की राहु नहीं उगै इन्दु सु, कीर के बिम्बन चोंचन मेरे।
कोउ न काहू से रोस करै सु, डरै उर साह अकब्बर से।।”
अकबर उसकी काव्य कुशलता से प्रभावित हुआ और समस्यापूर्ति के तहत उसकी परीक्षा भी ली। ज्यों- ज्यों वह परीक्षा में खरी उतरती गई, अकबर उतना ही मुग्ध होता गया और नाना प्रलोभन देकर उसे दरबार में रोके रखने का प्रयास किया। अंततः प्रवीण ने दरबार में रहने की अपनी अपात्रता को बयान करते हुए अकबर को उसके बड़प्पन की याद दिलाते हुए कहा-
“बिनती राय प्रबीन की, सुनिये साह सुजान।
जूठी पतरी भखत हैं, बारी, बायस, स्वान।।”
अब यह साहस कहें या विनम्रता या फिर इंद्रजीत के प्रति पूर्ण समर्पण, यह प्रवीण का ही वैशिष्ट्य था कि वह अपने आप को जूठी पत्तल तक कह जाती है। कहते हैं कि उसके काव्य कौशल, वैदुष्य और एकनिष्ठ प्रेम से पसीजकर अकबर ने ससम्मान उसे इंद्रजीत के दरबार में वापस भेज दिया और इन्द्रजीत पर लगाया गया जुर्माना भी माफ कर दिया।

प्रवीण की कविताओं में संयोग शृंगार के बहुतेरे चित्र मिलते थे और उन गीतों की नायिका प्रवीण तथा नायक राजा इंद्रजीत थे। भले ही वह गायिका और इंद्रजित राजा थे लेकिन दोनों के बीच प्रेम की डोर बहुत मजबूत थी। इसका प्रमाण हमें इस लोकप्रचलित कथा से मिलता है जिसके अनुसार राय प्रवीण का जब राजा इंद्रजीत से मिलन नहीं हो पाया तो वह इस दुख में सती हो गईं, उस समय राजा यात्रा पर थे। जब तक उन्हें यह खबर मिलती और वह उन्हें बचाने पहुंचते, प्रवीण राख हो चुकी थी। उस राख को हाथों में लिए राजा बिलखते रहे। कहा जाता है कि इसके बाद उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ गयी और तकरीबन साल भर बाद उनका भी देहांत हो गया। राजा इन्द्रजीत ने 1618 में अपनी प्रेयसी के लिए एक महल का निर्माण करवाया था जिसका नाम है, राय प्रवीण महल। यह महल आज भी ओरक्षा में मौजूद है जिसकी दीवारों पर बनी तस्वीरों और महल के कोने- कोने में राजा और कवयित्री की प्रेम कथा और प्रवीण की कविताओं की अनुगूंज अब भी सुनाई देती है।
उत्कट शृंगार की कविताओं के साथ ही प्रवीण ने कुछ विवाह गीत और गारियां भी लिखी थीं। दरबारी गायिकाएँ राजा परिवार के विभिन्न समारोहों में भी गायन करती थीं और प्रवीण ने संभवतः उन अवसरों के लिए इन गीतों का सृजन किया होगा। उनके मधुर स्वर के कारण उन्हें “ओरक्षा की बुलबुल” कहकर संबोधित किया जाता था। प्रवीण के प्रेम, समर्मण, प्रतिभा और बुद्धि कौशल के लिए उन्हें हमेशा उसी ऊंचे आसन पर बैठाना चाहिए जिस पर उनके गुरू केशवदास ने बैठाया था। सुनने में आया है कि राय प्रवीण पर एक फिल्म भी बनने वाली हैं। उन्हें नमन करते हुए आज की कहानी यहीं खत्म करती हूँ, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी कहानी के साथ। तब तक के लिए विदा।
स्वामी विवेकानंद पर सेमिनार का आयोजन
नयी दिल्ली : स्वामी विवेकानन्द फोरम, रामकृष्ण मिशन दिल्ली की ओर से स्वामी विवेकानन्द जयन्ती पर एक लाइव वेबिनार आयोजित किया जा रहा है। सेमिनार का विषय स्वामी विवेकानन्द : एन इन्टरनल इन्सपिरेशन फॉर यूथ रखा गया है जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में न्यूयार्क की द वेदान्त सोसयटी के प्रभारी मंत्री स्वामी सर्वप्रियानंद महाराज होंगे। सेमिनार विवेकानन्द ऑडिटोरियम में आज 10 जनवरी को शाम 5.30 से 7.30 बजे तक होगा। यह जानकारी स्वामी शान्तत्मानन्द द्वारा दी गयी और मेन्टर डॉ. एस. वी. ईश्वरन हैं।
कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं।
यू ट्यूब लाइव वेबकास्ट के लिए लिंक यह रहा(दिल्ली के लोगों के लिए)
दिल्ली से बाहर रहने वाले इस लिंक पर जाकर सेमिनार से जुड़ सकते हैं।
सुनो
निष्ठा बिन्द्रा
(छात्रा – श्री शिक्षायतन कॉलेज)
मुंडेर पर अगर कोई चिड़िया आकर बैठ जाये…..
