Wednesday, April 8, 2026
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रामकृष्ण मिशन के अथक प्रयास का साक्षी है स्वामी विवेकानंद के पैतृक आवास का पुनरुद्धार कार्य

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

स्वामी विवेकानन्द का घर हमेशा से उत्सुकता और कौतुहल का विषय रहा है। विवेकानन्द रोड आना – जाना तो हमेशा से होता रहा मगर घर कभी खोज नहीं सकी…यह इच्छा मन में दबी रही। आज स्वामी विवेकानन्द की जन्मस्थली को लेकर जो पड़ताल आपके सामने है, वह इसी जिज्ञासा का परिणाम और एक इच्छापूर्ति की सन्तुष्टि है। हम लिख सकते हैं, बता सकते हैं मगर अनुभूति का जो रोमांच है….वह तो यहाँ आकर ही मिलेगा इसलिए आप दुनिया के किसी भी कोने में यह आलेख पढ़ रहे हों…हमारी पड़ताल देख रहे हों…वह यहाँ आकर इस अद्भुत स्मृति को अवश्य देखें। रामकृष्ण मिशन की तत्परता, समर्पण, परिश्रम ने स्वामी जी का खोयी स्मृति को जीवन्त बनाकर पूरी मानव जाति का उपकार किया है। यह सब एक पुनरुद्धार कार्य का सुफल है जिसका बीड़ा रामकृष्ण मिशन ने उठाया…बगैर उसे जाने यह गाथा अधूरी है तो देखते हैं…समर्पण और निष्ठा के इतिहास की एक झलक –

आज यह स्वामी जी का घर रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानन्द का पैतृक आवास एवं सांस्कृतिक केन्द्र कहलाता है लेकिन यह यात्रा इतनी आसान भी नहीं थी और यहाँ जो संग्रहालय है…वह आपको इतिहास के अनोखे पन्ने तक ले जाता है। इस घर का जीर्णोद्धार हुआ और नये सिरे से सजाया गया…तब उद्घाटन हुआ 26 सितम्बर 2004 को। स्वामी जी के पैतृक आवास को लेकर बांग्ला में कोई पुस्तक नहीं थी मगर अब बांग्ला में एक पुस्तक उपलब्ध है। पुस्तक स्वामी एकरूपानंद द्वारा लिखी गयी है और पुस्तक का नाम है ‘रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद पैतृक आवास ओ सांस्कृतिक केन्द्रेर इतिवृत’।

दशकों के परिश्रम और निष्ठा की कहानी है यह पुनरुद्धार कार्य

रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी प्रेमानंद की इच्छा थी कि स्वामी विवेकानंद के पैतृक आवास का उपयोग हो। इस पर स्वामी ओम्कारेश्वरानंद ने स्वामी प्रेमानंद के कथन का उल्लेख किया है। स्वामी प्रेमानंद लिखते हैं, ‘मेरी इच्छा है कि स्वामी जी का पैतृक आवास खरीदा जाये और वहाँ पर एक विशाल शिव मंदिर बने जिसमें एक प्रार्थना सभागार और एक पुस्तकालय हो। श्री ठाकुर और स्वामी जी के नाम पर रोज प्रार्थना हो, भक्ति गीत, ध्यान हो, शास्त्रों को पढ़ा जाये, नियमित व्याख्यान हों, व्यायामशाला हो। जो युवा बेलूर मठ नहीं आ सकते, वे यहाँ आ सकें…अगर कोलकाता में ऐसे भवन की स्थापना हो तो यह उनके लिए अच्छा होगा। स्वामी जी की शिक्षा का प्रसार युवाओं में हो सकेगा तो यह देश को भी लाभ पहुँचा सकेगा।’

पर क्या यह सब इतना आसान था? हालांकि स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली को समुचित स्मारक के रूप में स्थापित करने की इच्छा संन्यासी और भक्त दशकों से महसूस कर रहे थे लेकिन 1963 तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका था। स्वामी विवेकानंद के जन्म शताब्दी वर्ष 1963 के पूर्व 1962 में तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार ने स्वामी जी की जन्म स्थली पर एक स्मारक स्थापित करने का निर्णय लिया। तब राज्य सरकार ने रामकृष्ण मिशन से इस बारे में पूछा कि क्या मिशन की रुचि इस कार्य में है, साथ ही मिशन से सरकार ने एक निश्चित प्रस्ताव देने को भी कहा। रामकृष्ण मिशन की शताब्दी कमेटी ने प्रस्ताव तैयार कर सरकार को सौंपा। राज्य सरकार ने प्रस्ताव को स्वीकार किया और 1963 में भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिसूचना जारी की। इस तरह की अधिसूचना 1973 और 1974 में भी जारी की गयी। तब तक मूल भवन ध्वस्त हो चला था, यहाँ पर 54 परिवार और छोटे व्यावसायिक केन्द्रों का भी कब्जा था। किरायेदारों ने अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला 30 साल तक चला।

अधिग्रहण के पूर्व ऐसी हो गयी थी यह विरासत

आखिरकार 1993 में स्वामी विवेकानंद के विश्व धर्म सम्मेलन में दिये गये वक्तव्य के शताब्दी वर्ष में रामकृष्ण मिशन ने किरायेदारों के साथ सीधे बातचीत से समस्या सुलझाने का निर्णय हाईकोर्ट की सहमति से लिया। तय हुआ कि रामकृष्ण मिशन किरायेदारों को वैकल्पिक आवास मुहैया करवायेगा और राज्य सरकार पूरी इमारत के साथ उससे लगी जमीन को अधिग्रहीत कर रामकृष्ण मिशन को सौंप देगी। तब तक स्वामी जी का पैतृक घर ध्वंसावशेष में तब्दील हो चुका था। ध्वस्त स्थापत्य, शेड्स और कचरे को साफ करना एक दुष्कर कार्य था। सबसे पहले यहाँ रह रहे 143 परिवारों और छोटे व्यवसायियों को कहीं और बसाना था। रामकृष्ण मिशन ने कलकत्ता इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट से जमीन खरीदी और 6 तल्ले की इमारत बनवायी जिसमें 28 फ्लैट थे। यह काफी नहीं था इसलिए मिशन ने सरकार और निजी एजेन्सियों से और अधिक फ्लैट्स और भवन खरीदे जिसमें 6 करोड़ रुपये का खर्च आया । इस काम में 7 साल लग गये। जब यह काम पूरा हुआ तो राज्य सरकार ने स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास और उससे संलग्न भूमि का अधिग्रहण किया और 26 मई 1999 को रामकृष्ण मिशन को सौंप दिया।

कहते हैं कि स्वामी जी सप्तर्षियों में से एक थे। चित्र में जो शिशु है, वह ठाकुर रामकृष्ण परमहंस हैं और संन्यासी कोई और नहीं स्वामी विवेकानंद है…इसका उल्लेख भी है

इसके अतिरिक्त संन्यासियों के आवास, प्रस्तावित ग्रामीण एवं बस्ती उन्नयन कार्य, कार पार्किंग के लिए मिशन ने स्वतन्त्र रूप से 3, गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट का उत्तरी किनारे पर भी भूमि खरीदी। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जल के टैंक, एक इलेक्ट्रिक मीटर कक्ष, जेनरेटर कक्ष, और रामकृष्ण मंच नामक एक ओपन एयर ऑडिटोरियम के लिए भी जमीन खरीदी गयी। रामकृष्ण मिशन ने स्वामी जी के पैतृक आवास की मूल संरचना में कोई बदलाव नहीं किया और भवन के मूल स्थापत्य को बहाल रखते हुए फिर से संरक्षित किया। जून 1999 से वास्तविक रूप में पुनरुद्धार कार्य आरम्भ हुआ।
हाई कोर्ट के आर्काइव से भवन का मूल नक्शा खोजकर निकाला गया। तकनीकी अध्यन किया गया और बाद में जोड़े गये अतिरिक्त भवनों की पहचान की गयी। इससे मूल भवन को चिन्हित करने में आसानी हुई। सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि ठाकुरदालान को खोज निकाला गया जो इस जीर्ण – शीर्ण तीन मंजिले भवन के पीछे छुपा था जिसे कब्जादारों ने जोड़ा था। ईंटों पर से ईंट हटाकर ठाकुरदालान को खोज निकाला गया। इसका मिलना और पुनरुद्धार होना ही वास्तव में एक चमत्कार ही है।