और जोर जोर से बोले…..
तो उसे भगाना मत उसे सुनना….
क्या पता क्या बोल रही हो…
शायद बच्चों के लिए ले जाता हुआ
भोजन उसकी चोंच से गिर गया हो……
या किसी ने उसका घोंसला तोड़ दिया हो ….
ये भी हो सकता है कि
किसी अज़गर ने उसके बच्चे खा लिये हों…..
चिड़िया अपने हक़ के लिए नहीं लड़ सकती ….
केवल भाग सकती है
या फिर ऐसे ही
किसी अनजान मुंडेर पर
किसी अनजान के सामने चीख सकती है ……
प्रकृति ने कमजोरों के चीखने को
सिर्फ इसलिए मधुर बनाया है कि वो सुनी जायें….
करुणा हमेशा मधुर होती है…..
इंसान अकेला ऐसा जीव है
जो अपने और अपनों के लिए
लड़ सकता है।
फिर भी वह सर्वाधिक त्रसित और ग्रसित है…..
संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं डोनी हजारिका
भारतीय संगीत की दुनिया में डोनी हजारिका एक चर्चित नाम हैं। असम से आने वाले डोनी ने 1995 में अपना कॅरियर बतौर संगीतकार और प्रोग्रामर शुरू किया। और अच्छा मुकाम पाने के लिए कड़ी मेहनत की। मंच पर प्रस्तुतियाँ देने वाले इस कलाकार का पहला अलबम 1995 में आया था जिसका नाम ‘बोन्दिता’ था।

इसके बाद ‘बोहनिमान द फोक शो’ और ‘आया बीहू झूम के’ आया। आया बीहू झूम के हिन्दी में अनुदित असमिया गीतों का पहला अलबम है और यह काफी अलग प्रयोग रहा। डोनी अब तक 35 धारावाहिकों में काम कर चुके हैं जिनमें ‘महाराणा प्रताप’, ‘महाभारत’, ‘भूत’, ‘हिटलर दीदी’ और ‘फियर फाइल्स’ जैसे शोज भी शामिल हैं। उन्होंने मुन्ना अहमद द्वारा निर्देशित असमिया फिल्म अचिन चिनाकी और अन्तहीन यात्रा के अतिरिक्त कन्नड़ फिल्म भक्त और हिन्दी में पूजा गुजराल की मैं और मिस्टर राइट की है। पाश्चात्य संगीत में जे बी रूमम के साथ फ्रांज स्कूबर्ट के मार्च मिलिटयर का निर्माण किया है। आवश्यक पारंपरिक ध्वनिक उपकरणों के बजाय पूरे डिजिटल सिंटेट्स शामिल हैं। इसकी सराहना संगीतकार वनराज भाटिया ने भी की थी।डोनी श्रेया घोषाल, रागिनी कावथेकर, अर्णव चक्रवर्ती.सुनीधि चौहान, कुमार सानू, बाबुल सुप्रियों से लेकर जुबिन गर्ग समेत कई अन्य दिग्गजों के साथ काम क ज़ी संगीत और टाइम्स संगीत। उन्होंने वोडाफोन, कोलगेट, डाबर, आदि विज्ञापनों के टीवी जिंगल्स में भी योगदान दिया है।
डोनी हजारिका 2009 से स्टैकटो रिकॉर्ड्स में बतौर मुख्य कार्यकारी अधिकारी कार्यरत हैं।
1857 की क्रांति के गुमनाम चेहरे : अंग्रेजों से लोहा लेने वाले हरेकृष्ण सिंह
बात जब 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बिहार के योगदान की होती है तो बाबू कुँवर सिंह याद आ जाते हैं। निश्चित रूप से उनका नाम क्रांति के इतिहास में स्वर्णाक्षऱों में अंकित होने योग्य हैं…मगर हमें उन लोगों को भी याद रखना चाहिए जो उनके साथ रहे और जिन्होंने उनको क्रांति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया..जी हाँ…ऐसे ही एक स्वाधीनता सेनानी की बात कर रहे हैं हम। ये कोई और नहीं बल्कि बाबू कुँवर सिंह के सेनापति हरेकृष्ण सिंह हैं। इन्होंने ही बाबू कुँवर सिंह को 1857 की क्रांति में भाग लेने के लिए राजी किया था और इनको ही सेना की कमान सौंपी गयी थी।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के महान योद्धा बाबू कुंवर सिंह के प्रमुख दूसरे सहायक सेनापति थे हरेकृष्ण सिंह। वे बाबू कुंवर सिंह के सबसे अधिक प्रभावशाली सेना में से थे। हरेकृष्ण सिंह पीरो परगना के तहसीलदार थे। 1857 के विद्रोह के समय उनकी उम्र तीस साल के करीब थी। जिस समय दानापुर छावनी में सैनिकों के बीच विद्रोह की स्वर फूट रही थी, उसकी हालात जानने के लिए बाबू कुंवर सिंह ने उन्हें वहां भेजा। वे बाबू कुंवर सिंह के वे बहुत अधिक विश्वासपात्र सैनिक थे। यही कारण है कि दानापुर सैनिक छावनी में पहुंचकर सैनिकों से गुप्त मुलाकात कर कुछ विद्रोही सैनिकों को अपने साथ लेकर आरा लौट आए।