इसी कक्ष में हुआ था स्वामी जी का जन्म,अब यह मंदिर है

यह कार्य आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया तथा डेवलपमेंट कन्सल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड की मदद से किया गया। इस निर्माण कार्य के लिए वही सामग्री इस्तेमाल की गयी जो 18 शताब्दी के भवन निर्माण कार्य में उपयोग में लायी जाती थी इसलिए पुनरुद्धार के बाद संरक्षित भवन हेरिटेज भवन कहलाता है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, दानदाताओं और भक्तों ने इस कार्य के लिए आर्थिक सहयोग दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, कोलकाता के पूर्व मेयर सुब्रत मुखर्जी, स्थानीय सांसद तथा विधायक समेत स्थानीय संस्थाएं सहायता के लिए आगे आयीं।
10 मार्च 2001 को मिशन के तत्कालीन उपाध्यक्ष स्वामी गहनानंदजी महाराज ने प्रस्तावित रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद स्मारक तथा सांस्कृतिक केन्द्र का शिलान्यास किया। 26 सितम्बर 2004 में तत्कालीन मिशन महासचिव स्वामी स्मरणानंद जी महाराज ने इस हेरिटेज भवन संलग्न नव स्थापित संन्यासी आवास का उद्घाटन किया इसी दिन यह ऐतिहासिक भवन आम जनता के लिए खोला गया। 1 अक्टूबर 2004 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी. जे. कलाम ने सांस्कृतिक केन्द्र का उद्घाटन किया। 1 जनवरी को मिशन के तत्कालीन अध्यक्ष आत्मास्थानानंद जी महाराज ने 12.6 फीट की स्वामी विवेकानंद की कांस्य प्रतिमा का उद्घाटन किया।

अब एक झलक अतीत की तरफ, ये है दत्त परिवार का इतिहास

इस शिवलिंग की पूजा भुवनेश्वरी देवी करती थीं औऱ इनकी आराधना से ही स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ इसी कारण से वे उनको बचपन में वीरेश्वर भी कहती थीं

स्वामी विवेकानन्द के मँझले भाई महेन्द्रनाथ दत्त के अनुसार दत्त परिवार की जमीन्दारी आमलाछाड़ा नामक किसी स्थान पर थी। इसके बाद दत्त परिवार बर्दवान के कालना महकमे के डेरियाटोना (डेरेटोना) गाँव में रहने लगा। दत्त परिवार की जमीन्दारी से जुड़ा होने के कारण गाँव का नाम हुआ दत्त डेरियाटोना। मुगल शासकों के समय से ही लम्बे अरसे दत्त परिवार ने सुखपूर्वक निवास किया। इसके बाद अंग्रेजों के समय रामनिधि दत्त अपने पुत्र रामजीवन और पौत्र रामसुन्दर दत्त को लेकर गोविन्दपुर आए। आज आप जिस जीपीओ को देखते हैं, वहीं इन्होंने निवास (बांग्ला में बसतबाटी) बनाया। 1776 में नवाब सिराजुद्दौला ने ईस्ट इंडिया कम्पनी का दुर्ग ध्वस्त किया। बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने दत्त परिवार से यह जगह छोड़ने को कहा क्योंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी यहाँ नया दुर्ग बनाना चाहती थी। दत्त परिवार को पुनर्वास दिया गया उत्तर कोलकाता के सूतानाटी अन्तर्गत आने वाले सिमुलिया (शिमला या सिमला) अंचल के मधु राय लेन। तब यह इलाका जंगल हुआ करता था जिसे साफ करने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 14 रुपये दिये। इस तरह दत्त परिवार शिमला स्ट्रीट यानी आज के विवेकानंद रोड में वास करने लगा। रामनिधि और रामजीवन ऊँचे पद पर थे। समय के साथ परिवार और समृद्धि, दोनों में वृद्धि हुई, घर अनुपयोगी होने लगा। तब 300 साल पहले स्वामी विवेकानन्द के परदादा राममोहन दत्त ने 3, गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट पर यह भव्य भवन बनवाया।  12 जनवरी 1863 में स्वामी विवेकानन्द का जन्म इसी घर में हुआ और यहीं उनका बचपन गुजरा।

प्रधान कार्यालय

शिमुलिया का वह मकान
शिमुलिया में कुल 4 बीघा जमीन दत्त परिवार की थी। इसमें से डेढ़ बीघा जमीन पर मूल निवास स्थान बना, शेष ढाई बीघा जमीन पर थी पुष्करिणी (तालाब), अस्तबल, फूल – फलों से लदा बागान और कर्मचारियों के लिए रहने की जगह। यह पुष्करिणी या तालाब आज के विवेकानंद रोड और विधान सरणी का संयोग स्थल हुआ करती थी। 2 नम्बर गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट में 4 कट्ठा जमीन पर राममोहन दत्त का विशाल अस्तबल था। आज इस जगह पर रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास तथा सांस्कृतिक केन्द्र का प्रधान कार्यालय और स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस है। मूल इमारत बाहरी महल और अन्दरमहल, दो भागों में विभक्त थी। श्रद्धालुओं और आम जनता के लिए कक्ष विन्यास किया गया है जिससे स्वामी जी के जीवन की घटनाओं को सुगमता से समझाया जा सके।
मूल भवन में प्रथम दो कमरे किसके थे, यह जाना नहीं जा सका है। सम्भवतः यह बैठकखाना था। दूसरे कमरे में स्वामी जी के परिवार की वंशावली है।
मकान की एक झलक
बाहिर महल में था ठाकुर दालान, स्वामी जी के पिता विश्वनाथ दत्त का कमरा, नरेन्द्र नाथ का अध्ययन अथवा बुद्ध दर्शन कक्ष, भूपेन्द्रनाथ, महेन्द्रनाथ के कक्ष, स्वामी जी का परिधान कक्ष और संगीत चर्चा का घर। दीवारें बड़ी – बड़ी तस्वीरों से सजी रहती थीं।
वहीं अन्दरमहल स्त्रियों के लिए था। स्वामी जी की माँ भुवनेश्वरी देवी का कमरा, बड़ी बहन स्वर्णमयी का कमरा, शिव मंदिर, स्वामी जी का जन्मस्थान, ध्यान कक्ष, ठाकुर भंडार, दादी श्यामा सुन्दरी देवी का कक्ष। ठाकुरदालान पश्चिममुखी था और उसके सामने था बड़ा प्रांगण। कई बैठकखाने थे। हावड़ा के सलकिया में राममोहन दत्त की 2 उद्यान बाटी थीं और खिदिरपुर में भी कुछ सम्पत्ति थी। महेन्द्र दत्त लिखते हैं कि तब नरेन को खोजते हुए रामकृष्ण परमहंस अक्सर यहाँ आया करते थे मगर भीतर कभी प्रवेश नहीं करते थे और नन्हे भूपेन को गोद में लेकर दुलार करते।
आज का भवन

आज यह भवन रामकृष्ण मिशन के परिश्रम से सुसज्जित है। आप यहाँ पर विवेकानंद के जीवन से जुड़ी घटनाओं का चित्रण झाँकियों में देख सकते हैं। स्वामी जी का जन्म जिस कक्ष में हुआ था, वह आज विवेकानन्द मंदिर है। पिता विश्वनाथ दत्त की लिखावट, स्वामी जी द्वारा प्रयुक्त वाद्य यंत्र से लेकर खेल के सामान, उनके परिधान..सब सुरक्षित हैं। वह शिवलिंग हैं…जिसकी आराधना करके माता भुवनेश्वरी देवी को पुत्र नरेन मिला था। बहुत कम लोग जानते हैं कि बचपन में इसी कारण से माता नरेन को वीरेश्वर भी बुलाया करती थीं। दीवारों पर बड़ी – बड़ी तस्वीरें और उपरोक्त सभी कक्ष हैं। जब आप सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हैं तो एक विशाल चित्र ध्यान खींचता है। चित्र में सप्तऋषि हैं और सामने बैठे ऋषि के कान में एक शिशु कुछ कह रहा है। स्वामी सारदानन्द जी महाराज ने लीला प्रसंग में लिखा है कि बाद में स्वयं ठाकुर ने उन सबको बताया था कि यह शिशु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस हैं और यह ऋषि कोई और नहीं बल्कि स्वयं स्वामी विवेकानंद हैं। शिशु इनको कह रहा है कि वे धरती पर जा रहे हैं और ऋषि भी पीछे से आएं। इस घटना को लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। नरेन्द्र के जन्म के पहले ठाकुर भाव समाधि में एक दिन यही दृश्य देखा था और नरेन को देखकर वे समझ गये थे…यही नरेन्द्र के प्रति उनके आकर्षण का कारण भी था।
शिकॉगो धर्म सम्मेलन को लेकर थ्री डी फिल्म प्रदर्शित की जाती है और इस घर का पुनरोद्धार किस तरह किया गया…उसे लेकर भी एक वीडियो प्रदर्शित किया जाता है। मुख्य द्वार पर स्वामी जी की विशाल कांस्य प्रतिमा है और इसके सामने है प्रधान कार्यालय तथा पुस्तक विक्रय केन्द्र। इसके साथ ही है साधु व कर्मियों का निवास, निवेदिता भवन। निवेदिता भवन में चिकित्सा सेवाएं दी जाती हैं। कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र भी है। इस समय 850 सीटों वाले वातानुकूलित सभागार का निर्माण कार्य चल रहा है जिसका स्वप्न स्वामी प्रेमानंद ने देखा था, आज मिशन उसे साकार कर रहा है और यह मानव जाति पर ऐसा उपकार है जिसे इतिहास हमेशा याद रखेगा।

स्त्रोत साभार – रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंदेर पैतृक आवास ओ सांस्कृतिक केन्द्रेर इतिवृत (पुस्तक)

स्त्रोत साभार – रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास तथा सांस्कृतिक केन्द्र की वेबसाइट 