आयर की फौज के आरा आने से लेकर कंपनी सरकार की फौज द्वारा जगदीशपुर पर कब्जा कर लेने तक जितनी लड़ाइयां हुई, उन सभी में हरेकृष्ण सिंह ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। इसके बाद वे कुंवर सिंह के साथ सासाराम की पहाड़ियों के जंगल में चले गए। इस बीच में उनकी गिरफ्तारी के लिए सरकार की ओर से तीन हजार रुपये के इनाम की घोषणा की गई थी। बाद में इनाम की यह राशि बढ़ाकर पांच हजार रुपये कर दी गई थी। हरेकृष्ण सिंह के मुकदमे के कतिपय गवाहों के बयान से प्रकट होता है कि आजमगढ़ की चढ़ाई में वे बिहार की विद्रोही सेना के सेनापति थे। इस लड़ाई में सफलता प्राप्त करने के फलस्वरुप बाबू कुंवर सिंह ने उन्हें ‘सोलार जंग’ की उपाधि से विभूषित किया था।
सन् 1858 ई के आरंभ में अपने मुकदमें में 40वीं देसी पलटन के हवलदार रणजीत राम ने जो बयान दिया था, उससे प्रकट होता है कि शिवपुर-घाट होकर गंगा पार करते समय हरेकृष्ण सिंह बाबू कुंवर सिंह के साथ थे। बाद में हरेकृष्ण सिंह ता.29 अगस्त (सन् 1859 ई)को बनारस के दशाश्वमेध के नायब कोतवाल के द्वारा बनारस जिले के भदावल परगने के दिनिया मौजा में पकड़े गए। कुछ दिनों तक वे आरा जेल में रखे गए। इसके बाद कई अपराधों के लिए उन पर मुकदमा चलाया गया। उनका विचार शाहाबाद के स्थानापन्न जज और स्पेशल कमिश्नर आर.जे.रिचर्डसन के इजलास में सन् 1857 ई के अधिनियम 14 के अनुसार उनके बारे में अदालत का फैसला हुआ कि आरा जेल से उन्हें जगदीशपुर के चौक पर ले जाए और वहां उन्हें फांसी पर लटका कर मृत्युदंड दिया जाए। स्थानापन्न जज और स्पेशल कमिश्नर ने सन् 1857 ई के अधिनियम 14 के अनुसार जो फैसला दिया था, उसके अनुसार हरेकृष्ण सिंह को जगदीशपुर के चौक पर फांसी दे दी गई।
सॉल्टलेक, राजारहाट में कार्यालय और उ. कोलकाता में घर चाहते हैं कोलकातावासी
सारे देश में पहले बिखरा, बाद में सम्भला रियल इस्टेट बाजार, मध्य कोलकाता और पूर्व कोलकाता में स्थिति निराशाजनक
सॉल्टलेक को मिल रही है राजारहाट से टक्कर
स्टाम्प शुल्क में कटौती हो तो कोलकाता में सुधर सकता है बाजार
कोलकाता : रियल इस्टेट बाजार में राजारहाट अब कोलकाता का नया लोकप्रिय ठिकाना बन रहा है। नाइट फ्रैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अब आवास और कार्यालय बनाने के लिए लोग सॉल्टलेक को पसन्द तो कर रहे हैं मगर राजारहाट का प्रदर्शन बेहतर है , वहीं कोलकाता इस लिहाज से पीछे है। वैसे सारे देश में कोरोना का असर पड़ा है और रियल इस्टेट बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा है मगर महामारी के दौरान सरकार के प्रोत्साहन और रियल इस्टेट समूहों की लचीली नीतियों के कारण लोगों का भरोसा बना रहा और दिखा भी। कोलकाता में ही ऑफिस ट्रान्जैक्शन वॉल्यूम रिकॉर्ड स्तर पर गया और 0.09 एम एन वर्ग मीटर (0.92 एम एन वर्ग फीट) रहा। महानगर में औसत डील साइज 1338 वर्ग मीटर (14,400 वर्ग फीट) रही। 2020 के एच 2 के दौरान 5975 आवासीय बिक्री हुई। लोग मकान बनाने की जगह तैयार मकान खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। हालांकि अनबिकी सम्पत्तियों की तादाद में कमी आयी है और 2020 में 14 प्रतिशत सम्पत्तियाँ नहीं बिक सकीं। नाइट फ्रैंक इंडिया के कोलकाता ब्रांच मैनेजर स्वपन दत्ता ने यह जानकारी दी।