शुभजिता प्रतिभा सम्मान-रीतिका गुप्ता

नाम-रीतिका गुप्ता

शिक्षण संस्थान -सावित्री गर्ल्स कॉलेज

शौक-मुझे चित्रकला में रुचि हैं,कहानी पढ़ना,सूरदास जी की कविता पढ़ना और पढ़ाना।

 

 

श्रीमोहन तिवारी को मातृ शोक

कोलकाता  : सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी की माता जी इंगुरवास देवी का आकस्मिक निधन गुरुवार दिनांक 14/01/2021 को अपने पैतृक निवास ग्राम-बघरी, जमानिया, गाजीपुर में हो गया। उनका अंतिम संस्कार आज 15/01/2021 जमानिया घाट पर किया जाएगा। वे अपने पीछे श्रीधर-अंजनी, श्रीमोहन-रानी, संजय-रिंकी, विजय-सुनीता (पुत्र-पुत्रवधू) के अलावा पौत्र-पौत्रियों का भरा पूरा परिवार छोड़ गयी हैं। इस दुखद घटना से पूरा परिवार मर्माहत है।

भवानीपुर कॉलेज में वित्तीय विवरण की व्याख्या पर दो दिवसीय कार्यशाला

कोलकाता :  दि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट अॉफ इंडिया और ईआईआरसी के साथ भवानीपुर कॉलेज के तत्वावधान में वित्तीय विवरण की व्याख्या पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें टीसीएस जैसी कंपनी के उदाहरण देकर वित्तीय विवरण की व्याख्या की गयी। ऑन-लाइन हुए इस कार्यक्रम में कॉलेज के शिक्षकों में सीए अंकित पटवारी, सीए प्रीति मोदी, सीए के हर्षवर्धन सांघी के महत्वपूर्ण वक्तव्य रहे। इआईसीएआई के मंच पर प्रथम बार इन वक्ताओं ने अपने वित्तीय विवरण की व्याख्या द्वारा महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की जिनमें कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन और बाजार की स्थिति, कंपनी की बैलेंस शीट, नकदी प्रवाह का विवरण, लाभ हानि का विवरण आदि विषय शामिल हैं। प्रथम दिन सीए नितेश कुमार मोर अध्यक्ष आईसीएआई, ईआईआरसी और कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह की गरिमामय उपस्थिति रही। सीए हरिराम अग्रवाल आईसीएआई और ईआईआरसी के क्षेत्रीय परिषद सदस्य ने वित्तीय विवरण आडिटर रिपोर्ट और निवेशकों के लिए डायरेक्टर की रिपोर्ट, डिस्क्लोजर, आडिटर्स की रिपोर्ट से संबंधित आडिट राय के आधार पर अन्य कंपनियों की कानूनी और विनियामक आवश्यक तत्वों पर रिपोर्ट आडिटर्स रिपोर्ट आर्डर 2016 आदि पर विशद चर्चा की।
कार्यशाला के द्वितीय दिन कॉलेज के शिक्षकों सीए अंकित पटवारी, सीए प्रीति मोदी और  सीए हर्षवर्धन संघी ने वित्तीय विवरण के तत्वों पर मूल्यवान इनपुट साझा किया जिनमें बैलेंस शीट के विभिन्न मापदंडों, लाभ हानि का ब्यौरा और संबंधित विभिन्न घटकों की चर्चा, स्टॉक मार्केट के लाभ और हानि, बिक्री खरीद, अन्य खरीद के मौलिक विश्लेषण और निवेशकों की धारणा बनाने के लिए समझ, पीबीटी और ईपीएस की चर्चा की गई। फ्लिपकार्ट और भुगतान पेटीएम पर केस स्टडीज के उपयोग के विषय में जानकारी दी गई , भले ही कंपनियां मौजूदा नुकसान में चल रही हों लेकिन उसका भी अधिक मूल्यांकन , आईपीओ शेयरों के मामले में ओवर सब्सक्राइब्ड करना  जो कंपनी की दृष्टि और बाजार में उनकी पहुँच पर निर्भर होती है आदि विषयों पर चर्चा की गई। कैश फ्लो स्टेटमेंट, क्रय विक्रय लाभ हानि संपत्तियों का, लेनदार देनदार आदि पर विशेषज्ञों ने विस्तार से जानकारी दी। कार्यशाला के दो दिनों में भाग लेने वाले सभी वक्ताओं प्रतिभागियों और आयोजकों को धन्यवाद दिया गया। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ. वसुंधरा मिश्र ने।