अगर दफ्तरों के लिहाज से देखा जाए तो सॉल्टलेक लोगों की पसन्द भी और 48 प्रतिशत की हिस्सेदारी इसी इलाके की रही मगर वर्ष के दूसरे चरण में राजारहाट से सॉल्टलेक को कड़ी टक्कर मिली और इसकी साझेदारी 48 प्रतिशत रही। सलाहकार, टेलिकम्यूनिकेशन्स, मीडिया, फर्मा और कन्सल्टिंग कम्पनियों की पसन्द कोलकाता है। कार्यालय के लिए जगह की बात की जाये तो 42 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दक्षिण कोलकाता का प्रदर्शन अच्छा रहा। 2020 में कुल आवासीय इकाईयों की बिक्री में राजारहाट की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत रही। आवास के लिहाज से देखा जाये तो उत्तर कोलकाता लोगों को भा रहा है औऱ इसका कारण गरिया से दमदम एयरपोर्ट लाइन में मेट्रो का विस्तार है। सोदपुर, बी टी रोड, मध्यमग्राम और जैसोर रोड में किफायती और मध्य – आय श्रेणी की परियोजनाएं प्रतिष्ठित डेवलपरों ने शुरू की हैं। इस इलाके में 20 प्रतिशत सम्पत्तियाँ अब तक बिकी हैं। पश्चिम कोलकाता में 12 प्रतिशत सम्पत्तियाँ बिकीं और सामाजिक संरचना के अभाव के कारण माँग में कमी आई है। यही स्थिति मध्य और पूर्वी रियल इस्टेट बाजार की है। 62 प्रतिशत लोगों ने 2.5 से 5 मिलियन रुपये तक की सम्पत्ति खरीदी। 22 प्रतिशत लोगों ने 5.0 मिलियन और 15 प्रतिशत लोगों ने 2.5 मिलियन की सम्पत्ति खरीदी। विशेषज्ञों का कहना है कि महाराष्ट्र की तरह अगर बंगाल में भी राज्य सरकार स्टाम्प ड्यूटी पर थोड़ी राहत दे तो स्थिति और बेहतर हो सकती है।
कोविड ने बाजार को धक्का पहुँचाया, 8 प्रमुख शहरों में बिक्री गिरी
कोविड-19 महामारी के चलते राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली-एनसीआर) में आवासीय बिक्री बीते वर्ष के दौरान सालाना आधार पर 50 प्रतिशत घटकर 21,234 इकाई रह गई। नाइट फ्रैंक ने अपनी ताजा रिपोर्ट ‘इंडिया रियल एस्टेट – आवासीय और कार्यालय अपडेट, दूसरी छमाही 2020’ में यह खुलासा किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 में आठ प्रमुख शहरों में आवासीय संपत्तियों की बिक्री घटकर 1,54,534 इकाई रह गई, जो इससे पिछले साल 2,45,861 इकाई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक सभी आठ प्रमुख शहरों में आवासीय बिक्री में गिरावट आई, जिसमें अहमदाबाद में मांग में सबसे गिरावट और पुणे में सबसे कम गिरावट रही। आंकड़ों के अनुसार पुणे में बीते साल आवासीय बिक्री 18 प्रतिशत घटकर 26,919 इकाई रह गई, जो इससे पिछले साल 32,809 इकाई थी। इसी तरह मुंबई में बिक्री 20 प्रतिशत घटी।
स्टाम्प शुल्क में कटौती से सम्भला मुम्बई और पुणे का बाजार
रिपोर्ट में कहा गया कि संपत्तियों के पंजीकरण पर अस्थायी रूप से स्टांप शुल्क में कटौती के बाद 2020 के अंतिम चार महीनों के दौरान मुंबई और पुणे में बिक्री बढ़ी। दिल्ली-एनसीआर में 2020 के दौरान आवासीय बिक्री 50 प्रतिशत घटकर 21,234 इकाई रह गई, जो इससे पिछले साल में 42,828 इकाई थी। समीक्षाधीन अवधि के दौरान बेंगलुरु में मांग 51 प्रतिशत घटकर 23,079 इकाई रह गई। आवासीय बिक्री के लिहाज से अहमदाबाद सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ और यहां बिक्री 61 प्रतिशत घटकर 6,506 इकाई रह गयी।