मकर संक्रांति पर खाइए लजीज खिचड़ी

दही खि‍चड़ी
तस्वीर – जी के फूड डायरी से
सामग्री : 1 कप पके हुए चावल, 2 कप दही, 2 चम्‍मच तेल, एक चौथाई कप दूध, कटा हुआ हरा धनि‍या, 1 से 2 हरी मि‍र्च, 1 चम्‍मच चने की दाल, 1 चम्‍मच उड़द की दाल, 1 चम्‍मच राई, डेढ़ चम्‍मच कि‍सा हुआ अदरक, 2 चम्‍मच सूखा नारि‍यल, आधा चम्‍मच नमक।
वि‍धि ‍: तेल गरम करें और उसमें राई डालें। जब राई तड़कने लगे तो उसमें चने और उड़द की दाल डाल दें। एक मि‍नट बाद उसमें अदरक, धनि‍या और हरी मि‍र्च डालें और एक मि‍नट तक हि‍लाते रहें। अब इसे गैस से उतार लें और इसमें चावल, नमक और नारि‍यल मि‍लाएं। इस मि‍श्रण को दही और दूध में मि‍लाकर परोसें।
मसालेदार बांग्ला स्पेशल खिचड़ी
तस्वीर पकवान गली से
सामग्री : 100 ग्राम मूंग की दाल, 250 ग्राम बासमती चावल, एक फूल गोभी (छोटे साइज में), 100 ग्राम मटर दाना,

2 मध्यम आकार के आलू
मसाला सामग्री : 1 टुकड़ा अदरक, 2 हरी मिर्च, आधा चम्मच हल्दी, थोड़ी-सी शक्कर, 2 खड़ी लाल मिर्च, आधा चम्मच जीरा, चुटकीभर हींग, 1 टुकड़ा दालचीनी, तेजपान के पत्ते 2, 3 लौंग, 2 छोटी इलायची, एक बड़ा चम्मच देशी घी, स्वादानुसार नमक, घी में तले हुए कुछेक काजू के टुकड़ें, हरा धनिया।
विधि : पहले चावल दो-तीन बार पानी बदल कर हाथ से मसलकर धो लें। अब आलू को छीलकर लंबे टुकड़ों में काट लें। फूल गोभी को भी बड़े-बड़े टुकड़ों में काट कर रख लें। अदरक कद्दूकस कर लें और हरी मिर्च काटकर रख लें। अब एक कड़ाही में मूंग की दाल को धीमी आंच पर गुलाबी होने तक भून लें। भूनते समय घी न डालें। अब इसमें घी, खड़ी लाल मिर्च, जीरा एवं हींग को छोड़कर बाकी सारी सामग्री और धुले हुए चावल मिलाकर आधा लीटर गरम पानी में धीमी आंच पर पका लें। (पानी अपनी जरूरत के अनुसार कम-ज्यादा कर सकते हैं) ध्यान रहें कि इसे ढंककर पकाएं। इस दौरान बीच-बीच में चलाती रहे। पूरी तरह पक जाए तो समझ लीजिए की आपकी खिचड़ी तैयार हैं। इसे परोसने से पहले एक अलग बर्तन में घी गर्म करके खड़ी लाल मिर्च, जीरा और हींग का छौंक लगाकर खिचड़ी में ऊपर से डाल दें। अच्छी तरह मिलाएं और हरा धनिया और काजू के टुकड़ें बुरकाकर तैयार गरमा-गरम चटपटी बंगाली खिचड़ी कढ़ी के साथ सर्व करें।
(साभार – वेबदुनिया)
ऐसे आई खिचड़ी 
कहा जाता है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे। इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था. इससे शरीर को तुरंत उर्जा मिलती थी. नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। गोरखपुर स्थिति बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे भी प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।
(स्त्रोत – इंडिया डॉट कॉम)

प्रकृति का त्योहार है मकर संक्रांति

सुनीता सुराना, युग्म ऐस्ट्रो कन्सल्टेंसी

मकर संक्रांति !!!
प्रकृति का त्यौहार !!!
भारतीय संस्कति एक शानदार संस्कृति है।

कितने लोग जानते हैं उस ‘अच्छाई’ के बारे में जो यह परंपरा अपने साथ लाती है।

विटामिन डी सूरज की रोशनी से शरीर द्वारा बनाया जाता है।

तिल के बीज में सबसे अधिक कैल्शियम (975mg प्रति 100 ग्राम) होता है। दूध में केवल 125mg है।

शरीर एक वर्ष तक विटामिन डी का भंडारण करने में सक्षम है, और भंडार का उपयोग करता है।
अंत में, शरीर सूर्य के प्रकाश के 3 पूर्ण दिनों के साथ अपने विटामिन डी भंडार को प्राप्त करने में सक्षम है।

धूप की सबसे अच्छी गुणवत्ता सर्दियों का अंत और गर्मियों की शुरुआत है।
अब देखें कि हमारे ऋषि प्राचीन भारत के कितने बुद्धिमान थे। उन्होंने पतंग उड़ाने का त्यौहार बनाया जहाँ हमारे बच्चे सुबह की सीधी धूप से, खुले धूप में, सुबह जल्दी उठने से शुरू होने के लिए उत्साहित हो जाते हैं। और उनकी माताएँ उन्हें घर का बना तिल लड्डू खिलाती हैं।
यह तो हुई संस्कृति और सेहत कि बात अब जानते हैं
मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व ….

हमारे पवित्र पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन-मन-आत्मा को शक्ति प्रदान करता है।
संत-महर्षियों के अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। संकल्प शक्ति बढ़ती है। ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है। यह संपूर्ण भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में आयोजित होता है।
पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। हालांकि ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नहीं, लेकिन इस दिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते हैं। इसलिए पुराणों में यह दिन पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

 

स्वामी विवेकानंद जयन्ती पर राजन – साजन मिश्र की सुमधुर प्रस्तुति

नयी दिल्ली : रामकृष्ण मिशन, नयी दिल्ली द्वारा स्वामी विवेकानंद की 158वीं जयन्ती पर संगीत सन्ध्या आयोजित की गयी। इस अवसर पर प्रख्यात गायक भाई पद्म भूषण पं. द्वारा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन पाठ राजन मिश्रा और पद्म भूषण पं. साजन मिश्रा बनारस घराना के डोयेन मंगलवार 12 जनवरी 2021 को विवेकानंद सभागार में प्रस्तुत किया। तबला और हारमोनियम पर उनके साथ श्री दुर्जय भौमिक और डॉ. विनय मिश्रा थे। आप भी इस संगीत का आनन्द लें –

वर्क फ्रॉम होम : फ्रीलांस लेवल पर कर्मचारियों की होगी भर्ती, नेतृत्व में बढ़ सकती है महिलाओं की भूमिका

साल-2020 में कोरोना महामारी के चलते दुनिया भर में लॉकडाउन लगा रहा। ऐसे में कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की इजाजत दी। मजबूरी में शुरू किया गया वर्क फ्रॉम होम कल्चर बाद में कंपनियों के लिए फायदेमंद साबित हुआ।cपिछले साल वर्क फ्रॉम होम कल्चर इतना सफल रहा कि कई कंपनियों ने कोरोना के बाद भी इसे अपनाने का फैसला किया। घर से काम करने की व्यवस्था की सफलता इस साल हाइब्रिड वर्कफोर्स को बढ़ावा देगी। एक स्टडी में खुलासा किया गया है कि वर्क फ्रॉम होम की सफलता से गिग इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा।
लीडरशिप में बढ़ेगी महिलाओं की संख्या
जॉब साइट साइकी (Scikey) की रिपोर्ट 2021 टैलेंट टेक्नोलॉजी आउटलुक के मुताबिक, इस साल हाइब्रिड वर्कफोर्स देखने को मिलेगा। गिग इकोनॉमी के विस्तार से महिलाओं की लीडरशिप में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। स्टडी में कहा गया कि काम करने की अवधि खुद से तय करने से रोजगार में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ेगी। इससे भविष्य में नेतृत्व की भूमिका में भी महिलाओं की संख्या बढ़ेगी।
गिग इकोनॉमी का मतलब यह है जहां पोजिशन अस्थाई है और संस्थान कम समय के लिए कमिटमेंट वाले फ्रीलांस या टेंपरेरी कर्मचारियों की भर्ती करते हैं। यानी ये कंपनी के पेरोल पर होंगे भी और नहीं होंगे। यानी आप एक कंपनी के साथ काम करते हुए दूसरी कंपनी के साथ भी काम कर सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में एक्सटर्नल हायरिंग अधिक नहीं होगी, इसके बावजूद गिग इकोनॉमी का विस्तार होगा।
यह स्टडी 100 प्लस सी-सुईट और सर्वे, सोशल मीडिया इनपुट्स इंटरव्यूज व पैनल डिस्कशन के जरिए चुने गए 100 से अधिक ऑर्गेनाइजेशंस के ह्यूमन कैपिटल लीडर्स से प्राप्त इनपुट्स के एनालिसिस के आधार पर किया गया है। सर्वे के मुताबिक 20 फीसदी लीडर्स ने कहा कि एक्सटर्नल वेंडर्स और एचआर कंसल्टेंट्स के जरिए रिक्रूटमेंट किया जाएगा। हालांकि, शेष 80 फीसदी लोगों का कहना है कि वे इंटर्नल हायरिंग को प्रमुखता देंगे। इस प्रकार 87 फीसदी लीडर्स का मानना है कि भविष्य में सीखने, बुनियादी कौशल विकास, व्यवहारिक और नेतृत्व जैसे गुणों की महत्ता बढ़ जाएगी।

स्वर्ण ईटीएफ में पिछले साल 6,657 करोड़ रुपये का निवेश

नयी दिल्ली : कोरोना वायरस महामारी के कारण छाई आर्थिक मंदी तथा अमेरिकी डॉलर में सुस्ती के चलते 2020 में सुरक्षित निवेश के तौर पर स्वर्ण आधारित एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेशकों का आकर्षण बढ़ने से गोल्ड- ईटीएफ में 6,657 करोड़ रुपये का भारी-भरकम शुद्ध निवेश किया गया।इससे पहले साल 2019 में स्वर्ण ईटीएफ में महज 16 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश देखने को मिला था। हालांकि, 2019 में लगातार छह साल की शुद्ध निकासी के बाद इसमें शुद्ध खरीदारी हुई। इससे पहले वे वैश्विक सुस्ती तथा इक्विटी व डेट बाजारों में उथल-पुथल के चलते लगातार निकासी कर रहे थे।
एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2020 के अंत तक स्वर्ण कोषों के प्रबंधनाधीन कुल संपत्ति साल भर पहले के 5,768 करोड़ रुपये की तुलना में दो गुना से अधिक बढ़कर 14,174 करोड़ रुपये पर पहुंच गयी। पिछले साल यानी 2020 के दौरान सोना निवेशकों के लिये सुरक्षित निवेश तथा सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले साधनों में से एक बनकर उभरा। इसी कारण निवेशकों ने 2020 में 14 स्वर्ण ईटीएफ में 6,657 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया।

पूरे 2020 के दौरान देखें तो मार्च और नवंबर महीने को छोड़ शेष सभी महीने के दौरान स्वर्ण ईटीएफ में शुद्ध निवेश देखा गया। शुद्ध निवेश से तात्पर्य ईटीएफ की बिक्री करने वालों के मुकाबले खरीदार अधिक रहे।

मॉर्निंगस्टार इंडिया के शोध प्रबंधक व सहायक निदेशक हिमांशु श्रीवास्तव ने कहा कि कोरोना वायरस महामारी के चलते आयी आर्थिक मंदी, अमेरिका डॉलर में नरमी तथा अमेरिका-चीन के बीच तनाव जैसे कई कारकों के कारण निवेशक स्वर्ण इटीएफ की ओर आकर्षित हुए।

स्टार सीमेंट का 450 करोड़ रुपये की लागत से बना कारखाना तैयार

कोलकाता : स्टार सीमेंट के प्रबंध निदेशक संजय अग्रवाल ने कहा है कि कंपनी का पश्चिम बंगाल में 20 लाख टन क्षमता वाला सीमेंट कारखाना बनकर तैयार है और वाणिज्यिक उत्पादन जल्द शुरू होगा। सेंचुरी प्लाईबोर्ड इंडिया प्रवर्तित कंपनी ने कुल 450 करोड़ रुपये की लागत वाली ग्रांइडिंग इकाई को राज्य के जलपाईगुड़ी जिले में लगाया है।
अग्रवाल ने से कहा, ‘‘परियोजना का फिलहाल परीक्षण किया जा रहा है और उत्पादन जल्दी ही किसी भी समय शुरू हो सकता है। यह पश्चिम बंगाल में हमारी पहली नई सीमेंट परियोजना है। हालांकि सेंचुरी प्लाईबोर्ड का यहां प्लाईबोर्ड विनिर्माण कारखाना है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को परियोजना के उद्घाटन के लिये बुलाएंगे। हमें राज्य सरकार से पूरा समर्थन मिला है और परियोजना को सुगमतापूर्वक क्रियान्वयन किया गया।’’ कारखाना 45 एकड़ जमीन पर फैला है। इसमें से नौ एकड़ भूमि राज्य सरकार ने उपलब्ध करायी है।
स्टार सीमेंट की विनिर्माण क्षमता फिलाल 43 लाख टन है। नये कारखाने में उत्पादन शुरू होने के साथ इसकी क्षमता बढ़कर 63 लाख टन तक हो जाएगी। कंपनी की ‘क्लिंकर’ (गिट्टी या ढेला) उत्पादन क्षमता 28 लाख टन है और 51 मेगावाट क्षमता का निजी उपयोग का बिजली संयंत्र है।
कोविड-19 महामारी के कारण उत्पन्न संकट के बीच अग्रवाल ने कहा कि वह पूर्वी भारत में दीर्घकाल में सीमेंट बाजार की संभावना को लेकर आशावान हैं। फिलहाल यह बाजार 2 से 2.5 करोड़ टन का है जिसमें 8 से 9 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है।